रविवार 28 जनवरी, 2024



विषयसत्य

SubjectTruth

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: भजन संहिता 31: 5

"हे यहोवा, हे सत्यवादी ईश्वर, तू ने मुझे मोल लेकर मुक्त किया है॥"



Golden Text: Psalm 31 : 5

Thou hast redeemed me, O Lord God of truth.




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उत्तरदायी अध्ययन: यूहन्ना 14: 6 • यूहन्ना 15: 4-9


6     यीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता।

4     तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में: जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते।

5     मैं दाखलता हूं: तुम डालियां हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।

6     यदि कोई मुझ में बना न रहे, तो वह डाली की नाईं फेंक दिया जाता, और सूख जाता है; और लोग उन्हें बटोरकर आग में झोंक देते हैं, और वे जल जाती हैं।

7     यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो मांगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।

8     मेरे पिता की महिमा इसी से होती है, कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे।

9     जैसा पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही मैं ने तुम से प्रेम रखा, मेरे प्रेम में बने रहो।

Responsive Reading: John 14 : 6   •   John 15 : 4-9

6.     Jesus saith unto him, I am the way, the truth, and the life: no man cometh unto the Father, but by me.

4.     Abide in me, and I in you. As the branch cannot bear fruit of itself, except it abide in the vine; no more can ye, except ye abide in me.

5.     I am the vine, ye are the branches: He that abideth in me, and I in him, the same bringeth forth much fruit: for without me ye can do nothing.

6.     If a man abide not in me, he is cast forth as a branch, and is withered; and men gather them, and cast them into the fire, and they are burned.

7.     If ye abide in me, and my words abide in you, ye shall ask what ye will, and it shall be done unto you.

8.     Herein is my Father glorified, that ye bear much fruit; so shall ye be my disciples.

9.     As the Father hath loved me, so have I loved you: continue ye in my love.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. मत्ती 4: 23

23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

1. Matthew 4 : 23

23     And Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing all manner of sickness and all manner of disease among the people.

2. मत्ती 9: 1-7

1     फिर वह नाव पर चढ़कर पार गया; और अपने नगर में आया।

2     और देखो, कई लोग एक झोले के मारे हुए को खाट पर रखकर उसके पास लाए; यीशु ने उन का विश्वास देखकर, उस झोले के मारे हुए से कहा; हे पुत्र, ढाढ़स बान्ध; तेरे पाप क्षमा हुए।

3     और देखो, कई शास्त्रियों ने सोचा, कि यह तो परमेश्वर की निन्दा करता है।

4     यीशु ने उन के मन की बातें मालूम करके कहा, कि तुम लोग अपने अपने मन में बुरा विचार क्यों कर रहे हो?

5     सहज क्या है, यह कहना, कि तेरे पाप क्षमा हुए; या यह कहना कि उठ और चल फिर।

6     परन्तु इसलिये कि तुम जान लो कि मनुष्य के पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार है (उस ने झोले के मारे हुए से कहा) उठ: अपनी खाट उठा, और अपने घर चला जा।

7     वह उठकर अपने घर चला गया।

2. Matthew 9 : 1-7

1     And he entered into a ship, and passed over, and came into his own city.

2     And, behold, they brought to him a man sick of the palsy, lying on a bed: and Jesus seeing their faith said unto the sick of the palsy; Son, be of good cheer; thy sins be forgiven thee.

3     And, behold, certain of the scribes said within themselves, This man blasphemeth.

4     And Jesus knowing their thoughts said, Wherefore think ye evil in your hearts?

5     For whether is easier, to say, Thy sins be forgiven thee; or to say, Arise, and walk?

6     But that ye may know that the Son of man hath power on earth to forgive sins, (then saith he to the sick of the palsy,) Arise, take up thy bed, and go unto thine house.

7     And he arose, and departed to his house.

3. यूहन्ना 8: 31-36

31     तब यीशु ने उन यहूदियों से जिन्हों ने उन की प्रतीति की थी, कहा, यदि तुम मेरे वचन में बने रहोगे, तो सचमुच मेरे चेले ठहरोगे।

32     और सत्य को जानोगे, और सत्य तुम्हें स्वतंत्र करेगा।

33     उन्होंने उस को उत्तर दिया; कि हम तो इब्राहीम के वंश से हैं और कभी किसी के दास नहीं हुए; फिर तू क्योंकर कहता है, कि तुम स्वतंत्र हो जाओगे?

34     यीशु ने उन को उत्तर दिया; मैं तुम से सच सच कहता हूं कि जो कोई पाप करता है, वह पाप का दास है।

35     और दास सदा घर में नहीं रहता; पुत्र सदा रहता है।

36     सो यदि पुत्र तुम्हें स्वतंत्र करेगा, तो सचमुच तुम स्वतंत्र हो जाओगे।

3. John 8 : 31-36

31     Then said Jesus to those Jews which believed on him, If ye continue in my word, then are ye my disciples indeed;

32     And ye shall know the truth, and the truth shall make you free.

33     They answered him, We be Abraham’s seed, and were never in bondage to any man: how sayest thou, Ye shall be made free?

34     Jesus answered them, Verily, verily, I say unto you, Whosoever committeth sin is the servant of sin.

35     And the servant abideth not in the house for ever: but the Son abideth ever.

36     If the Son therefore shall make you free, ye shall be free indeed.

4. यूहन्ना 14: 16-26

16     और मैं पिता से बिनती करूंगा, और वह तुम्हें एक और सहायक देगा, कि वह सर्वदा तुम्हारे साथ रहे।

17     अर्थात सत्य का आत्मा, जिसे संसार ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह न उसे देखता है और न उसे जानता है: तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है, और वह तुम में होगा।

18     मैं तुम्हें अनाथ न छोडूंगा, मैं तुम्हारे पास आता हूं।

19     और थोड़ी देर रह गई है कि फिर संसार मुझे न देखेगा, परन्तु तुम मुझे देखोगे, इसलिये कि मैं जीवित हूं, तुम भी जीवित रहोगे।

20     उस दिन तुम जानोगे, कि मैं अपने पिता में हूं, और तुम मुझ में, और मैं तुम में।

21     जिस के पास मेरी आज्ञा है, और वह उन्हें मानता है, वही मुझ से प्रेम रखता है, और जो मुझ से प्रेम रखता है, उस से मेरा पिता प्रेम रखेगा, और मैं उस से प्रेम रखूंगा, और अपने आप को उस पर प्रगट करूंगा।

22     उस यहूदा ने जो इस्करियोती न था, उस से कहा, हे प्रभु, क्या हुआ की तू अपने आप को हम पर प्रगट किया चाहता है, और संसार पर नहीं।

23     यीशु ने उस को उत्तर दिया, यदि कोई मुझ से प्रेम रखे, तो वह मेरे वचन को मानेगा, और मेरा पिता उस से प्रेम रखेगा, और हम उसके पास आएंगे, और उसके साथ वास करेंगे।

24     जो मुझ से प्रेम नहीं रखता, वह मेरे वचन नहीं मानता, और जो वचन तुम सुनते हो, वह मेरा नहीं वरन पिता का है, जिस ने मुझे भेजा॥

25     ये बातें मैं ने तुम्हारे साथ रहते हुए तुम से कहीं।

26     परन्तु सहायक अर्थात पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा।

4. John 14 : 16-26

16     And I will pray the Father, and he shall give you another Comforter, that he may abide with you for ever;

17     Even the Spirit of truth; whom the world cannot receive, because it seeth him not, neither knoweth him: but ye know him; for he dwelleth with you, and shall be in you.

18     I will not leave you comfortless: I will come to you.

19     Yet a little while, and the world seeth me no more; but ye see me: because I live, ye shall live also.

20     At that day ye shall know that I am in my Father, and ye in me, and I in you.

21     He that hath my commandments, and keepeth them, he it is that loveth me: and he that loveth me shall be loved of my Father, and I will love him, and will manifest myself to him.

22     Judas saith unto him, not Iscariot, Lord, how is it that thou wilt manifest thyself unto us, and not unto the world?

23     Jesus answered and said unto him, If a man love me, he will keep my words: and my Father will love him, and we will come unto him, and make our abode with him.

24     He that loveth me not keepeth not my sayings: and the word which ye hear is not mine, but the Father’s which sent me.

25     These things have I spoken unto you, being yet present with you.

26     But the Comforter, which is the Holy Ghost, whom the Father will send in my name, he shall teach you all things, and bring all things to your remembrance, whatsoever I have said unto you.

5. प्रेरितों के काम 12: 5-17 (से 1st.)

5     सो बन्दीगृह में पतरस की रखवाली हो रही थी; परन्तु कलीसिया उसके लिये लौ लगाकर परमेश्वर से प्रार्थना कर रही थी।

6     और जब हेरोदेस उसे उन के साम्हने लाने को था, तो उसी रात पतरस दो जंजीरों से बन्धा हुआ, दो सिपाहियों के बीच में सो रहा था: और पहरूए द्वार पर बन्दीगृह की रखवाली कर रहे थे।

7     तो देखो, प्रभु का एक स्वर्गदूत आ खड़ा हुआ: और उस कोठरी में ज्योति चमकी: और उस ने पतरस की पसली पर हाथ मार के उसे जगाया, और कहा; उठ, फुरती कर, और उसके हाथ से जंजीरें खुलकर गिर पड़ीं।

8     तब स्वर्गदूत ने उस से कहा; कमर बान्ध, और अपने जूते पहिन ले: उस ने वैसा ही किया, फिर उस ने उस से कहा; अपना वस्त्र पहिनकर मेरे पीछे हो ले।

9     वह निकलकर उसके पीछे हो लिया; परन्तु यह न जानता था, कि जो कुछ स्वर्गदूत कर रहा है, वह सचमुच है, वरन यह समझा, कि मैं दर्शन देख रहा हूं।

10     तब वे पहिल और दूसरे पहरे से निकलकर उस लोहे के फाटक पर पहुंचे, जो नगर की ओर है; वह उन के लिये आप से आप खुल गया: और वे निकलकर एक ही गली होकर गए, इतने में स्वर्गदूत उसे छोड़कर चला गया।

11     तब पतरस ने सचेत होकर कहा; अब मैं ने सच जान लिया कि प्रभु ने अपना स्वर्गदूत भेजकर मुझे हेरोदेस के हाथ से छुड़ा लिया, और यहूदियों की सारी आशा तोड़ दी।

12     और यह सोचकर, वह उस यूहन्ना की माता मरियम के घर आया, जो मरकुस कहलाता है; वहां बहुत लोग इकट्ठे होकर प्रार्थना कर रहे थे।

13     जब उस ने फाटक की खिड़की खटखटाई; तो रूदे नाम एक दासी सुनने को आई।

14     और पतरस का शब्द पहचानकर, उस ने आनन्द के मारे फाटक न खोला; परन्तु दौड़कर भीतर गई, और बताया कि पतरस द्वार पर खड़ा है।

15     उन्होंने उस से कहा; तू पागल है, परन्तु वह दृढ़ता से बोली, कि ऐसा ही है: तब उन्होंने कहा, उसका स्वर्गदूत होगा।

16     परन्तु पतरस खटखटाता ही रहा: सो उन्होंने खिड़की खोली, और उसे देखकर चकित हो गए।

17     तब उस ने उन्हें हाथ से सैन किया, कि चुप रहें; और उन को बताया, कि प्रभु किस रीति से मुझे बन्दीगृह से निकाल लाया है: फिर कहा, कि याकूब और भाइयों को यह बात कह देना; तब निकलकर दूसरी जगह चला गया।

5. Acts 12 : 5-17 (to 1st .)

5     Peter therefore was kept in prison: but prayer was made without ceasing of the church unto God for him.

6     And when Herod would have brought him forth, the same night Peter was sleeping between two soldiers, bound with two chains: and the keepers before the door kept the prison.

7     And, behold, the angel of the Lord came upon him, and a light shined in the prison: and he smote Peter on the side, and raised him up, saying, Arise up quickly. And his chains fell off from his hands.

8     And the angel said unto him, Gird thyself, and bind on thy sandals. And so he did. And he saith unto him, Cast thy garment about thee, and follow me.

9     And he went out, and followed him; and wist not that it was true which was done by the angel; but thought he saw a vision.

10     When they were past the first and the second ward, they came unto the iron gate that leadeth unto the city; which opened to them of his own accord: and they went out, and passed on through one street; and forthwith the angel departed from him.

11     And when Peter was come to himself, he said, Now I know of a surety, that the Lord hath sent his angel, and hath delivered me out of the hand of Herod, and from all the expectation of the people of the Jews.

12     And when he had considered the thing, he came to the house of Mary the mother of John, whose surname was Mark; where many were gathered together praying.

13     And as Peter knocked at the door of the gate, a damsel came to hearken, named Rhoda.

14     And when she knew Peter’s voice, she opened not the gate for gladness, but ran in, and told how Peter stood before the gate.

15     And they said unto her, Thou art mad. But she constantly affirmed that it was even so. Then said they, It is his angel.

16     But Peter continued knocking: and when they had opened the door, and saw him, they were astonished.

17     But he, beckoning unto them with the hand to hold their peace, declared unto them how the Lord had brought him out of the prison.

6. 2 कुरिन्थियों 3: 17

17     प्रभु तो आत्मा है: और जहां कहीं प्रभु का आत्मा है वहां स्वतंत्रता है।

6. II Corinthians 3 : 17

17     Now the Lord is that Spirit: and where the Spirit of the Lord is, there is liberty.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 412: 16-18

बीमारी को रोकने या उसका इलाज करने के लिए, सत्य की शक्ति, दिव्य आत्मा की शक्ति को भौतिक इंद्रियों के सपने को तोड़ना होगा।

1. 412 : 16-18

To prevent disease or to cure it, the power of Truth, of divine Spirit, must break the dream of the material senses.

2. 243: 25-29

सत्य में त्रुटि की कोई चेतना नहीं है। प्रेम में घृणा का भाव नहीं होता। जीवन का मृत्यु से कोई संबंध नहीं है। सत्य, जीवन और प्रेम अपने से भिन्न हर चीज के विनाश का नियम हैं, क्योंकि वे ईश्वर के अलावा कुछ भी घोषित नहीं करते हैं।

2. 243 : 25-29

Truth has no consciousness of error. Love has no sense of hatred. Life has no partnership with death. Truth, Life, and Love are a law of annihilation to everything unlike themselves, because they declare nothing except God.

3. 307: 25-30

सत्य की कोई शुरुआत नहीं होती. दिव्य मन मनुष्य की आत्मा है, और यह मनुष्य को सभी चीजों पर प्रभुत्व प्रदान करता है। मनुष्य को भौतिक आधार से नहीं बनाया गया था, न ही उन भौतिक कानूनों का पालन करने पर प्रतिबंध लगाया गया है जो आत्मा ने कभी नहीं बनाए; उनका प्रांत मन की उच्च विधि में आध्यात्मिक विधियों में है।

3. 307 : 25-30

Truth has no beginning. The divine Mind is the Soul of man, and gives man dominion over all things. Man was not created from a material basis, nor bidden to obey material laws which Spirit never made; his province is in spiritual statutes, in the higher law of Mind.

4. 259: 11-14

वैज्ञानिक होने और दैवीय उपचार की मसीह की समझ में एक आदर्श सिद्धांत और विचार शामिल हैं, पूर्ण ईश्वर और पूर्ण मनुष्य, विचार और प्रदर्शन के आधार के रूप में।

4. 259 : 11-14

The Christlike understanding of scientific being and divine healing includes a perfect Principle and idea, — perfect God and perfect man, — as the basis of thought and demonstration.

5. 210: 11-18

यह जानकर कि आत्मा और उसकी विशेषताओं को हमेशा मनुष्य के माध्यम से प्रकट किया गया था, मास्टर ने बीमारों को चंगा किया, अंधे को दृष्टि दी, बधिर को सुना, पैरों को लंगड़ा किया, इस प्रकार दिव्य की वैज्ञानिक कार्रवाई को प्रकाश में लाया मानव मन और शरीर पर मन और आत्मा और मोक्ष की बेहतर समझ देना। यीशु ने एक ही आध्यात्मिक प्रक्रिया के द्वारा बीमारी और पाप को चंगा किया।

5. 210 : 11-18

Knowing that Soul and its attributes were forever manifested through man, the Master healed the sick, gave sight to the blind, hearing to the deaf, feet to the lame, thus bringing to light the scientific action of the divine Mind on human minds and bodies and giving a better understanding of Soul and salvation. Jesus healed sickness and sin by one and the same metaphysical process.

6. 7: 27-23

जब से लेखिका ने रोग और पाप दोनों के उपचार में सत्य की शक्ति की खोज की है, तब से उसकी प्रणाली का पूरी तरह से परीक्षण किया गया है और उसे कम नहीं पाया गया है; लेकिन ईसाई विज्ञान की ऊंचाइयों तक पहुंचने के लिए, मनुष्य को इसके दिव्य सिद्धांत का पालन करते हुए रहना होगा। इस विज्ञान की पूर्ण शक्ति विकसित करने के लिए, भौतिक इंद्रियों की विसंगतियों को आध्यात्मिक भावना के सामंजस्य के रूप में प्रस्तुत करना होगा, जैसे कि संगीत का विज्ञान गलत स्वरों को सही करता है और ध्वनि को मधुर सामंजस्य प्रदान करता है।

धर्मशास्त्र और भौतिकी सिखाते हैं कि आत्मा और पदार्थ दोनों वास्तविक और अच्छे हैं, जबकि तथ्य यह है कि आत्मा अच्छा और वास्तविक है, और पदार्थ आत्मा के विपरीत है। प्रश्न, सत्य क्या है, का उत्तर प्रदर्शन द्वारा दिया जाता है, - रोग और पाप दोनों को ठीक करके; और यह प्रदर्शन दर्शाता है कि ईसाई उपचार सबसे अधिक स्वास्थ्य प्रदान करता है और सर्वोत्तम मनुष्य बनाता है। इस आधार पर क्रिश्चियन साइंस में निष्पक्ष लड़ाई होगी। सदियों से डॉक्टरों द्वारा भौतिक उपचारों का उपयोग करके बीमारी का मुकाबला किया जाता रहा है; लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इन अभ्यासियों के कारण बीमारियाँ कम होती हैं? एक जोरदार "नहीं" दो सहवर्ती तथ्यों से प्राप्त होने वाली प्रतिक्रिया है, - मध्यकाल की प्रतिष्ठित दीर्घायु, और बाढ़ के बाद से बीमारियों की तीव्र वृद्धि और बढ़ी हुई हिंसा।

6. vii : 27-23

Since the author's discovery of the might of Truth in the treatment of disease as well as of sin, her system has been fully tested and has not been found wanting; but to reach the heights of Christian Science, man must live in obedience to its divine Principle. To develop the full might of this Science, the discords of corporeal sense must yield to the harmony of spiritual sense, even as the science of music corrects false tones and gives sweet concord to sound.

Theology and physics teach that both Spirit and matter are real and good, whereas the fact is that Spirit is good and real, and matter is Spirit's opposite. The question, What is Truth, is answered by demonstration, — by healing both disease and sin; and this demonstration shows that Christian healing confers the most health and makes the best men. On this basis Christian Science will have a fair fight. Sickness has been combated for centuries by doctors using material remedies; but the question arises, Is there less sickness because of these practitioners? A vigorous "No" is the response deducible from two connate facts, — the reputed longevity of the Antediluvians, and the rapid multiplication and increased violence of diseases since the flood.

7. 458: 15-19

इस तरह की विपत्ति से पीड़ित होने के बाद, लेखक इसे क्रिश्चियन साइंस से बाहर रखने की इच्छा रखता है। सत्य की दोधारी तलवार को ''जीवन के वृक्ष'' की रक्षा के लिए हर दिशा में मुड़ना चाहिए।

7. 458 : 15-19

Semper paratus is Truth's motto. Having seen so much suffering from quackery, the author desires to keep it out of Christian Science. The two-edged sword of Truth must turn in every direction to guard "the tree of life."

8. 411: 10-12, 20-23

यदि आत्मा या दिव्य प्रेम की शक्ति सत्य की गवाही देती है, तो यह अंतिम चेतावनी है, वैज्ञानिक तरीका है, और उपचार तत्काल है।

सभी बीमारी का कारण और आधार भय, अज्ञानता या पाप है। रोग हमेशा एक झूठी भावना से प्रेरित होता है जो मानसिक रूप से मनोरंजन करता है, नष्ट नहीं होता है। रोग बाह्य विचार की एक छवि है।

8. 411 : 10-12, 20-23

If Spirit or the power of divine Love bear witness to the truth, this is the ultimatum, the scientific way, and the healing is instantaneous.

The procuring cause and foundation of all sickness is fear, ignorance, or sin. Disease is always induced by a false sense mentally entertained, not destroyed. Disease is an image of thought externalized.

9. 224: 28-13

सत्य स्वतंत्रता के तत्वों को लाता है। इसके बैनर पर आत्मा से प्रेरित आदर्श वाक्य है, "गुलामी को समाप्त कर दिया गया है।" भगवान की शक्ति कैद में उद्धार लाता है। कोई भी शक्ति दिव्य प्रेम का सामना नहीं कर सकती। यह कौन सी शक्ति है, जो स्वयं ईश्वर का विरोध करती है? यह किसके साथ आता है? वह कौन सी चीज है जो मनुष्य को पाप, बीमारी और मृत्यु के लिए लोहे की छड़ से बांधती है? जो कुछ भी मनुष्य को गुलाम बनाता है वह ईश्वरीय सरकार का विरोध करता है. सत्य ही मनुष्य को मुक्त बनाता है।

आप जान सकते हैं कि पहला सत्य अपने अनुयायियों की पवित्रता और ईमानदारी से कब आगे बढ़ता है। इस प्रकार यह है कि समय की स्वतंत्रता के बैनर पर मार्च का आयोजन होता है। इस दुनिया की शक्तियाँ लड़ेंगी, और अपने प्रहरी को आज्ञा देंगी कि जब तक वह अपने सिस्टम की सदस्यता न ले, तब तक सच्चाई को पहरा न दें; लेकिन नुकीले चाकू की ओर ध्यान न देकर विज्ञान मार्च करता है। हमेशा कुछ खटपट होती है, लेकिन सच्चाई के मानक के लिए एक रैली है।

9. 224 : 28-13

Truth brings the elements of liberty. On its banner is the Soul-inspired motto, "Slavery is abolished." The power of God brings deliverance to the captive. No power can withstand divine Love. What is this supposed power, which opposes itself to God? Whence cometh it? What is it that binds man with iron shackles to sin, sickness, and death? Whatever enslaves man is opposed to the divine government. Truth makes man free.

You may know when first Truth leads by the fewness and faithfulness of its followers. Thus it is that the march of time bears onward freedom's banner. The powers of this world will fight, and will command their sentinels not to let truth pass the guard until it subscribes to their systems; but Science, heeding not the pointed bayonet, marches on. There is always some tumult, but there is a rallying to truth's standard.

10. 227: 14-20

मनुष्य के अधिकारों को त्यागकर, हम सभी उत्पीड़न के विनाश को दूर करने में विफल नहीं हो सकते। गुलामी मनुष्य की वैध स्थिति नहीं है। ईश्वर ने मनुष्य को स्वतंत्र किया। पाल ने कहा, "मैं आज़ाद पैदा हुआ था।" सभी पुरुषों को स्वतंत्र होना चाहिए। "जहां कहीं प्रभु का आत्मा है, वहां स्वतंत्रता है।" प्रेम और सत्य मुक्त करते हैं, लेकिन बुराई और त्रुटि पुरुषों को कैद में ले जाती है।

10. 227 : 14-20

Discerning the rights of man, we cannot fail to foresee the doom of all oppression. Slavery is not the legitimate state of man. God made man free. Paul said, "I was free born." All men should be free. "Where the Spirit of the Lord is, there is liberty." Love and Truth make free, but evil and error lead into captivity.

11. 182: 32-7

मसीह का नियम, या सत्य, आत्मा के लिए सभी चीजों को संभव बनाता है; लेकिन इस मामले के तथाकथित कानून आत्मा को बिना किसी लाभ के सौंप देंगे, और भौतिकवादी कोड के लिए आज्ञाकारिता की मांग करेंगे, इस प्रकार एक भगवान, एक कानूनविद के आधार से प्रस्थान। यह मानने के लिए कि ईश्वर धर्म के नियमों का गठन करता है एक गलती है; डिस्क को प्रकृति या ईश्वरीय कानून से कोई समर्थन नहीं है, हालांकि इसके विपरीत बहुत कुछ कहा जाता है।

11. 182 : 32-7

The law of Christ, or Truth, makes all things possible to Spirit; but the so-called laws of matter would render Spirit of no avail, and demand obedience to materialistic codes, thus departing from the basis of one God, one lawmaker. To suppose that God constitutes laws of inharmony is a mistake; discords have no support from nature or divine law, however much is said to the contrary.

12. 183: 26-29

सत्य वास्तविक आध्यात्मिक कानून के साथ सभी बुराइयों और भौतिकवादी तरीकों को निकालता है, — वह कानून जो अंधे को दृष्टि देता है, बहरे को सुनता है, गूंगे को आवाज देता है, पैर को लंगड़ा करता है।

12. 183 : 26-29

Truth casts out all evils and materialistic methods with the actual spiritual law, — the law which gives sight to the blind, hearing to the deaf, voice to the dumb, feet to the lame.

13. 367: 24-5

मसीह-उपचार का अनंत सत्य इस युग में "शांत, छोटी आवाज" के माध्यम से, मौन उच्चारण और दिव्य अभिषेक के माध्यम से आया है जो ईसाई धर्म के लाभकारी प्रभावों को तेज और बढ़ाता है। मैं अपनी आशा की पूर्णता, अर्थात् प्रकाश की इस पंक्ति में छात्र की उच्च उपलब्धियों को देखना चाहता हूँ।

क्योंकि सत्य अनंत है, त्रुटि को कुछ भी नहीं के रूप में जाना जाना चाहिए। क्योंकि सत्य अच्छाई में सर्वशक्तिमान है, त्रुटि, सत्य के विपरीत, कोई हो सकता है। बुराई है, लेकिन शून्य का प्रतिकार है। सबसे बड़ा गलत है, लेकिन सर्वोच्च अधिकार के विपरीत है। विज्ञान से प्रेरित विश्वास इस तथ्य में निहित है कि सत्य वास्तविक है और त्रुटि असत्य है। सत्य से पहले त्रुटि कायरता है।

13. 367 : 24-5

The infinite Truth of the Christ-cure has come to this age through a "still, small voice," through silent utterances and divine anointing which quicken and increase the beneficial effects of Christianity. I long to see the consummation of my hope, namely, the student's higher attainments in this line of light.

Because Truth is infinite, error should be known as nothing. Because Truth is omnipotent in goodness, error, Truth's opposite, has no might. Evil is but the counterpoise of nothingness. The greatest wrong is but a supposititious opposite of the highest right. The confidence inspired by Science lies in the fact that Truth is real and error is unreal. Error is a coward before Truth.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6