रविवार 6 मार्च, 2022



विषयआदमी

SubjectMan

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: भजन संहिता 34 : 4

"मैं यहोवा के पास गया, तब उसने मेरी सुन ली, और मुझे पूरी रीति से निर्भय किया।"



Golden Text: Psalm 34 : 4

I sought the Lord, and he heard me, and delivered me from all my fears.




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उत्तरदायी अध्ययन: यशायाह 41: 10-13, 17, 18, 20


10     मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूं, इधर उधर मत ताक, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूं; मैं तुझे दृढ़ करूंगा और तेरी सहायता करूंगा, अपने धर्ममय दाहिने हाथ से मैं तुझे सम्हाले रहूंगा॥

11     देख, जो तुझ से क्रोधित हैं, वे सब लज्जित होंगे; जो तुझ से झगड़ते हैं उनके मुंह काले होंगे और वे नाश हो कर मिट जाएंगे।

12     जो तुझ से लड़ते हैं उन्हें ढूंढने पर भी तू न पएगा; जो तुझ से युद्ध करते हैं वे नाश हो कर मिट जाएंगे।

13     क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा, तेरा दहिना हाथ पकड़कर कहूंगा, मत डर, मैं तेरी सहायता करूंगा॥

17     जब दीन और दरिद्र लोग जल ढूंढ़ने पर भी न पाएं और उनका तालू प्यास के मारे सूख जाए; मैं यहोवा उनकी बिनती सुनूंगा, मैं इस्राएल का परमेश्वर उन को त्याग न दूंगां

18     मैं मुण्डे टीलों से भी नदियां और मैदानों के बीच में सोते बहऊंगा; मैं जंगल को ताल और निर्जल देश को सोते ही सोते कर दूंगा।

20     जिस से लोग देखकर जान लें, और सोचकर पूरी रीति से समझ लें कि यह यहोवा के हाथ का किया हुआ और इस्राएल के पवित्र का सृजा हुआ है॥

Responsive Reading: Isaiah 41 : 10-13, 17, 18, 20

10.     Fear thou not; for I am with thee: be not dismayed; for I am thy God: I will strengthen thee; yea, I will help thee; yea, I will uphold thee with the right hand of my righteousness.

11.     Behold, all they that were incensed against thee shall be ashamed and confounded: they shall be as nothing; and they that strive with thee shall perish.

12.     Thou shalt seek them, and shalt not find them, even them that contended with thee: they that war against thee shall be as nothing, and as a thing of nought.

13.     For I the Lord thy God will hold thy right hand, saying unto thee, Fear not; I will help thee.

17.     When the poor and needy seek water, and there is none, and their tongue faileth for thirst, I the Lord will hear them, I the God of Israel will not forsake them.

18.     I will open rivers in high places, and fountains in the midst of the valleys: I will make the wilderness a pool of water, and the dry land springs of water.

20.     That they may see, and know, and consider, and understand together, that the hand of the Lord hath done this, and the Holy One of Israel hath created it.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. डेनियल 10: 19 (हे मनु) (से 1st.)

19     हे अति प्रिय पुरूष, मत डर, तुझे शान्ति मिले; तू दृढ़ हो और तेरा हियाव बन्धा रहे।

1. Daniel 10 : 19 (O man) (to 1st .)

19     O man greatly beloved, fear not: peace be unto thee, be strong, yea, be strong.

2. भजन संहिता 27: 1, 3-5, 13, 14

1     यहोवा परमेश्वर मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है; मैं किस से डरूं? यहोवा मेरे जीवन का दृढ़ गढ़ ठहरा है, मैं किस का भय खाऊं?

3     चाहे सेना भी मेरे विरुद्ध छावनी डाले, तौभी मैं न डरूंगा; चाहे मेरे विरुद्ध लड़ाई ठन जाए, उस दशा में भी मैं हियाव बान्धे निशचिंत रहूंगा॥

4     एक वर मैं ने यहोवा से मांगा है, उसी के यत्न में लगा रहूंगा; कि मैं जीवन भर यहोवा के भवन में रहने पाऊं, जिस से यहोवा की मनोहरता पर दृष्टि लगाए रहूं, और उसके मन्दिर में ध्यान किया करूं॥

5     क्योंकि वह तो मुझे विपत्ति के दिन में अपने मण्डप में छिपा रखेगा; अपने तम्बू के गुप्त स्थान में वह मुझे छिपा लेगा, और चट्टान पर चढ़ाएगा।

7     हे यहोवा, मेरा शब्द सुन, मैं पुकारता हूं, तू मुझ पर अनुग्रह कर और मुझे उत्तर दे।

13     यदि मुझे विश्वास न होता कि जीवितों की पृथ्वी पर यहोवा की भलाई को देखूंगा, तो मैं मूर्च्छित हो जाता।

14     यहोवा की बाट जोहता रह; हियाव बान्ध और तेरा हृदय दृढ़ रहे; हां, यहोवा ही की बाट जोहता रह!

2. Psalm 27 : 1, 3-5, 13, 14

1     The Lord is my light and my salvation; whom shall I fear? the Lord is the strength of my life; of whom shall I be afraid?

3     Though an host should encamp against me, my heart shall not fear: though war should rise against me, in this will I be confident.

4     One thing have I desired of the Lord, that will I seek after; that I may dwell in the house of the Lord all the days of my life, to behold the beauty of the Lord, and to inquire in his temple.

5     For in the time of trouble he shall hide me in his pavilion: in the secret of his tabernacle shall he hide me; he shall set me up upon a rock.

13     I had fainted, unless I had believed to see the goodness of the Lord in the land of the living.

14     Wait on the Lord: be of good courage, and he shall strengthen thine heart: wait, I say, on the Lord.

3. 2 इतिहास 32: 1 (सन्हेरीब)-3, 6-8, 18, 20, 21 (से 2nd.)

1     इन बातों और ऐसे प्रबन्ध के बाद अश्शूर का राजा सन्हेरीब ने आकर यहूदा में प्रवेश कर ओर गढ़ वाले नगरों के विरुद्ध डेरे डाल कर उन को अपने लाभ के लिये लेना चाहा।

2     यह देख कर कि सन्हेरीब निकट आया है और यरूशलेम से लड़ने की मनसा करता है,

3     हिजकिय्याह ने अपने हाकिमों और वीरों के साथ यह सम्मति की, कि नगर के बाहर के सोतों को पठवा दें; और उन्होंने उसकी सहायता की।

6     तब उसने प्रजा के ऊपर सेनापति नियुक्त किए और उन को नगर के फाटक के चौक में इकट्ठा किया, और यह कह कर उन को धीरज दिया,

7     कि हियाव बान्धो और दृढ हो तुम न तो अश्शूर के राजा से डरो और न उसके संग की सारी भीड़ से, और न तुम्हारा मन कच्चा हो; क्योंकि जो हमारे साथ है, वह उसके संगियों से बड़ा है।

8     अर्थात उसका सहारा तो मनुष्य ही है परन्तु हमारे साथ, हमारी सहायता और हमारी ओर से युद्ध करने को हमारा परमेश्वर यहोवा है। इसलिये प्रजा के लोग यहूदा के राजा हिजकिय्याह की बातों पर भरोसा किए रहे।

18     और उन्होंने ऊंचे शब्द से उन यरूशलेमियों को जो शहरपनाह पर बैठे थे, यहूदी बोली में पुकारा, कि उन को डरा कर घबराहट में डाल दें जिस से नगर को ले लें।

20     तब इन घटनाओं के कारण राजा हिजकिय्याह और आमोस के पुत्र यशायाह नबी दोनों ने प्रार्थना की और स्वर्ग की ओर दोहाई दी।

21     तब यहोवा ने एक दूत भेज दिया, जिसने अश्शूर के राजा की छावनी में सब शूरवीरों, प्रधानों और सेनापतियों को नाश किया। और वह लज्जित हो कर, अपने देश को लौट गया।

3. II Chronicles 32 : 1 (Sennacherib)-3, 6-8, 18, 20, 21 (to 2nd .)

1     Sennacherib king of Assyria came, and entered into Judah, and encamped against the fenced cities, and thought to win them for himself.

2     And when Hezekiah saw that Sennacherib was come, and that he was purposed to fight against Jerusalem,

3     He took counsel with his princes and his mighty men to stop the waters of the fountains which were without the city: and they did help him.

6     And he set captains of war over the people, and gathered them together to him in the street of the gate of the city, and spake comfortably to them, saying,

7     Be strong and courageous, be not afraid nor dismayed for the king of Assyria, nor for all the multitude that is with him: for there be more with us than with him:

8     With him is an arm of flesh; but with us is the Lord our God to help us, and to fight our battles. And the people rested themselves upon the words of Hezekiah king of Judah.

18     Then they cried with a loud voice in the Jews’ speech unto the people of Jerusalem that were on the wall, to affright them, and to trouble them; that they might take the city.

20     And for this cause Hezekiah the king, and the prophet Isaiah the son of Amoz, prayed and cried to heaven.

21     And the Lord sent an angel, which cut off all the mighty men of valour, and the leaders and captains in the camp of the king of Assyria. So he returned with shame of face to his own land.

4. भजन संहिता 56: 1 (से :), 3, 4

1     हेपरमेश्वर, मुझ पर अनुग्रह कर।

3     जिस समय मुझे डर लगेगा, मैं तुझ पर भरोसा रखूंगा।

4     परमेश्वर की सहायता से मैं उसके वचन की प्रशंसा करूंगा, परमेश्वर पर मैं ने भरोसा रखा है, मैं नहीं डरूंगा। कोई प्राणी मेरा क्या कर सकता है?

4. Psalm 56 : 1 (to :), 3, 4

1     Be merciful unto me, O God:

3     What time I am afraid, I will trust in thee.

4     In God I will praise his word, in God I have put my trust; I will not fear what flesh can do unto me.

5. मरकुस 1: 1, 9, 35, 40-42

1     परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह के सुसमाचार का आरम्भ।

9     उन दिनों में यीशु ने गलील के नासरत से आकर, यरदन में यूहन्ना से बपतिस्मा लिया।

35     और भोर को दिन निकलने से बहुत पहिले, वह उठकर निकला, और एक जंगली स्थान में गया और वहां प्रार्थना करने लगा।

40     और एक कोढ़ी ने उसके पास आकर, उस से बिनती की, और उसके साम्हने घुटने टेककर, उस से कहा; यदि तू चाहे तो मुझे शुद्ध कर सकता है।

41     उस ने उस पर तरस खाकर हाथ बढ़ाया, और उसे छूकर कहा; मैं चाहता हूं तू शुद्ध हो जा।

42     और तुरन्त उसका को ढ़ जाता रहा, और वह शुद्ध हो गया।

5. Mark 1 : 1, 9, 35, 40-42

1     The beginning of the gospel of Jesus Christ, the Son of God;

9     And it came to pass in those days, that Jesus came from Nazareth of Galilee, and was baptized of John in Jordan.

35     And in the morning, rising up a great while before day, he went out, and departed into a solitary place, and there prayed.

40     And there came a leper to him, beseeching him, and kneeling down to him, and saying unto him, If thou wilt, thou canst make me clean.

41     And Jesus, moved with compassion, put forth his hand, and touched him, and saith unto him, I will; be thou clean.

42     And as soon as he had spoken, immediately the leprosy departed from him, and he was cleansed.

6. मरकुस 5: 25-34

25     और एक स्त्री, जिस को बारह वर्ष से लोहू बहने का रोग था।

26     और जिस ने बहुत वैद्यों से बड़ा दुख उठाया और अपना सब माल व्यय करने पर भी कुछ लाभ न उठाया था, परन्तु और भी रोगी हो गई थी।

27     यीशु की चर्चा सुनकर, भीड़ में उसके पीछे से आई, और उसके वस्त्र को छू लिया।

28     क्योंकि वह कहती थी, यदि मैं उसके वस्त्र ही को छू लूंगी, तो चंगी हो जाऊंगी।

29     और तुरन्त उसका लोहू बहना बन्द हो गया; और उस ने अपनी देह में जान लिया, कि मैं उस बीमारी से अच्छी हो गई।

30     यीशु ने तुरन्त अपने में जान लिया, कि मुझ में से सामर्थ निकली है, और भीड़ में पीछे फिरकर पूछा; मेरा वस्त्र किस ने छूआ?

31     उसके चेलों ने उस से कहा; तू देखता है, कि भीड़ तुझ पर गिरी पड़ती है, और तू कहता है; कि किस ने मुझे छुआ?

32     तब उस ने उसे देखने के लिये जिस ने यह काम किया था, चारों ओर दृष्टि की।

33     तब वह स्त्री यह जानकर, कि मेरी कैसी भलाई हुई है, डरती और कांपती हुई आई, और उसके पांवों पर गिरकर, उस से सब हाल सच सच कह दिया।

34     उस ने उस से कहा; पुत्री तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है: कुशल से जा, और अपनी इस बीमारी से बची रह॥

6. Mark 5 : 25-34

25     And a certain woman, which had an issue of blood twelve years,

26     And had suffered many things of many physicians, and had spent all that she had, and was nothing bettered, but rather grew worse,

27     When she had heard of Jesus, came in the press behind, and touched his garment.

28     For she said, If I may touch but his clothes, I shall be whole.

29     And straightway the fountain of her blood was dried up; and she felt in her body that she was healed of that plague.

30     And Jesus, immediately knowing in himself that virtue had gone out of him, turned him about in the press, and said, Who touched my clothes?

31     And his disciples said unto him, Thou seest the multitude thronging thee, and sayest thou, Who touched me?

32     And he looked round about to see her that had done this thing.

33     But the woman fearing and trembling, knowing what was done in her, came and fell down before him, and told him all the truth.

34     And he said unto her, Daughter, thy faith hath made thee whole; go in peace, and be whole of thy plague.

7. लूका 12: 32

32     हे छोटे झुण्ड, मत डर; क्योंकि तुम्हारे पिता को यह भाया है, कि तुम्हें राज्य दे।

7. Luke 12 : 32

32     Fear not, little flock; for it is your Father’s good pleasure to give you the kingdom.

8. फिलिप्पियों 4: 1, 4, 6-9

1     इसलिये हे मेरे प्रिय भाइयों, जिन में मेरा जी लगा रहता है जो मेरे आनन्द और मुकुट हो, हे प्रिय भाइयो, प्रभु में इसी प्रकार स्थिर रहो॥

4     प्रभु में सदा आनन्दित रहो; मैं फिर कहता हूं, आनन्दित रहो।

6     किसी भी बात की चिन्ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख अपस्थित किए जाएं।

7     तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरिक्षत रखेगी॥

8     निदान, हे भाइयों, जो जो बातें सत्य हैं, और जो जो बातें आदरणीय हैं, और जो जो बातें उचित हैं, और जो जो बातें पवित्र हैं, और जो जो बातें सुहावनी हैं, और जो जो बातें मनभावनी हैं, निदान, जो जो सदगुण और प्रशंसा की बातें हैं, उन्हीं पर ध्यान लगाया करो।

9     जो बातें तुम ने मुझ से सीखीं, और ग्रहण की, और सुनी, और मुझ में देखीं, उन्हीं का पालन किया करो, तब परमेश्वर जो शान्ति का सोता है तुम्हारे साथ रहेगा॥

8. Philippians 4 : 1, 4, 6-9

1     Therefore, my brethren dearly beloved and longed for, my joy and crown, so stand fast in the Lord, my dearly beloved.

4     Rejoice in the Lord alway: and again I say, Rejoice.

6     Be careful for nothing; but in every thing by prayer and supplication with thanksgiving let your requests be made known unto God.

7     And the peace of God, which passeth all understanding, shall keep your hearts and minds through Christ Jesus.

8     Finally, brethren, whatsoever things are true, whatsoever things are honest, whatsoever things are just, whatsoever things are pure, whatsoever things are lovely, whatsoever things are of good report; if there be any virtue, and if there be any praise, think on these things.

9     Those things, which ye have both learned, and received, and heard, and seen in me, do: and the God of peace shall be with you.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 410 : 29-30

ईसाई वैज्ञानिक अभ्यास की शुरुआत ईसा मसीह के सद्भाव के इस मुख्य स्वर से होती है कि, "डरो मत!"

1. 410 : 29-30

Christian scientific practice begins with Christ's keynote of harmony, "Be not afraid!"

2. 589 : 8-11

जफेट (नूह का पुत्र)। एक प्रकार की आध्यात्मिक शांति, यह इस समझ से बह रही है कि ईश्वर सभी अस्तित्व का दिव्य सिद्धांत है, और वह मनुष्य उसका विचार है, उसकी सुरक्षा की संतान है।

2. 589 : 8-11

Japhet (Noah's son). A type of spiritual peace, flowing from the understanding that God is the divine Principle of all existence, and that man is His idea, the child of His care.

3. 516 : 9-13, 19-23, 28 (परमेश्वर)-29

ईश्वर सभी चीजों का, उसकी अपनी समानता पर पक्षपात करता है। जीवन अस्तित्व में परिलक्षित होता है, सत्यता में सत्य, अच्छाई में ईश्वर, जो अपनी शांति और स्थायित्व प्रदान करता है। निःस्वार्थ भाव से प्यार, सुंदरता और रोशनी में नहाया हुआ। ... मनुष्य, उसकी समानता में बना, उसके पास सभी पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रभुत्व को दर्शाता है। भगवान के साथ सहवास और शाश्वत के रूप में आदमी और औरत हमेशा के लिए, अनंत पिता-माता भगवान की महिमा में परिलक्षित होते हैं।

ईश्वर ने मनुष्य को अपनी छवि में बनाया, दिव्य आत्मा को प्रतिबिंबित करने के लिए।

3. 516 : 9-13, 19-23, 28 (God)-29

God fashions all things, after His own likeness. Life is reflected in existence, Truth in truthfulness, God in goodness, which impart their own peace and permanence. Love, redolent with unselfishness, bathes all in beauty and light. … Man, made in His likeness, possesses and reflects God's dominion over all the earth. Man and woman as coexistent and eternal with God forever reflect, in glorified quality, the infinite Father-Mother God.

God made man in His own image, to reflect the divine Spirit.

4. 302 : 14-19

मनुष्य की हमारी परिभाषा को जारी रखते हुए, हमें याद रखना चाहिए कि सामंजस्यपूर्ण और अमर आदमी हमेशा के लिए अस्तित्व में है, और किसी भी जीवन, पदार्थ और बुद्धि के नश्वर भ्रम से परे और हमेशा मौजूद है। यह कथन तथ्य पर आधारित है, काल्पनिक नहीं।

4. 302 : 14-19

Continuing our definition of man, let us remember that harmonious and immortal man has existed forever, and is always beyond and above the mortal illusion of any life, substance, and intelligence as existent in matter. This statement is based on fact, not fable.

5. 475 : 28-31

मनुष्य पाप, बीमारी और मृत्यु के लिए अक्षम है। वास्तविक मनुष्य पवित्रता से विदा नहीं कर सकता, न ही परमेश्वर, जिसके द्वारा मनुष्य का विकास किया गया है, पाप करने की क्षमता या स्वतंत्रता प्रदान करता है।

5. 475 : 28-31

Man is incapable of sin, sickness, and death. The real man cannot depart from holiness, nor can God, by whom man is evolved, engender the capacity or freedom to sin.

6. 243 : 30-6

बीमारी, पाप और मृत्यु जीवन का फल नहीं हैं। वे ऐसे लोग हैं जो सत्य को नष्ट कर देते हैं। पूर्णता अपूर्णता को चेतन नहीं करती है। भगवान जितना अच्छा है और सभी का स्रोत है, वह नैतिक या शारीरिक विकृति उत्पन्न नहीं करता है, लेकिन इस तरह की विकृति वास्तविक नहीं है, लेकिन भ्रम है, त्रुटि का मतिभ्रम। दिव्य विज्ञान इन भव्य तथ्यों का खुलासा करता है। किसी भी रूप में कभी भी डरने या न मानने की गलती से, उनके आधार पर यीशु ने जीवन का प्रदर्शन किया।

6. 243 : 30-6

Sickness, sin, and death are not the fruits of Life. They are inharmonies which Truth destroys. Perfection does not animate imperfection. Inasmuch as God is good and the fount of all being, He does not produce moral or physical deformity; therefore such deformity is not real, but is illusion, the mirage of error. Divine Science reveals these grand facts. On their basis Jesus demonstrated Life, never fearing nor obeying error in any form.

7. 151 : 18 (डर)-5

भय और उसके कार्यों को कभी रोका नहीं जा सकता। रक्त, हृदय, फेफड़े, मस्तिष्क का जीवन, ईश्वर से कोई लेना-देना नहीं है। वास्तविक मनुष्य का प्रत्येक कार्य ईश्वरीय मन द्वारा संचालित होता है। मानव मन को मारने या ठीक करने की शक्ति नहीं है, और इसका परमेश्वर के मनुष्य पर कोई नियंत्रण नहीं है। जिस दिव्य मन ने मनुष्य को बनाया वह उसकी अपनी छवि और समानता को बनाए रखता है। मानव मन ईश्वर का विरोध करता है और इसे दूर किया जाना चाहिए, जैसा कि सेंट पॉल घोषित करते हैं। वह सब जो वास्तव में मौजूद है, वह है दिव्य मन और उसका विचार, और इस मन में संपूर्ण प्राणी सामंजस्यपूर्ण और शाश्वत पाया जाता है। सीधे और संकीर्ण तरीके से इस तथ्य को देखना और स्वीकार करना है, इस शक्ति से उपजें, और सच्चाई की अग्रणी का पालन करें।

वह नश्वर मन नश्वर शरीर के हर अंग को नियंत्रित करने का दावा करता है, हमारे पास इसके लिए जबरदस्त सबूत हैं। लेकिन यह तथाकथित मन एक मिथक है, और इसे अपनी सहमति से सत्य की ओर झुकना चाहिए। यह एक सम्राट के राजदंड का संचालन करेगा, लेकिन यह शक्तिहीन है। अमर दिव्य मन अपनी सारी कथित संप्रभुता को छीन लेता है और नश्वर मन को स्वयं से बचाता है।

7. 151 : 18 (Fear)-5

Fear never stopped being and its action. The blood, heart, lungs, brain, etc., have nothing to do with Life, God. Every function of the real man is governed by the divine Mind. The human mind has no power to kill or to cure, and it has no control over God's man. The divine Mind that made man maintains His own image and likeness. The human mind is opposed to God and must be put off, as St. Paul declares. All that really exists is the divine Mind and its idea, and in this Mind the entire being is found harmonious and eternal. The straight and narrow way is to see and acknowledge this fact, yield to this power, and follow the leadings of truth.

That mortal mind claims to govern every organ of the mortal body, we have overwhelming proof. But this so-called mind is a myth, and must by its own consent yield to Truth. It would wield the sceptre of a monarch, but it is powerless. The immortal divine Mind takes away all its supposed sovereignty, and saves mortal mind from itself.

8. 380 : 15-21, 28-19

भय के शारीरिक प्रभाव से उसके भ्रम का वर्णन होता है। एक शेर को देखते हुए जो जंजीरों में जकड़ा हुआ है और जो नीचे सिर रखकर सो रहा है, आदमी को इससे डरना चाहिए। सत्य से अनभिज्ञ तथाकथित मन से उत्पन्न रोग के विश्वास से शरीर प्रभावित होता है जो रोग को जकड़ लेता है। सत्य की ताकत के अलावा कुछ भी नहीं, त्रुटि के डर को रोक सकता है, और त्रुटि पर मनुष्य के प्रभुत्व को साबित कर सकता है।

यह मानने से अधिक निराशाजनक कुछ भी नहीं है कि ईश्वर के विपरीत एक शक्ति है, या अच्छा है, और यह कि ईश्वर इस विरोध शक्ति का उपयोग स्वयं के खिलाफ, जीवन, स्वास्थ्य, सद्भाव के खिलाफ करने की शक्ति के साथ करता है।

मनुष्य को शासित करने वाला पदार्थ या शरीर का प्रत्येक नियम, जीवन, ईश्वर के नियम से खाली और शून्य प्रदान किया जाता है। हमारे ईश्वर प्रदत्त अधिकारों से अनभिज्ञ, हम अन्याय को कम करने के लिए प्रस्तुत हैं, और शिक्षा का पक्षपात इस गुलामी को लागू करता है। इस भ्रम को भुगतने के लिए और अधिक तैयार न हों कि आप बीमार हैं या सिस्टम में कोई बीमारी विकसित हो रही है, क्योंकि आप इस आधार पर एक पापी प्रलोभन के आगे झुकना चाहते हैं कि पाप की आवश्यकताएं हैं।

कुछ कथित कानून का उल्लंघन करते समय, आप कहते हैं कि खतरा है। यह डर खतरा है और शारीरिक प्रभावों को प्रेरित करता है। हम वास्तव में एक नैतिक या आध्यात्मिक कानून को छोड़कर कुछ भी तोड़ने से पीड़ित नहीं हो सकते। नश्वर विश्वास के तथाकथित नियम आत्मा को अमर होने की समझ से नष्ट हो जाते हैं, और वह नश्वर मन समय, काल, और प्रकार के रोग का विधान नहीं कर सकता, जिसके साथ नश्वर मर जाते हैं। परमेश्वर कानूनविद् है, लेकिन वह भयंकर संहिताओं का लेखक नहीं है। अनंत जीवन और प्रेम में कोई बीमारी, पाप, मृत्यु नहीं है, और शास्त्र घोषणा करते हैं कि हम अनंत भगवान में रहते हैं, चलते हैं, और हमारे पास हैं।

8. 380 : 15-21, 28-19

The physical effects of fear illustrate its illusion. Gazing at a chained lion, crouched for a spring, should not terrify a man. The body is affected only with the belief of disease produced by a so-called mind ignorant of the truth which chains disease. Nothing but the power of Truth can prevent the fear of error, and prove man's dominion over error.

Nothing is more disheartening than to believe that there is a power opposite to God, or good, and that God endows this opposing power with strength to be used against Himself, against Life, health, harmony.

Every law of matter or the body, supposed to govern man, is rendered null and void by the law of Life, God. Ignorant of our God-given rights, we submit to unjust decrees, and the bias of education enforces this slavery. Be no more willing to suffer the illusion that you are sick or that some disease is developing in the system, than you are to yield to a sinful temptation on the ground that sin has its necessities.

When infringing some supposed law, you say that there is danger. This fear is the danger and induces the physical effects. We cannot in reality suffer from breaking anything except a moral or spiritual law. The so-called laws of mortal belief are destroyed by the understanding that Soul is immortal, and that mortal mind cannot legislate the times, periods, and types of disease, with which mortals die. God is the lawmaker, but He is not the author of barbarous codes. In infinite Life and Love there is no sickness, sin, nor death, and the Scriptures declare that we live, move, and have our being in the infinite God.

9. 425 : 23-28

चेतना एक बेहतर शरीर का निर्माण करती है जब सामग्री में विश्वास की जीत हुई है। आध्यात्मिक समझ से भौतिक विश्वास को ठीक करें, और आत्मा आपको नए सिरे से बनाएगी। आप फिर से ईश्वर को नाराज करने के अलावा कभी नहीं डरेंगे, और आप कभी भी यह विश्वास नहीं करेंगे कि हृदय या शरीर का कोई भी हिस्सा आपको नष्ट कर सकता है।

9. 425 : 23-28

Consciousness constructs a better body when faith in matter has been conquered. Correct material belief by spiritual understanding, and Spirit will form you anew. You will never fear again except to offend God, and you will never believe that heart or any portion of the body can destroy you.

10. 390 : 12-21, 29-4

जब रोग के पहले लक्षण दिखाई देते हैं, तो दिव्य विज्ञान के साथ सामग्री इंद्रियों की गवाही का विवाद करें। न्याय की अपनी उच्च भावना को नश्वर राय की झूठी प्रक्रिया को नष्ट करने दें, जिसे आप कानून का नाम देते हैं, और फिर आप एक बीमारी तक ही सीमित नहीं होंगे और न ही अंतिम भुगतान के भुगतान में पीड़ित होने की स्थिति में, जो कि अंतिम दंड है, जो त्रुटि की मांग करता है। "जब तक तू अपने मुद्दई के साथ मार्ग ही में हैं, उस से झटपट मेल मिलाप कर।" विचार पर बढ़ने के लिए पाप या बीमारी का कोई दावा नहीं है।

शक्तिशाली मानसिक विरोध के साथ रोग के प्रारंभिक चरणों का सामना करें, जैसे एक विधायक एक अमानवीय कानून के पारित होने को हराने के लिए उपयोग करेगा। नश्वर मन, राजकोषीय सामग्री और आत्मा के वर्चस्व के खिलाफ उकसाने की दलीलों को उखाड़ फेंकने के लिए, आप सत्य की आत्मा की चेतना में उठते हैं। बीमारी और पाप में नश्वर विचार और उसके विश्वासों की छवियों को मिटा दें।

10. 390 : 12-21, 29-4

When the first symptoms of disease appear, dispute the testimony of the material senses with divine Science. Let your higher sense of justice destroy the false process of mortal opinions which you name law, and then you will not be confined to a sick-room nor laid upon a bed of suffering in payment of the last farthing, the last penalty demanded by error. "Agree with thine adversary quickly, whiles thou art in the way with him." Suffer no claim of sin or of sickness to grow upon the thought.

Meet the incipient stages of disease with as powerful mental opposition as a legislator would employ to defeat the passage of an inhuman law. Rise in the conscious strength of the spirit of Truth to overthrow the plea of mortal mind, alias matter, arrayed against the supremacy of Spirit. Blot out the images of mortal thought and its beliefs in sickness and sin.

11. 495 : 16-24

न तो डर और न ही संदेह को अपनी स्पष्ट भावना और शांत विश्वास का पालन करें, कि जीवन के सामंजस्यपूर्ण जीवन की मान्यता - जैसा कि जीवन है - किसी भी दर्दनाक भावना, या विश्वास को नष्ट कर सकता है, जो जीवन नहीं है। क्रिश्चियन साइंस, कॉरपोरल सेंस के बजाय अपनी होने की समझ का समर्थन करें, और यह समझ सच्चाई के साथ त्रुटि को दबा देगी, मृत्यु दर को अमरता से बदल देगी, और सद्भाव के साथ चुप्पी को दूर करेगी।

11. 495 : 16-24

Let neither fear nor doubt overshadow your clear sense and calm trust, that the recognition of life harmonious — as Life eternally is — can destroy any painful sense of, or belief in, that which Life is not. Let Christian Science, instead of corporeal sense, support your understanding of being, and this understanding will supplant error with Truth, replace mortality with immortality, and silence discord with harmony.

12. 442 : 27 ("डर)-29

"हे छोटे झुण्ड, मत डर; क्योंकि तुम्हारे पिता को यह भाया है, कि तुम्हें राज्य दे।" यह सत्य है क्रिश्चियन साइंस।

12. 442 : 27 (“Fear)-29

"Fear not, little flock; for it is your Father's good pleasure to give you the kingdom." This truth is Christian Science.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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