रविवार 28 अप्रैल, 2024



विषयमृत्यु के बाद की प्रक्रिया

SubjectProbation After Death

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: प्रकाशित वाक्य 22: 14

"धन्य वे हैं, जो अपने वस्त्र धो लेते हैं, क्योंकि उन्हें जीवन के पेड़ के पास आने का अधिकार मिलेगा, और वे फाटकों से हो कर नगर में प्रवेश करेंगे।"



Golden Text: Revelation 22 : 14

Blessed are they that do his commandments, that they may have right to the tree of life, and may enter in through the gates into the city




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उत्तरदायी अध्ययन: यूहन्ना 5: 24-26, 28, 29


24     मैं तुम से सच सच कहता हूं, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले की प्रतीति करता है, अनन्त जीवन उसका है, और उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।

25     मैं तुम से सच सच कहता हूं, वह समय आता है, और अब है, जिस में मृतक परमेश्वर के पुत्र का शब्द सुनेंगे, और जो सुनेंगे वे जीएंगे।

26     क्योंकि जिस रीति से पिता अपने आप में जीवन रखता है, उसी रीति से उस ने पुत्र को भी यह अधिकार दिया है कि अपने आप में जीवन रखे।

28     इस से अचम्भा मत करो, क्योंकि वह समय आता है, कि जितने कब्रों में हैं, उसका शब्द सुनकर निकलेंगे।

29     जिन्हों ने भलाई की है वे जीवन के पुनरुत्थान के लिये जी उठेंगे और जिन्हों ने बुराई की है वे दंड के पुनरुत्थान के लिये जी उठेंगे।

Responsive Reading: John 5 : 24-26, 28, 29

24.     Verily, verily, I say unto you, He that heareth my word, and believeth on him that sent me, hath everlasting life, and shall not come into condemnation; but is passed from death unto life.

25.     Verily, verily, I say unto you, The hour is coming, and now is, when the dead shall hear the voice of the Son of God: and they that hear shall live.

26.     For as the Father hath life in himself; so hath he given to the Son to have life in himself.

28.     Marvel not at this: for the hour is coming, in the which all that are in the graves shall hear his voice,

29.     And shall come forth; they that have done good, unto the resurrection of life.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यशायाह 25: 1, 6-8

1     हेयहोवा, तू मेरा परमेश्वर है; मैं तुझे सराहूंगा, मैं तेरे नाम का धन्यवाद करूंगा; क्योंकि तू ने आश्चर्यकर्म किए हैं, तू ने प्राचीनकाल से पूरी सच्चाई के साथ युक्तियां की हैं।

6     सेनाओं का यहोवा इसी पर्वत पर सब देशों के लोगों के लिये ऐसी जेवनार करेगा जिस में भांति भांति का चिकना भोजन और निथरा हुआ दाखमधु होगा; उत्तम से उत्तम चिकना भोजन और बहुत ही निथरा हुआ दाखमधु होगा।

7     और जो पर्दा सब देशों के लोगों पर पड़ा है, जो घूंघट सब अन्यजातियों पर लटका हुआ है, उसे वह इसी पर्वत पर नाश करेगा।

8     वह मृत्यु को सदा के लिये नाश करेगा, और प्रभु यहोवा सभों के मुख पर से आंसू पोंछ डालेगा, और अपनी प्रजा की नामधराई सारी पृथ्वी पर से दूर करेगा; क्योंकि यहोवा ने ऐसा कहा है॥

1. Isaiah 25 : 1, 6-8

1     O Lord, thou art my God; I will exalt thee, I will praise thy name; for thou hast done wonderful things; thy counsels of old are faithfulness and truth.

6     And in this mountain shall the Lord of hosts make unto all people a feast of fat things, a feast of wines on the lees, of fat things full of marrow, of wines on the lees well refined.

7     And he will destroy in this mountain the face of the covering cast over all people, and the vail that is spread over all nations.

8     He will swallow up death in victory; and the Lord God will wipe away tears from off all faces; and the rebuke of his people shall he take away from off all the earth: for the Lord hath spoken it.

2. यूहन्ना 11: 1, 4 (से 4th,), 7, 11 (हमारा), 15, 17, 21-27, 32-34 (से?), 38-44

1     मरियम और उस की बहिन मारथा के गांव बैतनिय्याह का लाजर नाम एक मनुष्य बीमार था।

4     यह सुनकर यीशु ने कहा, यह बीमारी मृत्यु की नहीं, परन्तु परमेश्वर की महिमा के लिये है, कि उसके द्वारा परमेश्वर के पुत्र की महिमा हो।

7     फिर इस के बाद उस ने चेलों से कहा, कि आओ, हम फिर यहूदिया को चलें।

11     कि हमारा मित्र लाजर सो गया है, परन्तु मैं उसे जगाने जाता हूं।

15     और मैं तुम्हारे कारण आनन्दित हूं कि मैं वहां न था जिस से तुम विश्वास करो, परन्तु अब आओ, हम उसके पास चलें।

17     सो यीशु को आकर यह मालूम हुआ कि उसे कब्र में रखे चार दिन हो चुके हैं।

21     मारथा ने यीशु से कहा, हे प्रभु, यदि तू यहां होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता।

22     और अब भी मैं जानती हूं, कि जो कुछ तू परमेश्वर से मांगेगा, परमेश्वर तुझे देगा।

23     यीशु ने उस से कहा, तेरा भाई जी उठेगा।

24     मारथा ने उस से कहा, मैं जानती हूं, कि अन्तिम दिन में पुनरुत्थान के समय वह जी उठेगा।

25     यीशु ने उस से कहा, पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूं, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा।

26     और जो कोई जीवता है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा, क्या तू इस बात पर विश्वास करती है?

27     उस ने उस से कहा, हां हे प्रभु, मैं विश्वास कर चुकी हूं, कि परमेश्वर का पुत्र मसीह जो जगत में आनेवाला था, वह तू ही है।

32     जब मरियम वहां पहुंची जहां यीशु था, तो उसे देखते ही उसके पांवों पर गिर के कहा, हे प्रभु, यदि तू यहां होता तो मेरा भाई न मरता।

33     जब यीशु न उस को और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास हुआ।

34     जब यीशु न उस को और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास हुआ, और घबरा कर कहा, तुम ने उसे कहां रखा है?

38     यीशु मन में फिर बहुत ही उदास होकर कब्र पर आया, वह एक गुफा थी, और एक पत्थर उस पर धरा था।

39     यीशु ने कहा; पत्थर को उठाओ: उस मरे हुए की बहिन मारथा उस से कहने लगी, हे प्रभु, उस में से अब तो र्दुगंध आती है क्योंकि उसे मरे चार दिन हो गए।

40     यीशु ने उस से कहा, क्या मैं ने तुझ से न कहा था कि यदि तू विश्वास करेगी, तो परमेश्वर की महिमा को देखेगी।

41     तब उन्होंने उस पत्थर को हटाया, फिर यीशु ने आंखें उठाकर कहा, हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं कि तू ने मेरी सुन ली है।

42     और मै जानता था, कि तू सदा मेरी सुनता है, परन्तु जो भीड़ आस पास खड़ी है, उन के कारण मैं ने यह कहा, जिस से कि वे विश्वास करें, कि तू ने मुझे भेजा है।

43     यह कहकर उस ने बड़े शब्द से पुकारा, कि हे लाजर, निकल आ।

44     जो मर गया था, वह कफन से हाथ पांव बन्धे हुए निकल आया और उसका मुंह अंगोछे से लिपटा हुआ तें यीशु ने उन से कहा, उसे खोलकर जाने दो॥

2. John 11 : 1, 4 (to 4th ,), 7, 11 (Our), 15, 17, 21-27, 32-34 (to ?), 38-44

1     Now a certain man was sick, named Lazarus, of Bethany, the town of Mary and her sister Martha.

4     When Jesus heard that, he said, This sickness is not unto death, but for the glory of God,

7     Then after that saith he to his disciples, Let us go into Judæa again.

11     Our friend Lazarus sleepeth; but I go, that I may awake him out of sleep.

15     And I am glad for your sakes that I was not there, to the intent ye may believe; nevertheless let us go unto him.

17     Then when Jesus came, he found that he had lain in the grave four days already.

21     Then said Martha unto Jesus, Lord, if thou hadst been here, my brother had not died.

22     But I know, that even now, whatsoever thou wilt ask of God, God will give it thee.

23     Jesus saith unto her, Thy brother shall rise again.

24     Martha saith unto him, I know that he shall rise again in the resurrection at the last day.

25     Jesus said unto her, I am the resurrection, and the life: he that believeth in me, though he were dead, yet shall he live:

26     And whosoever liveth and believeth in me shall never die. Believest thou this?

27     She saith unto him, Yea, Lord: I believe that thou art the Christ, the Son of God, which should come into the world.

32     Then when Mary was come where Jesus was, and saw him, she fell down at his feet, saying unto him, Lord, if thou hadst been here, my brother had not died.

33     When Jesus therefore saw her weeping, and the Jews also weeping which came with her, he groaned in the spirit, and was troubled,

34     And said, Where have ye laid him?

38     Jesus therefore again groaning in himself cometh to the grave. It was a cave, and a stone lay upon it.

39     Jesus said, Take ye away the stone. Martha, the sister of him that was dead, saith unto him, Lord, by this time he stinketh: for he hath been dead four days.

40     Jesus saith unto her, Said I not unto thee, that, if thou wouldest believe, thou shouldest see the glory of God?

41     Then they took away the stone from the place where the dead was laid. And Jesus lifted up his eyes, and said, Father, I thank thee that thou hast heard me.

42     And I knew that thou hearest me always: but because of the people which stand by I said it, that they may believe that thou hast sent me.

43     And when he thus had spoken, he cried with a loud voice, Lazarus, come forth.

44     And he that was dead came forth, bound hand and foot with graveclothes: and his face was bound about with a napkin. Jesus saith unto them, Loose him, and let him go.

3. यूहन्ना 12: 35, 46

35     यह मनुष्य का पुत्र कौन है? यीशु ने उन से कहा, ज्योति अब थोड़ी देर तक तुम्हारे बीच में है, जब तक ज्योति तुम्हारे साथ है तब तक चले चलो; ऐसा न हो कि अन्धकार तुम्हें आ घेरे; जो अन्धकार में चलता है वह नहीं जानता कि किधर जाता है।

46     मैं जगत में ज्योति होकर आया हूं ताकि जो कोई मुझ पर विश्वास करे, वह अन्धकार में न रहे।

3. John 12 : 35, 46

35     Then Jesus said unto them, Yet a little while is the light with you. Walk while ye have the light, lest darkness come upon you: for he that walketh in darkness knoweth not whither he goeth.

46     I am come a light into the world, that whosoever believeth on me should not abide in darkness.

4. रोमियो 13: 11 (अब यह है)-14

11     ... इसलिये कि अब तुम्हारे लिये नींद से जाग उठने की घड़ी आ पहुंची है, क्योंकि जिस समय हम ने विश्वास किया था, उस समय के विचार से अब हमारा उद्धार निकट है।

12     रात बहुत बीत गई है, और दिन निकलने पर है; इसलिये हम अन्धकार के कामों को तज कर ज्योति के हथियार बान्ध लें।

13     जैसा दिन को सोहता है, वैसा ही हम सीधी चाल चलें; न कि लीला क्रीड़ा, और पियक्कड़पन, न व्यभिचार, और लुचपन में, और न झगड़े और डाह में।

14     वरन प्रभु यीशु मसीह को पहिन लो, और शरीर की अभिलाशाओं को पूरा करने का उपाय न करो।

4. Romans 13 : 11 (now it is)-14

11     ...now it is high time to awake out of sleep: for now is our salvation nearer than when we believed.

12     The night is far spent, the day is at hand: let us therefore cast off the works of darkness, and let us put on the armour of light.

13     Let us walk honestly, as in the day; not in rioting and drunkenness, not in chambering and wantonness, not in strife and envying.

14     But put ye on the Lord Jesus Christ, and make not provision for the flesh, to fulfil the lusts thereof.

5. प्रकाशित वाक्य 1: 1 (से ;)

1     यीशु मसीह का प्रकाशितवाक्य जो उसे परमेश्वर ने इसलिये दिया, कि अपने दासों को वे बातें, जिन का शीघ्र होना अवश्य है, दिखाए।

5. Revelation 1 : 1 (to ;)

1     The Revelation of Jesus Christ, which God gave unto him, to shew unto his servants things which must shortly come to pass;

6. प्रकाशित वाक्य 2: 7

7     जिस के कान हों, वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है: जो जय पाए, मैं उसे उस जीवन के पेड़ में से जो परमेश्वर के स्वर्गलोक में है, फल खाने को दूंगा॥

6. Revelation 2 : 7

7     He that hath an ear, let him hear what the Spirit saith unto the churches; To him that overcometh will I give to eat of the tree of life, which is in the midst of the paradise of God.

7. प्रकाशित वाक्य 3: 19-21

19     मैं जिन जिन से प्रीति रखता हूं, उन सब को उलाहना और ताड़ना देता हूं, इसलिये सरगर्म हो, और मन फिरा।

20     देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूं; यदि कोई मेरा शब्द सुन कर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आ कर उसके साथ भोजन करूंगा, और वह मेरे साथ।

21     जो जय पाए, मैं उसे अपने साथ अपने सिंहासन पर बैठाऊंगा, जैसा मैं भी जय पा कर अपने पिता के साथ उसके सिंहासन पर बैठ गया।

7. Revelation 3 : 19-21

19     As many as I love, I rebuke and chasten: be zealous therefore, and repent.

20     Behold, I stand at the door, and knock: if any man hear my voice, and open the door, I will come in to him, and will sup with him, and he with me.

21     To him that overcometh will I grant to sit with me in my throne, even as I also overcame, and am set down with my Father in his throne.

8. 1 कुरिन्थियों 15: 26, 55-58

26     सब से अन्तिम बैरी जो नाश किया जाएगा वह मृत्यु है।

55     हे मृत्यु तेरी जय कहां रही?

56     हे मृत्यु तेरा डंक कहां रहा? मृत्यु का डंक पाप है; और पाप का बल व्यवस्था है।

57     परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें जयवन्त करता है।

58     सो हे मेरे प्रिय भाइयो, दृढ़ और अटल रहो, और प्रभु के काम में सर्वदा बढ़ते जाओ, क्योंकि यह जानते हो, कि तुम्हारा परिश्रम प्रभु में व्यर्थ नहीं है॥

8. I Corinthians 15 : 26, 55-58

26     The last enemy that shall be destroyed is death.

55     O death, where is thy sting? O grave, where is thy victory?

56     The sting of death is sin; and the strength of sin is the law.

57     But thanks be to God, which giveth us the victory through our Lord Jesus Christ.

58     Therefore, my beloved brethren, be ye stedfast, unmoveable, always abounding in the work of the Lord, forasmuch as ye know that your labour is not in vain in the Lord.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 246: 27 (ज़िंदगी)-28 (से 2nd.)

जीवन शाश्वत है। हमें इसका पता लगाना चाहिए, और इसके बाद प्रदर्शन शुरू करना चाहिए। जीवन और अच्छाई अमर है।

1. 246 : 27 (Life)-28 (to 2nd .)

Life is eternal. We should find this out, and begin the demonstration thereof. Life and goodness are immortal.

2. 303: 28-30

आध्यात्मिक मनुष्य ईश्वर की छवि या विचार है, एक ऐसा विचार जो न तो खो सकता है और न ही अपने ईश्वरीय सिद्धांत से अलग हो सकता है।

2. 303 : 28-30

Spiritual man is the image or idea of God, an idea which cannot be lost nor separated from its divine Principle.

3. 203: 31-2

ईश्वर, ईश्वरीय भलाई, किसी व्यक्ति को अनन्त जीवन देने के लिए उसे नहीं मारता, क्योंकि ईश्वर ही मनुष्य का जीवन है। ईश्वर एक साथ अस्तित्व का केंद्र और परिधि है। वह बुराई है जो मरती है; अच्छा मरता नहीं.

3. 203 : 31-2

God, divine good, does not kill a man in order to give him eternal Life, for God alone is man's life. God is at once the centre and circumference of being. It is evil that dies; good dies not.

4. 324: 32-7

यीशु ने वास्तव में कहा, "जो कोई है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा" मतलब, वह जो जीवन के सच्चे विचार को मानता है वह मृत्यु में अपना विश्वास खो देता है। जिसके पास भलाई का सच्चा विचार है वह बुराई के सभी अर्थों को खो देता है, और इस कारण से आत्मा की शाश्वत वास्तविकताओं में प्रवेश किया जा रहा है। ऐसा मनुष्य जीवन में रहता है, - वह जीवन जो शरीर को सहायक जीवन के लिए नहीं बल्कि सत्य के लिए प्राप्त होता है, अपने स्वयं के अमर विचार को प्रकट करता है।

4. 324 : 32-7

Jesus said substantially, "He that believeth in me shall not see death." That is, he who perceives the true idea of Life loses his belief in death. He who has the true idea of good loses all sense of evil, and by reason of this is being ushered into the undying realities of Spirit. Such a one abideth in Life, — life obtained not of the body incapable of supporting life, but of Truth, unfolding its own immortal idea.

5. 90: 24-32

स्वयं के लिए प्रवेश यह है कि मनुष्य ईश्वर की अपनी समानता है जो मनुष्य को अनंत विचार के लिए स्वतंत्र करता है। यह विश्वास मृत्यु पर दरवाजा बंद कर देता है, और इसे अमरता की ओर विस्तृत करता है। आत्मा की समझ और मान्यता अंत में आनी चाहिए, और हम दिव्य सिद्धांत की आशंका के माध्यम से होने के रहस्यों को सुलझाने में हमारे समय में सुधार कर सकते हैं। वर्तमान में हम जानते हैं कि मनुष्य क्या नहीं है, लेकिन हम निश्चित रूप से यह जानते हैं जब मनुष्य भगवान को दर्शाता है।

5. 90 : 24-32

The admission to one's self that man is God's own likeness sets man free to master the infinite idea. This conviction shuts the door on death, and opens it wide towards immortality. The understanding and recognition of Spirit must finally come, and we may as well improve our time in solving the mysteries of being through an apprehension of divine Principle. At present we know not what man is, but we certainly shall know this when man reflects God.

6. 75: 12-20

यीशु ने लाजर के बारे में कहा: "कि हमारा मित्र लाजर सो गया है, परन्तु मैं उसे जगाने जाता हूं।" यीशु ने लाजर को इस समझ के साथ बहाल किया कि लाजर की मृत्यु कभी नहीं हुई थी, न कि इस बात से कि उसका शरीर मर गया था और फिर दोबारा जीवित हो गया था। अगर यीशु का मानना था कि लाजर उसके शरीर में रहता या मर गया है, तो मास्टर विश्वास के उसी तल पर खड़े होते थे, जो शरीर को दफनाते थे, और वे इसे पुनर्जीवित नहीं कर सकते थे।

6. 75 : 12-20

Jesus said of Lazarus: "Our friend Lazarus sleepeth; but I go, that I may awake him out of sleep." Jesus restored Lazarus by the understanding that Lazarus had never died, not by an admission that his body had died and then lived again. Had Jesus believed that Lazarus had lived or died in his body, the Master would have stood on the same plane of belief as those who buried the body, and he could not have resuscitated it.

7. 302: 3-13, 19-24

भौतिक शरीर और मन लौकिक हैं, लेकिन वास्तविक मनुष्य आध्यात्मिक और शाश्वत है। असली आदमी की पहचान नहीं खोई है, लेकिन इस स्पष्टीकरण के माध्यम से पाया जाता है।; इसके लिए अस्तित्व और सभी पहचान के प्रति सचेत अविभाजित है और अपरिवर्तित रहता है। जब भगवान सब और अनंत काल के हैं, तब यह असंभव है कि मनुष्य को वास्तविक रूप से खोना चाहिए। यह धारणा कि मन पदार्थ में है, और तथाकथित सुख और पीड़ा, जन्म, पाप, बीमारी, और पदार्थ की मृत्यु, वास्तविक हैं, एक नश्वर विश्वास है; और यह विश्वास वह सब है जो कभी खो जाएगा।

मनुष्य के पूर्ण, यहाँ तक कि पिता के रूप में भी पूर्ण होने का विज्ञान बताता है, क्योंकि आध्यात्मिक मनुष्य का आत्मा या मन, ईश्वर है, जो सभी का दिव्य सिद्धांत है, और क्योंकि यह वास्तविक व्यक्ति आत्मा के बजाय आत्मा के नियम द्वारा शासित है, न कि पदार्थ के तथाकथित नियमों द्वारा।

7. 302 : 3-13, 19-24

The material body and mind are temporal, but the real man is spiritual and eternal. The identity of the real man is not lost, but found through this explanation; for the conscious infinitude of existence and of all identity is thereby discerned and remains unchanged. It is impossible that man should lose aught that is real, when God is all and eternally his. The notion that mind is in matter, and that the so-called pleasures and pains, the birth, sin, sickness, and death of matter, are real, is a mortal belief; and this belief is all that will ever be lost.

The Science of being reveals man as perfect, even as the Father is perfect, because the Soul, or Mind, of the spiritual man is God, the divine Principle of all being, and because this real man is governed by Soul instead of sense, by the law of Spirit, not by the so-called laws of matter.

8. 427: 13-21

मृत्यु, लेकिन सपने का एक और चरण है कि अस्तित्व भौतिक हो सकता है। विज्ञान में मनुष्य के अस्तित्व के सामंजस्य में कुछ भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता है और न ही समाप्त कर सकता है। आदमी बाद में वैसा ही है जैसा हड्डी टूटने या सिर कटने से पहले होता है। यदि मनुष्य को कभी भी मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं करनी है, तो शास्त्र क्यों कहते हैं, "सब से अन्तिम बैरी जो नाश किया जाएगा वह मृत्यु है"? वचन की अवधि दर्शाती है कि हम पाप पर विजय पाने के अनुपात में मृत्यु पर विजय प्राप्त करेंगे।

8. 427 : 13-21

Death is but another phase of the dream that existence can be material. Nothing can interfere with the harmony of being nor end the existence of man in Science. Man is the same after as before a bone is broken or the body guillotined. If man is never to overcome death, why do the Scriptures say, "The last enemy that shall be destroyed is death"? The tenor of the Word shows that we shall obtain the victory over death in proportion as we overcome sin.

9. 46: 20-24

यीशु की मृत्यु के बाद लगने वाली शारीरिक स्थिति सभी भौतिक स्थितियों से ऊपर होने के कारण उसकी मृत्यु हो गई, और इस अतिशयोक्ति ने उसके उदगम की व्याख्या की, और कब्र से परे एक परिवीक्षाधीन और प्रगतिशील राज्य का खुलासा किया।

9. 46 : 20-24

Jesus' unchanged physical condition after what seemed to be death was followed by his exaltation above all material conditions; and this exaltation explained his ascension, and revealed unmistakably a probationary and progressive state beyond the grave.

10. 290: 16-18 अगला पृष्ठ

यदि मृत्यु नामक परिवर्तन पाप, बीमारी और मृत्यु में विश्वास को नष्ट कर देता है, तो विघटन के क्षण में खुशी जीत जाएगी, और हमेशा के लिए स्थायी हो जाएगी; लेकिन यह ऐसा नहीं है। पूर्णता से ही पूर्णता प्राप्त होती है। जो लोग अधर्मी हैं वे अभी भी अधर्मी होंगे, जब तक कि दिव्य विज्ञान में क्राइस्ट, सत्य, सभी अज्ञान और पाप को हटा नहीं देते हैं।

वह पाप और त्रुटि जो हमें मृत्यु के तुरंत बाद प्राप्त होती है, उस क्षण में समाप्त नहीं होती है, लेकिन इन त्रुटियों की मृत्यु तक होती है। पूर्ण आध्यात्मिक होने के लिए, मनुष्य को पाप रहित होना चाहिए, और वह पूर्णता तक पहुँचने पर ही इस प्रकार बनता है। हत्यारे, हालांकि कृत्य में मारे जाते हैं, जिससे पाप का त्याग नहीं होता। वह यह मानने के लिए अधिक आध्यात्मिक नहीं है कि उसका शरीर मर गया और यह सीख कर कि उसका क्रूर मन नहीं मर गया। उनके विचार तब तक शुद्ध नहीं होते जब तक कि बुराई अच्छे से निरस्त्र नहीं होती। उसका शरीर उसके मन के समान भौतिक है, और इसके विपरीत।

अधर्म को छोड़ते समय जिन पापों को क्षमा किया जाता है, वह खुशी पाप के बीच में वास्तविक हो सकती है, कि शरीर की तथाकथित मौत पाप से मुक्त हो जाती है, और यह कि भगवान का क्षमा याचना है लेकिन पाप का विनाश, - ये गंभीर गलतियाँ हैं । हम जानते हैं कि सब बदल जाएगा "एक पल में," जब आखिरी तुरही ध्वनि होगी; लेकिन ज्ञान का यह अंतिम निमंत्रण तब तक नहीं आ सकता जब तक कि ईसाई चरित्र की वृद्धि में प्रत्येक कम आमंत्रण के लिए नश्वर न हो गए हों। मनुष्यों को यह कल्पना करने की आवश्यकता नहीं है कि मृत्यु के अनुभव में विश्वास उन्हें महिमा प्रदान करेगा।

सार्वभौमिक मुक्ति प्रगति और परिवीक्षा पर टिकी हुई है, और उनके बिना अप्राप्य है। स्वर्ग एक स्थानीयता नहीं है, बल्कि मन की एक दिव्य स्थिति है जिसमें मन की सभी अभिव्यक्तियाँ सामंजस्यपूर्ण और अमर हैं, क्योंकि पाप नहीं है और मनुष्य अपने स्वयं के धार्मिकता नहीं पा रहा है, लेकिन "प्रभु के मन", "जैसा कि शास्त्र कहत।

10. 290 : 16-18 next page

If the change called death destroyed the belief in sin, sickness, and death, happiness would be won at the moment of dissolution, and be forever permanent; but this is not so. Perfection is gained only by perfection. They who are unrighteous shall be unrighteous still, until in divine Science Christ, Truth, removes all ignorance and sin.

The sin and error which possess us at the instant of death do not cease at that moment, but endure until the death of these errors. To be wholly spiritual, man must be sinless, and he becomes thus only when he reaches perfection. The murderer, though slain in the act, does not thereby forsake sin. He is no more spiritual for believing that his body died and learning that his cruel mind died not. His thoughts are no purer until evil is disarmed by good. His body is as material as his mind, and vice versa.

The suppositions that sin is pardoned while unforsaken, that happiness can be genuine in the midst of sin, that the so-called death of the body frees from sin, and that God's pardon is aught but the destruction of sin, — these are grave mistakes. We know that all will be changed "in the twinkling of an eye," when the last trump shall sound; but this last call of wisdom cannot come till mortals have already yielded to each lesser call in the growth of Christian character. Mortals need not fancy that belief in the experience of death will awaken them to glorified being.

Universal salvation rests on progression and probation, and is unattainable without them. Heaven is not a locality, but a divine state of Mind in which all the manifestations of Mind are harmonious and immortal, because sin is not there and man is found having no righteousness of his own, but in possession of "the mind of the Lord," as the Scripture says.

11. 254: 10-15

जब हम धैर्यपूर्वक ईश्वर की प्रतीक्षा करते हैं और सत्य की तलाश करते हैं, तो वह हमारे मार्ग का निर्देशन करता है। अपूर्ण नश्वर धीरे-धीरे आध्यात्मिक पूर्णता के चरम को समझ लेते हैं; लेकिन दुर्दशा शुरू करने और होने की बड़ी समस्या को प्रदर्शित करने के संघर्ष को जारी रखने के लिए, बहुत कुछ कर रहा है।

11. 254 : 10-15

When we wait patiently on God and seek Truth righteously, He directs our path. Imperfect mortals grasp the ultimate of spiritual perfection slowly; but to begin aright and to continue the strife of demonstrating the great problem of being, is doing much.

12. 426: 16-22

जब यह जान लिया जाता है कि बीमारी जीवन को नष्ट नहीं कर सकती है, और मृत्यु से पाप या बीमारी से मृत्यु को बचाया नहीं जाता है, तो यह समझ जीवन के नएपन में तब्दील हो जाएगी। यह या तो मरने या कब्र से डरने की इच्छा में महारत हासिल करेगा, और इस तरह नश्वर अस्तित्व को नष्ट करने वाले महान भय को नष्ट कर देगा।

12. 426 : 16-22

When it is learned that disease cannot destroy life, and that mortals are not saved from sin or sickness by death, this understanding will quicken into newness of life. It will master either a desire to die or a dread of the grave, and thus destroy the great fear that besets mortal existence.

13. 428: 3 केवल, 6-14

जीवन वास्तविक है, और मृत्यु भ्रम है। ... इस सर्वोच्च क्षण में मनुष्य का विशेषाधिकार हमारे मास्टर के शब्दों को साबित करना है: "कि यदि कोई व्यक्ति मेरे वचन पर चलेगा, तो वह अनन्त काल तक मृत्यु को न देखेगा।" झूठे न्यासों और भौतिक साक्ष्यों के बारे में विचार करने के लिए ताकि आध्यात्मिक तथ्य सामने आ सकें — यह महान प्राप्ति है जिसके माध्यम से हम असत्य को मिटा देंगे और सत्य को स्थान देंगे। इस प्रकार हम मंदिर, या देह को सच में स्थापित कर सकते हैं, "जिसका निर्माता और निर्माता भगवान है।"

13. 428 : 3 only, 6-14

Life is real, and death is the illusion. ... Man's privilege at this supreme moment is to prove the words of our Master: "If a man keep my saying, he shall never see death." To divest thought of false trusts and material evidences in order that the spiritual facts of being may appear, — this is the great attainment by means of which we shall sweep away the false and give place to the true. Thus we may establish in truth the temple, or body, "whose builder and maker is God."


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6