रविवार 26 सितंबर, 2021



विषयविषय — वास्तविकता

SubjectReality

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: यूहन्ना 11: 40

क्या मैं ने तुझ से न कहा था कि यदि तू विश्वास करेगी, तो परमेश्वर की महिमा को देखेगी।”— क्राइस्ट जीसस



Golden Text: John 11 : 40

Said I not unto thee, that, if thou wouldest believe, thou shouldest see the glory of God?”— Christ Jesus




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उत्तरदायी अध्ययन: 2 राजा 6: 15-17 • रोमियो 1: 17, 19, 20 • सपन्याह 3: 15


15     भोर को परमेश्वर के भक्त का टहलुआ उठा और निकल कर क्या देखता है कि घोड़ों और रथों समेत एक दल नगर को घेरे हुए पड़ा है। और उसके सेवक ने उस से कहा, हाय! मेरे स्वामी, हम क्या करें?

16     उसने कहा, मत डर; क्योंकि जो हमारी ओर हैं, वह उन से अधिक हैं, जो उनकी ओर हैं।

17     तब एलीशा ने यह प्रार्थना की, हे यहोवा, इसकी आंखें खोल दे कि यह देख सके। तब यहोवा ने सेवक की आंखें खोल दीं, और जब वह देख सका, तब क्या देखा, कि एलीशा के चारों ओर का पहाड़ अग्निमय घोड़ों और रथों से भरा हुआ है।

17     क्योंकि उस में परमेश्वर की धामिर्कता विश्वास से और विश्वास के लिये प्रगट होती है॥

19     इसलिये कि परमेश्वर के विषय का ज्ञान उन के मनों में प्रगट है, क्योंकि परमेश्वर ने उन पर प्रगट किया है।

20     क्योंकि उसके अनदेखे गुण, अर्थात उस की सनातन सामर्थ, और परमेश्वरत्व जगत की सृष्टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते है, यहां तक कि वे निरुत्तर हैं।

15     यहोवा ने तेरा दण्ड दूर कर दिया और तेरा शत्रु भी दूर किया गया है। इस्राएल का राजा यहोवा तेरे बीच में है, इसलिये तू फिर विपत्ति न भोगेगी।

Responsive Reading: II Kings 6 : 15-17; Romans 1 : 17, 19, 20; Zephaniah 3 : 15

15.     And when the servant of the man of God was risen early, and gone forth, behold, an host compassed the city both with horses and chariots. And his servant said unto him, Alas, my master! how shall we do?

16.     And he answered, Fear not: for they that be with us are more than they that be with them.

17.     And Elisha prayed, and said, Lord, I pray thee, open his eyes, that he may see. And the Lord opened the eyes of the young man; and he saw: and, behold, the mountain was full of horses and chariots of fire round about Elisha.

17.     For therein is the righteousness of God revealed from faith to faith:

19.     Because that which may be known of God is manifest.

20.     For the invisible things of him from the creation of the world are clearly seen, being understood by the things that are made, even his eternal power and Godhead;

15.     The king of Israel, even the Lord, is in the midst of thee: thou shalt not see evil any more.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 119: 12, 18

12     हे यहोवा, तू धन्य है; मुझे अपनी विधियां सिखा!

18     मेरी आंखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं।

1. Psalm 119 : 12, 18

12     Blessed art thou, O Lord: teach me thy statutes.

18     Open thou mine eyes, that I may behold wondrous things out of thy law.

2. यशायाह 60: 2-4 (से 1st :), 18-20

2     देख, पृथ्वी पर तो अन्धियारा और राज्य राज्य के लोगों पर घोर अन्धकार छाया हुआ है; परन्तु तेरे ऊपर यहोवा उदय होगा, और उसका तेज तुझ पर प्रगट होगा।

3     और अन्यजातियां तेरे पास प्रकाश के लिये और राजा तेरे आरोहण के प्रताप की ओर आएंगे॥

4     अपनी आंखें चारो ओर उठा कर देख।

18     तेरे देश में फिर कभी उपद्रव और तेरे सिवानों के भीतर उत्पात वा अन्धेर की चर्चा न सुनाईं पड़ेगी; परन्तु तू अपनी शहरपनाह का नाम उद्धार और अपने फाटकों का नाम यश रखेगी।

19     फिर दिन को सूर्य तेरा उजियाला न होगा, न चान्दनी के लिये चन्द्रमा परन्तु यहोवा तेरे लिये सदा का उजियाला और तेरा परमेश्वर तेरी शोभा ठहरेगा।

20     तेरा सूर्य फिर कभी अस्त न होगा और न तेरे चन्द्रमा की ज्योति मलिन होगी; क्योंकि यहोवा तेरी सदैव की ज्योति होगा और तरे विलाप के दिन समाप्त हो जाएंगे।

2. Isaiah 60 : 2-4 (to 1st :), 18-20

2     For, behold, the darkness shall cover the earth, and gross darkness the people: but the Lord shall arise upon thee, and his glory shall be seen upon thee.

3     And the Gentiles shall come to thy light, and kings to the brightness of thy rising.

4     Lift up thine eyes round about, and see:

18     Violence shall no more be heard in thy land, wasting nor destruction within thy borders; but thou shalt call thy walls Salvation, and thy gates Praise.

19     The sun shall be no more thy light by day; neither for brightness shall the moon give light unto thee: but the Lord shall be unto thee an everlasting light, and thy God thy glory.

20     Thy sun shall no more go down; neither shall thy moon withdraw itself: for the Lord shall be thine everlasting light, and the days of thy mourning shall be ended.

3. 2 कुरिन्थियों 4: 1-4, 6, 17, 18

1     इसलिये जब हम पर ऐसी दया हुई, कि हमें यह सेवा मिली, तो हम हियाव नहीं छोड़ते।

2     परन्तु हम ने लज्ज़ा के गुप्त कामों को त्याग दिया, और न चतुराई से चलते, और न परमेश्वर के वचन में मिलावट करते हैं, परन्तु सत्य को प्रगट करके, परमेश्वर के साम्हने हर एक मनुष्य के विवेक में अपनी भलाई बैठाते हैं।

3     परन्तु यदि हमारे सुसमाचार पर परदा पड़ा है, तो यह नाश होने वालों ही के लिये पड़ा है।

4     और उन अविश्वासियों के लिये, जिन की बुद्धि को इस संसार के ईश्वर ने अन्धी कर दी है, ताकि मसीह जो परमेश्वर का प्रतिरूप है, उसके तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके।

6     इसलिये कि परमेश्वर ही है, जिस ने कहा, कि अन्धकार में से ज्योति चमके; और वही हमारे हृदयों में चमका, कि परमेश्वर की महिमा की पहिचान की ज्योति यीशु मसीह के चेहरे से प्रकाशमान हो॥

17     क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।

18     और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं, क्योंकि देखी हुई वस्तुएं थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएं सदा बनी रहती हैं।

3. II Corinthians 4 : 1-4, 6, 17, 18

1     Therefore seeing we have this ministry, as we have received mercy, we faint not;

2     But have renounced the hidden things of dishonesty, not walking in craftiness, nor handling the word of God deceitfully; but by manifestation of the truth commending ourselves to every man’s conscience in the sight of God.

3     But if our gospel be hid, it is hid to them that are lost:

4     In whom the god of this world hath blinded the minds of them which believe not, lest the light of the glorious gospel of Christ, who is the image of God, should shine unto them.

6     For God, who commanded the light to shine out of darkness, hath shined in our hearts, to give the light of the knowledge of the glory of God in the face of Jesus Christ.

17     For our light affliction, which is but for a moment, worketh for us a far more exceeding and eternal weight of glory;

18     While we look not at the things which are seen, but at the things which are not seen: for the things which are seen are temporal; but the things which are not seen are eternal.

4. यूहन्ना 4: 46-53

46     तब वह फिर गलील के काना में आया, जहां उस ने पानी को दाख रस बनाया था: और राजा का एक कर्मचारी था जिस का पुत्र कफरनहूम में बीमार था।

47     वह यह सुनकर कि यीशु यहूदिया से गलील में आ गया है, उसके पास गया और उस से बिनती करने लगा कि चलकर मेरे पुत्र को चंगा कर दे: क्योंकि वह मरने पर था।

48     यीशु ने उस से कहा, जब तक तुम चिन्ह और अद्भुत काम न देखोगे तब तक कदापि विश्वास न करोगे।

49     राजा के कर्मचारी ने उस से कहा; हे प्रभु, मेरे बालक की मृत्यु होने से पहिले चल।

50     यीशु ने उस से कहा, जा, तेरा पुत्र जीवित है: उस मनुष्य ने यीशु की कही हुई बात की प्रतीति की, और चला गया।

51     वह मार्ग में जा रहा था, कि उसके दास उस से आ मिले और कहने लगे कि तेरा लड़का जीवित है।

52     उस ने उन से पूछा कि किस घड़ी वह अच्छा होने लगा उन्होंने उस से कहा, कल सातवें घण्टे में उसका ज्वर उतर गया।

53     तब पिता जान गया, कि यह उसी घड़ी हुआ जिस घड़ी यीशु ने उस से कहा, तेरा पुत्र जीवित है, और उस ने और उसके सारे घराने ने विश्वास किया।

4. John 4 : 46-53

46     So Jesus came again into Cana of Galilee, where he made the water wine. And there was a certain nobleman, whose son was sick at Capernaum.

47     When he heard that Jesus was come out of Judæa into Galilee, he went unto him, and besought him that he would come down, and heal his son: for he was at the point of death.

48     Then said Jesus unto him, Except ye see signs and wonders, ye will not believe.

49     The nobleman saith unto him, Sir, come down ere my child die.

50     Jesus saith unto him, Go thy way; thy son liveth. And the man believed the word that Jesus had spoken unto him, and he went his way.

51     And as he was now going down, his servants met him, and told him, saying, Thy son liveth.

52     Then inquired he of them the hour when he began to amend. And they said unto him, Yesterday at the seventh hour the fever left him.

53     So the father knew that it was at the same hour, in the which Jesus said unto him, Thy son liveth: and himself believed, and his whole house.

5. यूहन्ना 8: 2, 12, 32

2     और भोर को फिर मन्दिर में आया, और सब लोग उसके पास आए; और वह बैठकर उन्हें उपदेश देने लगा।

12     तब यीशु ने फिर लोगों से कहा, जगत की ज्योति मैं हूं; जो मेरे पीछे हो लेगा, वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा।

32     और सत्य को जानोगे, और सत्य तुम्हें स्वतंत्र करेगा।

5. John 8 : 2, 12, 32

2     And early in the morning he came again into the temple, and all the people came unto him; and he sat down, and taught them.

12     Then spake Jesus again unto them, saying, I am the light of the world: he that followeth me shall not walk in darkness, but shall have the light of life.

32     And ye shall know the truth, and the truth shall make you free.

6. यूहन्ना 9: 1-3, 6, 7, 39-41

1     फिर जाते हुए उस ने एक मनुष्य को देखा, जो जन्म का अन्धा था।

2     और उसके चेलों ने उस से पूछा, हे रब्बी, किस ने पाप किया था कि यह अन्धा जन्मा, इस मनुष्य ने, या उसके माता पिता ने?

3     यीशु ने उत्तर दिया, कि न तो इस ने पाप किया था, न इस के माता पिता ने: परन्तु यह इसलिये हुआ, कि परमेश्वर के काम उस में प्रगट हों।

6     यह कहकर उस ने भूमि पर थूका और उस थूक से मिट्टी सानी, और वह मिट्टी उस अन्धे की आंखों पर लगाकर।

7     उस से कहा; जा शीलोह के कुण्ड में धो ले, (जिस का अर्थ भेजा हुआ है) सो उस ने जाकर धोया, और देखता हुआ लौट आया।

39     तब यीशु ने कहा, मैं इस जगत में न्याय के लिये आया हूं, ताकि जो नहीं देखते वे देखें, और जो देखते हैं वे अन्धे हो जाएं।

40     जो फरीसी उसके साथ थे, उन्होंने ये बातें सुन कर उस से कहा, क्या हम भी अन्धे हैं?

41     यीशु ने उन से कहा, यदि तुम अन्धे होते तो पापी न ठहरते परन्तु अब कहते हो, कि हम देखते हैं, इसलिये तुम्हारा पाप बना रहता है॥

6. John 9 : 1-3, 6, 7, 39-41

1     And as Jesus passed by, he saw a man which was blind from his birth.

2     And his disciples asked him, saying, Master, who did sin, this man, or his parents, that he was born blind?

3     Jesus answered, Neither hath this man sinned, nor his parents: but that the works of God should be made manifest in him.

6     When he had thus spoken, he spat on the ground, and made clay of the spittle, and he anointed the eyes of the blind man with the clay,

7     And said unto him, Go, wash in the pool of Siloam, (which is by interpretation, Sent.) He went his way therefore, and washed, and came seeing.

39     And Jesus said, For judgment I am come into this world, that they which see not might see; and that they which see might be made blind.

40     And some of the Pharisees which were with him heard these words, and said unto him, Are we blind also?

41     Jesus said unto them, If ye were blind, ye should have no sin: but now ye say, We see; therefore your sin remaineth.

7. 1 कुरिन्थियों 2: 5 (आपका), 9, 10, 12

5     ... तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ पर निर्भर हो॥

9     परन्तु जैसा लिखा है, कि जो आंख ने नहीं देखी, और कान ने नहीं सुना, और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ीं वे ही हैं, जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखने वालों के लिये तैयार की हैं।

10     परन्तु परमेश्वर ने उन को अपने आत्मा के द्वारा हम पर प्रगट किया।

12     परन्तु हम ने संसार की आत्मा नहीं, परन्तु वह आत्मा पाया है, जो परमेश्वर की ओर से है, कि हम उन बातों को जानें, जो परमेश्वर ने हमें दी हैं।

7. I Corinthians 2 : 5 (your), 9, 10, 12

5     … your faith should not stand in the wisdom of men, but in the power of God.

9     But as it is written, Eye hath not seen, nor ear heard, neither have entered into the heart of man, the things which God hath prepared for them that love him.

10     But God hath revealed them unto us by his Spirit: for the Spirit searcheth all things, yea, the deep things of God.

12     Now we have received, not the spirit of the world, but the spirit which is of God; that we might know the things that are freely given to us of God.

8. कुलुस्सियों 1: 13, 16, 21, 26, 27

13     उसी ने हमें अन्धकार के वश से छुड़ाकर अपने प्रिय पुत्र के राज्य में प्रवेश कराया।

16     क्योंकि उसी में सारी वस्तुओं की सृष्टि हुई, स्वर्ग की हो अथवा पृथ्वी की, देखी या अनदेखी, क्या सिंहासन, क्या प्रभुतांए, क्या प्रधानताएं, क्या अधिकार, सारी वस्तुएं उसी के द्वारा और उसी के लिये सृजी गई हैं।

21     और उस ने अब उसकी शारीरिक देह में मृत्यु के द्वारा तुम्हारा भी मेल कर लिया जो पहिले निकाले हुए थे और बुरे कामों के कारण मन से बैरी थे।

26     अर्थात उस भेद को जो समयों और पीढिय़ों से गुप्त रहा, परन्तु अब उसके उन पवित्र लोगों पर प्रगट हुआ है।

27     जिन पर परमेश्वर ने प्रगट करना चाहा, कि उन्हें ज्ञात हो कि अन्यजातियों में उस भेद की महिमा का मूल्य क्या है और वह यह है, कि मसीह जो महिमा की आशा है तुम में रहता है।

8. Colossians 1 : 13, 16, 21, 26, 27

13     Who hath delivered us from the power of darkness, and hath translated us into the kingdom of his dear Son:

16     For by him were all things created, that are in heaven, and that are in earth, visible and invisible, whether they be thrones, or dominions, or principalities, or powers: all things were created by him, and for him:

21     And you, that were sometime alienated and enemies in your mind by wicked works, yet now hath he reconciled

26     Even the mystery which hath been hid from ages and from generations, but now is made manifest to his saints:

27     To whom God would make known what is the riches of the glory of this mystery among the Gentiles; which is Christ in you, the hope of glory:



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 472 : 24 (सब)-26

ईश्वर और उसकी रचना में सभी वास्तविकता सामंजस्यपूर्ण और शाश्वत है। वह जो बनाता है वह अच्छा है, और जो कुछ भी बनाया जाता है वह उसी के द्वारा बनाया जाता है।

1. 472 : 24 (All)-26

All reality is in God and His creation, harmonious and eternal. That which He creates is good, and He makes all that is made.

2. 242 : 9-14

स्वर्ग के लिए एक रास्ता है, सद्भाव; और ईश्वरीय विज्ञान में मसीह हमें इस मार्ग को दिखाता है। कोई और वास्तविकता नहीं है, अच्छे ईश्वर और उसके प्रतिबिंब को जानने और इंद्रियों के दर्द और सुख से श्रेष्ठ होने के अलावा जीवन की कोई अन्य चेतना नहीं है।

2. 242 : 9-14

There is but one way to heaven, harmony, and Christ in divine Science shows us this way. It is to know no other reality — to have no other consciousness of life — than good, God and His reflection, and to rise superior to the so-called pain and pleasure of the senses.

3. 325 : 2-9

जिसके पास भलाई का सच्चा विचार है वह बुराई के सभी अर्थों को खो देता है, और इस कारण से आत्मा की शाश्वत वास्तविकताओं में प्रवेश किया जा रहा है। ऐसा मनुष्य जीवन में रहता है, - वह जीवन जो शरीर को सहायक जीवन के लिए नहीं बल्कि सत्य के लिए प्राप्त होता है, अपने स्वयं के अमर विचार को प्रकट करता है। यीशु ने होने का सच्चा विचार दिया, जिसके परिणामस्वरूप नश्वर लोगों को अनंत आशीषें मिलती हैं।

3. 325 : 2-9

He who has the true idea of good loses all sense of evil, and by reason of this is being ushered into the undying realities of Spirit. Such a one abideth in Life, — life obtained not of the body incapable of supporting life, but of Truth, unfolding its own immortal idea. Jesus gave the true idea of being, which results in infinite blessings to mortals.

4. 264 : 13-19

जैसा कि नश्वर भगवान और मनुष्य के बारे में अधिक सही दृष्टिकोण प्राप्त करते हैं, सृष्टि की बहुपक्षीय वस्तुएं, जो पहले अदृश्य थीं, दृश्यमान हो जाएंगी। जब हम महसूस करते हैं कि जीवन आत्मा है, तो कभी भी नहीं, न ही इस मामले में, यह समझ आत्म-पूर्णता में विस्तारित होगी, सभी को ईश्वर में मिल जाएगी, अच्छा होगा, और किसी अन्य चेतना की आवश्यकता नहीं होगी।

4. 264 : 13-19

As mortals gain more correct views of God and man, multitudinous objects of creation, which before were invisible, will become visible. When we realize that Life is Spirit, never in nor of matter, this understanding will expand into self-completeness, finding all in God, good, and needing no other consciousness.

5. 297 : 32 (रोग)-15

बीमारी, पाप और मृत्यु मानवीय निष्कर्षों की अस्पष्ट वास्तविकता हैं। जीवन, सत्य और प्रेम ईश्वरीय विज्ञान की वास्तविकता हैं। वे विश्वास में डूब जाते हैं और आध्यात्मिक समझ में पूर्ण चमक प्राप्त करते हैं। जिस प्रकार बादल सूर्य को छिपा लेता है, वह बुझ नहीं सकता, उसी प्रकार मिथ्या विश्वास अपरिवर्तनशील सद्भाव की आवाज को कुछ समय के लिए खामोश कर देता है, लेकिन मिथ्या विश्वास विश्वास, आशा और फल से लैस विज्ञान को नष्ट नहीं कर सकता।

जिसे भौतिक इन्द्रिय कहा जाता है, वह केवल वस्तुओं के नश्वर अस्थायी बोध की सूचना दे सकता है, जबकि आध्यात्मिक इन्द्रिय केवल सत्य की गवाही दे सकता है। भौतिक अर्थों के लिए, असत्य तब तक वास्तविक है जब तक कि इस भावना को ईसाई विज्ञान द्वारा ठीक नहीं किया जाता है।

भौतिक इंद्रियों के विपरीत आध्यात्मिक भावना में अंतर्ज्ञान, आशा, विश्वास, समझ, फल, वास्तविकता शामिल है।

5. 297 : 32 (Sickness)-15

Sickness, sin, and death are the vague realities of human conclusions. Life, Truth, and Love are the realities of divine Science. They dawn in faith and glow full-orbed in spiritual understanding. As a cloud hides the sun it cannot extinguish, so false belief silences for a while the voice of immutable harmony, but false belief cannot destroy Science armed with faith, hope, and fruition.

What is termed material sense can report only a mortal temporary sense of things, whereas spiritual sense can bear witness only to Truth. To material sense, the unreal is the real until this sense is corrected by Christian Science.

Spiritual sense, contradicting the material senses, involves intuition, hope, faith, understanding, fruition, reality.

6. 335 : 27-28

वास्तविकता आध्यात्मिक, सामंजस्यपूर्ण, अपरिवर्तनीय, अमर, दिव्य, शाश्वत है।

6. 335 : 27-28

Reality is spiritual, harmonious, immutable, immortal, divine, eternal.

7. 212 : 29-3

अस्तित्व की वास्तविकता, इसकी सामान्य क्रिया, और सभी चीजों की उत्पत्ति नश्वर भावना के लिए अनदेखी है; जबकि नश्वर विश्वास के असत्य और अनुकरणीय आंदोलनों, जो अमर तरीके और क्रिया को उलट देंगे, को वास्तविक शैली में रखा गया है। जो कोई भी वास्तविकता के इस नश्वर मन की धारणा का खंडन करता है उसे धोखेबाज कहा जाता है, या धोखा दिया जाता है।

7. 212 : 29-3

The realities of being, its normal action, and the origin of all things are unseen to mortal sense; whereas the unreal and imitative movements of mortal belief, which would reverse the immortal modus and action, are styled the real. Whoever contradicts this mortal mind supposition of reality is called a deceiver, or is said to be deceived.

8. 28 : 4-8

यदि मास्टर ने एक छात्र को नहीं लिया था और भगवान की अनदेखी सत्य सिखाया था, तो उसे क्रूस पर नहीं चढ़ाया जाता था। पदार्थ की समझ में आत्मा को धारण करने का दृढ़ संकल्प, सत्य और प्रेम का उत्पीड़न करने वाला है।

8. 28 : 4-8

If the Master had not taken a student and taught the unseen verities of God, he would not have been crucified. The determination to hold Spirit in the grasp of matter is the persecutor of Truth and Love.

9. 481 : 7-12

भौतिक बोध कभी भी मनुष्यों को आत्मा, ईश्वर को समझने में मदद नहीं करता है। केवल आध्यात्मिक अर्थों के माध्यम से, मनुष्य समझ पाता है और देवता से प्यार करता है। भौतिक इंद्रियों द्वारा मन के विज्ञान के विभिन्न अंतर्विरोध अनदेखी सत्य को नहीं बदलते हैं, जो हमेशा के लिए बरकरार रहता है।

9. 481 : 7-12

Material sense never helps mortals to understand Spirit, God. Through spiritual sense only, man comprehends and loves Deity. The various contradictions of the Science of Mind by the material senses do not change the unseen Truth, which remains forever intact.

10. 486 : 23-26

दृष्टि, श्रवण, मनुष्य की सभी आध्यात्मिक इंद्रियां शाश्वत हैं। वे खो नहीं सकते। उनकी वास्तविकता और अमरता आत्मा और समझ में है, पदार्थ में नहीं, — इसलिए उनकी स्थायित्व।

10. 486 : 23-26

Sight, hearing, all the spiritual senses of man, are eternal. They cannot be lost. Their reality and immortality are in Spirit and understanding, not in matter, — hence their permanence.

11. 479 : 29-7

पॉल कहते हैं: "क्योंकि उसके अनदेखे गुण, अर्थात उस की सनातन सामर्थ, और परमेश्वरत्व जगत की सृष्टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते है, यहां तक कि वे निरुत्तर हैं।" (रोमियो 1. 20.) जब क्रिएस्टियन साइंस में आत्मा का पदार्थ दिखाई देता है, तो पदार्थ की कुछ भी मान्यता नहीं होती है। जहां परमात्मा की आत्मा है, और जहां परमात्मा नहीं है वहां कोई भी जगह नहीं है, तो बुराई कुछ भी नहीं है, - आत्मा के विपरीत। यदि कोई आध्यात्मिक प्रतिबिंब नहीं है, तो केवल रिक्तता का अंधेरा रहता है और न कि स्वर्गीय संकेतों का एक निशान।

11. 479 : 29-7

Paul says: "For the invisible things of Him, from the creation of the world, are clearly seen, being understood by the things that are made." (Romans i. 20.) When the substance of Spirit appears in Christian Science, the nothingness of matter is recognized. Where the spirit of God is, and there is no place where God is not, evil becomes nothing, — the opposite of the something of Spirit. If there is no spiritual reflection, then there remains only the darkness of vacuity and not a trace of heavenly tints.

12. 572 : 19-22

प्रकाशित वाक्य 21: 1 में हम पढ़ते हैं: —

फिर मैं ने नये आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा।

12. 572 : 19-22

In Revelation xxi. 1 we read: —

And I saw a new heaven and a new earth: for the first heaven and the first earth were passed away; and there was no more sea.

13. 573 : 3-31

रहस्योद्घाटन करने वाला हमारे अस्तित्व के विमान में था, जबकि अभी तक यह देखते हुए कि आंख क्या नहीं देख सकती, - जो कि बिना सोचे समझे अदृश्य है। पवित्र लेखन की यह गवाही विज्ञान में इस तथ्य को प्रमाणित करती है, कि एक मानव चेतना के लिए आकाश और पृथ्वी, उस चेतना को जिसे ईश्वर श्रेष्ठ मानते हैं, आध्यात्मिक हैं, जबकि दूसरे के लिए, एकात्म मानव मन, दृष्टि भौतिक है। यह निर्विवाद रूप से दिखाता है कि मानव मन क्या मायने रखता है और आत्मा राज्यों और चेतना के चरणों को इंगित करता है।

इस वैज्ञानिक चेतना के साथ एक और रहस्योद्घाटन किया गया था, यहां तक कि स्वर्ग से घोषणा, सर्वोच्च सद्भाव, कि भगवान, सद्भाव का दिव्य सिद्धांत, कभी पुरुषों के साथ है, और वे उनके लोग हैं। इस प्रकार मनुष्य अब एक दुखी पापी के रूप में नहीं, बल्कि ईश्वर के धन्य बच्चे के रूप में माना जाता था। क्यूं कर? क्योंकि स्वर्ग और पृथ्वी के सेंट जॉन के प्रति शत्रुता गायब हो गई थी, और इस झूठे अर्थ के स्थान पर आध्यात्मिक भावना थी, व्यक्तिपरक स्थिति जिसके द्वारा वह नए स्वर्ग और नई पृथ्वी को देख सकता था, जिसमें आध्यात्मिक विचार और वास्तविकता की चेतना शामिल है । यह निष्कर्ष निकालने के लिए शास्त्र सम्मत अधिकार है कि इस अस्तित्व की वर्तमान स्थिति में पुरुषों के लिए यह संभव है, और - यह कि हम यहाँ, और अब, मृत्यु, दुःख और पीड़ा के निवारण के लिए सचेत हो सकते हैं। यह वास्तव में पूर्ण क्रिश्चियन साइंस का पूर्वज है। दिल थाम लो, प्रिय पीड़ित, इस वास्तविकता के लिए निश्चित रूप से कुछ समय में और किसी तरह दिखाई देगा। अधिक दर्द नहीं होगा, और सभी आँसू मिटा दिए जाएंगे।

13. 573 : 3-31

The Revelator was on our plane of existence, while yet beholding what the eye cannot see, — that which is invisible to the uninspired thought. This testimony of Holy Writ sustains the fact in Science, that the heavens and earth to one human consciousness, that consciousness which God bestows, are spiritual, while to another, the unillumined human mind, the vision is material. This shows unmistakably that what the human mind terms matter and spirit indicates states and stages of consciousness.

Accompanying this scientific consciousness was another revelation, even the declaration from heaven, supreme harmony, that God, the divine Principle of harmony, is ever with men, and they are His people. Thus man was no longer regarded as a miserable sinner, but as the blessed child of God. Why? Because St. John's corporeal sense of the heavens and earth had vanished, and in place of this false sense was the spiritual sense, the subjective state by which he could see the new heaven and new earth, which involve the spiritual idea and consciousness of reality. This is Scriptural authority for concluding that such a recognition of being is, and has been, possible to men in this present state of existence, — that we can become conscious, here and now, of a cessation of death, sorrow, and pain. This is indeed a foretaste of absolute Christian Science. Take heart, dear sufferer, for this reality of being will surely appear sometime and in some way. There will be no more pain, and all tears will be wiped away.

14. 208 : 20-24

आइए हम वास्तविक और शाश्वत के बारे में जानें, और आत्मा के राज्य, स्वर्ग के राज्य की तैयारी करें - सार्वभौमिक सद्भाव का शासन और शासन, जिसे खोया नहीं जा सकता और न ही हमेशा के लिए अनदेखा किया जा सकता है।

14. 208 : 20-24

Let us learn of the real and eternal, and prepare for the reign of Spirit, the kingdom of heaven, — the reign and rule of universal harmony, which cannot be lost nor remain forever unseen.

15. 264 : 28-31

जब हम क्रिश्चियन साइंस में रास्ता सीखते हैं और मनुष्य के आध्यात्मिक होने को पहचानते हैं, तो हम भगवान की रचना को समझेंगे और समझेंगे, - पृथ्वी और स्वर्ग और मनुष्य की सभी महिमा।

15. 264 : 28-31

When we learn the way in Christian Science and recognize man's spiritual being, we shall behold and understand God's creation, — all the glories of earth and heaven and man.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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