रविवार 5 दिसंबर, 2021



विषयईश्वर ही एकमात्र कारण और निर्माता है

SubjectGod the only Cause and Creator

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: नीतिवचन 3: 19

"यहोवा ने पृथ्वी की नेव बुद्धि ही से डाली; और स्वर्ग को समझ ही के द्वारा स्थिर किया।"



Golden Text: Proverbs 3 : 19

The Lord by wisdom hath founded the earth; by understanding hath he established the heavens.




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उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 95: 1-6


1     आओ हम यहोवा के लिये ऊंचे स्वर से गाएं, अपने उद्धार की चट्टान का जयजयकार करें!

2     हम धन्यवाद करते हुए उसके सम्मुख आएं, और भजन गाते हुए उसका जयजयकार करें!

3     क्योंकि यहोवा महान ईश्वर है, और सब देवताओं के ऊपर महान राजा है।

4     पृथ्वी के गहिरे स्थान उसी के हाथ में हैं; और पहाड़ों की चोटियां भी उसी की हैं।

5     समुद्र उसका है, और उसी ने उसको बनाया, और स्थल भी उसी के हाथ का रचा है॥

6     आओ हम झुक कर दण्डवत करें, और अपने कर्ता यहोवा के साम्हने घुटने टेकें!

Responsive Reading: Psalm 95 : 1-6

1.     O come, let us sing unto the Lord: let us make a joyful noise to the rock of our salvation.

2.     Let us come before his presence with thanksgiving, and make a joyful noise unto him with psalms.

3.     For the Lord is a great God, and a great King above all gods.

4.     In his hand are the deep places of the earth: the strength of the hills is his also.

5.     The sea is his, and he made it: and his hands formed the dry land.

6.     O come, let us worship and bow down: let us kneel before the Lord our maker.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. उत्पत्ति 1: 1, 3-5 (से 1st.), 6, 8 (से 1st.), 9, 10, 26, 27, 31 (से 1st.)

1     आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।

3     तब परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो: तो उजियाला हो गया।

4     और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया।

5     और परमेश्वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा।

6     फिर परमेश्वर ने कहा, जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।

8     और परमेश्वर ने उस अन्तर को आकाश कहा।

9     फिर परमेश्वर ने कहा, आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे; और वैसा ही हो गया।

10     और परमेश्वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा; तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।

26     फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगने वाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।

27     तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।

31     तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है।

1. Genesis 1 : 1, 3-5 (to 1st .), 6, 8 (to 1st .), 9, 10, 26, 27, 31 (to 1st .)

1     In the beginning God created the heaven and the earth.

3     And God said, Let there be light: and there was light.

4     And God saw the light, that it was good: and God divided the light from the darkness.

5     And God called the light Day, and the darkness he called Night.

6     And God said, Let there be a firmament in the midst of the waters, and let it divide the waters from the waters.

8     And God called the firmament Heaven.

9     And God said, Let the waters under the heaven be gathered together unto one place, and let the dry land appear: and it was so.

10     And God called the dry land Earth; and the gathering together of the waters called he Seas: and God saw that it was good.

26     And God said, Let us make man in our image, after our likeness: and let them have dominion over the fish of the sea, and over the fowl of the air, and over the cattle, and over all the earth, and over every creeping thing that creepeth upon the earth.

27     So God created man in his own image, in the image of God created he him; male and female created he them.

31     And God saw every thing that he had made, and, behold, it was very good.

2. नहेमायाह 9: 1, 3, 6, 9, 11, 14, 15

1     फिर उसी महीने के चौबीसवें दिन को इस्राएली उपवास का टाट पहिने और सिर पर धूल डाले हुए, इकट्ठे हो गए।

3     तब उन्होंने अपने अपने स्थान पर खड़े हो कर दिन के एक पहर तक अपने परमेश्वर यहोवा की व्यवस्था की पुस्तक पढ़ते, और एक और पहर अपने पापों को मानते, और अपने परमेश्वर यहोवा को दण्डवत करते रहे।

6     तू ही अकेला यहोवा है; स्वर्ग वरन सब से ऊंचे स्वर्ग और उसके सब गण, और पृथ्वी और जो कुछ उस में है, और समुद्र और जो कुछ उस में है, सभों को तू ही ने बनाया, और सभों की रक्षा तू ही करता है; और स्वर्ग की समस्त सेना तुझी को दण्डवत करती हैं।

9     फिर तू ने मिस्र में हमारे पुरखाओं के दु:ख पर दृष्टि की; और लाल समुद्र के तट पर उनकी दोहाई सुनी।

11     और तू ने उनके आगे समुद्र को ऐसा दो भाग किया, कि वे समुद्र के बीच स्थल ही स्थल चलकर पार हो गए; और जो उनके पीछे पड़े थे, उन को तू ने गहिरे स्थानों में ऐसा डाल दिया, जैसा पत्थर महाजलराशि में डाला जाए।

14     और उन्हें अपने पवित्र विश्राम दिन का ज्ञान दिया, और अपने दास मूसा के द्वारा आज्ञाएं और विधियां और व्यवस्था दीं।

15     और उनकी भूख मिटाने को आकाश से उन्हें भोजन दिया और उनकी प्यास बुझाने को चट्टान में से उनके लिये पानी निकाला, और उन्हें आज्ञा दी कि जिस देश को तुम्हें देने की मैं ने शपथ खाई है उसके अधिकारी होने को तुम उस में जाओ।

2. Nehemiah 9 : 1, 3, 6, 9, 11, 14, 15

1     Now in the twenty and fourth day of this month the children of Israel were assembled with fasting, and with sackclothes, and earth upon them.

3     And they stood up in their place, and read in the book of the law of the Lord their God one fourth part of the day; and another fourth part they confessed, and worshipped the Lord their God.

6     Thou, even thou, art Lord alone; thou hast made heaven, the heaven of heavens, with all their host, the earth, and all things that are therein, the seas, and all that is therein, and thou preservest them all; and the host of heaven worshippeth thee.

9     And didst see the affliction of our fathers in Egypt, and heardest their cry by the Red sea;

11     And thou didst divide the sea before them, so that they went through the midst of the sea on the dry land; and their persecutors thou threwest into the deeps, as a stone into the mighty waters.

14     And madest known unto them thy holy sabbath, and commandedst them precepts, statutes, and laws, by the hand of Moses thy servant:

15     And gavest them bread from heaven for their hunger, and broughtest forth water for them out of the rock for their thirst, and promisedst them that they should go in to possess the land which thou hadst sworn to give them.

3. लूका 1: 5-8, 11 (वहां)-13, 18-20, 24, 25, 57, 62-64

5     यहूदियों के राजा हेरोदेस के समय अबिय्याह के दल में जकरयाह नाम का एक याजक था, और उस की पत्नी हारून के वंश की थी, जिस का नाम इलीशिबा था।

6     और वे दोनों परमेश्वर के साम्हने धर्मी थे: और प्रभु की सारी आज्ञाओं और विधियों पर निर्दोष चलने वाले थे।

7     क्योंकि इलीशिबा बांझ थी, और वे दोनों बूढ़े थे॥

8     जब वह अपने दलकी पारी पर परमेश्वर के साम्हने याजक का काम करता था।

11     ... प्रभु का एक स्वर्गदूत धूप की वेदी की दाहिनी ओर खड़ा हुआ उस को दिखाई दिया।

12     और जकरयाह देखकर घबराया और उस पर बड़ा भय छा गया।

13     परन्तु स्वर्गदूत ने उस से कहा, हे जकरयाह, भयभीत न हो क्योंकि तेरी प्रार्थना सुन ली गई है और तेरी पत्नी इलीशिबा से तेरे लिये एक पुत्र उत्पन्न होगा, और तू उसका नाम यूहन्ना रखना।

18     जकरयाह ने स्वर्गदूत से पूछा; यह मैं कैसे जानूं? क्योंकि मैं तो बूढ़ा हूं; और मेरी पत्नी भी बूढ़ी हो गई है।

19     स्वर्गदूत ने उस को उत्तर दिया, कि मैं जिब्राईल हूं, जो परमेश्वर के साम्हने खड़ा रहता हूं; और मैं तुझ से बातें करने और तुझे यह सुसमाचार सुनाने को भेजा गया हूं।

20     और देख जिस दिन तक ये बातें पूरी न हो लें, उस दिन तक तू मौन रहेगा, और बोल न सकेगा, इसलिये कि तू ने मेरी बातों की जो अपने समय पर पूरी होंगी, प्रतीति न की।

24     इन दिनों के बाद उस की पत्नी इलीशिबा गर्भवती हुई; और पांच महीने तक अपने आप को यह कह के छिपाए रखा।

25     कि मनुष्यों में मेरा अपमान दूर करने के लिये प्रभु ने इन दिनों में कृपा दृष्टि करके मेरे लिये ऐसा किया है॥

57     तब इलीशिबा के जनने का समय पूरा हुआ, और वह पुत्र जनी।

62     तब उन्होंने उसके पिता से संकेत करके पूछा।

63     कि तू उसका नाम क्या रखना चाहता है? और उस ने लिखने की पट्टी मंगाकर लिख दिया, कि उसका नाम यूहन्ना है: और सभों ने अचम्भा किया।

64     तब उसका मुंह और जीभ तुरन्त खुल गई; और वह बोलने और परमेश्वर का धन्यवाद करने लगा।

3. Luke 1 : 5-8, 11 (there)-13, 18-20, 24, 25, 57, 62-64

5     There was in the days of Herod, the king of Judæa, a certain priest named Zacharias, of the course of Abia: and his wife was of the daughters of Aaron, and her name was Elisabeth.

6     And they were both righteous before God, walking in all the commandments and ordinances of the Lord blameless.

7     And they had no child, because that Elisabeth was barren, and they both were now well stricken in years.

8     And it came to pass, that while he executed the priest’s office before God in the order of his course,

11     … there appeared unto him an angel of the Lord standing on the right side of the altar of incense.

12     And when Zacharias saw him, he was troubled, and fear fell upon him.

13     But the angel said unto him, Fear not, Zacharias: for thy prayer is heard; and thy wife Elisabeth shall bear thee a son, and thou shalt call his name John.

18     And Zacharias said unto the angel, Whereby shall I know this? for I am an old man, and my wife well stricken in years.

19     And the angel answering said unto him, I am Gabriel, that stand in the presence of God; and am sent to speak unto thee, and to shew thee these glad tidings.

20     And, behold, thou shalt be dumb, and not able to speak, until the day that these things shall be performed, because thou believest not my words, which shall be fulfilled in their season.

24     And after those days his wife Elisabeth conceived, and hid herself five months, saying,

25     Thus hath the Lord dealt with me in the days wherein he looked on me, to take away my reproach among men.

57     Now Elisabeth’s full time came that she should be delivered; and she brought forth a son.

62     And they made signs to his father, how he would have him called.

63     And he asked for a writing table, and wrote, saying, His name is John. And they marvelled all.

64     And his mouth was opened immediately, and his tongue loosed, and he spake, and praised God.

4. यशायाह 45: 5, 8, 12, 18

5     मैं यहोवा हूं और दूसरा कोई नहीं, मुझे छोड़ कोई परमेश्वर नहीं; यद्यपि तू मुझे नहीं जानता, तौभी मैं तेरी कमर कसूंगा,

8     हे आकाश, ऊपर से धर्म बरसा, आकाशमण्डल से धर्म की वर्षा हो; पृथ्वी खुले कि उद्धार उत्पन्न हो; और धर्म भी उसके संग उगाए; मैं यहोवा ही ने उसे उत्पन्न किया है॥

12     मैं ही ने पृथ्वी को बनाया और उसके ऊपर मनुष्यों को सृजा है; मैं ने अपने ही हाथों से आकाश को ताना और उसके सारे गणों को आज्ञा दी है।

18     क्योंकि यहोवा जो आकाश का सृजनहार है, वही परमेश्वर है; उसी ने पृथ्वी को रचा और बनाया, उसी ने उसको स्थिर भी किया; उसने उसे सुनसान रहने के लिये नहीं परन्तु बसने के लिये उसे रचा है। वही यों कहता है, मैं यहोवा हूं, मेरे सिवा दूसरा और कोई नहीं है।

4. Isaiah 45 : 5, 8, 12, 18

5     I am the Lord, and there is none else, there is no God beside me: I girded thee, though thou hast not known me:

8     Drop down, ye heavens, from above, and let the skies pour down righteousness: let the earth open, and let them bring forth salvation, and let righteousness spring up together; I the Lord have created it.

12     I have made the earth, and created man upon it: I, even my hands, have stretched out the heavens, and all their host have I commanded.

18     For thus saith the Lord that created the heavens; God himself that formed the earth and made it; he hath established it, he created it not in vain, he formed it to be inhabited: I am the Lord; and there is none else.

5. प्रकाशित वाक्य 4: 11

11     कि हे हमारे प्रभु, और परमेश्वर, तू ही महिमा, और आदर, और सामर्थ के योग्य है; क्योंकि तू ही ने सब वस्तुएं सृजीं और वे तेरी ही इच्छा से थीं, और सृजी गईं॥

5. Revelation 4 : 11

11     Thou art worthy, O Lord, to receive glory and honour and power: for thou hast created all things, and for thy pleasure they are and were created.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 295 : 5-8

भगवान मनुष्य सहित ब्रह्मांड का निर्माण और संचालन करता है। ब्रह्मांड आध्यात्मिक विचारों से भरा है, जिसे वह विकसित करता है, और वे मन के आज्ञाकारी हैं जो उन्हें बनाता है।

1. 295 : 5-8

God creates and governs the universe, including man. The universe is filled with spiritual ideas, which He evolves, and they are obedient to the Mind that makes them.

2. 470 : 21-28, 32-5

ईश्वर मनुष्य का निर्माता है, और, मनुष्य का ईश्वरीय सिद्धांत शेष पूर्ण है, दिव्य विचार या प्रतिबिंब, मनुष्य, परिपूर्ण रहता है मनुष्य ईश्वर के अस्तित्व की अभिव्यक्ति है। अगर कभी ऐसा क्षण आया जब मनुष्य ने ईश्वरीय पूर्णता को व्यक्त नहीं किया, तब एक ऐसा क्षण आया जब मनुष्य ने ईश्वर को व्यक्त नहीं किया, और फलस्वरूप एक समय था जब देवता अप्रसन्न थे — यह इकाई के बिना है।

साइंस में ईश्वर और मनुष्य के संबंध, ईश्वरीय सिद्धांत और विचार अविनाशी हैं; और विज्ञान जानता है कि कोई चूक नहीं हुई है और न ही सद्भाव में लौटा लेकिन यह ईश्वरीय आदेश या आध्यात्मिक कानून रखता है, जिसमें भगवान और वह जो कुछ भी बनाता है वह परिपूर्ण और शाश्वत है, अपने सनातन इतिहास में अपरिवर्तित रहा है।

2. 470 : 21-28, 32-5

God is the creator of man, and, the divine Principle of man remaining perfect, the divine idea or reflection, man, remains perfect. Man is the expression of God's being. If there ever was a moment when man did not express the divine perfection, then there was a moment when man did not express God, and consequently a time when Deity was unexpressed — that is, without entity.

The relations of God and man, divine Principle and idea, are indestructible in Science; and Science knows no lapse from nor return to harmony, but holds the divine order or spiritual law, in which God and all that He creates are perfect and eternal, to have remained unchanged in its eternal history.

3. 525 : 22-29

उत्पत्ति के विज्ञान में हमने पढ़ा कि उसने वह सब कुछ देखा जो उसने बनाया था, "और देखा तो बहुत अच्छा था।" शारीरिक इंद्रियां अन्यथा घोषित करती हैं; और अगर हम सत्य के रिकॉर्ड के रूप में त्रुटि के इतिहास के लिए एक ही ध्यान देते हैं, तो पाप और मृत्यु का पवित्र अभिलेख भौतिक इंद्रियों के झूठे निष्कर्ष का पक्षधर है। पाप, बीमारी और मृत्यु को वास्तविकता से रहित समझना चाहिए क्योंकि वे अच्छे, ईश्वर के हैं।

3. 525 : 22-29

In the Science of Genesis we read that He saw everything which He had made, "and, behold, it was very good." The corporeal senses declare otherwise; and if we give the same heed to the history of error as to the records of truth, the Scriptural record of sin and death favors the false conclusion of the material senses. Sin, sickness, and death must be deemed as devoid of reality as they are of good, God.

4. 332 : 4 (पिता)-8

पिता-माता देवता का नाम है, जो उनकी आध्यात्मिक रचना के उनके कोमल संबंधों को इंगित करता है। जैसा कि प्रेरित ने इसे उन शब्दों में व्यक्त किया है जो उसने एक क्लासिक कवि से मंजूर होने के साथ उद्धृत किए थे: "क्योंकि हम भी उसकी संतान हैं।"

4. 332 : 4 (Father)-8

Father-Mother is the name for Deity, which indicates His tender relationship to His spiritual creation. As the apostle expressed it in words which he quoted with approbation from a classic poet: "For we are also His offspring."

5. 583 : 20-25

रचनाकार। आत्मा; मन; बुद्धि; सभी के दैवीय सिद्धांत जो वास्तविक और अच्छे हैं; आत्म-अस्तित्व जीवन, सत्य और प्रेम; जो परिपूर्ण और शाश्वत है; पदार्थ और बुराई के विपरीत, जिसका कोई सिद्धांत नहीं है; ईश्वर, जिसने वह सब बनाया था जो स्वयं एक परमाणु या एक तत्व नहीं बना सकता था।

5. 583 : 20-25

Creator. Spirit; Mind; intelligence; the animating divine Principle of all that is real and good; self-existent Life, Truth, and Love; that which is perfect and eternal; the opposite of matter and evil, which have no Principle; God, who made all that was made and could not create an atom or an element the opposite of Himself.

6. 286 : 16-26

सैक्सन और बीस अन्य जीभों में भगवान के लिए अच्छा शब्द है। पवित्रशास्त्र ने वह सब घोषित किया, जो उसने स्वयं के लिए अच्छा माना, जैसे - सिद्धांत में अच्छा और विचार में। इसलिए आध्यात्मिक ब्रह्मांड अच्छा है, और भगवान को दर्शाता है जैसे वह है।

ईश्वर के विचार परिपूर्ण और शाश्वत हैं, पदार्थ और जीवन हैं। भौतिक और लौकिक विचार मानव हैं, जिसमें त्रुटि है, और चूंकि भगवान, आत्मा, एकमात्र कारण है, उनके पास एक दिव्य कारण का अभाव है। लौकिक और भौतिक तत्त्व आत्मा की रचना नहीं हैं। वे आध्यात्मिक और शाश्वत के नकली हैं।

6. 286 : 16-26

In the Saxon and twenty other tongues good is the term for God. The Scriptures declare all that He made to be good, like Himself, — good in Principle and in idea. Therefore the spiritual universe is good, and reflects God as He is.

God's thoughts are perfect and eternal, are substance and Life. Material and temporal thoughts are human, involving error, and since God, Spirit, is the only cause, they lack a divine cause. The temporal and material are not then creations of Spirit. They are but counterfeits of the spiritual and eternal.

7. 262 : 27-20

नश्वर कलह की नींव मनुष्य की उत्पत्ति का एक गलत अर्थ है। ठीक से शुरू करने के लिए सही तरीके से समाप्त करना है। हर अवधारणा जो मस्तिष्क से शुरू होती है, मिथ्या से शुरू होती है। ईश्वरीय मन ही अस्तित्व का एकमात्र कारण या सिद्धांत है। कारण पदार्थ में, नश्वर मन में, या भौतिक रूपों में मौजूद नहीं है।

मुर्दा अहंकारी हैं। वे खुद को स्वतंत्र कार्यकर्ता, व्यक्तिगत लेखक और यहां तक कि किसी चीज के विशेषाधिकार प्राप्त प्रवर्तक मानते हैं, जिसे देवता नहीं बना सकते थे या नहीं बना सकते थे। नश्वर मन की रचनाएँ भौतिक हैं। अमर आध्यात्मिक व्यक्ति अकेले ही सृष्टि के सत्य का प्रतिनिधित्व करता है।

जब नश्वर मनुष्य आध्यात्मिक के साथ अपने अस्तित्व के विचारों को मिश्रित करता है और केवल भगवान के रूप में काम करता है, तो वह अब अंधेरे में और पृथ्वी से चिपके नहीं रहेगा क्योंकि उसने स्वर्ग का स्वाद नहीं लिया है। कार्मिक मान्यताएँ हमें धोखा देती हैं। वे मनुष्य को एक अनैच्छिक पाखंडी बनाते हैं, - जब वह अच्छा पैदा करेगा, तो वह बुराई पैदा करेगा, जब वह अनुग्रह और सुंदरता को रेखांकित करेगा, तो वह उन लोगों को घायल कर देगा, जिन्हें वह आशीर्वाद देगा। वह एक सामान्य गलत रचनाकार बन जाता है, जो मानता है कि वह एक अर्ध-देवता है। उनका "स्पर्श धूल की उम्मीद बन जाता है, जो धूल हम सब फेंक चुके हैं।" वह बाइबल की भाषा में कह सकता है: "जिस अच्छे काम की मैं इच्छा करता हूं, वह तो नहीं करता, परन्तु जिस बुराई की इच्छा नहीं करता वही किया करता हूं।"

एक सृष्टिकर्ता को छोड़कर कोई नहीं हो सकता, जिसने सभी को बनाया हो।

7. 262 : 27-20

The foundation of mortal discord is a false sense of man's origin. To begin rightly is to end rightly. Every concept which seems to begin with the brain begins falsely. Divine Mind is the only cause or Principle of existence. Cause does not exist in matter, in mortal mind, or in physical forms.

Mortals are egotists. They believe themselves to be independent workers, personal authors, and even privileged originators of something which Deity would not or could not create. The creations of mortal mind are material. Immortal spiritual man alone represents the truth of creation.

When mortal man blends his thoughts of existence with the spiritual and works only as God works, he will no longer grope in the dark and cling to earth because he has not tasted heaven. Carnal beliefs defraud us. They make man an involuntary hypocrite, — producing evil when he would create good, forming deformity when he would outline grace and beauty, injuring those whom he would bless. He becomes a general mis-creator, who believes he is a semi-god. His "touch turns hope to dust, the dust we all have trod." He might say in Bible language: "The good that I would, I do not: but the evil which I would not, that I do."

There can be but one creator, who has created all.

8. 68 : 27-16

क्रिस्चियन साइंस अभियोग प्रस्तुत करता है, अभिवृद्धि नहीं; यह अणु से मन तक कोई भौतिक विकास नहीं दर्शाता है, लेकिन मनुष्य और ब्रह्मांड के लिए दिव्य मन का एक संस्कार है। मानव पीढ़ी के रूप में आनुपातिक रूप से बंद हो जाता है, शाश्वत के सामंजस्यपूर्ण लिंक, आध्यात्मिक रूप से विवेकी होंगे; और मनुष्य, पृथ्वी के पृथ्वी पर नहीं बल्कि परमेश्वर के साथ सह-अस्तित्व में दिखाई देगा। मनुष्य और ब्रह्मांड का वैज्ञानिक तथ्य आत्मा से विकसित होता है, और इसलिए आध्यात्मिक हैं, जैसा कि दिव्य विज्ञान में तय किया गया है, इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य केवल स्वास्थ्य की भावना प्राप्त करते हैं क्योंकि वे पाप और बीमारी की भावना को खो देते हैं। मनुष्य कभी भी यह नहीं मान सकता कि मनुष्य एक निर्माता है। पहले से ही बनाए गए भगवान के बच्चों को पहचान लिया जाएगा क्योंकि मनुष्य होने का सत्य पाता है। इस प्रकार यह है कि असली, आदर्श आदमी अनुपात में प्रकट होता है क्योंकि झूठ और सामग्री गायब हो जाती है। अब शादी करने या "विवाह में दिए जाने" के लिए न तो मनुष्य की निरंतरता को बंद करता है और न ही भगवान की अनंत योजना में बढ़ती संख्या की उसकी भावना। आध्यात्मिक रूप से यह समझने के लिए कि एक रचनाकार है, ईश्वर, सारी सृष्टि को उजागर करता है, शास्त्रों की पुष्टि करता है, बिना किसी पक्षपात के, बिना किसी पीड़ा के, और मनुष्य की मृत्यु और सही और शाश्वत का मधुर आश्वासन लाता है।

8. 68 : 27-16

Christian Science presents unfoldment, not accretion; it manifests no material growth from molecule to mind, but an impartation of the divine Mind to man and the universe. Proportionately as human generation ceases, the unbroken links of eternal, harmonious being will be spiritually discerned; and man, not of the earth earthly but coexistent with God, will appear. The scientific fact that man and the universe are evolved from Spirit, and so are spiritual, is as fixed in divine Science as is the proof that mortals gain the sense of health only as they lose the sense of sin and disease. Mortals can never understand God's creation while believing that man is a creator. God's children already created will be cognized only as man finds the truth of being. Thus it is that the real, ideal man appears in proportion as the false and material disappears. No longer to marry or to be "given in marriage" neither closes man's continuity nor his sense of increasing number in God's infinite plan. Spiritually to understand that there is but one creator, God, unfolds all creation, confirms the Scriptures, brings the sweet assurance of no parting, no pain, and of man deathless and perfect and eternal.

9. 502 : 27-5

रचनात्मक सिद्धांत - जीवन, सत्य और प्रेम - ईश्वर है। ब्रह्मांड ईश्वर को दर्शाता है। लेकिन एक रचनाकार और एक रचना है। इस रचना में आध्यात्मिक विचारों और उनकी पहचानों का खुलासा होता है, जो अनंत मन में समाहित हैं और हमेशा के लिए परिलक्षित होते हैं। ये विचार अनंत से लेकर अनंत तक हैं, और उच्चतम विचार ईश्वर के पुत्र और पुत्रियाँ हैं।

9. 502 : 27-5

The creative Principle — Life, Truth, and Love — is God. The universe reflects God. There is but one creator and one creation. This creation consists of the unfolding of spiritual ideas and their identities, which are embraced in the infinite Mind and forever reflected. These ideas range from the infinitesimal to infinity, and the highest ideas are the sons and daughters of God.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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