रविवार 26 फ़रवरी, 2023



विषयमसीह ईसा

SubjectChrist Jesus

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: यूहन्ना 5: 30

"मैं अपने आप से कुछ नहीं कर सकता; जैसा सुनता हूं, वैसा न्याय करता हूं, और मेरा न्याय सच्चा है; क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, परन्तु अपने भेजने वाले की इच्छा चाहता हूं।" — मसीह ईसा



Golden Text: John 5 : 30

I can of mine own self do nothing: as I hear, I judge: and my judgment is just; because I seek not mine own will, but the will of the Father which hath sent me.”— Christ Jesus




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उत्तरदायी अध्ययन: यूहन्ना 12: 27-30 • 1 थिस्सलुनीकियों 5: 16, 17


27     जब मेरा जी व्याकुल हो रहा है। इसलिये अब मैं क्या कहूं? हे पिता, मुझे इस घड़ी से बचा? परन्तु मैं इसी कारण इस घड़ी को पहुंचा हूं।

28     हे पिता अपने नाम की महिमा कर: तब यह आकाशवाणी हुई, कि मैं ने उस की महिमा की है, और फिर भी करूंगा।

29     तब जो लोग खड़े हुए सुन रहे थे, उन्होंने कहा; कि बादल गरजा, औरों ने कहा, कोई स्वर्गदूत उस से बोला।

30     इस पर यीशु ने कहा, यह शब्द मेरे लिये नहीं परन्तु तुम्हारे लिये आया है।

16     सदा आनन्दित रहो।

17     निरन्तर प्रार्थना मे लगे रहो।

Responsive Reading: I Thessalonians 5 : 16, 17

27.     Now is my soul troubled; and what shall I say? Father, save me from this hour: but for this cause came I unto this hour.

28.     Father, glorify thy name. Then came there a voice from heaven, saying, I have both glorified it, and will glorify it again.

29.     The people therefore, that stood by, and heard it, said that it thundered: others said, An angel spake to him.

30.     Jesus answered and said, This voice came not because of me, but for your sakes.

16.     Rejoice evermore.

17.     Pray without ceasing.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. मत्ती 3: 16 (से 1st :), 17

16     और यीशु बपतिस्मा लेकर तुरन्त पानी में से ऊपर आया, और देखो, उसके लिये आकाश खुल गया; और उस ने परमेश्वर के आत्मा को कबूतर की नाईं उतरते और अपने ऊपर आते देखा।

17     और देखो, यह आकाशवाणी हुई, कि यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिस से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूं॥

1. Matthew 3 : 16 (to 1st :), 17

16     And Jesus, when he was baptized, went up straightway out of the water:

17     And lo a voice from heaven, saying, This is my beloved Son, in whom I am well pleased.

2. लूका 11: 1

1     फिर वह किसी जगह प्रार्थना कर रहा था: और जब वह प्रार्थना कर चुका, तो उसके चेलों में से एक ने उस से कहा; हे प्रभु, जैसे यूहन्ना ने अपने चेलों को प्रार्थना करना सिखलाया वैसे ही हमें भी तू सिखा दे।

2. Luke 11 : 1

1     And it came to pass, that, as he was praying in a certain place, when he ceased, one of his disciples said unto him, Lord, teach us to pray, as John also taught his disciples.

3. मत्ती 5: 2

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

3. Matthew 5 : 2

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

4. मत्ती 6: 9-13

9     सो तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो; “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए।

10     तेरा राज्य आए; तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो।

11     हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे।

12     और जिस प्रकार हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर।

13     और हमें परीक्षा में न ला, परन्तु बुराई से बचा; क्योंकि राज्य और पराक्रम और महिमा सदा तेरे ही हैं। आमीन।

4. Matthew 6 : 9-13

9     After this manner therefore pray ye: Our Father which art in heaven, Hallowed be thy name.

10     Thy kingdom come. Thy will be done in earth, as it is in heaven.

11     Give us this day our daily bread.

12     And forgive us our debts, as we forgive our debtors.

13     And lead us not into temptation, but deliver us from evil: For thine is the kingdom, and the power, and the glory, for ever. Amen.

5. मरकुस 1: 34 (से ;), 35, 39-42

34     और उस ने बहुतों को जो नाना प्रकार की बीमारियों से दुखी थे, चंगा किया; और बहुत से दुष्टात्माओं को निकाला; और दुष्टात्माओं को बोलने न दिया, क्योंकि वे उसे पहचानती थीं॥

35     और भोर को दिन निकलने से बहुत पहिले, वह उठकर निकला, और एक जंगली स्थान में गया और वहां प्रार्थना करने लगा।

39     सो वह सारे गलील में उन की सभाओं में जा जाकर प्रचार करता और दुष्टात्माओं को निकालता रहा॥

40     और एक कोढ़ी ने उसके पास आकर, उस से बिनती की, और उसके साम्हने घुटने टेककर, उस से कहा; यदि तू चाहे तो मुझे शुद्ध कर सकता है।

41     उस ने उस पर तरस खाकर हाथ बढ़ाया, और उसे छूकर कहा; मैं चाहता हूं तू शुद्ध हो जा।

42     और तुरन्त उसका को ढ़ जाता रहा, और वह शुद्ध हो गया।

5. Mark 1 : 34 (to ;), 35, 39-42

34     And he healed many that were sick of divers diseases, and cast out many devils;

35     And in the morning, rising up a great while before day, he went out, and departed into a solitary place, and there prayed.

39     And he preached in their synagogues throughout all Galilee, and cast out devils.

40     And there came a leper to him, beseeching him, and kneeling down to him, and saying unto him, If thou wilt, thou canst make me clean.

41     And Jesus, moved with compassion, put forth his hand, and touched him, and saith unto him, I will; be thou clean.

42     And as soon as he had spoken, immediately the leprosy departed from him, and he was cleansed.

6. लूका 6: 12, 13, 20-23

12     और उन दिनों में वह पहाड़ पर प्रार्थना करने को निकला, और परमेश्वर से प्रार्थना करने में सारी रात बिताई।

13     जब दिन हुआ, तो उस ने अपने चेलों को बुलाकर उन में से बारह चुन लिए, और उन को प्रेरित कहा।

20     तब उस ने अपने चेलों की ओर देखकर कहा; धन्य हो तुम, जो दीन हो, क्योंकि परमेश्वर का राज्य तुम्हारा है।

21     धन्य हो तुम, जो अब भूखे हो; क्योंकि तृप्त किए जाओगे; धन्य हो तुम, जो अब रोते हो, क्योंकि हंसोगे।

22     धन्य हो तुम, जब मनुष्य के पुत्र के कारण लोग तुम से बैर करेंगे, और तुम्हें निकाल देंगे, और तुम्हारी निन्दा करेंगे, और तुम्हारा नाम बुरा जानकर काट देंगे।

23     उस दिन आनन्दित होकर उछलना, क्योंकि देखो, तुम्हारे लिये स्वर्ग में बड़ा प्रतिफल है: उन के बाप-दादे भविष्यद्वक्ताओं के साथ भी वैसा ही किया करते थे।

6. Luke 6 : 12, 13, 20-23

12     And it came to pass in those days, that he went out into a mountain to pray, and continued all night in prayer to God.

13     And when it was day, he called unto him his disciples: and of them he chose twelve, whom also he named apostles;

20     And he lifted up his eyes on his disciples, and said, Blessed be ye poor: for yours is the kingdom of God.

21     Blessed are ye that hunger now: for ye shall be filled. Blessed are ye that weep now: for ye shall laugh.

22     Blessed are ye, when men shall hate you, and when they shall separate you from their company, and shall reproach you, and cast out your name as evil, for the Son of man’s sake.

23     Rejoice ye in that day, and leap for joy: for, behold, your reward is great in heaven: for in the like manner did their fathers unto the prophets.

7. यूहन्ना 17: 1-8

1     यीशु ने ये बातें कहीं और अपनी आंखे आकाश की ओर उठाकर कहा, हे पिता, वह घड़ी आ पहुंची, अपने पुत्र की महिमा कर, कि पुत्र भी तेरी महिमा करे।

2     क्योंकि तू ने उस को सब प्राणियों पर अधिकार दिया, कि जिन्हें तू ने उस को दिया है, उन सब को वह अनन्त जीवन दे।

3     और अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जाने।

4     जो काम तू ने मुझे करने को दिया था, उसे पूरा करके मैं ने पृथ्वी पर तेरी महिमा की है।

5     और अब, हे पिता, तू अपने साथ मेरी महिमा उस महिमा से कर जो जगत के होने से पहिले, मेरी तेरे साथ थी।

6     मैं ने तेरा नाम उन मनुष्यों पर प्रगट किया जिन्हें तू ने जगत में से मुझे दिया: वे तेरे थे और तू ने उन्हें मुझे दिया और उन्होंने तेरे वचन को मान लिया है।

7     अब वे जान गए हैं, कि जो कुछ तू ने मुझे दिया है, सब तेरी ओर से है।

8     क्योंकि जो बातें तू ने मुझे पहुंचा दीं, मैं ने उन्हें उन को पहुंचा दिया और उन्होंने उन को ग्रहण किया: और सच सच जान लिया है, कि मैं तेरी ओर से निकला हूं, और प्रतीति कर ली है कि तू ही ने मुझे भेजा।

7. John 17 : 1-8

1     These words spake Jesus, and lifted up his eyes to heaven, and said, Father, the hour is come; glorify thy Son, that thy Son also may glorify thee:

2     As thou hast given him power over all flesh, that he should give eternal life to as many as thou hast given him.

3     And this is life eternal, that they might know thee the only true God, and Jesus Christ, whom thou hast sent.

4     I have glorified thee on the earth: I have finished the work which thou gavest me to do.

5     And now, O Father, glorify thou me with thine own self with the glory which I had with thee before the world was.

6     I have manifested thy name unto the men which thou gavest me out of the world: thine they were, and thou gavest them me; and they have kept thy word.

7     Now they have known that all things whatsoever thou hast given me are of thee.

8     For I have given unto them the words which thou gavest me; and they have received them, and have known surely that I came out from thee, and they have believed that thou didst send me.

8. मत्ती 26: 36-44

36     तब यीशु ने अपने चेलों के साथ गतसमनी नाम एक स्थान में आया और अपने चेलों से कहने लगा कि यहीं बैठे रहना, जब तक कि मैं वहां जाकर प्रार्थना करूं।

37     और वह पतरस और जब्दी के दोनों पुत्रों को साथ ले गया, और उदास और व्याकुल होने लगा।

38     तब उस ने उन से कहा; मेरा जी बहुत उदास है, यहां तक कि मेरे प्राण निकला चाहते: तुम यहीं ठहरो, और मेरे साथ जागते रहो।

39     फिर वह थोड़ा और आगे बढ़कर मुंह के बल गिरा, और यह प्रार्थना करने लगा, कि हे मेरे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए; तौभी जैसा मैं चाहता हूं वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।

40     फिर चेलों के पास आकर उन्हें सोते पाया, और पतरस से कहा; क्या तुम मेरे साथ एक घड़ी भी न जाग सके?

41     जागते रहो, और प्रार्थना करते रहो, कि तुम परीक्षा में न पड़ो: आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है।

42     फिर उस ने दूसरी बार जाकर यह प्रार्थना की; कि हे मेरे पिता, यदि यह मेरे पीए बिना नहीं हट सकता तो तेरी इच्छा पूरी हो।

43     तब उस ने आकर उन्हें फिर सोते पाया, क्योंकि उन की आंखें नींद से भरी थीं।

44     और उन्हें छोड़कर फिर चला गया, और वही बात फिर कहकर, तीसरी बार प्रार्थना की।

8. Matthew 26 : 36-44

36     Then cometh Jesus with them unto a place called Gethsemane, and saith unto the disciples, Sit ye here, while I go and pray yonder.

37     And he took with him Peter and the two sons of Zebedee, and began to be sorrowful and very heavy.

38     Then saith he unto them, My soul is exceeding sorrowful, even unto death: tarry ye here, and watch with me.

39     And he went a little further, and fell on his face, and prayed, saying, O my Father, if it be possible, let this cup pass from me: nevertheless not as I will, but as thou wilt.

40     And he cometh unto the disciples, and findeth them asleep, and saith unto Peter, What, could ye not watch with me one hour?

41     Watch and pray, that ye enter not into temptation: the spirit indeed is willing, but the flesh is weak.

42     He went away again the second time, and prayed, saying, O my Father, if this cup may not pass away from me, except I drink it, thy will be done.

43     And he came and found them asleep again: for their eyes were heavy.

44     And he left them, and went away again, and prayed the third time, saying the same words.

9. भजन संहिता 31: 1-3, 5, 14 (मैंने भरोसा किया), 15 (से :)

1     हेयहोवा मेरा भरोसा तुझ पर है; मुझे कभी लज्जित होना न पड़े; तू अपने धर्मी होने के कारण मुझे छुड़ा ले!

2     अपना कान मेरी ओर लगाकर तुरन्त मुझे छुड़ा ले! तू मेरी दृढ़ चट्टान बन, मेरा बचाव करने का भवन बन।

3     क्योंकि तू मेरे लिये चट्टान और मेरा गढ़ है; इसलिये अपने नाम के निमित्त मेरी अगुवाई कर, और मुझे आगे ले चल।

5     मैं अपनी आत्मा को तेरे ही हाथ में सौंप देता हूं; हे यहोवा, हे सत्यवादी ईश्वर, तू ने मुझे मोल लेकर मुक्त किया है॥

14     हे यहोवा मैं ने तो तुझी पर भरोसा रखा है, मैं ने कहा, तू मेरा परमेश्वर है।

15     मेरे दिन तेरे हाथ में है।

9. Psalm 31 : 1-3, 5, 14 (I trusted), 15 (to :)

1     In thee, O Lord, do I put my trust; let me never be ashamed: deliver me in thy righteousness.

2     Bow down thine ear to me; deliver me speedily: be thou my strong rock, for an house of defence to save me.

3     For thou art my rock and my fortress; therefore for thy name’s sake lead me, and guide me.

5     Into thine hand I commit my spirit: thou hast redeemed me, O Lord God of truth.

14     I trusted in thee, O Lord: I said, Thou art my God.

15     My times are in thy hand:

10. यूहन्ना 10: 30

30     मैं और पिता एक हैं।

10. John 10 : 30

30     I and my Father are one.

11. यूहन्ना 14: 10 (पिता जो)

10     ... पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है।

11. John 14 : 10 (the Father that)

10     …the Father that dwelleth in me, he doeth the works.

12. यूहन्ना 8: 29 (वह) (से ;)

29     ... मेरा भेजनेवाला मेरे साथ है; उस ने मुझे अकेला नहीं छोड़ा।

12. John 8 : 29 (he) (to ;)

29     …he that sent me is with me: the Father hath not left me alone;



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 2 : 4 (हैं)-7

क्या प्रार्थना करने से हमें लाभ होता है? हाँ, जो इच्छा धार्मिकता की भूख की ओर ले जाती है, वह हमारे पिता का आशीर्वाद है, और यह हमारे पास व्यर्थ नहीं लौटती।

1. 2 : 4 (Are)-7

Are we benefited by praying? Yes, the desire which goes forth hungering after righteousness is blessed of our Father, and it does not return unto us void.

2. 15 : 14-24

सही प्रार्थना करने के लिए, हमें कोठरी में प्रवेश करना चाहिए और दरवाजा बंद करना चाहिए। हमें होठों को बंद करना चाहिए और भौतिक इंद्रियों को शांत करना चाहिए। गंभीर लालसाओं के शांत अभयारण्य में, हमें पाप को नकारना चाहिए और परमेश्वर की पूर्णता की याचना करनी चाहिए। हमें क्रूस को उठाने का संकल्प लेना चाहिए, और काम करने के लिए ईमानदार दिलों के साथ आगे बढ़ना चाहिए और ज्ञान, सत्य और प्रेम की तलाश करनी चाहिए। हमें "दैनिक प्रार्थना" करनी चाहिए। ऐसी प्रार्थना का उत्तर तब तक मिलता है, जब तक हम अपनी इच्छाओं को व्यवहार में लाते हैं। गुरु का आदेश है कि हम गुप्त रूप से प्रार्थना करें और अपने जीवन को अपनी ईमानदारी को प्रमाणित करने दें।

2. 15 : 14-24

In order to pray aright, we must enter into the closet and shut the door. We must close the lips and silence the material senses. In the quiet sanctuary of earnest longings, we must deny sin and plead God's allness. We must resolve to take up the cross, and go forth with honest hearts to work and watch for wisdom, Truth, and Love. We must "pray without ceasing." Such prayer is answered, in so far as we put our desires into practice. The Master's injunction is, that we pray in secret and let our lives attest our sincerity.

3. 16 : 7-11, 24-25, 27, 29, 31

हमारे मास्टर ने अपने शिष्यों को एक संक्षिप्त प्रार्थना सिखाई, जिसे हम उनके नाम प्रभु प्रार्थना के नाम से जानते हैं। हमारे गुरु ने कहा, "सो तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो", और फिर उसने वह प्रार्थना दी जो सभी मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करती है।

यहाँ मुझे यह बताने दें कि मैं प्रभु की प्रार्थना का आध्यात्मिक अर्थ क्या समझता हूँ:

हमारे पिता-माता भगवान, सभी सामंजस्यपूर्ण,

मनमोहक

तेरा राज्य आ गया; तू हमेशा मौजूद है।

3. 16 : 7-11, 24-25, 27, 29, 31

Our Master taught his disciples one brief prayer, which we name after him the Lord's Prayer. Our Master said, "After this manner therefore pray ye," and then he gave that prayer which covers all human needs.

Here let me give what I understand to be the spiritual sense of the Lord's Prayer:

Our Father-Mother God, all-harmonious,

Adorable One.

Thy kingdom is come; Thou art ever-present.

4. 17 : 2-3, 5, 7, 10-11, 14-15

जैसा कि स्वर्ग में पृथ्वी पर भी है, हमें यह जानने में सक्षम करें, कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है, सर्वोच्च है।

आज के लिए हमें अनुग्रह दें; कृपया प्रसिद्द स्नेह खिलाएँ;

और प्यार प्यार में परिलक्षित होता है;

और परमेश्वर हमें प्रलोभन में नहीं ले जाता है, बल्कि हमें पाप, बीमारी और मृत्यु से बचाता है।

क्योंकि परमेश्वर अनंत है, सर्व-शक्ति है, सभी जीवन, सत्य, प्रेम, सभी पर शासक है, और सभी में है।

4. 17 : 2-3, 5, 7, 10-11, 14-15

Enable us to know, — as in heaven, so on earth, — God is omnipotent, supreme.

Give us grace for to-day; feed the famished affections;

And Love is reflected in love;

And God leadeth us not into temptation, but delivereth us from sin, disease, and death.

For God is infinite, all-power, all Life, Truth, Love, over all, and All.

5. 10 : 1-4

प्रार्थना का अर्थ है कि हम चलने की इच्छा रखते हैं और जहाँ तक हम इसे प्राप्त करते हैं, तब तक प्रकाश में चलेंगे, भले ही खून बहते कदमों के साथ, और यह कि प्रभु पर धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते हुए, हम अपनी वास्तविक इच्छाओं को उसके द्वारा पुरस्कृत किए जाने के लिए छोड़ देंगे।

5. 10 : 1-4

Prayer means that we desire to walk and will walk in the light so far as we receive it, even though with bleeding footsteps, and that waiting patiently on the Lord, we will leave our real desires to be rewarded by Him.

6. 12 : 1-15

शास्त्र कहते हैं, "और विश्वास की प्रार्थना के द्वारा रोगी बच जाएगा"। यह उपचार प्रार्थना क्या है? केवल एक अनुरोध है कि भगवान बीमारों को चंगा करेंगे, ईश्वरीय उपस्थिति से अधिक प्राप्त करने की कोई शक्ति नहीं है जो हमेशा हाथ में है। बीमारों के लिए इस तरह की प्रार्थना का लाभकारी प्रभाव मानव मन पर होता है, जिससे यह ईश्वर में अंध विश्वास के माध्यम से शरीर पर अधिक शक्तिशाली रूप से कार्य करता है। हालाँकि, यह एक विश्वास है जो दूसरे को बाहर निकालता है, - अज्ञात में विश्वास बीमारी में विश्वास को बाहर निकालता है। यह न तो विज्ञान है और न ही सत्य जो अंध विश्वास के माध्यम से कार्य करता है, न ही यह ईश्वरीय उपचार सिद्धांत की मानवीय समझ है जैसा कि यीशु में प्रकट हुआ, जिसकी विनम्र प्रार्थनाएं सत्य के गहरे और कर्तव्यनिष्ठ विरोध थे, - ईश्वर के साथ मनुष्य की समानता और मनुष्य की एकता के साथ सत्य और प्रेम।

6. 12 : 1-15

"The prayer of faith shall save the sick," says the Scripture. What is this healing prayer? A mere request that God will heal the sick has no power to gain more of the divine presence than is always at hand. The beneficial effect of such prayer for the sick is on the human mind, making

it act more powerfully on the body through a blind faith in God. This, however, is one belief casting out another, — a belief in the unknown casting out a belief in sickness. It is neither Science nor Truth which acts through blind belief, nor is it the human understanding of the divine healing Principle as manifested in Jesus, whose humble prayers were deep and conscientious protests of Truth, — of man's likeness to God and of man's unity with Truth and Love.

7. 18 : 3-12

नासरत के यीशु ने पिता के साथ मनुष्य की एकता को सिखाया और प्रदर्शित किया, और इसके लिए हम उसे अंतहीन श्रद्धांजलि देते हैं। उनका मिशन व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों था। उन्होंने जीवन का काम न केवल स्वयं के प्रति न्याय में, बल्कि मनुष्यों पर दया करने में भी किया। यीशु ने निर्भीकता से, इंद्रियों के मान्यता प्राप्त सबूतों के खिलाफ, फरिसासिक पंथों और प्रथाओं के खिलाफ काम किया, और उन्होंने अपनी उपचार शक्ति के साथ सभी विरोधियों का खंडन किया।

7. 18 : 3-12

Jesus of Nazareth taught and demonstrated man's oneness with the Father, and for this we owe him endless homage. His mission was both individual and collective. He did life's work aright not only in justice to himself, but in mercy to mortals, — to show them how to do theirs, but not to do it for them nor to relieve them of a single responsibility. Jesus acted boldly, against the accredited evidence of the senses, against Pharisaical creeds and practices, and he refuted all opponents with his healing power.

8. 180 : 25-8

जब मनुष्य ईश्वर द्वारा शासित होता है, सभी चीजों को समझने वाला वर्तमान मन मनुष्य जानता है कि भगवान के साथ सभी चीजें संभव हैं। इस जीवित सत्य का एकमात्र तरीका, जो बीमारों को चंगा करता है, ईश्वरीय मन के विज्ञान में पाया जाता है जैसा कि मसीह यीशु ने सिखाया और प्रदर्शित किया है।

सूजन को कम करने के लिए, एक ट्यूमर को भंग करने या शारीरिक बीमारी को ठीक करने के लिए, मैंने सभी निचले उपायों की तुलना में दिव्य सत्य को अधिक शक्तिशाली पाया है। और क्यों नहीं, मन से, भगवान, सभी अस्तित्व का स्रोत और स्थिति है? यह निश्चय करने से पहले कि शरीर, पदार्थ, अव्यवस्थित है, यह पूछना चाहिए, "भला तू कौन है, जो परमेश्वर का साम्हना करता है? क्या पदार्थ अपने लिए बोल सकता है, या यह जीवन के मुद्दों को धारण करता है?" पदार्थ, जो न तो भोग सकता है और न ही आनंद ले सकता है, उसकी पीड़ा और सुख के साथ कोई साझेदारी नहीं है, लेकिन नश्वर विश्वास की ऐसी साझेदारी है।

8. 180 : 25-8

When man is governed by God, the ever-present Mind who understands all things, man knows that with God all things are possible. The only way to this living Truth, which heals the sick, is found in the Science of divine Mind as taught and demonstrated by Christ Jesus.

To reduce inflammation, dissolve a tumor, or cure organic disease, I have found divine Truth more potent than all lower remedies. And why not, since Mind, God, is the source and condition of all existence? Before deciding that the body, matter, is disordered, one should ask, "Who art thou that repliest to Spirit? Can matter speak for itself, or does it hold the issues of life?" Matter, which can neither suffer nor enjoy, has no partnership with pain and pleasure, but mortal belief has such a partnership.

9. 47 : 31-9

बगीचे में अपनी निराशा और महिमा की रात के दौरान, यीशु ने किसी भी संभावित भौतिक बुद्धि में विश्वास करने की पूरी त्रुटि को महसूस किया। उपेक्षा की वेदना और धर्मांध अज्ञानता की लाठियों ने उसे बुरी तरह सताया। उनके छात्र सो गए। उसने उनसे कहा: "क्या तुम मेरे साथ एक घड़ी भी न जाग सके?" क्या वे उसके साथ देखभाल नहीं कर सकते थे, जो प्रतीक्षा कर रहा था और आवाजहीन पीड़ा में संघर्ष कर रहा था, एक दुनिया पर बिना किसी शिकायत के पहरा दे रहा था? उस मानवीय लालसा का कोई जवाब नहीं था, और इसलिए यीशु हमेशा के लिए पृथ्वी से स्वर्ग की ओर, भावना से आत्मा की ओर मुड़ गए।

9. 47 : 31-9

During his night of gloom and glory in the garden, Jesus realized the utter error of a belief in any possible material intelligence. The pangs of neglect and the staves of bigoted ignorance smote him sorely. His students slept. He said unto them: "Could ye not watch with me one hour?" Could they not watch with him who, waiting and struggling in voiceless agony, held uncomplaining guard over a world? There was no response to that human yearning, and so Jesus turned forever away from earth to heaven, from sense to Soul.

10. 280 : 30-4

मानवीय मतों का मनोरंजन करने और विज्ञान होने को अस्वीकार करने का एकमात्र बहाना हमारी आत्मा का नश्वर अज्ञान है, - अज्ञान जो केवल दिव्य विज्ञान की समझ के लिए उपजता है, वह समझ जिसके द्वारा हम पृथ्वी पर सत्य के राज्य में प्रवेश करते हैं और सीखते हैं कि आत्मा अनंत और सर्वोच्च।

10. 280 : 30-4

The only excuse for entertaining human opinions and rejecting the Science of being is our mortal ignorance of Spirit, — ignorance which yields only to the understanding of divine Science, the understanding by which we enter into the kingdom of Truth on earth and learn that Spirit is infinite and supreme.

11. 202 : 3-5

ईश्वर और मनुष्य के बीच मौजूद वैज्ञानिक एकता को जीवन-व्यवहार में बदल देना चाहिए, और ईश्वर को सर्वव्यापी होना चाहिए।

11. 202 : 3-5

The scientific unity which exists between God and man must be wrought out in life-practice, and God's will must be universally done.

12. 368 : 14-19

प्रयास जब हम त्रुटि में होने की तुलना में अधिक विश्वास करते हैं, तो हम आत्मा में अधिक विश्वास रखते हैं, बात करने की तुलना में अधिक विश्वास करते हैं, मरने की तुलना में जीने में अधिक विश्वास करते हैं, मनुष्य की तुलना में भगवान में अधिक विश्वास करते हैं, तब कोई भी भौतिक दमन हमें बीमार होने और त्रुटि को नष्ट करने से नहीं रोक सकता।

12. 368 : 14-19

When we come to have more faith in the truth of being than we have in error, more faith in Spirit than in matter, more faith in living than in dying, more faith in God than in man, then no material suppositions can prevent us from healing the sick and destroying error.

13. 497 : 13 (हम)-19

हम यीशु के प्रायश्चित को ईश्वरीय, प्रभावशाली प्रेम के प्रमाण के रूप में स्वीकार करते हैं, मसीह यीशु के माध्यम से परमेश्वर के साथ मनुष्य की एकता को प्रकट करते हैं; और हम स्वीकार करते हैं कि मनुष्य मसीह के माध्यम से सत्य, जीवन और प्रेम के माध्यम से बचाया जाता है जैसा कि गैलीलियन पैगंबर ने बीमारों को चंगा करने और पाप और मृत्यु पर काबू पाने में दिखाया था।

13. 497 : 13 (We)-19

We acknowledge Jesus' atonement as the evidence of divine, efficacious Love, unfolding man's unity with God through Christ Jesus the Way-shower; and we acknowledge that man is saved through Christ, through Truth, Life, and Love as demonstrated by the Galilean Prophet in healing the sick and overcoming sin and death.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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