रविवार 5 मई, 2019 |

रविवार 5 मई, 2019



विषयहमेशा की सजा

SubjectEverlasting Punishment

वर्ण पाठ: दानिय्येल 9: 9

यद्यपि हम अपने परमेश्वर प्रभु से फिर गए, तौभी तू दयासागर और क्षमा की खानि है।



Golden Text: Daniel 9 : 9

To the Lord our God belong mercies and forgivenesses, though we have rebelled against him.




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भजन संहिता 85 : 1-9


1     हे यहोवा, तू अपने देश पर प्रसन्न हुआ, याकूब को बन्धुआई से लौटा ले आया है।

2     तू ने अपनी प्रजा के अधर्म को क्षमा किया है; और उसके सब पापों को ढांप दिया है।

3     तू ने अपने रोष को शान्त किया है; और अपने भड़के हुए कोप को दूर किया है॥

4     हे हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर हम को फेर, और अपना क्रोध हम पर से दूर कर!

5     क्या तू हम पर सदा कोपित रहेगा? क्या तू पीढ़ी से पीढ़ी तक कोप करता रहेगा?

6     क्या तू हम को फिर न जिलाएगा, कि तेरी प्रजा तुझ में आनन्द करे?

7     हे यहोवा अपनी करूणा हमें दिखा, और तू हमारा उद्धार कर॥

8     मैं कान लगाए रहूंगा, कि ईश्वर यहोवा क्या कहता है, वह तो अपनी प्रजा से जो उसके भक्त है, शान्ति की बातें कहेगा; परन्तु वे फिर के मूर्खता न करने लगें।

9     निश्चय उसके डरवैयों के उद्धार का समय निकट है, तब हमारे देश में महिमा का निवास होगा॥

Responsive Reading: Psalm 85 : 1-9

1.     Lord, thou hast been favourable unto thy land: thou hast brought back the captivity of Jacob.

2.     Thou hast forgiven the iniquity of thy people, thou hast covered all their sin.

3.     Thou hast taken away all thy wrath: thou hast turned thyself from the fierceness of thine anger.

4.     Turn us, O God of our salvation, and cause thine anger toward us to cease.

5.     Wilt thou be angry with us for ever? wilt thou draw out thine anger to all generations?

6.     Wilt thou not revive us again: that thy people may rejoice in thee?

7.     Shew us thy mercy, O Lord, and grant us thy salvation.

8.     I will hear what God the Lord will speak: for he will speak peace unto his people, and to his saints: but let them not turn again to folly.

9.     Surely his salvation is nigh them that fear him; that glory may dwell in our land.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 32 : 1, 2, 5 (से 2nd .)

1     क्या ही धन्य है वह जिसका अपराध क्षमा किया गया, और जिसका पाप ढ़ाँपा गया हो।

2     क्या ही धन्य है वह मनुष्य जिसके अधर्म का यहोवा लेखा न ले, और जिसकी आत्मा में कपट न हो॥

5     जब मैं ने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया और अपना अधर्म न छिपाया, और कहा, मैं यहोवा के साम्हने अपने अपराधों को मान लूंगा; तब तू ने मेरे अधर्म और पाप को क्षमा कर दिया॥

1. Psalm 32 : 1, 2, 5 (to 2nd .)

1     Blessed is he whose transgression is forgiven, whose sin is covered.

2     Blessed is the man unto whom the Lord imputeth not iniquity, and in whose spirit there is no guile.

5     I acknowledged my sin unto thee, and mine iniquity have I not hid. I said, I will confess my transgressions unto the Lord; and thou forgavest the iniquity of my sin.

2. यशायाह 33 : 10-16, 22, 24

10     यहोवा कहता है, अब मैं उठूंगा, मैं अपना प्रताप दिखाऊंगा; अब मैं महान ठहरूंगा।

11     तुम में सूखी घास का गर्भ रहेगा, तुम से भूसी उत्पन्न होगी; तुम्हारी सांस आग है जो तुम्हें भस्म करेगी।

12     देश देश के लोग फूंके हुए चूने के सामान हो जाएंगे, और कटे हुए कटीले पेड़ों की नाईं आग में जलाए जाएंगे॥

13     हे दूर दूर के लोगों, सुनो कि मैं ने क्या किया है? और तुम भी जो निकट हो, मेरा पराक्रम जान लो।

14     सिय्योन के पापी थरथरा गए हैं: भक्तिहीनों को कंपकंपी लगी है: हम में से कौन प्रचण्ड आग में रह सकता? हम में से कौन उस आग में बना रह सकता है जो कभी नहीं बुझेगी?

15     जो धर्म से चलता और सीधी बातें बोलता; जो अन्धेर के लाभ से घृणा करता, जो घूस नहीं लेता; जो खून की बात सुनने से कान बन्द करता, और बुराई देखने से आंख मूंद लेता है। वही ऊंचे स्थानों में निवास करेगा।

16     वह चट्टानों के गढ़ों में शरण लिए हुए रहेगा; उसको रोटी मिलेगी और पानी की घटी कभी न होगी॥

22     क्योंकि यहोवा हमारा न्यायी, यहोवा हमारा हाकिम, यहोवा हमारा राजा है; वही हमारा उद्धार करेगा॥

24     कोई निवासी न कहेगा कि मैं रोगी हूं; और जो लाग उस में बसेंगे, उनका अधर्म क्षमा किया जाएगा॥

2. Isaiah 33 : 10-16, 22, 24

10     Now will I rise, saith the Lord; now will I be exalted; now will I lift up myself.

11     Ye shall conceive chaff, ye shall bring forth stubble: your breath, as fire, shall devour you.

12     And the people shall be as the burnings of lime: as thorns cut up shall they be burned in the fire.

13     Hear, ye that are far off, what I have done; and, ye that are near, acknowledge my might.

14     The sinners in Zion are afraid; fearfulness hath surprised the hypocrites. Who among us shall dwell with the devouring fire? who among us shall dwell with everlasting burnings?

15     He that walketh righteously, and speaketh uprightly; he that despiseth the gain of oppressions, that shaketh his hands from holding of bribes, that stoppeth his ears from hearing of blood, and shutteth his eyes from seeing evil;

16     He shall dwell on high: his place of defence shall be the munitions of rocks: bread shall be given him; his waters shall be sure.

22     For the Lord is our judge, the Lord is our lawgiver, the Lord is our king; he will save us.

24     And the inhabitant shall not say, I am sick: the people that dwell therein shall be forgiven their iniquity.

3. लूका 4 : 1 (से 1st ,)

1     फिर यीशु पवित्रआत्मा से भरा हुआ, यरदन से लैटा।

3. Luke 4 : 1 (to 1st,)

1     And Jesus being full of the Holy Ghost returned from Jordan,

4. लूका 15: 1-7, 11-24 (से 1st.)

1     सब चुंगी लेने वाले और पापी उसके पास आया करते थे ताकि उस की सुनें।

2     और फरीसी और शास्त्री कुड़कुड़ा कर कहने लगे, कि यह तो पापियों से मिलता है और उन के साथ खाता भी है॥

3     तब उस ने उन से यह दृष्टान्त कहा।

4     तुम में से कौन है जिस की सौ भेड़ें हों, और उन में से एक खो जाए तो निन्नानवे को जंगल में छोड़कर, उस खोई हुई को जब तक मिल न जाए खोजता न रहे?

5     और जब मिल जाती है, तब वह बड़े आनन्द से उसे कांधे पर उठा लेता है।

6     और घर में आकर मित्रों और पड़ोसियों को इकट्ठे करके कहता है, मेरे साथ आनन्द करो, क्योंकि मेरी खोई हुई भेड़ मिल गई है।

7     मैं तुम से कहता हूं; कि इसी रीति से एक मन फिरानेवाले पापी के विषय में भी स्वर्ग में इतना ही आनन्द होगा, जितना कि निन्नानवे ऐसे धमिर्यों के विषय नहीं होता, जिन्हें मन फिराने की आवश्यकता नहीं॥

11     फिर उस ने कहा, किसी मनुष्य के दो पुत्र थे।

12     उन में से छुटके ने पिता से कहा कि हे पिता संपत्ति में से जो भाग मेरा हो, वह मुझे दे दीजिए। उस ने उन को अपनी संपत्ति बांट दी।

13     और बहुत दिन न बीते थे कि छुटका पुत्र सब कुछ इकट्ठा करके एक दूर देश को चला गया और वहां कुकर्म में अपनी संपत्ति उड़ा दी।

14     जब वह सब कुछ खर्च कर चुका, तो उस देश में बड़ा अकाल पड़ा, और वह कंगाल हो गया।

15     और वह उस देश के निवासियों में से एक के यहां जा पड़ा : उस ने उसे अपने खेतों में सूअर चराने के लिये भेजा।

16     और वह चाहता था, कि उन फलियों से जिन्हें सूअर खाते थे अपना पेट भरे; और उसे कोई कुछ नहीं देता था।

17     जब वह अपने आपे में आया, तब कहने लगा, कि मेरे पिता के कितने ही मजदूरों को भोजन से अधिक रोटी मिलती है, और मैं यहां भूखा मर रहा हूं।

18     मैं अब उठकर अपने पिता के पास जाऊंगा और उस से कहूंगा कि पिता जी मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्टि में पाप किया है।

19     अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊं, मुझे अपने एक मजदूर की नाईं रख ले।

20     तब वह उठकर, अपने पिता के पास चला: वह अभी दूर ही था, कि उसके पिता ने उसे देखकर तरस खाया, और दौड़कर उसे गले लगाया, और बहुत चूमा।

21     पुत्र ने उस से कहा; पिता जी, मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्टि में पाप किया है; और अब इस योग्य नहीं रहा, कि तेरा पुत्र कहलाऊं।

22     परन्तु पिता ने अपने दासों से कहा; फट अच्छे से अच्छा वस्त्र निकालकर उसे पहिनाओ, और उसके हाथ में अंगूठी, और पांवों में जूतियां पहिनाओ।

23     और पला हुआ बछड़ा लाकर मारो ताकि हम खांए और आनन्द मनावें।

24     क्योंकि मेरा यह पुत्र मर गया था, फिर जी गया है: खो गया था, अब मिल गया है।

4. Luke 15 : 1-7, 11-24 (to 1st .)

1     Then drew near unto him all the publicans and sinners for to hear him.

2     And the Pharisees and scribes murmured, saying, This man receiveth sinners, and eateth with them.

3     And he spake this parable unto them, saying,

4     What man of you, having an hundred sheep, if he lose one of them, doth not leave the ninety and nine in the wilderness, and go after that which is lost, until he find it?

5     And when he hath found it, he layeth it on his shoulders, rejoicing.

6     And when he cometh home, he calleth together his friends and neighbours, saying unto them, Rejoice with me; for I have found my sheep which was lost.

7     I say unto you, that likewise joy shall be in heaven over one sinner that repenteth, more than over ninety and nine just persons, which need no repentance.

11     And he said, A certain man had two sons:

12     And the younger of them said to his father, Father, give me the portion of goods that falleth to me. And he divided unto them his living.

13     And not many days after the younger son gathered all together, and took his journey into a far country, and there wasted his substance with riotous living.

14     And when he had spent all, there arose a mighty famine in that land; and he began to be in want.

15     And he went and joined himself to a citizen of that country; and he sent him into his fields to feed swine.

16     And he would fain have filled his belly with the husks that the swine did eat: and no man gave unto him.

17     And when he came to himself, he said, How many hired servants of my father’s have bread enough and to spare, and I perish with hunger!

18     I will arise and go to my father, and will say unto him, Father, I have sinned against heaven, and before thee,

19     And am no more worthy to be called thy son: make me as one of thy hired servants.

20     And he arose, and came to his father. But when he was yet a great way off, his father saw him, and had compassion, and ran, and fell on his neck, and kissed him.

21     And the son said unto him, Father, I have sinned against heaven, and in thy sight, and am no more worthy to be called thy son.

22     But the father said to his servants, Bring forth the best robe, and put it on him; and put a ring on his hand, and shoes on his feet:

23     And bring hither the fatted calf, and kill it; and let us eat, and be merry:

24     For this my son was dead, and is alive again; he was lost, and is found.

5. लूका 6 : 37, 38

37     दोष मत लगाओ; तो तुम पर भी दोष नहीं लगाया जाएगा: दोषी न ठहराओ, तो तुम भी दोषी नहीं ठहराए जाओगे: क्षमा करो, तो तुम्हारी भी क्षमा की जाएगी।

38     दिया करो, तो तुम्हें भी दिया जाएगा: लोग पूरा नाप दबा दबाकर और हिला हिलाकर और उभरता हुआ तुम्हारी गोद में डालेंगे, क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिये भी नापा जाएगा॥

5. Luke 6 : 37, 38

37     Judge not, and ye shall not be judged: condemn not, and ye shall not be condemned: forgive, and ye shall be forgiven:

38     Give, and it shall be given unto you; good measure, pressed down, and shaken together, and running over, shall men give into your bosom. For with the same measure that ye mete withal it shall be measured to you again.

6. इफिसियों 1 : 3-7

3     हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो, कि उस ने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आशीष दी है।

4     जैसा उस ने हमें जगत की उत्पति से पहिले उस में चुन लिया, कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों।

5     और अपनी इच्छा की सुमति के अनुसार हमें अपने लिये पहिले से ठहराया, कि यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों,

6     कि उसके उस अनुग्रह की महिमा की स्तुति हो, जिसे उस ने हमें उस प्यारे में सेंत मेंत दिया।

7     हम को उस में उसके लोहू के द्वारा छुटकारा, अर्थात अपराधों की क्षमा, उसके उस अनुग्रह के धन के अनुसार मिला है।

6. Ephesians 1 : 3-7

3     Blessed be the God and Father of our Lord Jesus Christ, who hath blessed us with all spiritual blessings in heavenly places in Christ:

4     According as he hath chosen us in him before the foundation of the world, that we should be holy and without blame before him in love:

5     Having predestinated us unto the adoption of children by Jesus Christ to himself, according to the good pleasure of his will,

6     To the praise of the glory of his grace, wherein he hath made us accepted in the beloved.

7     In whom we have redemption through his blood, the forgiveness of sins, according to the riches of his grace;



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 205: 12-13

ईश्वर ने सभी को मन से बनाया, और सभी को पूर्ण और शाश्वत बनाया।

1. 205 : 12-13

God created all through Mind, and made all perfect and eternal.

2. 476 : 28-5

जब यीशु ने परमेश्वर के बच्चों की बात की, न कि पुरुषों के बच्चों की, तो उन्होंने कहा, "परमेश्वर का राज्य तुम्हारे बीच में है;" इसका मतलब है, सत्य और प्रेम वास्तविक मनुष्य में राज्य करता है, यह दर्शाता है कि भगवान की छवि में आदमी बेदाग और शाश्वत है। यीशु ने विज्ञान में सिद्ध पुरुष को सही ठहराया, जो उसे दिखाई दिया जहां पाप करने वाला नश्वर मनुष्य नश्वर प्रतीत होता है। इस सिद्ध पुरुष में उद्धारकर्ता ने परमेश्वर की अपनी समानता को देखा, और मनुष्य के इस सही दृष्टिकोण ने बीमारों को चंगा किया। इस प्रकार यीशु ने सिखाया कि ईश्वर का राज्य अक्षुण्ण, सार्वभौमिक है, और वह मनुष्य शुद्ध और पवित्र है।

2. 476 : 28-5

When speaking of God's children, not the children of men, Jesus said, "The kingdom of God is within you;" that is, Truth and Love reign in the real man, showing that man in God's image is unfallen and eternal. Jesus beheld in Science the perfect man, who appeared to him where sinning mortal man appears to mortals. In this perfect man the Saviour saw God's own likeness, and this correct view of man healed the sick. Thus Jesus taught that the kingdom of God is intact, universal, and that man is pure and holy.

3. 337 : 16-19

उसकी शुद्धता के अनुपात में मनुष्य परिपूर्ण है; और पूर्णता खगोलीय होने का क्रम है जो जीवन को मसीह में प्रदर्शित करता है, जीवन का आध्यात्मिक आदर्श है।

3. 337 : 16-19

In proportion to his purity is man perfect; and perfection is the order of celestial being which demonstrates Life in Christ, Life's spiritual ideal.

4. 480 : 19 (ईश्वर, या)-20

ईश्वर, या अच्छा, कभी भी मनुष्य को पाप करने में सक्षम नहीं बनाता है।

4. 480 : 19 (God, or)-20

God, or good, never made man capable of sin.

5. 356 : 19-23

ईश्वर पाप, बीमारी और मृत्यु पैदा करने में असमर्थ है क्योंकि वह इन त्रुटियों का अनुभव कर रहा है। उसके बाद मनुष्य के लिए यह कैसे संभव है कि वह त्रुटियों की इस त्रय के अधीन हो, - मनुष्य जो दिव्य समानता में बना है?

5. 356 : 19-23

God is as incapable of producing sin, sickness, and death as He is of experiencing these errors. How then is it possible for Him to create man subject to this triad of errors, — man who is made in the divine likeness?

6. 357: 4-13 (से ;)

भगवान है "किसका आंखें ऐसी शुद्ध हैं स्पष्ट नहीं देख सकते।" इसे स्वीकार करके नहीं, बल्कि एक झूठ को खारिज करके, हम सत्य को बनाए रखते हैं।

यीशु ने व्यक्‍तिगत बुराई के बारे में कहा, कि यह "झूठा, और इसका जनक था।" सत्य न तो झूठ पैदा करता है और न झूठ बोलने की क्षमता, न ही यह झूठ पैदा करता है। यदि मानव जाति इस विश्वास को त्याग देती कि ईश्वर बीमारी, पाप और मृत्यु को जन्म देता है या मनुष्य को इस पुरुषवादी त्रय के कारण पीड़ित करने में सक्षम बनाता है, तो त्रुटि की नींव डूब जाएगी और त्रुटि का विनाश सुनिश्चित हो जाएगा;

6. 357 : 4-13 (to ;)

God is "of purer eyes than to behold evil." We sustain Truth, not by accepting, but by rejecting a lie.

Jesus said of personified evil, that it was "a liar, and the father of it." Truth creates neither a lie, a capacity to lie, nor a liar. If mankind would relinquish the belief that God makes sickness, sin, and death, or makes man capable of suffering on account of this malevolent triad, the foundations of error would be sapped and error's destruction ensured;

7. 481: 24 (पाप)-27

पाप में आत्म-विनाश के तत्व हैं। यह खुद को बनाए नहीं रख सकता। यदि पाप का समर्थन किया जाता है, तो भगवान को इसे बनाए रखना चाहिए, और यह असंभव है, क्योंकि सत्य त्रुटि का समर्थन नहीं कर सकता है।

7. 481 : 24 (Sin)-27

Sin has the elements of self-destruction. It cannot sustain itself. If sin is supported, God must uphold it, and this is impossible, since Truth cannot support error.

8. 339: 1 (यह)-4

पाप का नाश ही क्षमा का दिव्य तरीका है। ईश्वरीय जीवन मृत्यु को नष्ट करता है, सत्य त्रुटि को नष्ट करता है, और प्रेम घृणा को नष्ट करता है। नष्ट होने के नाते, पाप को क्षमा का कोई अन्य रूप नहीं चाहिए।

8. 339 : 1 (The)-4

The destruction of sin is the divine method of pardon. Divine Life destroys death, Truth destroys error, and Love destroys hate. Being destroyed, sin needs no other form of forgiveness.

9. 6: 11-14, 18-27

पाप के परिणाम के रूप में पीड़ित होने के लिए, पाप को नष्ट करने का साधन है। जब तक भौतिक जीवन में पाप और पाप नष्ट नहीं हो जाते, तब तक पाप का हर आनंद उसके दर्द के बराबर होगा।

यह मानने के लिए कि ईश्वर क्षमा करता है या पाप को दंडित करता है जैसा कि उसकी दया की मांग की गई है या बिना शर्त के, प्यार को गलत समझना और प्रार्थना को अपराध के लिए सुरक्षा-वाल्व बनाना है।

यीशु ने पाप को उजागर और झिड़क दिया, इससे पहले कि वह इसे बाहर निकालता। एक बीमार महिला के बारे में उन्होंने कहा कि शैतान ने उसे बाध्य किया था, और पीटर को उसने कहा, "तुम मेरे लिए रुकने का कारण हो।" वह आदमियों को सिखा रहा था और दिखा रहा था कि पाप, बीमारी और मौत को कैसे नष्ट किया जाए।

9. 6 : 11-14, 18-27

To cause suffering as the result of sin, is the means of destroying sin. Every supposed pleasure in sin will furnish more than its equivalent of pain, until belief in material life and sin is destroyed.

To suppose that God forgives or punishes sin according as His mercy is sought or unsought, is to misunderstand Love and to make prayer the safety-valve for wrong-doing.

Jesus uncovered and rebuked sin before he cast it out. Of a sick woman he said that Satan had bound her, and to Peter he said, "Thou art an offence unto me." He came teaching and showing men how to destroy sin, sickness, and death.

10. 5: 3-13

गलत काम के लिए दुःख है, लेकिन सुधार की दिशा में एक कदम और बहुत आसान कदम है। ज्ञान द्वारा आवश्यक अगला और महान कदम हमारी ईमानदारी की परीक्षा है, - अर्थात्, सुधार। इसके लिए हमें परिस्थितियों के तनाव में रखा गया है। प्रलोभन बोली हमें अपराध को दोहराती है, और जो किया जाता है उसके बदले में आ जाता है। इसी तरह यह हमेशा रहेगा, जब तक हम यह नहीं सीख लेते कि न्याय के कानून में कोई छूट नहीं है और हमें "पूरी तरह से" भुगतान करना होगा। जिस नाप से तुम नापते हो, "उसी से तुम्हारे लिये भी नापा जाएगा" और यह भरा जाएगा "और ऊपर चल रहा होगा।"

10. 5 : 3-13

Sorrow for wrong-doing is but one step towards reform and the very easiest step. The next and great step required by wisdom is the test of our sincerity, — namely, reformation. To this end we are placed under the stress of circumstances. Temptation bids us repeat the offence, and woe comes in return for what is done. So it will ever be, till we learn that there is no discount in the law of justice and that we must pay "the uttermost farthing." The measure ye mete "shall be measured to you again," and it will be full "and running over."

11. 201: 20-5

अपवित्रता पर पवित्रता का अभिवादन करते हुए, यह कहते हुए कि पाप को क्षमा किया जा सकता है जब यह त्याग नहीं किया जाता है, यह ऊंटों को निगलने जैसी मूर्खता है।

ईश्वर और मनुष्य के बीच मौजूद वैज्ञानिक एकता को जीवन-व्यवहार में बदल देना चाहिए, और ईश्वर को सर्वव्यापी होना चाहिए।

11. 201 : 20-5

Grafting holiness upon unholiness, supposing that sin can be forgiven when it is not forsaken, is as foolish as straining out gnats and swallowing camels.

The scientific unity which exists between God and man must be wrought out in life-practice, and God's will must be universally done.

12. 22: 3-31

पाप और क्षमा, स्वार्थ और कामुकता की आशा के बीच एक पेंडुलम की तरह कंपन, निरंतर प्रतिगमन का कारण बनता है, — हमारी नैतिक प्रगति धीमी होगी। मसीह की माँग के प्रति जागते हुए, नश्वर दुख का अनुभव करते हैं। यह उनके कारण होता है, यहां तक कि डूबने वाले पुरुषों के रूप में, खुद को बचाने के लिए जोरदार प्रयास करना; और मसीह के अनमोल प्रेम के माध्यम से इन प्रयासों को सफलता मिली।

"अपने स्वयं के उद्धार का काम करें," यह जीवन और प्रेम की मांग है, इस अंत के लिए भगवान आपके साथ काम करते हैं। "जब तक मैं न आऊं तब तक दृढ़ रहना!" अपने इनाम की प्रतीक्षा करें, और "अच्छा करने में थके नहीं। यदि आपके प्रयास भयभीत बाधाओं से घिरे हुए हैं, और आपको कोई वर्तमान इनाम नहीं मिलता है, तो गलती पर वापस न जाएं, और न ही दौड़ में सुस्त बनें।

जब लड़ाई का धुआं दूर हो जाएगा, तो आप अपने द्वारा किए गए अच्छे को समझेंगे, और अपने योग्य के अनुसार प्राप्त करेंगे। प्रेम हमें प्रलोभन देने के लिए जल्दी में नहीं है, क्योंकि प्रेम का अर्थ है कि हमें कोशिश और शुद्ध करना होगा।

त्रुटि से अंतिम उद्धार, जिससे हम अमरता, असीम स्वतंत्रता और पापहीन भावना में आनंदित होते हैं, फूलों के रास्तों से नहीं पहुँचा जा सकता है और न ही किसी के विश्वास के बिना किसी दूसरे के काम के प्रयासों पर विश्वास करके। जो कोई भी यह मानता है कि क्रोध धर्मी है या वह देवत्व मानवीय पीड़ाओं से प्रभावित है, वह परमेश्वर को नहीं समझता।

न्याय के लिए पापी के सुधार की आवश्यकता है दया ऋण को तभी रद्द करती है जब न्याय स्वीकृत होता है।

12. 22 : 3-31

Vibrating like a pendulum between sin and the hope of forgiveness, — selfishness and sensuality causing constant retrogression, — our moral progress will be slow. Waking to Christ's demand, mortals experience suffering. This causes them, even as drowning men, to make vigorous efforts to save themselves; and through Christ's precious love these efforts are crowned with success.

"Work out your own salvation," is the demand of Life and Love, for to this end God worketh with you. "Occupy till I come!" Wait for your reward, and "be not weary in well doing." If your endeavors are beset by fearful odds, and you receive no present reward, go not back to error, nor become a sluggard in the race.

When the smoke of battle clears away, you will discern the good you have done, and receive according to your deserving. Love is not hasty to deliver us from temptation, for Love means that we shall be tried and purified.

Final deliverance from error, whereby we rejoice in immortality, boundless freedom, and sinless sense, is not reached through paths of flowers nor by pinning one's faith without works to another's vicarious effort. Whosoever believeth that wrath is righteous or that divinity is appeased by human suffering, does not understand God.

Justice requires reformation of the sinner. Mercy cancels the debt only when justice approves.

13. 404: 3-16

यदि कोई व्यक्ति एक पापी है, तंबाकू का गुलाम है, या पाप के असंख्य रूपों में से किसी एक का विशेष सेवक है, तो इन गलतियों को पूरा करें, और सत्य होने के साथ इन त्रुटियों को नष्ट करें, - गलत काम करने वाले को पीड़ित करके और उसे विश्वास दिलाते हैं कि झूठी भूख में कोई वास्तविक आनंद नहीं है। एक भ्रष्ट दिमाग एक भ्रष्ट शरीर में प्रकट होता है। वासना, द्वेष, और सभी प्रकार की बुराई रोगग्रस्त विश्वास हैं, और आप उन्हें केवल उन दुष्ट उद्देश्यों को नष्ट करके नष्ट कर सकते हैं जो उन्हें उत्पन्न करते हैं। यदि पश्चाताप नश्वर मन में बुराई खत्म हो गई है, जबकि इसका प्रभाव अभी भी व्यक्ति पर बना हुआ है, तो आप इस विकार को दूर कर सकते हैं क्योंकि भगवान का कानून पूरा हो गया है और अपराध को रद्द कर देता है। स्वस्थ पापी कठोर पापी होता है।

13. 404 : 3-16

If a man is an inebriate, a slave to tobacco, or the special servant of any one of the myriad forms of sin, meet and destroy these errors with the truth of being, — by exhibiting to the wrong-doer the suffering which his submission to such habits brings, and by convincing him that there is no real pleasure in false appetites. A corrupt mind is manifested in a corrupt body. Lust, malice, and all sorts of evil are diseased beliefs, and you can destroy them only by destroying the wicked motives which produce them. If the evil is over in the repentant mortal mind, while its effects still remain on the individual, you can remove this disorder as God's law is fulfilled and reformation cancels the crime. The healthy sinner is the hardened sinner.

14. 11: 17-18

सत्य त्रुटि पर कोई क्षमा नहीं करता है, लेकिन इसे सबसे प्रभावशाली तरीके से मिटा देता है।

14. 11 : 17-18

Truth bestows no pardon upon error, but wipes it out in the most effectual manner.

15. 242: 1-8

पश्चाताप, आध्यात्मिक बपतिस्मा, और उत्थान के माध्यम से, नश्वर अपने भौतिक विश्वासों और झूठी व्यक्तित्व को बंद कर देते हैं। यह केवल समय का सवाल है "कि छोटे से ले कर बड़े तक, सब के सब मेरा ज्ञान रखेंगे।" पदार्थ के दावों से इंकार आत्मा की खुशियों की ओर, मानव स्वतंत्रता और शरीर पर अंतिम विजय की ओर एक बड़ा कदम है।

15. 242 : 1-8

Through repentance, spiritual baptism, and regeneration, mortals put off their material beliefs and false individuality. It is only a question of time when "they shall all know Me [God], from the least of them unto the greatest." Denial of the claims of matter is a great step towards the joys of Spirit, towards human freedom and the final triumph over the body.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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