रविवार 27 अगस्त, 2023



विषयमसीह ईसा

SubjectChrist Jesus

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: 1 तीमुथियुस 2 : 5

"क्योंकि परमेश्वर एक ही है: और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही बिचवई है, अर्थात मसीह यीशु जो मनुष्य है।"



Golden Text: I Timothy 2 : 5

For there is one God, and one mediator between God and men, the man Christ Jesus.




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उत्तरदायी अध्ययन: यशायाह 42: 1-8


1     मेरे दास को देखो जिसे मैं संभाले हूं, मेरे चुने हुए को, जिस से मेरा जी प्रसन्न है; मैं ने उस पर अपना आत्मा रखा है, वह अन्यजातियों के लिये न्याय प्रगट करेगा।

2     न वह चिल्लाएगा और न ऊंचे शब्द से बोलेगा, न सड़क में अपनी वाणी सुनायेगा।

3     कुचले हुए नरकट को वह न तोड़ेगा और न टिमटिमाती बत्ती को बुझाएगा; वह सच्चाई से न्याय चुकाएगा।

4     वह न थकेगा और न हियाव छोड़ेगा जब तक वह न्याय को पृथ्वी पर स्थिर न करे; और द्वीपों के लोग उसकी व्यवस्था की बाट जाहेंगे॥

5     ईश्वर जो आकाश का सृजने और तानने वाला है, जो उपज सहित पृथ्वी का फैलाने वाला और उस पर के लोगों को सांस और उस पर के चलने वालों को आत्मा देने वाला यहावो है, वह यों कहता है:

6     मुझ यहोवा ने तुझ को धर्म से बुला लिया है; मैं तेरा हाथ थाम कर तेरी रक्षा करूंगा; मैं तुझे प्रजा के लिये वाचा और जातियों के लिये प्रकाश ठहराऊंगा; कि तू अन्धों की आंखें खोले,

7     बंधुओं को बन्दीगृह से निकाले और जो अन्धियारे में बैठे हैं उन को काल कोठरी से निकाले।

8     मैं यहोवा हूं, मेरा नाम यही है; अपनी महिमा मैं दूसरे को न दूंगा और जो स्तुति मेरे योग्य है वह खुदी हुई मूरतों को न दूंगा।

Responsive Reading: Isaiah 42 : 1-8

1.     Behold my servant, whom I uphold; mine elect, in whom my soul delighteth; I have put my spirit upon him: he shall bring forth judgment to the Gentiles.

2.     He shall not cry, nor lift up, nor cause his voice to be heard in the street.

3.     A bruised reed shall he not break, and the smoking flax shall he not quench: he shall bring forth judgment unto truth.

4.     He shall not fail nor be discouraged, till he have set judgment in the earth: and the isles shall wait for his law.

5.     Thus saith God the Lord, he that created the heavens, and stretched them out; he that spread forth the earth, and that which cometh out of it; he that giveth breath unto the people upon it, and spirit to them that walk therein:

6.     I the Lord have called thee in righteousness, and will hold thine hand, and will keep thee, and give thee for a covenant of the people, for a light of the Gentiles;

7.     To open the blind eyes, to bring out the prisoners from the prison, and them that sit in darkness out of the prison house.

8.     I am the Lord: that is my name: and my glory will I not give to another, neither my praise to graven images.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. मरकुस 1: 1, 9-11

1     परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह के सुसमाचार का आरम्भ।

9     उन दिनों में यीशु ने गलील के नासरत से आकर, यरदन में यूहन्ना से बपतिस्मा लिया।

10     और जब वह पानी से निकलकर ऊपर आया, तो तुरन्त उस ने आकाश को खुलते और आत्मा को कबूतर की नाई अपने ऊपर उतरते देखा।

11     और यह आकाशवाणी हई, कि तू मेरा प्रिय पुत्र है, तुझ से मैं प्रसन्न हूं॥

1. Mark 1 : 1, 9-11

1     The beginning of the gospel of Jesus Christ, the Son of God;

9     And it came to pass in those days, that Jesus came from Nazareth of Galilee, and was baptized of John in Jordan.

10     And straightway coming up out of the water, he saw the heavens opened, and the Spirit like a dove descending upon him:

11     And there came a voice from heaven, saying, Thou art my beloved Son, in whom I am well pleased.

2. लूका 4: 14-21

14     फिर यीशु आत्मा की सामर्थ से भरा हुआ गलील को लौटा, और उस की चर्चा आस पास के सारे देश में फैल गई।

15     और वह उन की आराधनालयों में उपदेश करता रहा, और सब उस की बड़ाई करते थे॥

16     और वह नासरत में आया; जहां पाला पोसा गया था; और अपनी रीति के अनुसार सब्त के दिन आराधनालय में जा कर पढ़ने के लिये खड़ा हुआ।

17     यशायाह भविष्यद्वक्ता की पुस्तक उसे दी गई, और उस ने पुस्तक खोलकर, वह जगह निकाली जहां यह लिखा था।

18     कि प्रभु का आत्मा मुझ पर है, इसलिये कि उस ने कंगालों को सुसमाचार सुनाने के लिये मेरा अभिषेक किया है, और मुझे इसलिये भेजा है, कि बन्धुओं को छुटकारे का और अन्धों को दृष्टि पाने का सुसमाचार प्रचार करूं और कुचले हुओं को छुड़ाऊं।

19     और प्रभु के प्रसन्न रहने के वर्ष का प्रचार करूं।

20     तब उस ने पुस्तक बन्द करके सेवक के हाथ में दे दी, और बैठ गया: और आराधनालय के सब लोगों की आंख उस पर लगी थीं।

21     तब वह उन से कहने लगा, कि आज ही यह लेख तुम्हारे साम्हने पूरा हुआ है।

2. Luke 4 : 14-21

14     And Jesus returned in the power of the Spirit into Galilee: and there went out a fame of him through all the region round about.

15     And he taught in their synagogues, being glorified of all.

16     And he came to Nazareth, where he had been brought up: and, as his custom was, he went into the synagogue on the sabbath day, and stood up for to read.

17     And there was delivered unto him the book of the prophet Esaias. And when he had opened the book, he found the place where it was written,

18     The Spirit of the Lord is upon me, because he hath anointed me to preach the gospel to the poor; he hath sent me to heal the brokenhearted, to preach deliverance to the captives, and recovering of sight to the blind, to set at liberty them that are bruised,

19     To preach the acceptable year of the Lord.

20     And he closed the book, and he gave it again to the minister, and sat down. And the eyes of all them that were in the synagogue were fastened on him.

21     And he began to say unto them, This day is this scripture fulfilled in your ears.

3. मत्ती 20: 30-34

30     और देखो, दो अन्धे, जो सड़कर के किनारे बैठे थे, यह सुनकर कि यीशु जा रहा है, पुकारकर कहने लगे; कि हे प्रभु, दाऊद की सन्तान, हम पर दया कर।

31     लोगों ने उन्हें डांटा, कि चुप रहें, पर वे और भी चिल्लाकर बोले, हे प्रभु, दाऊद की सन्तान, हम पर दया कर।

32     तब यीशु ने ख़ड़े होकर, उन्हें बुलाया, और कहा; तुम क्या चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये करूं?

33     उन्हों ने उस से कहा, हे प्रभु; यह कि हमारी आंखे खुल जाएं।

34     यीशु ने तरस खाकर उन की आंखे छूई, और वे तुरन्त देखने लगे; और उसके पीछे हो लिए॥

3. Matthew 20 : 30-34

30     And, behold, two blind men sitting by the way side, when they heard that Jesus passed by, cried out, saying, Have mercy on us, O Lord, thou Son of David.

31     And the multitude rebuked them, because they should hold their peace: but they cried the more, saying, Have mercy on us, O Lord, thou Son of David.

32     And Jesus stood still, and called them, and said, What will ye that I shall do unto you?

33     They say unto him, Lord, that our eyes may be opened.

34     So Jesus had compassion on them, and touched their eyes: and immediately their eyes received sight, and they followed him.

4. मरकुस 6: 34-39, 41-44

34     उस ने निकलकर बड़ी भीड़ देखी, और उन पर तरस खाया, क्योंकि वे उन भेड़ों के समान थे, जिन का कोई रखवाला न हो; और वह उन्हें बहुत सी बातें सिखाने लगा।

35     जब दिन बहुत ढल गया, तो उसके चेले उसके पास आकर कहने लगे; यह सुनसान जगह है, और दिन बहुत ढल गया है।

36     उन्हें विदा कर, कि चारों ओर के गांवों और बस्तियों में जाकर, अपने लिये कुछ खाने को मोल लें।

37     उस ने उन्हें उत्तर दिया; कि तुम ही उन्हें खाने को दो: उन्हों ने उस से कहा; क्या हम सौ दीनार की रोटियां मोल लें, और उन्हें खिलाएं?

38     उस ने उन से कहा; जाकर देखो तुम्हारे पास कितनी रोटियां हैं? उन्होंने मालूम करके कहा; पांच और दो मछली भी।

39     तब उस ने उन्हें आज्ञा दी, कि सब को हरी घास पर पांति पांति से बैठा दो।

41     और उस ने उन पांच रोटियों को और दो मछिलयों को लिया, और स्वर्ग की ओर देखकर धन्यवाद किया और रोटियां तोड़ तोड़ कर चेलों को देता गया, कि वे लोगों को परोसें, और वे दो मछिलयां भी उन सब में बांट दीं।

42     और सब खाकर तृप्त हो गए।

43     और उन्होंने टुकडों से बारह टोकिरयां भर कर उठाई, और कुछ मछिलयों से भी।

44     जिन्हों ने रोटियां खाईं, वे पांच हजार पुरूष थे॥

4. Mark 6 : 34-39, 41-44

34     And Jesus, when he came out, saw much people, and was moved with compassion toward them, because they were as sheep not having a shepherd: and he began to teach them many things.

35     And when the day was now far spent, his disciples came unto him, and said, This is a desert place, and now the time is far passed:

36     Send them away, that they may go into the country round about, and into the villages, and buy themselves bread: for they have nothing to eat.

37     He answered and said unto them, Give ye them to eat. And they say unto him, Shall we go and buy two hundred pennyworth of bread, and give them to eat?

38     He saith unto them, How many loaves have ye? go and see. And when they knew, they say, Five, and two fishes.

39     And he commanded them to make all sit down by companies upon the green grass.

41     And when he had taken the five loaves and the two fishes, he looked up to heaven, and blessed, and brake the loaves, and gave them to his disciples to set before them; and the two fishes divided he among them all.

42     And they did all eat, and were filled.

43     And they took up twelve baskets full of the fragments, and of the fishes.

44     And they that did eat of the loaves were about five thousand men.

5. लूका 7: 11 (से;), 12 (से :), 13-16

11     थोड़े दिन के बाद वह नाईंन नाम के एक नगर को गया, और उसके चेले।

12     जब वह नगर के फाटक के पास पहुंचा, तो देखो, लोग एक मुरदे को बाहर लिए जा रहे थे; जो अपनी मां का एकलौता पुत्र था, और वह विधवा थी: और नगर के बहुत से लोग उसके साथ थे।

13     उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उस से कहा; मत रो।

14     तब उस ने पास आकर, अर्थी को छुआ; और उठाने वाले ठहर गए, तब उस ने कहा; हे जवान, मैं तुझ से कहता हूं, उठ।

15     तब वह मुरदा उठ बैठा, और बोलने लगा: और उस ने उसे उस की मां को सौप दिया।

16     इस से सब पर भय छा गया; और वे परमेश्वर की बड़ाई करके कहने लगे कि हमारे बीच में एक बड़ा भविष्यद्वक्ता उठा है, और परमेश्वर ने अपने लोगों पर कृपा दृष्टि की है।

5. Luke 7 : 11 (to ;), 12 (to :), 13-16

11     And it came to pass the day after, that he went into a city called Nain;

12     Now when he came nigh to the gate of the city, behold, there was a dead man carried out, the only son of his mother, and she was a widow:

13     And when the Lord saw her, he had compassion on her, and said unto her, Weep not.

14     And he came and touched the bier: and they that bare him stood still. And he said, Young man, I say unto thee, Arise.

15     And he that was dead sat up, and began to speak. And he delivered him to his mother.

16     And there came a fear on all: and they glorified God, saying, That a great prophet is risen up among us; and, That God hath visited his people.

6. यूहन्ना 14: 8-12

8     फिलेप्पुस ने उस से कहा, हे प्रभु, पिता को हमें दिखा दे: यही हमारे लिये बहुत है।

9     यीशु ने उस से कहा; हे फिलेप्पुस, मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूं, और क्या तू मुझे नहीं जानता? जिस ने मुझे देखा है उस ने पिता को देखा है: तू क्यों कहता है कि पिता को हमें दिखा।

10     क्या तू प्रतीति नहीं करता, कि मैं पिता में हूं, और पिता मुझ में हैं? ये बातें जो मैं तुम से कहता हूं, अपनी ओर से नहीं कहता, परन्तु पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है।

11     मेरी ही प्रतीति करो, कि मैं पिता में हूं; और पिता मुझ में है; नहीं तो कामों ही के कारण मेरी प्रतीति करो।

12     मैं तुम से सच सच कहता हूं, कि जो मुझ पर विश्वास रखता है, ये काम जो मैं करता हूं वह भी करेगा, वरन इन से भी बड़े काम करेगा, क्योंकि मैं पिता के पास जाता हूं।

6. John 14 : 8-12

8     Philip saith unto him, Lord, shew us the Father, and it sufficeth us.

9     Jesus saith unto him, Have I been so long time with you, and yet hast thou not known me, Philip? he that hath seen me hath seen the Father; and how sayest thou then, Shew us the Father?

10     Believest thou not that I am in the Father, and the Father in me? the words that I speak unto you I speak not of myself: but the Father that dwelleth in me, he doeth the works.

11     Believe me that I am in the Father, and the Father in me: or else believe me for the very works’ sake.

12     Verily, verily, I say unto you, He that believeth on me, the works that I do shall he do also; and greater works than these shall he do; because I go unto my Father.

7. यूहन्ना 17: 1-3, 20, 21 (से ;), 26

1     यीशु ने ये बातें कहीं और अपनी आंखे आकाश की ओर उठाकर कहा, हे पिता, वह घड़ी आ पहुंची, अपने पुत्र की महिमा कर, कि पुत्र भी तेरी महिमा करे।

2     क्योंकि तू ने उस को सब प्राणियों पर अधिकार दिया, कि जिन्हें तू ने उस को दिया है, उन सब को वह अनन्त जीवन दे।

3     और अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जाने।

20     मैं केवल इन्हीं के लिये बिनती नहीं करता, परन्तु उन के लिये भी जो इन के वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे, कि वे सब एक हों।

21     जैसा तू हे पिता मुझ में हैं, और मैं तुझ में हूं, वैसे ही वे भी हम में हों, इसलिये कि जगत प्रतीति करे, कि तू ही ने मुझे भेजा।

26     और मैं ने तेरा नाम उन को बताया और बताता रहूंगा कि जो प्रेम तुझ को मुझ से था, वह उन में रहे और मैं उन में रहूं॥

7. John 17 : 1-3, 20, 21 (to ;), 26

1     These words spake Jesus, and lifted up his eyes to heaven, and said, Father, the hour is come; glorify thy Son, that thy Son also may glorify thee:

2     As thou hast given him power over all flesh, that he should give eternal life to as many as thou hast given him.

3     And this is life eternal, that they might know thee the only true God, and Jesus Christ, whom thou hast sent.

20     Neither pray I for these alone, but for them also which shall believe on me through their word;

21     That they all may be one;

26     And I have declared unto them thy name, and will declare it: that the love wherewith thou hast loved me may be in them, and I in them.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 18: 3-9

नासरत के यीशु ने पिता के साथ मनुष्य की एकता को सिखाया और प्रदर्शित किया, और इसके लिए हम उसे अंतहीन श्रद्धांजलि देते हैं। उनका मिशन व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों था। उन्होंने जीवन का काम न केवल स्वयं के प्रति न्याय में, बल्कि मनुष्यों पर दया करने में भी किया — उन्हें यह दिखाने के लिए कि उन्हें अपना काम कैसे करना है, लेकिन यह उनके लिए नहीं करना है और न ही उन्हें किसी भी जिम्मेदारी से मुक्त करना है।

1. 18 : 3-9

Jesus of Nazareth taught and demonstrated man's oneness with the Father, and for this we owe him endless homage. His mission was both individual and collective. He did life's work aright not only in justice to himself, but in mercy to mortals, — to show them how to do theirs, but not to do it for them nor to relieve them of a single responsibility.

2. 19: 6-11

यीशु ने मनुष्य को ईश्वर की शिक्षा, यीशु की शिक्षाओं के दिव्य सिद्धांत, और प्रेम के इस तुच्छ अर्थ को मनुष्य की आत्मा, के नियम, और मृत्यु के नियम से मनुष्य की मृत्यु के रूप में समझने की कोशिश की ईश्वरीय प्रेम का नियम।

2. 19 : 6-11

Jesus aided in reconciling man to God by giving man a truer sense of Love, the divine Principle of Jesus' teachings, and this truer sense of Love redeems man from the law of matter, sin, and death by the law of Spirit, — the law of divine Love.

3. 332: 23 (यीशु)-2

यीशु एक कुंवारी का बेटा था। उन्हें परमेश्वर के वचन को बोलने और मनुष्यों के रूप में मनुष्यों के रूप में प्रकट करने के लिए नियुक्त किया गया था क्योंकि वे समझ के साथ-साथ विचारों को भी समझ सकते थे। उनके बारे में मैरी की धारणा आध्यात्मिक थी, क्योंकि केवल पवित्रता ही सत्य और प्रेम को प्रतिबिंबित कर सकती थी, जो स्पष्ट रूप से अच्छे और शुद्ध ईसा मसीह में अवतरित थे। उन्होंने उच्चतम प्रकार की दिव्यता व्यक्त की, जो उस युग में एक मांसल रूप व्यक्त कर सकती थी। असली और आदर्श आदमी में मांस तत्व प्रवेश नहीं कर सकता। इस प्रकार यह है कि मसीह अपनी छवि में भगवान और मनुष्य के बीच के संयोग, या आध्यात्मिक समझौते को दर्शाता है।

3. 332 : 23 (Jesus)-2

Jesus was the son of a virgin. He was appointed to speak God's word and to appear to mortals in such a form of humanity as they could understand as well as perceive. Mary's conception of him was spiritual, for only purity could reflect Truth and Love, which were plainly incarnate in the good and pure Christ Jesus. He expressed the highest type of divinity, which a fleshly form could express in that age. Into the real and ideal man the fleshly element cannot enter. Thus it is that Christ illustrates the coincidence, or spiritual agreement, between God and man in His image.

4. 333: 8 (मसीह)-13

क्राइस्ट इतना नाम नहीं है जितना कि जीसस का ईश्वरीय शीर्षक। मसीह परमेश्वर के आध्यात्मिक, शाश्वत स्वभाव को व्यक्त करता है। यह नाम मसीहा का पर्यायवाची है, और उस आध्यात्मिकता के प्रति दृष्टिकोण, जिसे चित्रित किया गया है, चित्रित किया गया है और जीवन में प्रदर्शित किया गया है जिसमें ईसा मसीह अवतार थे।

4. 333 : 8 (Christ)-13

Christ is not a name so much as the divine title of Jesus. Christ expresses God's spiritual, eternal nature. The name is synonymous with Messiah, and alludes to the spirituality which is taught, illustrated, and demonstrated in the life of which Christ Jesus was the embodiment.

5. 94: 1-6

यीशु ने सिखाया कि केवल एक ईश्वर है, एक आत्मा है, जो आदमी को खुद की छवि और समानता में बनाता है, — आत्मा की, पदार्थ की नहीं। मनुष्य अनंत सत्य, जीवन और प्रेम को दर्शाता है। इस प्रकार, मनुष्य की प्रकृति को समझा जाता है, इसमें वह सब शामिल होता है, जो पवित्र शास्त्र में प्रयुक्त "छवि" और "समानता" शब्दों से निहित है।

5. 94 : 1-6

Jesus taught but one God, one Spirit, who makes man in the image and likeness of Himself, — of Spirit, not of matter. Man reflects infinite Truth, Life, and Love. The nature of man, thus understood, includes all that is implied by the terms "image" and "likeness" as used in Scripture.

6. 42: 1-4

यीशु के जीवन ने दैवीय और वैज्ञानिक रूप से साबित कर दिया कि ईश्वर प्रेम है, जबकि पुजारी और रब्बी ने ईश्वर को एक शक्तिशाली शक्तिशाली होने की पुष्टि की, जो प्यार करता है और नफरत करता है। यहूदी धर्मशास्त्र ने ईश्वर के अपरिवर्तनीय प्रेम का कोई संकेत नहीं दिया।

6. 42 : 1-4

Jesus' life proved, divinely and scientifically, that God is Love, whereas priest and rabbi affirmed God to be a mighty potentate, who loves and hates. The Jewish theology gave no hint of the unchanging love of God.

7. 25: 13-19, 22-26

यीशु ने प्रदर्शन के द्वारा जीवन का मार्ग सिखाया, कि हम समझ सकते हैं कि यह दिव्य सिद्धांत कैसे बीमारों को चंगा करता है, त्रुटि को जन्म देता है, और मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है। यीशु ने ईश्वर के आदर्श को किसी भी ऐसे व्यक्ति की तुलना में बेहतर प्रस्तुत किया जिसकी उत्पत्ति कम आध्यात्मिक थी। परमेश्वर की आज्ञाकारिता के द्वारा, उसने आध्यात्मिक रूप से सभी दूसरों के सिद्धांत का प्रदर्शन किया।

यद्यपि पाप और बीमारी पर अपने नियंत्रण का प्रदर्शन, किसी भी तरह से महान शिक्षक ने दूसरों को अपने स्वयं के पवित्रता के अपेक्षित प्रमाण देने से राहत नहीं दी। उन्होंने उनके मार्गदर्शन के लिए काम किया, ताकि वे इस शक्ति का प्रदर्शन कर सकें, जैसा कि उन्होंने किया और इसके दिव्य सिद्धांत को समझा।

7. 25 : 13-19, 22-26

Jesus taught the way of Life by demonstration, that we may understand how this divine Principle heals the sick, casts out error, and triumphs over death. Jesus presented the ideal of God better than could any man whose origin was less spiritual. By his obedience to God, he demonstrated more spiritually than all others the Principle of being.

Though demonstrating his control over sin and disease, the great Teacher by no means relieved others from giving the requisite proofs of their own piety. He worked for their guidance, that they might demonstrate this power as he did and understand its divine Principle.

8. 26: 16-18, 21-27

उनका मिशन आकाशीय विज्ञान को प्रकट करना था, यह साबित करने के लिए कि ईश्वर क्या है और वह मनुष्य के लिए क्या करता है।

यीशु के शिक्षण और सत्य के अभ्यास में ऐसा बलिदान शामिल है जो हमें अपने सिद्धांत को प्रेम के रूप में स्वीकार करता है। यह हमारे गुरु के पाप रहित जीवन और मृत्यु पर उनके शक्ति प्रदर्शन का अनमोल आयात था। उन्होंने अपने कर्मों से यह साबित कर दिया कि क्रिश्चियन साइंस बीमारी, पाप और मृत्यु को नष्ट करता है।

8. 26 : 16-18, 21-27

His mission was to reveal the Science of celestial being, to prove what God is and what He does for man.

Jesus' teaching and practice of Truth involved such a sacrifice as makes us admit its Principle to be Love. This was the precious import of our Master's sinless career and of his demonstration of power over death. He proved by his deeds that Christian Science destroys sickness, sin, and death.

9. 27: 1-9

यीशु ने जॉन द बैप्टिस्ट को एक संदेश भेजा, एक प्रश्न से परे जो यह साबित करने के लिए था कि मसीह आया था: "कि जो कुछ तुम सुनते हो और देखते हो, वह सब जाकर यूहन्ना से कह दो। कि अन्धे देखते हैं और लंगड़े चलते फिरते हैं; कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं और बहिरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाए जाते हैं; और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है।" दूसरे शब्दों में: जॉन को बताएं कि दैवीय शक्ति का प्रदर्शन क्या है, और वह तुरंत महसूस करेगा कि ईश्वर मसीहाई काम में एक शक्ति है।

9. 27 : 1-9

Jesus sent a message to John the Baptist, which was intended to prove beyond a question that the Christ had come: "Go your way, and tell John what things ye have seen and heard; how that the blind see, the lame walk, the lepers are cleansed, the deaf hear, the dead are raised, to the poor the gospel is preached." In other words: Tell John what the demonstration of divine power is, and he will at once perceive that God is the power in the Messianic work.

10. 135: 26-8

जैसा कि जीसस ने सिखाया था कि ईसाई धर्म पंथ नहीं था, न ही कोई समारोह, और न ही कर्मकांडी यहोवा की ओर से कोई विशेष भेंट; लेकिन यह दिव्य प्रेम का प्रदर्शन था जिसमें त्रुटि करना और बीमारों को ठीक करना, न केवल मसीह, या सत्य के नाम पर, लेकिन सत्य के प्रदर्शन में, जैसा कि दिव्य प्रकाश के चक्रों में होना चाहिए।

यीशु ने अपने चर्च की स्थापना की और मसीह-उपचार की आध्यात्मिक नींव पर अपने मिशन को बनाए रखा। उन्होंने अपने अनुयायियों को सिखाया कि उनके धर्म में एक दिव्य सिद्धांत है, जो त्रुटि को बाहर निकालता है और बीमार और पापी दोनों को ठीक करता है। उन्होंने दावा किया कि कोई भी खुफिया, कार्रवाई, और न ही जीवन भगवान से अलग है। अपने ऊपर आए उत्पीड़न के बावजूद, उसने शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से पुरुषों को बचाने के लिए अपनी दिव्य शक्ति का इस्तेमाल किया।

10. 135 : 26-8

Christianity as Jesus taught it was not a creed, nor a system of ceremonies, nor a special gift from a ritualistic Jehovah; but it was the demonstration of divine Love casting out error and healing the sick, not merely in the name of Christ, or Truth, but in demonstration of Truth, as must be the case in the cycles of divine light.

Jesus established his church and maintained his mission on a spiritual foundation of Christ-healing. He taught his followers that his religion had a divine Principle, which would cast out error and heal both the sick and the sinning. He claimed no intelligence, action, nor life separate from God. Despite the persecution this brought upon him, he used his divine power to save men both bodily and spiritually.

11. 110: 25-31

यीशु ने नश्वर मन और शरीर को ठीक करने के लिए क्रिश्चियन साइंस की शक्ति का प्रदर्शन किया। लेकिन इस शक्ति को नजरअंदाज कर दिया गया था, और इसे फिर से "संकेतों का पालन" के साथ, मसीह की आज्ञा के अनुसार आध्यात्मिक रूप से समझा जाना, सिखाया जाना और प्रदर्शित किया जाना चाहिए। इसके विज्ञान को उन लोगों को अवश्य समझना चाहिए जो ईसा मसीह पर विश्वास करते हैं और आध्यात्मिक रूप से सत्य को समझते हैं।

11. 110 : 25-31

Jesus demonstrated the power of Christian Science to heal mortal minds and bodies. But this power was lost sight of, and must again be spiritually discerned, taught, and demonstrated according to Christ's command, with "signs following." Its Science must be apprehended by as many as believe on Christ and spiritually understand Truth.

12. 494: 5-14

क्या यह विश्वास करना बेवफाई की प्रजाति नहीं है कि मसीहा के रूप में इतना महान कार्य स्वयं या ईश्वर के लिए किया गया था, जिसे यीशु के उदाहरण से अनन्त सद्भाव को बनाए रखने के लिए किसी सहायता की आवश्यकता नहीं थी? लेकिन नश्वर लोगों को इस मदद की ज़रूरत थी, और यीशु ने उनके लिए रास्ता बताया। ईश्वरीय प्रेम हमेशा से मिला है और हमेशा हर मानवीय आवश्यकता को पूरा करेगा। यह कल्पना करना ठीक नहीं है कि यीशु ने दिव्य शक्ति का चयन केवल संख्या के लिए या सीमित समय के लिए ठीक करने के लिए किया, क्योंकि सभी मानव जाति के लिए और सभी समयों में, दिव्य प्रेम सभी अच्छे की आपूर्ति करता है।

12. 494 : 5-14

Is it not a species of infidelity to believe that so great a work as the Messiah's was done for himself or for God, who needed no help from Jesus' example to preserve the eternal harmony? But mortals did need this help, and Jesus pointed the way for them. Divine Love always has met and always will meet every human need. It is not well to imagine that Jesus demonstrated the divine power to heal only for a select number or for a limited period of time, since to all mankind and in every hour, divine Love supplies all good.

13. 476: 28-5

जब यीशु ने परमेश्वर के बच्चों की बात की, न कि पुरुषों के बच्चों की, तो उन्होंने कहा, "परमेश्वर का राज्य तुम्हारे बीच में है;" इसका मतलब है, सत्य और प्रेम वास्तविक मनुष्य में राज्य करता है, यह दर्शाता है कि भगवान की छवि में आदमी बेदाग और शाश्वत है। यीशु ने विज्ञान में सिद्ध पुरुष को सही ठहराया, जो उसे दिखाई दिया जहां पाप करने वाला नश्वर मनुष्य नश्वर प्रतीत होता है। इस सिद्ध पुरुष में उद्धारकर्ता ने परमेश्वर की अपनी समानता को देखा, और मनुष्य के इस सही दृष्टिकोण ने बीमारों को चंगा किया। इस प्रकार यीशु ने सिखाया कि ईश्वर का राज्य अक्षुण्ण, सार्वभौमिक है, और वह मनुष्य शुद्ध और पवित्र है।

13. 476 : 28-5

When speaking of God's children, not the children of men, Jesus said, "The kingdom of God is within you;" that is, Truth and Love reign in the real man, showing that man in God's image is unfallen and eternal. Jesus beheld in Science the perfect man, who appeared to him where sinning mortal man appears to mortals. In this perfect man the Saviour saw God's own likeness, and this correct view of man healed the sick. Thus Jesus taught that the kingdom of God is intact, universal, and that man is pure and holy.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6