रविवार 30 अक्टूबर, 2022



विषयहमेशा की सजा

SubjectEverlasting Punishment

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: 1 यूहन्ना 4: 8

"परमेश्वर प्रेम है।"



Golden Text: I John 4 : 8

God is love.




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उत्तरदायी अध्ययन: 1 यूहन्ना 3: 11, 14, 16-18


11     क्योंकि जो समाचार तुम ने आरम्भ से सुना, वह यह है, कि हम एक दूसरे से प्रेम रखें।

14     हम जानते हैं, कि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुंचे हैं; क्योंकि हम भाइयों से प्रेम रखते हैं: जो प्रेम नहीं रखता, वह मृत्यु की दशा में रहता है।

16     हम ने प्रेम इसी से जाना, कि उस ने हमारे लिये अपने प्राण दे दिए; और हमें भी भाइयों के लिये प्राण देना चाहिए।

17     पर जिस किसी के पास संसार की संपत्ति हो और वह अपने भाई को कंगाल देख कर उस पर तरस न खाना चाहे, तो उस में परमेश्वर का प्रेम क्योंकर बना रह सकता है?

18     हे बालकों, हम वचन और जीभ ही से नहीं, पर काम और सत्य के द्वारा भी प्रेम करें।

Responsive Reading: I John 3 : 11, 14, 16-18

11.     For this is the message that ye heard from the beginning, that we should love one another.

14.     We know that we have passed from death unto life, because we love the brethren. He that loveth not his brother abideth in death.

16.     Hereby perceive we the love of God, because he laid down his life for us: and we ought to lay down our lives for the brethren.

17.     But whoso hath this world’s good, and seeth his brother have need, and shutteth up his bowels of compassion from him, how dwelleth the love of God in him?

18.     My little children, let us not love in word, neither in tongue; but in deed and in truth.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. गलातियों 5: 14 (तमाम)

14     ... सारी व्यवस्था इस एक ही बात में पूरी हो जाती है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।

1. Galatians 5 : 14 (all)

14     …all the law is fulfilled in one word, even in this; Thou shalt love thy neighbour as thyself.

2. मरकुस 1: 14 (यीशु), 15

14     ... यीशु ने गलील में आकर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया।

15     और कहा, समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो॥

2. Mark 1 : 14 (Jesus), 15

14     …Jesus came into Galilee, preaching the gospel of the kingdom of God,

15     And saying, The time is fulfilled, and the kingdom of God is at hand: repent ye, and believe the gospel.

3. लूका 5: 17-25, 27-32

17     और एक दिन ऐसा हुआ कि वह उपदेश दे रहा था, और फरीसी और व्यवस्थापक वहां बैठे हुए थे, जो गलील और यहूदिया के हर एक गांव से, और यरूशलेम से आए थे; और चंगा करने के लिये प्रभु की सामर्थ उसके साथ थी।

18     और देखो कई लोग एक मनुष्य को जो झोले का मारा हुआ था, खाट पर लाए, और वे उसे भीतर ले जाने और यीशु के साम्हने रखने का उपाय ढूंढ़ रहे थे।

19     और जब भीड़ के कारण उसे भीतर न ले जा सके तो उन्होंने कोठे पर चढ़ कर और खप्रैल हटाकर, उसे खाट समेत बीच में यीशु के साम्हने उतरा दिया।

20     उस ने उन का विश्वास देखकर उस से कहा; हे मनुष्य, तेरे पाप क्षमा हुए।

24     मैं तुझ से कहता हूं, उठ और अपनी खाट उठाकर अपने घर चला जा।

25     वह तुरन्त उन के साम्हने उठा, और जिस पर वह पड़ा था उसे उठाकर, परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ अपने घर चला गया।

27     और इसके बाद वह बाहर गया, और लेवी नाम एक चुंगी लेने वाले को चुंगी की चौकी पर बैठे देखा, और उस से कहा, मेरे पीछे हो ले।

28     तब वह सब कुछ छोड़कर उठा, और उसके पीछे हो लिया।

29     और लेवी ने अपने घर में उसके लिये बड़ी जेवनार की; और चुंगी लेने वालों की और औरों की जो उसके साथ भोजन करने बैठे थे एक बड़ी भीड़ थी।

30     और फरीसी और उन के शास्त्री उस के चेलों से यह कहकर कुड़कुड़ाने लगे, कि तुम चुंगी लेने वालों और पापियों के साथ क्यों खाते-पीते हो?

31     यीशु ने उन को उत्तर दिया; कि वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है।

32     मैं धमिर्यों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूं।

3. Luke 5 : 17-25, 27-32

17     And it came to pass on a certain day, as he was teaching, that there were Pharisees and doctors of the law sitting by, which were come out of every town of Galilee, and Judæa, and Jerusalem: and the power of the Lord was present to heal them.

18     And, behold, men brought in a bed a man which was taken with a palsy: and they sought means to bring him in, and to lay him before him.

19     And when they could not find by what way they might bring him in because of the multitude, they went upon the housetop, and let him down through the tiling with his couch into the midst before Jesus.

20     And when he saw their faith, he said unto him, Man, thy sins are forgiven thee.

21     And the scribes and the Pharisees began to reason, saying, Who is this which speaketh blasphemies? Who can forgive sins, but God alone?

22     But when Jesus perceived their thoughts, he answering said unto them, What reason ye in your hearts?

23     Whether is easier, to say, Thy sins be forgiven thee; or to say, Rise up and walk?

24     But that ye may know that the Son of man hath power upon earth to forgive sins, (he said unto the sick of the palsy,) I say unto thee, Arise, and take up thy couch, and go into thine house.

25     And immediately he rose up before them, and took up that whereon he lay, and departed to his own house, glorifying God.

27     And after these things he went forth, and saw a publican, named Levi, sitting at the receipt of custom: and he said unto him, Follow me.

28     And he left all, rose up, and followed him.

29     And Levi made him a great feast in his own house: and there was a great company of publicans and of others that sat down with them.

30     But their scribes and Pharisees murmured against his disciples, saying, Why do ye eat and drink with publicans and sinners?

31     And Jesus answering said unto them, They that are whole need not a physician; but they that are sick.

32     I came not to call the righteous, but sinners to repentance.

4. मत्ती 5: 1, 2, 20 (के अलावा)-24

1     वह इस भीड़ को देखकर, पहाड़ पर चढ़ गया; और जब बैठ गया तो उसके चेले उसके पास आए।

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

20     ... यदि तुम्हारी धामिर्कता शास्त्रियों और फरीसियों की धामिर्कता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे॥

21     तुम सुन चुके हो, कि पूर्वकाल के लोगों से कहा गया था कि हत्या न करना, और जो कोई हत्या करेगा वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा।

22     परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा, वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा: और जो कोई अपने भाई को निकम्मा कहेगा वह महासभा में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई कहे “अरे मूर्ख” वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा।

23     इसलिये यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए, और वहां तू स्मरण करे, कि मेरे भाई के मन में मेरी ओर से कुछ विरोध है, तो अपनी भेंट वहीं वेदी के साम्हने छोड़ दे।

24     और जाकर पहिले अपने भाई से मेल मिलाप कर; तब आकर अपनी भेंट चढ़ा।

4. Matthew 5 : 1, 2, 20 (except)-24

1     And seeing the multitudes, he went up into a mountain: and when he was set, his disciples came unto him:

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

20     …except your righteousness shall exceed the righteousness of the scribes and Pharisees, ye shall in no case enter into the kingdom of heaven.

21     Ye have heard that it was said by them of old time, Thou shalt not kill; and whosoever shall kill shall be in danger of the judgment:

22     But I say unto you, That whosoever is angry with his brother without a cause shall be in danger of the judgment: and whosoever shall say to his brother, Raca, shall be in danger of the council: but whosoever shall say, Thou fool, shall be in danger of hell fire.

23     Therefore if thou bring thy gift to the altar, and there rememberest that thy brother hath ought against thee;

24     Leave there thy gift before the altar, and go thy way; first be reconciled to thy brother, and then come and offer thy gift.

5. रोमियो 12: 1, 9-18, 21

1     इसलिये हे भाइयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर बिनती करता हूं, कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ: यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है।

9     प्रेम निष्कपट हो; बुराई से घृणा करो; भलाई मे लगे रहो।

10     भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे पर दया रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो।

11     प्रयत्न करने में आलसी न हो; आत्मिक उन्माद में भरो रहो; प्रभु की सेवा करते रहो।

12     आशा मे आनन्दित रहो; क्लेश मे स्थिर रहो; प्रार्थना मे नित्य लगे रहो।

13     पवित्र लोगों को जो कुछ अवश्य हो, उस में उन की सहायता करो; पहुनाई करने मे लगे रहो।

14     अपने सताने वालों को आशीष दो; आशीष दो श्राप न दो।

15     आनन्द करने वालों के साथ आनन्द करो; और रोने वालों के साथ रोओ।

16     आपस में एक सा मन रखो; अभिमानी न हो; परन्तु दीनों के साथ संगति रखो; अपनी दृष्टि में बुद्धिमानन हो।

17     बुराई के बदले किसी से बुराई न करो; जो बातें सब लोगों के निकट भली हैं, उन की चिन्ता किया करो।

18     जहां तक हो सके, तुम अपने भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो।

21     बुराई से न हारो परन्तु भलाई से बुराई का जीत लो॥

5. Romans 12 : 1, 9-18, 21

1     I beseech you therefore, brethren, by the mercies of God, that ye present your bodies a living sacrifice, holy, acceptable unto God, which is your reasonable service.

9     Let love be without dissimulation. Abhor that which is evil; cleave to that which is good.

10     Be kindly affectioned one to another with brotherly love; in honour preferring one another;

11     Not slothful in business; fervent in spirit; serving the Lord;

12     Rejoicing in hope; patient in tribulation; continuing instant in prayer;

13     Distributing to the necessity of saints; given to hospitality.

14     Bless them which persecute you: bless, and curse not.

15     Rejoice with them that do rejoice, and weep with them that weep.

16     Be of the same mind one toward another. Mind not high things, but condescend to men of low estate. Be not wise in your own conceits.

17     Recompense to no man evil for evil. Provide things honest in the sight of all men.

18     If it be possible, as much as lieth in you, live peaceably with all men.

21     Be not overcome of evil, but overcome evil with good.

6. 1 यूहन्ना 2: 1-5, 8-10

1     हेमेरे बालकों, मैं ये बातें तुम्हें इसलिये लिखता हूं, कि तुम पाप न करो; और यदि कोई पाप करे, तो पिता के पास हमारा एक सहायक है, अर्थात धार्मिक यीशु मसीह।

2     और वही हमारे पापों का प्रायश्चित्त है: और केवल हमारे ही नहीं, वरन सारे जगत के पापों का भी।

3     यदि हम उस की आज्ञाओं को मानेंगे, तो इस से हम जान लेंगे कि हम उसे जान गए हैं।

4     जो कोई यह कहता है, कि मैं उसे जान गया हूं, और उस की आज्ञाओं को नहीं मानता, वह झूठा है; और उस में सत्य नहीं।

5     पर जो कोई उसके वचन पर चले, उस में सचमुच परमेश्वर का प्रेम सिद्ध हुआ है: हमें इसी से मालूम होता है, कि हम उस में हैं।

8     फिर मैं तुम्हें नई आज्ञा लिखता हूं; और यह तो उस में और तुम में सच्ची ठहरती है; क्योंकि अन्धकार मिटता जाता है और सत्य की ज्योति अभी चमकने लगी है।

9     जो कोई यह कहता है, कि मैं ज्योति में हूं; और अपने भाई से बैर रखता है, वह अब तक अन्धकार ही में है।

10     जो कोई अपने भाई से प्रेम रखता है, वह ज्योति में रहता है, और ठोकर नहीं खा सकता।

6. I John 2 : 1-5, 8-10

1     My little children, these things write I unto you, that ye sin not. And if any man sin, we have an advocate with the Father, Jesus Christ the righteous:

2     And he is the propitiation for our sins: and not for ours only, but also for the sins of the whole world.

3     And hereby we do know that we know him, if we keep his commandments.

4     He that saith, I know him, and keepeth not his commandments, is a liar, and the truth is not in him.

5     But whoso keepeth his word, in him verily is the love of God perfected: hereby know we that we are in him.

8     Again, a new commandment I write unto you, which thing is true in him and in you: because the darkness is past, and the true light now shineth.

9     He that saith he is in the light, and hateth his brother, is in darkness even until now.

10     He that loveth his brother abideth in the light, and there is none occasion of stumbling in him.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 496 : 6 (में)-8

... क्रिश्चियन साइंस में का पालन करना है, एक दिमाग रखना है, और दूसरे को खुद के रूप में प्यार करना है।

1. 496 : 6 (in)-8

…in Christian Science the first duty is to obey God, to have one Mind, and to love another as yourself.

2. 88 : 18-20

अपने पड़ोसी को अपने समान प्रेम करना, एक दिव्य विचार है; लेकिन इस विचार को कभी भी भौतिक इंद्रियों के माध्यम से देखा, महसूस नहीं किया जा सकता है और न ही समझा जा सकता है।

2. 88 : 18-20

To love one's neighbor as one's self, is a divine idea; but this idea can never be seen, felt, nor understood through the physical senses.

3. 295 : 16-24

नश्वर के माध्यम से ईश्वर का प्रकट होना खिड़की के शीशे से गुजरने वाले प्रकाश के समान है। प्रकाश और कांच कभी आपस में नहीं मिलते हैं, लेकिन बात यह है कि कांच दीवारों की तुलना में कम अपारदर्शी है। नश्वर मन जिसके माध्यम से सत्य सबसे अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट होता है, वह है जिसने सत्य के लिए एक बेहतर पारदर्शिता बनने के लिए बहुत अधिक भौतिकता - बहुत त्रुटि - खो दी है। फिर, जैसे बादल पिघलकर पतले वाष्प में बदल जाता है, यह अब सूर्य को नहीं छिपाता है।

3. 295 : 16-24

The manifestation of God through mortals is as light passing through the window-pane. The light and the glass never mingle, but as matter, the glass is less opaque than the walls. The mortal mind through which Truth appears most vividly is that one which has lost much materiality — much error — in order to become a better transparency for Truth. Then, like a cloud melting into thin vapor, it no longer hides the sun.

4. 242 : 15-20

स्व-प्रेम एक ठोस शरीर की तुलना में अधिक अपारदर्शी है। एक रोगी ईश्वर की आज्ञाकारिता में, प्रेम के सार्वभौमिक विलायक के साथ भंग करने के लिए हमें श्रम करना चाहिए, - आत्म-इच्छा, आत्म-औचित्य, और आत्म-प्रेम, - जो आध्यात्मिकता के खिलाफ युद्ध करता है और पाप का कानून मौत।

4. 242 : 15-20

Self-love is more opaque than a solid body. In patient obedience to a patient God, let us labor to dissolve with the universal solvent of Love the adamant of error, — self-will, self-justification, and self-love, — which wars against spirituality and is the law of sin and death.

5. 6 : 3-5, 11-22

ईश्वरीय प्रेम मनुष्य को सुधारता है और नियंत्रित करता है। पुरुष क्षमा मांग सकते हैं, लेकिन यह ईश्वरीय सिद्धांत केवल पापी को सुधारता है।

पाप के परिणाम के रूप में पीड़ित होने के लिए, पाप को नष्ट करने का साधन है। जब तक भौतिक जीवन में पाप और पाप नष्ट नहीं हो जाते, तब तक पाप का हर आनंद उसके दर्द के बराबर होगा। स्वर्ग तक पहुँचने के लिए, हम होने के दिव्य सिद्धांत को समझना चाहिए।

"भगवान प्यार है।" इससे अधिक हम पूछ नहीं सकते, उच्च हम नहीं देख सकते हैं, आगे हम नहीं जा सकते। यह मानने के लिए कि ईश्वर क्षमा करता है या पाप को दंडित करता है जैसा कि उसकी दया की मांग की गई है या बिना शर्त के, प्यार को गलत समझना और प्रार्थना को अपराध के लिए सुरक्षा-वाल्व बनाना है।

5. 6 : 3-5, 11-22

Divine Love corrects and governs man. Men may pardon, but this divine Principle alone reforms the sinner.

To cause suffering as the result of sin, is the means of destroying sin. Every supposed pleasure in sin will furnish more than its equivalent of pain, until belief in material life and sin is destroyed. To reach heaven, the harmony of being, we must understand the divine Principle of being.

"God is Love." More than this we cannot ask, higher we cannot look, farther we cannot go. To suppose that God forgives or punishes sin according as His mercy is sought or unsought, is to misunderstand Love and to make prayer the safety-valve for wrong-doing.

6. 290 : 16-32

यदि मृत्यु नामक परिवर्तन पाप, बीमारी और मृत्यु में विश्वास को नष्ट कर देता है, तो विघटन के क्षण में खुशी जीत जाएगी, और हमेशा के लिए स्थायी हो जाएगी; लेकिन यह ऐसा नहीं है। पूर्णता से ही पूर्णता प्राप्त होती है। जो लोग अधर्मी हैं वे अभी भी अधर्मी होंगे, जब तक कि दिव्य विज्ञान में क्राइस्ट, सत्य, सभी अज्ञान और पाप को हटा नहीं देते हैं।

वह पाप और त्रुटि जो हमें मृत्यु के तुरंत बाद प्राप्त होती है, उस क्षण में समाप्त नहीं होती है, लेकिन इन त्रुटियों की मृत्यु तक होती है। पूर्ण आध्यात्मिक होने के लिए, मनुष्य को पाप रहित होना चाहिए, और वह पूर्णता तक पहुँचने पर ही इस प्रकार बनता है। हत्यारे, हालांकि कृत्य में मारे जाते हैं, जिससे पाप का त्याग नहीं होता। वह यह मानने के लिए अधिक आध्यात्मिक नहीं है कि उसका शरीर मर गया और यह सीख कर कि उसका क्रूर मन नहीं मर गया। उनके विचार तब तक शुद्ध नहीं होते जब तक कि बुराई अच्छे से निरस्त्र नहीं होती। उसका शरीर उसके मन के समान भौतिक है, और इसके विपरीत।

6. 290 : 16-32

If the change called death destroyed the belief in sin, sickness, and death, happiness would be won at the moment of dissolution, and be forever permanent; but this is not so. Perfection is gained only by perfection. They who are unrighteous shall be unrighteous still, until in divine Science Christ, Truth, removes all ignorance and sin.

The sin and error which possess us at the instant of death do not cease at that moment, but endure until the death of these errors. To be wholly spiritual, man must be sinless, and he becomes thus only when he reaches perfection. The murderer, though slain in the act, does not thereby forsake sin. He is no more spiritual for believing that his body died and learning that his cruel mind died not. His thoughts are no purer until evil is disarmed by good. His body is as material as his mind, and vice versa.

7. 291 : 1-11, 13-18

अधर्म को छोड़ते समय जिन पापों को क्षमा किया जाता है, वह खुशी पाप के बीच में वास्तविक हो सकती है, कि शरीर की तथाकथित मौत पाप से मुक्त हो जाती है, और यह कि भगवान का क्षमा याचना है लेकिन पाप का विनाश, - ये गंभीर गलतियाँ हैं । हम जानते हैं कि सब बदल जाएगा "एक पल में," जब आखिरी तुरही ध्वनि होगी; लेकिन ज्ञान का यह अंतिम निमंत्रण तब तक नहीं आ सकता जब तक कि ईसाई चरित्र की वृद्धि में प्रत्येक कम आमंत्रण के लिए नश्वर न हो गए हों। मनुष्यों को यह कल्पना करने की आवश्यकता नहीं है कि मृत्यु के अनुभव में विश्वास उन्हें महिमा प्रदान करेगा।

स्वर्ग एक स्थानीयता नहीं है, बल्कि मन की एक दिव्य स्थिति है जिसमें मन की सभी अभिव्यक्तियाँ सामंजस्यपूर्ण और अमर हैं, क्योंकि पाप नहीं है और मनुष्य अपने स्वयं के धार्मिकता नहीं पा रहा है, लेकिन "प्रभु के मन", जैसा कि शास्त्र कहता है।

7. 291 : 1-11, 13-18

The suppositions that sin is pardoned while unforsaken, that happiness can be genuine in the midst of sin, that the so-called death of the body frees from sin, and that God's pardon is aught but the destruction of sin, — these are grave mistakes. We know that all will be changed "in the twinkling of an eye," when the last trump shall sound; but this last call of wisdom cannot come till mortals have already yielded to each lesser call in the growth of Christian character. Mortals need not fancy that belief in the experience of death will awaken them to glorified being.

Heaven is not a locality, but a divine state of Mind in which all the manifestations of Mind are harmonious and immortal, because sin is not there and man is found having no righteousness of his own, but in possession of "the mind of the Lord," as the Scripture says.

8. 404 : 29-11

घृणा, ईर्ष्या, बेईमानी, भय, और ऐसी अन्य चीजें, एक आदमी को बीमार बनाती हैं, और न तो भौतिक चिकित्सा और न ही मन उसे स्थायी रूप से मदद कर सकता है, यहां तक कि शरीर में भी, जब तक कि वह उसे मानसिक रूप से बेहतर नहीं बनाता है, और इसलिए उसे उसके विध्वंसक से बचाता है। मूल त्रुटि नश्वर मन है। घृणा क्रूर इच्छाओं को भड़काती है। बुरे इरादों और उद्देश्यों का भोग किसी भी आदमी को एक निराशाजनक पीड़ित बनाता है, जो सबसे कम प्रकार के साहस से ऊपर है।

क्रिश्चियन साइंस मनुष्य को भविष्यवाणियों में महारत हासिल करने के लिए आज्ञा देता है दया के साथ घृणा करने के लिए, शुद्धता के साथ वासना को जीतने के लिए, दान के साथ बदला लेने के लिए, और ईमानदारी के साथ धोखे को दूर करने के लिए। यदि आप स्वास्थ्य, खुशी और सफलता के खिलाफ षड्यंत्रकारियों की एक सेना को संजोना नहीं चाहते हैं, तो इन त्रुटियों को उनके शुरुआती चरणों में नष्ट कर दें।

8. 404 : 29-11

Hatred, envy, dishonesty, fear, and so forth, make a man sick, and neither material medicine nor Mind can help him permanently, even in body, unless it makes him better mentally, and so delivers him from his destroyers. The basic error is mortal mind. Hatred inflames the brutal propensities. The indulgence of evil motives and aims makes any man, who is above the lowest type of manhood, a hopeless sufferer.

Christian Science commands man to master the propensities, — to hold hatred in abeyance with kindness, to conquer lust with chastity, revenge with charity, and to overcome deceit with honesty. Choke these errors in their early stages, if you would not cherish an army of conspirators against health, happiness, and success.

9. 405 : 18-21

अच्छा इंसान आखिरकार अपने पाप के डर को दूर कर सकता है। स्वयं को नष्ट करना पाप की आवश्यकता है। अमर मनुष्य ईश्वर की सरकार को प्रदर्शित करता है, जिसमें पाप करने की शक्ति नहीं है।

9. 405 : 18-21

The good man finally can overcome his fear of sin. This is sin's necessity, — to destroy itself. Immortal man demonstrates the government of God, good, in which is no power to sin.

10. 76 : 18-29

दुख, पाप, मरते विश्वास असत्य हैं। जब दैवीय विज्ञान को सार्वभौमिक रूप से समझा जाता है, तो उनके पास मनुष्य पर कोई शक्ति नहीं होगी, क्योंकि मनुष्य अमर है और दिव्य अधिकार से जीवित है।

पाप रहित आनन्द, - जीवन की पूर्ण सद्भाव और अमरता, एक दिव्य सुख या पीड़ा के बिना असीमित दिव्य सौंदर्य और अच्छाई का होना, - एकमात्र सत्य, अविनाशी पुरुष का निर्माण करता है, जिसका अस्तित्व आध्यात्मिक है। अस्तित्व की यह स्थिति वैज्ञानिक और अक्षुण्ण है, - एक पूर्णता केवल उन लोगों द्वारा समझ में आती है जिनके पास दिव्य विज्ञान में मसीह की अंतिम समझ है।

10. 76 : 18-29

Suffering, sinning, dying beliefs are unreal. When divine Science is universally understood, they will have no power over man, for man is immortal and lives by divine authority.

The sinless joy, — the perfect harmony and immortality of Life, possessing unlimited divine beauty and goodness without a single bodily pleasure or pain, — constitutes the only veritable, indestructible man, whose being is spiritual. This state of existence is scientific and intact, — a perfection discernible only by those who have the final understanding of Christ in divine Science.

11. 410 : 4-7

"यह जीवन अनन्त है," यीशु कहते हैं, - है, नहीं होगा; और फिर वह अपने पिता और स्वयं के वर्तमान ज्ञान के रूप में अनन्त जीवन को परिभाषित करता है, - जिसका अर्थ है प्रेम, सत्य और जीवन का ज्ञान।

11. 410 : 4-7

"This is life eternal," says Jesus, —is, not shall be; and then he defines everlasting life as a present knowledge of his Father and of himself, — the knowledge of Love, Truth, and Life.

12. 426 : 29-32

मनुष्य अमर है, और शरीर मर नहीं सकता, क्योंकि पदार्थ के पास समर्पण करने के लिए कोई जीवन नहीं है। पदार्थ, मृत्यु, बीमारी, बीमारी और पाप नाम की मानवीय अवधारणाएँ सभी नष्ट की जा सकती हैं।

12. 426 : 29-32

Man is immortal, and the body cannot die, because matter has no life to surrender. The human concepts named matter, death, disease, sickness, and sin are all that can be destroyed.

13. 569 : 6-14

यह शास्त्र,"तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा अपने," सचमुच पूर्ण होता है, जब हम सत्य की सर्वोच्चता के प्रति सचेत होते हैं, जिसके द्वारा त्रुटि की शून्यता दिखाई देती है; और हम जानते हैं कि त्रुटि की शून्यता उसकी दुष्टता के अनुपात में है। वह जो मसीह के वस्त्र के ऊपरी भाग को छूता है और अपने नश्वर विश्वासों, पशुता और घृणा में महारत हासिल करता है, उपचार के प्रमाण में आनन्दित होता है, - एक मधुर और निश्चित अर्थ में कि ईश्वर प्रेम है।

13. 569 : 6-14

The Scripture, "Thou hast been faithful over a few things, I will make thee ruler over many," is literally fulfilled, when we are conscious of the supremacy of Truth, by which the nothingness of error is seen; and we know that the nothingness of error is in proportion to its wickedness. He that touches the hem of Christ's robe and masters his mortal beliefs, animality, and hate, rejoices in the proof of healing, — in a sweet and certain sense that God is Love.

14. 578 : 10-12, 16-18

चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूं, तौभी हानि से न डरूंगा, क्योंकि [प्रेम] मेरे साथ रहता है;

निश्चय भलाई और करूणा जीवन भर मेरे साथ साथ बनी रहेंगी; और मैं [प्रेम] के [चेतना] धाम में वास करूंगा॥

14. 578 : 10-12, 16-18

Yea, though I walk through the valley of the shadow of death, I will fear no evil: for [love] is with me; [love's] rod and [love's] staff they comfort me.

Surely goodness and mercy shall follow me all the days of my life; and I will dwell in the house [the consciousness] of [love] for ever.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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