रविवार 28 अगस्त, 2022



विषयमसीह ईसा

SubjectChrist Jesus

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: प्रकाशित वाक्य 22: 16

"मैं यीशु दाऊद की जड़ और वंश, और चमकीला और भोर का तारा हूं।"



Golden Text: Revelation 22 : 16

I Jesus am the root and the offspring of David, and the bright and morning star.




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उत्तरदायी अध्ययन: प्रकाशित वाक्य 19: 11-16


11     फिर मैं ने स्वर्ग को खुला हुआ देखा; और देखता हूं कि एक श्वेत घोड़ा है; और उस पर एक सवार है, जो विश्वास योग्य, और सत्य कहलाता है; और वह धर्म के साथ न्याय और लड़ाई करता है।

12     उस की आंखे आग की ज्वाला हैं: और उसके सिर पर बहुत से राजमुकुट हैं; और उसका एक नाम लिखा है, जिस उस को छोड़ और कोई नहीं जानता।

13     और वह लोहू से छिड़का हुआ वस्त्र पहिने है: और उसका नाम परमेश्वर का वचन है।

14     और स्वर्ग की सेना श्वेत घोड़ों पर सवार और श्वेत और शुद्ध मलमल पहिने हुए उसके पीछे पीछे है।

15     और जाति जाति को मारने के लिये उसके मुंह से एक चोखी तलवार निकलती है, और वह लोहे का राजदण्ड लिए हुए उन पर राज्य करेगा, और वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के भयानक प्रकोप की जलजलाहट की मदिरा के कुंड में दाख रौंदेगा।

16     और उसके वस्त्र और जांघ पर यह नाम लिखा है,राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु॥

Responsive Reading: Revelation 19 : 11-16

11.     And I saw heaven opened, and behold a white horse; and he that sat upon him was called Faithful and True, and in righteousness he doth judge and make war.

12.     His eyes were as a flame of fire, and on his head were many crowns; and he had a name written, that no man knew, but he himself.

13.     And he was clothed with a vesture dipped in blood: and his name is called The Word of God.

14.     And the armies which were in heaven followed him upon white horses, clothed in fine linen, white and clean.

15.     And out of his mouth goeth a sharp sword, that with it he should smite the nations: and he shall rule them with a rod of iron: and he treadeth the winepress of the fierceness and wrath of Almighty God.

16.     And he hath on his vesture and on his thigh a name written, KING OF KINGS, AND LORD of LORDS.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यशायाह 11: 1-6, 9

1     तब यिशै के ठूंठ में से एक डाली फूट निकलेगी और उसकी जड़ में से एक शाखा निकल कर फलवन्त होगी।

2     और यहोवा की आत्मा, बुद्धि और समझ की आत्मा, युक्ति और पराक्रम की आत्मा, और ज्ञान और यहोवा के भय की आत्मा उस पर ठहरी रहेगी।

3     ओर उसको यहोवा का भय सुगन्ध सा भाएगा॥ वह मुंह देखा न्याय न करेगा और न अपने कानों के सुनने के अनुसार निर्णय करेगा;

4     परन्तु वह कंगालों का न्याय धर्म से, और पृथ्वी के नम्र लोगों का निर्णय खराई से करेगा; और वह पृथ्वी को अपने वचन के सोंटे से मारेगा, और अपने फूंक के झोंके से दुष्ट को मिटा डालेगा।

5     उसकी कटि का फेंटा धर्म और उसकी कमर का फेंटा सच्चाई होगी॥

6     तब भेडिय़ा भेड़ के बच्चे के संग रहा करेगा, और चीता बकरी के बच्चे के साथ बैठा रहेगा, और बछड़ा और जवान सिंह और पाला पोसा हुआ बैल तीनों इकट्ठे रहेंगे, और एक छोटा लड़का उनकी अगुवाई करेगा।

9     मेरे सारे पवित्र पर्वत पर न तो कोई दु:ख देगा और न हानि करेगा; क्योंकि पृथ्वी यहोवा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसा जल समुद्र में भरा रहता है॥

1. Isaiah 11 : 1-6, 9

1     And there shall come forth a rod out of the stem of Jesse, and a Branch shall grow out of his roots:

2     And the spirit of the Lord shall rest upon him, the spirit of wisdom and understanding, the spirit of counsel and might, the spirit of knowledge and of the fear of the Lord;

3     And shall make him of quick understanding in the fear of the Lord: and he shall not judge after the sight of his eyes, neither reprove after the hearing of his ears:

4     But with righteousness shall he judge the poor, and reprove with equity for the meek of the earth: and he shall smite the earth with the rod of his mouth, and with the breath of his lips shall he slay the wicked.

5     And righteousness shall be the girdle of his loins, and faithfulness the girdle of his reins.

6     The wolf also shall dwell with the lamb, and the leopard shall lie down with the kid; and the calf and the young lion and the fatling together; and a little child shall lead them.

9     They shall not hurt nor destroy in all my holy mountain: for the earth shall be full of the knowledge of the Lord, as the waters cover the sea.

2. मरकुस 1: 1, 9-11

1     परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह के सुसमाचार का आरम्भ।

9     उन दिनों में यीशु ने गलील के नासरत से आकर, यरदन में यूहन्ना से बपतिस्मा लिया।

10     और जब वह पानी से निकलकर ऊपर आया, तो तुरन्त उस ने आकाश को खुलते और आत्मा को कबूतर की नाई अपने ऊपर उतरते देखा।

11     और यह आकाशवाणी हई, कि तू मेरा प्रिय पुत्र है, तुझ से मैं प्रसन्न हूं॥

2. Mark 1 : 1, 9-11

1     The beginning of the gospel of Jesus Christ, the Son of God;

9     And it came to pass in those days, that Jesus came from Nazareth of Galilee, and was baptized of John in Jordan.

10     And straightway coming up out of the water, he saw the heavens opened, and the Spirit like a dove descending upon him:

11     And there came a voice from heaven, saying, Thou art my beloved Son, in whom I am well pleased.

3. यूहन्ना 1 : 43-49

43     दूसरे दिन यीशु ने गलील को जाना चाहा; और फिलेप्पुस से मिलकर कहा, मेरे पीछे हो ले।

44     फिलेप्पुस तो अन्द्रियास और पतरस के नगर बैतसैदा का निवासी था।

45     फिलेप्पुस ने नतनएल से मिलकर उस से कहा, कि जिस का वर्णन मूसा ने व्यवस्था में और भविष्यद्वक्ताओं ने किया है, वह हम को मिल गया; वह यूसुफ का पुत्र, यीशु नासरी है।

46     नतनएल ने उस से कहा, क्या कोई अच्छी वस्तु भी नासरत से निकल सकती है? फिलेप्पुस ने उस से कहा, चलकर देख ले।

47     यीशु ने नतनएल को अपनी ओर आते देखकर उसके विषय में कहा, देखो, यह सचमुच इस्त्राएली है: इस में कपट नहीं।

48     नतनएल ने उस से कहा, तू मुझे कहां से जानता है? यीशु ने उस को उत्तर दिया; उस से पहिले कि फिलेप्पुस ने तुझे बुलाया, जब तू अंजीर के पेड़ के तले था, तब मैं ने तुझे देखा था।

49     नतनएल ने उस को उत्तर दिया, कि हे रब्बी, तू परमेश्वर का पुत्र है; तू इस्त्राएल का महाराजा है।

3. John 1 : 43-49

43     The day following Jesus would go forth into Galilee, and findeth Philip, and saith unto him, Follow me.

44     Now Philip was of Bethsaida, the city of Andrew and Peter.

45     Philip findeth Nathanael, and saith unto him, We have found him, of whom Moses in the law, and the prophets, did write, Jesus of Nazareth, the son of Joseph.

46     And Nathanael said unto him, Can there any good thing come out of Nazareth? Philip saith unto him, Come and see.

47     Jesus saw Nathanael coming to him, and saith of him, Behold an Israelite indeed, in whom is no guile!

48     Nathanael saith unto him, Whence knowest thou me? Jesus answered and said unto him, Before that Philip called thee, when thou wast under the fig tree, I saw thee.

49     Nathanael answered and saith unto him, Rabbi, thou art the Son of God; thou art the King of Israel.

4. यूहन्ना 2 : 1-11, 13-16

1     फिर तीसरे दिन गलील के काना में किसी का ब्याह था, और यीशु की माता भी वहां थी।

2     और यीशु और उसके चेले भी उस ब्याह में नेवते गए थे।

3     जब दाखरस घट गया, तो यीशु की माता ने उस से कहा, कि उन के पास दाखरस नहीं रहा।

4     यीशु ने उस से कहा, हे महिला मुझे तुझ से क्या काम? अभी मेरा समय नहीं आया।

5     उस की माता ने सेवकों से कहा, जो कुछ वह तुम से कहे, वही करना।

6     वहां यहूदियों के शुद्ध करने की रीति के अनुसार पत्थर के छ: मटके धरे थे, जिन में दो दो, तीन तीन मन समाता था।

7     यीशु ने उन से कहा, मटकों में पानी भर दो: सो उन्हों ने मुँहामुँह भर दिया।

8     यीशु ने उन से कहा, अब निकालकर भोज के प्रधान के पास ले जाओ।

9     वे ले गए, जब भोज के प्रधान ने वह पानी चखा, जो दाखरस बन गया था, और नहीं जानता था, कि वह कहां से आया हे, (परन्तु जिन सेवकों ने पानी निकाला था, वे जानते थे) तो भोज के प्रधान ने दूल्हे को बुलाकर, उस से कहा।

10     हर एक मनुष्य पहिले अच्छा दाखरस देता है और जब लोग पीकर छक जाते हैं, तब मध्यम देता है; परन्तु तू ने अच्छा दाखरस अब तक रख छोड़ा है।

11     यीशु ने गलील के काना में अपना यह पहिला चिन्ह दिखाकर अपनी महिमा प्रगट की और उसके चेलों ने उस पर विश्वास किया॥

13     यहूदियों का फसह का पर्व निकट था और यीशु यरूशलेम को गया।

14     और उस ने मन्दिर में बैल और भेड़ और कबूतर के बेचने वालों ओर सर्राफों को बैठे हुए पाया।

15     और रस्सियों का को ड़ा बनाकर, सब भेड़ों और बैलों को मन्दिर से निकाल दिया, और सर्राफों के पैसे बिथरा दिए, और पीढ़ों को उलट दिया।

16     और कबूतर बेचने वालों से कहा; इन्हें यहां से ले जाओ: मेरे पिता के भवन को व्यापार का घर मत बनाओ।

4. John 2 : 1-11, 13-16

1     And the third day there was a marriage in Cana of Galilee; and the mother of Jesus was there:

2     And both Jesus was called, and his disciples, to the marriage.

3     And when they wanted wine, the mother of Jesus saith unto him, They have no wine.

4     Jesus saith unto her, Woman, what have I to do with thee? mine hour is not yet come.

5     His mother saith unto the servants, Whatsoever he saith unto you, do it.

6     And there were set there six waterpots of stone, after the manner of the purifying of the Jews, containing two or three firkins apiece.

7     Jesus saith unto them, Fill the waterpots with water. And they filled them up to the brim.

8     And he saith unto them, Draw out now, and bear unto the governor of the feast. And they bare it.

9     When the ruler of the feast had tasted the water that was made wine, and knew not whence it was: (but the servants which drew the water knew;) the governor of the feast called the bridegroom,

10     And saith unto him, Every man at the beginning doth set forth good wine; and when men have well drunk, then that which is worse: but thou hast kept the good wine until now.

11     This beginning of miracles did Jesus in Cana of Galilee, and manifested forth his glory; and his disciples believed on him.

13     And the Jews’ passover was at hand, and Jesus went up to Jerusalem,

14     And found in the temple those that sold oxen and sheep and doves, and the changers of money sitting:

15     And when he had made a scourge of small cords, he drove them all out of the temple, and the sheep, and the oxen; and poured out the changers’ money, and overthrew the tables;

16     And said unto them that sold doves, Take these things hence; make not my Father’s house an house of merchandise.

5. मरकुस 1: 32-39

32     सन्ध्या के समय जब सूर्य डूब गया तो लोग सब बीमारों को और उन्हें जिन में दुष्टात्माएं थीं उसके पास लाए।

33     और सारा नगर द्वार पर इकट्ठा हुआ।

34     और उस ने बहुतों को जो नाना प्रकार की बीमारियों से दुखी थे, चंगा किया; और बहुत से दुष्टात्माओं को निकाला; और दुष्टात्माओं को बोलने न दिया, क्योंकि वे उसे पहचानती थीं॥

35     और भोर को दिन निकलने से बहुत पहिले, वह उठकर निकला, और एक जंगली स्थान में गया और वहां प्रार्थना करने लगा।

36     तब शमौन और उसके साथी उस की खोज में गए।

37     जब वह मिला, तो उस से कहा; कि सब लोग तुझे ढूंढ रहे हैं।

38     उस ने उन से कहा, आओ; हम और कहीं आस पास की बस्तियों में जाएं, कि मैं वहां भी प्रचार करूं, क्योंकि मैं इसी लिये निकला हूं।

39     सो वह सारे गलील में उन की सभाओं में जा जाकर प्रचार करता और दुष्टात्माओं को निकालता रहा॥

5. Mark 1 : 32-39

32     And at even, when the sun did set, they brought unto him all that were diseased, and them that were possessed with devils.

33     And all the city was gathered together at the door.

34     And he healed many that were sick of divers diseases, and cast out many devils; and suffered not the devils to speak, because they knew him.

35     And in the morning, rising up a great while before day, he went out, and departed into a solitary place, and there prayed.

36     And Simon and they that were with him followed after him.

37     And when they had found him, they said unto him, All men seek for thee.

38     And he said unto them, Let us go into the next towns, that I may preach there also: for therefore came I forth.

39     And he preached in their synagogues throughout all Galilee, and cast out devils.

6. मत्ती 11: 2-6

2     यूहन्ना ने बन्दीगृह में मसीह के कामों का समाचार सुनकर अपने चेलों को उस से यह पूछने भेजा।

3     कि क्या आनेवाला तू ही है: या हम दूसरे की बाट जोहें?

4     यीशु ने उत्तर दिया, कि जो कुछ तुम सुनते हो और देखते हो, वह सब जाकर यूहन्ना से कह दो।

5     कि अन्धे देखते हैं और लंगड़े चलते फिरते हैं; कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं और बहिरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाए जाते हैं; और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है।

6     और धन्य है वह, जो मेरे कारण ठोकर न खाए।

6. Matthew 11 : 2-6

2     Now when John had heard in the prison the works of Christ, he sent two of his disciples,

3     And said unto him, Art thou he that should come, or do we look for another?

4     Jesus answered and said unto them, Go and shew John again those things which ye do hear and see:

5     The blind receive their sight, and the lame walk, the lepers are cleansed, and the deaf hear, the dead are raised up, and the poor have the gospel preached to them.

6     And blessed is he, whosoever shall not be offended in me.

7. यूहन्ना 21 : 25

25     और भी बहुत से काम हैं, जो यीशु ने किए; यदि वे एक एक करके लिखे जाते, तो मैं समझता हूं, कि पुस्तकें जो लिखी जातीं वे जगत में भी न समातीं॥

7. John 21 : 25

25     And there are also many other things which Jesus did, the which, if they should be written every one, I suppose that even the world itself could not contain the books that should be written. Amen.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 583 : 10-11

मसीह। भगवान की दिव्य अभिव्यक्ति, जो अवतार त्रुटि को नष्ट करने के लिए मांस के लिए आती है।

1. 583 : 10-11

Christ. The divine manifestation of God, which comes to the flesh to destroy incarnate error.

2. 589 : 16-18

यीशु। ईश्वरीय विचार की उच्चतम मानव भौतिक अवधारणा, विद्रोह करने और त्रुटि को नष्ट करने और प्रकाश की अमरता लाने के लिए।

2. 589 : 16-18

Jesus. The highest human corporeal concept of the divine idea, rebuking and destroying error and bringing to light man's immortality.

3. 26 : 10-18, 28-9

मसीह आत्मा था जिसे यीशु ने अपने बयानों में निहित किया था: "मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं;" "मैं और पिता एक हैं।" यह मसीह, या यीशु की दिव्यता, उसकी दिव्य प्रकृति थी, जो उसे अनुप्राणित करती थी। ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम ने पाप, बीमारी और मृत्यु पर यीशु को अधिकार दिया। उनका मिशन आकाशीय विज्ञान को प्रकट करना था, यह साबित करने के लिए कि ईश्वर क्या है और वह मनुष्य के लिए क्या करता है।

हमारे मास्टर ने कोई विचार, सिद्धांत या विश्वास नहीं सिखाया। यह सभी वास्तविक लोगों का दिव्य सिद्धांत था जो उन्होंने सिखाया और अभ्यास किया। ईसाई धर्म का उनका प्रमाण धर्म और पूजा का कोई रूप या प्रणाली नहीं था, लेकिन क्रिश्चियन साइंस, जो जीवन और प्रेम के सामंजस्य को दर्शाता है। यीशु ने जॉन द बैप्टिस्ट को एक संदेश भेजा, एक प्रश्न से परे जो यह साबित करने के लिए था कि मसीह आया था: "कि जो कुछ तुम सुनते हो और देखते हो, वह सब जाकर यूहन्ना से कह दो। कि अन्धे देखते हैं और लंगड़े चलते फिरते हैं; कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं और बहिरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाए जाते हैं; और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है।" दूसरे शब्दों में: जॉन को बताएं कि दैवीय शक्ति का प्रदर्शन क्या है, और वह तुरंत महसूस करेगा कि ईश्वर मसीहाई काम में एक शक्ति है।

3. 26 : 10-18, 28-9

The Christ was the Spirit which Jesus implied in his own statements: "I am the way, the truth, and the life;" "I and my Father are one." This Christ, or divinity of the man Jesus, was his divine nature, the godliness which animated him. Divine Truth, Life, and Love gave Jesus authority over sin, sickness, and death. His mission was to reveal the Science of celestial being, to prove what God is and what He does for man.

Our Master taught no mere theory, doctrine, or belief. It was the divine Principle of all real being which he taught and practised. His proof of Christianity was no form or system of religion and worship, but Christian Science, working out the harmony of Life and Love. Jesus sent a message to John the Baptist, which was intended to prove beyond a question that the Christ had come: "Go your way, and tell John what things ye have seen and heard; how that the blind see, the lame walk, the lepers are cleansed, the deaf hear, the dead are raised, to the poor the gospel is preached." In other words: Tell John what the demonstration of divine power is, and he will at once perceive that God is the power in the Messianic work.

4. 31 : 12-17

सबसे पहले ईसाई कर्तव्यों की सूची में, उन्होंने अपने अनुयायियों को सत्य और प्रेम की उपचार शक्ति सिखाई। उन्होंने मृत समारोहों के लिए कोई महत्व नहीं दिया। यह जीवित मसीह है, व्यावहारिक सत्य है, जो यीशु को उन सभी लोगों के लिए "पुनरुत्थान और जीवन" बनाता है जो उसे विलेख में पालन करते हैं।

4. 31 : 12-17

First in the list of Christian duties, he taught his followers the healing power of Truth and Love. He attached no importance to dead ceremonies. It is the living Christ, the practical Truth, which makes Jesus "the resurrection and the life" to all who follow him in deed.

5. 473 : 7-25

ईश्वर-तत्त्व सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है। ईश्वर हर जगह है, और उसके बिना कुछ भी मौजूद नहीं है या उसकी कोई शक्ति नहीं है। मसीह एक आदर्श सत्य है, जो क्रायश्चियन साइंस के माध्यम से बीमारी और पाप को ठीक करने के लिए आता है, और ईश्वर को सभी शक्ति प्रदान करता है। यीशु उस व्यक्ति का नाम है जिसने बीमारों और पापों का उपचार करके और मृत्यु की शक्ति को नष्ट करके, मसीह को प्रस्तुत किया, जो कि अन्य सभी पुरुषों की तुलना में अधिक परमेश्वर का सच्चा विचार है। यीशु मानव मनुष्य है, और मसीह ईश्वरीय विचार है; इसलिए यीशु मसीह का द्वैत है।

कलीसियाई निरंकुशता के युग में, यीशु ने ईसाई धर्म की शिक्षा और अभ्यास की शुरुआत की, जो ईसाई धर्म की सच्चाई और प्रेम का प्रमाण प्रस्तुत करता है; लेकिन उसके उदाहरण तक पहुँचने के लिए और उसके नियम के अनुसार उसके अचूक विज्ञान का परीक्षण करने के लिए, बीमारी, पाप और मृत्यु को ठीक करने के लिए, ईश्वर को ईश्वरीय सिद्धांत के रूप में बेहतर समझने की आवश्यकता है, व्यक्तित्व या मनुष्य यीशु के बजाय प्रेम की आवश्यकता है।

5. 473 : 7-25

The God-principle is omnipresent and omnipotent. God is everywhere, and nothing apart from Him is present or has power. Christ is the ideal Truth, that comes to heal sickness and sin through Christian Science, and attributes all power to God. Jesus is the name of the man who, more than all other men, has presented Christ, the true idea of God, healing the sick and the sinning and destroying the power of death. Jesus is the human man, and Christ is the divine idea; hence the duality of Jesus the Christ.

In an age of ecclesiastical despotism, Jesus introduced the teaching and practice of Christianity, affording the proof of Christianity's truth and love; but to reach his example and to test its unerring Science according to his rule, healing sickness, sin, and death, a better understanding of God as divine Principle, Love, rather than personality or the man Jesus, is required.

6. 53 : 4 (वहां)-7

… भूख और जुनून से दूर नासरी के रूप में अब तक एक आदमी कभी नहीं रहता था। उसने पापियों को स्पष्ट और निर्भीकता से डांटा, क्योंकि वह उनका मित्र था; इसलिए उसने वह प्याला पी लिया।

6. 53 : 4 (there)-7

… there never lived a man so far removed from appetites and passions as the Nazarene. He rebuked sinners pointedly and unflinchingly, because he was their friend; hence the cup he drank.

7. 7:1-7

गलती के लिए उसे जो एकमात्र सजा थी, वह थी, "हे शैतान, मेरे साम्हने से दूर हो।" जीसस का तिरस्कार तेज और गहन था, इसका मजबूत प्रमाण उनके स्वयं के शब्दों में मिलता है, — इस तरह के जबरन बोलने की आवश्यकता को दिखाते हुए, जब उसने शैतानों को बाहर निकाला और बीमार और पापी को चंगा किया। त्रुटि का निवारण उसके झूठे दावों की भौतिक भावना से वंचित करता है।

7. 7 : 1-7

The only civil sentence which he had for error was, "Get thee behind me, Satan." Still stronger evidence that Jesus' reproof was pointed and pungent is found in his own words, — showing the necessity for such forcible utterance, when he cast out devils and healed the sick and sinning. The relinquishment of error deprives material sense of its false claims.

8. 51 : 19-24, 28-8

उनका घाघ उदाहरण हम सभी के उद्धार के लिए था, लेकिन केवल उन कार्यों को करने के माध्यम से जो उन्होंने किए और दूसरों को करना सिखाया। उपचार में उनका उद्देश्य केवल स्वास्थ्य को बहाल करना नहीं था, बल्कि अपने दिव्य सिद्धांत को प्रदर्शित करना था। वह परमेश्वर से, सत्य और प्रेम से, जो कुछ उसने कहा और किया, उससे प्रेरित था।

यीशु निःस्वार्थ था। उनकी आध्यात्मिकता ने उन्हें कामुकता से अलग कर दिया, और स्वार्थी भौतिकवादी को उनसे घृणा करने के लिए प्रेरित किया; परन्तु यह आत्मिकता ही थी जिसने यीशु को बीमारों को चंगा करने, बुराई को दूर करने और मरे हुओं को जिलाने में सक्षम बनाया।

बचपन से ही, वह अपने "पिता के व्यवसाय" में शामिल थे। उसकी खोज दूसरों से बहुत अलग थी। उसका स्वामी आत्मा था; लेकिन उनका स्वामी सामग्री था। उसने परमेश्वर की सेवा की; उन्होंने लालच की सेवा की। उसके स्नेह शुद्ध थे; उनके कामुक थे। उसके स्वास्थ्य, पवित्रता और जीवन के आध्यात्मिक प्रमाण में इन्द्रियाँ डूब जाती हैं; उनकी इंद्रियों ने विपरीत रूप से गवाही दी और पाप, बीमारी और मृत्यु के भौतिक साक्ष्य को आत्मसात कर लिया।

8. 51 : 19-24, 28-8

His consummate example was for the salvation of us all, but only through doing the works which he did and taught others to do. His purpose in healing was not alone to restore health, but to demonstrate his divine Principle. He was inspired by God, by Truth and Love, in all that he said and did.

Jesus was unselfish. His spirituality separated him from sensuousness, and caused the selfish materialist to hate him; but it was this spirituality which enabled Jesus to heal the sick, cast out evil, and raise the dead.

From early boyhood he was about his "Father's business." His pursuits lay far apart from theirs. His master was Spirit; their master was matter. He served God; they served mammon. His affections were pure; theirs were carnal. His senses drank in the spiritual evidence of health, holiness, and life; their senses testified oppositely, and absorbed the material evidence of sin, sickness, and death.

9. 52 : 19-28

"दुखों का आदमी" भौतिक जीवन और बुद्धिमत्ता की श्रेष्ठता और सभी समावेशी ईश्वर की ताकतवर वास्तविकता को अच्छी तरह से समझता है। ये मन की चिकित्सा या क्रिएचरियन साइंस के दो मुख्य बिंदु थे, जिसने उन्हें प्यार से सशस्त्र किया। ईश्वर की सर्वोच्च सांसारिक प्रतिनिधि, ईश्वरीय शक्ति को प्रतिबिंबित करने की मानवीय क्षमता की बात करते हुए, केवल अपने युग के लिए नहीं, बल्कि सभी युगों के लिए, अपने शिष्यों से कहा। "कि जो मुझ पर विश्वास रखता है, ये काम जो मैं करता हूं वह भी करेगा;" और "और विश्वास करने वालों में ये चिन्ह होंगे कि वे।"

9. 52 : 19-28

The "man of sorrows" best understood the nothingness of material life and intelligence and the mighty actuality of all-inclusive God, good. These were the two cardinal points of Mind-healing, or Christian Science, which armed him with Love. The highest earthly representative of God, speaking of human ability to reflect divine power, prophetically said to his disciples, speaking not for their day only but for all time: "He that believeth on me, the works that I do shall he do also;" and "These signs shall follow them that believe."

10. 40 : 25-30

हमारे स्वर्गीय पिता, दिव्य प्रेम, मांग करते हैं कि सभी पुरुषों को हमारे गुरु और प्रेरितों के उदाहरण का पालन करना चाहिए न कि केवल उनके व्यक्तित्व की पूजा करनी चाहिए। यह दुखद है कि वाक्यांश ईश्वरीय सेवा आम तौर पर दैनिक कर्मों के बजाय सार्वजनिक पूजा का मतलब है।

10. 40 : 25-30

Our heavenly Father, divine Love, demands that all men should follow the example of our Master and his apostles and not merely worship his personality. It is sad that the phrase divine service has come so generally to mean public worship instead of daily deeds.

11. 41 : 6-7

अपने गुरु की तरह, हमें भौतिक अर्थों में होने के आध्यात्मिक अर्थ से प्रस्थान करना चाहिए।

11. 41 : 6-7

Like our Master, we must depart from material sense into the spiritual sense of being.

12. 28 : 15-24

न तो यीशु की उत्पत्ति, चरित्र, और न ही यीशु के कार्य को आम तौर पर समझा गया था। भौतिक दुनिया ने उनके स्वभाव के एक हिस्से को सही नहीं मापा। यहां तक कि उनकी धार्मिकता और पवित्रता ने भी पुरुषों को यह कहने में बाधा नहीं दी: वह एक अतिभक्षी और अशुद्ध का दोस्त है, और बिल्जेबब उसका संरक्षक है।

हे तुम क्रिश्चियन शहीद हो, याद रखो, यह पर्याप्त है यदि तुम अपने आप को अपने मास्टर के पैरों के फीते खोलने लायक पाते हो!

12. 28 : 15-24

Neither the origin, the character, nor the work of Jesus was generally understood. Not a single component part of his nature did the material world measure aright. Even his righteousness and purity did not hinder men from saying: He is a glutton and a friend of the impure, and Beelzebub is his patron.

Remember, thou Christian martyr, it is enough if thou art found worthy to unloose the sandals of thy Master's feet!

13. 55 : 15-26

अपने स्वयं के पंखों के नीचे बीमार और पापी लोगों को इकट्ठा करके, सत्य का अमर विचार सदियों से चल रहा है। मेरी थकी हुई आशा उस सुखद दिन को महसूस करने की कोशिश करती है, जब मनुष्य मसीह के विज्ञान को पहचान लेगा और अपने पड़ोसी को अपने जैसा प्यार करेगा, — जब वह ईश्वर की सर्वशक्तिमानता और उस परमात्मा की उपचार शक्ति का एहसास करेगा जो उसने किया है और मानव जाति के लिए कर रहा है। वादे पूरे होंगे। दिव्य चिकित्सा के प्रकट होने का समय हर समय है; और जो कोई भी दिव्य विज्ञान की वेदी पर अपने सांसारिक स्तर को रखता है, अब मसीह के प्याले को पीता है, और वह ईसाई उपचार की भावना और शक्ति से संपन्न है।

13. 55 : 15-26

Truth's immortal idea is sweeping down the centuries, gathering beneath its wings the sick and sinning. My weary hope tries to realize that happy day, when man shall recognize the Science of Christ and love his neighbor as himself, — when he shall realize God's omnipotence and the healing power of the divine Love in what it has done and is doing for mankind. The promises will be fulfilled. The time for the reappearing of the divine healing is throughout all time; and whosoever layeth his earthly all on the altar of divine Science, drinketh of Christ's cup now, and is endued with the spirit and power of Christian healing.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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