रविवार 3 मार्च, 2024



विषयमसीह ईसा

SubjectChrist Jesus

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: इब्रानियों 13: 8

"यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एकसा है।"



Golden Text: Hebrews 13 : 8

Jesus Christ the same yesterday, and to day, and for ever.




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उत्तरदायी अध्ययन: यूहन्ना 3: 16, 18, 20, 21, 33, 35, 36


16     क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।

18     जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका; इसलिये कि उस ने परमेश्वर के एकलौते पुत्र के नाम पर विश्वास नहीं किया।

20     क्योंकि जो कोई बुराई करता है, वह ज्योति से बैर रखता है, और ज्योति के निकट नहीं आता, ऐसा न हो कि उसके कामों पर दोष लगाया जाए।

21     परन्तु जो सच्चाई पर चलता है वह ज्योति के निकट आता है, ताकि उसके काम प्रगट हों, कि वह परमेश्वर की ओर से किए गए हैं।

33     जिस ने उस की गवाही ग्रहण कर ली उस ने इस बात पर छाप दे दी कि परमेश्वर सच्चा है।

34     क्योंकि जिसे परमेश्वर ने भेजा है, वह परमेश्वर की बातें कहता है: क्योंकि वह आत्मा नाप नापकर नहीं देता।

35     पिता पुत्र से प्रेम रखता है, और उस ने सब वस्तुएं उसके हाथ में दे दी हैं।

36     जो पुत्र पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है॥

Responsive Reading: John 3 : 16, 18, 20, 21, 33, 35, 36

16.     For God so loved the world, that he gave his only begotten Son, that whosoever believeth in him should not perish, but have everlasting life.

18.     He that believeth on him is not condemned: but he that believeth not is condemned already, because he hath not believed in the name of the only begotten Son of God.

20.     For every one that doeth evil hateth the light, neither cometh to the light, lest his deeds should be reproved.

21.     But he that doeth truth cometh to the light, that his deeds may be made manifest, that they are wrought in God.

33.     He that hath received his testimony hath set to his seal that God is true.

35.     The Father loveth the Son, and hath given all things into his hand.

36.     He that believeth on the Son hath everlasting life.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यशायाह 7: 14

14     इस कारण प्रभु आप ही तुम को एक चिन्ह देगा। सुनो, एक कुमारी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानूएल रखेगी।

1. Isaiah 7 : 14

14     Therefore the Lord himself shall give you a sign; Behold, a virgin shall conceive, and bear a son, and shall call his name Immanuel.

2. लूका 1: 26-28, 30-32 (से 1st :), 33 (और का)-35, 37, 80 (से 2nd,)

26     छठवें महीने में परमेश्वर की ओर से जिब्राईल स्वर्गदूत गलील के नासरत नगर में एक कुंवारी के पास भेजा गया।

27     जिस की मंगनी यूसुफ नाम दाऊद के घराने के एक पुरूष से हुई थी: उस कुंवारी का नाम मरियम था।

28     और स्वर्गदूत ने उसके पास भीतर आकर कहा; आनन्द और जय तेरी हो, जिस पर ईश्वर का अनुग्रह हुआ है, प्रभु तेरे साथ है।

30     हे मरियम; भयभीत न हो, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह तुझ पर हुआ है।

31     और देख, तू गर्भवती होगी, और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा; तू उसका नाम यीशु रखना।

32     वह महान होगा; और परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा; और प्रभु परमेश्वर उसके पिता दाऊद का सिंहासन उस को देगा।

33     ... और उसके राज्य का अन्त न होगा।

34     मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, यह क्योंकर होगा? मैं तो पुरूष को जानती ही नहीं।

35     स्वर्गदूत ने उस को उत्तर दिया; कि पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा, और परमप्रधान की सामर्थ तुझ पर छाया करेगी इसलिये वह पवित्र जो उत्पन्न होनेवाला है, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।

37     क्योंकि जो वचन परमेश्वर की ओर से होता है वह प्रभावरिहत नहीं होता।

80     और वह बालक बढ़ता और आत्मा में बलवन्त होता गया।

2. Luke 1 : 26-28, 30-32 (to 1st :), 33 (and of)-35, 37, 80 (to 2nd ,)

26     And in the sixth month the angel Gabriel was sent from God unto a city of Galilee, named Nazareth,

27     To a virgin espoused to a man whose name was Joseph, of the house of David; and the virgin’s name was Mary.

28     And the angel came in unto her, and said, Hail, thou that art highly favoured, the Lord is with thee: blessed art thou among women.

30     And the angel said unto her, Fear not, Mary: for thou hast found favour with God.

31     And, behold, thou shalt conceive in thy womb, and bring forth a son, and shalt call his name JESUS.

32     He shall be great, and shall be called the Son of the Highest:

33     ...and of his kingdom there shall be no end.

34     Then said Mary unto the angel, How shall this be, seeing I know not a man?

35     And the angel answered and said unto her, The Holy Ghost shall come upon thee, and the power of the Highest shall overshadow thee: therefore also that holy thing which shall be born of thee shall be called the Son of God.

37     For with God nothing shall be impossible.

80     And the child grew, and waxed strong in spirit,

3. लूका 4: 14, 15, 32-36, 38-41

14     फिर यीशु आत्मा की सामर्थ से भरा हुआ गलील को लौटा, और उस की चर्चा आस पास के सारे देश में फैल गई।

15     और वह उन की आराधनालयों में उपदेश करता रहा, और सब उस की बड़ाई करते थे॥

32     वे उस के उपदेश से चकित हो गए क्योंकि उसका वचन अधिकार सहित था।

33     आराधनालय में एक मनुष्य था, जिस में अशुद्ध आत्मा थी।

34     वह ऊंचे शब्द से चिल्ला उठा, हे यीशु नासरी, हमें तुझ से क्या काम? क्या तू हमें नाश करने आया है? मैं तुझे जानता हूं तू कौन है? तू परमेश्वर का पवित्र जन है।

35     यीशु ने उसे डांटकर कहा, चुप रह: और उस में से निकल जा: तब दुष्टात्मा उसे बीच में पटककर बिना हानि पहुंचाए उस में से निकल गई।

36     इस पर सब को अचम्भा हुआ, और वे आपस में बातें करके कहने लगे, यह कैसा वचन है कि वह अधिकार और सामर्थ के साथ अशुद्ध आत्माओं को आज्ञा देता है, और वे निकल जाती

38     वह आराधनालय में से उठकर शमौन के घर में गया और शमौन की सास को ज्वर चढ़ा हुआ था, और उन्होंने उसके लिये उस से बिनती की।

39     उस ने उसके निकट खड़े होकर ज्वर को डांटा और वह उस पर से उतर गया और वह तुरन्त उठकर उन की सेवा टहल करने लगी॥

40     सूरज डूबते समय जिन जिन के यहां लोग नाना प्रकार की बीमारियों में पड़े हुए थे, वे सब उन्हें उसके पास ले आए, और उस ने एक एक पर हाथ रखकर उन्हें चंगा किया।

41     और दुष्टात्मा चिल्लाती और यह कहती हुई कि तू परमेश्वर का पुत्र है, बहुतों में से निकल गईं पर वह उन्हें डांटता और बोलने नहीं देता था, क्योंकि वे जानते थे, कि यह मसीह है॥

3. Luke 4 : 14, 15, 32-36, 38-41

14     And Jesus returned in the power of the Spirit into Galilee: and there went out a fame of him through all the region round about.

15     And he taught in their synagogues, being glorified of all.

32     And they were astonished at his doctrine: for his word was with power.

33     And in the synagogue there was a man, which had a spirit of an unclean devil, and cried out with a loud voice,

34     Saying, Let us alone; what have we to do with thee, thou Jesus of Nazareth? art thou come to destroy us? I know thee who thou art; the Holy One of God.

35     And Jesus rebuked him, saying, Hold thy peace, and come out of him. And when the devil had thrown him in the midst, he came out of him, and hurt him not.

36     And they were all amazed, and spake among themselves, saying, What a word is this! for with authority and power he commandeth the unclean spirits, and they come out.

38     And he arose out of the synagogue, and entered into Simon’s house. And Simon’s wife’s mother was taken with a great fever; and they besought him for her.

39     And he stood over her, and rebuked the fever; and it left her: and immediately she arose and ministered unto them.

40     Now when the sun was setting, all they that had any sick with divers diseases brought them unto him; and he laid his hands on every one of them, and healed them.

41     And devils also came out of many, crying out, and saying, Thou art Christ the Son of God. And he rebuking them suffered them not to speak: for they knew that he was Christ.

4. यूहन्ना 8: 58

58     यीशु ने उन से कहा; मैं तुम से सच सच कहता हूं; कि पहिले इसके कि इब्राहीम उत्पन्न हुआ मैं हूं।

4. John 8 : 58

58     Jesus said unto them, Verily, verily, I say unto you, Before Abraham was, I am.

5. यूहन्ना 14: 2 (से :), 16, 17 (से 1st ;), 19 (से ;), 26, 30, 31

2     मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं, यदि न होते, तो मैं तुम से कह देता क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूं।

16     और मैं पिता से बिनती करूंगा, और वह तुम्हें एक और सहायक देगा, कि वह सर्वदा तुम्हारे साथ रहे।

17     अर्थात सत्य का आत्मा, जिसे संसार ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह न उसे देखता है और न उसे जानता है: तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है, और वह तुम में होगा।

19     और थोड़ी देर रह गई है कि फिर संसार मुझे न देखेगा, परन्तु तुम मुझे देखोगे, इसलिये कि मैं जीवित हूं, तुम भी जीवित रहोगे।

26     परन्तु सहायक अर्थात पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा।

30     मैं अब से तुम्हारे साथ और बहुत बातें न करूंगा, क्योंकि इस संसार का सरदार आता है, और मुझ में उसका कुछ नहीं।

31     परन्तु यह इसलिये होता है कि संसार जाने कि मैं पिता से प्रेम रखता हूं, और जिस तरह पिता ने मुझे आज्ञा दी, मैं वैसे ही करता हूं: उठो, यहां से चलें॥

5. John 14 : 2 (to :), 16, 17 (to 1st ;), 19 (to ;), 26, 30, 31

2     In my Father’s house are many mansions:

16     And I will pray the Father, and he shall give you another Comforter, that he may abide with you for ever;

17     Even the Spirit of truth;

19     Yet a little while, and the world seeth me no more;

26     But the Comforter, which is the Holy Ghost, whom the Father will send in my name, he shall teach you all things, and bring all things to your remembrance, whatsoever I have said unto you.

30     Hereafter I will not talk much with you: for the prince of this world cometh, and hath nothing in me.

31     But that the world may know that I love the Father; and as the Father gave me commandment, even so I do. Arise, let us go hence.

6. मत्ती 27: 1, 23, 35 (से,)

1     जब भोर हुई, तो सब महायाजकों और लोगों के पुरनियों ने यीशु के मार डालने की सम्मति की।

23     हाकिम ने कहा; क्यों उस ने क्या बुराई की है? परन्तु वे और भी चिल्ला, चिल्लाकर कहने लगे, वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।

35     तब उन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाया; और चिट्ठियां डालकर उसके कपड़े बांट लिए।

6. Matthew 27 : 1, 23, 35 (to ,)

1     When the morning was come, all the chief priests and elders of the people took counsel against Jesus to put him to death:

23     And the governor said, Why, what evil hath he done? But they cried out the more, saying, Let him be crucified.

35     And they crucified him, and parted his garments, casting lots: that it might be fulfilled which was spoken by the prophet, They parted my garments among them, and upon my vesture did they cast lots.

7. यूहन्ना 20: 1, 11-13 (से 4th,), 14-16, 19

1     सप्ताह के पहिले दिन मरियम मगदलीनी भोर को अंधेरा रहते ही कब्र पर आई, और पत्थर को कब्र से हटा हुआ देखा।

11     परन्तु मरियम रोती हुई कब्र के पास ही बाहर खड़ी रही और रोते रोते कब्र की ओर झुककर,

12     दो स्वर्गदूतों को उज्ज़वल कपड़े पहिने हुए एक को सिरहाने और दूसरे को पैताने बैठे देखा, जहां यीशु की लोथ पड़ी थी।

13     उन्होंने उस से कहा, हे नारी, तू क्यों रोती है? उस ने उन से कहा, वे मेरे प्रभु को उठा ले गए और मैं नहीं जानती कि उसे कहां रखा है।

14     यह कहकर वह पीछे फिरी और यीशु को खड़े देखा और न पहचाना कि यह यीशु है।

15     यीशु ने उस से कहा, हे नारी तू क्यों रोती है? किस को ढूंढ़ती है? उस ने माली समझकर उस से कहा, हे महाराज, यदि तू ने उसे उठा लिया है तो मुझ से कह कि उसे कहां रखा है और मैं उसे ले जाऊंगी।

16     यीशु ने उस से कहा, मरियम! उस ने पीछे फिरकर उस से इब्रानी में कहा, रब्बूनी अर्थात हे गुरू।

19     उसी दिन जो सप्ताह का पहिला दिन था, सन्ध्या के समय जब वहां के द्वार जहां चेले थे, यहूदियों के डर के मारे बन्द थे, तब यीशु आया और बीच में खड़ा होकर उन से कहा, तुम्हें शान्ति मिले।

7. John 20 : 1, 11-13 (to 4th ,), 14-16, 19

1     The first day of the week cometh Mary Magdalene early, when it was yet dark, unto the sepulchre, and seeth the stone taken away from the sepulchre.

11     But Mary stood without at the sepulchre weeping: and as she wept, she stooped down, and looked into the sepulchre,

12     And seeth two angels in white sitting, the one at the head, and the other at the feet, where the body of Jesus had lain.

13     And they say unto her, Woman, why weepest thou? She saith unto them, Because they have taken away my Lord,

14     And when she had thus said, she turned herself back, and saw Jesus standing, and knew not that it was Jesus.

15     Jesus saith unto her, Woman, why weepest thou? whom seekest thou? She, supposing him to be the gardener, saith unto him, Sir, if thou have borne him hence, tell me where thou hast laid him, and I will take him away.

16     Jesus saith unto her, Mary. She turned herself, and saith unto him, Rabboni; which is to say, Master.

19     Then the same day at evening, being the first day of the week, when the doors were shut where the disciples were assembled for fear of the Jews, came Jesus and stood in the midst, and saith unto them, Peace be unto you.

8. लूका 24: 45, 46, 48, 50-53

45     तब उस ने पवित्र शास्त्र बूझने के लिये उन की समझ खोल दी।

46     और उन से कहा, यों लिखा है; कि मसीह दु: ख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा।

48     तुम इन सब बातें के गवाह हो।

50     तब वह उन्हें बैतनिय्याह तक बाहर ले गया, और अपने हाथ उठाकर उन्हें आशीष दी।

51     और उन्हें आशीष देते हुए वह उन से अलग हो गया और स्वर्ग से उठा लिया गया।

52     और वे उस को दण्डवत करके बड़े आनन्द से यरूशलेम को लौट गए।

53     और लगातार मन्दिर में उपस्थित होकर परमेश्वर की स्तुति किया करते थे॥

8. Luke 24 : 45, 46, 48, 50-53

45     Then opened he their understanding, that they might understand the scriptures,

46     And said unto them, Thus it is written, and thus it behoved Christ to suffer, and to rise from the dead the third day:

48     And ye are witnesses of these things.

50     And he led them out as far as to Bethany, and he lifted up his hands, and blessed them.

51     And it came to pass, while he blessed them, he was parted from them, and carried up into heaven.

52     And they worshipped him, and returned to Jerusalem with great joy:

53     And were continually in the temple, praising and blessing God. Amen.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 333: 16 (यह)-23, 26-30

नासरत के यीशु के आगमन ने ईसाई युग की पहली शताब्दी को चिह्नित किया, लेकिन मसीह वर्षों या दिनों की शुरुआत के बिना है। ईसाई युग से पहले और बाद में सभी पीढ़ियों के दौरान, आध्यात्मिक विचार के रूप में, मसीह, - भगवान का प्रतिबिंब, - शक्ति और अनुग्रह के कुछ उपाय के साथ आया है जो सभी मसीह, सत्य को प्राप्त करने के लिए तैयार हैं। ... ईश्वरीय छवि, विचार, या मसीह ईश्वरीय सिद्धांत ईश्वर से अविभाज्य था, है और हमेशा के लिए रहेगा। यीशु ने अपनी आध्यात्मिक पहचान की इस एकता का उल्लेख किया: "पहिले इसके कि इब्राहीम उत्पन्न हुआ मैं हूं।" "मैं और पिता एक हैं।" "पिता मुझ से बड़ा है।" एक आत्मा में सभी पहचान शामिल हैं।

1. 333 : 16 (The)-23, 26-30

The advent of Jesus of Nazareth marked the first century of the Christian era, but the Christ is without beginning of years or end of days. Throughout all generations both before and after the Christian era, the Christ, as the spiritual idea, — the reflection of God, — has come with some measure of power and grace to all prepared to receive Christ, Truth. ... The divine image, idea, or Christ was, is, and ever will be inseparable from the divine Principle, God. Jesus referred to this unity of his spiritual identity thus: "Before Abraham was, I am;" "I and my Father are one;" "My Father is greater than I."

2. 52: 1-14

बचपन से ही, वह अपने "पिता के व्यवसाय" में शामिल थे। उसकी खोज दूसरों से बहुत अलग थी। उसका स्वामी आत्मा था; लेकिन उनका स्वामी सामग्री था। उसने परमेश्वर की सेवा की; उन्होंने लालच की सेवा की। उसके स्नेह शुद्ध थे; उनके कामुक थे। उसके स्वास्थ्य, पवित्रता और जीवन के आध्यात्मिक प्रमाण में इन्द्रियाँ डूब जाती हैं; उनकी इंद्रियों ने विपरीत रूप से गवाही दी और पाप, बीमारी और मृत्यु के भौतिक साक्ष्य को आत्मसात कर लिया।

उनकी अपूर्णताओं और अशुद्धियों को उसकी पूर्णता और पवित्रता की सदैव फटकार महसूस होती थी। इसलिए न्यायपूर्ण और पूर्ण यीशु के प्रति दुनिया की नफरत, और भविष्यवक्ता की दूरदर्शिता के कारण उसे स्वागत में त्रुटि मिलेगी। "वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था," शांति के आने वाले राजकुमार के विषय में यशायाह का ग्राफिक शब्द था।

2. 52 : 1-14

From early boyhood he was about his "Father's business." His pursuits lay far apart from theirs. His master was Spirit; their master was matter. He served God; they served mammon. His affections were pure; theirs were carnal. His senses drank in the spiritual evidence of health, holiness, and life; their senses testified oppositely, and absorbed the material evidence of sin, sickness, and death.

Their imperfections and impurity felt the ever-present rebuke of his perfection and purity. Hence the world's hatred of the just and perfect Jesus, and the prophet's foresight of the reception error would give him. "Despised and rejected of men," was Isaiah's graphic word concerning the coming Prince of Peace.

3. 26: 28-32

हमारे मास्टर ने कोई विचार, सिद्धांत या विश्वास नहीं सिखाया। यह सभी वास्तविक लोगों का दिव्य सिद्धांत था जो उन्होंने सिखाया और अभ्यास किया। ईसाई धर्म का उनका प्रमाण धर्म और पूजा का कोई रूप या प्रणाली नहीं था, लेकिन क्रिश्चियन साइंस, जो जीवन और प्रेम के सामंजस्य को दर्शाता है।

3. 26 : 28-32

Our Master taught no mere theory, doctrine, or belief. It was the divine Principle of all real being which he taught and practised. His proof of Christianity was no form or system of religion and worship, but Christian Science, working out the harmony of Life and Love.

4. 117: 16-23

अपने आप में जीवन और सत्य का चित्रण और प्रदर्शन करते हुए और बीमारों और पापियों पर अपनी शक्ति के द्वारा, एक दिव्य छात्र के रूप में, उन्होंने ईश्वर को मनुष्य के सामने प्रकट किया। यीशु द्वारा किए गए चमत्कारों (अजीब कार्यों) और विशेष रूप से उनके शक्तिशाली, मुकुटधारी, अद्वितीय और विजयी शरीर से बाहर निकलने में शामिल दैवीय सिद्धांत की व्याख्या करने के लिए मानव सिद्धांत अपर्याप्त हैं।

4. 117 : 16-23

As a divine student he unfolded God to man, illustrating and demonstrating Life and Truth in himself and by his power over the sick and sinning. Human theories are inadequate to interpret the divine Principle involved in the miracles (marvels) wrought by Jesus and especially in his mighty, crowning, unparalleled, and triumphant exit from the flesh.

5. 45: 32-12

यीशु के शिष्य, जो अपने गुरु की विजय को समझने के लिए पूरी तरह से विकसित नहीं थे, उन्होंने कई अद्भुत कार्य नहीं किए, जब तक कि उन्होंने उन्हें सूली पर चढ़ने के बाद नहीं देखा और पता नहीं चला कि उनकी मृत्यु नहीं हुई है। इससे उन्हें उनके द्वारा सिखाई गई सभी बातों की सत्यता का विश्वास हो गया।

इम्माऊस की यात्रा में, यीशु को उसके दोस्तों ने उन शब्दों से, और रोटी तोड़ने से जाना, जिससे उनके हृदय जल उठे। दिव्य आत्मा, जिसने सदियों पहले यीशु की पहचान की थी, ने प्रेरित वचन के माध्यम से बात की है और हर युग और समय में इसके माध्यम से बात करेगी। यह ग्रहणशील हृदय पर प्रकट होता है, और फिर से बुराई को दूर करता और बीमारों को ठीक करता हुआ दिखाई देता है।

5. 45 : 32-12

Jesus' students, not sufficiently advanced fully to understand their Master's triumph, did not perform many wonderful works, until they saw him after his crucifixion and learned that he had not died. This convinced them of the truthfulness of all that he had taught.

In the walk to Emmaus, Jesus was known to his friends by the words, which made their hearts burn within them, and by the breaking of bread. The divine Spirit, which identified Jesus thus centuries ago, has spoken through the inspired Word and will speak through it in every age and clime. It is revealed to the receptive heart, and is again seen casting out evil and healing the sick.

6. 131: 26-30

यीशु के मिशन ने भविष्यवाणी की पुष्टि की, और पुराने समय के तथाकथित चमत्कारों को ईश्वरीय शक्ति के प्राकृतिक प्रदर्शनों, प्रदर्शनों के रूप में समझाया, जिन्हें समझा नहीं गया था। यीशु के कार्यों ने मसीहा पद पर उसके दावे को स्थापित किया।

6. 131 : 26-30

The mission of Jesus confirmed prophecy, and explained the so-called miracles of olden time as natural demonstrations of the divine power, demonstrations which were not understood. Jesus' works established his claim to the Messiahship.

7. 51: 6-18

यीशु स्वयं को अपने शत्रुओं से अलग कर सकता था। उनमें परमात्मा की समानता में अपनी आध्यात्मिक पहचान के लिए जीवन की मानवीय भावना को त्यागने की शक्ति थी; लेकिन उसने मनुष्यों को नश्वर शरीर को नष्ट करने का प्रयास करने की अनुमति दी ताकि वह अमर जीवन का प्रमाण प्रस्तुत कर सके। मनुष्य के इस जीवन को कोई नहीं मार सकता। यीशु अपना लौकिक जीवन अपने शत्रुओं के हाथों में दे सकता था; लेकिन जब उनका पृथ्वी-मिशन पूरा हुआ, तो उनका आध्यात्मिक जीवन, अविनाशी और शाश्वत, हमेशा के लिए वही पाया गया। वह जानता था कि पदार्थ में कोई जीवन नहीं है और वास्तविक जीवन ईश्वर है; इसलिए उसे अपने आध्यात्मिक जीवन से तब तक अलग नहीं किया जा सकता जब तक ईश्वर को समाप्त नहीं किया जा सकता।

7. 51 : 6-18

Jesus could have withdrawn himself from his enemies. He had power to lay down a human sense of life for his spiritual identity in the likeness of the divine; but he allowed men to attempt the destruction of the mortal body in order that he might furnish the proof of immortal life. Nothing could kill this Life of man. Jesus could give his temporal life into his enemies' hands; but when his earth-mission was accomplished, his spiritual life, indestructible and eternal, was found forever the same. He knew that matter had no life and that real Life is God; therefore he could no more be separated from his spiritual Life than God could be extinguished.

8. 18: 3-12

नासरत के यीशु ने पिता के साथ मनुष्य की एकता को सिखाया और प्रदर्शित किया, और इसके लिए हम उसे अंतहीन श्रद्धांजलि देते हैं। उनका मिशन व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों था। उन्होंने जीवन का काम न केवल स्वयं के प्रति न्याय में, बल्कि मनुष्यों पर दया करने में भी किया। यीशु ने निर्भीकता से, इंद्रियों के मान्यता प्राप्त सबूतों के खिलाफ, फरिसासिक पंथों और प्रथाओं के खिलाफ काम किया, और उन्होंने अपनी उपचार शक्ति के साथ सभी विरोधियों का खंडन किया।

8. 18 : 3-12

Jesus of Nazareth taught and demonstrated man's oneness with the Father, and for this we owe him endless homage. His mission was both individual and collective. He did life's work aright not only in justice to himself, but in mercy to mortals, — to show them how to do theirs, but not to do it for them nor to relieve them of a single responsibility. Jesus acted boldly, against the accredited evidence of the senses, against Pharisaical creeds and practices, and he refuted all opponents with his healing power.

9. 134: 14-26

मानव निर्मित सिद्धांत लुप्त हो रहे हैं। मुसीबत के समय में वे मजबूत नहीं हुए हैं। मसीह-शक्ति से रहित, वे कैसे मसीह के सिद्धांतों या अनुग्रह के चमत्कारों का वर्णन कर सकते हैं? ईसाई उपचार की संभावना से इनकार ईसाई धर्म को उसी तत्व से लूटता है, जिसने इसे पहली शताब्दी में दैवीय शक्ति और इसकी आश्चर्यजनक और अप्रतिम सफलता दी।

सच्चा लोगो प्रदर्शनकारी क्रिश्चियन साइंस है, सद्भाव का प्राकृतिक नियम जो कलह को खत्म करता है, इसलिए नहीं कि यह विज्ञान अलौकिक या अप्राकृतिक है, न ही क्योंकि यह ईश्वरीय नियम का उल्लंघन है, लेकिन क्योंकि यह भगवान का अपरिवर्तनीय नियम है, अच्छा है।

9. 134 : 14-26

Man-made doctrines are waning. They have not waxed strong in times of trouble. Devoid of the Christ-power, how can they illustrate the doctrines of Christ or the miracles of grace? Denial of the possibility of Christian healing robs Christianity of the very element, which gave it divine force and its astonishing and unequalled success in the first century.

The true Logos is demonstrably Christian Science, the natural law of harmony which overcomes discord, — not because this Science is supernatural or preternatural, nor because it is an infraction of divine law, but because it is the immutable law of God, good.

10. 304: 9-15

यह क्रिश्चियन साइंस का सिद्धांत है: उस दिव्य प्रेम को उसकी अभिव्यक्ति, या वस्तु से वंचित नहीं किया जा सकता है; वह आनन्द दुःख में नहीं बदल सकता, क्योंकि दुःख आनन्द का स्वामी नहीं है; वह अच्छाई कभी स्पष्ट नहीं कर सकता; वह पदार्थ कभी भी मन उत्पन्न नहीं कर सकता है और न ही जीवन का परिणाम मृत्यु है। पूर्ण पुरुष - भगवान द्वारा शासित, उनका सिद्ध सिद्धांत - पाप रहित और शाश्वत है।

10. 304 : 9-15

This is the doctrine of Christian Science: that divine Love cannot be deprived of its manifestation, or object; that joy cannot be turned into sorrow, for sorrow is not the master of joy; that good can never produce evil; that matter can never produce mind nor life result in death. The perfect man — governed by God, his perfect Principle — is sinless and eternal.

11. 55: 15-26

अपने स्वयं के पंखों के नीचे बीमार और पापी लोगों को इकट्ठा करके, सत्य का अमर विचार सदियों से चल रहा है। मेरी थकी हुई आशा उस सुखद दिन को महसूस करने की कोशिश करती है, जब मनुष्य मसीह के विज्ञान को पहचान लेगा और अपने पड़ोसी को अपने जैसा प्यार करेगा, — जब वह ईश्वर की सर्वशक्तिमानता और उस परमात्मा की उपचार शक्ति का एहसास करेगा जो उसने किया है और मानव जाति के लिए कर रहा है। वादे पूरे होंगे। दिव्य चिकित्सा के प्रकट होने का समय हर समय है; और जो कोई भी दिव्य विज्ञान की वेदी पर अपने सांसारिक स्तर को रखता है, अब मसीह के प्याले को पीता है, और वह ईसाई उपचार की भावना और शक्ति से संपन्न है।

11. 55 : 15-26

Truth's immortal idea is sweeping down the centuries, gathering beneath its wings the sick and sinning. My weary hope tries to realize that happy day, when man shall recognize the Science of Christ and love his neighbor as himself, — when he shall realize God's omnipotence and the healing power of the divine Love in what it has done and is doing for mankind. The promises will be fulfilled. The time for the reappearing of the divine healing is throughout all time; and whosoever layeth his earthly all on the altar of divine Science, drinketh of Christ's cup now, and is endued with the spirit and power of Christian healing.

12. 565: 13-18

आध्यात्मिक विचार का प्रतिरूपण हमारे मास्टर के सांसारिक जीवन में एक संक्षिप्त इतिहास था; परंतु "उसके राज्य का अन्त न होगा", क्योंकि मसीह, ईश्वर का विचार, अंततः सभी देशों और लोगों पर शासन करेगा - अनिवार्य रूप से, बिल्कुल, अंत में - दिव्य विज्ञान के साथ।

12. 565 : 13-18

The impersonation of the spiritual idea had a brief history in the earthly life of our Master; but "of his kingdom there shall be no end," for Christ, God's idea, will eventually rule all nations and peoples — imperatively, absolutely, finally — with divine Science.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6