रविवार 6 सितंबर, 2020 |

रविवार 6 सितंबर, 2020



विषयआदम

SubjectMan

वर्ण पाठ: 1 कुरिन्थियों 15: 10

परन्तु मैं जो कुछ भी हूं, परमेश्वर के अनुग्रह से हूं: और उसका अनुग्रह जो मुझ पर हुआ, वह व्यर्थ नहीं हुआ परन्तु।



Golden Text: I Corinthians 15 : 10

By the grace of God I am what I am: and his grace which was bestowed upon me was not in vain.




PDF Downloads:


पाठ के ऑडियो के लिए यहां क्लिक करें

YouTube पर सुनने के लिए यहां क्लिक करें

████████████████████████████████████████████████████████████████████████


मत्ती 5: 13-16 • रोमियो 8: 28


13     तुम पृथ्वी के नमक हो; परन्तु यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए, तो वह फिर किस वस्तु से नमकीन किया जाएगा? फिर वह किसी काम का नहीं, केवल इस के कि बाहर फेंका जाए और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाए।

14     तुम जगत की ज्योति हो; जो नगर पहाड़ पर बसा हुआ है वह छिप नहीं सकता।

15     और लोग दिया जलाकर पैमाने के नीचे नहीं परन्तु दीवट पर रखते हैं, तब उस से घर के सब लोगों को प्रकाश पहुंचता है।

16     उसी प्रकार तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के साम्हने चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में हैं, बड़ाई करें॥

28     और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात उन्हीं के लिये जो उस की इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।

Responsive Reading: Matthew 5 : 13-16; Romans 8 : 28

13.     Ye are the salt of the earth: but if the salt have lost his savour, wherewith shall it be salted? it is thenceforth good for nothing, but to be cast out, and to be trodden under foot of men.

14.     Ye are the light of the world. A city that is set on an hill cannot be hid.

15.     Neither do men light a candle, and put it under a bushel, but on a candlestick; and it giveth light unto all that are in the house.

16.     Let your light so shine before men, that they may see your good works, and glorify your Father which is in heaven.

28.     And we know that all things work together for good to them that love God, to them who are the called according to his purpose.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. उत्पत्ति 1: 26, 27, 31 (से 1st.)

26     फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगने वाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।

27     तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।

31     तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है।

1. Genesis 1 : 26, 27, 31 (to 1st .)

26     And God said, Let us make man in our image, after our likeness: and let them have dominion over the fish of the sea, and over the fowl of the air, and over the cattle, and over all the earth, and over every creeping thing that creepeth upon the earth.

27     So God created man in his own image, in the image of God created he him; male and female created he them.

31     And God saw every thing that he had made, and, behold, it was very good.

2. भजन संहिता 8: 1, 3-6

1     हेयहोवा हमारे प्रभु, तेरा नाम सारी पृथ्वी पर क्या ही प्रतापमय है! तू ने अपना वैभव स्वर्ग पर दिखाया है।

3     जब मैं आकाश को, जो तेरे हाथों का कार्य है, और चंद्रमा और तरागण को जो तू ने नियुक्त किए हैं, देखता हूं;

4     तो फिर मनुष्य क्या है कि तू उसका स्मरण रखे, और आदमी क्या है कि तू उसकी सुधि ले?

5     क्योंकि तू ने उसको परमेश्वर से थोड़ा ही कम बनाया है, और महिमा और प्रताप का मुकुट उसके सिर पर रखा है।

6     तू ने उसे अपने हाथों के कार्यों पर प्रभुता दी है; तू ने उसके पांव तले सब कुछ कर दिया है।

2. Psalm 8 : 1, 3-6

1     O Lord our Lord, how excellent is thy name in all the earth! who hast set thy glory above the heavens.

3     When I consider thy heavens, the work of thy fingers, the moon and the stars, which thou hast ordained;

4     What is man, that thou art mindful of him? and the son of man, that thou visitest him?

5     For thou hast made him a little lower than the angels, and hast crowned him with glory and honour.

6     Thou madest him to have dominion over the works of thy hands; thou hast put all things under his feet:

3. मत्ती 3: 16, 17

16     और यीशु बपतिस्मा लेकर तुरन्त पानी में से ऊपर आया, और देखो, उसके लिये आकाश खुल गया; और उस ने परमेश्वर के आत्मा को कबूतर की नाईं उतरते और अपने ऊपर आते देखा।

17     और देखो, यह आकाशवाणी हुई, कि यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिस से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूं॥

3. Matthew 3 : 16, 17

16     And Jesus, when he was baptized, went up straightway out of the water: and, lo, the heavens were opened unto him, and he saw the Spirit of God descending like a dove, and lighting upon him:

17     And lo a voice from heaven, saying, This is my beloved Son, in whom I am well pleased.

4. मत्ती 5: 1-3, 5, 6, 8, 20, 43-45, 48

1     वह इस भीड़ को देखकर, पहाड़ पर चढ़ गया; और जब बैठ गया तो उसके चेले उसके पास आए।

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

3     धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।

5     धन्य हैं वे, जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे।

6     धन्य हैं वे जो धर्म के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किये जाएंगे।

8     धन्य हैं वे, जिन के मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।

20     क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि यदि तुम्हारी धामिर्कता शास्त्रियों और फरीसियों की धामिर्कता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे॥

43     तुम सुन चुके हो, कि कहा गया था; कि अपने पड़ोसी से प्रेम रखना, और अपने बैरी से बैर।

44     परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सताने वालों के लिये प्रार्थना करो।

45     जिस से तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे क्योंकि वह भलों और बुरों दोनो पर अपना सूर्य उदय करता है, और धमिर्यों और अधमिर्यों दोनों पर मेंह बरसाता है।

48     इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है॥

4. Matthew 5 : 1-3, 5, 6, 8, 20, 43-45, 48

1     And seeing the multitudes, he went up into a mountain: and when he was set, his disciples came unto him:

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

3     Blessed are the poor in spirit: for theirs is the kingdom of heaven.

5     Blessed are the meek: for they shall inherit the earth.

6     Blessed are they which do hunger and thirst after righteousness: for they shall be filled.

8     Blessed are the pure in heart: for they shall see God.

20     For I say unto you, That except your righteousness shall exceed the righteousness of the scribes and Pharisees, ye shall in no case enter into the kingdom of heaven.

43     Ye have heard that it hath been said, Thou shalt love thy neighbour, and hate thine enemy.

44     But I say unto you, Love your enemies, bless them that curse you, do good to them that hate you, and pray for them which despitefully use you, and persecute you;

45     That ye may be the children of your Father which is in heaven: for he maketh his sun to rise on the evil and on the good, and sendeth rain on the just and on the unjust.

48     Be ye therefore perfect, even as your Father which is in heaven is perfect.

5. 1 कुरिन्थियों 12: 1, 4-13

1     हेभाइयों, मैं नहीं चाहता कि तुम आत्मिक वरदानों के विषय में अज्ञात रहो।

4     वरदान तो कई प्रकार के हैं, परन्तु आत्मा एक ही है।

5     और सेवा भी कई प्रकार की है, परन्तु प्रभु एक ही है।

6     और प्रभावशाली कार्य कई प्रकार के हैं, परन्तु परमेश्वर एक ही है, जो सब में हर प्रकार का प्रभाव उत्पन्न करता है।

7     किन्तु सब के लाभ पहुंचाने के लिये हर एक को आत्मा का प्रकाश दिया जाता है।

8     क्योंकि एक को आत्मा के द्वारा बुद्धि की बातें दी जाती हैं; और दूसरे को उसी आत्मा के अनुसार ज्ञान की बातें।

9     और किसी को उसी आत्मा से विश्वास; और किसी को उसी एक आत्मा से चंगा करने का वरदान दिया जाता है।

10     फिर किसी को सामर्थ के काम करने की शक्ति; और किसी को भविष्यद्वाणी की; और किसी को आत्माओं की परख, और किसी को अनेक प्रकार की भाषा; और किसी को भाषाओं का अर्थ बताना।

11     परन्तु ये सब प्रभावशाली कार्य वही एक आत्मा करवाता है, और जिसे जो चाहता है वह बांट देता है॥

12     क्योंकि जिस प्रकार देह तो एक है और उसके अंग बहुत से हैं, और उस एक देह के सब अंग, बहुत होने पर भी सब मिलकर एक ही देह हैं, उसी प्रकार मसीह भी है।

13     क्योंकि हम सब ने क्या यहूदी हो, क्या युनानी, क्या दास, क्या स्वतंत्र एक ही आत्मा के द्वारा एक देह होने के लिये बपतिस्मा लिया, और हम सब को एक ही आत्मा पिलाया गया।

5. I Corinthians 12 : 1, 4-13

1     Now concerning spiritual gifts, brethren, I would not have you ignorant.

4     Now there are diversities of gifts, but the same Spirit.

5     And there are differences of administrations, but the same Lord.

6     And there are diversities of operations, but it is the same God which worketh all in all.

7     But the manifestation of the Spirit is given to every man to profit withal.

8     For to one is given by the Spirit the word of wisdom; to another the word of knowledge by the same Spirit;

9     To another faith by the same Spirit; to another the gifts of healing by the same Spirit;

10     To another the working of miracles; to another prophecy; to another discerning of spirits; to another divers kinds of tongues; to another the interpretation of tongues:

11     But all these worketh that one and the selfsame Spirit, dividing to every man severally as he will.

12     For as the body is one, and hath many members, and all the members of that one body, being many, are one body: so also is Christ.

13     For by one Spirit are we all baptized into one body, whether we be Jews or Gentiles, whether we be bond or free; and have been all made to drink into one Spirit.

6. इफिसियों 4: 1, 2, 13, 22-24

1     सोमैं जो प्रभु में बन्धुआ हूं तुम से बिनती करता हूं, कि जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए थे, उसके योग्य चाल चलो।

2     अर्थात सारी दीनता और नम्रता सहित, और धीरज धरकर प्रेम से एक दूसरे की सह लो।

13     जब तक कि हम सब के सब विश्वास, और परमेश्वर के पुत्र की पहिचान में एक न हो जाएं, और एक सिद्ध मनुष्य न बन जाएं और मसीह के पूरे डील डौल तक न बढ़ जाएं।

22     कि तुम अगले चालचलन के पुराने मनुष्यत्व को जो भरमाने वाली अभिलाषाओं के अनुसार भ्रष्ट होता जाता है, उतार डालो।

23     और अपने मन के आत्मिक स्वभाव में नये बनते जाओ।

24     और नये मनुष्यत्व को पहिन लो, जो परमेश्वर के अनुसार सत्य की धामिर्कता, और पवित्रता में सृजा गया है॥

6. Ephesians 4 : 1, 2, 13, 22-24

1     I therefore, the prisoner of the Lord, beseech you that ye walk worthy of the vocation wherewith ye are called,

2     With all lowliness and meekness, with longsuffering, forbearing one another in love;

13     Till we all come in the unity of the faith, and of the knowledge of the Son of God, unto a perfect man, unto the measure of the stature of the fulness of Christ:

22     That ye put off concerning the former conversation the old man, which is corrupt according to the deceitful lusts;

23     And be renewed in the spirit of your mind;

24     And that ye put on the new man, which after God is created in righteousness and true holiness.

7. कुलुस्सियों 3: 11-15

11     उस में न तो यूनानी रहा, न यहूदी, न खतना, न खतनारिहत, न जंगली, न स्कूती, न दास और न स्वतंत्र: केवल मसीह सब कुछ और सब में है॥

12     इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करूणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो।

13     और यदि किसी को किसी पर दोष देने को कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो।

14     और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्ध है बान्ध लो।

15     और मसीह की शान्ति जिस के लिये तुम एक देह होकर बुलाए भी गए हो, तुम्हारे हृदय में राज्य करे, और तुम धन्यवादी बने रहो।

7. Colossians 3 : 11-15

11     Where there is neither Greek nor Jew, circumcision nor uncircumcision, Barbarian, Scythian, bond nor free: but Christ is all, and in all.

12     Put on therefore, as the elect of God, holy and beloved, bowels of mercies, kindness, humbleness of mind, meekness, longsuffering;

13     Forbearing one another, and forgiving one another, if any man have a quarrel against any: even as Christ forgave you, so also do ye.

14     And above all these things put on charity, which is the bond of perfectness.

15     And let the peace of God rule in your hearts, to the which also ye are called in one body; and be ye thankful.

8. इफिसियों 2: 10

10     क्योंकि हम उसके बनाए हुए हैं; और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिये सृजे गए जिन्हें परमेश्वर ने पहिले से हमारे करने के लिये तैयार किया॥

8. Ephesians 2 : 10

10     For we are his workmanship, created in Christ Jesus unto good works, which God hath before ordained that we should walk in them.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 76: 20 (आदमी है)-21

...मनुष्य अमर है और दिव्य अधिकार से जीवित है।

1. 76 : 20 (man is)-21

…man is immortal and lives by divine authority.

2. 475: 7-13, 14-15 (से ;), 16 (यह)-22

पवित्रशास्त्र हमें सूचित करता है कि मनुष्य परमेश्वर की छवि और समानता में बना है। सामग्री वह समानता नहीं है। आत्मा की समानता आत्मा के विपरीत नहीं हो सकती। मनुष्य आध्यात्मिक और परिपूर्ण है; और आध्यात्मिक और परिपूर्ण होने के कारण, उसे इस तरह से क्रिश्चियन साइंस में समझना चाहिए … वह ईश्वर का यौगिक विचार है, जिसमें सभी सही विचार शामिल हैं; … जिसमें देवता से नीचे एक भी गुण नहीं है; उसके पास न तो जीवन है, न बुद्धि, और न ही उसकी रचनात्मक शक्ति, लेकिन यह आध्यात्मिक रूप से सभी को दर्शाता है जो उसके निर्माता से संबंधित है।

2. 475 : 7-13, 14-15 (to ;), 16 (the)-22

The Scriptures inform us that man is made in the image and likeness of God. Matter is not that likeness. The likeness of Spirit cannot be so unlike Spirit. Man is spiritual and perfect; and because he is spiritual and perfect, he must be so understood in Christian Science. … He is the compound idea of God, including all right ideas; … the conscious identity of being as found in Science, in which man is the reflection of God, or Mind, and therefore is eternal; that which has no separate mind from God; that which has not a single quality underived from Deity; that which possesses no life, intelligence, nor creative power of his own, but reflects spiritually all that belongs to his Maker.

3. 63: 9-11

आत्मा उसका मूल और होने का परम स्रोत है; परमेश्वर उसका पिता है, और जीवन उसके होने का नियम है।

3. 63 : 9-11

Spirit is his primitive and ultimate source of being; God is his Father, and Life is the law of his being.

4. 259: 6 (दिव्य)-14

मसीह यीशु में ईश्वरीय प्रकृति को सर्वश्रेष्ठ रूप से व्यक्त किया गया था, विचार जो मनुष्य को पतित, बीमार, पापी और मरने के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वैज्ञानिक होने और दैवीय उपचार की मसीह की समझ में एक आदर्श सिद्धांत और विचार शामिल हैं, पूर्ण ईश्वर और पूर्ण मनुष्य, विचार और प्रदर्शन के आधार के रूप में।

4. 259 : 6 (The divine)-14

The divine nature was best expressed in Christ Jesus, who threw upon mortals the truer reflection of God and lifted their lives higher than their poor thought-models would allow, — thoughts which presented man as fallen, sick, sinning, and dying. The Christlike understanding of scientific being and divine healing includes a perfect Principle and idea, — perfect God and perfect man, — as the basis of thought and demonstration.

5. 476: 32-7

यीशु ने विज्ञान में सिद्ध पुरुष को सही ठहराया, जो उसे दिखाई दिया जहां पाप करने वाला नश्वर मनुष्य नश्वर प्रतीत होता है। इस सिद्ध पुरुष में उद्धारकर्ता ने परमेश्वर की अपनी समानता को देखा, और मनुष्य के इस सही दृष्टिकोण ने बीमारों को चंगा किया। इस प्रकार यीशु ने सिखाया कि ईश्वर का राज्य अक्षुण्ण, सार्वभौमिक है, और वह मनुष्य शुद्ध और पवित्र है। आत्मा के लिए मनुष्य कोई भौतिक आवास नहीं है; वह खुद आध्यात्मिक है।

5. 476 : 32-7

Jesus beheld in Science the perfect man, who appeared to him where sinning mortal man appears to mortals. In this perfect man the Saviour saw God's own likeness, and this correct view of man healed the sick. Thus Jesus taught that the kingdom of God is intact, universal, and that man is pure and holy. Man is not a material habitation for Soul; he is himself spiritual.

6. 477: 9 (से)-17

पांच शारीरिक इंद्रियों के लिए, मनुष्य पदार्थ और मन को एकजुट प्रतीत होता है; लेकिन क्राइस्टियन साइंस मनुष्य को ईश्वर के विचार के रूप में प्रकट करता है, और शारीरिक इंद्रियों को नश्वर और दुराचारी होने की घोषणा करता है। ईश्वरीय विज्ञान यह दिखाता है कि यह असंभव है कि एक भौतिक शरीर, मनुष्य होना चाहिए, हालांकि पदार्थ के उच्चतम स्तर के साथ जुड़ा हुआ है, यही इसका गलत नाम है - वास्तविक और पूर्ण मनुष्य, होने का अमर विचार, अविनाशी और शाश्वत।

6. 477 : 9 (To)-17

To the five corporeal senses, man appears to be matter and mind united; but Christian Science reveals man as the idea of God, and declares the corporeal senses to be mortal and erring illusions. Divine Science shows it to be impossible that a material body, though interwoven with matter's highest stratum, misnamed mind, should be man, — the genuine and perfect man, the immortal idea of being, indestructible and eternal.

7. 302: 3-9

भौतिक शरीर और मन लौकिक हैं, लेकिन वास्तविक मनुष्य आध्यात्मिक और शाश्वत है। असली आदमी की पहचान नहीं खोई है, लेकिन इस स्पष्टीकरण के माध्यम से पाया जाता है।; इसके लिए अस्तित्व और सभी पहचान के प्रति सचेत अविभाजित है और अपरिवर्तित रहता है। जब भगवान सब और अनंत काल के हैं, तब यह असंभव है कि मनुष्य को वास्तविक रूप से खोना चाहिए।

7. 302 : 3-9

The material body and mind are temporal, but the real man is spiritual and eternal. The identity of the real man is not lost, but found through this explanation; for the conscious infinitude of existence and of all identity is thereby discerned and remains unchanged. It is impossible that man should lose aught that is real, when God is all and eternally his. 

8. 254: 19 (यह)-23

...मानव स्वयं को प्रचारित करना चाहिए। यह कार्य ईश्वर हमें आज प्रेमपूर्वक स्वीकार करने के लिए, और इतनी तेजी से व्यावहारिक सामग्री को छोड़ने के लिए, और आध्यात्मिक कार्य करने के लिए कहता है जो बाहरी और वास्तविक को निर्धारित करता है।

8. 254 : 19 (the)-23

…the human self must be evangelized. This task God demands us to accept lovingly to-day, and to abandon so fast as practical the material, and to work out the spiritual which determines the outward and actual.

9. 265 : 10-15

किसी भी तरह से, आत्मा के लिए कुछ भी होने का यह वैज्ञानिक अर्थ, मनुष्य को देवता में अवशोषण और उसकी पहचान के नुकसान का सुझाव देता है, लेकिन मनुष्य में बढ़े हुए व्यक्तित्व, विचार और कर्म का व्यापक क्षेत्र, एक अधिक विस्तृत प्रेम, एक उच्च और अधिक स्थायी शांति।

9. 265 : 10-15

This scientific sense of being, forsaking matter for Spirit, by no means suggests man's absorption into Deity and the loss of his identity, but confers upon man enlarged individuality, a wider sphere of thought and action, a more expansive love, a higher and more permanent peace.

10. 317: 16-20

मनुष्य का व्यक्तित्व कम मूर्त नहीं है क्योंकि यह आध्यात्मिक है और क्योंकि उसका जीवन पदार्थ की दया पर नहीं है। उनकी आध्यात्मिक व्यक्तित्व की समझ, मनुष्य को सच्चाई में अधिक वास्तविक, अधिक दुर्जेय बनाती है और उसे पाप, बीमारी और मृत्यु पर विजय प्राप्त करने में सक्षम बनाती है।

10. 317 : 16-20

The individuality of man is no less tangible because it is spiritual and because his life is not at the mercy of matter. The understanding of his spiritual individuality makes man more real, more formidable in truth, and enables him to conquer sin, disease, and death.

11. 128: 6-19

इससे यह ज्ञात होता है कि व्यापारिक पुरुषों और सुसंस्कृत विद्वानों ने पाया है कि क्रिएस्टियन साइंस उनकी सहनशक्ति और मानसिक शक्तियों को बढ़ाता है, चरित्र की उनकी धारणा को बढ़ाता है, उन्हें एकरूपता और समझ देता है और उनकी साधारण क्षमता को पार करने की क्षमता देता है। मानव मन, जो इस आध्यात्मिक समझ के साथ जुड़ा हुआ है, अधिक लोचदार हो जाता है, अधिक धीरज रखने में सक्षम होता है, कुछ हद तक खुद से बच जाता है, और कम प्रतिनिधि की आवश्यकता होती है। मनुष्य के अव्यक्त क्षमताओं और संभावनाओं को विकसित करने के विज्ञान का ज्ञान। यह विचार के वातावरण का विस्तार करता है, जिससे नश्वर व्यापक और उच्चतर क्षेत्रों तक पहुँच प्राप्त करता है। यह विचारक को अंतर्दृष्टि और दृष्टिकोण की अपनी मूल हवा में उठाता है।

11. 128 : 6-19

From this it follows that business men and cultured scholars have found that Christian Science enhances their endurance and mental powers, enlarges their perception of character, gives them acuteness and comprehensiveness and an ability to exceed their ordinary capacity. The human mind, imbued with this spiritual understanding, becomes more elastic, is capable of greater endurance, escapes somewhat from itself, and requires less repose. A knowledge of the Science of being develops the latent abilities and possibilities of man. It extends the atmosphere of thought, giving mortals access to broader and higher realms. It raises the thinker into his native air of insight and perspicacity.

12. 491: 9-16

मनुष्य का आध्यात्मिक व्यक्तित्व कभी गलत नहीं होता। यह मनुष्य के निर्माता की समानता है। पदार्थ नश्वर को वास्तविक उत्पत्ति और होने के तथ्यों से नहीं जोड़ सकता, जिसमें सभी को समाप्त होना चाहिए। यह आत्मा के वर्चस्व को स्वीकार करने से ही है, जो पदार्थ के दावों को खारिज करता है, कि नश्वरता मृत्यु दर को दूर कर सकती है और उस अदम्य आध्यात्मिक लिंक को खोज सकती है जो मनुष्य को दैवीय समानता में स्थापित करता है, जो अपने निर्माता से अविभाज्य है।

12. 491 : 9-16

Man's spiritual individuality is never wrong. It is the likeness of man's Maker. Matter cannot connect mortals with the true origin and facts of being, in which all must end. It is only by acknowledging the supremacy of Spirit, which annuls the claims of matter, that mortals can lay off mortality and find the indissoluble spiritual link which establishes man forever in the divine likeness, inseparable from his creator.

13. 519: 14-21

नश्वर कभी भी अनंत को नहीं जान सकते, जब तक कि वे प्राचीन मानवता को नहीं छोड़ते और आध्यात्मिक छवि और समानता तक नहीं पहुंचते। अनंत को क्या माप सकता है! प्रेरित की भाषा में, हम उसे कैसे घोषित करेंगे, जब तक कि "हम सब के सब विश्वास, और भगवान के पुत्र की पहिचान में एक न हो जाओ, और एक सिद्ध पुरुष न बन जाओ और मसीह के पूरे सौदे डौल तक न बढ़ जाओ।"?

13. 519 : 14-21

Mortals can never know the infinite, until they throw off the old man and reach the spiritual image and likeness. What can fathom infinity! How shall we declare Him, till, in the language of the apostle, "we all come in the unity of the faith, and of the knowledge of the Son of God, unto a perfect man, unto the measure of the stature of the fulness of Christ"?

14. 241: 23-30

एक उद्देश्य, विश्वास से परे एक बिंदु, सत्य के नक्शेकदम पर चलना चाहिए, स्वास्थ्य और पवित्रता का रास्ता। हमें होरेब की ऊँचाई तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए जहाँ परमेश्वर प्रगट होता है; और सभी आध्यात्मिक भवन की आधारशिला पवित्रता है। आत्मा का बपतिस्मा, मांस की सभी अशुद्धियों के शरीर को धोना, यह दर्शाता है कि शुद्ध हृदय ईश्वर को देखता है और आध्यात्मिक जीवन और उसके प्रदर्शन के करीब पहुंच रहा है।

14. 241 : 23-30

One's aim, a point beyond faith, should be to find the footsteps of Truth, the way to health and holiness. We should strive to reach the Horeb height where God is revealed; and the corner-stone of all spiritual building is purity. The baptism of Spirit, washing the body of all the impurities of flesh, signifies that the pure in heart see God and are approaching spiritual Life and its demonstration.

15. 337: 16-19

उसकी शुद्धता के अनुपात में मनुष्य परिपूर्ण है; और पूर्णता खगोलीय होने का क्रम है जो जीवन को मसीह में प्रदर्शित करता है, जीवन का आध्यात्मिक आदर्श है।

15. 337 : 16-19

In proportion to his purity is man perfect; and perfection is the order of celestial being which demonstrates Life in Christ, Life's spiritual ideal.

16. 99: 23-29

सच्ची आध्यात्मिकता की शांत, मजबूत धाराएँ, जिनमें से अभिव्यक्तियाँ स्वास्थ्य, पवित्रता और आत्म-विनाश हैं, मानव अनुभव को गहरा करना चाहिए, जब तक कि भौतिक अस्तित्व की मान्यताओं को एक गंजेपन के रूप में नहीं देखा जाता है, और पाप, बीमारी, और मृत्यु ईश्वरीय आत्मा के वैज्ञानिक प्रदर्शन और परमेश्‍वर के आध्यात्मिक, सिद्ध इंसान को हमेशा के लिए जगह देते हैं।

16. 99 : 23-29

The calm, strong currents of true spirituality, the manifestations of which are health, purity, and self-immolation, must deepen human experience, until the beliefs of material existence are seen to be a bald imposition, and sin, disease, and death give everlasting place to the scientific demonstration of divine Spirit and to God's spiritual, perfect man.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


████████████████████████████████████████████████████████████████████████