रविवार 9 फरवरी, 2020 |

रविवार 9 फरवरी, 2020



विषयआत्म

SubjectSpirit

वर्ण पाठ: अय्यूब 33 : 4

मुझे ईश्वर की आत्मा ने बनाया है, और सर्वशक्तिमान की सांस से मुझे जीवन मिलता है।



Golden Text: Job 33 : 4

The Spirit of God hath made me, and the breath of the Almighty hath given me life.




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भजन संहिता 104 : 24, 30, 31 • I यूहन्ना 1: 1-3


24     हे यहोवा तेरे काम अनगिनित हैं! इन सब वस्तुओं को तू ने बुद्धि से बनाया है; पृथ्वी तेरी सम्पत्ति से परिपूर्ण है।

30     फिर तू अपनी ओर से सांस भेजता है, और वे सिरजे जाते हैं; और तू धरती को नया कर देता है॥

31     यहोवा की महिमा सदा काल बनी रहे, यहोवा अपने कामों से आन्दित होवे!

1     उस जीवन के वचन के विषय में जो आदि से था, जिसे हम ने सुना, और जिसे अपनी आंखों से देखा, वरन जिसे हम ने ध्यान से देखा; और हाथों से छूआ।

2     (यह जीवन प्रगट हुआ, और हम ने उसे देखा, और उस की गवाही देते हैं, और तुम्हें उस अनन्त जीवन का समाचार देते हैं, जो पिता के साथ था, और हम पर प्रगट हुआ) ।

3     जो कुछ हम ने देखा और सुना है उसका समाचार तुम्हें भी देते हैं, इसलिये कि तुम भी हमारे साथ सहभागी हो; और हमारी यह सहभागिता पिता के साथ, और उसके पुत्र यीशु मसीह के साथ है।

Responsive Reading: Psalm 104 : 24, 30, 31; I John 1 : 1-3

24.     O Lord, how manifold are thy works! in wisdom hast thou made them all: the earth is full of thy riches.

30.     Thou sendest forth thy spirit, they are created: and thou renewest the face of the earth.

31.     The glory of the Lord shall endure for ever: the Lord shall rejoice in his works.

1.     That which was from the beginning, which we have heard, which we have seen with our eyes, which we have looked upon, and our hands have handled, of the Word of life;

2.     (For the life was manifested, and we have seen it, and bear witness, and shew unto you that eternal life, which was with the Father, and was manifested unto us;)

3.     That which we have seen and heard declare we unto you, that ye also may have fellowship with us: and truly our fellowship is with the Father, and with his Son Jesus Christ.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 139: 7-10, 14 (से :)

7     मैं तेरे आत्मा से भाग कर किधर जाऊं? वा तेरे साम्हने से किधर भागूं?

8     यदि मैं आकाश पर चढूं, तो तू वहां है! यदि मैं अपना बिछौना अधोलोक में बिछाऊं तो वहां भी तू है!

9     यदि मैं भोर की किरणों पर चढ़ कर समुद्र के पार जा बसूं,

10     तो वहां भी तू अपने हाथ से मेरी अगुवाई करेगा, और अपने दाहिने हाथ से मुझे पकड़े रहेगा।

14     मैं तेरा धन्यवाद करूंगा, इसलिये कि मैं भयानक और अद्भुत रीति से रचा गया हूं।

1. Psalm 139 : 7-10, 14 (to :)

7     Whither shall I go from thy spirit? or whither shall I flee from thy presence?

8     If I ascend up into heaven, thou art there: if I make my bed in hell, behold, thou art there.

9     If I take the wings of the morning, and dwell in the uttermost parts of the sea;

10     Even there shall thy hand lead me, and thy right hand shall hold me.

14     I will praise thee; for I am fearfully and wonderfully made:

2. यूहन्ना 4: 24 (से :)

24     परमेश्वर आत्मा है।

2. John 4 : 24 (to :)

24     God is a Spirit:

3. I यूहन्ना 4 : 13

13     इसी से हम जानते हैं, कि हम उस में बने रहते हैं, और वह हम में; क्योंकि उस ने अपने आत्मा में से हमें दिया है।

3. I John 4 : 13

13     Hereby know we that we dwell in him, and he in us, because he hath given us of his Spirit.

4. रोमियो 8 : 2 (यह), 6, 9-11, 13-17, 35, 37-39

2     ... जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया।

6     शरीर पर मन लगाना तो मृत्यु है, परन्तु आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है।

9     परन्तु जब कि परमेश्वर का आत्मा तुम में बसता है, तो तुम शारीरिक दशा में नहीं, परन्तु आत्मिक दशा में हो। यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।

10     और यदि मसीह तुम में है, तो देह पाप के कारण मरी हुई है; परन्तु आत्मा धर्म के कारण जीवित है।

11     और यदि उसी का आत्मा जिस ने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया तुम में बसा हुआ है; तो जिस ने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया, वह तुम्हारी मरनहार देहों को भी अपने आत्मा के द्वारा जो तुम में बसा हुआ है जिलाएगा।

13     क्योंकि यदि तुम शरीर के अनुसार दिन काटोगे, तो मरोगे, यदि आत्मा से देह की क्रीयाओं को मारोगे, तो जीवित रहोगे।

14     इसलिये कि जितने लोग परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे ही परमेश्वर के पुत्र हैं।

15     क्योंकि तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली, कि फिर भयभीत हो परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिस से हम हे अब्बा, हे पिता कह कर पुकारते हैं।

16     आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं।

17     और यदि सन्तान हैं, तो वारिस भी, वरन परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं, जब कि हम उसके साथ दुख उठाएं कि उसके साथ महिमा भी पाएं॥

35     कौन हम को मसीह के प्रेम से अलग करेगा? क्या क्लेश, या संकट, या उपद्रव, या अकाल, या नंगाई, या जोखिम, या तलवार?

37     परन्तु इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिस ने हम से प्रेम किया है, जयवन्त से भी बढ़कर हैं।

38     क्योंकि मैं निश्चय जानता हूं, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ, न ऊंचाई,

39     न गहिराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी॥

4. Romans 8 : 2 (the), 6, 9-11, 13-17, 35, 37-39

2     …the law of the Spirit of life in Christ Jesus hath made me free from the law of sin and death.

6     For to be carnally minded is death; but to be spiritually minded is life and peace.

9     But ye are not in the flesh, but in the Spirit, if so be that the Spirit of God dwell in you. Now if any man have not the Spirit of Christ, he is none of his.

10     And if Christ be in you, the body is dead because of sin; but the Spirit is life because of righteousness.

11     But if the Spirit of him that raised up Jesus from the dead dwell in you, he that raised up Christ from the dead shall also quicken your mortal bodies by his Spirit that dwelleth in you.

13     For if ye live after the flesh, ye shall die: but if ye through the Spirit do mortify the deeds of the body, ye shall live.

14     For as many as are led by the Spirit of God, they are the sons of God.

15     For ye have not received the spirit of bondage again to fear; but ye have received the Spirit of adoption, whereby we cry, Abba, Father.

16     The Spirit itself beareth witness with our spirit, that we are the children of God:

17     And if children, then heirs; heirs of God, and joint-heirs with Christ; if so be that we suffer with him, that we may be also glorified together.

35     Who shall separate us from the love of Christ? shall tribulation, or distress, or persecution, or famine, or nakedness, or peril, or sword?

37     Nay, in all these things we are more than conquerors through him that loved us.

38     For I am persuaded, that neither death, nor life, nor angels, nor principalities, nor powers, nor things present, nor things to come,

39     Nor height, nor depth, nor any other creature, shall be able to separate us from the love of God, which is in Christ Jesus our Lord.

5. I यूहन्ना 1 : 5-7

5     जो समाचार हम ने उस से सुना, और तुम्हें सुनाते हैं, वह यह है; कि परमेश्वर ज्योति है: और उस में कुछ भी अन्धकार नहीं।

6     यदि हम कहें, कि उसके साथ हमारी सहभागिता है, और फिर अन्धकार में चलें, तो हम झूठे हैं: और सत्य पर नहीं चलते।

7     पर यदि जैसा वह ज्योति में है, वैसे ही हम भी ज्योति में चलें, तो एक दूसरे से सहभागिता रखते हैं; और उसके पुत्र यीशु का लोहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है।

5. I John 1 : 5-7

5     This then is the message which we have heard of him, and declare unto you, that God is light, and in him is no darkness at all.

6     If we say that we have fellowship with him, and walk in darkness, we lie, and do not the truth:

7     But if we walk in the light, as he is in the light, we have fellowship one with another, and the blood of Jesus Christ his Son cleanseth us from all sin.

6. मत्ती 4 : 23, 24

23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

24     और सारे सूरिया में उसका यश फैल गया; और लोग सब बीमारों को, जो नाना प्रकार की बीमारियों और दुखों में जकड़े हुए थे, और जिन में दुष्टात्माएं थीं और मिर्गी वालों और झोले के मारे हुओं को उसके पास लाए और उस ने उन्हें चंगा किया।

6. Matthew 4 : 23, 24

23     And Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing all manner of sickness and all manner of disease among the people.

24     And his fame went throughout all Syria: and they brought unto him all sick people that were taken with divers diseases and torments, and those which were possessed with devils, and those which were lunatick, and those that had the palsy; and he healed them.

7. मत्ती 15 : 30

30     और भीड़ पर भीड़ लंगड़ों, अन्धों, गूंगों, टुंड़ों, और बहुत औरों को लेकर उसके पास आए; और उन्हें उस के पांवों पर डाल दिया, और उस ने उन्हें चंगा किया।

7. Matthew 15 : 30

30     And great multitudes came unto him, having with them those that were lame, blind, dumb, maimed, and many others, and cast them down at Jesus’ feet; and he healed them:

8. प्रेरितों के काम 9 : 36-42

36     याफा में तबीता अर्थात दोरकास नाम एक विश्वासिनी रहती थी, वह बहुतेरे भले भले काम और दान किया करती थी।

37     उन्हीं दिनों में वह बीमार होकर मर गई; और उन्होंने उसे नहला कर अटारी पर रख दिया।

38     और इसलिये कि लुद्दा याफा के निकट था, चेलों ने यह सुनकर कि पतरस वहां है दो मनुष्य भेजकर उस ने बिनती की कि हमारे पास आने में देर न कर।

39     तब पतरस उठकर उन के साथ हो लिया, और जब पहुंच गया, तो वे उसे उस अटारी पर ले गए; और सब विधवाएं रोती हुई उसके पास आ खड़ी हुई: और जो कुरते और कपड़े दोरकास ने उन के साथ रहते हुए बनाए थे, दिखाने लगीं।

40     तब पतरस ने सब को बाहर कर दिया, और घुटने टेककर प्रार्थना की; और लोथ की ओर देखकर कहा; हे तबीता उठ: तब उस ने अपनी आंखे खोल दी; और पतरस को देखकर उठ बैठी।

41     उस ने हाथ देकर उसे उठाया और पवित्र लोगों और विधवाओं को बुलाकर उसे जीवित और जागृत दिखा दिया।

42     यह बात सारे याफा मे फैल गई: और बहुतेरों ने प्रभु पर विश्वास किया।

8. Acts 9 : 36-42

36     Now there was at Joppa a certain disciple named Tabitha, which by interpretation is called Dorcas: this woman was full of good works and almsdeeds which she did.

37     And it came to pass in those days, that she was sick, and died: whom when they had washed, they laid her in an upper chamber.

38     And forasmuch as Lydda was nigh to Joppa, and the disciples had heard that Peter was there, they sent unto him two men, desiring him that he would not delay to come to them.

39     Then Peter arose and went with them. When he was come, they brought him into the upper chamber: and all the widows stood by him weeping, and shewing the coats and garments which Dorcas made, while she was with them.

40     But Peter put them all forth, and kneeled down, and prayed; and turning him to the body said, Tabitha, arise. And she opened her eyes: and when she saw Peter, she sat up.

41     And he gave her his hand, and lifted her up, and when he had called the saints and widows, presented her alive.

42     And it was known throughout all Joppa; and many believed in the Lord.

9. II कुरिन्थियों 3 : 17, 18 (हम)

17     प्रभु तो आत्मा है: और जहां कहीं प्रभु का आत्मा है वहां स्वतंत्रता है।

18     ... हम सब, जिस प्रकार दर्पण में, तो प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्वी रूप में अंश अंश कर के बदलते जाते हैं॥

9. II Corinthians 3 : 17, 18 (we)

17     Now the Lord is that Spirit: and where the Spirit of the Lord is, there is liberty.

18     …we all, with open face beholding as in a glass the glory of the Lord, are changed into the same image from glory to glory, even as by the Spirit of the Lord.

10. गलातियों 6 : 8

8     क्योंकि जो अपने शरीर के लिये बोता है, वह शरीर के द्वारा विनाश की कटनी काटेगा; और जो आत्मा के लिये बोता है, वह आत्मा के द्वारा अनन्त जीवन की कटनी काटेगा।

10. Galatians 6 : 8

8     For he that soweth to his flesh shall of the flesh reap corruption; but he that soweth to the Spirit shall of the Spirit reap life everlasting.

12. यूहन्ना 6 : 63

63     आत्मा तो जीवनदायक है, शरीर से कुछ लाभ नहीं: जो बातें मैं ने तुम से कहीं हैं वे आत्मा है, और जीवन भी हैं।

11. John 6 : 63

63     It is the spirit that quickeneth; the flesh profiteth nothing: the words that I speak unto you, they are spirit, and they are life.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 467 : 3 (यह)-4

इस विज्ञान की पहली मांग है, "दूसरों को ईश्वर करके न मानना॥"

1. 467 : 3 (The)-4

The first demand of this Science is, “Thou shalt have no other gods before me."

2. 266: 27-29 (से 1st.)

मनुष्य आत्मा का विचार है; वह प्रकाश के साथ ब्रह्मांड को रोशन करते हुए, सुंदर उपस्थिति को दर्शाता है।

2. 266 : 27-29 (to 1st .)

Man is the idea of Spirit; he reflects the beatific presence, illuming the universe with light.

3. 88 : 14 केवल

विचार आध्यात्मिक, सामंजस्यपूर्ण और शाश्वत हैं।

3. 88 : 14 only

Ideas are spiritual, harmonious, and eternal.

4. 361 : 16-18

जैसे पानी की एक बूंद सागर के साथ है, सूर्य के साथ प्रकाश की एक किरण, यहां तक कि भगवान और मनुष्य, पिता और पुत्र, अस्तित्व में एक हैं।

4. 361 : 16-18

As a drop of water is one with the ocean, a ray of light one with the sun, even so God and man, Father and son, are one in being.

5. 468 : 8-15

सवाल। — होने का वैज्ञानिक कथन क्या है?

उत्तर। —पदार्थ में कोई जीवन, सत्य, बुद्धिमत्ता नहीं है, न ही पदार्थ। सब अनंत मन और उसकी अनंत अभिव्यक्ति है, भगवान के लिए सभी में है। आत्मा अमर सत्य है; मामला नश्वर त्रुटि है। आत्मा ही वास्तविक और शाश्वत है; पदार्थ असत्य और लौकिक है। आत्मा ईश्वर है, और मनुष्य उसकी छवि और समानता है। इसलिए आदमी भौतिक नहीं है; वह आध्यात्मिक है।

5. 468 : 8-15

Question. — What is the scientific statement of being?

Answer. — There is no life, truth, intelligence, nor substance in matter. All is infinite Mind and its infinite manifestation, for God is All-in-all. Spirit is immortal Truth; matter is mortal error. Spirit is the real and eternal; matter is the unreal and temporal. Spirit is God, and man is His image and likeness. Therefore man is not material; he is spiritual.

6. 346 : 2-5

जब मनुष्य को भगवान की छवि के रूप में बनाया गया है, तो यह पापी और बीमार नश्वर मनुष्य नहीं है, जिसे भगवान की समानता को दर्शाते हुए, बल्कि संदर्भित किया जाता है।

6. 346 : 2-5

When man is spoken of as made in God's image, it is not sinful and sickly mortal man who is referred to, but the ideal man, reflecting God's likeness.

7. 480 : 1-7

जब क्रिएस्टियन साइंस में आत्मा का पदार्थ दिखाई देता है, तो पदार्थ की कुछ भी मान्यता नहीं होती है। जहां परमात्मा की आत्मा है, और जहां परमात्मा नहीं है वहां कोई भी जगह नहीं है, तो बुराई कुछ भी नहीं है, - आत्मा के विपरीत। यदि कोई आध्यात्मिक प्रतिबिंब नहीं है, तो केवल रिक्तता का अंधेरा रहता है और न कि स्वर्गीय संकेतों का एक निशान।

7. 480 : 1-7

When the substance of Spirit appears in Christian Science, the nothingness of matter is recognized. Where the spirit of God is, and there is no place where God is not, evil becomes nothing, — the opposite of the something of Spirit. If there is no spiritual reflection, then there remains only the darkness of vacuity and not a trace of heavenly tints.

8. 485 : 14-27

आत्मा में पदार्थ से धीरे से उभरें। सभी चीजों के आध्यात्मिक परम को विफल करने के लिए नहीं सोचें, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य और नैतिकता के माध्यम से और आध्यात्मिक विकास के परिणामस्वरूप आत्मा में स्वाभाविक रूप से आएं। मृत्यु नहीं, बल्कि जीवन की समझ मनुष्य को अमर बनाती है। यह विश्वास कि जीवन पदार्थ या आत्मा शरीर में हो सकता है, और वह मनुष्य धूल या अंडे से पैदा होता है, वह नश्वर त्रुटि का परिणाम है जो मसीह, या सत्य, होने के आध्यात्मिक नियम को पूरा करके नष्ट कर देता है, जिसमें मनुष्य परिपूर्ण है, जैसा कि "तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है॥" यदि विचार अन्य शक्तियों पर अपना प्रभुत्व प्राप्त करता है, तो यह शरीर की अपनी सुंदर छवियों को रेखांकित नहीं कर सकता है, लेकिन यह उन्हें संक्रमित करता है और रोग और पाप नामक विदेशी एजेंटों को बचाता है।

8. 485 : 14-27

Emerge gently from matter into Spirit. Think not to thwart the spiritual ultimate of all things, but come naturally into Spirit through better health and morals and as the result of spiritual growth. Not death, but the understanding of Life, makes man immortal. The belief that life can be in matter or soul in body, and that man springs from dust or from an egg, is the result of the mortal error which Christ, or Truth, destroys by fulfilling the spiritual law of being, in which man is perfect, even as the "Father which is in heaven is perfect." If thought yields its dominion to other powers, it cannot outline on the body its own beautiful images, but it effaces them and delineates foreign agents, called disease and sin. 

9. 301 : 17-23, 24-29

जैसा कि ईश्वर पदार्थ है और मनुष्य ईश्वरीय छवि और समानता है, मनुष्य को आत्मा के पदार्थ की इच्छा करनी चाहिए, केवल पदार्थ की, न कि पदार्थ की और वास्तव में उसने ऐसा किया है। यह विश्वास कि मनुष्य के पास कोई अन्य पदार्थ या मन है, आध्यात्मिक नहीं है और पहले आज्ञा को तोड़ता है, आप एक ईश्वर को, एक मन को स्वीकार करेंगे। … भ्रम, पाप, बीमारी और मृत्यु भौतिक अर्थों की झूठी गवाही से उत्पन्न होती है, जो कि अनंत आत्मा की केंद्रीय दूरी के बाहर एक निश्चित दृष्टिकोण से, मन और पदार्थ की एक उलटी छवि प्रस्तुत करता है और सब कुछ उल्टा हो जाता है।

9. 301 : 17-23, 24-29

As God is substance and man is the divine image and likeness, man should wish for, and in reality has, only the substance of good, the substance of Spirit, not matter. The belief that man has any other substance, or mind, is not spiritual and breaks the First Commandment, Thou shalt have one God, one Mind. … Delusion, sin, disease, and death arise from the false testimony of material sense, which, from a supposed standpoint outside the focal distance of infinite Spirit, presents an inverted image of Mind and substance with everything turned upside down.

10. 303 : 21-15

यह विश्वास कि पीड़ा और आनंद, जीवन और मृत्यु, पवित्रता और अपवित्रता, मनुष्य में घुलमिल जाती है, - वह नश्वर, भौतिक मनुष्य भगवान की समानता है और वह स्वयं एक निर्माता है, - एक घातक त्रुटि है।

ईश्वर, स्वयं की छवि और समानता के बिना, एक गैर-बराबरी, या मन अप्रभावित होगा। वह अपने स्वयं के स्वभाव के गवाह या सबूत के बिना होगा। आध्यात्मिक मनुष्य ईश्वर की छवि या विचार है, एक ऐसा विचार जो न तो खो सकता है और न ही अपने ईश्वरीय सिद्धांत से अलग हो सकता है। जब भौतिक ज्ञान के प्रति अनुभूतियां हुईं, तब प्रेरितों ने यह घोषणा की कि कुछ भी उसे ईश्वर, मीठे भाव और जीवन और सत्य की उपस्थिति से अलग नहीं कर सकता।

यह ज्ञान और असत्य विश्वास है, भौतिक वस्तुओं पर आधारित है, जो आध्यात्मिक सौंदर्य और गुडई को छिपाते हैं। यह समझ में आया, पॉल ने कहा: "न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रादित्य, न वर्तमान, न भविष्य, न समृति, न ऊंचाई, न यशैरी और न नो और सृष्टि, हमें भगवान के प्रेम से ...।" अलग कर संभव है। " यह क्रिश्चियन साइंस का सिद्धांत है: उस दिव्य प्रेम को उसकी अभिव्यक्ति, या वस्तु से वंचित नहीं किया जा सकता है; वह आनन्द दुःख में नहीं बदल सकता, क्योंकि दुःख आनन्द का स्वामी नहीं है; वह अच्छाई कभी स्पष्ट नहीं कर सकता; वह पदार्थ कभी भी मन उत्पन्न नहीं कर सकता है और न ही जीवन का परिणाम मृत्यु है। पूर्ण पुरुष - भगवान द्वारा शासित, उनका सिद्ध सिद्धांत - पाप रहित और शाश्वत है

10. 303 : 21-15

The belief that pain and pleasure, life and death, holiness and unholiness, mingle in man, — that mortal, material man is the likeness of God and is himself a creator, — is a fatal error.

God, without the image and likeness of Himself, would be a nonentity, or Mind unexpressed. He would be without a witness or proof of His own nature. Spiritual man is the image or idea of God, an idea which cannot be lost nor separated from its divine Principle. When the evidence before the material senses yielded to spiritual sense, the apostle declared that nothing could alienate him from God, from the sweet sense and presence of Life and Truth.

It is ignorance and false belief, based on a material sense of things, which hide spiritual beauty and goodness. Understanding this, Paul said: "Neither death, nor life, … nor things present, nor things to come, nor height, nor depth, nor any other creature, shall be able to separate us from the love of God." This is the doctrine of Christian Science: that divine Love cannot be deprived of its manifestation, or object; that joy cannot be turned into sorrow, for sorrow is not the master of joy; that good can never produce evil; that matter can never produce mind nor life result in death. The perfect man — governed by God, his perfect Principle — is sinless and eternal.

11. 476 : 9-15, 32-4

ईश्वर मनुष्य का सिद्धांत है, और मनुष्य ईश्वर का विचार है। इसलिए मनुष्य न तो नश्वर है और न ही भौतिक। नश्वर गायब हो जाएंगे, और अमर होंगे, या भगवान की संतान, मनुष्य के एकमात्र और अनन्त सत्य के रूप में दिखाई देंगे। मुर्दा भगवान के बच्चे नहीं हैं। उनके पास कभी भी पूर्ण राज्य नहीं था, जिसे बाद में फिर से हासिल किया जा सकता है।

यीशु ने विज्ञान में सिद्ध पुरुष को सही ठहराया, जो उसे दिखाई दिया जहां पाप करने वाला नश्वर मनुष्य नश्वर प्रतीत होता है। इस सिद्ध पुरुष में उद्धारकर्ता ने परमेश्वर की अपनी समानता को देखा, और मनुष्य के इस सही दृष्टिकोण ने बीमारों को चंगा किया।

11. 476 : 9-15, 32-4

God is the Principle of man, and man is the idea of God. Hence man is not mortal nor material. Mortals will disappear, and immortals, or the children of God, will appear as the only and eternal verities of man. Mortals are not fallen children of God. They never had a perfect state of being, which may subsequently be regained.

Jesus beheld in Science the perfect man, who appeared to him where sinning mortal man appears to mortals. In this perfect man the Saviour saw God's own likeness, and this correct view of man healed the sick.

12. 470 : 32-5

ईश्वर और मनुष्य के संबंध, ईश्वरीय सिद्धांत और विचार, विज्ञान में अविनाशी हैं; और विज्ञान न तो कोई चूक जानता है और न ही सद्भाव में लौटता है, लेकिन ईश्वरीय आदेश या आध्यात्मिक कानून रखता है, जिसमें ईश्वर और वह जो कुछ भी बनाता है वह परिपूर्ण और शाश्वत है, जो उसके शाश्वत इतिहास में अपरिवर्तित रहा है।

12. 470 : 32-5

The relations of God and man, divine Principle and idea, are indestructible in Science; and Science knows no lapse from nor return to harmony, but holds the divine order or spiritual law, in which God and all that He creates are perfect and eternal, to have remained unchanged in its eternal history.

13. 516 : 2-4, 21-23

जैसे दर्पण में स्वयं का प्रतिबिंब दिखाई देता है, वैसे ही आप आध्यात्मिक होने के कारण भगवान के प्रतिबिंब हैं।

भगवान के साथ सहवास और शाश्वत के रूप में आदमी और औरत हमेशा के लिए, अनंत पिता-माता भगवान की महिमा में परिलक्षित होते हैं।

13. 516 : 2-4, 21-23

As the reflection of yourself appears in the mirror, so you, being spiritual, are the reflection of God.

Man and woman as coexistent and eternal with God forever reflect, in glorified quality, the infinite Father-Mother God.

14. 476 : 18-22

पाप, बीमारी, और मृत्यु को उन तथ्यों को जगह देनी होगी जो अमर आदमी के हैं।

हे नश्वर, इसे सीखो, और ईमानदारी से मनुष्य की आध्यात्मिक स्थिति की तलाश करो, जो सभी भौतिक स्वार्थों से परे है।

14. 476 : 18-22

Sin, sickness, and death must disappear to give place to the facts which belong to immortal man.

Learn this, O mortal, and earnestly seek the spiritual status of man, which is outside of all material selfhood.

15. 477 : 20 (पहचान)-25

पहचान आत्मा का प्रतिबिंब है, जीवित सिद्धांत, प्रेम के विविध रूपों में प्रतिबिंब है। आत्मा ही मनुष्य का पदार्थ, जीवन और बुद्धिमत्ता है, जो व्यक्तिगत है, लेकिन पदार्थ में नहीं। आत्मा कभी भी आत्मा से हीन कुछ भी नहीं कर सकती है।

15. 477 : 20 (Identity)-25

Identity is the reflection of Spirit, the reflection in multifarious forms of the living Principle, Love. Soul is the substance, Life, and intelligence of man, which is individualized, but not in matter. Soul can never reflect anything inferior to Spirit.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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