रविवार 7 जनवरी, 2024



विषयपरमेश्वर

SubjectGod

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: भजन संहिता 46: 1

"परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलने वाला सहायक।"



Golden Text: Psalm 46 : 1

God is our refuge and strength, a very present help in trouble.




PDF Downloads:


पाठ के ऑडियो के लिए यहां क्लिक करें

YouTube पर सुनने के लिए यहां क्लिक करें



उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 62: 1, 2, 7, 8, 11, 12


1     सचमुच मैं चुपचाप होकर परमेरश्वर की ओर मन लगाए हूं; मेरा उद्धार उसी से होता है।

2     सचमुच वही, मेरी चट्टान और मेरा उद्धार है, वह मेरा गढ़ है; मैं बहुत न डिगूंगा॥

7     मेरा उद्धार और मेरी महिमा का आधार परमेश्वर है; मेरी दृढ़ चट्टान, और मेरा शरणस्थान परमेश्वर है।

8     हे लोगो, हर समय उस पर भरोसा रखो; उससे अपने अपने मन की बातें खोलकर कहो; परमेश्वर हमारा शरणस्थान है।

11     परमेश्वर ने एक बार कहा है; और दो बार मैं ने यह सुना है: कि सामर्थ्य परमेश्वर का है।

12     और हे प्रभु, करूणा भी तेरी है। क्योंकि तू एक एक जन को उसके काम के अनुसार फल देता है॥

Responsive Reading: Psalm 62 : 1, 2, 7, 8, 11, 12

1.     Truly my soul waiteth upon God: from him cometh my salvation.

2.     He only is my rock and my salvation; he is my defence; I shall not be greatly moved.

7.     In God is my salvation and my glory: the rock of my strength, and my refuge, is in God.

8.     Trust in him at all times; ye people, pour out your heart before him: God is a refuge for us.

11.     God hath spoken once; twice have I heard this; that power belongeth unto God.

12.     Also unto thee, O Lord, belongeth mercy: for thou renderest to every man according to his work.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. निर्गमन 20: 1-3

1     तब परमेश्वर ने ये सब वचन कहे,

2     कि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूं, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात मिस्र देश से निकाल लाया है॥

3     तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना॥

1. Exodus 20 : 1-3

1     And God spake all these words, saying,

2     I am the Lord thy God, which have brought thee out of the land of Egypt, out of the house of bondage.

3     Thou shalt have no other gods before me.

2. उत्पत्ति 21: 22 (परमेश्वर)

22     जो कुछ तू करता है उस में परमेश्वर तेरे संग रहता है:

2. Genesis 21 : 22 (God)

22     God is with thee in all that thou doest:

3. यशायाह 41: 10, 17-20

10     मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूं, इधर उधर मत ताक, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूं; मैं तुझे दृढ़ करूंगा और तेरी सहायता करूंगा, अपने धर्ममय दाहिने हाथ से मैं तुझे सम्हाले रहूंगा॥

17     जब दीन और दरिद्र लोग जल ढूंढ़ने पर भी न पाएं और उनका तालू प्यास के मारे सूख जाए; मैं यहोवा उनकी बिनती सुनूंगा, मैं इस्राएल का परमेश्वर उन को त्याग न दूंगां

18     मैं मुण्डे टीलों से भी नदियां और मैदानों के बीच में सोते बहऊंगा; मैं जंगल को ताल और निर्जल देश को सोते ही सोते कर दूंगा।

19     मैं जंगल में देवदार, बबूल, मेंहदी, और जलपाई उगाऊंगा; मैं अराबा में सनौवर, तिधार वृक्ष, और सीधा सनौबर इकट्ठे लगाऊंगा।

20     जिस से लोग देखकर जान लें, और सोचकर पूरी रीति से समझ लें कि यह यहोवा के हाथ का किया हुआ और इस्राएल के पवित्र का सृजा हुआ है॥

3. Isaiah 41 : 10, 17-20

10     Fear thou not; for I am with thee: be not dismayed; for I am thy God: I will strengthen thee; yea, I will help thee; yea, I will uphold thee with the right hand of my righteousness.

17     When the poor and needy seek water, and there is none, and their tongue faileth for thirst, I the Lord will hear them, I the God of Israel will not forsake them.

18     I will open rivers in high places, and fountains in the midst of the valleys: I will make the wilderness a pool of water, and the dry land springs of water.

19     I will plant in the wilderness the cedar, the shittah tree, and the myrtle, and the oil tree; I will set in the desert the fir tree, and the pine, and the box tree together:

20     That they may see, and know, and consider, and understand together, that the hand of the Lord hath done this, and the Holy One of Israel hath created it.

4. लूका 4: 14 (से:)

14     यीशु आत्मा की सामर्थ से भरा हुआ गलील को लौटा।

4. Luke 4 : 14 (to :)

14     And Jesus returned in the power of the Spirit into Galilee:

5. लूका 11: 1-4, 9-13 (से 1st,), 13 (जानना)

1     फिर वह किसी जगह प्रार्थना कर रहा था: और जब वह प्रार्थना कर चुका, तो उसके चेलों में से एक ने उस से कहा; हे प्रभु, जैसे यूहन्ना ने अपने चेलों को प्रार्थना करना सिखलाया वैसे ही हमें भी तू सिखा दे।

2     उस ने उन से कहा; जब तुम प्रार्थना करो, तो कहो; हे पिता, तेरा नाम पवित्र माना जाए, तेरा राज्य आए।

3     हमारी दिन भर की रोटी हर दिन हमें दिया कर।

4     और हमारे पापों को क्षमा कर, क्योंकि हम भी अपने हर एक अपराधी को क्षमा करते हैं, और हमें परीक्षा में न ला॥

9     और मैं तुम से कहता हूं; कि मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढ़ों तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा।

10     क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढ़ता है, वह पाता है; और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा।

11     तुम में से ऐसा कौन पिता होगा, कि जब उसका पुत्र रोटी मांगे, तो उसे पत्थर दे: या मछली मांगे, तो मछली के बदले उसे सांप दे?

12     या अण्डा मांगे तो उसे बिच्छू दे?

13     सो जब तुम बुरे होकर अपने लड़के-बालों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो स्वर्गीय पिता अपने मांगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा॥

5. Luke 11 : 1-4, 9-13 (to 1st ,), 13 (know)

1     And it came to pass, that, as he was praying in a certain place, when he ceased, one of his disciples said unto him, Lord, teach us to pray, as John also taught his disciples.

2     And he said unto them, When ye pray, say, Our Father which art in heaven, Hallowed be thy name. Thy kingdom come. Thy will be done, as in heaven, so in earth.

3     Give us day by day our daily bread.

4     And forgive us our sins; for we also forgive every one that is indebted to us. And lead us not into temptation; but deliver us from evil.

9     And I say unto you, Ask, and it shall be given you; seek, and ye shall find; knock, and it shall be opened unto you.

10     For every one that asketh receiveth; and he that seeketh findeth; and to him that knocketh it shall be opened.

11     If a son shall ask bread of any of you that is a father, will he give him a stone? or if he ask a fish, will he for a fish give him a serpent?

12     Or if he shall ask an egg, will he offer him a scorpion?

13     If ye then, … know how to give good gifts unto your children: how much more shall your heavenly Father give the Holy Spirit to them that ask him?

6. भजन संहिता 103: 8-13

8     यहोवा दयालु और अनुग्रहकरी, विलम्ब से कोप करने वाला और अति करूणामय है।

9     वह सर्वदा वादविवाद करता न रहेगा, न उसका क्रोध सदा के लिये भड़का रहेगा।

10     उसने हमारे पापों के अनुसार हम से व्यवहार नहीं किया, और न हमारे अधर्म के कामों के अनुसार हम को बदला दिया है।

11     जैसे आकाश पृथ्वी के ऊपर ऊंचा है, वैसे ही उसकी करूणा उसके डरवैयों के ऊपर प्रबल है।

12     उदयाचल अस्ताचल से जितनी दूर है, उसने हमारे अपराधों को हम से उतनी ही दूर कर दिया है।

13     जैसे पिता अपने बालकों पर दया करता है, वैसे ही यहोवा अपने डरवैयों पर दया करता है।

6. Psalm 103 : 8-13

8     The Lord is merciful and gracious, slow to anger, and plenteous in mercy.

9     He will not always chide: neither will he keep his anger for ever.

10     He hath not dealt with us after our sins; nor rewarded us according to our iniquities.

11     For as the heaven is high above the earth, so great is his mercy toward them that fear him.

12     As far as the east is from the west, so far hath he removed our transgressions from us.

13     Like as a father pitieth his children, so the Lord pitieth them that fear him.

7. प्रेरितों के काम 17: 22-28

22     तब पौलुस ने अरियुपगुस के बीच में खड़ा होकर कहा; हे अथेने के लोगों मैं देखता हूं, कि तुम हर बात में देवताओं के बड़े मानने वाले हो।

23     क्योंकि मैं फिरते हुए तुम्हारी पूजने की वस्तुओं को देख रहा था, तो एक ऐसी वेदी भी पाई, जिस पर लिखा था, कि अनजाने ईश्वर के लिये। सो जिसे तुम बिना जाने पूजते हो, मैं तुम्हें उसका समाचार सुनाता हूं।

24     जिस परमेश्वर ने पृथ्वी और उस की सब वस्तुओं को बनाया, वह स्वर्ग और पृथ्वी का स्वामी होकर हाथ के बनाए हुए मन्दिरों में नहीं रहता।

25     न किसी वस्तु का प्रयोजन रखकर मनुष्यों के हाथों की सेवा लेता है, क्योंकि वह तो आप ही सब को जीवन और स्वास और सब कुछ देता है।

26     उस ने एक ही मूल से मनुष्यों की सब जातियां सारी पृथ्वी पर रहने के लिये बनाईं हैं; और उन के ठहराए हुए समय, और निवास के सिवानों को इसलिये बान्धा है।

27     कि वे परमेश्वर को ढूंढ़ें, कदाचित उसे टटोल कर पा जाएं तौभी वह हम में से किसी से दूर नहीं!

28     क्योंकि हम उसी में जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं; जैसे तुम्हारे कितने कवियों ने भी कहा है, कि हम तो उसी के वंश भी हैं।

7. Acts 17 : 22-28

22     Then Paul stood in the midst of Mars’ hill, and said, Ye men of Athens, I perceive that in all things ye are too superstitious.

23     For as I passed by, and beheld your devotions, I found an altar with this inscription, TO THE UNKNOWN GOD. Whom therefore ye ignorantly worship, him declare I unto you.

24     God that made the world and all things therein, seeing that he is Lord of heaven and earth, dwelleth not in temples made with hands;

25     Neither is worshipped with men’s hands, as though he needed any thing, seeing he giveth to all life, and breath, and all things;

26     And hath made of one blood all nations of men for to dwell on all the face of the earth, and hath determined the times before appointed, and the bounds of their habitation;

27     That they should seek the Lord, if haply they might feel after him, and find him, though he be not far from every one of us:

28     For in him we live, and move, and have our being; as certain also of your own poets have said, For we are also his offspring.

8. 2 कुरिन्थियों 1: 3-5

3     हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर, और पिता का धन्यवाद हो, जो दया का पिता, और सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर है।

4     वह हमारे सब क्लेशों में शान्ति देता है; ताकि हम उस शान्ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें भी शान्ति दे सकें, जो किसी प्रकार के क्लेश में हों।

5     क्योंकि जैसे मसीह के दुख हम को अधिक होते हैं, वैसे ही हमारी शान्ति भी मसीह के द्वारा अधिक होती है।

8. II Corinthians 1 : 3-5

3     Blessed be God, even the Father of our Lord Jesus Christ, the Father of mercies, and the God of all comfort;

4     Who comforteth us in all our tribulation, that we may be able to comfort them which are in any trouble, by the comfort wherewith we ourselves are comforted of God.

5     For as the sufferings of Christ abound in us, so our consolation also aboundeth by Christ.

9. भजन संहिता 23: 1-6

1     यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी।

2     वह मुझे हरी हरी चराइयों में बैठाता है; वह मुझे सुखदाई जल के झरने के पास ले चलता है;

3     वह मेरे जी में जी ले आता है। धर्म के मार्गो में वह अपने नाम के निमित्त मेरी अगुवाई करता है।

4     चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूं, तौभी हानि से न डरूंगा, क्योंकि तू मेरे साथ रहता है; तेरे सोंटे और तेरी लाठी से मुझे शान्ति मिलती है॥

5     तू मेरे सताने वालों के साम्हने मेरे लिये मेज बिछाता है; तू ने मेरे सिर पर तेल मला है, मेरा कटोरा उमण्ड रहा है।

6     निश्चय भलाई और करूणा जीवन भर मेरे साथ साथ बनी रहेंगी; और मैं यहोवा के धाम में सर्वदा वास करूंगा॥

9. Psalm 23 : 1-6

1     The Lord is my shepherd; I shall not want.

2     He maketh me to lie down in green pastures: he leadeth me beside the still waters.

3     He restoreth my soul: he leadeth me in the paths of righteousness for his name’s sake.

4     Yea, though I walk through the valley of the shadow of death, I will fear no evil: for thou art with me; thy rod and thy staff they comfort me.

5     Thou preparest a table before me in the presence of mine enemies: thou anointest my head with oil; my cup runneth over.

6     Surely goodness and mercy shall follow me all the days of my life: and I will dwell in the house of the Lord for ever.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 33: 19 (परमेश्वर)-20

ईश्वर वही है जो शास्त्र उसे घोषित करते हैं, - मतलब जीवन, सत्य, प्रेम।

1. 330 : 19 (God)-20

God is what the Scriptures declare Him to be, — Life, Truth, Love.

2. 332: 4 (पिता)-8

पिता-माता देवता का नाम है, जो उनकी आध्यात्मिक रचना के उनके कोमल संबंधों को इंगित करता है। जैसा कि प्रेरित ने इसे उन शब्दों में व्यक्त किया है जो उसने एक क्लासिक कवि से मंजूर होने के साथ उद्धृत किए थे: "क्योंकि हम भी उसकी संतान हैं।"

2. 332 : 4 (Father)-8

Father-Mother is the name for Deity, which indicates His tender relationship to His spiritual creation. As the apostle expressed it in words which he quoted with approbation from a classic poet: "For we are also His offspring."

3. 63: 5-11

विज्ञान में मनुष्य आत्मा की संतान है। सुंदर, अच्छा और शुद्ध उसके वंश का गठन करते हैं। उसका मूल, नश्वर की तरह, पाशविक वृत्ति में नहीं है, और न ही वह बुद्धि तक पहुँचने से पहले भौतिक परिस्थितियों से गुजरता है। आत्मा उसका मूल और होने का परम स्रोत है; परमेश्वर उसका पिता है, और जीवन उसके होने का नियम है।

3. 63 : 5-11

In Science man is the offspring of Spirit. The beautiful, good, and pure constitute his ancestry. His origin is not, like that of mortals, in brute instinct, nor does he pass through material conditions prior to reaching intelligence. Spirit is his primitive and ultimate source of being; God is his Father, and Life is the law of his being.

4. 387: 27-32

ईसाइयत का इतिहास अपने स्वर्गीय पिता, सर्वशक्तिमान मन, द्वारा मनुष्य पर समर्थित शक्ति और रक्षा शक्ति के उदात्त प्रमाण प्रस्तुत करता है, जो मनुष्य को विश्वास और समझ प्रदान करता है जिससे वह खुद का बचाव करता है, न केवल प्रलोभन से, बल्कि शारीरिक से।

4. 387 : 27-32

The history of Christianity furnishes sublime proofs of the supporting influence and protecting power bestowed on man by his heavenly Father, omnipotent Mind, who gives man faith and understanding whereby to defend himself, not only from temptation, but from bodily suffering.

5. 275: 6-19

दिव्य विज्ञान का प्रारंभिक बिंदु यह है कि भगवान, आत्मा, संपूर्ण है और न ही कोई अन्य शक्ति है और न ही मन — वह ईश्वर प्रेम है, और इसलिए वह दिव्य सिद्धांत है।

वास्तविकता और उसके विज्ञान में होने के क्रम को समझने के लिए, आपको परमेश्वर को उस सभी के दिव्य सिद्धांत के रूप में फिर से शुरू करना चाहिए जो वास्तव में है। आत्मा, जीवन, सत्य, प्रेम, एक के रूप में गठबंधन, - और भगवान के लिए शास्त्र के नाम हैं। सभी पदार्थ, बुद्धि, ज्ञान, अस्तित्व, अमरता, कारण और प्रभाव ईश्वर के हैं। ये उनकी विशेषताएं हैं, अनंत दिव्य सिद्धांत, प्रेम की शाश्वत अभिव्यक्तियाँ। कोई भी ज्ञान बुद्धिमान नहीं है, लेकिन उसका ज्ञान है; कोई सत्य सत्य नहीं है, कोई प्रेम प्यारा नहीं है, कोई जीवन जीवन नहीं है, लेकिन परमात्मा है; कोई अच्छा नहीं है, लेकिन अच्छा भगवान सबसे अच्छा है।

5. 275 : 6-19

The starting-point of divine Science is that God, Spirit, is All-in-all, and that there is no other might nor Mind, — that God is Love, and therefore He is divine Principle.

To grasp the reality and order of being in its Science, you must begin by reckoning God as the divine Principle of all that really is. Spirit, Life, Truth, Love, combine as one, — and are the Scriptural names for God. All substance, intelligence, wisdom, being, immortality, cause, and effect belong to God. These are His attributes, the eternal manifestations of the infinite divine Principle, Love. No wisdom is wise but His wisdom; no truth is true, no love is lovely, no life is Life but the divine; no good is, but the good God bestows.

6. 519: 10 (विज्ञान)-16

विज्ञान अनंतता और प्रेम के पितृत्व और मातृत्व को प्रकट करता है। मानवीय क्षमता ईश्वर की रचना और उसके साथ जाने वाली ईश्वरीय शक्ति और उपस्थिति को समझने और उसकी आध्यात्मिक उत्पत्ति को प्रदर्शित करने के लिए धीमी है। नश्वर कभी भी अनंत को नहीं जान सकते, जब तक कि वे प्राचीन मानवता को नहीं छोड़ते और आध्यात्मिक छवि और समानता तक नहीं पहुंचते।

6. 519 : 10 (Science)-16

Science reveals infinity and the fatherhood and motherhood of Love. Human capacity is slow to discern and to grasp God's creation and the divine power and presence which go with it, demonstrating its spiritual origin. Mortals can never know the infinite, until they throw off the old man and reach the spiritual image and likeness.

7. 12: 1-2 (से?), 22-24, 31-4

शास्त्र कहते हैं, "और विश्वास की प्रार्थना के द्वारा रोगी बच जाएगा"। यह उपचार प्रार्थना क्या है?

बीमारों के ठीक होने के लिए प्रार्थना करने की आम परंपरा में अंध विश्वास से मदद मिलती है, जबकि मदद प्रबुद्ध समझ से आनी चाहिए।

दिव्य विज्ञान में, जहां प्रार्थनाएं मानसिक होती हैं, वहां सभी ईश्वर का लाभ उठा सकते हैं जो "संकट में अति सहज से सहायक" है प्रेम अपने अनुकूलन और सर्वश्रेष्ठ में निष्पक्ष और सार्वभौमिक है। यह खुला फव्वारा है जो कहता है, "हो, हर एक कि प्यास, तुम पानी के करीब आओ।"

7. 12 : 1-2 (to ?), 22-24, 31-4

"The prayer of faith shall save the sick," says the Scripture. What is this healing prayer?

The common custom of praying for the recovery of the sick finds help in blind belief, whereas help should come from the enlightened understanding.

In divine Science, where prayers are mental, all may avail themselves of God as "a very present help in trouble." Love is impartial and universal in its adaptation and bestowals. It is the open fount which cries, "Ho, every one that thirsteth, come ye to the waters."

8. 13: 10-12, 14-17 (से 2nd,)

यदि हमारी प्रार्थनाएँ शुद्ध हैं, तो हम जो माँगते हैं उसके लिए परिश्रम करते हैं; तब हमारा पिता, जो गुप्‍त में देखता है, हमें खुले आम प्रतिफल देगा। … भले ही प्रार्थना सच्ची हो, इससे पहले कि हम उसे या हमारे साथी-प्राणियों को इसके बारे में बताएं, ईश्वर हमारी आवश्यकता को जानता है। यदि हम ईमानदारी से और चुपचाप और विनम्रता से इच्छा को संजोते हैं, तो भगवान इसे आशीर्वाद देंगे।

8. 13 : 10-12, 14-17 (to 2nd ,)

If our petitions are sincere, we labor for what we ask; and our Father, who seeth in secret, will reward us openly. … Even if prayer is sincere, God knows our need before we tell Him or our fellow-beings about it. If we cherish the desire honestly and silently and humbly, God will bless it,

9. 7: 23 (परमेश्वर)-26

ईश्वर मनुष्य से प्रभावित नहीं होता. "दिव्य कान" श्रवण तंत्रिका नहीं है। यह सर्व-श्रवण और सर्व-ज्ञान मन है, जिनके लिए मनुष्य की प्रत्येक आवश्यकता को हमेशा जाना जाता है और जिनके द्वारा इसकी आपूर्ति की जाएगी।

9. 7 : 23 (God)-26

God is not influenced by man. The "divine ear" is not an auditory nerve. It is the all-hearing and all-knowing Mind, to whom each need of man is always known and by whom it will be supplied.

10. 322: 26-30

पदार्थ के सपोसिटिटिव जीवन में विश्वास के तेज अनुभव, साथ ही साथ हमारी निराशा और निरंतर व्यर्थ, हमें थका हुआ बच्चों की तरह दिव्य प्रेम की ओर मोड़ते हैं। तब हम जीवन को दिव्य विज्ञान में सीखना शुरू करते हैं।

10. 322 : 26-30

The sharp experiences of belief in the supposititious life of matter, as well as our disappointments and ceaseless woes, turn us like tired children to the arms of divine Love. Then we begin to learn Life in divine Science.

11. 494: 10-11

ईश्वरीय प्रेम हमेशा से मिला है और हमेशा हर मानवीय आवश्यकता को पूरा करेगा।

11. 494 : 10-11

Divine Love always has met and always will meet every human need.

12. 507: 3-6

आत्मा प्रत्येक वस्तु को विधिवत रूप से खिलाती और कपड़े पहनाती है, जैसा कि यह आध्यात्मिक सृष्टि की पंक्ति में प्रकट होता है, इस प्रकार ईश्वर के पितृत्व और मातृत्व को कोमलता से व्यक्त करता है।

12. 507 : 3-6

Spirit duly feeds and clothes every object, as it appears in the line of spiritual creation, thus tenderly expressing the fatherhood and motherhood of God.

13. 470: 32-5

साइंस में ईश्वर और मनुष्य के संबंध, ईश्वरीय सिद्धांत और विचार अविनाशी हैं; और विज्ञान जानता है कि कोई चूक नहीं हुई है और न ही सद्भाव में लौटा लेकिन यह ईश्वरीय आदेश या आध्यात्मिक कानून रखता है, जिसमें भगवान और वह जो कुछ भी बनाता है वह परिपूर्ण और शाश्वत है, अपने सनातन इतिहास में अपरिवर्तित रहा है।

13. 470 : 32-5

The relations of God and man, divine Principle and idea, are indestructible in Science; and Science knows no lapse from nor return to harmony, but holds the divine order or spiritual law, in which God and all that He creates are perfect and eternal, to have remained unchanged in its eternal history.

14. 276: 1-11, 17-24

एक ईश्वर, एक मन, उस शक्ति को प्रकट करता है जो बीमारों को चंगा करती है, और पवित्रशास्त्र की इन बातों को पूरा करती है, "मैं तुम्हारा चंगा करने वाला यहोवा हूं," तथा "मुझे छुड़ौती मिली है।" जब दिव्य उपदेशों को समझा जाता है, तो वे फेलोशिप की नींव को उजागर करते हैं, जिसमें एक मन दूसरे के साथ युद्ध में नहीं है, लेकिन सभी के पास एक आत्मा, भगवान, एक बुद्धिमान स्रोत है, जो कि इंजील कमांड के अनुसार है: "जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।" मनुष्य और उसके निर्माता का संबंध ईश्वरीय विज्ञान में है, और वास्तविक चेतना केवल ईश्वर की बातों के प्रति ही संज्ञान है।

यदि परमेश्वर को केवल मन और जीवन माना जाता है, तो पाप और मृत्यु के लिए कोई अवसर होना बंद हो जाता है। जब हम विज्ञान में सीखते हैं कि स्वर्ग में हमारे पिता भी कैसे परिपूर्ण हैं, तो विचार को नए और स्वस्थ चैनलों में बदल दिया गया है, - सामंजस्यपूर्ण मनुष्य सहित ब्रह्मांड के सिद्धांत के लिए अमरता और भौतिकता से दूर चीजों के चिंतन की ओर।

14. 276 : 1-11, 17-24

Having one God, one Mind, unfolds the power that heals the sick, and fulfils these sayings of Scripture, "I am the Lord that healeth thee," and "I have found a ransom." When the divine precepts are understood, they unfold the foundation of fellowship, in which one mind is not at war with another, but all have one Spirit, God, one intelligent source, in accordance with the Scriptural command: "Let this Mind be in you, which was also in Christ Jesus." Man and his Maker are correlated in divine Science, and real consciousness is cognizant only of the things of God.

If God is admitted to be the only Mind and Life, there ceases to be any opportunity for sin and death. When we learn in Science how to be perfect even as our Father in heaven is perfect, thought is turned into new and healthy channels, — towards the contemplation of things immortal and away from materiality to the Principle of the universe, including harmonious man.

15. 577: 32-18

निम्नलिखित कोड में एक शब्द दिखाता है, हालांकि मंद रूप से, क्राइस्टियन साइंस जो प्रकाश देवता के आध्यात्मिक अर्थ के साथ भौतिक अर्थ के लिए प्रतिस्थापन द्वारा शास्त्र पर डालता है: —

भजन संहिता 23

[दिव्य प्रेम] मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी।

[प्रेम] मुझे हरी हरी चराइयों में बैठाता है; [प्रेम] मुझे सुखदाई जल के झरने के पास ले चलता है;

[प्रेम] मेरे जी में जी ले आता है। धर्म के मार्गो में [प्रेम] अपने नाम के निमित्त मेरी अगुवाई करता है।

चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूं, तौभी हानि से न डरूंगा, क्योंकि [प्रेम] मेरे साथ रहता है;

[प्रेम का] सोंटे और [प्रेम का] लाठी से मुझे शान्ति मिलती है॥

[प्रेम] मेरे सताने वालों के साम्हने मेरे लिये मेज बिछाता है; [प्रेम] ने मेरे सिर पर तेल मला है, मेरा कटोरा उमण्ड रहा है।

निश्चय भलाई और करूणा जीवन भर मेरे साथ साथ बनी

रहेंगी; और मैं [प्रेम] के [चेतना] धाम में वास करूंगा॥

15. 577 : 32-18

In the following Psalm one word shows, though faintly, the light which Christian Science throws on the Scriptures by substituting for the corporeal sense, the incorporeal or spiritual sense of Deity: —

PSALM XXIII

[Divine Love] is my shepherd; I shall not want.

[Love] maketh me to lie down in green pastures:

[love] leadeth me beside the still waters.

[Love] restoreth my soul [spiritual sense]: [love] lead-

eth me in the paths of righteousness for His name's sake.

Yea, though I walk through the valley of the shadow of

death, I will fear no evil: for [love] is with me; [love's]

rod and [love's] staff they comfort me.

[Love] prepareth a table before me in the presence of

mine enemies: [love] anointeth my head with oil; my cup

runneth over.

Surely goodness and mercy shall follow me all the days of

my life; and I will dwell in the house [the consciousness]

of [love] for ever.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6