रविवार 4 अगस्त, 2019 |

रविवार 4 अगस्त, 2019



विषयप्रेम

SubjectLove

वर्ण पाठ: रोमियो 8 : 28

जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है।



Golden Text: Romans 8 : 28

All things work together for good to them that love God.




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I यूहन्ना 4 : 7-12


7     हे प्रियों, हम तुम में प्रेम रखो; क्योंकि प्रेम परमेश्वर से है: और जो कोई प्रेम नहीं करता, वह भगवान से जन्मा है; और भगवान को पता है।

8     जो प्रेम नहीं रखता, वह भगवान को नहीं जानता, क्योंकि भगवान प्रेम है।

9     जो प्रेम भगवान हम से रखता है, वह इस से प्रकट हुआ, कि भगवान ने अपने एकलौते पुत्र को अवतार में भेजा है, कि हम उसके द्वारा जीवन पाएं।

10     प्रेम इस में नहीं कि हमने भगवान को प्रेम किया है; पर इस में है, कि उसने हम से प्रेम किया; और हमारे पापों के प्रायश्चित्त के लिए अपने पुत्र को भेजा।

11     हे प्रियो, जब भगवान ने हम से ऐसा प्रेम किया, तो हम को भी आपस में प्रेम रखना चाहिए।

12     भगवान को कभी किसी ने नहीं देखा; यदि हम आपस में प्रेम रखते हैं, तो परमेश्वर हम में बना रहता है; और उसका प्रेम हम में अनुक्रम हो गया है।

Responsive Reading: I John 4 : 7-12

7.     Beloved, let us love one another: for love is of God; and every one that loveth is born of God, and knoweth God.

8.     He that loveth not knoweth not God; for God is love.

9.     In this was manifested the love of God toward us, because that God sent his only begotten Son into the world, that we might live through him.

10.     Herein is love, not that we loved God, but that he loved us, and sent his Son to be the propitiation for our sins.

11.     Beloved, if God so loved us, we ought also to love one another.

12.     No man hath seen God at any time. If we love one another, God dwelleth in us, and his love is perfected in us.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यिर्मयाह 31 : 3

3     यहोवा ने मुझे दूर से दर्शन देकर कहा है। मैं तुझ से सदा प्रेम रखता आया हूँ; इस कारण मैं ने तुझ पर अपनी करुणा बनाए रखी है।

1. Jeremiah 31 : 3

3     The Lord hath appeared of old unto me, saying, Yea, I have loved thee with an everlasting love: therefore with lovingkindness have I drawn thee.

2. भजन संहिता 36 : 7

7     हे परमेश्वर तेरी करूणा, कैसी अनमोल है! मनुष्य तेरे पंखो के तले शरण लेते हैं।

2. Psalm 36 : 7

7     How excellent is thy lovingkindness, O God! therefore the children of men put their trust under the shadow of thy wings.

3. I शमूएल 17 : 57 (जैसा) (शाऊल को), 58

57     जब दाऊद पलिश्ती को मारकर लौटा, तब अब्नेर ने उसे पलिश्ती का सिर हाथ में लिए हुए शाऊल के साम्हने पहुंचाया।

58     शाऊल ने उस से पूछा, हे जवान, तू किस का पुत्र है? दाऊद ने कहा, मैं तो तेरे दास बेतलेहेमी यिशै का पुत्र हूं॥

3. I Samuel 17 : 57 (as) (to Saul), 58

57     …as David returned from the slaughter of the Philistine, Abner took him, and brought him before Saul…

58     And Saul said to him, Whose son art thou, thou young man? And David answered, I am the son of thy servant Jesse the Beth-lehemite.

4. I शमूएल 18 : 1, 3, 4, 6 (घटित होना), 6 (कि)-9

1     जब वह शाऊल से बातें कर चुका, तब योनातान का मन दाऊद पर ऐसा लग गया, कि योनातान उसे अपने प्राण के बराबर प्यार करने लगा।

3     तब योनातान ने दाऊद से वाचा बान्धी, क्योंकि वह उसको अपने प्राण के बराबर प्यार करता था।

4     और योनातान ने अपना बागा जो वह स्वयं पहिने था उतारकर अपने वस्त्र समेत दाऊद को दे दिया, वरन अपनी तलवार और धनुष और कटिबन्ध भी उसको दे दिए।

6     जब दाऊद उस पलिश्ती को मारकर लौटा आता था, और वे सब लोग भी आ रहे थे, तब सब इस्राएली नगरों से स्त्रियों ने निकलकर डफ और तिकोने बाजे लिए हुए, आनन्द के साथ गाती और नाचती हुई, शाऊल राजा के स्वागत में निकलीं।

7     और वे स्त्रियां नाचती हुइ एक दूसरी के साथ यह गाती गईं, कि शाऊल ने तो हजारों को, परन्तु दाऊद ने लाखों को मारा है॥

8     तब शाऊल अति क्रोधित हुआ, और यह बात उसको बुरी लगी; और वह कहने लगा, उन्होंने दाऊद के लिये तो लाखों और मेरे लिये हजारों को ठहराया; इसलिये अब राज्य को छोड़ उसको अब क्या मिलना बाकी है?

9     तब उस दिन से भविष्य में शाऊल दाऊद की ताक में लगा रहा॥

4. I Samuel 18 : 1, 3, 4, 6 (to pass), 6 (that)-9

1     And it came to pass, when he had made an end of speaking unto Saul, that the soul of Jonathan was knit with the soul of David, and Jonathan loved him as his own soul.

3     Then Jonathan and David made a covenant, because he loved him as his own soul.

4     And Jonathan stripped himself of the robe that was upon him, and gave it to David, and his garments, even to his sword, and to his bow, and to his girdle.

6     And it came to pass … that the women came out of all cities of Israel, singing and dancing, to meet king Saul, with tabrets, with joy, and with instruments of musick.

7     And the women answered one another as they played, and said, Saul hath slain his thousands, and David his ten thousands.

8     And Saul was very wroth, and the saying displeased him; and he said, They have ascribed unto David ten thousands, and to me they have ascribed but thousands: and what can he have more but the kingdom?

9     And Saul eyed David from that day and forward.

5. I शमूएल 19 : 1, 2

1     और शाऊल ने अपने पुत्र योनातन और अपने सब कर्मचारियों से दाऊद को मार डालने की चर्चा की। परन्तु शाऊल का पुत्र योनातन दाऊद से बहुत प्रसन्न था।

2     और योनातन ने दाऊद को बताया, कि मेरा पिता तुझे मरवा डालना चाहता है; इसलिये तू बिहान को सावधान रहना, और किसी गुप्त स्थान में बैठा हुआ छिपा रहना;

5. I Samuel 19 : 1, 2

1     And Saul spake to Jonathan his son, and to all his servants, that they should kill David.

2     But Jonathan Saul’s son delighted much in David: and Jonathan told David, saying, Saul my father seeketh to kill thee: now therefore, I pray thee, take heed to thyself until the morning, and abide in a secret place, and hide thyself:

6. I शमूएल 23: 14, 16-18 (से :)

14     जब दाऊद जो जंगल के गढ़ों में रहने लगा, और पहाड़ी देश के जीप नाम जंगल में रहा। और शाऊल उसे प्रति दिन ढूंढ़ता रहा, परन्तु परमेश्वर ने उसे उसके हाथ में न पड़ने दिया।

16     कि शाऊल का पुत्र योनातन उठ कर उसके पास होरेश में गया, और परमेश्वर की चर्चा करके उसको ढाढ़स दिलाया।

17     उसने उस से कहा, मत डर; क्योंकि तू मेरे पिता शाऊल के हाथ में न पड़ेगा; और तू ही इस्राएल का राजा होगा, और मैं तेरे नीचे हूंगा; और इस बात को मेरा पिता शाऊल भी जानता है।

18     तब उन दोनों ने यहोवा की शपथ खाकर आपस में वाचा बान्धी;

6. I Samuel 23 : 14, 16-18 (to :)

14     And David abode in the wilderness in strong holds, and remained in a mountain in the wilderness of Ziph. And Saul sought him every day, but God delivered him not into his hand.

16     And Jonathan Saul’s son arose, and went to David into the wood, and strengthened his hand in God.

17     And he said unto him, Fear not: for the hand of Saul my father shall not find thee; and thou shalt be king over Israel, and I shall be next unto thee; and that also Saul my father knoweth.

18     And they two made a covenant before the Lord:

7. मत्ती 4 : 23 (यीशु) (से 3rd ,)

23 और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

7. Matthew 4 : 23 (Jesus) (to 3rd ,)

23     Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom,

8. मत्ती 5 : 1, 2, 43-48

1     वह इस भीड़ को देखकर, पहाड़ पर चढ़ गया; और जब बैठ गया तो उसके चेले उसके पास आए।

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

43     तुम सुन चुके हो, कि कहा गया था; कि अपने पड़ोसी से प्रेम रखना, और अपने बैरी से बैर।

44     परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सताने वालों के लिये प्रार्थना करो।

45     जिस से तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे क्योंकि वह भलों और बुरों दोनो पर अपना सूर्य उदय करता है, और धमिर्यों और अधमिर्यों दोनों पर मेंह बरसाता है।

46     क्योंकि यदि तुम अपने प्रेम रखने वालों ही से प्रेम रखो, तो तु म्हारे लिये क्या फल होगा? क्या महसूल लेने वाले भी ऐसा ही नहीं करते?

47     और यदि तुम केवल अपने भाइयों ही को नमस्कार करो, तो कौन सा बड़ा काम करते हो? क्या अन्यजाति भी ऐसा नहीं करते?

48     इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है॥

8. Matthew 5 : 1, 2, 43-48

1     And seeing the multitudes, he went up into a mountain: and when he was set, his disciples came unto him:

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

43     Ye have heard that it hath been said, Thou shalt love thy neighbour, and hate thine enemy.

44     But I say unto you, Love your enemies, bless them that curse you, do good to them that hate you, and pray for them which despitefully use you, and persecute you;

45     That ye may be the children of your Father which is in heaven: for he maketh his sun to rise on the evil and on the good, and sendeth rain on the just and on the unjust.

46     For if ye love them which love you, what reward have ye? do not even the publicans the same?

47     And if ye salute your brethren only, what do ye more than others? do not even the publicans so?

48     Be ye therefore perfect, even as your Father which is in heaven is perfect.

9. मत्ती 20 : 30-34

30     और देखो, दो अन्धे, जो सड़कर के किनारे बैठे थे, यह सुनकर कि यीशु जा रहा है, पुकारकर कहने लगे; कि हे प्रभु, दाऊद की सन्तान, हम पर दया कर।

31     लोगों ने उन्हें डांटा, कि चुप रहें, पर वे और भी चिल्लाकर बोले, हे प्रभु, दाऊद की सन्तान, हम पर दया कर।

32     तब यीशु ने ख़ड़े होकर, उन्हें बुलाया, और कहा;

33     तुम क्या चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये करूं? उन्हों ने उस से कहा, हे प्रभु; यह कि हमारी आंखे खुल जाएं।

34     यीशु ने तरस खाकर उन की आंखे छूई, और वे तुरन्त देखने लगे; और उसके पीछे हो लिए॥

9. Matthew 20 : 30-34

30     And, behold, two blind men sitting by the way side, when they heard that Jesus passed by, cried out, saying, Have mercy on us, O Lord, thou Son of David.

31     And the multitude rebuked them, because they should hold their peace: but they cried the more, saying, Have mercy on us, O Lord, thou Son of David.

32     And Jesus stood still, and called them, and said, What will ye that I shall do unto you?

33     They say unto him, Lord, that our eyes may be opened.

34     So Jesus had compassion on them, and touched their eyes: and immediately their eyes received sight, and they followed him.

10. यूहन्ना 15 : 8, 9, 12

8     मेरे पिता की महिमा इसी से होती है, कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे।

9     जैसा पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही मैं ने तुम से प्रेम रखा, मेरे प्रेम में बने रहो।

12     मेरी आज्ञा यह है, कि जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो।

10. John 15 : 8, 9, 12

8     Herein is my Father glorified, that ye bear much fruit; so shall ye be my disciples.

9     As the Father hath loved me, so have I loved you: continue ye in my love.

12     This is my commandment, That ye love one another, as I have loved you.

11. रोमियो 8 : 35, 37-39

35     कौन हम को मसीह के प्रेम से अलग करेगा? क्या क्लेश, या संकट, या उपद्रव, या अकाल, या नंगाई, या जोखिम, या तलवार?

37     परन्तु इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिस ने हम से प्रेम किया है, जयवन्त से भी बढ़कर हैं।

38     क्योंकि मैं निश्चय जानता हूं, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ, न ऊंचाई,

39     न गहिराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी॥

11. Romans 8 : 35, 37-39

35     Who shall separate us from the love of Christ? shall tribulation, or distress, or persecution, or famine, or nakedness, or peril, or sword?

37     Nay, in all these things we are more than conquerors through him that loved us.

38     For I am persuaded, that neither death, nor life, nor angels, nor principalities, nor powers, nor things present, nor things to come,

39     Nor height, nor depth, nor any other creature, shall be able to separate us from the love of God, which is in Christ Jesus our Lord.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 243 : 4-13

दैवीय प्रेम, जिसने जहरीली सांप को हानिरहित बना दिया, जिसने उबलते हुए तेल से पुरुषों को ज्वलंत भट्ठी से, शेर के जबड़े से, हर उम्र में बीमार और पाप और विजय से मृत्यु तक पहुंचाया। इसने नायाब शक्ति और प्रेम के साथ यीशु के प्रदर्शनों को ताज पहनाया। लेकिन भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के प्राचीन प्रदर्शनों की पुष्टि करने और उन्हें दोहराने के लिए उसी "मन ... जो मसीह यीशु में भी था" हमेशा विज्ञान के पत्र के साथ होना चाहिए।

1. 243 : 4-13

The divine Love, which made harmless the poisonous viper, which delivered men from the boiling oil, from the fiery furnace, from the jaws of the lion, can heal the sick in every age and triumph over sin and death. It crowned the demonstrations of Jesus with unsurpassed power and love. But the same “Mind … which was also in Christ Jesus” must always accompany the letter of Science in order to confirm and repeat the ancient demonstrations of prophets and apostles.

2. 112 : 32-6

ईश्वर दिव्य तत्वमीमांसा का सिद्धांत है। जैसा कि एक ईश्वर है, लेकिन सभी विज्ञानों का एक ईश्वरीय सिद्धांत हो सकता है; और इस ईश्वरीय सिद्धांत के प्रदर्शन के लिए निश्चित नियम होने चाहिए। विज्ञान का पत्र बहुतायत से आज मानवता तक पहुंचता है, लेकिन इसकी भावना केवल छोटी डिग्री में आती है। ईसाई विज्ञान का महत्वपूर्ण हिस्सा, हृदय और आत्मा, प्रेम है।

2. 112 : 32-6

God is the Principle of divine metaphysics. As there is but one God, there can be but one divine Principle of all Science; and there must be fixed rules for the demonstration of this divine Principle. The letter of Science plentifully reaches humanity to-day, but its spirit comes only in small degrees. The vital part, the heart and soul of Christian Science, is Love.

3. 285 : 23-31

ईश्वर को एक कॉर्पोरल उद्धारकर्ता के रूप में व्याख्या करने के लिए लेकिन बचत सिद्धांत या ईश्वरीय प्रेम के रूप में नहीं, हम क्षमा के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करना जारी रखेंगे, न कि सुधार के माध्यम से, और बीमारों के इलाज के लिए आत्मा के बजाय मामले का सहारा लेंगे। जैसा कि नश्वर तक पहुँचते हैं, क्रिश्चियन साइंस के ज्ञान के माध्यम से, एक उच्च भावना, वे सीखने की तलाश करेंगे, न कि पदार्थ से, बल्कि ईश्वरीय सिद्धांत से, ईश्वर, मसीह, सत्य, को उपचार और बचत शक्ति के रूप में कैसे प्रदर्शित करें।

3. 285 : 23-31

By interpreting God as a corporeal Saviour but not as the saving Principle, or divine Love, we shall continue to seek salvation through pardon and not through reform, and resort to matter instead of Spirit for the cure of the sick. As mortals reach, through knowledge of Christian Science, a higher sense, they will seek to learn, not from matter, but from the divine Principle, God, how to demonstrate the Christ, Truth, as the healing and saving power.

4. 454 : 17-23

ईश्वर और मनुष्य के लिए प्यार हीलिंग और शिक्षण दोनों में सच्चा प्रोत्साहन है। प्रेम प्रेरणा देता है, रोशनी करता है, नामित करता है और मार्ग प्रशस्त करता है। सही इरादों ने विचार, और ताकत और बोलने और कार्रवाई करने की स्वतंत्रता को चुटकी दी। सत्य की वेदी पर प्रेम पुरोहिती है। दिव्य प्रेम के लिए धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करें नश्वर मन के पानी पर आगे बढ़ने के लिए, और सही अवधारणा बनाएं।

4. 454 : 17-23

Love for God and man is the true incentive in both healing and teaching. Love inspires, illumines, designates, and leads the way. Right motives give pinions to thought, and strength and freedom to speech and action. Love is priestess at the altar of Truth. Wait patiently for divine Love to move upon the waters of mortal mind, and form the perfect concept.

5. 230 : 1-10

यदि बीमारी वास्तविक है, तो यह अमरता से संबंधित है; अगर यह सच है, यह सत्य का एक हिस्सा है। क्या आप सत्य की गुणवत्ता या स्थिति को नष्ट करने के लिए दवाओं के साथ या बिना प्रयास करेंगे? लेकिन अगर बीमारी और पाप भ्रम हैं, तो इस नश्वर सपने से जागृति, या भ्रम, हमें स्वास्थ्य, पवित्रता और अमरता में लाएगा। यह जागृति हमेशा के लिए मसीह के आने की है, सत्य का उन्नत रूप है, जो त्रुटि को बाहर निकालता है और बीमारों को ठीक करता है। यह वह मोक्ष है जो ईश्वर, ईश्वरीय सिद्धांत और प्रेम के माध्यम से आता है, जैसा कि यीशु द्वारा प्रदर्शित किया गया है।

5. 230 : 1-10

If sickness is real, it belongs to immortality; if true, it is a part of Truth. Would you attempt with drugs, or without, to destroy a quality or condition of Truth? But if sickness and sin are illusions, the awakening from this mortal dream, or illusion, will bring us into health, holiness, and immortality. This awakening is the forever coming of Christ, the advanced appearing of Truth, which casts out error and heals the sick. This is the salvation which comes through God, the divine Principle, Love, as demonstrated by Jesus.

6. 366 : 12-19

जिस चिकित्सक को अपने साथी के प्रति सहानुभूति की कमी है, वह मानवीय स्नेह में कमी है, और हमारे पास पूछने के लिए एपोस्टोलिक वारंट है "जो अपने भाई से, जिस उस ने देखा है, प्रेम नहीं रखता, तो वह परमेश्वर से भी जिसे उस ने नहीं देखा, प्रेम नहीं रख सकता।" इस आध्यात्मिक स्नेह के न होने पर, चिकित्सक को दिव्य मन में विश्वास की कमी है और असीम प्रेम की मान्यता नहीं है जो अकेले ही चिकित्सा शक्ति प्रदान करता है।

6. 366 : 12-19

The physician who lacks sympathy for his fellow-being is deficient in human affection, and we have the apostolic warrant for asking: “He that loveth not his brother whom he hath seen, how can he love God whom he hath not seen?” Not having this spiritual affection, the physician lacks faith in the divine Mind and has not that recognition of infinite Love which alone confers the healing power.

7. 248 : 26-32

हमें विचार में आदर्श मॉडल बनाना चाहिए और उन्हें लगातार देखना चाहिए, या हम उन्हें भव्य और महान जीवन में कभी नहीं उकेरेंगे। निःस्वार्थता, अच्छाई, दया, न्याय, स्वास्थ्य, पवित्रता, प्रेम - स्वर्ग का राज्य - हमारे भीतर राज करो, और पाप, बीमारी, और मृत्यु तब तक कम हो जाएगी जब तक वे अंततः गायब नहीं हो जाते।

7. 248 : 26-32

We must form perfect models in thought and look at them continually, or we shall never carve them out in grand and noble lives. Let unselfishness, goodness, mercy, justice, health, holiness, love — the kingdom of heaven — reign within us, and sin, disease, and death will diminish until they finally disappear.

8. 326 : 3-11

यदि हम मसीह, सत्य का पालन करना चाहते हैं, तो यह भगवान की नियुक्ति के रास्ते में होना चाहिए। यीशु ने यह कहा: "कि जो मुझ पर विश्वास रखता है, ये काम जो मैं करता हूं वह भी करेगा।" वह, जो स्रोत तक पहुंच जाएगा और हर बीमार के लिए दिव्य उपाय ढूंढेगा, उसे किसी अन्य सड़क से विज्ञान की पहाड़ी पर चढ़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। सभी प्रकृति मनुष्य को ईश्वर का प्यार सिखाती है, लेकिन मनुष्य ईश्वर से प्रेम नहीं कर सकता है और आध्यात्मिक चीजों पर अपना पूरा प्यार कायम कर सकता है, जबकि सामग्री से प्रेम कर सकता है या आध्यात्मिक से अधिक उस पर भरोसा कर सकता है।

8. 326 : 3-11

If we wish to follow Christ, Truth, it must be in the way of God’s appointing. Jesus said, “He that believeth on me, the works that I do shall he do also.” He, who would reach the source and find the divine remedy for every ill, must not try to climb the hill of Science by some other road. All nature teaches God’s love to man, but man cannot love God supremely and set his whole affections on spiritual things, while loving the material or trusting in it more than in the spiritual.

9. 304 : 3-15

यह अज्ञानता और असत्य विश्वास है, भौतिक वस्तुओं पर आधारित है, जो आध्यात्मिक सुंदरता और अच्छाई को छिपाते हैं। इसे समझते हुए, पॉल ने कहा: "न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ, न ऊंचाई, न गहिराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से.... अलग कर सकेगी॥" यह क्रिश्चियन साइंस का सिद्धांत है: उस दिव्य प्रेम को उसकी अभिव्यक्ति, या वस्तु से वंचित नहीं किया जा सकता है; वह आनन्द दुःख में नहीं बदल सकता, क्योंकि दुःख आनन्द का स्वामी नहीं है; वह अच्छाई कभी बुराई पैदा नहीं कर सकती; वह पदार्थ कभी भी मन उत्पन्न नहीं कर सकता है और न ही जीवन का परिणाम मृत्यु है। पूर्ण पुरुष - भगवान द्वारा शासित, उनका सिद्ध सिद्धांत - पाप रहित और शाश्वत है।

9. 304 : 3-15

It is ignorance and false belief, based on a material sense of things, which hide spiritual beauty and goodness. Understanding this, Paul said: “Neither death, nor life, … nor things present, nor things to come, nor height, nor depth, nor any other creature, shall be able to separate us from the love of God.” This is the doctrine of Christian Science: that divine Love cannot be deprived of its manifestation, or object; that joy cannot be turned into sorrow, for sorrow is not the master of joy; that good can never produce evil; that matter can never produce mind nor life result in death. The perfect man — governed by God, his perfect Principle — is sinless and eternal.

10. 410 : 14-21

ईश्वर में हमारी आस्था का हर परीक्षण हमें मजबूत बनाता है। आत्मा से पार पाने के लिए भौतिक स्थिति जितनी कठिन लगती है, उतनी ही मजबूत हमारे विश्वास और हमारे प्रेम को शुद्ध करना चाहिए। प्रेरित यूहन्ना कहता है: "प्रेम में भय नहीं होता, वरन सिद्ध प्रेम भय को दूर कर देता है, ... जो भय करता है, वह प्रेम में सिद्ध नहीं हुआ।" यहाँ क्रिश्चियन साइंस की एक निश्चित और प्रेरित घोषणा है।

10. 410 : 14-21

Every trial of our faith in God makes us stronger. The more difficult seems the material condition to be overcome by Spirit, the stronger should be our faith and the purer our love. The Apostle John says: “There is no fear in Love, but perfect Love casteth out fear. … He that feareth is not made perfect in Love.” Here is a definite and inspired proclamation of Christian Science.

11. 286 : 9-15

मास्टर ने कहा, "बिना मेरे द्वारा कोई पिता (होने का दिव्य सिद्धांत) के पास नहीं पहुंच सकता।" मसीह, जीवन, सत्य, प्रेम के बिना; क्योंकि मसीह कहता है: "मार्ग मैं हूं." इस मूल पुरुष, यीशु द्वारा पहले से लेकर आखिर तक शारीरिक कार्य को अलग रखा गया था। वह जानता था कि दिव्य सिद्धांत, प्रेम, वास्तविक सब कुछ बनाता और संचालित करता है।

11. 286 : 9-15

The Master said, “No man cometh unto the Father [the divine Principle of being] but by me,” Christ, Life, Truth, Love; for Christ says, “I am the way.” Physical causation was put aside from first to last by this original man, Jesus. He knew that the divine Principle, Love, creates and governs all that is real.

12. 265 : 3-15

मनुष्य आध्यात्मिक अस्तित्व को उसी अनुपात में समझता है जैसा कि सत्य और प्रेम के खजाने हैं। मनुष्यों को ईश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए, उनका स्नेह और उद्देश्य आध्यात्मिक रूप से विकसित होना चाहिए, - उन्हें होने की व्यापक व्याख्याओं के पास होना चाहिए, और अनंत के कुछ उचित अर्थों को प्राप्त करना चाहिए, - ताकि पाप और मृत्यु दर को दूर किया जा सके।

किसी भी तरह से, आत्मा के लिए कुछ भी होने का यह वैज्ञानिक अर्थ, मनुष्य को देवता में अवशोषण और उसकी पहचान के नुकसान का सुझाव देता है, लेकिन मनुष्य में बढ़े हुए व्यक्तित्व, विचार और कर्म का व्यापक क्षेत्र, एक अधिक विस्तृत प्रेम, एक उच्च और अधिक स्थायी शांति।

12. 265 : 3-15

Man understands spiritual existence in proportion as his treasures of Truth and Love are enlarged. Mortals must gravitate Godward, their affections and aims grow spiritual, — they must near the broader interpretations of being, and gain some proper sense of the infinite, — in order that sin and mortality may be put off.

This scientific sense of being, forsaking matter for Spirit, by no means suggests man’s absorption into Deity and the loss of his identity, but confers upon man enlarged individuality, a wider sphere of thought and action, a more expansive love, a higher and more permanent peace.

13. 225 : 21-22

Love is the liberator.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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