रविवार 28 अप्रैल, 2019 |

रविवार 28 अप्रैल, 2019



विषयमौत के बाद की प्रक्रिया

SubjectProbation After Death

वर्ण पाठ: भजन संहिता 31 : 14, 15



परन्तु हे यहोवा मैं ने तो तुझी पर भरोसा रखा है, मैं ने कहा, तू मेरा परमेश्वर है। मेरे दिन तेरे हाथ में है।

Golden Text: Psalm 31 : 14, 15

I trusted in thee, O Lord: I said, Thou art my God. My times are in thy hand.




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भजन संहिता 23 : 1-6


1     यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी।

2     वह मुझे हरी हरी चराइयों में बैठाता है; वह मुझे सुखदाई जल के झरने के पास ले चलता है;

3     वह मेरे जी में जी ले आता है। धर्म के मार्गो में वह अपने नाम के निमित्त मेरी अगुवाई करता है।

4     चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूं, तौभी हानि से न डरूंगा, क्योंकि तू मेरे साथ रहता है; तेरे सोंटे और तेरी लाठी से मुझे शान्ति मिलती है॥

5     तू मेरे सताने वालों के साम्हने मेरे लिये मेज बिछाता है; तू ने मेरे सिर पर तेल मला है, मेरा कटोरा उमण्ड रहा है।

6     निश्चय भलाई और करूणा जीवन भर मेरे साथ साथ बनी रहेंगी; और मैं यहोवा के धाम में सर्वदा वास करूंगा॥

Responsive Reading: Psalm 23 : 1-6

1.     The Lord is my shepherd; I shall not want.

2.     He maketh me to lie down in green pastures: he leadeth me beside the still waters.

3.     He restoreth my soul: he leadeth me in the paths of righteousness for his name’s sake.

4.     Yea, though I walk through the valley of the shadow of death, I will fear no evil: for thou art with me; thy rod and thy staff they comfort me.

5.     Thou preparest a table before me in the presence of mine enemies: thou anointest my head with oil; my cup runneth over.

6.     Surely goodness and mercy shall follow me all the days of my life: and I will dwell in the house of the Lord for ever.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 116 : 1-9

1     मैं प्रेम रखता हूं, इसलिये कि यहोवा ने मेरे गिड़गिड़ाने को सुना है।

2     उसने जो मेरी ओर कान लगाया है, इसलिये मैं जीवन भर उसको पुकारा करूंगा।

3     मृत्यु की रस्सियां मेरे चारोंओर थीं; मैं अधोलोक की सकेती में पड़ा था; मुझे संकट और शोक भोगना पड़ा।

4     तब मैं ने यहोवा से प्रार्थना की, कि हे यहोवा बिनती सुन कर मेरे प्राण को बचा ले!

5     यहोवा अनुग्रहकारी और धर्मी है; और हमारा परमेश्वर दया करने वाला है।

6     यहोवा भोलों की रक्षा करता है; जब मैं बलहीन हो गया था, उसने मेरा उद्धार किया।

7     हे मेरे प्राण तू अपने विश्राम स्थान में लौट आ; क्योंकि यहोवा ने तेरा उपकार किया है॥

8     तू ने तो मेरे प्राण को मृत्यु से, मेरी आंख को आंसू बहाने से, और मेरे पांव को ठोकर खाने से बचाया है।

9     मैं जीवित रहते हुए, अपने को यहोवा के साम्हने जान कर नित चलता रहूंगा।

1. Psalm 116 : 1-9

1     I love the Lord, because he hath heard my voice and my supplications.

2     Because he hath inclined his ear unto me, therefore will I call upon him as long as I live.

3     The sorrows of death compassed me, and the pains of hell gat hold upon me: I found trouble and sorrow.

4     Then called I upon the name of the Lord; O Lord, I beseech thee, deliver my soul.

5     Gracious is the Lord, and righteous; yea, our God is merciful.

6     The Lord preserveth the simple: I was brought low, and he helped me.

7     Return unto thy rest, O my soul; for the Lord hath dealt bountifully with thee.

8     For thou hast delivered my soul from death, mine eyes from tears, and my feet from falling.

9     I will walk before the Lord in the land of the living.

2. उत्पत्ति 19: 1, 2 (से 1st.), 12-17, 26, 30 (से ;)

1     सांझ को वे दो दूत सदोम के पास आए: और लूत सदोम के फाटक के पास बैठा था: सो उन को देख कर वह उन से भेंट करने के लिये उठा; और मुंह के बल झुक कर दण्डवत कर कहा;

2     हे मेरे प्रभुओं, अपने दास के घर में पधारिए, और रात भर विश्राम कीजिए, और अपने पांव धोइये, फिर भोर को उठ कर अपने मार्ग पर जाइए। उन्होंने कहा, नहीं; हम चौक ही में रात बिताएंगे।

12     फिर उन पाहुनों ने लूत से पूछा, यहां तेरे और कौन कौन हैं? दामाद, बेटे, बेटियां, वा नगर में तेरा जो कोई हो, उन सभों को ले कर इस स्थान से निकल जा।

13     क्योंकि हम यह स्थान नाश करने पर हैं, इसलिये कि उसकी चिल्लाहट यहोवा के सम्मुख बढ़ गई है; और यहोवा ने हमें इसका सत्यनाश करने के लिये भेज दिया है।

14     तब लूत ने निकल कर अपने दामादों को, जिनके साथ उसकी बेटियों की सगाई हो गई थी, समझा के कहा, उठो, इस स्थान से निकल चलो: क्योंकि यहोवा इस नगर को नाश किया चाहता है। पर वह अपने दामादों की दृष्टि में ठट्ठा करने हारा सा जान पड़ा।

15     जब पौ फटने लगी, तब दूतों ने लूत से फुर्ती कराई और कहा, कि उठ, अपनी पत्नी और दोनो बेटियों को जो यहां हैं ले जा: नहीं तो तू भी इस नगर के अधर्म में भस्म हो जाएगा।

16     पर वह विलम्ब करता रहा, इस से उन पुरूषों ने उसका और उसकी पत्नी, और दोनों बेटियों का हाथ पकड़ लिया; क्योंकि यहोवा की दया उस पर थी: और उसको निकाल कर नगर के बाहर कर दिया।

17     और ऐसा हुआ कि जब उन्होंने उन को बाहर निकाला, तब उसने कहा अपना प्राण ले कर भाग जा; पीछे की और न ताकना, और तराई भर में न ठहरना; उस पहाड़ पर भाग जाना, नहीं तो तू भी भस्म हो जाएगा।

26     लूत की पत्नी ने जो उसके पीछे थी दृष्टि फेर के पीछे की ओर देखा, और वह नमक का खम्भा बन गई।

30     और लूत ने सोअर को छोड़ दिया, और पहाड़ पर अपनी दोनों बेटियों समेत रहने लगा; क्योंकि वह सोअर में रहने से डरता था: इसलिये वह और उसकी दोनों बेटियां वहां एक गुफा में रहने लगे।

2. Genesis 19 : 1, 2 (to 1st .), 12-17, 26, 30 (to ;)

1     And there came two angels to Sodom at even; and Lot sat in the gate of Sodom: and Lot seeing them rose up to meet them; and he bowed himself with his face toward the ground;

2     And he said, Behold now, my lords, turn in, I pray you, into your servant’s house, and tarry all night, and wash your feet, and ye shall rise up early, and go on your ways.

12     And the men said unto Lot, Hast thou here any besides? son in law, and thy sons, and thy daughters, and whatsoever thou hast in the city, bring them out of this place:

13     For we will destroy this place, because the cry of them is waxen great before the face of the Lord; and the Lord hath sent us to destroy it.

14     And Lot went out, and spake unto his sons in law, which married his daughters, and said, Up, get you out of this place; for the Lord will destroy this city. But he seemed as one that mocked unto his sons in law.

15     And when the morning arose, then the angels hastened Lot, saying, Arise, take thy wife, and thy two daughters, which are here; lest thou be consumed in the iniquity of the city.

16     And while he lingered, the men laid hold upon his hand, and upon the hand of his wife, and upon the hand of his two daughters; the Lord being merciful unto him: and they brought him forth, and set him without the city.

17     And it came to pass, when they had brought them forth abroad, that he said, Escape for thy life; look not behind thee, neither stay thou in all the plain; escape to the mountain, lest thou be consumed.

26     But his wife looked back from behind him, and she became a pillar of salt.

30     And Lot went up out of Zoar, and dwelt in the mountain, and his two daughters with him;

3. नीतिवचन 3 : 5-8, 21 (रखना)-26

5     तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना।

6     उसी को स्मरण करके सब काम करना, तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा।

7     अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न होना; यहोवा का भय मानना, और बुराई से अलग रहना।

8     ऐसा करने से तेरा शरीर भला चंगा, और तेरी हड्डियां पुष्ट रहेंगी।

21     ... खरी बुद्धि और विवेक की रक्षा कर,

22     तब इन से तुझे जीवन मिलेगा, और ये तेरे गले का हार बनेंगे।

23     और तू अपने मार्ग पर निडर चलेगा, और तेरे पांव में ठेस न लगेगी।

24     जब तू लेटेगा, तब भय न खाएगा, जब तू लेटेगा, तब सुख की नींद आएगी।

25     अचानक आने वाले भय से न डरना, और जब दुष्टों पर विपत्ति आ पड़े, तब न घबराना;

26     क्योंकि यहोवा तुझे सहारा दिया करेगा, और तेरे पांव को फन्दे में फंसने न देगा।

3. Proverbs 3 : 5-8, 21 (keep)-26

5     Trust in the Lord with all thine heart; and lean not unto thine own understanding.

6     In all thy ways acknowledge him, and he shall direct thy paths.

7     Be not wise in thine own eyes: fear the Lord, and depart from evil.

8     It shall be health to thy navel, and marrow to thy bones.

21     …keep sound wisdom and discretion:

22     So shall they be life unto thy soul, and grace to thy neck.

23     Then shalt thou walk in thy way safely, and thy foot shall not stumble.

24     When thou liest down, thou shalt not be afraid: yea, thou shalt lie down, and thy sleep shall be sweet.

25     Be not afraid of sudden fear, neither of the desolation of the wicked, when it cometh.

26     For the Lord shall be thy confidence, and shall keep thy foot from being taken.

4. मत्ती 4 : 23

23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

4. Matthew 4 : 23

23     And Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing all manner of sickness and all manner of disease among the people.

5. लूका 7 : 12-15

12     जब वह नगर के फाटक के पास पहुंचा, तो देखो, लोग एक मुरदे को बाहर लिए जा रहे थे; जो अपनी मां का एकलौता पुत्र था, और वह विधवा थी: और नगर के बहुत से लोग उसके साथ थे।

13     उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उस से कहा; मत रो।

14     तब उस ने पास आकर, अर्थी को छुआ; और उठाने वाले ठहर गए, तब उस ने कहा; हे जवान, मैं तुझ से कहता हूं, उठ।

15     तब वह मुरदा उठ बैठा, और बोलने लगा: और उस ने उसे उस की मां को सौप दिया।

5. Luke 7 : 12-15

12     Now when he came nigh to the gate of the city, behold, there was a dead man carried out, the only son of his mother, and she was a widow: and much people of the city was with her.

13     And when the Lord saw her, he had compassion on her, and said unto her, Weep not.

14     And he came and touched the bier: and they that bare him stood still. And he said, Young man, I say unto thee, Arise.

15     And he that was dead sat up, and began to speak. And he delivered him to his mother.

6. यूहन्ना 5 : 24

24     मैं तुम से सच सच कहता हूं, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले की प्रतीति करता है, अनन्त जीवन उसका है, और उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।

6. John 5 : 24

24     Verily, verily, I say unto you, He that heareth my word, and believeth on him that sent me, hath everlasting life, and shall not come into condemnation; but is passed from death unto life.

7. इब्रानियों 2 : 1-3, 9, 10 (से 4th ,), 14, 15

1     इस कारण चाहिए, कि हम उन बातों पर जो हम ने सुनी हैं और भी मन लगाएं, ऐसा न हो कि बहक कर उन से दूर चले जाएं।

2     क्योंकि जो वचन स्वर्गदूतों के द्वारा कहा गया था जब वह स्थिर रहा और हर एक अपराध और आज्ञा न मानने का ठीक ठीक बदला मिला।

3     तो हम लोग ऐसे बड़े उद्धार से निश्चिन्त रह कर क्योंकर बच सकते हैं? जिस की चर्चा पहिले पहिल प्रभु के द्वारा हुई, और सुनने वालों के द्वारा हमें निश्चय हुआ।

9     पर हम यीशु को जो स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया गया था, मृत्यु का दुख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं; ताकि परमेश्वर के अनुग्रह से हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखे।

10     क्योंकि जिस के लिये सब कुछ है, और जिस के द्वारा सब कुछ है, उसे यही अच्छा लगा कि जब वह बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुंचाए,

14     इसलिये जब कि लड़के मांस और लोहू के भागी हैं, तो वह आप भी उन के समान उन का सहभागी हो गया; ताकि मृत्यु के द्वारा उसे जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात शैतान को निकम्मा कर दे।

15     और जितने मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फंसे थे, उन्हें छुड़ा ले।

7. Hebrews 2 : 1-3, 9, 10 (to 4th ,), 14, 15

1     Therefore we ought to give the more earnest heed to the things which we have heard, lest at any time we should let them slip.

2     For if the word spoken by angels was stedfast, and every transgression and disobedience received a just recompence of reward;

3     How shall we escape, if we neglect so great salvation; which at the first began to be spoken by the Lord, and was confirmed unto us by them that heard him;

9     But we see Jesus, who was made a little lower than the angels for the suffering of death, crowned with glory and honour; that he by the grace of God should taste death for every man.

10     For it became him, for whom are all things, and by whom are all things, in bringing many sons unto glory,

14     Forasmuch then as the children are partakers of flesh and blood, he also himself likewise took part of the same; that through death he might destroy him that had the power of death, that is, the devil;

15     And deliver them who through fear of death were all their lifetime subject to bondage.

8. I कुरिन्थियों 15 : 55, 57, 58

55     हे मृत्यु तेरी जय कहां रही? हे मृत्यु तेरा डंक कहां रहा?

57     परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें जयवन्त करता है।

58     सो हे मेरे प्रिय भाइयो, दृढ़ और अटल रहो, और प्रभु के काम में सर्वदा बढ़ते जाओ, क्योंकि यह जानते हो, कि तुम्हारा परिश्रम प्रभु में व्यर्थ नहीं है॥

8. I Corinthians 15 : 55, 57, 58

55     O death, where is thy sting? O grave, where is thy victory?

57     But thanks be to God, which giveth us the victory through our Lord Jesus Christ.

58     Therefore, my beloved brethren, be ye stedfast, unmoveable, always abounding in the work of the Lord, forasmuch as ye know that your labour is not in vain in the Lord.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1 242: 9-14

स्वर्ग के लिए एक रास्ता है, सद्भाव; और ईश्वरीय विज्ञान में मसीह हमें इस मार्ग को दिखाता है। कोई और वास्तविकता नहीं है, अच्छे ईश्वर और उसके प्रतिबिंब को जानने और इंद्रियों के दर्द और सुख से श्रेष्ठ होने के अलावा जीवन की कोई अन्य चेतना नहीं है।

1. 242 : 9-14

There is but one way to heaven, harmony, and Christ in divine Science shows us this way. It is to know no other reality — to have no other consciousness of life — than good, God and His reflection, and to rise superior to the so-called pain and pleasure of the senses.

2. 428 : 3 केवल

जीवन वास्तविक है, और मृत्यु भ्रम है।

2. 428 : 3 only

Life is real, and death is the illusion.

3. 430 : 2-3, 7-9

यीशु ने यह प्रदर्शित किया, मरते हुए और मृतकों को उठाते हुए।

जब मनुष्य मृत्यु पर अपना विश्वास छोड़ देता है, तो वह ईश्वर, जीवन और प्रेम की ओर अधिक तेजी से आगे बढ़ेगा।

3. 430 : 2-3, 7-9

Jesus demonstrated this, healing the dying and raising the dead.

When man gives up his belief in death, he will advance more rapidly towards God, Life, and Love.

4. 79 : 5-6

मौत के संबंध में रोगी के विचारों को बदलकर स्वास्थ्य को बहाल करने के हजारों उदाहरणों का उल्लेख किया जा सकता है।

4. 79 : 5-6

Thousands of instances could be cited of health restored by changing the patient's thoughts regarding death.

5. 428 : 30-6

लेखक ने आशाहीन जैविक बीमारी को ठीक किया है, और जीवन और स्वास्थ्य को भगवान की समझ के माध्यम से उठाया है जो कि मर रहा था। यह मानना कि पाप सर्वशक्तिमान और अनन्त जीवन पर हावी हो सकता है, यह पाप है और इस जीवन को इस समझ के साथ प्रकाश में लाया जाना चाहिए कि कोई मृत्यु नहीं है, साथ ही साथ आत्मा के अन्य अनुग्रह द्वारा भी। हालांकि, हमें नियंत्रण के अधिक सरल प्रदर्शनों के साथ शुरू करना चाहिए, और जितनी जल्दी हम शुरू करेंगे, उतना ही बेहतर होगा।

5. 428 : 30-6

The author has healed hopeless organic disease, and raised the dying to life and health through the understanding of God as the only Life. It is a sin to believe that aught can overpower omnipotent and eternal Life, and this Life must be brought to light by the understanding that there is no death, as well as by other graces of Spirit. We must begin, however, with the more simple demonstrations of control, and the sooner we begin the better.

6. 426 : 8-29

जब गंतव्य वांछनीय होता है, तो उम्मीद हमारी प्रगति को गति देती है। सत्य के लिए संघर्ष एक को कमजोर बनाने के बजाय मजबूत बनाता है, एक को पहनने के बजाय आराम करता है। यदि मृत्यु में विश्वास तिरोहित हो जाता है, और यह समझ प्राप्त हो जाती है कि मृत्यु नहीं है, तो यह "जीवन का वृक्ष" होगा, जो इसके फलों से जाना जाता है। मनुष्य को अपनी ऊर्जाओं और प्रयासों को नवीनीकृत करना चाहिए, और अपने स्वयं के उद्धार के लिए काम करने की आवश्यकता को सीखते हुए, पाखंड को भी देखना चाहिए। जब यह जान लिया जाता है कि बीमारी जीवन को नष्ट नहीं कर सकती है, और मृत्यु से पाप या बीमारी से मृत्यु को बचाया नहीं जाता है, तो यह समझ जीवन के नएपन में तब्दील हो जाएगी। यह या तो मरने या कब्र से डरने की इच्छा में महारत हासिल करेगा, और इस तरह नश्वर अस्तित्व को नष्ट करने वाले महान भय को नष्ट कर देगा।

मृत्यु में सभी विश्वासों का त्याग और इसके डंक के डर से स्वास्थ्य और नैतिकता के स्तर को अपने वर्तमान उत्थान से बहुत ऊपर उठाया जा सकता है, और हमें ईश्वर में जीवन के प्रति असीम विश्वास के साथ ईसाई धर्म के बैनर को धारण करने में सक्षम करेगा। पाप मौत लाया, और पाप के गायब होने के साथ मौत गायब हो जाएगी।

6. 426 : 8-29

When the destination is desirable, expectation speeds our progress. The struggle for Truth makes one strong instead of weak, resting instead of wearying one. If the belief in death were obliterated, and the understanding obtained that there is no death, this would be a "tree of life," known by its fruits. Man should renew his energies and endeavors, and see the folly of hypocrisy, while also learning the necessity of working out his own salvation. When it is learned that disease cannot destroy life, and that mortals are not saved from sin or sickness by death, this understanding will quicken into newness of life. It will master either a desire to die or a dread of the grave, and thus destroy the great fear that besets mortal existence.

The relinquishment of all faith in death and also of the fear of its sting would raise the standard of health and morals far beyond its present elevation, and would enable us to hold the banner of Christianity aloft with unflinching faith in God, in Life eternal. Sin brought death, and death will disappear with the disappearance of sin.

7 203: 17-25 (से 1st.), 31-2

हम एक से अधिक सर्वोच्च शासक या भगवान से कम किसी शक्ति में विश्वास करने के लिए प्रवण हैं। हम कल्पना करते हैं कि मन एक कामुक शरीर में कैद हो सकता है। जब भौतिक शरीर बर्बाद हो गया है, जब बुराई ने मामले में जीवन के विश्वास को पलट दिया है और इसे नष्ट कर दिया है, तो नश्वर लोग मानते हैं कि मृत्युहीन सिद्धांत, या आत्मा, पदार्थ से बच जाती है और जीवित रहती है; पर ये सच नहीं है। मृत्यु जीवन के लिए एक कदम-पत्थर नहीं है, अमरता और आनंद है।

ईश्वर, ईश्वरीय भलाई, मनुष्य को अनंत जीवन देने के लिए उसे नहीं मारता, क्योंकि ईश्वर ही मनुष्य का जीवन है। भगवान एक बार केंद्र में है और होने की परिधि है। यह बुरा है कि मर जाता है; अच्छा नहीं मरता।

7. 203 : 17-25 (to 1st .), 31-2

We are prone to believe either in more than one Supreme Ruler or in some power less than God. We imagine that Mind can be imprisoned in a sensuous body. When the material body has gone to ruin, when evil has overtaxed the belief of life in matter and destroyed it, then mortals believe that the deathless Principle, or Soul, escapes from matter and lives on; but this is not true. Death is not a stepping-stone to Life, immortality, and bliss.

God, divine good, does not kill a man in order to give him eternal Life, for God alone is man's life. God is at once the centre and circumference of being. It is evil that dies; good dies not.

8 224: 8-10

पीड़ा रहित प्रगति होनी चाहिए, जिसमें कलह और मृत्यु के बजाय जीवन और शांति हो।

8. 224 : 8-10

There should be painless progress, attended by life and peace instead of discord and death.

9 290: 16-22

यदि मृत्यु नामक परिवर्तन पाप, बीमारी और मृत्यु में विश्वास को नष्ट कर देता है, तो विघटन के क्षण में खुशी जीत जाएगी, और हमेशा के लिए स्थायी हो जाएगी; लेकिन यह ऐसा नहीं है। पूर्णता से ही पूर्णता प्राप्त होती है। जो लोग अधर्मी हैं वे अभी भी अधर्मी होंगे, जब तक कि दिव्य विज्ञान में क्राइस्ट, सत्य, सभी अज्ञान और पाप को हटा नहीं देते हैं।

9. 290 : 16-22

If the change called death destroyed the belief in sin, sickness, and death, happiness would be won at the moment of dissolution, and be forever permanent; but this is not so. Perfection is gained only by perfection. They who are unrighteous shall be unrighteous still, until in divine Science Christ, Truth, removes all ignorance and sin.

10 291: 1-5, 9-18, 28-32

अधर्म को छोड़ते समय जिन पापों को क्षमा किया जाता है, वह खुशी पाप के बीच में वास्तविक हो सकती है, कि शरीर की तथाकथित मौत पाप से मुक्त हो जाती है, और यह कि भगवान का क्षमा याचना है लेकिन पाप का विनाश, - ये गंभीर गलतियाँ हैं । … मनुष्यों को यह कल्पना करने की आवश्यकता नहीं है कि मृत्यु के अनुभव में विश्वास उन्हें महिमा प्रदान करेगा।

सार्वभौमिक मुक्ति प्रगति और परिवीक्षा पर टिकी हुई है, और उनके बिना अप्राप्य है। स्वर्ग एक स्थानीयता नहीं है, बल्कि मन की एक दिव्य स्थिति है जिसमें मन की सभी अभिव्यक्तियाँ सामंजस्यपूर्ण और अमर हैं, क्योंकि पाप नहीं है और मनुष्य अपने स्वयं के धार्मिकता नहीं पा रहा है, लेकिन "प्रभु के मन" , "जैसा कि शास्त्र कहता है।

कोई भी अंतिम निर्णय नश्वर की प्रतीक्षा नहीं करता है, क्योंकि ज्ञान का निर्णय दिन प्रति घंटा और लगातार आता है, यहां तक कि वह निर्णय जिसके द्वारा नश्वर मनुष्य को सभी भौतिक त्रुटि से विभाजित किया जाता है। आध्यात्मिक त्रुटि के लिए कोई नहीं है।

10. 291 : 1-5, 9-18, 28-32

The suppositions that sin is pardoned while unforsaken, that happiness can be genuine in the midst of sin, that the so-called death of the body frees from sin, and that God's pardon is aught but the destruction of sin, — these are grave mistakes. … Mortals need not fancy that belief in the experience of death will awaken them to glorified being.

Universal salvation rests on progression and probation, and is unattainable without them. Heaven is not a locality, but a divine state of Mind in which all the manifestations of Mind are harmonious and immortal, because sin is not there and man is found having no righteousness of his own, but in possession of "the mind of the Lord," as the Scripture says.

No final judgment awaits mortals, for the judgment-day of wisdom comes hourly and continually, even the judgment by which mortal man is divested of all material error. As for spiritual error there is none.

11 76: 18 (पीड़ा)-31

दुख, पाप, मरते विश्वास असत्य हैं। जब दैवीय विज्ञान को सार्वभौमिक रूप से समझा जाता है, तो उनके पास मनुष्य पर कोई शक्ति नहीं होगी, क्योंकि मनुष्य अमर है और दिव्य अधिकार से जीवित है।

पाप रहित आनन्द, - जीवन की पूर्ण सद्भाव और अमरता, एक दिव्य सुख या पीड़ा के बिना असीमित दिव्य सौंदर्य और अच्छाई का होना, - एकमात्र सत्य, अविनाशी पुरुष का निर्माण करता है, जिसका अस्तित्व आध्यात्मिक है। अस्तित्व की यह स्थिति वैज्ञानिक और अक्षुण्ण है, - एक पूर्णता केवल उन लोगों द्वारा समझ में आती है जिनके पास दिव्य विज्ञान में मसीह की अंतिम समझ है। मृत्यु कभी अस्तित्व की इस स्थिति को जल्दबाजी नहीं कर सकती, क्योंकि अमरता प्रकट होने से पहले मृत्यु को दूर करना होगा, प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।

11. 76 : 18 (Suffering)-31

Suffering, sinning, dying beliefs are unreal. When divine Science is universally understood, they will have no power over man, for man is immortal and lives by divine authority.

The sinless joy, — the perfect harmony and immortality of Life, possessing unlimited divine beauty and goodness without a single bodily pleasure or pain, — constitutes the only veritable, indestructible man, whose being is spiritual. This state of existence is scientific and intact, — a perfection discernible only by those who have the final understanding of Christ in divine Science. Death can never hasten this state of existence, for death must be overcome, not submitted to, before immortality appears.

12 425: 24-28

आध्यात्मिक समझ से सही भौतिक विश्वास, और आत्मा आपको नए सिरे से बनाएगी। आप फिर से ईश्वर को नाराज करने के अलावा कभी नहीं डरेंगे, और आप कभी भी यह विश्वास नहीं करेंगे कि दिल या शरीर का कोई भी हिस्सा आपको नष्ट कर सकता है।

12. 425 : 24-28

Correct material belief by spiritual understanding, and Spirit will form you anew. You will never fear again except to offend God, and you will never believe that heart or any portion of the body can destroy you.

13 427: 29-2

मृत्यु का सपना यहाँ या उसके बाद मन से महारत हासिल करना चाहिए। सत्य के इस तुरही-शब्द को पकड़ने के लिए, अपनी स्वयं की सामग्री घोषणा से, "मैं मर गया हूँ" जाग जाएगा "कोई मृत्यु नहीं है, कोई निष्क्रियता नहीं है, रोगग्रस्त क्रिया, अतिशयोक्ति और न ही प्रतिक्रिया।"

13. 427 : 29-2

The dream of death must be mastered by Mind here or hereafter. Thought will waken from its own material declaration, "I am dead," to catch this trumpet-word of Truth, "There is no death, no inaction, diseased action, overaction, nor reaction."

14 406: 20 (हम)-25

हम, और अंत में, सत्य की सर्वोच्चता की हर दिशा में स्वयं को लाभ पहुंचाने के लिए उठ सकते हैं, मृत्यु पर जीवन, और बुराई पर अच्छाई, और यह विकास तब तक चलेगा जब तक हम भगवान के विचार की पूर्णता तक नहीं पहुंच जाते, और कोई और डर नहीं कि हम बीमार होंगे और मर जाएंगे।

14. 406 : 20 (We)-25

We can, and ultimately shall, so rise as to avail ourselves in every direction of the supremacy of Truth over error, Life over death, and good over evil, and this growth will go on until we arrive at the fulness of God's idea, and no more fear that we shall be sick and die.

15 596: 21-27

"चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूं, तौभी हानि से न डरूंगा।" (भजन संहिता 23:4.)

यद्यपि यह रास्ता नश्वर अर्थों में अंधेरा है, दिव्य जीवन और प्रेम इसे रोशन करता है, नश्वर विचार की अशांति, मृत्यु का भय, और त्रुटि की कथित वास्तविकता को नष्ट करता है। क्रिश्चियन साइंस, विरोधाभासी अर्थ, घाटी को कली और गुलाब के रूप में खिलने के लिए।

15. 596 : 21-27

"Though I walk through the valley of the shadow of death, I will fear no evil." (Psalm xxiii. 4.)

Though the way is dark in mortal sense, divine Life and Love illumine it, destroy the unrest of mortal thought, the fear of death, and the supposed reality of error. Christian Science, contradicting sense, maketh the valley to bud and blossom as the rose.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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