रविवार 26 मार्च, 2023



विषयवास्तविकता

SubjectReality

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: याकूब 1: 17

"क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिस में न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, ओर न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है।"



Golden Text: James 1 : 17

Every good gift and every perfect gift is from above, and cometh down from the Father of lights, with whom is no variableness, neither shadow of turning.




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उत्तरदायी अध्ययन: यूहन्ना 1: 1-5 • उत्पत्ति 1: 4, 31


1     सेआदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।

2     यही आदि में परमेश्वर के साथ था।

3     सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।

4     उस में जीवन था; और वह जीवन मुनष्यों की ज्योति थी।

5     और ज्योति अन्धकार में चमकती है; और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया।

4     और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया।

31     तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है।

Responsive Reading: John 1 : 1-5Genesis 1 : 4, 31

1.     In the beginning was the Word, and the Word was with God, and the Word was God.

2.     The same was in the beginning with God.

3.     All things were made by him; and without him was not any thing made that was made.

4.     In him was life; and the life was the light of men.

5.     And the light shineth in darkness; and the darkness comprehended it not.

4.     And God saw the light, that it was good: and God divided the light from the darkness.

31.     And God saw every thing that he had made, and, behold, it was very good.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. कुलुस्सियों 1: 3 (से 1st ,), 13, 16

3     अपने प्रभु यीशु मसीह के पिता अर्थात परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं।

13     उसी ने हमें अन्धकार के वश से छुड़ाकर अपने प्रिय पुत्र के राज्य में प्रवेश कराया।

16     क्योंकि उसी में सारी वस्तुओं की सृष्टि हुई, स्वर्ग की हो अथवा पृथ्वी की, देखी या अनदेखी, क्या सिंहासन, क्या प्रभुतांए, क्या प्रधानताएं, क्या अधिकार, सारी वस्तुएं उसी के द्वारा और उसी के लिये सृजी गई हैं।

1. Colossians 1 : 3 (to 1st ,), 13, 16

3     We give thanks to God and the Father of our Lord Jesus Christ,

13     Who hath delivered us from the power of darkness, and hath translated us into the kingdom of his dear Son:

16     For by him were all things created, that are in heaven, and that are in earth, visible and invisible, whether they be thrones, or dominions, or principalities, or powers: all things were created by him, and for him:

2. उत्पत्ति 12: 1-4, 6, 7

1     यहोवा ने अब्राम से कहा, अपने देश, और अपनी जन्मभूमि, और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊंगा।

2     और मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊंगा, और तुझे आशीष दूंगा, और तेरा नाम बड़ा करूंगा, और तू आशीष का मूल होगा।

3     और जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूंगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूंगा; और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएंगे।

4     यहोवा के इस वचन के अनुसार अब्राम चला; और लूत भी उसके संग चला; और जब अब्राम हारान देश से निकला उस समय वह पचहत्तर वर्ष का था।

6     उस देश के बीच से जाते हुए अब्राम शकेम में, जहां मोरे का बांज वृक्ष है, पंहुचा; उस समय उस देश में कनानी लोग रहते थे।

7     तब यहोवा ने अब्राम को दर्शन देकर कहा, यह देश मैं तेरे वंश को दूंगा: और उसने वहां यहोवा के लिये जिसने उसे दर्शन दिया था, एक वेदी बनाई।

2. Genesis 12 : 1-4, 6, 7

1     Now the Lord had said unto Abram, Get thee out of thy country, and from thy kindred, and from thy father’s house, unto a land that I will shew thee:

2     And I will make of thee a great nation, and I will bless thee, and make thy name great; and thou shalt be a blessing:

3     And I will bless them that bless thee, and curse him that curseth thee: and in thee shall all families of the earth be blessed.

4     So Abram departed, as the Lord had spoken unto him; and Lot went with him: and Abram was seventy and five years old when he departed out of Haran.

6     And Abram passed through the land unto the place of Sichem, unto the plain of Moreh. And the Canaanite was then in the land.

7     And the Lord appeared unto Abram, and said, Unto thy seed will I give this land: and there builded he an altar unto the Lord, who appeared unto him.

3. उत्पत्ति 17: 15-17, 19

15     फिर परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, तेरी जो पत्नी सारै है, उसको तू अब सारै न कहना, उसका नाम सारा होगा।

16     और मैं उसको आशीष दूंगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूंगा; और मैं उसको ऐसी आशीष दूंगा, कि वह जाति जाति की मूलमाता हो जाएगी; और उसके वंश में राज्य राज्य के राजा उत्पन्न होंगे।

17     तब इब्राहीम मुंह के बल गिर पड़ा और हंसा, और अपने मन ही मन कहने लगा, क्या सौ वर्ष के पुरूष के भी सन्तान होगा और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?

19     तब परमेश्वर ने कहा, निश्चय तेरी पत्नी सारा के तुझ से एक पुत्र उत्पन्न होगा; और तू उसका नाम इसहाक रखना: और मैं उसके साथ ऐसी वाचा बान्धूंगा जो उसके पश्चात उसके वंश के लिये युग युग की वाचा होगी।

3. Genesis 17 : 15-17, 19

15     And God said unto Abraham, As for Sarai thy wife, thou shalt not call her name Sarai, but Sarah shall her name be.

16     And I will bless her, and give thee a son also of her: yea, I will bless her, and she shall be a mother of nations; kings of people shall be of her.

17     Then Abraham fell upon his face, and laughed, and said in his heart, Shall a child be born unto him that is an hundred years old? and shall Sarah, that is ninety years old, bear?

19     And God said, Sarah thy wife shall bear thee a son indeed; and thou shalt call his name Isaac: and I will establish my covenant with him for an everlasting covenant, and with his seed after him.

4. उत्पत्ति 18: 11, 13 (से 1st ,), 14

11     इब्राहीम और सारा दोनो बहुत बूढ़े थे; और सारा का स्त्रीधर्म बन्द हो गया था

13     तब यहोवा ने इब्राहीम से कहा।

14     क्या यहोवा के लिये कोई काम कठिन है? नियत समय में, अर्थात वसन्त ऋतु में, मैं तेरे पास फिर आऊंगा, और सारा के पुत्र उत्पन्न होगा।

4. Genesis 18 : 11, 13 (to 1st ,), 14

11     Now Abraham and Sarah were old and well stricken in age; and it ceased to be with Sarah after the manner of women.

13     And the Lord said unto Abraham,

14     Is any thing too hard for the Lord? At the time appointed I will return unto thee, according to the time of life, and Sarah shall have a son.

5. उत्पत्ति 21: 1-3, 5

1     सो यहोवा ने जैसा कहा था वैसा ही सारा की सुधि लेके उसके साथ अपने वचन के अनुसार किया।

2     सो सारा को इब्राहीम से गर्भवती हो कर उसके बुढ़ापे में उसी नियुक्त समय पर जो परमेश्वर ने उससे ठहराया था एक पुत्र उत्पन्न हुआ।

3     और इब्राहीम ने अपने पुत्र का नाम जो सारा से उत्पन्न हुआ था इसहाक रखा।

5     और जब इब्राहीम का पुत्र इसहाक उत्पन्न हुआ तब वह एक सौ वर्ष का था।

5. Genesis 21 : 1-3, 5

1     And the Lord visited Sarah as he had said, and the Lord did unto Sarah as he had spoken.

2     For Sarah conceived, and bare Abraham a son in his old age, at the set time of which God had spoken to him.

3     And Abraham called the name of his son that was born unto him, whom Sarah bare to him, Isaac.

5     And Abraham was an hundred years old, when his son Isaac was born unto him.

6. इब्रानियों 11: 3, 8-11

3     विश्वास ही से हम जान जाते हैं, कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है। यह नहीं, कि जो कुछ देखने में आता है, वह देखी हुई वस्तुओं से बना हो।

8     विश्वास ही से इब्राहीम जब बुलाया गया तो आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया जिसे मीरास में लेने वाला था, और यह न जानता था, कि मैं किधर जाता हूं; तौभी निकल गया।

9     विश्वास ही से उस ने प्रतिज्ञा किए हुए देश में जैसे पराए देश में परदेशी रह कर इसहाक और याकूब समेत जो उसके साथ उसी प्रतिज्ञा के वारिस थे, तम्बूओं में वास किया।

10     क्योंकि वह उस स्थिर नेव वाले नगर की बाट जोहता था, जिस का रचने वाला और बनाने वाला परमेश्वर है।

11     विश्वास से सारा ने आप बूढ़ी होने पर भी गर्भ धारण करने की सामर्थ पाई; क्योंकि उस ने प्रतिज्ञा करने वाले को सच्चा जाना था।

6. Hebrews 11 : 3, 8-11

3     Through faith we understand that the worlds were framed by the word of God, so that things which are seen were not made of things which do appear.

8     By faith Abraham, when he was called to go out into a place which he should after receive for an inheritance, obeyed; and he went out, not knowing whither he went.

9     By faith he sojourned in the land of promise, as in a strange country, dwelling in tabernacles with Isaac and Jacob, the heirs with him of the same promise:

10     For he looked for a city which hath foundations, whose builder and maker is God.

11     Through faith also Sara herself received strength to conceive seed, and was delivered of a child when she was past age, because she judged him faithful who had promised.

7. 2 कुरिन्थियों 4: 1, 3, 4, 6, 18

1     इसलिये जब हम पर ऐसी दया हुई, कि हमें यह सेवा मिली, तो हम हियाव नहीं छोड़ते।

3     परन्तु यदि हमारे सुसमाचार पर परदा पड़ा है, तो यह नाश होने वालों ही के लिये पड़ा है।

4     और उन अविश्वासियों के लिये, जिन की बुद्धि को इस संसार के ईश्वर ने अन्धी कर दी है, ताकि मसीह जो परमेश्वर का प्रतिरूप है, उसके तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके।

6     इसलिये कि परमेश्वर ही है, जिस ने कहा, कि अन्धकार में से ज्योति चमके; और वही हमारे हृदयों में चमका, कि परमेश्वर की महिमा की पहिचान की ज्योति यीशु मसीह के चेहरे से प्रकाशमान हो॥

18     और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं, क्योंकि देखी हुई वस्तुएं थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएं सदा बनी रहती हैं।

7. II Corinthians 4 : 1, 3, 4, 6, 18

1     Therefore seeing we have this ministry, as we have received mercy, we faint not;

3     But if our gospel be hid, it is hid to them that are lost:

4     In whom the god of this world hath blinded the minds of them which believe not, lest the light of the glorious gospel of Christ, who is the image of God, should shine unto them.

6     For God, who commanded the light to shine out of darkness, hath shined in our hearts, to give the light of the knowledge of the glory of God in the face of Jesus Christ.

18     While we look not at the things which are seen, but at the things which are not seen: for the things which are seen are temporal; but the things which are not seen are eternal.

8. 1 कुरिन्थियों 2 2: 9 (जैसा), 10, 12-15

9     ... जैसा लिखा है, कि जो आंख ने नहीं देखी, और कान ने नहीं सुना, और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ीं वे ही हैं, जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखने वालों के लिये तैयार की हैं।

10     परन्तु परमेश्वर ने उन को अपने आत्मा के द्वारा हम पर प्रगट किया; क्योंकि आत्मा सब बातें, वरन परमेश्वर की गूढ़ बातें भी जांचता है।

12     परन्तु हम ने संसार की आत्मा नहीं, परन्तु वह आत्मा पाया है, जो परमेश्वर की ओर से है, कि हम उन बातों को जानें, जो परमेश्वर ने हमें दी हैं।

13     जिन को हम मनुष्यों के ज्ञान की सिखाई हुई बातों में नहीं, परन्तु आत्मा की सिखाई हुई बातों में, आत्मिक बातें आत्मिक बातों से मिला मिला कर सुनाते हैं।

14     परन्तु शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उस की दृष्टि में मूर्खता की बातें हैं, और न वह उन्हें जान सकता है क्योंकि उन की जांच आत्मिक रीति से होती है।

15     आत्मिक जन सब कुछ जांचता है, परन्तु वह आप किसी से जांचा नहीं जाता।

8. I Corinthians 2 : 9 (as), 10, 12-15

9     … as it is written, Eye hath not seen, nor ear heard, neither have entered into the heart of man, the things which God hath prepared for them that love him.

10     But God hath revealed them unto us by his Spirit: for the Spirit searcheth all things, yea, the deep things of God.

12     Now we have received, not the spirit of the world, but the spirit which is of God; that we might know the things that are freely given to us of God.

13     Which things also we speak, not in the words which man’s wisdom teacheth, but which the Holy Ghost teacheth; comparing spiritual things with spiritual.

14     But the natural man receiveth not the things of the Spirit of God: for they are foolishness unto him: neither can he know them, because they are spiritually discerned.

15     But he that is spiritual judgeth all things, yet he himself is judged of no man.

9. 1 इतिहास 29: 11, 13

11     हे यहोवा! महिमा, पराक्रम, शोभा, सामर्थ्य और वैभव, तेरा ही है; क्योंकि आकाश और पृथ्वी में जो कुछ है, वह तेरा ही है; हे यहोवा! राज्य तेरा है, और तू सभों के ऊपर मुख्य और महान ठहरा है।

13     इसलिये अब हे हमारे परमेश्वर! हम तेरा ध्न्यवाद और तेरे महिमायुक्त नाम की स्तुति करते हैं।

9. I Chronicles 29 : 11, 13

11     Thine, O Lord, is the greatness, and the power, and the glory, and the victory, and the majesty: for all that is in the heaven and in the earth is thine; thine is the kingdom, O Lord, and thou art exalted as head above all.

13     Now therefore, our God, we thank thee, and praise thy glorious name.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 513 : 26 (ईश्वर)-27

भगवान वास्तविकता के सभी रूपों को बनाता है। उनके विचार आध्यात्मिक यथार्थ हैं।

1. 513 : 26 (God)-27

God creates all forms of reality. His thoughts are spiritual realities.

2. 275 : 10-19

वास्तविकता और उसके विज्ञान में होने के क्रम को समझने के लिए, आपको परमेश्वर को उस सभी के दिव्य सिद्धांत के रूप में फिर से शुरू करना चाहिए जो वास्तव में है। आत्मा, जीवन, सत्य, प्रेम, एक के रूप में गठबंधन, - और भगवान के लिए शास्त्र के नाम हैं। सभी पदार्थ, बुद्धि, ज्ञान, अस्तित्व, अमरता, कारण और प्रभाव ईश्वर के हैं। ये उनकी विशेषताएं हैं, अनंत दिव्य सिद्धांत, प्रेम की शाश्वत अभिव्यक्तियाँ। कोई भी ज्ञान बुद्धिमान नहीं है, लेकिन उसका ज्ञान है; कोई सत्य सत्य नहीं है, कोई प्रेम प्यारा नहीं है, कोई जीवन जीवन नहीं है, लेकिन परमात्मा है; कोई अच्छा नहीं है, लेकिन अच्छा भगवान सबसे अच्छा है।

2. 275 : 10-19

To grasp the reality and order of being in its Science, you must begin by reckoning God as the divine Principle of all that really is. Spirit, Life, Truth, Love, combine as one, — and are the Scriptural names for God. All substance, intelligence, wisdom, being, immortality, cause, and effect belong to God. These are His attributes, the eternal manifestations of the infinite divine Principle, Love. No wisdom is wise but His wisdom; no truth is true, no love is lovely, no life is Life but the divine; no good is, but the good God bestows.

3. 512 : 20-25

आत्मा अपने शुद्ध और परिपूर्ण विचारों के गुणन को आशीर्वाद देती है। एक मन के अनंत तत्वों से सभी रूप, रंग, गुणवत्ता और मात्रा निकलती है, और ये मानसिक होते हैं, दोनों मुख्य रूप से और दूसरे रूप में। उनकी आध्यात्मिक प्रकृति केवल आध्यात्मिक इंद्रियों के माध्यम से विवेकी है।

3. 512 : 20-25

Spirit blesses the multiplication of its own pure and perfect ideas. From the infinite elements of the one Mind emanate all form, color, quality, and quantity, and these are mental, both primarily and secondarily. Their spiritual nature is discerned only through the spiritual senses.

4. 507 : 15-23, 28-5

आत्मा का ब्रह्मांड ईश्वरीय सिद्धांत या जीवन की रचनात्मक शक्ति को दर्शाता है, जो मन के बहुसंख्यक रूपों को पुन: उत्पन्न करता है और यौगिक विचार मनुष्य के गुणन को नियंत्रित करता है। पेड़ और जड़ी-बूटी अपनी स्वयं की किसी प्रसार शक्ति के कारण फल नहीं देते हैं, बल्कि इसलिए कि वे उस मन को प्रतिबिंबित करते हैं जिसमें सभी शामिल हैं। एक भौतिक दुनिया का अर्थ है एक नश्वर मन और मनुष्य एक निर्माता। वैज्ञानिक ईश्वरीय रचना अमर मन और ईश्वर द्वारा निर्मित ब्रह्मांड की घोषणा करती है।

सृजन हमेशा दिखाई दे रहा है, और हमेशा अपने अटूट स्रोत की प्रकृति से प्रकट होता रहना चाहिए। नश्वर भाव इस प्रकार प्रकट होता है और विचार सामग्री कहता है। इस प्रकार, गलत अर्थ में, दिव्य विचार मानव या भौतिक विश्वास के स्तर तक गिर जाता है, जिसे नश्वर मनुष्य कहा जाता है। लेकिन बीज अपने आप में है, केवल दिव्य मन ही सब कुछ है और सभी को पुन: उत्पन्न करता है — जैसा कि मन गुणक है, और मन का अनंत विचार, मनुष्य और ब्रह्मांड, उत्पाद है।

4. 507 : 15-23, 28-5

The universe of Spirit reflects the creative power of the divine Principle, or Life, which reproduces the multitudinous forms of Mind and governs the multiplication of the compound idea man. The tree and herb do not yield fruit because of any propagating power of their own, but because they reflect the Mind which includes all. A material world implies a mortal mind and man a creator. The scientific divine creation declares immortal Mind and the universe created by God.

Creation is ever appearing, and must ever continue to appear from the nature of its inexhaustible source. Mortal sense inverts this appearing and calls ideas material. Thus misinterpreted, the divine idea seems to fall to the level of a human or material belief, called mortal man. But the seed is in itself, only as the divine Mind is All and reproduces all — as Mind is the multiplier, and Mind's infinite idea, man and the universe, is the product.

5. 505 : 16-17, 26-28

आत्मा उस समझ को प्रदान करती है जो चेतना को बढ़ाती है और सभी सत्य की ओर ले जाती है।

यह समझ बौद्धिक नहीं है, विद्वानों की प्राप्ति का परिणाम नहीं है; यह प्रकाश में लाई गई सभी चीजों की वास्तविकता है।

5. 505 : 16-17, 26-28

Spirit imparts the understanding which uplifts consciousness and leads into all truth.

This understanding is not intellectual, is not the result of scholarly attainments; it is the reality of all things brought to light.

6. 525 : 20-24, 28-29

सब कुछ भगवान ने अच्छा या योग्य बनाया। जो कुछ भी वैधता या द्वेषपूर्ण है, उसने नहीं बनाया, - इसलिए यह असत्य है। उत्पत्ति के विज्ञान में हमने पढ़ा कि उसने वह सब कुछ देखा जो उसने बनाया था, "और देखा तो बहुत अच्छा था।" ... पाप, बीमारी और मृत्यु को वास्तविकता से रहित समझना चाहिए क्योंकि वे अच्छे, ईश्वर के हैं।

6. 525 : 20-24, 28-29

Everything good or worthy, God made. Whatever is valueless or baneful, He did not make, — hence its unreality. In the Science of Genesis we read that He saw everything which He had made, "and, behold, it was very good." … Sin, sickness, and death must be deemed as devoid of reality as they are of good, God.

7. 273 : 16-18, 21-24, 29-3

सामग्री और चिकित्सा विज्ञान के तथाकथित कानूनों ने नश्वर को कभी भी पूर्ण, सामंजस्यपूर्ण और अमर नहीं बनाया है। आत्मा द्वारा शासित होने पर मनुष्य सामंजस्यपूर्ण होता है।

भगवान ने आध्यात्मिक कानून को रद्द करने के लिए कभी भी एक भौतिक कानून का पालन नहीं किया। यदि ऐसा कोई भौतिक कानून होता, यह आत्मा, परमेश्वर की सर्वोच्चता के खिलाफ होगा, और यह निर्माता के ज्ञान को प्रभावित करेगा।

विज्ञान दिखाता है कि सामग्री, परस्पर विरोधी नश्वर राय और विश्वास हर समय त्रुटि के प्रभावों का उत्सर्जन करते हैं, लेकिन यह नश्वर मन का वातावरण नैतिक और स्वास्थ्य के लिए विनाशकारी नहीं हो सकता है जब यह क्राइस्टच्यून साइंस द्वारा तुरंत और लगातार विरोध किया जाता है। ट्रुथ एंड लव इस मानसिक माया का प्रतिकार करता है, और इस प्रकार अस्तित्व और अस्तित्व को बनाए रखता है।

7. 273 : 16-18, 21-24, 29-3

The so-called laws of matter and of medical science have never made mortals whole, harmonious, and immortal. Man is harmonious when governed by Soul.

God never ordained a material law to annul the spiritual law. If there were such a material law, it would oppose the supremacy of Spirit, God, and impugn the wisdom of the creator.

Science shows that material, conflicting mortal opinions and beliefs emit the effects of error at all times, but this atmosphere of mortal mind cannot be destructive to morals and health when it is opposed promptly and persistently by Christian Science. Truth and Love antidote this mental miasma, and thus invigorate and sustain existence.

8. 128 : 4-19

विज्ञान शब्द, ठीक से समझे जाने पर, केवल ईश्वर के नियमों और ब्रह्मांड पर उसकी सरकार को संदर्भित करता है, जिसमें मनुष्य भी शामिल है। इससे यह प्रतीत होता है कि व्यापारिक पुरुषों और सुसंस्कृत विद्वानों ने पाया है कि क्रिएस्टियन साइंस उनकी सहनशक्ति और मानसिक शक्तियों को बढ़ाता है, चरित्र की उनकी धारणा को बढ़ाता है, उन्हें एकरूपता और समझ देता है और उनकी साधारण क्षमता को पार करने की क्षमता देता है। मानव मन, जो इस आध्यात्मिक समझ के साथ जुड़ा हुआ है, अधिक लोचदार हो जाता है, अधिक धीरज रखने में सक्षम होता है, कुछ हद तक खुद से बच जाता है, और कम प्रतिनिधि की आवश्यकता होती है। मनुष्य के अव्यक्त क्षमताओं और संभावनाओं को विकसित करने के विज्ञान का ज्ञान। यह विचार के वातावरण का विस्तार करता है, जिससे नश्वर व्यापक और उच्चतर क्षेत्रों तक पहुँच प्राप्त करता है। यह विचारक को अंतर्दृष्टि और दृष्टिकोण की अपनी मूल हवा में उठाता है।

8. 128 : 4-19

The term Science, properly understood, refers only to the laws of God and to His government of the universe, inclusive of man. From this it follows that business men and cultured scholars have found that Christian Science enhances their endurance and mental powers, enlarges their perception of character, gives them acuteness and comprehensiveness and an ability to exceed their ordinary capacity. The human mind, imbued with this spiritual understanding, becomes more elastic, is capable of greater endurance, escapes somewhat from itself, and requires less repose. A knowledge of the Science of being develops the latent abilities and possibilities of man. It extends the atmosphere of thought, giving mortals access to broader and higher realms. It raises the thinker into his native air of insight and perspicacity.

9. 67 : 25-8

लोकप्रिय ईसाई धर्म के सीमित प्रदर्शन में आध्यात्मिक शक्ति की कमी सदियों के श्रम को शांत नहीं करती है। भौतिक नहीं आध्यात्मिक, चेतना चाहिए। मनुष्य पाप, रोग और मृत्यु से मुक्त होकर सच्ची समानता या आध्यात्मिक आदर्श प्रस्तुत करता है।

धर्म और चिकित्सा की व्यवस्था शारीरिक दर्द और सुख का इलाज करती है, लेकिन यीशु ने ऐसे किसी भी कारण या प्रभाव से पीड़ित को फटकार लगाई। वह युग आ रहा है जब अस्तित्व के सत्य की समझ सच्चे धर्म का आधार होगी। वर्तमान में हास्यास्पद समझे जाने के डर से नश्वर धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। वे फैशन, गर्व और समझदारी के गुलाम हैं। कभी-कभी हम सीखेंगे कि आत्मा, महान वास्तुकार, ने विज्ञान में पुरुषों और महिलाओं को कैसे बनाया है। हमें क्षणभंगुर और झूठ से तौबा करना चाहिए और ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जो हमारे सर्वोच्च स्वार्थ में बाधक हो।

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10. 544 : 13-17

विज्ञान में मन न तो पदार्थ उत्पन्न करता है और न ही पदार्थ मन उत्पन्न करता है। किसी भी नश्वर मन में बनाने या नष्ट करने की शक्ति या अधिकार या ज्ञान नहीं है। सब कुछ एक ही मन के अधीन है, यहाँ तक कि ईश्वर भी।

9. 67 : 25-8

The lack of spiritual power in the limited demonstration of popular Christianity does not put to silence the labor of centuries. Spiritual, not corporeal, consciousness is needed. Man delivered from sin, disease, and death presents the true likeness or spiritual ideal.

Systems of religion and medicine treat of physical pains and pleasures, but Jesus rebuked the suffering from any such cause or effect. The epoch approaches when the understanding of the truth of being will be the basis of true religion. At present mortals progress slowly for fear of being thought ridiculous. They are slaves to fashion, pride, and sense. Sometime we shall learn how Spirit, the great architect, has created men and women in Science. We ought to weary of the fleeting and false and to cherish nothing which hinders our highest selfhood.

10. 544 : 13-17

In Science, Mind neither produces matter nor does matter produce mind. No mortal mind has the might or right or wisdom to create or to destroy. All is under the control of the one Mind, even God.

11. 403 : 14-20

आप स्थिति को आज्ञा देते हैं यदि आप समझते हैं कि नश्वर अस्तित्व आत्म-धोखे की स्थिति है न कि सत्य होने की। नश्वर मन लगातार नश्वर शरीर पर गलत विचारों के परिणाम उत्पन्न कर रहा है; और यह तब तक करना जारी रखेगा, जब तक कि नश्वर त्रुटि सत्य द्वारा अपनी काल्पनिक शक्तियों से वंचित न हो, जो नश्वर भ्रम के गॉसमेर वेब को मिटा देता है।

11. 403 : 14-20

You command the situation if you understand that mortal existence is a state of self-deception and not the truth of being. Mortal mind is constantly producing on mortal body the results of false opinions; and it will continue to do so, until mortal error is deprived of its imaginary powers by Truth, which sweeps away the gossamer web of mortal illusion.

12. 310 : 5-8

पदार्थ काल्पनिक नश्वर मन-शक्ति से बना है; लेकिन सभी शक्ति दिव्य मन है। विचार अंततः सभी रूपों, पदार्थों और रंगों में समझा और देखा जा सकेगा, लेकिन भौतिक संगत के बिना।

12. 310 : 5-8

Matter is made up of supposititious mortal mind-force; but all might is divine Mind. Thought will finally be understood and seen in all form, substance, and color, but without material accompaniments.

13. 205 : 32-3

जब हम दिव्य के साथ अपने संबंध को पूरी तरह से समझते हैं, तो हमारे पास कोई अन्य मन नहीं हो सकता है, लेकिन उनका - कोई अन्य प्रेम, ज्ञान, या सत्य, जीवन का कोई अन्य अर्थ नहीं है, और पदार्थ या त्रुटि के अस्तित्व की कोई चेतना नहीं है।

13. 205 : 32-3

When we fully understand our relation to the Divine, we can have no other Mind but His, — no other Love, wisdom, or Truth, no other sense of Life, and no consciousness of the existence of matter or error.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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