रविवार 8 जनवरी, 2023



विषयधर्मविधि

SubjectSacrament

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: यूहन्ना 14: 21

"जिस के पास मेरी आज्ञा है, और वह उन्हें मानता है, वही मुझ से प्रेम रखता है, और जो मुझ से प्रेम रखता है, उस से मेरा पिता प्रेम रखेगा।"



Golden Text: John 14 : 21

He that hath my commandments, and keepeth them, he it is that loveth me: and he that loveth me shall be loved of my Father.




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उत्तरदायी अध्ययन: फिलिप्पियों 2: 5-13


5     जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।

6     जिस ने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा।

7     वरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया।

8     और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली।

9     इस कारण परमेश्वर ने उस को अति महान भी किया, और उस को वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है।

10     कि जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और जो पृथ्वी के नीचे है; वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें।

11     और परमेश्वर पिता की महिमा के लिये हर एक जीभ अंगीकार कर ले कि यीशु मसीह ही प्रभु है॥

12     सो हे मेरे प्यारो, जिस प्रकार तुम सदा से आज्ञा मानते आए हो, वैसे ही अब भी न केवल मेरे साथ रहते हुए पर विशेष करके अब मेरे दूर रहने पर भी डरते और कांपते हुए अपने अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ।

13     क्योंकि परमेश्वर ही है, जिस न अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है।

Responsive Reading: Philippians 2 : 5-13

5.     Let this mind be in you, which was also in Christ Jesus:

6.     Who, being in the form of God, thought it not robbery to be equal with God:

7.     But made himself of no reputation, and took upon him the form of a servant, and was made in the likeness of men:

8.     And being found in fashion as a man, he humbled himself, and became obedient unto death, even the death of the cross.

9.     Wherefore God also hath highly exalted him, and given him a name which is above every name:

10.     That at the name of Jesus every knee should bow, of things in heaven, and things in earth, and things under the earth;

11.     And that every tongue should confess that Jesus Christ is Lord, to the glory of God the Father.

12.     Wherefore, my beloved, as ye have always obeyed, not as in my presence only, but now much more in my absence, work out your own salvation with fear and trembling.

13.     For it is God which worketh in you both to will and to do of his good pleasure.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. मीका 6: 6-8

6     मैं क्या ले कर यहोवा के सम्मुख आऊं, और ऊपर रहने वाले परमेश्वर के साम्हने झुकूं? क्या मैं होमबलि के लिये एक एक वर्ष के बछड़े ले कर उसके सम्मुख आऊं?

7     क्या यहोवा हजारों मेढ़ों से, वा तेल की लाखों नदियों से प्रसन्न होगा? क्या मैं अपने अपराध के प्रायश्चित्त में अपने पहिलौठे को वा अपने पाप के बदले में अपने जन्माए हुए किसी को दूं?

8     हे मनुष्य, वह तुझे बता चुका है कि अच्छा क्या है; और यहोवा तुझ से इसे छोड़ और क्या चाहता है, कि तू न्याय से काम करे, और कृपा से प्रीति रखे, और अपने परमेश्वर के साथ नम्रता से चले?

1. Micah 6 : 6-8

6     Wherewith shall I come before the Lord, and bow myself before the high God? shall I come before him with burnt offerings, with calves of a year old?

7     Will the Lord be pleased with thousands of rams, or with ten thousands of rivers of oil? shall I give my firstborn for my transgression, the fruit of my body for the sin of my soul?

8     He hath shewed thee, O man, what is good; and what doth the Lord require of thee, but to do justly, and to love mercy, and to walk humbly with thy God?

2. मत्ती 4: 23

23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

2. Matthew 4 : 23

23     And Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing all manner of sickness and all manner of disease among the people.

3. मत्ती 5: 1-12, 16

1     वह इस भीड़ को देखकर, पहाड़ पर चढ़ गया; और जब बैठ गया तो उसके चेले उसके पास आए।

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

3     धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।

4     धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं, क्योंकि वे शांति पाएंगे।

5     धन्य हैं वे, जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे।

6     धन्य हैं वे जो धर्म के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किये जाएंगे।

7     धन्य हैं वे, जो दयावन्त हैं, क्योंकि उन पर दया की जाएगी।

8     धन्य हैं वे, जिन के मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।

9     धन्य हैं वे, जो मेल करवाने वाले हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएंगे।

10     धन्य हैं वे, जो धर्म के कारण सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।

11     धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें, और सताएं और झूठ बोल बोलकर तुम्हरो विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें।

12     आनन्दित और मगन होना क्योंकि तुम्हारे लिये स्वर्ग में बड़ा फल है इसलिये कि उन्होंने उन भविष्यद्वक्ताओं को जो तुम से पहिले थे इसी रीति से सताया था॥

16     तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के साम्हने चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में हैं, बड़ाई करें॥

3. Matthew 5 : 1-12, 16

1     And seeing the multitudes, he went up into a mountain: and when he was set, his disciples came unto him:

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

3     Blessed are the poor in spirit: for theirs is the kingdom of heaven.

4     Blessed are they that mourn: for they shall be comforted.

5     Blessed are the meek: for they shall inherit the earth.

6     Blessed are they which do hunger and thirst after righteousness: for they shall be filled.

7     Blessed are the merciful: for they shall obtain mercy.

8     Blessed are the pure in heart: for they shall see God.

9     Blessed are the peacemakers: for they shall be called the children of God.

10     Blessed are they which are persecuted for righteousness’ sake: for theirs is the kingdom of heaven.

11     Blessed are ye, when men shall revile you, and persecute you, and shall say all manner of evil against you falsely, for my sake.

12     Rejoice, and be exceeding glad: for great is your reward in heaven: for so persecuted they the prophets which were before you.

16     Let your light so shine before men, that they may see your good works, and glorify your Father which is in heaven.

4. मत्ती 10: 1, 5-8, 12-14

1     फिर उस ने अपने बारह चेलों को पास बुलाकर, उन्हें अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार दिया, कि उन्हें निकालें और सब प्रकार की बीमारियों और सब प्रकार की दुर्बलताओं को दूर करें॥

5     इन बारहों को यीशु ने यह आज्ञा देकर भेजा कि अन्यजातियों की ओर न जाना, और सामरियों के किसी नगर में प्रवेश न करना।

6     परन्तु इस्राएल के घराने ही की खोई हुई भेड़ों के पास जाना।

7     और चलते चलते प्रचार कर कहो कि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।

8     बीमारों को चंगा करो: मरे हुओं को जिलाओ: कोढिय़ों को शुद्ध करो: दुष्टात्माओं को निकालो: तुम ने सेंतमेंत पाया है, सेंतमेंत दो।

12     और घर में प्रवेश करते हुए उस को आशीष देना।

13     यदि उस घर के लोग योग्य होंगे तो तुम्हारा कल्याण उन पर पहुंचेगा परन्तु यदि वे योग्य न हों तो तुम्हारा कल्याण तुम्हारे पास लौट आएगा।

14     और जो कोई तुम्हें ग्रहण न करे, और तुम्हारी बातें न सुने, उस घर या उस नगर से निकलते हुए अपने पांवों की धूल झाड़ डालो।

4. Matthew 10 : 1, 5-8, 12-14

1     And when he had called unto him his twelve disciples, he gave them power against unclean spirits, to cast them out, and to heal all manner of sickness and all manner of disease.

5     These twelve Jesus sent forth, and commanded them, saying, Go not into the way of the Gentiles, and into any city of the Samaritans enter ye not:

6     But go rather to the lost sheep of the house of Israel.

7     And as ye go, preach, saying, The kingdom of heaven is at hand.

8     Heal the sick, cleanse the lepers, raise the dead, cast out devils: freely ye have received, freely give.

12     And when ye come into an house, salute it.

13     And if the house be worthy, let your peace come upon it: but if it be not worthy, let your peace return to you.

14     And whosoever shall not receive you, nor hear your words, when ye depart out of that house or city, shake off the dust of your feet.

5. मत्ती 26: 17-20, 26-29

17     अखमीरी रोटी के पर्व्व के पहिले दिन, चेले यीशु के पास आकर पूछने लगे; तू कहां चाहता है कि हम तेरे लिये फसह खाने की तैयारी करें?

18     उस ने कहा, नगर में फुलाने के पास जाकर उस से कहो, कि गुरू कहता है, कि मेरा समय निकट है, मैं अपने चेलों के साथ तेरे यहां पर्व्व मनाऊंगा।

19     सो चेलों ने यीशु की आज्ञा मानी, और फसह तैयार किया।

20     जब सांझ हुई, तो वह बारहों के साथ भोजन करने के लिये बैठा।

26     उस ने उस से कहा, तू कह चुका: जब वे खा रहे थे, तो यीशु ने रोटी ली, और आशीष मांग कर तोड़ी, और चेलों को देकर कहा, लो, खाओ; यह मेरी देह है।

27     फिर उस ने कटोरा लेकर, धन्यवाद किया, और उन्हें देकर कहा, तुम सब इस में से पीओ।

28     क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लोहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है।

29     मैं तुम से कहता हूं, कि दाख का यह रस उस दिन तक कभी न पीऊंगा, जब तक तुम्हारे साथ अपने पिता के राज्य में नया न पीऊं॥

5. Matthew 26 : 17-20, 26-29

17     Now the first day of the feast of unleavened bread the disciples came to Jesus, saying unto him, Where wilt thou that we prepare for thee to eat the passover?

18     And he said, Go into the city to such a man, and say unto him, The Master saith, My time is at hand; I will keep the passover at thy house with my disciples.

19     And the disciples did as Jesus had appointed them; and they made ready the passover.

20     Now when the even was come, he sat down with the twelve.

26     And as they were eating, Jesus took bread, and blessed it, and brake it, and gave it to the disciples, and said, Take, eat; this is my body.

27     And he took the cup, and gave thanks, and gave it to them, saying, Drink ye all of it;

28     For this is my blood of the new testament, which is shed for many for the remission of sins.

29     But I say unto you, I will not drink henceforth of this fruit of the vine, until that day when I drink it new with you in my Father’s kingdom.

6. मत्ती 27: 1, 33, 35 (वे) (से 1st ,)

1     जब भोर हुई, तो सब महायाजकों और लोगों के पुरनियों ने यीशु के मार डालने की सम्मति की।

33     उन्होंने पित्त मिलाया हुआ दाखरस उसे पीने को दिया, परन्तु उस ने चखकर पीना न चाहा।

35     ... तब उन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाय।

6. Matthew 27 : 1, 33, 35 (they) (to 1st ,)

1     When the morning was come, all the chief priests and elders of the people took counsel against Jesus to put him to death:

33     And when they were come unto a place called Golgotha, that is to say, a place of a skull,

35     …they crucified him.

7. मरकुस 16: 9, 14, 15, 17, 18

9     सप्ताह के पहिले दिन भोर होते ही वह जी उठ कर पहिले पहिल मरियम मगदलीनी को जिस में से उस ने सात दुष्टात्माएं निकाली थीं, दिखाई दिया।

14     पीछे वह उन ग्यारहों को भी, जब वे भोजन करने बैठे थे दिखाई दिया, और उन के अविश्वास और मन की कठोरता पर उलाहना दिया, क्योंकि जिन्हों ने उसके जी उठने के बाद उसे देखा था, इन्होंने उन की प्रतीति न की थी।

15     और उस ने उन से कहा, तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो।

17     और विश्वास करने वालों में ये चिन्ह होंगे कि वे मेरे नाम से दुष्टात्माओं को निकालेंगे।

18     नई नई भाषा बोलेंगे, सांपों को उठा लेंगे, और यदि वे नाशक वस्तु भी पी जांए तौभी उन की कुछ हानि न होगी, वे बीमारों पर हाथ रखेंगे, और वे चंगे हो जाएंगे।

7. Mark 16 : 9, 14, 15, 17, 18

9     Now when Jesus was risen early the first day of the week, he appeared first to Mary Magdalene, out of whom he had cast seven devils.

14     Afterward he appeared unto the eleven as they sat at meat, and upbraided them with their unbelief and hardness of heart, because they believed not them which had seen him after he was risen.

15     And he said unto them, Go ye into all the world, and preach the gospel to every creature.

17     And these signs shall follow them that believe; In my name shall they cast out devils; they shall speak with new tongues;

18     They shall take up serpents; and if they drink any deadly thing, it shall not hurt them; they shall lay hands on the sick, and they shall recover.

8. लूका 24: 45, 50-53

45     तब उस ने पवित्र शास्त्र बूझने के लिये उन की समझ खोल दी।

50     तब वह उन्हें बैतनिय्याह तक बाहर ले गया, और अपने हाथ उठाकर उन्हें आशीष दी।

51     और उन्हें आशीष देते हुए वह उन से अलग हो गया और स्वर्ग से उठा लिया गया।

52     और वे उस को दण्डवत करके बड़े आनन्द से यरूशलेम को लौट गए।

53     और लगातार मन्दिर में उपस्थित होकर परमेश्वर की स्तुति किया करते थे॥

8. Luke 24 : 45, 50-53

45     Then opened he their understanding, that they might understand the scriptures,

50     And he led them out as far as to Bethany, and he lifted up his hands, and blessed them.

51     And it came to pass, while he blessed them, he was parted from them, and carried up into heaven.

52     And they worshipped him, and returned to Jerusalem with great joy:

53     And were continually in the temple, praising and blessing God. Amen.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 4 : 5-11

हमारे मास्टर की आज्ञाओं को रखने के लिए और उनके उदाहरण का पालन करने के लिए, क्या वह हमारे लिए उचित ऋण है और उसने जो कुछ भी किया है, उसके लिए हमारी कृतज्ञता का एकमात्र योग्य प्रमाण है। बाहरी पूजा स्वयं के प्रति वफादार और हार्दिक आभार व्यक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि उसने कहा है: "यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।"

1. 4 : 5-11

To keep the commandments of our Master and follow his example, is our proper debt to him and the only worthy evidence of our gratitude for all that he has done. Outward worship is not of itself sufficient to express loyal and heartfelt gratitude, since he has said: "If ye love me, keep my commandments."

2. 496 : 5-8

आप सीखेंगे कि क्रिश्चियन साइंस में पहला कर्तव्य ईश्वर का पालन करना, एक मन रखना और दूसरे को अपने जैसा प्यार करना है।

2. 496 : 5-8

You will learn that in Christian Science the first duty is to obey God, to have one Mind, and to love another as yourself.

3. 256 : 19-27

वह कौन है जो हमारी आज्ञाकारिता की माँग करता है? वह जो, शास्त्र की भाषा में, "जो स्वर्ग की सेना और पृथ्वी के रहने वालों के बीच अपनी इच्छा के अनुसार काम करता है; और कोई उसको रोक कर उस से नहीं कह सकता है, तू ने यह क्या किया है?"

अनंत प्रेम का प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई रूप या भौतिक संयोजन पर्याप्त नहीं है। ईश्वर की एक सीमित और भौतिक भावना औपचारिकता और संकीर्णता की ओर ले जाती है; यह ईसाई धर्म की भावना को ठंडा करता है।

3. 256 : 19-27

Who is it that demands our obedience? He who, in the language of Scripture, "doeth according to His will in the army of heaven, and among the inhabitants of the earth; and none can stay His hand, or say unto Him, What doest Thou?"

No form nor physical combination is adequate to represent infinite Love. A finite and material sense of God leads to formalism and narrowness; it chills the spirit of Christianity.

4. 25 : 13-21

यीशु ने प्रदर्शन के द्वारा जीवन का मार्ग सिखाया, कि हम समझ सकते हैं कि यह दिव्य सिद्धांत कैसे बीमारों को चंगा करता है, त्रुटि को जन्म देता है, और मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है। यीशु ने ईश्वर के आदर्श को किसी भी ऐसे व्यक्ति की तुलना में बेहतर प्रस्तुत किया जिसकी उत्पत्ति कम आध्यात्मिक थी। परमेश्वर की आज्ञाकारिता के द्वारा, उसने आध्यात्मिक रूप से सभी दूसरों के सिद्धांत का प्रदर्शन किया। अत: उसके पालन की शक्ति, "यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।"

4. 25 : 13-21

Jesus taught the way of Life by demonstration, that we may understand how this divine Principle heals the sick, casts out error, and triumphs over death. Jesus presented the ideal of God better than could any man whose origin was less spiritual. By his obedience to God, he demonstrated more spiritually than all others the Principle of being. Hence the force of his admonition, "If ye love me, keep my commandments."

5. 27 : 22-27

यीशु ने एक समय में सत्तर छात्रों को भेजा, लेकिन केवल ग्यारह ने एक वांछनीय ऐतिहासिक रिकॉर्ड छोड़ दिया। परंपरा उसे दो या तीन सौ अन्य शिष्यों के साथ श्रेय देती है जिन्होंने कोई नाम नहीं छोड़ा है। "क्योंकि बुलाए हुए तो बहुत परन्तु चुने हुए थोड़े हैं॥" वे अनुग्रह से दूर हो गए क्योंकि वे कभी भी अपने गुरु के निर्देश को नहीं समझते थे।

5. 27 : 22-27

Jesus sent forth seventy students at one time, but only eleven left a desirable historic record. Tradition credits him with two or three hundred other disciples who have left no name. "Many are called, but few are chosen." They fell away from grace because they never truly understood their Master's instruction.

6. 242 : 9-14, 30-3

स्वर्ग के लिए एक रास्ता है, सद्भाव; और ईश्वरीय विज्ञान में मसीह हमें इस मार्ग को दिखाता है। कोई और वास्तविकता नहीं है, अच्छे ईश्वर और उसके प्रतिबिंब को जानने और इंद्रियों के दर्द और सुख से श्रेष्ठ होने के अलावा जीवन की कोई अन्य चेतना नहीं है।

दैवीय विज्ञान के उँगलियों के खंभे दिखाते हैं कि हमारे गुरु किस तरह से चले, और ईसाइयों को वह प्रमाण चाहिए जो उन्होंने पेश किया, न कि केवल पेशा। हम दुनिया से आध्यात्मिक अज्ञान को छुपा सकते हैं, लेकिन हम अज्ञानता या पाखंड के माध्यम से विज्ञान और आध्यात्मिक अच्छाई के प्रदर्शन में कभी सफल नहीं हो सकते।

6. 242 : 9-14, 30-3

There is but one way to heaven, harmony, and Christ in divine Science shows us this way. It is to know no other reality — to have no other consciousness of life — than good, God and His reflection, and to rise superior to the so-called pain and pleasure of the senses.

The finger-posts of divine Science show the way our Master trod, and require of Christians the proof which he gave, instead of mere profession. We may hide spiritual ignorance from the world, but we can never succeed in the Science and demonstration of spiritual good through ignorance or hypocrisy.

7. 31: 12-22 (से.)

सबसे पहले ईसाई कर्तव्यों की सूची में, उन्होंने अपने अनुयायियों को सत्य और प्रेम की उपचार शक्ति सिखाई। उन्होंने मृत समारोहों के लिए कोई महत्व नहीं दिया। यह जीवित मसीह है, व्यावहारिक सत्य है, जो यीशु को उन सभी लोगों के लिए "पुनरुत्थान और जीवन" बनाता है जो उसे विलेख में पालन करते हैं। उनकी कीमती उपदेशों का पालन करते हुए, — उनके प्रदर्शन के बाद अब तक हम इसे स्वीकार करते हैं, — हम उसके प्याले को पीते हैं, हम उसकी रोटी का हिस्सा बनाते हैं, उसकी पवित्रता से बपतिस्मा लेते हैं: और अंत में हम मृत्यु के ऊपर विजय प्राप्त करने वाले दिव्य सिद्धांत की पूर्ण समझ में, उसके साथ बैठेंगे।

7. 31 : 12-22 (to .)

First in the list of Christian duties, he taught his followers the healing power of Truth and Love. He attached no importance to dead ceremonies. It is the living Christ, the practical Truth, which makes Jesus "the resurrection and the life" to all who follow him in deed. Obeying his precious precepts, — following his demonstration so far as we apprehend it, — we drink of his cup, partake of his bread, are baptized with his purity; and at last we shall rest, sit down with him, in a full understanding of the divine Principle which triumphs over death.

8. 32: 3-25

प्राचीन रोम में एक सैनिक को अपने जनरल के प्रति निष्ठा की शपथ लेने की आवश्यकता थी। इस शपथ के लिए लैटिन शब्द संस्कार था, और हमारे अंग्रेजी शब्द संस्कार से लिया गया है। यहूदियों में यह एक प्राचीन रीति-रिवाज था जिसमें प्रत्येक अतिथि को एक कप शराब दी जाती थी। लेकिन यूचरिस्ट एक रोमन सैनिक की शपथ को याद नहीं करता है, न ही शराब, आदी अवसरों पर और हमारे भगवान के कप यहूदी संस्कारों में इस्तेमाल किया गया था। कप उनके कड़वे अनुभव को दर्शाता है, - जिस कप से उन्होंने प्रार्थना की थी वह उनसे गुजर सकता है, हालांकि वह दिव्य डिक्री को पवित्र रूप से प्रस्तुत करते हैं।

"उस ने उस से कहा, तू कह चुका: जब वे खा रहे थे, तो यीशु ने रोटी ली, और आशीष मांग कर तोड़ी, और चेलों को देकर कहा, लो, खाओ; यह मेरी देह है। फिर उस ने कटोरा लेकर, धन्यवाद किया, और उन्हें देकर कहा, तुम सब इस में से पीओ।"

सच्चा अर्थ आध्यात्मिक रूप से खो गया है, अगर संस्कार रोटी और शराब के उपयोग तक ही सीमित है। चेलों ने खा लिया था, तौभी यीशु ने प्रार्थना करके उन्हें रोटी दी। यह शाब्दिक अर्थ में मूर्खतापूर्ण होता; लेकिन इसके आध्यात्मिक अर्थ में, यह प्राकृतिक और सुंदर था।

8. 32 : 3-25

In ancient Rome a soldier was required to swear allegiance to his general. The Latin word for this oath was sacramentum, and our English word sacrament is derived from it. Among the Jews it was an ancient custom for the master of a feast to pass each guest a cup of wine. But the Eucharist does not commemorate a Roman soldier's oath, nor was the wine, used on convivial occasions and in Jewish rites, the cup of our Lord. The cup shows forth his bitter experience, — the cup which he prayed might pass from him, though he bowed in holy submission to the divine decree.

"As they were eating, Jesus took bread, and blessed it and brake it, and gave it to the disciples, and said, Take, eat; this is my body. And he took the cup, and gave thanks, and gave it to them saying, Drink ye all of it."

The true sense is spiritually lost, if the sacrament is confined to the use of bread and wine. The disciples had eaten, yet Jesus prayed and gave them bread. This would have been foolish in a literal sense; but in its spiritual signification, it was natural and beautiful.

9. 43: 21-4

यीशु कड़वाहट के प्याले के कारण प्रदर्शन में ऊँचा उठ गया। मानव कानून ने उसकी निंदा की थी, लेकिन वह दिव्य विज्ञान का प्रदर्शन कर रहा था। अपने दुश्मनों की बर्बरता की पहुंच से बाहर, वह मामले और मृत्यु दर की रक्षा में आध्यात्मिक कानून के तहत काम कर रहा था, और उस आध्यात्मिक कानून ने उसे बनाए रखा। परमात्मा को हर बिंदु पर मानव को दूर करना होगा। विज्ञान यीशु ने सिखाया और जीना चाहिए, जीवन, पदार्थ और बुद्धि के बारे में सभी भौतिक विश्वासों पर विजय प्राप्त करना चाहिए, और इस तरह की मान्यताओं से बढ़ती हुई बहुपक्षीय त्रुटियां।

प्यार नफरत पर विजय चाहिए। सत्य और जीवन को जीत और त्रुटि और मृत्यु पर रोकना होगा, इससे पहले कि काँटे को एक मुकुट के लिए अलग रखा जा सके, बीडक्शन कहता है, "अच्छा काम अच्छा एवं विश्वसनीय सेवक," और आत्मा की सर्वोच्चता का प्रदर्शन किया जाए।

9. 43 : 21-4

Jesus rose higher in demonstration because of the cup of bitterness he drank. Human law had condemned him, but he was demonstrating divine Science. Out of reach of the barbarity of his enemies, he was acting under spiritual law in defiance of matter and mortality, and that spiritual law sustained him. The divine must overcome the human at every point. The Science Jesus taught and lived must triumph over all material beliefs about life, substance, and intelligence, and the multitudinous errors growing from such beliefs.

Love must triumph over hate. Truth and Life must seal the victory over error and death, before the thorns can be laid aside for a crown, the benediction follow, "Well done, good and faithful servant," and the supremacy of Spirit be demonstrated.

10. 35: 19 केवल, 25-29

हमारा बपतिस्मा सभी त्रुटि से शुद्धिकरण है। ... हमारा ईश्वरवादी एक ईश्वर के साथ आध्यात्मिक संवाद है। हमारी रोटी, "जो स्वर्ग से नीचे आती है," सत्य है। हमारा प्याला पार है। हमारी शराब प्रेम की प्रेरणा थी, हमारे मास्टर ने मसौदा तैयार किया और अपने अनुयायियों की प्रशंसा की।

10. 35 : 19 only, 25-29

Our baptism is a purification from all error. … Our Eucharist is spiritual communion with the one God. Our bread, "which cometh down from heaven," is Truth. Our cup is the cross. Our wine the inspiration of Love, the draught our Master drank and commended to his followers.

11. 239: 16-22

अपनी प्रगति का पता लगाने के लिए, हमें यह सीखना चाहिए कि हमारे साथ हमारे संबंध किससे हैं और हम किसको स्वीकार करते हैं और ईश्वर के रूप में मानते हैं। यदि ईश्वरीय प्रेम निकट, प्रिय, और अधिक वास्तविक होता जा रहा है, तब पदार्थ आत्मा को सौंप रहा है। जिन वस्तुओं का हम अनुसरण करते हैं और जो आत्मा हम प्रकट करते हैं वह हमारे दृष्टिकोण को प्रकट करती है, और दिखाते हैं कि हम क्या जीत रहे हैं।

11. 239 : 16-22

To ascertain our progress, we must learn where our affections are placed and whom we acknowledge and obey as God. If divine Love is becoming nearer, dearer, and more real to us, matter is then submitting to Spirit. The objects we pursue and the spirit we manifest reveal our standpoint, and show what we are winning.

12. 37: 22-31

यह संभव है, - हाँ, यह प्रत्येक बच्चे, पुरुष और महिला का कर्तव्य और विशेषाधिकार है, - कि उन्हें कुछ हद तक स्वास्थ्य और पवित्रता के सत्य और जीवन के प्रदर्शन द्वारा मास्टर के उदाहरण का पालन करना चाहिए। ईसाई उसके अनुयायी होने का दावा करते हैं, लेकिन क्या वे उस तरीके से उसका अनुसरण करते हैं जो उसने आज्ञा दी थी? ये अनिवार्य आदेश सुनें: "इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है॥" "तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो!" "बीमारों को चंगा करो।"

12. 37 : 22-31

It is possible, — yea, it is the duty and privilege of every child, man, and woman, — to follow in some degree the example of the Master by the demonstration of Truth and Life, of health and holiness. Christians claim to be his followers, but do they follow him in the way that he commanded? Hear these imperative commands: "Be ye therefore perfect, even as your Father which is in heaven is perfect!" "Go ye into all the world, and preach the gospel to every creature!" "Heal the sick!"


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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