रविवार 27 फ़रवरी, 2022



विषयमसीह ईसा

SubjectChrist Jesus

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: यूहन्ना 8 : 58

"मैं तुम से सच सच कहता हूं; कि पहिले इसके कि इब्राहीम उत्पन्न हुआ मैं हूं।"”— मसीह ईसा



Golden Text: John 8 : 58

Verily, verily, I say unto you, Before Abraham was, I am.” — Christ Jesus”




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उत्तरदायी अध्ययन: यूहन्ना 1: 1, 4, 5, 11-14, 16, 17


1     आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।

3     सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।

4     उस में जीवन था; और वह जीवन मुनष्यों की ज्योति थी।

5     और ज्योति अन्धकार में चमकती है; और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया।

11     वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।

12     परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।

13     वे न तो लोहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।

14     और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा।

16     क्योंकि उस की परिपूर्णता से हम सब ने प्राप्त किया अर्थात अनुग्रह पर अनुग्रह।

17     इसलिये कि व्यवस्था तो मूसा के द्वारा दी गई; परन्तु अनुग्रह, और सच्चाई यीशु मसीह के द्वारा पहुंची।

Responsive Reading: John 1 : 1, 4, 5, 11-14, 16, 17

1.     In the beginning was the Word, and the Word was with God, and the Word was God.

4.     In him was life; and the life was the light of men.

5.     And the light shineth in darkness; and the darkness comprehended it not.

11.     He came unto his own, and his own received him not.

12.     But as many as received him, to them gave he power to become the sons of God, even to them that believe on his name:

13.     Which were born, not of blood, nor of the will of the flesh, nor of the will of man, but of God.

14.     And the Word was made flesh, and dwelt among us, (and we beheld his glory, the glory as of the only begotten of the Father,) full of grace and truth.

16.     And of his fulness have all we received, and grace for grace.

17.     For the law was given by Moses, but grace and truth came by Jesus Christ.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यशायाह 9: 6, 7 (से 1st.)

6     क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है; और प्रभुता उसके कांधे पर होगी, और उसका नाम अद्भुत, युक्ति करने वाला, पराक्रमी परमेश्वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा।

7     उसकी प्रभुता सर्वदा बढ़ती रहेगी, और उसकी शान्ति का अन्त न होगा, इसलिये वे उसको दाऊद की राजगद्दी पर इस समय से ले कर सर्वदा के लिये न्याय और धर्म के द्वारा स्थिर किए ओर संभाले रहेगा। सेनाओं के यहोवा की धुन के द्वारा यह हो जाएगा॥

1. Isaiah 9 : 6, 7 (to 1st .)

6     For unto us a child is born, unto us a son is given: and the government shall be upon his shoulder: and his name shall be called Wonderful, Counseller, The mighty God, The everlasting Father, The Prince of Peace.

7     Of the increase of his government and peace there shall be no end, upon the throne of David, and upon his kingdom, to order it, and to establish it with judgment and with justice from henceforth even for ever.

2. लूका 4: 1 (से 1st,), 16-19, 21 (इस)

1     फिर यीशु पवित्रआत्मा से भरा हुआ, यरदन से लैटा।

16     और वह नासरत में आया; जहां पाला पोसा गया था; और अपनी रीति के अनुसार सब्त के दिन आराधनालय में जा कर पढ़ने के लिये खड़ा हुआ।

17     यशायाह भविष्यद्वक्ता की पुस्तक उसे दी गई, और उस ने पुस्तक खोलकर, वह जगह निकाली जहां यह लिखा था।

18     कि प्रभु का आत्मा मुझ पर है, इसलिये कि उस ने कंगालों को सुसमाचार सुनाने के लिये मेरा अभिषेक किया है, और मुझे इसलिये भेजा है, कि बन्धुओं को छुटकारे का और अन्धों को दृष्टि पाने का सुसमाचार प्रचार करूं और कुचले हुओं को छुड़ाऊं।

19     और प्रभु के प्रसन्न रहने के वर्ष का प्रचार करूं।

21     तब वह उन से कहने लगा, कि आज ही यह लेख तुम्हारे साम्हने पूरा हुआ है।

2. Luke 4 : 1 (to 1st ,), 16-19, 21 (This)

1     And Jesus being full of the Holy Ghost returned from Jordan,

16     And he came to Nazareth, where he had been brought up: and, as his custom was, he went into the synagogue on the sabbath day, and stood up for to read.

17     And there was delivered unto him the book of the prophet Esaias. And when he had opened the book, he found the place where it was written,

18     The Spirit of the Lord is upon me, because he hath anointed me to preach the gospel to the poor; he hath sent me to heal the brokenhearted, to preach deliverance to the captives, and recovering of sight to the blind, to set at liberty them that are bruised,

19     To preach the acceptable year of the Lord.

21     This day is this scripture fulfilled in your ears.

3. लूका 5: 27-32

27     और इसके बाद वह बाहर गया, और लेवी नाम एक चुंगी लेने वाले को चुंगी की चौकी पर बैठे देखा, और उस से कहा, मेरे पीछे हो ले।

28     तब वह सब कुछ छोड़कर उठा, और उसके पीछे हो लिया।

29     और लेवी ने अपने घर में उसके लिये बड़ी जेवनार की; और चुंगी लेने वालों की और औरों की जो उसके साथ भोजन करने बैठे थे एक बड़ी भीड़ थी।

30     और फरीसी और उन के शास्त्री उस के चेलों से यह कहकर कुड़कुड़ाने लगे, कि तुम चुंगी लेने वालों और पापियों के साथ क्यों खाते-पीते हो?

31     यीशु ने उन को उत्तर दिया; कि वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है।

32     मैं धमिर्यों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूं।

3. Luke 5 : 27-32

27     And after these things he went forth, and saw a publican, named Levi, sitting at the receipt of custom: and he said unto him, Follow me.

28     And he left all, rose up, and followed him.

29     And Levi made him a great feast in his own house: and there was a great company of publicans and of others that sat down with them.

30     But their scribes and Pharisees murmured against his disciples, saying, Why do ye eat and drink with publicans and sinners?

31     And Jesus answering said unto them, They that are whole need not a physician; but they that are sick.

32     I came not to call the righteous, but sinners to repentance.

4. मत्ती 9: 18 (वहां), 19, 23-25, 27 (से 2nd,), 28-30 (से ;), 35

18     ... सरदार ने आकर उसे प्रणाम किया और कहा मेरी पुत्री अभी मरी है; परन्तु चलकर अपना हाथ उस पर रख, तो वह जीवित हो जाएगी।

19     यीशु उठकर अपने चेलों समेत उसके पीछे हो लिया।

23     जब यीशु उस सरदार के घर में पहुंचा और बांसली बजाने वालों और भीड़ को हुल्लड़ मचाते देखा तब कहा।

24     हट जाओ, लड़की मरी नहीं, पर सोती है; इस पर वे उस की हंसी करने लगे।

25     परन्तु जब भीड़ निकाल दी गई, तो उस ने भीतर जाकर लड़की का हाथ पकड़ा, और वह जी उठी।

27     जब यीशु वहां से आगे बढ़ा, तो दो अन्धे उसके पीछे यह पुकारते हुए चले।

28     जब वह घर में पहुंचा, तो वे अन्धे उस के पास आए; और यीशु ने उन से कहा; क्या तुम्हें विश्वास है, कि मैं यह कर सकता हूं उन्होंने उस से कहा; हां प्रभु।

29     तब उस ने उन की आंखे छूकर कहा, तुम्हारे विश्वास के अनुसार तुम्हारे लिये हो।

30     और उन की आंखे खुल गई।

35     और यीशु सब नगरों और गांवों में फिरता रहा और उन की सभाओं में उपदेश करता, और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और हर प्रकार की बीमारी और दुर्बलता को दूर करता रहा।

4. Matthew 9 : 18 (there), 19, 23-25, 27 (to 2nd ,), 28-30 (to ;), 35

18     …there came a certain ruler, and worshipped him, saying, My daughter is even now dead: but come and lay thy hand upon her, and she shall live.

19     And Jesus arose, and followed him, and so did his disciples.

23     And when Jesus came into the ruler’s house, and saw the minstrels and the people making a noise,

24     He said unto them, Give place: for the maid is not dead, but sleepeth. And they laughed him to scorn.

25     But when the people were put forth, he went in, and took her by the hand, and the maid arose.

27     And when Jesus departed thence, two blind men followed him,

28     And when he was come into the house, the blind men came to him: and Jesus saith unto them, Believe ye that I am able to do this? They said unto him, Yea, Lord.

29     Then touched he their eyes, saying, According to your faith be it unto you.

30     And their eyes were opened;

35     And Jesus went about all the cities and villages, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing every sickness and every disease among the people.

5. मत्ती 11 : 2-6

2     यूहन्ना ने बन्दीगृह में मसीह के कामों का समाचार सुनकर अपने चेलों को उस से यह पूछने भेजा।

3     कि क्या आनेवाला तू ही है: या हम दूसरे की बाट जोहें?

4     यीशु ने उत्तर दिया, कि जो कुछ तुम सुनते हो और देखते हो, वह सब जाकर यूहन्ना से कह दो।

5     कि अन्धे देखते हैं और लंगड़े चलते फिरते हैं; कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं और बहिरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाए जाते हैं; और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है।

6     और धन्य है वह, जो मेरे कारण ठोकर न खाए।

5. Matthew 11 : 2-6

2     Now when John had heard in the prison the works of Christ, he sent two of his disciples,

3     And said unto him, Art thou he that should come, or do we look for another?

4     Jesus answered and said unto them, Go and shew John again those things which ye do hear and see:

5     The blind receive their sight, and the lame walk, the lepers are cleansed, and the deaf hear, the dead are raised up, and the poor have the gospel preached to them.

6     And blessed is he, whosoever shall not be offended in me.

6. लूका 9 : 28 (और) केवल, 28 (वह)-36

28     और ... वह पतरस और यूहन्ना और याकूब को ले गया और प्रार्थना करने के लिए एक पहाड़ पर चढ़ गया।

29     जब वह प्रार्थना कर ही रहा था, तो उसके चेहरे का रूप बदल गया: और उसका वस्त्र श्वेत होकर चमकने लगा।

30     और देखो, मूसा और एलिय्याह, ये दो पुरूष उसके साथ बातें कर रहे थे।

31     ये महिमा सहित दिखाई दिए; और उसके मरने की चर्चा कर रहे थे, जो यरूशलेम में होनेवाला था।

32     पतरस और उसके साथी नींद से भरे थे, और जब अच्छी तरह सचेत हुए, तो उस की महिमा; और उन दो पुरूषों को, जो उसके साथ खड़े थे, देखा।

33     जब वे उसके पास से जाने लगे, तो पतरस ने यीशु से कहा; हे स्वामी, हमारा यहां रहना भला है: सो हम तीन मण्डप बनाएं, एक तेरे लिये, एक मूसा के लिये, और एक एलिय्याह के लिये। वह जानता न था, कि क्या कह रहा है।

34     वह यह कह ही रहा था, कि एक बादल ने आकर उन्हें छा लिया, और जब वे उस बादल से घिरने लगे, तो डर गए।

35     और उस बादल में से यह शब्द निकला, कि यह मेरा पुत्र और मेरा चुना हुआ है, इस की सुनो।

36     यह शब्द होते ही यीशु अकेला पाया गया: और वे चुप रहे, और कुछ देखा था, उस की कोई बात उन दिनों में किसी से न कही॥

6. Luke 9 : 28 (And) only, 28 (he)-36

28 And … he took Peter and John and James, and went up into a mountain to pray.

29     And as he prayed, the fashion of his countenance was altered, and his raiment was white and glistering.

30     And, behold, there talked with him two men, which were Moses and Elias:

31     Who appeared in glory, and spake of his decease which he should accomplish at Jerusalem.

32     But Peter and they that were with him were heavy with sleep: and when they were awake, they saw his glory, and the two men that stood with him.

33     And it came to pass, as they departed from him, Peter said unto Jesus, Master, it is good for us to be here: and let us make three tabernacles; one for thee, and one for Moses, and one for Elias: not knowing what he said.

34     While he thus spake, there came a cloud, and overshadowed them: and they feared as they entered into the cloud.

35     And there came a voice out of the cloud, saying, This is my beloved Son: hear him.

36     And when the voice was past, Jesus was found alone. And they kept it close, and told no man in those days any of those things which they had seen.

7. मत्ती 28 : 16 (यह), 18-20

16     ... ग्यारह चेले गलील में उस पहाड़ पर गए, जिसे यीशु ने उन्हें बताया था।

18     यीशु ने उन के पास आकर कहा, कि स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है।

19     इसलिये तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो।

20     और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूं॥

7. Matthew 28 : 16 (the), 18-20

16     …the eleven disciples went away into Galilee, into a mountain where Jesus had appointed them.

18     And Jesus came and spake unto them, saying, All power is given unto me in heaven and in earth.

19     Go ye therefore, and teach all nations, baptizing them in the name of the Father, and of the Son, and of the Holy Ghost:

20     Teaching them to observe all things whatsoever I have commanded you: and, lo, I am with you alway, even unto the end of the world. Amen.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 7 : 1-12

अनंत पर टिके रहने वालों के लिए आज का दिन आशीर्वाद के साथ बड़ा है। जाग्रत चरवाहा सुबह की पहली धुंधली किरणों को देखता है, तभी एक जी उठे दिन की पूरी चमक आती है। इस प्रकार भविष्यद्वक्ता-चरवाहों के लिये पीला तारा चमका; तौभी रात बीत गई और वह आ गया, जहां, बेतलेहेम के बच्चे, मसीह के मानव संदेशवाहक, सत्य, को अस्पष्टता में रखा गया था, जो अंधे को स्पष्ट कर देगा कि मसीह यीशु के द्वारा उद्धार का मार्ग समझ में आ जाएगा, जब तक कि त्रुटि की रात भर भोर की किरणें न चमकें और होने के मार्गदर्शक सितारे को चमकाएं। ज्ञानियों को दिव्य विज्ञान के इस दिन के तारे को देखने और उसका पालन करने के लिए प्रेरित किया गया, जिससे शाश्वत सद्भाव का मार्ग प्रशस्त हुआ।

1. vii : 1-12

To those leaning on the sustaining infinite, to-day is big with blessings. The wakeful shepherd beholds the first faint morning beams, ere cometh the full radiance of a risen day. So shone the pale star to the prophet-shepherds; yet it traversed the night, and came where, in cradled obscurity, lay the Bethlehem babe, the human herald of Christ, Truth, who would make plain to benighted understanding the way of salvation through Christ Jesus, till across a night of error should dawn the morning beams and shine the guiding star of being. The Wisemen were led to behold and to follow this daystar of divine Science, lighting the way to eternal harmony.

2. 482 : 15 (मसीह)-16, 19-22, 23-25

मसीह "मार्ग" और सत्य है जो सभी त्रुटि को दूर कर रहा है। … यीशु सिद्ध मनुष्य की सर्वोच्च मानवीय अवधारणा थे। वह मसीह, मसीहा से अविभाज्य था, - मांस के बाहर ईश्वर का दिव्य विचार। ... एन्जिल्स ने पुराने लोगों के लिए इस दोहरे प्रकट होने की घोषणा की, और स्वर्गदूतों ने इसे विश्वास के माध्यम से, हर युग में भूखे दिल के लिए फुसफुसाते हुए कहा।

2. 482 : 15 (Christ)-16, 19-22, 23-25

Christ is "the way" and the truth casting out all error. … Jesus was the highest human concept of the perfect man. He was inseparable from Christ, the Messiah, — the divine idea of God outside the flesh. … Angels announced to the Wisemen of old this dual appearing, and angels whisper it, through faith, to the hungering heart in every age.

3. 332 : 23 (यीशु)-26

यीशु एक कुंवारी का बेटा था। उन्हें परमेश्वर के वचन को बोलने और मनुष्यों के रूप में मनुष्यों के रूप में प्रकट करने के लिए नियुक्त किया गया था क्योंकि वे समझ के साथ-साथ विचारों को भी समझ सकते थे।

3. 332 : 23 (Jesus)-26

Jesus was the son of a virgin. He was appointed to speak God's word and to appear to mortals in such a form of humanity as they could understand as well as perceive.

4. 26 : 14-18

ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम ने पाप, बीमारी और मृत्यु पर यीशु को अधिकार दिया। उनका मिशन आकाशीय विज्ञान को प्रकट करना था, यह साबित करने के लिए कि ईश्वर क्या है और वह मनुष्य के लिए क्या करता है।

4. 26 : 14-18

Divine Truth, Life, and Love gave Jesus authority over sin, sickness, and death. His mission was to reveal the Science of celestial being, to prove what God is and what He does for man.

5. 146 : 26-30

सत्य की यह उपचार शक्ति उस अवधि के लिए पूर्वकाल में रही होगी, जिसमें यीशु रहते थे। यह उतना ही प्राचीन है जितना कि "प्राचीन दिन"। यह सभी जीवन के माध्यम से रहता है, और पूरे अंतरिक्ष में फैला हुआ है।

5. 146 : 26-30

This healing power of Truth must have been far anterior to the period in which Jesus lived. It is as ancient as "the Ancient of days." It lives through all Life, and extends throughout all space.

6. 333 : 16 (आगमन)-31, 32 (द्वारा)-9

नासरत के यीशु के आगमन ने ईसाई युग की पहली शताब्दी को चिह्नित किया, लेकिन मसीह वर्षों या दिनों की शुरुआत के बिना है। ईसाई युग से पहले और बाद में सभी पीढ़ियों के दौरान, आध्यात्मिक विचार के रूप में, मसीह, - भगवान का प्रतिबिंब, - शक्ति और अनुग्रह के कुछ उपाय के साथ आया है जो सभी मसीह, सत्य को प्राप्त करने के लिए तैयार हैं। अब्राहम, जैकब, मूसा और नबियों ने मसीहा या मसीह की शानदार झलकें पकड़ीं, जिसने दिव्य प्रकृति, प्रेम के सार में इन द्रष्टाओं को बपतिस्मा दिया। ईश्वरीय छवि, विचार, या मसीह ईश्वरीय सिद्धांत ईश्वर से अविभाज्य था, है और हमेशा के लिए रहेगा। यीशु ने अपनी आध्यात्मिक पहचान की इस एकता का उल्लेख किया: "पहिले इसके कि इब्राहीम उत्पन्न हुआ मैं हूं।" "मैं और पिता एक हैं।" "पिता मुझ से बड़ा है।" एक आत्मा में सभी पहचान शामिल हैं।

इन बातों से, यीशु का मतलब यह नहीं था कि मानव यीशु शाश्वत था या है, लेकिन यह कि ईश्वरीय विचार या मसीह ऐसा था और इसलिए प्राचीन इब्राहीम, यह नहीं कि साकार यीशु, पिता के साथ एक था, बल्कि आध्यात्मिक विचार था मसीह, पिता, परमेश्वर की गोद में हमेशा के लिए रहता है, जिससे वह स्वर्ग और पृथ्वी को प्रकाशित करता है; ऐसा नहीं है कि पिता आत्मा से बड़ा है, जो कि ईश्वर है, लेकिन अधिक से अधिक, असीम रूप से शारीरिक यीशु से, जिसका सांसारिक जीवन संक्षिप्त था।

6. 333 : 16 (The advent)-31, 32 (By)-9

The advent of Jesus of Nazareth marked the first century of the Christian era, but the Christ is without beginning of years or end of days. Throughout all generations both before and after the Christian era, the Christ, as the spiritual idea, — the reflection of God, — has come with some measure of power and grace to all prepared to receive Christ, Truth. Abraham, Jacob, Moses, and the prophets caught glorious glimpses of the Messiah, or Christ, which baptized these seers in the divine nature, the essence of Love. The divine image, idea, or Christ was, is, and ever will be inseparable from the divine Principle, God. Jesus referred to this unity of his spiritual identity thus: "Before Abraham was, I am;" "I and my Father are one;" "My Father is greater than I." The one Spirit includes all identities.

By these sayings Jesus meant, not that the human Jesus was or is eternal, but that the divine idea or Christ was and is so and therefore antedated Abraham; not that the corporeal Jesus was one with the Father, but that the spiritual idea, Christ, dwells forever in the bosom of the Father, God, from which it illumines heaven and earth; not that the Father is greater than Spirit, which is God, but greater, infinitely greater, than the fleshly Jesus, whose earthly career was brief.

7. 30 : 19-25

सत्य के व्यक्तिगत आदर्श के रूप में, ईसा मसीह सत्य और जीवन के तरीके को इंगित करने के लिए, सभी गलतियों, बीमारी, और मृत्यु - को रबिनिकल त्रुटि और फटकार के लिए आया था। आत्मा और भौतिक अर्थ, सत्य और त्रुटि के बीच अंतर दिखाते हुए, इस आदर्श को यीशु के संपूर्ण सांसारिक जीवन के दौरान प्रदर्शित किया गया था।

7. 30 : 19-25

As the individual ideal of Truth, Christ Jesus came to rebuke rabbinical error and all sin, sickness, and death, — to point out the way of Truth and Life. This ideal was demonstrated throughout the whole earthly career of Jesus, showing the difference between the offspring of Soul and of material sense, of Truth and of error.

8. 259 : 6 (यह)-14

मसीह यीशु में ईश्वरीय प्रकृति को सर्वश्रेष्ठ रूप से व्यक्त किया गया था, विचार जो मनुष्य को पतित, बीमार, पापी और मरने के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वैज्ञानिक होने और दैवीय उपचार की मसीह की समझ में एक आदर्श सिद्धांत और विचार शामिल हैं, पूर्ण ईश्वर और पूर्ण मनुष्य, विचार और प्रदर्शन के आधार के रूप में।

8. 259 : 6 (The)-14

The divine nature was best expressed in Christ Jesus, who threw upon mortals the truer reflection of God and lifted their lives higher than their poor thought-models would allow, — thoughts which presented man as fallen, sick, sinning, and dying. The Christlike understanding of scientific being and divine healing includes a perfect Principle and idea, — perfect God and perfect man, — as the basis of thought and demonstration.

9. 230 : 4 (यह)-10

... तो इस नश्वर सपने से जागृति, या भ्रम, हमें स्वास्थ्य, पवित्रता और अमरता में लाएगा। यह जागृति हमेशा के लिए मसीह के आने की है, सत्य का उन्नत रूप है, जो त्रुटि को बाहर निकालता है और बीमारों को ठीक करता है। यह वह मोक्ष है जो ईश्वर, ईश्वरीय सिद्धांत और प्रेम के माध्यम से आता है, जैसा कि यीशु द्वारा प्रदर्शित किया गया है।

9. 230 : 4 (the)-10

…the awakening from this mortal dream, or illusion, will bring us into health, holiness, and immortality. This awakening is the forever coming of Christ, the advanced appearing of Truth, which casts out error and heals the sick. This is the salvation which comes through God, the divine Principle, Love, as demonstrated by Jesus.

10. 27 : 1-9

यीशु ने एक संदेश भेजा यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले, जिसका उद्देश्य एक प्रश्न से परे साबित करना था कि मसीह आया था: "जो कुछ तुम ने देखा और सुना है, जाकर यूहन्ना से कह दो; कि अन्धे देखते हैं, लंगड़े चलते फिरते हैं, कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं, बहिरे सुनते हैं, मुरदे जिलाये जाते हैं; और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है।" दूसरे शब्दों में: यूहन्ना को बताएं कि दैवीय शक्ति का प्रदर्शन क्या है, और वह तुरंत अनुभव करेगा कि मसीहाई कार्य में परमेश्वर शक्ति है।

10. 27 : 1-9

Jesus sent a message to John the Baptist, which was intended to prove beyond a question that the Christ had come: "Go your way, and tell John what things ye have seen and heard; how that the blind see, the lame walk, the lepers are cleansed, the deaf hear, the dead are raised, to the poor the gospel is preached." In other words: Tell John what the demonstration of divine power is, and he will at once perceive that God is the power in the Messianic work.

11. 25 : 22-26

यद्यपि पाप और बीमारी पर अपने नियंत्रण का प्रदर्शन, किसी भी तरह से महान शिक्षक ने दूसरों को अपने स्वयं के पवित्रता के अपेक्षित प्रमाण देने से राहत नहीं दी। उन्होंने उनके मार्गदर्शन के लिए काम किया, ताकि वे इस शक्ति का प्रदर्शन कर सकें, जैसा कि उन्होंने किया और इसके दिव्य सिद्धांत को समझा।

11. 25 : 22-26

Though demonstrating his control over sin and disease, the great Teacher by no means relieved others from giving the requisite proofs of their own piety. He worked for their guidance, that they might demonstrate this power as he did and understand its divine Principle.

12. 28 : 4-8

यदि मास्टर ने एक छात्र को नहीं लिया था और भगवान की अनदेखी सत्य सिखाया था, तो उसे क्रूस पर नहीं चढ़ाया जाता था। पदार्थ की समझ में आत्मा को धारण करने का दृढ़ संकल्प, सत्य और प्रेम का उत्पीड़न करने वाला है।

12. 28 : 4-8

If the Master had not taken a student and taught the unseen verities of God, he would not have been crucified. The determination to hold Spirit in the grasp of matter is the persecutor of Truth and Love.

13. 334 : 10 (अदृश्य)-20

अदृश्य मसीह तथाकथित व्यक्तिगत इंद्रियों के लिए अगोचर था, जबकि यीशु एक शारीरिक अस्तित्व के रूप में दिखाई दिया। अनदेखी और देखा, आध्यात्मिक और भौतिक, शाश्वत मसीह और शारीरिक यीशु का मांस में प्रकट होने का यह दोहरा व्यक्तित्व, मास्टर के स्वर्गारोहण होने तक जारी रहा, जब मानव, भौतिक अवधारणा, या यीशु गायब हो गया, जबकि आध्यात्मिक आत्म, या मसीह, दैवीय विज्ञान के अनन्त क्रम में मौजूद है, दुनिया के पापों को दूर कर रहा है, जैसा कि मसीह ने हमेशा किया है, इससे पहले भी मानव यीशु नश्वर आंखों के लिए अवतार था।

13. 334 : 10 (The invisible)-20

The invisible Christ was imperceptible to the so-called personal senses, whereas Jesus appeared as a bodily existence. This dual personality of the unseen and the seen, the spiritual and material, the eternal Christ and the corporeal Jesus manifest in flesh, continued until the Master's ascension, when the human, material concept, or Jesus, disappeared, while the spiritual self, or Christ, continues to exist in the eternal order of divine Science, taking away the sins of the world, as the Christ has always done, even before the human Jesus was incarnate to mortal eyes.

14. 565 : 13-18

आध्यात्मिक विचार का प्रतिरूपण हमारे मास्टर के सांसारिक जीवन में एक संक्षिप्त इतिहास था; परंतु "उसके राज्य का अन्त न होगा", क्योंकि मसीह, ईश्वर का विचार, अंततः सभी देशों और लोगों पर शासन करेगा - अनिवार्य रूप से, बिल्कुल, अंत में - दिव्य विज्ञान के साथ।

14. 565 : 13-18

The impersonation of the spiritual idea had a brief history in the earthly life of our Master; but "of his kingdom there shall be no end," for Christ, God's idea, will eventually rule all nations and peoples — imperatively, absolutely, finally — with divine Science.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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