रविवार 3 सितंबर, 2023



विषयआदमी

SubjectMan

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: भजन संहिता 37: 37

"खरे मनुष्य पर दृष्टि कर और धर्मी को देख, क्योंकि मेल से रहने वाले पुरूष का अन्तफल अच्छा है।"



Golden Text: Psalm 37 : 37

Mark the perfect man, and behold the upright: for the end of that man is peace.




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उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 1: 1-6


1     क्याही धन्य है वह पुरूष जो दुष्टों की युक्ति पर नहीं चलता, और न पापियों के मार्ग में खड़ा होता; और न ठट्ठा करने वालों की मण्डली में बैठता है!

2     परन्तु वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है।

3     वह उस वृक्ष के समान है, जो बहती नालियों के किनारे लगाया गया है। और अपनी ऋतु में फलता है, और जिसके पत्ते कभी मुरझाते नहीं। इसलिये जो कुछ वह पुरूष करे वह सफल होता है॥

4     दुष्ट लोग ऐसे नहीं होते, वे उस भूसी के समान होते हैं, जो पवन से उड़ाई जाती है।

5     इस कारण दुष्ट लोग अदालत में स्थिर न रह सकेंगे, और न पापी धर्मियों की मण्डली में ठहरेंगे;

6     क्योंकि यहोवा धर्मियों का मार्ग जानता है, परन्तु दुष्टों का मार्ग नाश हो जाएगा॥

Responsive Reading: Psalm 1 : 1-6

1.     Blessed is the man that walketh not in the counsel of the ungodly, nor standeth in the way of sinners, nor sitteth in the seat of the scornful.

2.     But his delight is in the law of the Lord; and in his law doth he meditate day and night.

3.     And he shall be like a tree planted by the rivers of water, that bringeth forth his fruit in his season; his leaf also shall not wither; and whatsoever he doeth shall prosper.

4.     The ungodly are not so: but are like the chaff which the wind driveth away.

5.     Therefore the ungodly shall not stand in the judgment, nor sinners in the congregation of the righteous.

6.     For the Lord knoweth the way of the righteous: but the way of the ungodly shall perish.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 146: 1-10

1     याह की स्तुति करो। हे मेरे मन यहोवा की स्तुति कर!

2     मैं जीवन भर यहोवा की स्तुति करता रहूंगा; जब तक मैं बना रहूंगा, तब तक मैं अपने परमेश्वर का भजन गाता रहूंगा॥

3     तुम प्रधानों पर भरोसा न रखना, न किसी आदमी पर, क्योंकि उस में उद्धार करने की भी शक्ति नहीं।

4     उसका भी प्राण निकलेगा, वही भी मिट्टी में मिल जाएगा; उसी दिन उसकी सब कल्पनाएं नाश हो जाएंगी॥

5     क्या ही धन्य वह है, जिसका सहायक याकूब का ईश्वर है, और जिसका भरोसा अपने परमेश्वर यहोवा पर है।

6     वह आकाश और पृथ्वी और समुद्र और उन में जो कुछ है, सब का कर्ता है; और वह अपना वचन सदा के लिये पूरा करता रहेगा।

7     वह पिसे हुओं का न्याय चुकाता है; और भूखों को रोटी देता है॥ यहोवा बन्धुओं को छुड़ा;

8     यहोवा अन्धों को आंखें देता है। यहोवा झुके हुओं को सीधा खड़ा करता है; यहोवा धर्मियों से प्रेम रखता है।

9     यहोवा परदेशियों की रक्षा करता है; और अनाथों और विधवा को तो सम्भालता है; परन्तु दुष्टों के मार्ग को टेढ़ा मेढ़ा करता है॥

10     हे सिय्योन, यहोवा सदा के लिये, तेरा परमेश्वर पीढ़ी पीढ़ी राज्य करता रहेगा। याह की स्तुति करो!

1. Psalm 146 : 1-10

1     Praise ye the Lord. Praise the Lord, O my soul.

2     While I live will I praise the Lord: I will sing praises unto my God while I have any being.

3     Put not your trust in princes, nor in the son of man, in whom there is no help.

4     His breath goeth forth, he returneth to his earth; in that very day his thoughts perish.

5     Happy is he that hath the God of Jacob for his help, whose hope is in the Lord his God:

6     Which made heaven, and earth, the sea, and all that therein is: which keepeth truth for ever:

7     Which executeth judgment for the oppressed: which giveth food to the hungry. The Lord looseth the prisoners:

8     The Lord openeth the eyes of the blind: the Lord raiseth them that are bowed down: the Lord loveth the righteous:

9     The Lord preserveth the strangers; he relieveth the fatherless and widow: but the way of the wicked he turneth upside down.

10     The Lord shall reign for ever, even thy God, O Zion, unto all generations. Praise ye the Lord.

2. यूहन्ना 9 : 1-11

1     फिर जाते हुए उस ने एक मनुष्य को देखा, जो जन्म का अन्धा था।

2     और उसके चेलों ने उस से पूछा, हे रब्बी, किस ने पाप किया था कि यह अन्धा जन्मा, इस मनुष्य ने, या उसके माता पिता ने?

3     यीशु ने उत्तर दिया, कि न तो इस ने पाप किया था, न इस के माता पिता ने: परन्तु यह इसलिये हुआ, कि परमेश्वर के काम उस में प्रगट हों।

4     जिस ने मुझे भेजा है; हमें उसके काम दिन ही दिन में करना अवश्य है: वह रात आनेवाली है जिस में कोई काम नहीं कर सकता।

5     जब तक मैं जगत में हूं, तब तक जगत की ज्योति हूं।

6     यह कहकर उस ने भूमि पर थूका और उस थूक से मिट्टी सानी, और वह मिट्टी उस अन्धे की आंखों पर लगाकर।

7     उस से कहा; जा शीलोह के कुण्ड में धो ले, (जिस का अर्थ भेजा हुआ है) सो उस ने जाकर धोया, और देखता हुआ लौट आया।

8     तब पड़ोसी और जिन्हों ने पहले उसे भीख मांगते देखा था, कहने लगे; क्या यह वही नहीं, जो बैठा भीख मांगा करता था?

9     कितनों ने कहा, यह वही है: औरों ने कहा, नहीं; परन्तु उसके समान है: उस ने कहा, मैं वही हूं।

10     तब वे उस से पूछने लगे, तेरी आंखें क्योंकर खुल गईं?

11     उस ने उत्तर दिया, कि यीशु नाम एक व्यक्ति ने मिट्टी सानी, और मेरी आंखों पर लगाकर मुझ से कहा, कि शीलोह में जाकर धो ले; सो मैं गया, और धोकर देखने लगा।

2. John 9 : 1-11

1     And as Jesus passed by, he saw a man which was blind from his birth.

2     And his disciples asked him, saying, Master, who did sin, this man, or his parents, that he was born blind?

3     Jesus answered, Neither hath this man sinned, nor his parents: but that the works of God should be made manifest in him.

4     I must work the works of him that sent me, while it is day: the night cometh, when no man can work.

5     As long as I am in the world, I am the light of the world.

6     When he had thus spoken, he spat on the ground, and made clay of the spittle, and he anointed the eyes of the blind man with the clay,

7     And said unto him, Go, wash in the pool of Siloam, (which is by interpretation, Sent.) He went his way therefore, and washed, and came seeing.

8     The neighbours therefore, and they which before had seen him that he was blind, said, Is not this he that sat and begged?

9     Some said, This is he: others said, He is like him: but he said, I am he.

10     Therefore said they unto him, How were thine eyes opened?

11     He answered and said, A man that is called Jesus made clay, and anointed mine eyes, and said unto me, Go to the pool of Siloam, and wash: and I went and washed, and I received sight.

3. यूहन्ना 13: 31 (यीशु)

31     यीशु ने कहा; अब मनुष्य पुत्र की महिमा हुई, और परमेश्वर की महिमा उस में हुई।

3. John 13 : 31 (Jesus)

31     Jesus said, Now is the Son of man glorified, and God is glorified in him.

4. यूहन्ना 15: 1-10

1     सच्ची दाखलता मैं हूं; और मेरा पिता किसान है।

2     जो डाली मुझ में है, और नहीं फलती, उसे वह काट डालता है, और जो फलती है, उसे वह छांटता है ताकि और फले।

3     तुम तो उस वचन के कारण जो मैं ने तुम से कहा है, शुद्ध हो।

4     तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में: जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते।

5     मैं दाखलता हूं: तुम डालियां हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।

6     यदि कोई मुझ में बना न रहे, तो वह डाली की नाईं फेंक दिया जाता, और सूख जाता है; और लोग उन्हें बटोरकर आग में झोंक देते हैं, और वे जल जाती हैं।

7     यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो मांगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।

8     मेरे पिता की महिमा इसी से होती है, कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे।

9     जैसा पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही मैं ने तुम से प्रेम रखा, मेरे प्रेम में बने रहो।

10     यदि तुम मेरी आज्ञाओं को मानोगे, तो मेरे प्रेम में बने रहोगे: जैसा कि मैं ने अपने पिता की आज्ञाओं को माना है, और उसके प्रेम में बना रहता हूं।

4. John 15 : 1-10

1     I am the true vine, and my Father is the husbandman.

2     Every branch in me that beareth not fruit he taketh away: and every branch that beareth fruit, he purgeth it, that it may bring forth more fruit.

3     Now ye are clean through the word which I have spoken unto you.

4     Abide in me, and I in you. As the branch cannot bear fruit of itself, except it abide in the vine; no more can ye, except ye abide in me.

5     I am the vine, ye are the branches: He that abideth in me, and I in him, the same bringeth forth much fruit: for without me ye can do nothing.

6     If a man abide not in me, he is cast forth as a branch, and is withered; and men gather them, and cast them into the fire, and they are burned.

7     If ye abide in me, and my words abide in you, ye shall ask what ye will, and it shall be done unto you.

8     Herein is my Father glorified, that ye bear much fruit; so shall ye be my disciples.

9     As the Father hath loved me, so have I loved you: continue ye in my love.

10     If ye keep my commandments, ye shall abide in my love; even as I have kept my Father’s commandments, and abide in his love.

5. रोमियो 8: 35, 38, 39

35     कौन हम को मसीह के प्रेम से अलग करेगा? क्या क्लेश, या संकट, या उपद्रव, या अकाल, या नंगाई, या जोखिम, या तलवार?

38     क्योंकि मैं निश्चय जानता हूं, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ, न ऊंचाई,

39     न गहिराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी॥

5. Romans 8 : 35, 38, 39

35     Who shall separate us from the love of Christ? shall tribulation, or distress, or persecution, or famine, or nakedness, or peril, or sword?

38     For I am persuaded, that neither death, nor life, nor angels, nor principalities, nor powers, nor things present, nor things to come,

39     Nor height, nor depth, nor any other creature, shall be able to separate us from the love of God, which is in Christ Jesus our Lord.

6. भजन संहिता 37: 3-7 (से:)

3     यहोवा पर भरोसा रख, और भला कर; देश में बसा रह, और सच्चाई में मन लगाए रह।

4     यहोवा को अपने सुख का मूल जान, और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा॥

5     अपने मार्ग की चिन्ता यहोवा पर छोड़; और उस पर भरोसा रख, वही पूरा करेगा।

6     और वह तेरा धर्म ज्योति की नाईं, और तेरा न्याय दोपहर के उजियाले की नाईं प्रगट करेगा॥

7     यहोवा के साम्हने चुपचाप रह, और धीरज से उसका आसरा रख!

6. Psalm 37 : 3-7 (to :)

3     Trust in the Lord, and do good; so shalt thou dwell in the land, and verily thou shalt be fed.

4     Delight thyself also in the Lord; and he shall give thee the desires of thine heart.

5     Commit thy way unto the Lord; trust also in him; and he shall bring it to pass.

6     And he shall bring forth thy righteousness as the light, and thy judgment as the noonday.

7     Rest in the Lord, and wait patiently for him:

7. कुलुस्सियों 3: 4, 12-17

4     जब मसीह जो हमारा जीवन है, प्रगट होगा, तब तुम भी उसके साथ महिमा सहित प्रगट किए जाओगे।

12     इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करूणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो।

13     और यदि किसी को किसी पर दोष देने को कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो।

14     और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्ध है बान्ध लो।

15     और मसीह की शान्ति जिस के लिये तुम एक देह होकर बुलाए भी गए हो, तुम्हारे हृदय में राज्य करे, और तुम धन्यवादी बने रहो।

16     मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो; और सिद्ध ज्ञान सहित एक दूसरे को सिखाओ, और चिताओ, और अपने अपने मन में अनुग्रह के साथ परमेश्वर के लिये भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाओ।

17     और वचन से या काम से जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो॥

7. Colossians 3 : 4, 12-17

4     When Christ, who is our life, shall appear, then shall ye also appear with him in glory.

12     Put on therefore, as the elect of God, holy and beloved, bowels of mercies, kindness, humbleness of mind, meekness, longsuffering;

13     Forbearing one another, and forgiving one another, if any man have a quarrel against any: even as Christ forgave you, so also do ye.

14     And above all these things put on charity, which is the bond of perfectness.

15     And let the peace of God rule in your hearts, to the which also ye are called in one body; and be ye thankful.

16     Let the word of Christ dwell in you richly in all wisdom; teaching and admonishing one another in psalms and hymns and spiritual songs, singing with grace in your hearts to the Lord.

17     And whatsoever ye do in word or deed, do all in the name of the Lord Jesus, giving thanks to God and the Father by him.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 361: 16-20

जैसे पानी की एक बूंद सागर के साथ है, सूर्य के साथ प्रकाश की एक किरण, यहां तक कि भगवान और मनुष्य, पिता और पुत्र, अस्तित्व में एक हैं। शास्त्र कहता है: "क्योंकि हम उसी में जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं."

1. 361 : 16-20

As a drop of water is one with the ocean, a ray of light one with the sun, even so God and man, Father and son, are one in being. The Scripture reads: "For in Him we live, and move, and have our being."

2. 18: 3-9

नासरत के यीशु ने पिता के साथ मनुष्य की एकता को सिखाया और प्रदर्शित किया, और इसके लिए हम उसे अंतहीन श्रद्धांजलि देते हैं। उनका मिशन व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों था। उन्होंने जीवन का काम न केवल स्वयं के प्रति न्याय में, बल्कि मनुष्यों पर दया करने में भी किया।

2. 18 : 3-9

Jesus of Nazareth taught and demonstrated man's oneness with the Father, and for this we owe him endless homage. His mission was both individual and collective. He did life's work aright not only in justice to himself, but in mercy to mortals, — to show them how to do theirs, but not to do it for them nor to relieve them of a single responsibility.

3. 210: 11-18

यह जानकर कि आत्मा और उसकी विशेषताओं को हमेशा मनुष्य के माध्यम से प्रकट किया गया था, मास्टर ने बीमारों को चंगा किया, अंधे को दृष्टि दी, बधिर को सुना, पैरों को लंगड़ा किया, इस प्रकार दिव्य की वैज्ञानिक कार्रवाई को प्रकाश में लाया मानव मन और शरीर पर मन और आत्मा और मोक्ष की बेहतर समझ देना। यीशु ने एक ही आध्यात्मिक प्रक्रिया के द्वारा बीमारी और पाप को चंगा किया।

3. 210 : 11-18

Knowing that Soul and its attributes were forever manifested through man, the Master healed the sick, gave sight to the blind, hearing to the deaf, feet to the lame, thus bringing to light the scientific action of the divine Mind on human minds and bodies and giving a better understanding of Soul and salvation. Jesus healed sickness and sin by one and the same metaphysical process.

4. 178: 8-17

आनुवंशिकता कोई कानून नहीं है. बीमारी का दूरस्थ कारण या विश्वास अपनी प्राथमिकता और वर्तमान के साथ अतीत के नश्वर विचारों के संबंध के कारण खतरनाक नहीं है। पूर्वगामी कारण और उत्तेजक कारण मानसिक हैं।

शायद किसी वयस्क में जन्म से पहले उसकी माँ के डर से उत्पन्न विकृति होती है। जब इसे मानवीय विश्वास से हटा दिया जाता है और विज्ञान या दिव्य मन पर आधारित कर दिया जाता है, जिसके लिए सभी चीजें संभव हैं, तो उस पुराने मामले को ठीक करना मुश्किल नहीं है।

4. 178 : 8-17

Heredity is not a law. The remote cause or belief of disease is not dangerous because of its priority and the connection of past mortal thoughts with present. The predisposing cause and the exciting cause are mental.

Perhaps an adult has a deformity produced prior to his birth by the fright of his mother. When wrested from human belief and based on Science or the divine Mind, to which all things are possible, that chronic case is not difficult to cure.

5. 304: 3-11 अगला पृष्ठ

यह ज्ञान और असत्य विश्वास है, भौतिक वस्तुओं पर आधारित है, जो आध्यात्मिक सौंदर्य और गुडई को छिपाते हैं। यह समझ में आया, पॉल ने कहा: "न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रादित्य, न वर्तमान, न भविष्य, न समृति, न ऊंचाई, न यशैरी और न नो और सृष्टि, हमें भगवान के प्रेम से ...।" अलग कर संभव है। " यह क्रिश्चियन साइंस का सिद्धांत है: उस दिव्य प्रेम को उसकी अभिव्यक्ति, या वस्तु से वंचित नहीं किया जा सकता है; वह आनन्द दुःख में नहीं बदल सकता, क्योंकि दुःख आनन्द का स्वामी नहीं है; वह अच्छाई कभी स्पष्ट नहीं कर सकता; वह पदार्थ कभी भी मन उत्पन्न नहीं कर सकता है और न ही जीवन का परिणाम मृत्यु है। पूर्ण पुरुष - भगवान द्वारा शासित, उनका सिद्ध सिद्धांत - पाप रहित और शाश्वत है

सद्भाव इसके सिद्धांत द्वारा निर्मित होता है, इसके द्वारा नियंत्रित होता है और इसके साथ रहता है। ईश्वरीय सिद्धांत मनुष्य का जीवन है। इसलिए मनुष्य का सुख भौतिक इन्द्रिय के अधीन नहीं है। सत्य त्रुटि से दूषित नहीं होता है। मनुष्य में सामंजस्य उतना ही सुंदर है जितना कि संगीत में, और कलह अप्राकृतिक, असत्य है।

संगीत का विज्ञान स्वरों को नियंत्रित करता है। यदि नश्वर लोग भौतिक इंद्रियों के माध्यम से सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं, तो वे सामंजस्य खो देंगे, यदि समय या दुर्घटना ने उन्हें भौतिक ज्ञान से वंचित कर दिया। सुरों और सुरों में पारंगत होने के लिए संगीत के विज्ञान को समझना होगा। भौतिक ज्ञान के निर्णयों पर छोड़ दिए जाने पर, संगीत को गलत समझा जा सकता है और भ्रम में खोया जा सकता है। समझ के बजाय विश्वास द्वारा नियंत्रित, संगीत अपूर्ण रूप से व्यक्त किया जाना चाहिए। इसलिए मनुष्य, अस्तित्व के विज्ञान को न समझकर, अपने दिव्य सिद्धांत को समझ से परे मानकर एक तरफ रख देता है, - अनुमानों के लिए छोड़ दिया जाता है, अज्ञानता के हाथों में छोड़ दिया जाता है, भ्रम के अधीन कर दिया जाता है, भौतिक भावना के अधीन कर दिया जाता है जो कलह है। एक असन्तुष्ट, असन्तुष्ट प्राणी मनुष्य नहीं है, क्योंकि असन्तोष संगीत है।

कैमरे में दिखाई गई तस्वीर या दर्पण में दिखाई दे रहा चेहरा मिलता-जुलता होते हुए भी असली नहीं है। मनुष्य, अपने निर्माता की समानता में, अस्तित्व के केंद्रीय प्रकाश, अदृश्य ईश्वर को प्रतिबिंबित करता है। चूंकि प्रतिबिंबित रूप में कोई भौतिकता नहीं है, जो केवल एक प्रतिबिंब है, इसलिए मनुष्य, सभी वास्तविक चीजों की तरह, भगवान को, उनके दिव्य सिद्धांत को प्रतिबिंबित करता है, न कि नश्वर शरीर में।

5. 304 : 3-11 next page

It is ignorance and false belief, based on a material sense of things, which hide spiritual beauty and goodness. Understanding this, Paul said: "Neither death, nor life, ... nor things present, nor things to come, nor height, nor depth, nor any other creature, shall be able to separate us from the love of God." This is the doctrine of Christian Science: that divine Love cannot be deprived of its manifestation, or object; that joy cannot be turned into sorrow, for sorrow is not the master of joy; that good can never produce evil; that matter can never produce mind nor life result in death. The perfect man — governed by God, his perfect Principle — is sinless and eternal.

Harmony is produced by its Principle, is controlled by it and abides with it. Divine Principle is the Life of man. Man's happiness is not, therefore, at the disposal of physical sense. Truth is not contaminated by error. Harmony in man is as beautiful as in music, and discord is unnatural, unreal.

The science of music governs tones. If mortals caught harmony through material sense, they would lose harmony, if time or accident robbed them of material sense. To be master of chords and discords, the science of music must be understood. Left to the decisions of material sense, music is liable to be misapprehended and lost in confusion. Controlled by belief, instead of understanding, music is, must be, imperfectly expressed. So man, not understanding the Science of being, — thrusting aside his divine Principle as incomprehensible, — is abandoned to conjectures, left in the hands of ignorance, placed at the disposal of illusions, subjected to material sense which is discord. A discontented, discordant mortal is no more a man than discord is music.

A picture in the camera or a face reflected in the mirror is not the original, though resembling it. Man, in the likeness of his Maker, reflects the central light of being, the invisible God. As there is no corporeality in the mirrored form, which is but a reflection, so man, like all things real, reflects God, his divine Principle, not in a mortal body.

6. 303: 25-2

ईश्वर, स्वयं की छवि और समानता के बिना, एक गैर-बराबरी, या मन अप्रभावित होगा। वह अपने स्वयं के स्वभाव के गवाह या सबूत के बिना होगा। आध्यात्मिक मनुष्य ईश्वर की छवि या विचार है, एक ऐसा विचार जो न तो खो सकता है और न ही अपने ईश्वरीय सिद्धांत से अलग हो सकता है। जब भौतिक ज्ञान के प्रति अनुभूतियां हुईं, तब प्रेरितों ने यह घोषणा की कि कुछ भी उसे ईश्वर, मीठे भाव और जीवन और सत्य की उपस्थिति से अलग नहीं कर सकता।

6. 303 : 25-2

God, without the image and likeness of Himself, would be a nonentity, or Mind unexpressed. He would be without a witness or proof of His own nature. Spiritual man is the image or idea of God, an idea which cannot be lost nor separated from its divine Principle. When the evidence before the material senses yielded to spiritual sense, the apostle declared that nothing could alienate him from God, from the sweet sense and presence of Life and Truth.

7. 306: 18 (आदमी)-20

...यदि मनुष्य ईश्वर को प्रतिबिंबित करता है, तो मनुष्य को एक क्षण के लिए भी ईश्वर से अलग नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार विज्ञान मनुष्य के अस्तित्व को अक्षुण्ण सिद्ध करता है।

7. 306 : 18 (man)-20

...man cannot be separated for an instant from God, if man reflects God. Thus Science proves man's existence to be intact.

8. 325: 10-19, 26-29

कुलुस्सियों (3:4) में पॉल लिखते हैं: "जब मसीह जो हमारा जीवन है, प्रगट होगा [दिखाई देगा], तब तुम भी उसके साथ महिमा सहित प्रगट किए [दिखाई देगा] जाओगे।" जब आध्यात्मिक अस्तित्व को उसकी पूर्णता, निरंतरता और शक्ति में समझा जाता है, तब मनुष्य ईश्वर की छवि में पाया जाएगा। प्रेरितिक शब्दों का पूर्ण अर्थ यह है: तब मनुष्य उसकी समानता में, पिता के समान परिपूर्ण, जीवन में अविनाशी, "ईश्वर में मसीह के साथ छिपा हुआ" पाया जाएगा - दिव्य प्रेम में सत्य के साथ, जहां मानवीय भावना ने मनुष्य को नहीं देखा है।

वह समय आता है जब मनुष्य की आध्यात्मिक उत्पत्ति, दिव्य विज्ञान जिसने यीशु को मानव उपस्थिति में प्रवेश कराया, को समझा और प्रदर्शित किया जाएगा।

8. 325 : 10-19, 26-29

In Colossians (iii. 4) Paul writes: "When Christ, who is our life, shall appear [be manifested], then shall ye also appear [be manifested] with him in glory." When spiritual being is understood in all its perfection, continuity, and might, then shall man be found in God's image. The absolute meaning of the apostolic words is this: Then shall man be found, in His likeness, perfect as the Father, indestructible in Life, "hid with Christ in God," — with Truth in divine Love, where human sense hath not seen man.

The time cometh when the spiritual origin of man, the divine Science which ushered Jesus into human presence, will be understood and demonstrated.

9. 475: 17 (आदमी)-22

... जिसमें मनुष्य या मन का प्रतिबिंब है, और इसलिए शाश्वत है; जो परमात्मा से अलग नहीं है; जिसे देवता से एक भी गुण नहीं मिला है; जो अपने आप में कोई जीवन, बुद्धिमत्ता और न ही रचनात्मक शक्ति रखता है, बल्कि आध्यात्मिक रूप से वह सब कुछ दर्शाता है जो उसके निर्माता का है।

9. 475 : 17 (man)-22

...man is the reflection of God, or Mind, and therefore is eternal; that which has no separate mind from God; that which has not a single quality underived from Deity; that which possesses no life, intelligence, nor creative power of his own, but reflects spiritually all that belongs to his Maker.

10. 336: 25 (ईश्वर)-26

भगवान, मनुष्य का दिव्य सिद्धांत, और भगवान की समानता में आदमी अविभाज्य, सामंजस्यपूर्ण और शाश्वत हैं।

10. 336 : 25 (God)-26

God, the divine Principle of man, and man in God's likeness are inseparable, harmonious, and eternal.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6