रविवार 5 मई, 2024



विषयहमेशा की सजा

SubjectEverlasting Punishment

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: यशायाह 55: 6

"जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो, जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो।"



Golden Text: Isaiah 55 : 6

Seek ye the Lord while he may be found, call ye upon him while he is near.




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उत्तरदायी अध्ययन: यशायाह 55: 7 • भजन संहिता 103: 8-13


7     दुष्ट अपनी चालचलन और अनर्थकारी अपने सोच विचार छोड़कर यहोवा ही की ओर फिरे, वह उस पर दया करेगा, वह हमारे परमेश्वर की ओर फिरे और वह पूरी रीति से उसको क्षमा करेगा।

8     यहोवा दयालु और अनुग्रहकरी, विलम्ब से कोप करने वाला और अति करूणामय है।

9     वह सर्वदा वादविवाद करता न रहेगा, न उसका क्रोध सदा के लिये भड़का रहेगा।

10     उसने हमारे पापों के अनुसार हम से व्यवहार नहीं किया, और न हमारे अधर्म के कामों के अनुसार हम को बदला दिया है।

11     जैसे आकाश पृथ्वी के ऊपर ऊंचा है, वैसे ही उसकी करूणा उसके डरवैयों के ऊपर प्रबल है।

12     उदयाचल अस्ताचल से जितनी दूर है, उसने हमारे अपराधों को हम से उतनी ही दूर कर दिया है।

13     जैसे पिता अपने बालकों पर दया करता है, वैसे ही यहोवा अपने डरवैयों पर दया करता है।

Responsive Reading: Isaiah 55 : 7  •  Psalm 103 : 8-13

7.     Let the wicked forsake his way, and the unrighteous man his thoughts: and let him return unto the Lord, and he will have mercy upon him; and to our God, for he will abundantly pardon.

8.     The Lord is merciful and gracious, slow to anger, and plenteous in mercy.

9.     He will not always chide: neither will he keep his anger for ever.

10.     He hath not dealt with us after our sins; nor rewarded us according to our iniquities.

11.     For as the heaven is high above the earth, so great is his mercy toward them that fear him.

12.     As far as the east is from the west, so far hath he removed our transgressions from us.

13.     Like as a father pitieth his children, so the Lord pitieth them that fear him.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यशायाह 49: 8, 9, 11, 13

8     यहोवा यों कहता है, अपनी प्रसन्नता के समय मैं ने तेरी सुन ली, उद्धार करने के दिन मैं ने तेरी सहायता की है; मैं तेरी रक्षा कर के तुझे लोगों के लिये एक वाचा ठहराऊंगा, ताकि देश को स्थिर करे और उजड़े हुए स्थानों को उनके अधिकारियों के हाथ में दे दे; और बंधुओं से कहे, बन्दीगृह से निकल आओ.

9     और जो अन्धियारे में हैं उन से कहे, अपने आप को दिखलाओ! वे मार्गों के किनारे किनारे पेट भरने पाएंगे, सब मुण्डे टीलों पर भी उन को चराई मिलेगी।

11     और, मैं अपने सब पहाड़ों को मार्ग बना दूंगा, और मेरे राजमार्ग ऊंचे किए जाएंगे।

13     हे आकाश, जयजयकार कर, हे पृथ्वी, मगन हो; हे पहाड़ों, गला खोल कर जयजयकार करो! क्योंकि यहोवा ने अपनी प्रजा को शान्ति दी है और अपने दीन लोगों पर दया की है॥

1. Isaiah 49 : 8, 9, 11, 13

8     Thus saith the Lord, In an acceptable time have I heard thee, and in a day of salvation have I helped thee: and I will preserve thee, and give thee for a covenant of the people, to establish the earth, to cause to inherit the desolate heritages;

9     That thou mayest say to the prisoners, Go forth; to them that are in darkness, Shew yourselves. They shall feed in the ways, and their pastures shall be in all high places.

11     And I will make all my mountains a way, and my highways shall be exalted.

13     Sing, O heavens; and be joyful, O earth; and break forth into singing, O mountains: for the Lord hath comforted his people, and will have mercy upon his afflicted.

2. उत्पत्ति 50: 14-21

14     अपने पिता को मिट्टी देकर यूसुफ अपने भाइयोंऔर उन सब समेत, जो उसके पिता को मिट्टी देने के लिये उसके संग गए थे, मिस्र में लौट आया।

15     जब यूसुफ के भाइयों ने देखा कि हमारा पिता मर गया है, तब कहने लगे, कदाचित यूसुफ अब हमारे पीछे पड़े, और जितनी बुराई हम ने उससे की थी सब का पूरा पलटा हम से ले।

16     इसलिये उन्होंने यूसुफ के पास यह कहला भेजा, कि तेरे पिता ने मरने से पहिले हमें यह आज्ञा दी थी,

17     कि तुम लोग यूसुफ से इस प्रकार कहना, कि हम बिनती करते हैं, कि तू अपने भाइयों के अपराध और पाप को क्षमा कर; हम ने तुझ से बुराई तो की थी, पर अब अपने पिता के परमेश्वर के दासों का अपराध क्षमा कर। उनकी ये बातें सुनकर यूसुफ रो पड़ा।

18     और उसके भाई आप भी जाकर उसके साम्हने गिर पड़े, और कहा, देख, हम तेरे दास हैं।

19     यूसुफ ने उन से कहा, मत डरो, क्या मैं परमेश्वर की जगह पर हूं?

20     यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिये बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, जिस से वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है, कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं।

21     सो अब मत डरो: मैं तुम्हारा और तुम्हारे बाल-बच्चों का पालन पोषण करता रहूंगा; इस प्रकार उसने उन को समझा बुझाकर शान्ति दी॥

2. Genesis 50 : 14-21

14     And Joseph returned into Egypt, he, and his brethren, and all that went up with him to bury his father, after he had buried his father.

15     And when Joseph’s brethren saw that their father was dead, they said, Joseph will peradventure hate us, and will certainly requite us all the evil which we did unto him.

16     And they sent a messenger unto Joseph, saying, Thy father did command before he died, saying,

17     So shall ye say unto Joseph, Forgive, I pray thee now, the trespass of thy brethren, and their sin; for they did unto thee evil: and now, we pray thee, forgive the trespass of the servants of the God of thy father. And Joseph wept when they spake unto him.

18     And his brethren also went and fell down before his face; and they said, Behold, we be thy servants.

19     And Joseph said unto them, Fear not: for am I in the place of God?

20     But as for you, ye thought evil against me; but God meant it unto good, to bring to pass, as it is this day, to save much people alive.

21     Now therefore fear ye not: I will nourish you, and your little ones. And he comforted them, and spake kindly unto them.

3. यूहन्ना 8: 1-11

1     परन्तु यीशु जैतून के पहाड़ पर गया।

2     और भोर को फिर मन्दिर में आया, और सब लोग उसके पास आए; और वह बैठकर उन्हें उपदेश देने लगा।

3     तब शास्त्री और फरीसी एक स्त्री को लाए, जो व्यभिचार में पकड़ी गई थी, और उस को बीच में खड़ी करके यीशु से कहा।

4     हे गुरू, यह स्त्री व्यभिचार करते ही पकड़ी गई है।

5     व्यवस्था में मूसा ने हमें आज्ञा दी है कि ऐसी स्त्रियों को पत्थरवाह करें: सो तू इस स्त्री के विषय में क्या कहता है?

6     उन्होंने उस को परखने के लिये यह बात कही ताकि उस पर दोष लगाने के लिये कोई बात पाएं, परन्तु यीशु झुककर उंगली से भूमि पर लिखने लगा।

7     जब वे उस से पूछते रहे, तो उस ने सीधे होकर उन से कहा, कि तुम में जो निष्पाप हो, वही पहिले उस को पत्थर मारे।

8     और फिर झुककर भूमि पर उंगली से लिखने लगा।

9     परन्तु वे यह सुनकर बड़ों से लेकर छोटों तक एक एक करके निकल गए, और यीशु अकेला रह गया, और स्त्री वहीं बीच में खड़ी रह गई।

10     यीशु ने सीधे होकर उस से कहा, हे नारी, वे कहां गए? क्या किसी ने तुझ पर दंड की आज्ञा न दी।

11     उस ने कहा, हे प्रभु, किसी ने नहीं: यीशु ने कहा, मैं भी तुझ पर दंड की आज्ञा नहीं देता; जा, और फिर पाप न करना॥

3. John 8 : 1-11

1     Jesus went unto the mount of Olives.

2     And early in the morning he came again into the temple, and all the people came unto him; and he sat down, and taught them.

3     And the scribes and Pharisees brought unto him a woman taken in adultery; and when they had set her in the midst,

4     They say unto him, Master, this woman was taken in adultery, in the very act.

5     Now Moses in the law commanded us, that such should be stoned: but what sayest thou?

6     This they said, tempting him, that they might have to accuse him. But Jesus stooped down, and with his finger wrote on the ground, as though he heard them not.

7     So when they continued asking him, he lifted up himself, and said unto them, He that is without sin among you, let him first cast a stone at her.

8     And again he stooped down, and wrote on the ground.

9     And they which heard it, being convicted by their own conscience, went out one by one, beginning at the eldest, even unto the last: and Jesus was left alone, and the woman standing in the midst.

10     When Jesus had lifted up himself, and saw none but the woman, he said unto her, Woman, where are those thine accusers? hath no man condemned thee?

11     She said, No man, Lord. And Jesus said unto her, Neither do I condemn thee: go, and sin no more.

4. मत्ती 18: 21-27

21     तब पतरस ने पास आकर, उस से कहा, हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूं, क्या सात बार तक?

22     यीशु ने उस से कहा, मैं तुझ से यह नहीं कहता, कि सात बार, वरन सात बार के सत्तर गुने तक।

23     इसलिये स्वर्ग का राज्य उस राजा के समान है, जिस ने अपने दासों से लेखा लेना चाहा।

24     जब वह लेखा लेने लगा, तो एक जन उसके साम्हने लाया गया जो दस हजार तोड़े धारता था।

25     जब कि चुकाने को उसके पास कुछ न था, तो उसके स्वामी ने कहा, कि यह और इस की पत्नी और लड़के बाले और जो कुछ इस का है सब बेचा जाए, और वह कर्ज चुका दिया जाए।

26     इस पर उस दास ने गिरकर उसे प्रणाम किया, और कहा; हे स्वामी, धीरज धर, मैं सब कुछ भर दूंगा।

27     तब उस दास के स्वामी ने तरस खाकर उसे छोड़ दिया, और उसका धार क्षमा किया।

4. Matthew 18 : 21-27

21     Then came Peter to him, and said, Lord, how oft shall my brother sin against me, and I forgive him? till seven times?

22     Jesus saith unto him, I say not unto thee, Until seven times: but, Until seventy times seven.

23     Therefore is the kingdom of heaven likened unto a certain king, which would take account of his servants.

24     And when he had begun to reckon, one was brought unto him, which owed him ten thousand talents.

25     But forasmuch as he had not to pay, his lord commanded him to be sold, and his wife, and children, and all that he had, and payment to be made.

26     The servant therefore fell down, and worshipped him, saying, Lord, have patience with me, and I will pay thee all.

27     Then the lord of that servant was moved with compassion, and loosed him, and forgave him the debt.

5. 2 इतिहास 30: 9 (क्योंकि)

9     ... क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर यहोवा अनुग्रहकारी और दयालु है, और यदि तुम उसकी ओर फिरोगे तो वह अपना मुंह तुम से न मोड़ेगा।

5. II Chronicles 30 : 9 (for the)

9     …for the Lord your God is gracious and merciful, and will not turn away his face from you, if ye return unto him.

6. भजन संहिता 86: 1-8

1     हेयहोवा कान लगा कर मेरी सुन ले, क्योंकि मैं दीन और दरिद्र हूं।

2     मेरे प्राण की रक्षा कर, क्योंकि मैं भक्त हूं; तू मेरा परमेश्वर है, इसलिये अपने दास का, जिसका भरोसा तुझ पर है, उद्धार कर।

3     हे प्रभु मुझ पर अनुग्रह कर, क्योंकि मैं तुझी को लगातार पुकारता रहता हूं।

4     अपने दास के मन को आनन्दित कर, क्योंकि हे प्रभु, मैं अपना मन तेरी ही ओर लगाता हूं।

5     क्योंकि हे प्रभु, तू भला और क्षमा करने वाला है, और जितने तुझे पुकारते हैं उन सभों के लिये तू अति करूणामय है।

6     हे यहोवा मेरी प्रार्थना की ओर कान लगा, और मेरे गिड़गिड़ाने को ध्यान से सुन।

7     संकट के दिन मैं तुझ को पुकारूंगा, क्योंकि तू मेरी सुन लेगा॥

8     हे प्रभु देवताओं में से कोई भी तेरे तुल्य नहीं, और ने किसी के काम तेरे कामों के बराबर हैं।

6. Psalm 86 : 1-8

1     Bow down thine ear, O Lord, hear me: for I am poor and needy.

2     Preserve my soul; for I am holy: O thou my God, save thy servant that trusteth in thee.

3     Be merciful unto me, O Lord: for I cry unto thee daily.

4     Rejoice the soul of thy servant: for unto thee, O Lord, do I lift up my soul.

5     For thou, Lord, art good, and ready to forgive; and plenteous in mercy unto all them that call upon thee.

6     Give ear, O Lord, unto my prayer; and attend to the voice of my supplications.

7     In the day of my trouble I will call upon thee: for thou wilt answer me.

8     Among the gods there is none like unto thee, O Lord; neither are there any works like unto thy works.

7. 1 कुरिन्थियों 10: 13

13     हम तो सीमा से बाहर घमण्ड कदापि न करेंगे, परन्तु उसी सीमा तक जो परमेश्वर ने हमारे लिये ठहरा दी है, और उस में तुम भी आ गए हो और उसी के अनुसार घमण्ड भी करेंगे।

7. I Corinthians 10 : 13

13     There hath no temptation taken you but such as is common to man: but God is faithful, who will not suffer you to be tempted above that ye are able; but will with the temptation also make a way to escape, that ye may be able to bear it.

8. मत्ती 25: 34 (आना)

34     हे मेरे पिता के धन्य लोगों, आओ, उस राज्य के अधिकारी हो जाओ, जो जगत के आदि से तुम्हारे लिये तैयार किया हुआ है।

8. Matthew 25 : 34 (Come)

34     Come, ye blessed of my Father, inherit the kingdom prepared for you from the foundation of the world:



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 466: 26-31

क्रिस्चियनिटी का विज्ञान हाथ से पंखे के साथ गेहूं को अलग करने के लिए आता है। विज्ञान ईश्वर को अष्ट घोषित करेगा, और ईसाई धर्म इस घोषणा और उसके ईश्वरीय सिद्धांत को प्रदर्शित करेगा, जिससे मानव जाति शारीरिक, नैतिक और आध्यात्मिक रूप से बेहतर होगी।

1. 466 : 26-31

The Science of Christianity comes with fan in hand to separate the chaff from the wheat. Science will declare God aright, and Christianity will demonstrate this declaration and its divine Principle, making mankind better physically, morally, and spiritually.

2. 239: 14 (“होने देना)-15

"दुष्ट अपनी चालचलन और अनर्थकारी अपने सोच विचार छोड़कर।"

2. 239 : 14 (“Let)-15

"Let the wicked forsake his way, and the unrighteous man his thoughts."

3. 448: 12-19

ईसाई विज्ञान भौतिक इंद्रियों के प्रमाण से ऊपर उठता है; परन्तु यदि आप स्वयं पाप से ऊपर नहीं उठे हैं, तो बुराई या उस भलाई के प्रति अपने अंधेपन के लिए स्वयं को बधाई न दें जिसे आप जानते हैं और नहीं। एक बेईमान स्थिति ईसाई वैज्ञानिकता से बहुत दूर है। "जो अपने अपराध छिपा रखता है, उसका कार्य सुफल नहीं होता, परन्तु जो उन को मान लेता और छोड़ भी देता है, उस पर दया की जायेगी।"

3. 448 : 12-19

Christian Science rises above the evidence of the corporeal senses; but if you have not risen above sin yourself, do not congratulate yourself upon your blindness to evil or upon the good you know and do not. A dishonest position is far from Christianly scientific. "He that covereth his sins shall not prosper: but whoso confesseth and forsaketh them shall have mercy."

4. 11: 1 (यीशु')-4

यीशु की प्रार्थना, "हमें हमारे पापों को माफ कर दो," क्षमा की शर्तों को भी निर्दिष्ट किया। व्यभिचारी स्त्री को क्षमा करते हुए उसने कहा, "जाओ, और अब पाप मत करो।"

4. 11 : 1 (Jesus’)-4

Jesus' prayer, "Forgive us our debts," specified also the terms of forgiveness. When forgiving the adulterous woman he said, "Go, and sin no more."

5. 22: 3-10

पाप और क्षमा, स्वार्थ और कामुकता की आशा के बीच एक पेंडुलम की तरह कंपन, निरंतर प्रतिगमन का कारण बनता है, — हमारी नैतिक प्रगति धीमी होगी। मसीह की माँग के प्रति जागते हुए, नश्वर दुख का अनुभव करते हैं। यह उनके कारण होता है, यहां तक कि डूबने वाले पुरुषों के रूप में, खुद को बचाने के लिए जोरदार प्रयास करना; और मसीह के अनमोल प्रेम के माध्यम से इन प्रयासों को सफलता मिली।

5. 22 : 3-10

Vibrating like a pendulum between sin and the hope of forgiveness, — selfishness and sensuality causing constant retrogression, — our moral progress will be slow. Waking to Christ's demand, mortals experience suffering. This causes them, even as drowning men, to make vigorous efforts to save themselves; and through Christ's precious love these efforts are crowned with success.

6. 19: 17-28

यद्यपि पाप और बीमारी पर अपने नियंत्रण का प्रदर्शन, किसी भी तरह से महान शिक्षक ने दूसरों को अपने स्वयं के पवित्रता के अपेक्षित प्रमाण देने से राहत नहीं दी। उन्होंने उनके मार्गदर्शन के लिए काम किया, ताकि वे इस शक्ति का प्रदर्शन कर सकें, जैसा कि उन्होंने किया और इसके दिव्य सिद्धांत को समझा। शिक्षक के प्रति विश्वास और सभी भावनात्मक प्रेम हम उस पर पूरा कर सकते हैं, कभी भी हमें उसका अनुकरण करने वाला नहीं बनाएंगे। हमें इसी तरह से जाना चाहिए और करना चाहिए, अन्यथा हम उन महान आशीषों में सुधार नहीं कर रहे हैं जो हमारे मास्टर ने काम किया था और हमारे लिए सबसे अच्छा था। मसीह की दिव्यता को यीशु की मानवता में प्रकट किया गया था।

6. 19 : 17-28

Every pang of repentance and suffering, every effort for reform, every good thought and deed, will help us to understand Jesus' atonement for sin and aid its efficacy; but if the sinner continues to pray and repent, sin and be sorry, he has little part in the atonement, — in the at-one-ment with God, — for he lacks the practical repentance, which reforms the heart and enables man to do the will of wisdom. Those who cannot demonstrate, at least in part, the divine Principle of the teachings and practice of our Master have no part in God. If living in disobedience to Him, we ought to feel no security, although God is good.

7. 329: 21 (वहाँ)-31

विज्ञान में कोई पाखंड नहीं है। सिद्धांत अनिवार्य है। आप मानवीय इच्छा से इसका मजाक नहीं उड़ा सकते। विज्ञान ईश्वरीय मांग है, मानवीय मांग नहीं। सदा सही होने के कारण इसका दैवी तत्त्व कभी पछताता नहीं, बल्कि त्रुटि को शान्त कर सत्य के दावे को कायम रखता है। ईश्वरीय दया की क्षमा ही त्रुटि का नाश है। यदि लोग अपने वास्तविक आध्यात्मिक स्रोत को सभी आशीषों के रूप में समझते हैं, तो वे आध्यात्मिकता के लिए संघर्ष करेंगे और शांति से रहेंगे; लेकिन नश्वर मन जितनी गहरी त्रुटि में डूबा है, आध्यात्मिकता का विरोध उतना ही तीव्र है, जब तक कि त्रुटि सत्य के सामने नहीं आ जाती।

7. 329 : 21 (There)-31

There is no hypocrisy in Science. Principle is imperative. You cannot mock it by human will. Science is a divine demand, not a human. Always right, its divine Principle never repents, but maintains the claim of Truth by quenching error. The pardon of divine mercy is the destruction of error. If men understood their real spiritual source to be all blessedness, they would struggle for recourse to the spiritual and be at peace; but the deeper the error into which mortal mind is plunged, the more intense the opposition to spirituality, till error yields to Truth.

8. 105: 3-15

अपराध पर लगाम लगाने, हिंसा के कार्यों को रोकने या उन्हें दंडित करने के लिए अदालतें और जूरी नश्वर लोगों का न्याय करती हैं और उन्हें सजा देती हैं। यह कहना कि इन न्यायाधिकरणों का शारीरिक या नश्वर मन पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है, उदाहरण का खंडन करना होगा और यह स्वीकार करना होगा कि मानव कानून की शक्ति पदार्थ तक ही सीमित है, जबकि नश्वर मन, बुराई, जो वास्तविक गैरकानूनी है, न्याय की अवहेलना करता है और है दया करने की अनुशंसा की. क्या मामला अपराध कर सकता है? क्या मामले को सज़ा दी जा सकती है? क्या आप उस मानसिकता को उस निकाय से अलग कर सकते हैं जिस पर न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र है? नश्वर मन, कोई बात नहीं, हर मामले में अपराधी है; और मानव कानून अपराध का सही अनुमान लगाता है, और अदालतें मकसद के अनुसार उचित रूप से सजा सुनाती हैं।

8. 105 : 3-15

Courts and juries judge and sentence mortals in order to restrain crime, to prevent deeds of violence or to punish them. To say that these tribunals have no jurisdiction over the carnal or mortal mind, would be to contradict precedent and to admit that the power of human law is restricted to matter, while mortal mind, evil, which is the real outlaw, defies justice and is recommended to mercy. Can matter commit a crime? Can matter be punished? Can you separate the mentality from the body over which courts hold jurisdiction? Mortal mind, not matter, is the criminal in every case; and human law rightly estimates crime, and courts reasonably pass sentence, according to the motive.

9. 356: 17-29

त्रुटि और सत्य के बीच, मांस और आत्मा के बीच न तो कोई वर्तमान है और न ही शाश्वत सह-साझेदारी है। ईश्वर पाप, बीमारी और मृत्यु पैदा करने में असमर्थ है क्योंकि वह इन त्रुटियों का अनुभव कर रहा है। उसके बाद मनुष्य के लिए यह कैसे संभव है कि वह त्रुटियों की इस त्रय के अधीन हो, - मनुष्य जो दिव्य समानता में बना है?

क्या ईश्वर स्वयं से, आत्मा से भौतिक मनुष्य का निर्माण करता है? क्या बुराई अच्छे से आगे बढ़ती है? क्या ईश्वरीय प्रेम मनुष्य को पाप की ओर प्रवृत्त करके और फिर उसके लिए उसे दंड देकर मानवता के साथ धोखा करता है? क्या कोई इसे आदिम बनाने और फिर उसके व्युत्पन्न को दंडित करने को बुद्धिमानी और अच्छा कहेगा?

9. 356 : 17-29

There is neither a present nor an eternal copartnership between error and Truth, between flesh and Spirit. God is as incapable of producing sin, sickness, and death as He is of experiencing these errors. How then is it possible for Him to create man subject to this triad of errors, — man who is made in the divine likeness?

Does God create a material man out of Himself, Spirit? Does evil proceed from good? Does divine Love commit a fraud on humanity by making man inclined to sin, and then punishing him for it? Would any one call it wise and good to create the primitive, and then punish its derivative?

10. 196: 1-8, 11-19

यदि भौतिकवादी ज्ञान शक्ति है, तो वह बुद्धि नहीं है। यह एक अंधी शक्ति है। मनुष्य ने "कई आविष्कारों की खोज की है", लेकिन उसे अभी तक यह सच नहीं लगा है कि ज्ञान उसे ज्ञान के भयानक प्रभावों से बचा सकता है। अपने शरीर पर नश्वर मन की शक्ति को बहुत कम समझा जाता है।

इस सपने को कायम रखने वाले झूठे सुखों से बेहतर है कि वह दुख जो नश्वर मन को उसके शारीरिक सपने से जगाए। पाप ही मृत्यु लाता है, क्योंकि पाप ही विनाश का एकमात्र तत्व है।

"उससे डरें जो आत्मा और शरीर दोनों को नरक में नष्ट करने में सक्षम हैं," यीशु ने कहा। इस पाठ का सावधानीपूर्वक अध्ययन से पता चलता है कि यहाँ आत्मा शब्द का अर्थ गलत अर्थ या भौतिक चेतना है। यह आदेश रोम के, शैतान का नहीं, ईश्वर का नहीं, बल्कि पाप से सावधान रहने की चेतावनी थी। बीमारी, पाप और मृत्यु जीवन या सत्य के सहवर्ती नहीं हैं। कोई कानून उनका समर्थन नहीं करता। उनकी सत्ता स्थापित करने के लिए ईश्वर के साथ उनका कोई संबंध नहीं है। पाप अपना नरक स्वयं बनाता है, और अच्छाई अपना स्वर्ग स्वयं बनाती है।

10. 196 : 1-8, 11-19

If materialistic knowledge is power, it is not wisdom. It is but a blind force. Man has "sought out many inventions," but he has not yet found it true that knowledge can save him from the dire effects of knowledge. The power of mortal mind over its own body is little understood.

Better the suffering which awakens mortal mind from its fleshly dream, than the false pleasures which tend to perpetuate this dream.

"Fear him which is able to destroy both soul and body in hell," said Jesus. A careful study of this text shows that here the word soul means a false sense or material consciousness. The command was a warning to beware, not of Rome, Satan, nor of God, but of sin. Sickness, sin, and death are not concomitants of Life or Truth. No law supports them. They have no relation to God wherewith to establish their power. Sin makes its own hell, and goodness its own heaven.

11. 339: 1 (विनाश)-6

पाप का नाश ही क्षमा का दिव्य तरीका है। ईश्वरीय जीवन मृत्यु को नष्ट करता है, सत्य त्रुटि को नष्ट करता है, और प्रेम घृणा को नष्ट करता है। नष्ट होने के नाते, पाप को क्षमा का कोई अन्य रूप नहीं चाहिए। क्या ईश्वर की क्षमा, किसी एक पाप को नष्ट करने, भविष्यवाणी करने और सभी पापों के अंतिम विनाश को शामिल नहीं करती है?

11. 339 : 1 (The destruction)-6

The destruction of sin is the divine method of pardon. Divine Life destroys death, Truth destroys error, and Love destroys hate. Being destroyed, sin needs no other form of forgiveness. Does not God's pardon, destroying any one sin, prophesy and involve the final destruction of all sin?

12. 265: 23-5

किसने महसूस किया है कि मानवीय शांति का नुकसान आध्यात्मिकता के लिए मजबूत इच्छाओं को प्राप्त नहीं हुआ है? स्वर्गीय भलाई के बाद की आकांक्षा इससे पहले कि हमें पता चले कि ज्ञान और प्रेम का क्या संबंध है। सांसारिक आशाओं और सुखों का नुकसान कई दिलों के आरोही मार्ग को उज्ज्वल करता है। भावना के दर्द हमें जल्दी से सूचित करते हैं कि भावना के सुख नश्वर हैं और यह आनंद आध्यात्मिक है।

अर्थ की वेदनाएँ नमस्कार हैं, यदि वे झूठे सुखदायक विश्वासों को मिटा देते हैं और भावनाओं को आत्मा से आत्मा तक पहुँचाते हैं, जहाँ ईश्वर की रचनाएँ अच्छी हैं, "हृदय को आनन्दित करता है।" यह विज्ञान की तलवार है, जिसके साथ सत्य त्रुटि को नष्ट करता है, भौतिकता मनुष्य के उच्च व्यक्तित्व और भाग्य को स्थान देती है।

12. 265 : 23-5

Who that has felt the loss of human peace has not gained stronger desires for spiritual joy? The aspiration after heavenly good comes even before we discover what belongs to wisdom and Love. The loss of earthly hopes and pleasures brightens the ascending path of many a heart. The pains of sense quickly inform us that the pleasures of sense are mortal and that joy is spiritual.

The pains of sense are salutary, if they wrench away false pleasurable beliefs and transplant the affections from sense to Soul, where the creations of God are good, "rejoicing the heart." Such is the sword of Science, with which Truth decapitates error, materiality giving place to man's higher individuality and destiny.

13. 402: 8-13

वह समय निकट आता है जब नश्वर मन अपने भौतिक, संरचनात्मक और भौतिक आधार को त्याग देगा, जब विज्ञान में अमर मन और उसके गठन को पकड़ लिया जाएगा, और भौतिक विश्वास आध्यात्मिक तथ्यों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। मनुष्य अविनाशी और शाश्वत है।

13. 402 : 8-13

The time approaches when mortal mind will forsake its corporeal, structural, and material basis, when immortal Mind and its formations will be apprehended in Science, and material beliefs will not interfere with spiritual facts. Man is indestructible and eternal.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6