रविवार 7 अप्रैल, 2024



विषयकल्पना

SubjectUnreality

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: यशायाह 53: 1

"जोसमाचार हमें दिया गया, उसका किस ने विश्वास किया? और यहोवा का भुजबल किस पर प्रगट हुआ?"



Golden Text: Isaiah 53 : 1

Who hath believed our report? and to whom is the arm of the Lord revealed?




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उत्तरदायी अध्ययन: रोमियो 8: 1, 2, 6, 14, 16, 38, 39


1     सो अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं: क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के अनुसार चलते हैं।

2     क्योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया।

6     शरीर पर मन लगाना तो मृत्यु है, परन्तु आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है।

14     इसलिये कि जितने लोग परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे ही परमेश्वर के पुत्र हैं।

16     आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं।

38     क्योंकि मैं निश्चय जानता हूं, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ, न ऊंचाई,

39     न गहिराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी॥

Responsive Reading: Romans 8 : 1, 2, 6, 14, 16, 38, 39

1.     There is therefore now no condemnation to them which are in Christ Jesus, who walk not after the flesh, but after the Spirit.

2.     For the law of the Spirit of life in Christ Jesus hath made me free from the law of sin and death.

6.     For to be carnally minded is death; but to be spiritually minded is life and peace.

14.     For as many as are led by the Spirit of God, they are the sons of God.

16.     The Spirit itself beareth witness with our spirit, that we are the children of God:

38.     For I am persuaded, that neither death, nor life, nor angels, nor principalities, nor powers, nor things present, nor things to come,

39.     Nor height, nor depth, nor any other creature, shall be able to separate us from the love of God, which is in Christ Jesus our Lord.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. निर्गमन 3: 11

11     तब मूसा ने परमेश्वर से कहा, मै कौन हूं जो फिरौन के पास जाऊं, और इस्राएलियोंको मिस्र से निकाल ले आऊं?

1. Exodus 3 : 11

11     And Moses said unto God, Who am I, that I should go unto Pharaoh, and that I should bring forth the children of Israel out of Egypt?

2. निर्गमन 4: 2-8, 12, 31

2     यहोवा ने उससे कहा, तेरे हाथ में वह क्या है? वह बोला, लाठी।

3     उसने कहा, उसे भूमि पर डाल दे; जब उसने उसे भूमि पर डाला तब वह सर्प बन गई, और मूसा उसके साम्हने से भागा।

4     तब यहोवा ने मूसा से कहा, हाथ बढ़ाकर उसकी पूंछ पकड़ ले कि वे लोग प्रतीति करें कि तुम्हारे पितरों के परमेश्वर अर्थात इब्राहीम के परमेश्वर, इसहाक के परमेश्वर, और याकूब के परमेश्वर, यहोवा ने तुझ को दर्शन दिया है।

5     तब उसने हाथ बढ़ाकर उसको पकड़ा तब वह उसके हाथ में फिर लाठी बन गई।

6     फिर यहोवा ने उससे यह भी कहा, कि अपना हाथ छाती पर रखकर ढांप। सो उसने अपना हाथ छाती पर रखकर ढांप लिया; फिर जब उसे निकाला तब क्या देखा, कि उसका हाथ कोढ़ के कारण हिम के समान श्वेत हो गया है।

7     तब उसने कहा, अपना हाथ छाती पर फिर रखकर ढांप। और उसने अपना हाथ छाती पर रखकर ढांप लिया; और जब उसने उसको छाती पर से निकाला तब क्या देखता है, कि वह फिर सारी देह के समान हो गया।

8     तब यहोवा ने कहा, यदि वे तेरी बात की प्रतीति न करें, और पहिले चिन्ह को न मानें, तो दूसरे चिन्ह की प्रतीति करेंगे।

12     अब जा, मैं तेरे मुख के संग हो कर जो तुझे कहना होगा वह तुझे सिखलाता जाऊंगा।

31     और लोगों ने उनकी प्रतीति की; और यह सुनकर, कि यहोवा ने इस्राएलियों की सुधि ली और उनके दु: खों पर दृष्टि की है, उन्होंने सिर झुका कर दण्डवत की॥

2. Exodus 4 : 2-8, 12, 31

2     And the Lord said unto him, What is that in thine hand? And he said, A rod.

3     And he said, Cast it on the ground. And he cast it on the ground, and it became a serpent; and Moses fled from before it.

4     And the Lord said unto Moses, Put forth thine hand, and take it by the tail. And he put forth his hand, and caught it, and it became a rod in his hand:

5     That they may believe that the Lord God of their fathers, the God of Abraham, the God of Isaac, and the God of Jacob, hath appeared unto thee.

6     And the Lord said furthermore unto him, Put now thine hand into thy bosom. And he put his hand into his bosom: and when he took it out, behold, his hand was leprous as snow.

7     And he said, Put thine hand into thy bosom again. And he put his hand into his bosom again; and plucked it out of his bosom, and, behold, it was turned again as his other flesh.

8     And it shall come to pass, if they will not believe thee, neither hearken to the voice of the first sign, that they will believe the voice of the latter sign.

12     Now therefore go, and I will be with thy mouth, and teach thee what thou shalt say.

31     And the people believed: and when they heard that the Lord had visited the children of Israel, and that he had looked upon their affliction, then they bowed their heads and worshipped.

3. निर्गमन 20: 2, 3

2     कि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूं, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात मिस्र देश से निकाल लाया है॥

3     तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना॥

3. Exodus 20 : 2, 3

2     I am the Lord thy God, which have brought thee out of the land of Egypt, out of the house of bondage.

3     Thou shalt have no other gods before me.

4. यूहन्ना 2: 1, 3-5, 7-11

1     फिर तीसरे दिन गलील के काना में किसी का ब्याह था, और यीशु की माता भी वहां थी।

3     जब दाखरस घट गया, तो यीशु की माता ने उस से कहा, कि उन के पास दाखरस नहीं रहा।

4     यीशु ने उस से कहा, हे महिला मुझे तुझ से क्या काम? अभी मेरा समय नहीं आया।

5     उस की माता ने सेवकों से कहा, जो कुछ वह तुम से कहे, वही करना।

7     यीशु ने उन से कहा, मटकों में पानी भर दो: सो उन्हों ने मुँहामुँह भर दिया।

8     यीशु ने उन से कहा, अब निकालकर भोज के प्रधान के पास ले जाओ।

9     वे ले गए, जब भोज के प्रधान ने वह पानी चखा, जो दाखरस बन गया था, और नहीं जानता था, कि वह कहां से आया हे, (परन्तु जिन सेवकों ने पानी निकाला था, वे जानते थे) तो भोज के प्रधान ने दूल्हे को बुलाकर, उस से कहा।

10     हर एक मनुष्य पहिले अच्छा दाखरस देता है और जब लोग पीकर छक जाते हैं, तब मध्यम देता है; परन्तु तू ने अच्छा दाखरस अब तक रख छोड़ा है।

11     यीशु ने गलील के काना में अपना यह पहिला चिन्ह दिखाकर अपनी महिमा प्रगट की और उसके चेलों ने उस पर विश्वास किया॥

4. John 2 : 1, 3-5, 7-11

1     And the third day there was a marriage in Cana of Galilee; and the mother of Jesus was there:

3     And when they wanted wine, the mother of Jesus saith unto him, They have no wine.

4     Jesus saith unto her, Woman, what have I to do with thee? mine hour is not yet come.

5     His mother saith unto the servants, Whatsoever he saith unto you, do it.

7     Jesus saith unto them, Fill the waterpots with water. And they filled them up to the brim.

8     And he saith unto them, Draw out now, and bear unto the governor of the feast. And they bare it.

9     When the ruler of the feast had tasted the water that was made wine, and knew not whence it was: (but the servants which drew the water knew;) the governor of the feast called the bridegroom,

10     And saith unto him, Every man at the beginning doth set forth good wine; and when men have well drunk, then that which is worse: but thou hast kept the good wine until now.

11     This beginning of miracles did Jesus in Cana of Galilee, and manifested forth his glory; and his disciples believed on him.

5. मत्ती 8: 1-4, 14-16, 18, 24-26

1     जब वह उस पहाड़ से उतरा, तो एक बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली।

2     और देखो, एक कोढ़ी ने पास आकर उसे प्रणाम किया और कहा; कि हे प्रभु यदि तू चाहे, तो मुझे शुद्ध कर सकता है।

3     यीशु ने हाथ बढ़ाकर उसे छूआ, और कहा, मैं चाहता हूं, तू शुद्ध हो जा और वह तुरन्त को ढ़ से शुद्ध हो गया।

4     यीशु ने उस से कहा; देख, किसी से न कहना परन्तु जाकर अपने आप को याजक को दिखला और जो चढ़ावा मूसा ने ठहराया है उसे चढ़ा, ताकि उन के लिये गवाही हो।

14     और यीशु ने पतरस के घर में आकर उस की सास को ज्वर में पड़ी देखा।

15     उस ने उसका हाथ छूआ और उसका ज्वर उतर गया; और वह उठकर उस की सेवा करने लगी।

16     जब संध्या हुई तब वे उसके पास बहुत से लोगों को लाए जिन में दुष्टात्माएं थीं और उस ने उन आत्माओं को अपने वचन से निकाल दिया, और सब बीमारों को चंगा किया।

18     यीशु ने अपनी चारों ओर एक बड़ी भीड़ देखकर उस पार जाने की आज्ञा दी।

24     और देखो, झील में एक ऐसा बड़ा तूफान उठा कि नाव लहरों से ढंपने लगी; और वह सो रहा था।

25     तब उन्होंने पास आकर उसे जगाया, और कहा, हे प्रभु, हमें बचा, हम नाश हुए जाते हैं।

26     उस ने उन से कहा; हे अल्पविश्वासियों, क्यों डरते हो? तब उस ने उठकर आन्धी और पानी को डांटा, और सब शान्त हो गया।

5. Matthew 8 : 1-4, 14-16, 18, 24-26

1     When he was come down from the mountain, great multitudes followed him.

2     And, behold, there came a leper and worshipped him, saying, Lord, if thou wilt, thou canst make me clean.

3     And Jesus put forth his hand, and touched him, saying, I will; be thou clean. And immediately his leprosy was cleansed.

4     And Jesus saith unto him, See thou tell no man; but go thy way, shew thyself to the priest, and offer the gift that Moses commanded, for a testimony unto them.

14     And when Jesus was come into Peter’s house, he saw his wife’s mother laid, and sick of a fever.

15     And he touched her hand, and the fever left her: and she arose, and ministered unto them.

16     When the even was come, they brought unto him many that were possessed with devils: and he cast out the spirits with his word, and healed all that were sick:

18     Now when Jesus saw great multitudes about him, he gave commandment to depart unto the other side.

24     And, behold, there arose a great tempest in the sea, insomuch that the ship was covered with the waves: but he was asleep.

25     And his disciples came to him, and awoke him, saying, Lord, save us: we perish.

26     And he saith unto them, Why are ye fearful, O ye of little faith? Then he arose, and rebuked the winds and the sea; and there was a great calm.

6. मत्ती 24: 4-7, 10-14

4     सावधान रहो! कोई तुम्हें न भरमाने पाए।

5     क्योंकि बहुत से ऐसे होंगे जो मेरे नाम से आकर कहेंगे, कि मैं मसीह हूं: और बहुतों को भरमाएंगे।

6     तुम लड़ाइयों और लड़ाइयों की चर्चा सुनोगे; देखो घबरा न जाना क्योंकि इन का होना अवश्य है, परन्तु उस समय अन्त न होगा।

7     क्योंकि जाति पर जाति, और राज्य पर राज्य चढ़ाई करेगा, और जगह जगह अकाल पड़ेंगे, और भुईंडोल होंगे।

10     तब बहुतेरे ठोकर खाएंगे, और एक दूसरे से बैर रखेंगे।

11     और बहुत से झूठे भविष्यद्वक्ता उठ खड़े होंगे, और बहुतों को भरमाएंगे।

12     और अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठण्डा हो जाएगा।

13     परन्तु जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा।

14     और राज्य का यह सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा, कि सब जातियों पर गवाही हो॥

6. Matthew 24 : 4-7, 10-14

4     And Jesus answered and said unto them, Take heed that no man deceive you.

5     For many shall come in my name, saying, I am Christ; and shall deceive many.

6     And ye shall hear of wars and rumours of wars: see that ye be not troubled: for all these things must come to pass, but the end is not yet.

7     For nation shall rise against nation, and kingdom against kingdom: and there shall be famines, and pestilences, and earthquakes, in divers places.

10     And then shall many be offended, and shall betray one another, and shall hate one another.

11     And many false prophets shall rise, and shall deceive many.

12     And because iniquity shall abound, the love of many shall wax cold.

13     But he that shall endure unto the end, the same shall be saved.

14     And this gospel of the kingdom shall be preached in all the world for a witness unto all nations; and then shall the end come.

7. रोमियो 8: 7 (कामुक), 8

7 …     शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि न तो परमेश्वर की व्यवस्था के आधीन है, और न हो सकता है।

8     और जो शारीरिक दशा में है, वे परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते।

7. Romans 8 : 7 (the carnal), 8

7     ...the carnal mind is enmity against God: for it is not subject to the law of God, neither indeed can be.

8     So then they that are in the flesh cannot please God.

8. रोमियो 12: 2

2     और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो॥

8. Romans 12 : 2

2     And be not conformed to this world: but be ye transformed by the renewing of your mind, that ye may prove what is that good, and acceptable, and perfect, will of God.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 200: 4-7

मूसा ने एक राष्ट्र को पदार्थ के बजाय आत्मा में ईश्वर की पूजा करने के लिए आगे बढ़ाया, और अमर मन द्वारा प्रदान की जाने वाली भव्य मानवीय क्षमताओं का वर्णन किया।

1. 200 : 4-7

Moses advanced a nation to the worship of God in Spirit instead of matter, and illustrated the grand human capacities of being bestowed by immortal Mind.

2. 321: 6-2

हिब्रू लॉजिवर, भाषण की धीमी गति, लोगों को यह समझने में निराश करती है कि उसे क्या बताया जाना चाहिए। जब, अपने डंडे को गिराने के लिए प्रज्ञा ने नेतृत्व किया, तो उसने देखा कि यह नागिन बन गई है, इससे पहले मूसा भाग गया; लेकिन ज्ञान ने उसे वापस आकर सर्प को संभाल लिया, और तब मूसा का भय दूर हो गया। इस घटना में विज्ञान की वास्तविकता देखी गई थी। बात को केवल एक विश्वास के रूप में दिखाया गया था। ज्ञान की बोली के तहत नागिन, दुष्ट, दिव्य विज्ञान को समझने के माध्यम से नष्ट हो गया था, और यह सबूत एक कर्मचारी था जिस पर झुकना था। मूसा के भ्रम ने उसे खतरे में डालने की अपनी शक्ति खो दी, जब उसने पाया कि उसने जो स्पष्ट रूप से देखा था वह वास्तव में था लेकिन नश्वर विश्वास का एक चरण था।

यह वैज्ञानिक रूप से प्रदर्शित किया गया था कि कुष्ठ रोग नश्वर मन का निर्माण था और न ही पदार्थ की स्थिति, जब मूसा ने पहली बार उसकी छाती पर हाथ रखा और उसे भयानक बीमारी के साथ बर्फ की तरह सफ़ेद कर दिया, और वर्तमान में एक ही सरल प्रक्रिया द्वारा अपनी प्राकृतिक स्थिति के लिए अपने हाथ को बहाल किया। ईश्वरीय विज्ञान में इस प्रमाण से ईश्वर ने मूसा का भय कम कर दिया था, और भीतर की आवाज़ उसे ईश्वर की आवाज़ बन गई, जिसने कहा: "यदि वे तेरी बात की प्रतीति न करें, और पहिले चिन्ह को न मानें, तो दूसरे चिन्ह की प्रतीति करेंगे।" और इसलिए यह आने वाली शताब्दियों में था, जब यीशु द्वारा विज्ञान का प्रदर्शन किया जा रहा था, जिसने अपने छात्रों को शराब में पानी बदलकर माइंड की शक्ति को दिखाया, और उन्हें सिखाया कि कैसे नागों को संभाला जाए, बीमारों को ठीक किया जाए और बुराइयों को बाहर निकाला जाए। मन की सर्वोच्चता के प्रमाण में।

2. 321 : 6-2

The Hebrew Lawgiver, slow of speech, despaired of making the people understand what should be revealed to him. When, led by wisdom to cast down his rod, he saw it become a serpent, Moses fled before it; but wisdom bade him come back and handle the serpent, and then Moses' fear departed. In this incident was seen the actuality of Science. Matter was shown to be a belief only. The serpent, evil, under wisdom's bidding, was destroyed through understanding divine Science, and this proof was a staff upon which to lean. The illusion of Moses lost its power to alarm him, when he discovered that what he apparently saw was really but a phase of mortal belief.

It was scientifically demonstrated that leprosy was a creation of mortal mind and not a condition of matter, when Moses first put his hand into his bosom and drew it forth white as snow with the dread disease, and presently restored his hand to its natural condition by the same simple process. God had lessened Moses' fear by this proof in divine Science, and the inward voice became to him the voice of God, which said: "It shall come to pass, if they will not believe thee, neither hearken to the voice of the first sign, that they will believe the voice of the latter sign." And so it was in the coming centuries, when the Science of being was demonstrated by Jesus, who showed his students the power of Mind by changing water into wine, and taught them how to handle serpents unharmed, to heal the sick and cast out evils in proof of the supremacy of Mind.

3. 215: 15-21

कभी-कभी हमें यह विश्वास दिला दिया जाता है कि अंधकार भी उतना ही वास्तविक है जितना कि प्रकाश; लेकिन विज्ञान इस बात की पुष्टि करता है कि अंधकार केवल प्रकाश की अनुपस्थिति का एक नश्वर भाव है, जिसके आने पर अंधकार वास्तविकता का आभास खो देता है। तो पाप और दुःख, बीमारी और मृत्यु, जीवन, ईश्वर की अनुमानित अनुपस्थिति हैं, और सत्य और प्रेम के सामने त्रुटि के प्रेत के रूप में भागते हैं।

3. 215 : 15-21

We are sometimes led to believe that darkness is as real as light; but Science affirms darkness to be only a mortal sense of the absence of light, at the coming of which darkness loses the appearance of reality. So sin and sorrow, disease and death, are the suppositional absence of Life, God, and flee as phantoms of error before truth and love.

4. 135: 26-32

ईसाई धर्म, जैसा कि यीशु ने सिखाया था, न तो कोई पंथ था, न ही समारोहों की एक प्रणाली, न ही अनुष्ठान करने वाले यहोवा का कोई विशेष उपहार; लेकिन यह दैवीय प्रेम का प्रदर्शन था जो त्रुटि को दूर करता था और बीमारों को ठीक करता था, न केवल ईसा मसीह या सत्य के नाम पर, बल्कि सत्य के प्रदर्शन में, जैसा कि दैवीय प्रकाश के चक्रों में होना चाहिए।

4. 135 : 26-32

Christianity as Jesus taught it was not a creed, nor a system of ceremonies, nor a special gift from a ritualistic Jehovah; but it was the demonstration of divine Love casting out error and healing the sick, not merely in the name of Christ, or Truth, but in demonstration of Truth, as must be the case in the cycles of divine light.

5. 269: 9 (इंसान)-11

मानव दर्शन ने ईश्वर को मनुष्य जैसा बना दिया है। क्रिश्चियन साइंस मनुष्य को ईश्वरतुल्य बनाता है। पहली त्रुटि है; उत्तरार्द्ध सत्य है.

5. 269 : 9 (Human)-11

Human philosophy has made God manlike. Christian Science makes man Godlike. The first is error; the latter is truth.

6. 205: 15-21

गलती में फंसने से (यह मानने की त्रुटि कि पदार्थ अच्छे या बुरे के लिए बुद्धिमान हो सकता है), धुंध छंटने पर ही हम ईश्वर की स्पष्ट झलक पा सकते हैं, या जब वे इतने पतलेपन में पिघल जाते हैं कि हम किसी शब्द या कार्य में दिव्य छवि को देखते हैं जो सच्चे विचार को इंगित करता है, - श्रेष्ठता और सत्य की सच्चाई, बुराई की शून्यता और असत्यता।

6. 205 : 15-21

Befogged in error (the error of believing that matter can be intelligent for good or evil), we can catch clear glimpses of God only as the mists disperse, or as they melt into such thinness that we perceive the divine image in some word or deed which indicates the true idea, — the supremacy and reality of good, the nothingness and unreality of evil.

7. 331: 11 (वह)-17

शास्त्रों का अर्थ है कि ईश्वर सब कुछ है। इससे यह पता चलता है कि ईश्वरीय मन और उनके विचारों के अलावा किसी भी चीज़ में वास्तविकता या अस्तित्व नहीं है। शास्त्र यह भी घोषणा करते हैं कि ईश्वर आत्मा है। इसलिए आत्मा में सब कुछ सामंजस्य है, और कोई मतभेद नहीं हो सकता; सब कुछ जीवन है, और कोई मृत्यु नहीं है। भगवान के ब्रह्मांड में सब कुछ उसे व्यक्त करता है।

7. 331 : 11 (The)-17

The Scriptures imply that God is All-in-all. From this it follows that nothing possesses reality nor existence except the divine Mind and His ideas. The Scriptures also declare that God is Spirit. Therefore in Spirit all is harmony, and there can be no discord; all is Life, and there is no death. Everything in God's universe expresses Him.

8. 207: 8 (ईश्वर)-19

भगवान बुरे दिमाग का निर्माता नहीं है. वास्तव में, बुराई मन नहीं है. हमें सीखना चाहिए कि बुराई अस्तित्व का भ्रामक और असत्य है। बुराई सर्वोच्च नहीं है; अच्छा असहाय नहीं है; न तो पदार्थ के प्राथमिक, और आत्मा के कानून के तथाकथित कानून हैं। इस पाठ के बिना, हम पूर्ण पिता, या मनुष्य के दिव्य सिद्धांत की दृष्टि खो देते हैं।

शरीर पहले और आत्मा अंतिम नहीं है, न ही बुराई अच्छाई से अधिक शक्तिशाली है। अस्तित्व का विज्ञान स्वयं-स्पष्ट असंभवताओं को अस्वीकार करता है, जैसे कारण या प्रभाव में सत्य और त्रुटि का समामेलन। विज्ञान कटाई के समय जंगली पौधों और गेहूँ को अलग करता है।

8. 207 : 8 (God)-19

God is not the creator of an evil mind. Indeed, evil is not Mind. We must learn that evil is the awful deception and unreality of existence. Evil is not supreme; good is not helpless; nor are the so-called laws of matter primary, and the law of Spirit secondary. Without this lesson, we lose sight of the perfect Father, or the divine Principle of man.

Body is not first and Soul last, nor is evil mightier than good. The Science of being repudiates self-evident impossibilities, such as the amalgamation of Truth and error in cause or effect. Science separates the tares and wheat in time of harvest.

9. 473: 4 (वह)-6

मन का विज्ञान सभी बुराई का निपटारा करता है। सत्य, ईश्वर, त्रुटि का जनक नहीं है। पाप, बीमारी और मृत्यु को त्रुटि के प्रभावों के रूप में वर्गीकृत किया जाना है।

9. 473 : 4 (The)-6

The Science of Mind disposes of all evil. Truth, God, is not the father of error. Sin, sickness, and death are to be classified as effects of error.

10. 275: 10-19

वास्तविकता और उसके विज्ञान में होने के क्रम को समझने के लिए, आपको परमेश्वर को उस सभी के दिव्य सिद्धांत के रूप में फिर से शुरू करना चाहिए जो वास्तव में है। आत्मा, जीवन, सत्य, प्रेम, एक के रूप में गठबंधन, - और भगवान के लिए शास्त्र के नाम हैं। सभी पदार्थ, बुद्धि, ज्ञान, अस्तित्व, अमरता, कारण और प्रभाव ईश्वर के हैं। ये उनकी विशेषताएं हैं, अनंत दिव्य सिद्धांत, प्रेम की शाश्वत अभिव्यक्तियाँ। कोई भी ज्ञान बुद्धिमान नहीं है, लेकिन उसका ज्ञान है; कोई सत्य सत्य नहीं है, कोई प्रेम प्यारा नहीं है, कोई जीवन जीवन नहीं है, लेकिन परमात्मा है; कोई अच्छा नहीं है, लेकिन अच्छा भगवान सबसे अच्छा है।

10. 275 : 10-19

To grasp the reality and order of being in its Science, you must begin by reckoning God as the divine Principle of all that really is. Spirit, Life, Truth, Love, combine as one, — and are the Scriptural names for God. All substance, intelligence, wisdom, being, immortality, cause, and effect belong to God. These are His attributes, the eternal manifestations of the infinite divine Principle, Love. No wisdom is wise but His wisdom; no truth is true, no love is lovely, no life is Life but the divine; no good is, but the good God bestows.

11. 330: 19 (ईश्वर)-24

ईश्वर वही है जो शास्त्र उसे घोषित करते हैं - जीवन, सत्य, प्रेम। आत्मा ईश्वरीय सिद्धांत है, और ईश्वरीय सिद्धांत प्रेम है, और प्रेम मन है, और मन अच्छा और बुरा दोनों नहीं है, क्योंकि ईश्वर मन है; इसलिए वास्तव में मन एक ही है, क्योंकि ईश्वर एक है।

11. 330 : 19 (God)-24

God is what the Scriptures declare Him to be, — Life, Truth, Love. Spirit is divine Principle, and divine Principle is Love, and Love is Mind, and Mind is not both good and bad, for God is Mind; therefore there is in reality one Mind only, because there is one God.

12. 242: 9-14

स्वर्ग के लिए एक रास्ता है, सद्भाव; और ईश्वरीय विज्ञान में मसीह हमें इस मार्ग को दिखाता है। कोई और वास्तविकता नहीं है, अच्छे ईश्वर और उसके प्रतिबिंब को जानने और इंद्रियों के दर्द और सुख से श्रेष्ठ होने के अलावा जीवन की कोई अन्य चेतना नहीं है।

12. 242 : 9-14

There is but one way to heaven, harmony, and Christ in divine Science shows us this way. It is to know no other reality — to have no other consciousness of life — than good, God and His reflection, and to rise superior to the so-called pain and pleasure of the senses.

13. 281: 14-17

एक अहंकार, एक मन या आत्मा जिसे ईश्वर कहा जाता है, अनंत व्यक्तित्व है, जो सभी रूप और सुंदरता प्रदान करता है और जो व्यक्तिगत आध्यात्मिक मनुष्य और चीजों में वास्तविकता और दिव्यता को दर्शाता है।

13. 281 : 14-17

The one Ego, the one Mind or Spirit called God, is infinite individuality, which supplies all form and comeliness and which reflects reality and divinity in individual spiritual man and things.

14. 76: 18 (कष्ट)-21

पीड़ा, पाप, मरणासन्न मान्यताएँ अवास्तविक हैं। जब दैवीय विज्ञान को सार्वभौमिक रूप से समझा जाएगा, तो उनका मनुष्य पर कोई अधिकार नहीं होगा, क्योंकि मनुष्य अमर है और दैवीय अधिकार द्वारा जीवित है।

14. 76 : 18 (Suffering)-21

Suffering, sinning, dying beliefs are unreal. When divine Science is universally understood, they will have no power over man, for man is immortal and lives by divine authority.

15. 207: 27 केवल

आध्यात्मिक वास्तविकता सभी चीज़ों में वैज्ञानिक तथ्य है।

15. 207 : 27 only

The spiritual reality is the scientific fact in all things.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6