रविवार 4 फ़रवरी, 2024



विषयप्रेम

SubjectLove

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: 1 यूहन्ना 3: 1

"देखो पिता ने हम से कैसा प्रेम किया है, कि हम परमेश्वर की सन्तान कहलाएं।"



Golden Text: I John 3 : 1

Behold, what manner of love the Father hath bestowed upon us, that we should be called the sons of God.




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उत्तरदायी अध्ययन: 1 यूहन्ना 3: 7 • 1 यूहन्ना 4: 6-11


7     हे बालकों, किसी के भरमाने में न आना; जो धर्म के काम करता है, वही उस की नाईं धर्मी है।

6     हम परमेश्वर के हैं।

7     हे प्रियों, हम तुम में प्रेम रखो; क्योंकि प्रेम परमेश्वर से है: और जो कोई प्रेम नहीं करता, वह भगवान से जन्मा है; और भगवान को पता है।

8     जो प्रेम नहीं रखता, वह भगवान को नहीं जानता, क्योंकि भगवान प्रेम है।

9     जो प्रेम भगवान हम से रखता है, वह इस से प्रकट हुआ, कि भगवान ने अपने एकलौते पुत्र को अवतार में भेजा है, कि हम उसके द्वारा जीवन पाएं।

10     प्रेम इस में नहीं कि हमने भगवान को प्रेम किया है; पर इस में है, कि उसने हम से प्रेम किया; और हमारे पापों के प्रायश्चित्त के लिए अपने पुत्र को भेजा।

11     हे प्रियो, जब भगवान ने हम से ऐसा प्रेम किया, तो हम को भी आपस में प्रेम रखना चाहिए।

Responsive Reading: I John 3 : 7I John 4 : 6-11

7.     Little children, let no man deceive you: he that doeth righteousness is righteous, even as he is righteous.

6.     We are of God.

7.     Beloved, let us love one another: for love is of God; and every one that loveth is born of God, and knoweth God.

8.     He that loveth not knoweth not God; for God is love.

9.     In this was manifested the love of God toward us, because that God sent his only begotten Son into the world, that we might live through him.

10.     Herein is love, not that we loved God, but that he loved us, and sent his Son to be the propitiation for our sins.

11.     Beloved, if God so loved us, we ought also to love one another.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. 1 यूहन्ना 4: 16, 17, 19-21

16     और जो प्रेम परमेश्वर हम से रखता है, उस को हम जान गए, और हमें उस की प्रतीति है; परमेश्वर प्रेम है: जो प्रेम में बना रहता है, वह परमेश्वर में बना रहता है; और परमेश्वर उस में बना रहता है।

17     इसी से प्रेम हम में सिद्ध हुआ, कि हमें न्याय के दिन हियाव हो; क्योंकि जैसा वह है, वैसे ही संसार में हम भी हैं।

19     हम इसलिये प्रेम करते हैं, कि पहिले उस ने हम से प्रेम किया।

20     यदि कोई कहे, कि मैं परमेश्वर से प्रेम रखता हूं; और अपने भाई से बैर रखे; तो वह झूठा है: क्योंकि जो अपने भाई से, जिस उस ने देखा है, प्रेम नहीं रखता, तो वह परमेश्वर से भी जिसे उस ने नहीं देखा, प्रेम नहीं रख सकता।

21     और उस से हमें यह आज्ञा मिली है, कि जो कोई अपने परमेश्वर से प्रेम रखता है, वह अपने भाई से भी प्रेम रखे॥

1. I John 4 : 16, 17, 19-21

16     And we have known and believed the love that God hath to us. God is love; and he that dwelleth in love dwelleth in God, and God in him.

17     Herein is our love made perfect, that we may have boldness in the day of judgment: because as he is, so are we in this world.

19     We love him, because he first loved us.

20     If a man say, I love God, and hateth his brother, he is a liar: for he that loveth not his brother whom he hath seen, how can he love God whom he hath not seen?

21     And this commandment have we from him, That he who loveth God love his brother also.

2. मत्ती 22: 37 (से कहा), 37 (तुम)-40

37     यीशु कहा... तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख।

38     बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है

39     और उसी के समान यह दूसरी भी है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।

40     ये ही दो आज्ञाएं सारी व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं का आधार है॥

2. Matthew 22 : 37 (to said), 37 (Thou)-40

37     Jesus said ... Thou shalt love the Lord thy God with all thy heart, and with all thy soul, and with all thy mind.

38     This is the first and great commandment.

39     And the second is like unto it, Thou shalt love thy neighbour as thyself.

40     On these two commandments hang all the law and the prophets.

3. मत्ती 5: 1, 2, 43-48

1     वह इस भीड़ को देखकर, पहाड़ पर चढ़ गया; और जब बैठ गया तो उसके चेले उसके पास आए।

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

43     तुम सुन चुके हो, कि कहा गया था; कि अपने पड़ोसी से प्रेम रखना, और अपने बैरी से बैर।

44     परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सताने वालों के लिये प्रार्थना करो।

45     जिस से तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे क्योंकि वह भलों और बुरों दोनो पर अपना सूर्य उदय करता है, और धमिर्यों और अधमिर्यों दोनों पर मेंह बरसाता है।

46     क्योंकि यदि तुम अपने प्रेम रखने वालों ही से प्रेम रखो, तो तु म्हारे लिये क्या फल होगा? क्या महसूल लेने वाले भी ऐसा ही नहीं करते?

47     और यदि तुम केवल अपने भाइयों ही को नमस्कार करो, तो कौन सा बड़ा काम करते हो? क्या अन्यजाति भी ऐसा नहीं करते?

48     इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है॥

3. Matthew 5 : 1, 2, 43-48

1     And seeing the multitudes, he went up into a mountain: and when he was set, his disciples came unto him:

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

43     Ye have heard that it hath been said, Thou shalt love thy neighbour, and hate thine enemy.

44     But I say unto you, Love your enemies, bless them that curse you, do good to them that hate you, and pray for them which despitefully use you, and persecute you;

45     That ye may be the children of your Father which is in heaven: for he maketh his sun to rise on the evil and on the good, and sendeth rain on the just and on the unjust.

46     For if ye love them which love you, what reward have ye? do not even the publicans the same?

47     And if ye salute your brethren only, what do ye more than others? do not even the publicans so?

48     Be ye therefore perfect, even as your Father which is in heaven is perfect.

4. प्रेरितों के काम 10: 1-5, 7-15, 19, 20, 23, 24 (से 1st.), 25, 26, 28, 34, 3

1     कैसरिया में कुरनेलियुस नाम ऐक मनुष्य था, जो इतालियानी नाम पलटन का सूबेदार था।

2     वह भक्त था, और अपने सारे घराने समेत परमेश्वर से डरता था, और यहूदी लागों को बहुत दान देता, और बराबर परमेश्वर से प्रार्थना करता था।

3     उस ने दिन के तीसरे पहर के निकट दर्शन में स्पष्ट रूप से देखा, कि परमेश्वर का एक स्वर्गदूत मेरे पास भीतर आकर कहता है; कि हे कुरनेलियुस।

4     उस ने उसे ध्यान से देखा; और डरकर कहा; हे प्रभु क्या है उस ने उस से कहा, तेरी प्रार्थनाएं और तेरे दान स्मरण के लिये परमेश्वर के साम्हने पहुंचे हैं।

5     और अब याफा में मनुष्य भेजकर शमौन को, जो पतरस कहलाता है, बुलवा ले।

7     जब वह स्वर्गदूत जिस ने उस से बातें की थीं चला गया, तो उस ने दो सेवक, और जो उसके पास उपस्थित रहा करते थे उन में से एक भक्त सिपाही को बुलाया।

8     और उन्हें सब बातें बता कर याफा को भेजा॥

9     दूसरे दिन, जब वे चलते चलते नगर के पास पहुंचे, तो दो पहर के निकट पतरस कोठे पर प्रार्थना करने चढ़ा।

10     और उसे भूख लगी, और कुछ खाना चाहता था; परन्तु जब वे तैयार कर रहे थे, तो वह बेसुध हो गया।

11     और उस ने देखा, कि आकाश खुल गया; और एक पात्र बड़ी चादर के समान चारों कोनों से लटकता हुआ, पृथ्वी की ओर उतर रहा है।

12     जिस में पृथ्वी के सब प्रकार के चौपाए और रेंगने वाले जन्तु और आकाश के पक्षी थे।

13     और उसे एक ऐसा शब्द सुनाईं दिया, कि हे पतरस उठ, मार के खा।

14     परन्तु पतरस ने कहा, नहीं प्रभु, कदापि नहीं; क्योंकि मैं ने कभी कोई अपवित्र या अशुद्ध वस्तु नहीं खाई है।

15     फिर दूसरी बार उसे शब्द सुनाईं दिया, कि जो कुछ परमेश्वर ने शुद्ध ठहराया है, उसे तू अशुद्ध मत कह।

19     पतरस जो उस दर्शन पर सोच ही रहा था, कि आत्मा ने उस से कहा, देख, तीन मनुष्य तेरी खोज में हैं।

20     सो उठकर नीचे जा, और बेखटके उन के साथ हो ले; क्योंकि मैं ही ने उन्हें भेजा है।

23     तब उस ने उन्हें भीतर बुलाकर उन की पहुनाईं की॥ और दूसरे दिन, वह उनके साथ गया; और याफा के भाइयों में से कई उसके साथ हो लिए।

24     दूसरे दिन वे कैसरिया में पहुंचे।

25     जब पतरस भीतर आ रहा था, तो कुरनेलियुस ने उस से भेंट की, और पांवों पड़ के प्रणाम किया।

26     परन्तु पतरस ने उसे उठाकर कहा, खड़ा हो, मैं भी तो मनुष्य हूं।

28     उन से कहा, तुम जानते हो, कि अन्यजाति की संगति करना या उसके यहां जाना यहूदी के लिये अधर्म है, परन्तु परमेश्वर ने मुझे बताया है, कि किसी मनुष्य को अपवित्र था अशुद्ध न कहूं।

34     तब पतरस ने मुंह खोलकर कहा; अब मुझे निश्चय हुआ, कि परमेश्वर किसी का पक्ष नहीं करता:

35     वरन हर जाति में जो उस से डरता और धर्म के काम करता है, वह उसे भाता है।

4. Acts 10 : 1-5, 7-15, 19, 20, 23, 24 (to 1st .), 25, 26, 28, 34, 35

1     There was a certain man in Cæsarea called Cornelius, a centurion of the band called the Italian band,

2     A devout man, and one that feared God with all his house, which gave much alms to the people, and prayed to God alway.

3     He saw in a vision evidently about the ninth hour of the day an angel of God coming in to him, and saying unto him, Cornelius.

4     And when he looked on him, he was afraid, and said, What is it, Lord? And he said unto him, Thy prayers and thine alms are come up for a memorial before God.

5     And now send men to Joppa, and call for one Simon, whose surname is Peter:

7     And when the angel which spake unto Cornelius was departed, he called two of his household servants, and a devout soldier of them that waited on him continually;

8     And when he had declared all these things unto them, he sent them to Joppa.

9     On the morrow, as they went on their journey, and drew nigh unto the city, Peter went up upon the housetop to pray about the sixth hour:

10     And he became very hungry, and would have eaten: but while they made ready, he fell into a trance,

11     And saw heaven opened, and a certain vessel descending unto him, as it had been a great sheet knit at the four corners, and let down to the earth:

12     Wherein were all manner of fourfooted beasts of the earth, and wild beasts, and creeping things, and fowls of the air.

13     And there came a voice to him, Rise, Peter; kill, and eat.

14     But Peter said, Not so, Lord; for I have never eaten any thing that is common or unclean.

15     And the voice spake unto him again the second time, What God hath cleansed, that call not thou common.

19     While Peter thought on the vision, the Spirit said unto him, Behold, three men seek thee.

20     Arise therefore, and get thee down, and go with them, doubting nothing: for I have sent them.

23     Then called he them in, and lodged them. And on the morrow Peter went away with them, and certain brethren from Joppa accompanied him.

24     And the morrow after they entered into Cæsarea.

25     And as Peter was coming in, Cornelius met him, and fell down at his feet, and worshipped him.

26     But Peter took him up, saying, Stand up; I myself also am a man.

28     And he said unto them, Ye know how that it is an unlawful thing for a man that is a Jew to keep company, or come unto one of another nation; but God hath shewed me that I should not call any man common or unclean.

34     Then Peter opened his mouth, and said, Of a truth I perceive that God is no respecter of persons:

35     But in every nation he that feareth him, and worketh righteousness, is accepted with him.

5. 1 यूहन्ना 5: 2-4 (से :)

2     जब हम परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, और उस की आज्ञाओं को मानते हैं, तो इसी से हम जानते हैं, कि परमेश्वर की सन्तानों से प्रेम रखते हैं।

3     और परमेश्वर का प्रेम यह है, कि हम उस की आज्ञाओं को मानें; और उस की आज्ञाएं कठिन नहीं।

4     क्योंकि जो कुछ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है, और वह विजय जिस से संसार पर जय प्राप्त होती है हमारा विश्वास है।

5. I John 5 : 2-4 (to :)

2     By this we know that we love the children of God, when we love God, and keep his commandments.

3     For this is the love of God, that we keep his commandments: and his commandments are not grievous.

4     For whatsoever is born of God overcometh the world:

6. रोमियो 8: 28, 31, 35, 37-39

28     और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात उन्हीं के लिये जो उस की इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।

31     सो हम इन बातों के विषय में क्या कहें? यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है?

35     कौन हम को मसीह के प्रेम से अलग करेगा? क्या क्लेश, या संकट, या उपद्रव, या अकाल, या नंगाई, या जोखिम, या तलवार?

37     परन्तु इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिस ने हम से प्रेम किया है, जयवन्त से भी बढ़कर हैं।

38     क्योंकि मैं निश्चय जानता हूं, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ, न ऊंचाई,

39     न गहिराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी॥

6. Romans 8 : 28, 31, 35, 37-39

28     And we know that all things work together for good to them that love God, to them who are the called according to his purpose.

31     What shall we then say to these things? If God be for us, who can be against us?

35     Who shall separate us from the love of Christ? Shall tribulation, or distress, or persecution, or famine, or nakedness, or peril, or sword?

37     Nay, in all these things we are more than conquerors through him that loved us.

38     For I am persuaded, that neither death, nor life, nor angels, nor principalities, nor powers, nor things present, nor things to come,

39     Nor height, nor depth, nor any other creature, shall be able to separate us from the love of God, which is in Christ Jesus our Lord.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 572: 6-8, 12 (से,)

"आपस में प्रेम रखें" (1 यूहन्ना 3: 23), प्रेरित लेखक की सबसे सरल और गहन सलाह है।

प्रेम क्रिश्चियन साइंस के कानून को पूरा करता है।

1. 572 : 6-8, 12 (to ,)

"Love one another" (I John, iii. 23), is the most simple and profound counsel of the inspired writer.

Love fulfils the law of Christian Science,

2. 6: 17-18

"भगवान प्यार है।" इससे अधिक हम पूछ नहीं सकते, उच्च हम नहीं देख सकते हैं, आगे हम नहीं जा सकते।

2. 6 : 17-18

"God is Love." More than this we cannot ask, higher we cannot look, farther we cannot go.

3. 19: 6-11

यीशु ने मनुष्य को ईश्वर की शिक्षा, यीशु की शिक्षाओं के दिव्य सिद्धांत, और प्रेम के इस तुच्छ अर्थ को मनुष्य की आत्मा, के नियम, और मृत्यु के नियम से मनुष्य की मृत्यु के रूप में समझने की कोशिश की। ईश्वरीय प्रेम का नियम।

3. 19 : 6-11

Jesus aided in reconciling man to God by giving man a truer sense of Love, the divine Principle of Jesus' teachings, and this truer sense of Love redeems man from the law of matter, sin, and death by the law of Spirit, — the law of divine Love.

4. 516: 9-13

ईश्वर सभी चीजों का, उसकी अपनी समानता पर पक्षपात करता है। जीवन अस्तित्व में परिलक्षित होता है, सत्यता में सत्य, अच्छाई में ईश्वर, जो अपनी शांति और स्थायित्व प्रदान करता है। निःस्वार्थ भाव से प्यार, सुंदरता और रोशनी में नहाया हुआ।

4. 516 : 9-13

God fashions all things, after His own likeness. Life is reflected in existence, Truth in truthfulness, God in goodness, which impart their own peace and permanence. Love, redolent with unselfishness, bathes all in beauty and light.

5. 112: 32 (जैसा)-8

जैसा कि एक ईश्वर है, लेकिन सभी विज्ञानों का एक ईश्वरीय सिद्धांत हो सकता है; और इस ईश्वरीय सिद्धांत के प्रदर्शन के लिए निश्चित नियम होने चाहिए। विज्ञान का पत्र बहुतायत से आज मानवता तक पहुंचता है, लेकिन इसकी भावना केवल छोटी डिग्री में आती है। ईसाई विज्ञान का महत्वपूर्ण हिस्सा, हृदय और आत्मा, प्रेम है। इसके बिना यह पत्र विज्ञान का मृत शरीर, स्पंदनहीन, ठंडा, निर्जीव है।

5. 112 : 32 (As)-8

As there is but one God, there can be but one divine Principle of all Science; and there must be fixed rules for the demonstration of this divine Principle. The letter of Science plentifully reaches humanity to-day, but its spirit comes only in small degrees. The vital part, the heart and soul of Christian Science, is Love. Without this, the letter is but the dead body of Science, — pulseless, cold, inanimate.

6. 454: 10 (केवल), 17-24

प्रेम सिंहासन पर विराजमान है.

ईश्वर और मनुष्य के लिए प्यार हीलिंग और शिक्षण दोनों में सच्चा प्रोत्साहन है। प्रेम प्रेरणा देता है, रोशनी करता है, नामित करता है और मार्ग प्रशस्त करता है। सही इरादों ने विचार, और ताकत और बोलने और कार्रवाई करने की स्वतंत्रता को चुटकी दी। सत्य की वेदी पर प्रेम पुरोहिती है। दिव्य प्रेम के लिए धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करें नश्वर मन के पानी पर आगे बढ़ने के लिए, और सही अवधारणा बनाएं। धीरज "को अपना पूरा काम करने दो॥"

6. 454 : 10 only, 17-24

Love is enthroned.

Love for God and man is the true incentive in both healing and teaching. Love inspires, illumines, designates, and leads the way. Right motives give pinions to thought, and strength and freedom to speech and action. Love is priestess at the altar of Truth. Wait patiently for divine Love to move upon the waters of mortal mind, and form the perfect concept. Patience must "have her perfect work."

7. 57: 22-30

मानवीय स्नेह व्यर्थ नहीं बहाया जाता, भले ही उसका कोई प्रतिफल नहीं मिलता। प्रेम प्रकृति को समृद्ध करता है, बड़ा करता है, शुद्ध करता है और उसे उन्नत करता है। पृथ्वी के ठंढे धमाके स्नेह के फूलों को उखाड़ सकते हैं, और उन्हें हवाओं में बिखेर सकते हैं; लेकिन शारीरिक संबंधों का यह विचलन ईश्वर के प्रति अधिक निकटता से विचार करने का कार्य करता है, क्योंकि प्रेम संघर्षशील हृदय का समर्थन करता है, जब तक कि वह दुनिया को छोड़ नहीं देता और स्वर्ग के लिए अपने पंखों को खोलना शुरू कर देता है।

7. 57 : 22-30

Human affection is not poured forth vainly, even though it meet no return. Love enriches the nature, enlarging, purifying, and elevating it. The wintry blasts of earth may uproot the flowers of affection, and scatter them to the winds; but this severance of fleshly ties serves to unite thought more closely to God, for Love supports the struggling heart until it ceases to sigh over the world and begins to unfold its wings for heaven.

8. 266: 6-19

क्या व्यक्तिगत मित्रों के बिना अस्तित्व आपके लिए शून्य होगा? तब वह समय आएगा जब तुम अकेले हो जाओगे, सहानुभूति के बिना रह जाओगे; लेकिन यह प्रतीत होने वाला शून्य पहले से ही दिव्य प्रेम से भरा हुआ है। जब विकास का यह समय आता है, भले ही आप व्यक्तिगत खुशियों की भावना में व्यस्त रहें, आध्यात्मिक प्रेम आपको वह स्वीकार करने के लिए मजबूर करेगा जो आपके विकास को सबसे अच्छा बढ़ावा देता है। मित्र विश्वासघात करेंगे और शत्रु बदनामी करेंगे, जब तक कि सबक तुम्हें ऊँचा उठाने के लिए पर्याप्त न हो; क्योंकि "मनुष्य का चरम ईश्वर का अवसर है।" लेखक ने उपरोक्त भविष्यवाणी और उसके आशीर्वाद का अनुभव किया है। इस प्रकार वह मनुष्यों को अपनी शारीरिकता त्यागने और आध्यात्मिकता प्राप्त करने की शिक्षा देता है। यह आत्म-त्याग के माध्यम से किया जाता है। सार्वभौमिक प्रेम क्रिश्चियन साइंस में दिव्य मार्ग है।

8. 266 : 6-19

Would existence without personal friends be to you a blank? Then the time will come when you will be solitary, left without sympathy; but this seeming vacuum is already filled with divine Love. When this hour of development comes, even if you cling to a sense of personal joys, spiritual Love will force you to accept what best promotes your growth. Friends will betray and enemies will slander, until the lesson is sufficient to exalt you; for "man's extremity is God's opportunity." The author has experienced the foregoing prophecy and its blessings. Thus He teaches mortals to lay down their fleshliness and gain spirituality. This is done through self-abnegation. Universal Love is the divine way in Christian Science.

9. 242: 15-20

स्व-प्रेम एक ठोस शरीर की तुलना में अधिक अपारदर्शी है। एक रोगी ईश्वर की आज्ञाकारिता में, प्रेम के सार्वभौमिक विलायक के साथ भंग करने के लिए हमें श्रम करना चाहिए, - आत्म-इच्छा, आत्म-औचित्य, और आत्म-प्रेम, - जो आध्यात्मिकता के खिलाफ युद्ध करता है और पाप का कानून मौत।

9. 242 : 15-20

Self-love is more opaque than a solid body. In patient obedience to a patient God, let us labor to dissolve with the universal solvent of Love the adamant of error, — self-will, self-justification, and self-love, — which wars against spirituality and is the law of sin and death.

10. 234: 4-16

जो कुछ भी ज्ञान, सत्य, या प्रेम से प्रेरित होता है - चाहे वह गीत हो, उपदेश हो, या विज्ञान हो - मानव परिवार को मसीह की मेज से आराम के टुकड़ों का आशीर्वाद देता है, भूखे को खाना खिलाता है और प्यासे को जीवित जल देता है।

हमें बुराई की तुलना में अच्छाई से अधिक परिचित होना चाहिए, और झूठी मान्यताओं से उसी तरह सतर्क रहना चाहिए जैसे हम चोरों और हत्यारों के सामने अपने दरवाजे बंद कर लेते हैं। हमें अपने शत्रुओं से प्रेम करना चाहिए और स्वर्णिम नियम के आधार पर उनकी सहायता करनी चाहिए; परन्तु उन लोगों के सामने मोती फेंकने से बचें जो उन्हें पैरों तले रौंदते हैं, जिससे वे स्वयं और दूसरों दोनों को लूटते हैं।

10. 234 : 4-16

Whatever inspires with wisdom, Truth, or Love — be it song, sermon, or Science — blesses the human family with crumbs of comfort from Christ's table, feeding the hungry and giving living waters to the thirsty.

We should become more familiar with good than with evil, and guard against false beliefs as watchfully as we bar our doors against the approach of thieves and murderers. We should love our enemies and help them on the basis of the Golden Rule; but avoid casting pearls before those who trample them under foot, thereby robbing both themselves and others.

11. 326: 8-14

सभी प्रकृति मनुष्य को ईश्वर का प्यार सिखाती है, लेकिन मनुष्य ईश्वर से प्रेम नहीं कर सकता है और आध्यात्मिक चीजों पर अपना पूरा प्यार कायम कर सकता है, जबकि सामग्री से प्रेम कर सकता है या आध्यात्मिक से अधिक उस पर भरोसा कर सकता है।

हमें भौतिक प्रणालियों की नींव का त्याग करना चाहिए, केवल समय-सम्मानित, अगर हम अपने एकमात्र उद्धारकर्ता के रूप में मसीह को प्राप्त करेंगे।

11. 326 : 8-14

All nature teaches God's love to man, but man cannot love God supremely and set his whole affections on spiritual things, while loving the material or trusting in it more than in the spiritual.

We must forsake the foundation of material systems, however time-honored, if we would gain the Christ as our only Saviour.

12. 88: 18-20

अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना एक दिव्य विचार है; लेकिन इस विचार को भौतिक इंद्रियों के माध्यम से कभी देखा, महसूस नहीं किया जा सकता, न ही समझा जा सकता है।

12. 88 : 18-20

To love one's neighbor as one's self, is a divine idea; but this idea can never be seen, felt, nor understood through the physical senses.

13. 239: 5-10, 16-22

धन, प्रसिद्धि और सामाजिक संगठनों को दूर करें, जो भगवान के संतुलन में एक भी वजन नहीं करते हैं, तब हमें सिद्धांत के स्पष्ट विचार मिलते हैं। गुटबंदी तोड़ो, ईमानदारी के साथ धन कमाओ, ज्ञान के अनुसार न्याय करने दो, फिर हमें मानवता के बारे में बेहतर विचार मिलेंगे।

अपनी प्रगति का पता लगाने के लिए, हमें यह सीखना चाहिए कि हमारे साथ हमारे संबंध किससे हैं और हम किसको स्वीकार करते हैं और ईश्वर के रूप में मानते हैं। यदि ईश्वरीय प्रेम निकट, प्रिय, और अधिक वास्तविक होता जा रहा है, तब पदार्थ आत्मा को सौंप रहा है। जिन वस्तुओं का हम अनुसरण करते हैं और जो आत्मा हम प्रकट करते हैं वह हमारे दृष्टिकोण को प्रकट करती है, और दिखाते हैं कि हम क्या जीत रहे हैं।

13. 239 : 5-10, 16-22

Take away wealth, fame, and social organizations, which weigh not one jot in the balance of God, and we get clearer views of Principle. Break up cliques, level wealth with honesty, let worth be judged according to wisdom, and we get better views of humanity.

To ascertain our progress, we must learn where our affections are placed and whom we acknowledge and obey as God. If divine Love is becoming nearer, dearer, and more real to us, matter is then submitting to Spirit. The objects we pursue and the spirit we manifest reveal our standpoint, and show what we are winning.

14. 518: 13-23

ईश्वर स्वयं का विचार देता है, अधिक के लिए कम करने के लिए, और बदले में, उच्च हमेशा कम की रक्षा करता है। सभी को एक ही सिद्धांत, या पिता, को एक भव्य भाईचारे में रखते हुए, आत्मा में समृद्ध गरीबों की मदद करते हैं। और धन्य है वह आदमी जो दूसरे की भलाई में अपनी भलाई जानता है, अपने भाई की आवश्यकता को देखता है और उसकी आपूर्ति करता है। प्रेम कमजोर आध्यात्मिक को, अमरता, और अच्छाई देता है, जो सभी के माध्यम से चमकता है जैसे कि कली के माध्यम से खिलता है। ईश्वर की सभी विविध अभिव्यक्तियाँ स्वास्थ्य, पवित्रता, अमरता - अनंत जीवन, सत्य और प्रेम को दर्शाती हैं।

14. 518 : 13-23

God gives the lesser idea of Himself for a link to the greater, and in return, the higher always protects the lower. The rich in spirit help the poor in one grand brotherhood, all having the same Principle, or Father; and blessed is that man who seeth his brother's need and supplieth it, seeking his own in another's good. Love giveth to the least spiritual idea might, immortality, and goodness, which shine through all as the blossom shines through the bud. All the varied expressions of God reflect health, holiness, immortality — infinite Life, Truth, and Love.

15. 45: 16-21

भगवान की जय हो, और संघर्षशील दिलों को शांति मिले! मसीह ने मानव आशा और विश्वास के द्वार से पत्थर को लुढ़का दिया, और ईश्वर में जीवन के रहस्योद्घाटन और प्रदर्शन के माध्यम से, उन्हें मनुष्य के आध्यात्मिक विचार और उनके दिव्य सिद्धांत, प्रेम के साथ संभवतया एक-मानसिक रूप से उन्नत किया।

15. 45 : 16-21

Glory be to God, and peace to the struggling hearts! Christ hath rolled away the stone from the door of human hope and faith, and through the revelation and demonstration of life in God, hath elevated them to possible at-one-ment with the spiritual idea of man and his divine Principle, Love.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6