रविवार 9 जुलाई, 2023



विषयधर्मविधि

SubjectSacrament

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: होशे 6: 6

"क्योंकि मैं बलिदान से नहीं, स्थिर प्रेम ही से प्रसन्न होता हूं, और होमबलियों से अधिक यह चाहता हूं कि लोग परमेश्वर का ज्ञान रखें॥"



Golden Text: Hosea 6 : 6

I desired mercy, and not sacrifice; and the knowledge of God more than burnt offerings.




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उत्तरदायी अध्ययन: याकूब 1: 21-27


21     इसलिये सारी मलिनता और बैर भाव की बढ़ती को दूर करके, उस वचन को नम्रता से ग्रहण कर लो, जो हृदय में बोया गया और जो तुम्हारे प्राणों का उद्धार कर सकता है।

22     परन्तु वचन पर चलने वाले बनो, और केवल सुनने वाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं।

23     क्योंकि जो कोई वचन का सुनने वाला हो, और उस पर चलने वाला न हो, तो वह उस मनुष्य के समान है जो अपना स्वाभाविक मुंह दर्पण में देखता है।

24     इसलिये कि वह अपने आप को देख कर चला जाता, और तुरन्त भूल जाता है कि मैं कैसा था।

25     पर जो व्यक्ति स्वतंत्रता की सिद्ध व्यवस्था पर ध्यान करता रहता है, वह अपने काम में इसलिये आशीष पाएगा कि सुनकर नहीं, पर वैसा ही काम करता है।

26     यदि कोई अपने आप को भक्त समझे, और अपनी जीभ पर लगाम न दे, पर अपने हृदय को धोखा दे, तो उस की भक्ति व्यर्थ है।

27     हमारे परमेश्वर और पिता के निकट शुद्ध और निर्मल भक्ति यह है, कि अनाथों और विधवाओं के क्लेश में उन की सुधि लें, और अपने आप को संसार से निष्कलंक रखें॥

Responsive Reading: James 1 : 21-27

21.     Wherefore lay apart all filthiness and superfluity of naughtiness, and receive with meekness the engrafted word, which is able to save your souls.

22.     But be ye doers of the word, and not hearers only, deceiving your own selves.

23.     For if any be a hearer of the word, and not a doer, he is like unto a man beholding his natural face in a glass:

24.     For he beholdeth himself, and goeth his way, and straightway forgetteth what manner of man he was.

25.     But whoso looketh into the perfect law of liberty, and continueth therein, he being not a forgetful hearer, but a doer of the work, this man shall be blessed in his deed.

26.     If any man among you seem to be religious, and bridleth not his tongue, but deceiveth his own heart, this man’s religion is vain.

27.     Pure religion and undefiled before God and the Father is this, To visit the fatherless and widows in their affliction, and to keep himself unspotted from the world.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. मीका 6: 6-8

6     मैं क्या ले कर यहोवा के सम्मुख आऊं, और ऊपर रहने वाले परमेश्वर के साम्हने झुकूं? क्या मैं होमबलि के लिये एक एक वर्ष के बछड़े ले कर उसके सम्मुख आऊं?

7     क्या यहोवा हजारों मेढ़ों से, वा तेल की लाखों नदियों से प्रसन्न होगा? क्या मैं अपने अपराध के प्रायश्चित्त में अपने पहिलौठे को वा अपने पाप के बदले में अपने जन्माए हुए किसी को दूं?

8     हे मनुष्य, वह तुझे बता चुका है कि अच्छा क्या है; और यहोवा तुझ से इसे छोड़ और क्या चाहता है, कि तू न्याय से काम करे, और कृपा से प्रीति रखे, और अपने परमेश्वर के साथ नम्रता से चले?

1. Micah 6 : 6-8

6     Wherewith shall I come before the Lord, and bow myself before the high God? shall I come before him with burnt offerings, with calves of a year old?

7     Will the Lord be pleased with thousands of rams, or with ten thousands of rivers of oil? shall I give my firstborn for my transgression, the fruit of my body for the sin of my soul?

8     He hath shewed thee, O man, what is good; and what doth the Lord require of thee, but to do justly, and to love mercy, and to walk humbly with thy God?

2. मत्ती 4: 23

23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

2. Matthew 4 : 23

23     And Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing all manner of sickness and all manner of disease among the people.

3. मत्ती 5: 1, 2, 13-16, 20

1     वह इस भीड़ को देखकर, पहाड़ पर चढ़ गया; और जब बैठ गया तो उसके चेले उसके पास आए।

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

13     तुम पृथ्वी के नमक हो; परन्तु यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए, तो वह फिर किस वस्तु से नमकीन किया जाएगा? फिर वह किसी काम का नहीं, केवल इस के कि बाहर फेंका जाए और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाए।

14     तुम जगत की ज्योति हो; जो नगर पहाड़ पर बसा हुआ है वह छिप नहीं सकता।

15     और लोग दिया जलाकर पैमाने के नीचे नहीं परन्तु दीवट पर रखते हैं, तब उस से घर के सब लोगों को प्रकाश पहुंचता है।

16     उसी प्रकार तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के साम्हने चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में हैं, बड़ाई करें॥

20     क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि यदि तुम्हारी धामिर्कता शास्त्रियों और फरीसियों की धामिर्कता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे॥

3. Matthew 5 : 1, 2, 13-16, 20

1     And seeing the multitudes, he went up into a mountain: and when he was set, his disciples came unto him:

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

13     Ye are the salt of the earth: but if the salt have lost his savour, wherewith shall it be salted? it is thenceforth good for nothing, but to be cast out, and to be trodden under foot of men.

14     Ye are the light of the world. A city that is set on an hill cannot be hid.

15     Neither do men light a candle, and put it under a bushel, but on a candlestick; and it giveth light unto all that are in the house.

16     Let your light so shine before men, that they may see your good works, and glorify your Father which is in heaven.

20     For I say unto you, That except your righteousness shall exceed the righteousness of the scribes and Pharisees, ye shall in no case enter into the kingdom of heaven.

4. मत्ती 6: 5, 6

5     और जब तू प्रार्थना करे, तो कपटियों के समान न हो क्योंकि लोगों को दिखाने के लिये सभाओं में और सड़कों के मोड़ों पर खड़े होकर प्रार्थना करना उन को अच्छा लगता है; मैं तुम से सच कहता हूं, कि वे अपना प्रतिफल पा चुके।

6     परन्तु जब तू प्रार्थना करे, तो अपनी कोठरी में जा; और द्वार बन्द कर के अपने पिता से जो गुप्त में है प्रार्थना कर; और तब तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा।

4. Matthew 6 : 5, 6

5     And when thou prayest, thou shalt not be as the hypocrites are: for they love to pray standing in the synagogues and in the corners of the streets, that they may be seen of men. Verily I say unto you, They have their reward.

6     But thou, when thou prayest, enter into thy closet, and when thou hast shut thy door, pray to thy Father which is in secret; and thy Father which seeth in secret shall reward thee openly.

5. मत्ती 23: 1-12, 27, 28

1     तब यीशु ने भीड़ से और अपने चेलों से कहा।

2     शास्त्री और फरीसी मूसा की गद्दी पर बैठे हैं।

3     इसलिये वे तुम से जो कुछ कहें वह करना, और मानना; परन्तु उन के से काम मत करना; क्योंकि वे कहते तो हैं पर करते नहीं।

4     वे एक ऐसे भारी बोझ को जिन को उठाना कठिन है, बान्धकर उन्हें मनुष्यों के कन्धों पर रखते हैं; परन्तु आप उन्हें अपनी उंगली से भी सरकाना नहीं चाहते।

5     वे अपने सब काम लोगों को दिखाने के लिये करते हैं: वे अपने तावीजों को चौड़े करते, और अपने वस्त्रों की को रें बढ़ाते हैं।

6     जेवनारों में मुख्य मुख्य जगहें, और सभा में मुख्य मुख्य आसन।

7     और बाजारों में नमस्कार और मनुष्य में रब्बी कहलाना उन्हें भाता है।

8     परन्तु, तुम रब्बी न कहलाना; क्योंकि तुम्हारा एक ही गुरू है: और तुम सब भाई हो।

9     और पृथ्वी पर किसी को अपना पिता न कहना, क्योंकि तुम्हारा एक ही पिता है, जो स्वर्ग में है।

10     और स्वामी भी न कहलाना, क्योंकि तुम्हारा एक ही स्वामी है, अर्थात मसीह।

11     जो तुम में बड़ा हो, वह तुम्हारा सेवक बने।

12     जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा: और जो कोई अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा॥

27     हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय; तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हिड्डयों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं।

28     इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो॥

5. Matthew 23 : 1-12, 27, 28

1     Then spake Jesus to the multitude, and to his disciples,

2     Saying, The scribes and the Pharisees sit in Moses’ seat:

3     All therefore whatsoever they bid you observe, that observe and do; but do not ye after their works: for they say, and do not.

4     For they bind heavy burdens and grievous to be borne, and lay them on men’s shoulders; but they themselves will not move them with one of their fingers.

5     But all their works they do for to be seen of men: they make broad their phylacteries, and enlarge the borders of their garments,

6     And love the uppermost rooms at feasts, and the chief seats in the synagogues,

7     And greetings in the markets, and to be called of men, Rabbi, Rabbi.

8     But be not ye called Rabbi: for one is your Master, even Christ; and all ye are brethren.

9     And call no man your father upon the earth: for one is your Father, which is in heaven.

10     Neither be ye called masters: for one is your Master, even Christ.

11     But he that is greatest among you shall be your servant.

12     And whosoever shall exalt himself shall be abased; and he that shall humble himself shall be exalted.

27     Woe unto you, scribes and Pharisees, hypocrites! for ye are like unto whited sepulchres, which indeed appear beautiful outward, but are within full of dead men’s bones, and of all uncleanness.

28     Even so ye also outwardly appear righteous unto men, but within ye are full of hypocrisy and iniquity.

6. मत्ती 26: 17-19, 26-28

17     अखमीरी रोटी के पर्व्व के पहिले दिन, चेले यीशु के पास आकर पूछने लगे; तू कहां चाहता है कि हम तेरे लिये फसह खाने की तैयारी करें?

18     उस ने कहा, नगर में फुलाने के पास जाकर उस से कहो, कि गुरू कहता है, कि मेरा समय निकट है, मैं अपने चेलों के साथ तेरे यहां पर्व्व मनाऊंगा।

19     सो चेलों ने यीशु की आज्ञा मानी, और फसह तैयार किया।

26     उस ने उस से कहा, तू कह चुका: जब वे खा रहे थे, तो यीशु ने रोटी ली, और आशीष मांग कर तोड़ी, और चेलों को देकर कहा, लो, खाओ; यह मेरी देह है।

27     फिर उस ने कटोरा लेकर, धन्यवाद किया, और उन्हें देकर कहा, तुम सब इस में से पीओ।

28     क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लोहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है।

29     मैं तुम से कहता हूं, कि दाख का यह रस उस दिन तक कभी न पीऊंगा, जब तक तुम्हारे साथ अपने पिता के राज्य में नया न पीऊं॥

6. Matthew 26 : 17-19, 26-28

17     Now the first day of the feast of unleavened bread the disciples came to Jesus, saying unto him, Where wilt thou that we prepare for thee to eat the passover?

18     And he said, Go into the city to such a man, and say unto him, The Master saith, My time is at hand; I will keep the passover at thy house with my disciples.

19     And the disciples did as Jesus had appointed them; and they made ready the passover.

26     And as they were eating, Jesus took bread, and blessed it, and brake it, and gave it to the disciples, and said, Take, eat; this is my body.

27     And he took the cup, and gave thanks, and gave it to them, saying, Drink ye all of it;

28     For this is my blood of the new testament, which is shed for many for the remission of sins.

7. यूहन्ना 15: 1-5, 7, 8

1     सच्ची दाखलता मैं हूं; और मेरा पिता किसान है।

2     जो डाली मुझ में है, और नहीं फलती, उसे वह काट डालता है, और जो फलती है, उसे वह छांटता है ताकि और फले।

3     तुम तो उस वचन के कारण जो मैं ने तुम से कहा है, शुद्ध हो।

4     तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में: जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते।

5     मैं दाखलता हूं: तुम डालियां हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।

7     यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो मांगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।

8     मेरे पिता की महिमा इसी से होती है, कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे।

7. John 15 : 1-5, 7, 8

1     I am the true vine, and my Father is the husbandman.

2     Every branch in me that beareth not fruit he taketh away: and every branch that beareth fruit, he purgeth it, that it may bring forth more fruit.

3     Now ye are clean through the word which I have spoken unto you.

4     Abide in me, and I in you. As the branch cannot bear fruit of itself, except it abide in the vine; no more can ye, except ye abide in me.

5     I am the vine, ye are the branches: He that abideth in me, and I in him, the same bringeth forth much fruit: for without me ye can do nothing.

7     If ye abide in me, and my words abide in you, ye shall ask what ye will, and it shall be done unto you.

8     Herein is my Father glorified, that ye bear much fruit; so shall ye be my disciples.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 9: 5-16

इन सवालों के जवाब में सभी प्रार्थनाओं का परीक्षण निहित है: क्या हम इस आज्ञा के कारण अपने पड़ोसी से बेहतर प्रेम करते हैं? क्या हम पुराने स्वार्थ का पीछा करते हैं, किसी चीज़ के लिए बेहतर प्रार्थना करने से संतुष्ट हैं, हालाँकि हम अपनी प्रार्थना के साथ लगातार रहकर अपने अनुरोधों की ईमानदारी का कोई सबूत नहीं देते हैं? अगर स्वार्थ ने दया को जगह दी है, तो हम अपने पड़ोसी को निस्वार्थ रूप से सम्मान देंगे, और उन्हें आशीर्वाद देंगे कि हमें अभिशाप दें; लेकिन हम इस महान कर्तव्य को कभी नहीं पूछेंगे कि यह किया जाए। इससे पहले कि हम अपनी आशा और विश्वास के फल का आनंद ले सकें, हमें एक क्रास उठाना होगा।

1. 9 : 5-16

The test of all prayer lies in the answer to these questions: Do we love our neighbor better because of this asking? Do we pursue the old selfishness, satisfied with having prayed for something better, though we give no evidence of the sincerity of our requests by living consistently with our prayer? If selfishness has given place to kindness, we shall regard our neighbor unselfishly, and bless them that curse us; but we shall never meet this great duty simply by asking that it may be done. There is a cross to be taken up before we can enjoy the fruition of our hope and faith.

2. 11: 22-32 (से 2nd.)

हम जानते हैं कि पवित्रता पाने के लिए पवित्रता की इच्छा आवश्यक है; लेकिन अगर हम सब से ऊपर पवित्रता की इच्छा रखते हैं, तो हम इसके लिए सब कुछ त्याग देंगे। हमें ऐसा करने के लिए तैयार होना चाहिए, ताकि हम पवित्रता के लिए एकमात्र व्यावहारिक मार्ग में सुरक्षित रूप से चल सकें। अपरिवर्तनीय सत्य को नहीं बदल सकती, न ही केवल प्रार्थना हमें सत्य की समझ दे सकती है; लेकिन प्रार्थना, भगवान की इच्छा को जानने और करने की उत्कट अभ्यस्त इच्छा के साथ मिलकर, हमें सभी सत्य में लाएगी। ऐसी इच्छा को श्रव्य अभिव्यक्ति की बहुत कम आवश्यकता होती है। यह विचार और जीवन में सबसे अच्छा व्यक्त किया गया है।

2. 11 : 22-32 (to 2nd .)

We know that a desire for holiness is requisite in order to gain holiness; but if we desire holiness above all else, we shall sacrifice everything for it. We must be willing to do this, that we may walk securely in the only practical road to holiness. Prayer cannot change the unalterable Truth, nor can prayer alone give us an understanding of Truth; but prayer, coupled with a fervent habitual desire to know and do the will of God, will bring us into all Truth. Such a desire has little need of audible expression. It is best expressed in thought and in life.

3. 7: 27-32 (से 2nd.)

प्रार्थना से खतरा यह है कि यह हमें प्रलोभन में ले जा सकती है। इसके द्वारा हम अनैच्छिक पाखंडी बन सकते हैं, ऐसी इच्छाओं का उच्चारण करना जो वास्तविक नहीं हैं और पाप के बीच में खुद को इस स्मरण के साथ सांत्वना देते हैं कि हमने इसके लिए प्रार्थना की है या यह बाद के दिनों में क्षमा मांगने का एक साधन है। पाखंड धर्म के लिए घातक है।

3. 7 : 27-32 (to 2nd .)

The danger from prayer is that it may lead us into temptation. By it we may become involuntary hypocrites, uttering desires which are not real and consoling ourselves in the midst of sin with the recollection that we have prayed over it or mean to ask forgiveness at some later day. Hypocrisy is fatal to religion.

4. 15: 23-24, 26-30

गुरु का आदेश है कि हम गुप्त रूप से प्रार्थना करें और अपने जीवन को अपनी ईमानदारी को प्रमाणित करने दें।

आत्म-विस्मृति, पवित्रता और स्नेह निरंतर प्रार्थना है। पेशा नहीं, अभ्यास विश्वास नहीं समझ, सर्वशक्तिमान के कान और नेक हाथ और वे निश्चय ही असीम आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

4. 15 : 23-24, 26-30

The Master's injunction is, that we pray in secret and let our lives attest our sincerity.

Self-forgetfulness, purity, and affection are constant prayers. Practice not profession, understanding not belief, gain the ear and right hand of omnipotence and they assuredly call down infinite blessings.

5. 19: 29-13

यीशु ने इस आज्ञा का आग्रह किया, "तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना," जिसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है: आपको नश्वर के रूप में जीवन का कोई विश्वास नहीं होगा; तुम बुराई को नहीं जानोगे, क्योंकि एक ही जीवन है - भगवान, अच्छा। उन्होंने प्रतिपादन किया "जो कैसर का है, वह कैसर को; और जो परमेश्वर का है, वह परमेश्वर को दो।" अंत में उन्होंने सिद्धांत के रूपों या मनुष्य के सिद्धांतों के प्रति कोई सम्मान नहीं दिया, लेकिन आत्मा द्वारा नहीं बल्कि आत्मा द्वारा स्थानांतरित किए जाने पर अभिनय किया और बोला।

यीशु ने कर्मकांड के पुजारी और पाखंडी फरीसी से कहा, "कि महसूल लेने वाले और वेश्या तुम से पहिले परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करते हैं।" यीशु के इतिहास ने एक नया कैलेंडर बनाया, जिसे हम ईसाई युग कहते हैं; लेकिन उन्होंने कोई पूजा पाठ नहीं किया। वह जानता था कि पुरुषों को बपतिस्मा दिया जा सकता है, यूचरिस्ट का हिस्सा बन सकता है, पादरी का समर्थन कर सकता है, सब्त का पालन कर सकता है, लंबी प्रार्थना कर सकता है, और फिर भी कामुक और पापी हो सकता है।

5. 19 : 29-13

Jesus urged the commandment, "Thou shalt have no other gods before me," which may be rendered: Thou shalt have no belief of Life as mortal; thou shalt not know evil, for there is one Life, — even God, good. He rendered "unto Caesar the things which are Caesar's; and unto God the things that are God's." He at last paid no homage to forms of doctrine or to theories of man, but acted and spake as he was moved, not by spirits but by Spirit.

To the ritualistic priest and hypocritical Pharisee Jesus said, "The publicans and the harlots go into the kingdom of God before you." Jesus' history made a new calendar, which we call the Christian era; but he established no ritualistic worship. He knew that men can be baptized, partake of the Eucharist, support the clergy, observe the Sabbath, make long prayers, and yet be sensual and sinful.

6. 25: 13-21

यीशु ने प्रदर्शन के द्वारा जीवन का मार्ग सिखाया, कि हम समझ सकते हैं कि यह दिव्य सिद्धांत कैसे बीमारों को चंगा करता है, त्रुटि को जन्म देता है, और मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है। यीशु ने ईश्वर के आदर्श को किसी भी ऐसे व्यक्ति की तुलना में बेहतर प्रस्तुत किया जिसकी उत्पत्ति कम आध्यात्मिक थी। परमेश्वर की आज्ञाकारिता के द्वारा, उसने आध्यात्मिक रूप से सभी दूसरों के सिद्धांत का प्रदर्शन किया। अत: उसके पालन की शक्ति, "यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।"

6. 25 : 13-21

Jesus taught the way of Life by demonstration, that we may understand how this divine Principle heals the sick, casts out error, and triumphs over death. Jesus presented the ideal of God better than could any man whose origin was less spiritual. By his obedience to God, he demonstrated more spiritually than all others the Principle of being. Hence the force of his admonition, "If ye love me, keep my commandments."

7. 31: 12-22 (से.)

सबसे पहले ईसाई कर्तव्यों की सूची में, उन्होंने अपने अनुयायियों को सत्य और प्रेम की उपचार शक्ति सिखाई। उन्होंने मृत समारोहों के लिए कोई महत्व नहीं दिया। यह जीवित मसीह है, व्यावहारिक सत्य है, जो यीशु को उन सभी लोगों के लिए "पुनरुत्थान और जीवन" बनाता है जो उसे विलेख में पालन करते हैं। उनकी कीमती उपदेशों का पालन करते हुए, — उनके प्रदर्शन के बाद अब तक हम इसे स्वीकार करते हैं, — हम उसके प्याले को पीते हैं, हम उसकी रोटी का हिस्सा बनाते हैं, उसकी पवित्रता से बपतिस्मा लेते हैं: और अंत में हम मृत्यु के ऊपर विजय प्राप्त करने वाले दिव्य सिद्धांत की पूर्ण समझ में, उसके साथ बैठेंगे।

7. 31 : 12-22 (to .)

First in the list of Christian duties, he taught his followers the healing power of Truth and Love. He attached no importance to dead ceremonies. It is the living Christ, the practical Truth, which makes Jesus "the resurrection and the life" to all who follow him in deed. Obeying his precious precepts, — following his demonstration so far as we apprehend it, — we drink of his cup, partake of his bread, are baptized with his purity; and at last we shall rest, sit down with him, in a full understanding of the divine Principle which triumphs over death.

8. 27: 28-4

जो लोग मसीह का पालन करना स्वीकार करते हैं, वे उस आवश्यक धर्म को अस्वीकार क्यों करते हैं जो वह स्थापित करने के लिए आया था? यीशु के अत्याचारियों ने इसी बिंदु पर अपना सबसे मजबूत हमला किया। उन्होंने उसे सामग्री की दया पर रखने और कुछ निश्चित भौतिक कानूनों के अनुसार उसे मारने का प्रयास किया।

फरीसियों ने ईश्वरीय इच्छा को जानने और सिखाने का दावा किया, लेकिन उन्होंने केवल यीशु के मिशन की सफलता में बाधा डाली। यहां तक कि उनके कई छात्र भी उनके रास्ते में खड़े थे।

8. 27 : 28-4

Why do those who profess to follow Christ reject the essential religion he came to establish? Jesus' persecutors made their strongest attack upon this very point. They endeavored to hold him at the mercy of matter and to kill him according to certain assumed material laws.

The Pharisees claimed to know and to teach the divine will, but they only hindered the success of Jesus' mission. Even many of his students stood in his way.

9. 28: 9-14

चर्च में या उससे बाहर के सभी अच्छे लोगों का सम्मान करते हुए, मसीह के लिए किसी की प्रतिष्ठा पेशे की तुलना में प्रदर्शन के आधार पर अधिक है। अंतरात्मा की आवाज में, हम विश्वासों को पकड़ नहीं सकते हैं; और मृत्युहीन मसीह के दिव्य सिद्धांत को और अधिक समझने के द्वारा, हम बीमारों को चंगा करने और पाप पर विजय प्राप्त करने के लिए सक्षम हैं।

9. 28 : 9-14

While respecting all that is good in the Church or out of it, one's consecration to Christ is more on the ground of demonstration than of profession. In conscience, we cannot hold to beliefs outgrown; and by understanding more of the divine Principle of the deathless Christ, we are enabled to heal the sick and to triumph over sin.

10. 32: 11-14, 21-25

कप उनके कड़वे अनुभव को दर्शाता है, - जिस कप से उन्होंने प्रार्थना की थी वह उनसे गुजर सकता है, हालांकि वह दिव्य डिक्री को पवित्र रूप से प्रस्तुत करते हैं।

चेलों ने खा लिया था, तौभी यीशु ने प्रार्थना करके उन्हें रोटी दी। यह शाब्दिक अर्थ में मूर्खतापूर्ण होता; लेकिन इसके आध्यात्मिक अर्थ में, यह प्राकृतिक और सुंदर था।

10. 32 : 11-14, 21-25

The cup shows forth his bitter experience, — the cup which he prayed might pass from him, though he bowed in holy submission to the divine decree.

The disciples had eaten, yet Jesus prayed and gave them bread. This would have been foolish in a literal sense; but in its spiritual signification, it was natural and beautiful.

11. 33: 6-10, 27-2

उनकी रोटी वास्तव में स्वर्ग से नीचे आई थी। यह आध्यात्मिक का महान सत्य था, बीमारों को ठीक करना और त्रुटि को दूर करना। उनके मास्टर ने पहले यह सब समझाया था, और अब यह रोटी उन्हें खिला रही थी और उन्हें बनाए रख रही थी।

ईसाई, क्या आप उसका प्याला पी रहे हैं? क्या आपने नई वाचा के खून को साझा किया है, जो उत्पीड़न भगवान की एक नई और उच्च समझ में भाग लेते हैं? यदि नहीं, तो क्या आप यह कह सकते हैं कि आपने यीशु को उसके प्याले में स्मरण किया है? क्या वे सभी जो यीशु की याद में रोटी खाते हैं और शराब पीते हैं, अपना प्याला पीना चाहते हैं, अपना क्रूस लेते हैं, और मसीह-सिद्धांत के लिए सब छोड़ देते हैं?

11. 33 : 6-10, 27-2

Their bread indeed came down from heaven. It was the great truth of spiritual being, healing the sick and casting out error. Their Master had explained it all before, and now this bread was feeding and sustaining them.

Christians, are you drinking his cup? Have you shared the blood of the New Covenant, the persecutions which attend a new and higher understanding of God? If not, can you then say that you have commemorated Jesus in his cup? Are all who eat bread and drink wine in memory of Jesus willing truly to drink his cup, take his cross, and leave all for the Christ-principle?

12. 34: 5-17

यदि मसीह, सत्य, प्रदर्शन में हमारे पास आए हैं, तो प्रदर्शन के लिए किसी अन्य स्मारक की आवश्यकता नहीं है, प्रदर्शन के लिए इमैनुअल, या भगवान हमारे साथ हैं; और यदि कोई मित्र हमारे साथ है, तो हमें उस मित्र के स्मारक की आवश्यकता क्यों है?

अगर कभी संस्कार का हिस्सा बनने वाले सभी लोगों ने यीशु की पीड़ाओं को याद किया और उनके प्याले को पीया, तो उन्होंने दुनिया में क्रांति ला दी। यदि सभी जो भौतिक प्रतीकों के माध्यम से अपने स्मरणोत्सव की तलाश करते हैं, तो क्रूस को उठाएंगे, बीमारों को चंगा करेंगे, बुराइयों को बाहर निकालेंगे, और गरीबों को मसीह, या सत्य का उपदेश देंगे, - ग्रहणशील विचार, - वे सहस्त्राब्दी में लाएंगे।

12. 34 : 5-17

If Christ, Truth, has come to us in demonstration, no other commemoration is requisite, for demonstration is Immanuel, or God with us; and if a friend be with us, why need we memorials of that friend?

If all who ever partook of the sacrament had really commemorated the sufferings of Jesus and drunk of his cup, they would have revolutionized the world. If all who seek his commemoration through material symbols will take up the cross, heal the sick, cast out evils, and preach Christ, or Truth, to the poor, — the receptive thought, — they will bring in the millennium.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6