रविवार 26 अप्रैल, 2020 |

रविवार 26 अप्रैल, 2020



विषयमौत के बाद की प्रक्रिया

SubjectProbation After Death

वर्ण पाठ: भजन संहिता 17 : 15

परन्तु मैं तो धर्मी होकर तेरे मुख का दर्शन करूंगा जब मैं जानूंगा तब तेरे स्वरूप से सन्तुष्ट हूंगा॥



Golden Text: Psalm 17 : 15

As for me, I will behold thy face in righteousness: I shall be satisfied, when I awake, with thy likeness.




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इफिसियों 4 : 1-3, 13, 22-24 • इफिसियों 5: 14


1     सो मैं जो प्रभु में बन्धुआ हूं तुम से बिनती करता हूं, कि जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए थे, उसके योग्य चाल चलो।

2     अर्थात सारी दीनता और नम्रता सहित, और धीरज धरकर प्रेम से एक दूसरे की सह लो।

3     और मेल के बन्ध में आत्मा की एकता रखने का यत्न करो।

13     जब तक कि हम सब के सब विश्वास, और परमेश्वर के पुत्र की पहिचान में एक न हो जाएं, और एक सिद्ध मनुष्य न बन जाएं और मसीह के पूरे डील डौल तक न बढ़ जाएं।

22     कि तुम अगले चालचलन के पुराने मनुष्यत्व को जो भरमाने वाली अभिलाषाओं के अनुसार भ्रष्ट होता जाता है, उतार डालो।

23     और अपने मन के आत्मिक स्वभाव में नये बनते जाओ।

24     और नये मनुष्यत्व को पहिन लो, जो परमेश्वर के अनुसार सत्य की धामिर्कता, और पवित्रता में सृजा गया है॥

14     इस कारण वह कहता है, हे सोने वाले जाग और मुर्दों में से जी उठ; तो मसीह की ज्योति तुझ पर चमकेगी॥

Responsive Reading: Ephesians 4 : 1-3, 13, 22-24 • Ephesians 5 : 14

1.     I therefore, the prisoner of the Lord, beseech you that ye walk worthy of the vocation wherewith ye are called,

2.     With all lowliness and meekness, with longsuffering, forbearing one another in love;

3.     Endeavoring to keep the unity of the Spirit in the bond of peace.

13.     Till we all come in the unity of the faith, and of the knowledge of the Son of God, unto a perfect man, unto the measure of the stature of the fulness of Christ:

22.     That ye put off concerning the former conversation the old man, which is corrupt according to the deceitful lusts;

23.     And be renewed in the spirit of your mind;

24.     And that ye put on the new man, which after God is created in righteousness and true holiness.

14.     Wherefore he saith, Awake thou that sleepest, and arise from the dead, and Christ shall give thee light.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 23 : 1, 4, 6

1     यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी।

4     चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूं, तौभी हानि से न डरूंगा, क्योंकि तू मेरे साथ रहता है; तेरे सोंटे और तेरी लाठी से मुझे शान्ति मिलती है॥

6     निश्चय भलाई और करूणा जीवन भर मेरे साथ साथ बनी रहेंगी; और मैं यहोवा के धाम में सर्वदा वास करूंगा॥

1. Psalm 23 : 1, 4, 6

1     The Lord is my shepherd; I shall not want.

4     Yea, though I walk through the valley of the shadow of death, I will fear no evil: for thou art with me; thy rod and thy staff they comfort me.

6     Surely goodness and mercy shall follow me all the days of my life: and I will dwell in the house of the Lord for ever.

2. यूहन्ना 6 : 1 (यीशु)

1     इन बातों के बाद यीशु गलील की झील अर्थात तिबिरियास की झील के पास गया।

2. John 6 : 1 (Jesus)

1     Jesus went over the sea of Galilee, which is the sea of Tiberias.

3. यूहन्ना 11 : 1, 3, 4, 7, 11 (हमारी)-14, 17, 21-26 (से .), 32-34, 38-44

1     मरियम और उस की बहिन मारथा के गांव बैतनिय्याह का लाजर नाम एक मनुष्य बीमार था।

3     सो उस की बहिनों ने उसे कहला भेजा, कि हे प्रभु, देख, जिस से तू प्रीति रखता है, वह बीमार है।

4     यह सुनकर यीशु ने कहा, यह बीमारी मृत्यु की नहीं, परन्तु परमेश्वर की महिमा के लिये है, कि उसके द्वारा परमेश्वर के पुत्र की महिमा हो।

7     फिर इस के बाद उस ने चेलों से कहा, कि आओ, हम फिर यहूदिया को चलें।

11     उस ने ये बातें कहीं, और इस के बाद उन से कहने लगा, कि हमारा मित्र लाजर सो गया है, परन्तु मैं उसे जगाने जाता हूं।

12     तब चेलों ने उस से कहा, हे प्रभु, यदि वह सो गया है, तो बच जाएगा।

13     यीशु ने तो उस की मृत्यु के विषय में कहा था: परन्तु वे समझे कि उस ने नींद से सो जाने के विषय में कहा।

14     तब यीशु ने उन से साफ कह दिया, कि लाजर मर गया है।

17     सो यीशु को आकर यह मालूम हुआ कि उसे कब्र में रखे चार दिन हो चुके हैं।

21     मारथा ने यीशु से कहा, हे प्रभु, यदि तू यहां होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता।

22     और अब भी मैं जानती हूं, कि जो कुछ तू परमेश्वर से मांगेगा, परमेश्वर तुझे देगा।

23     यीशु ने उस से कहा, तेरा भाई जी उठेगा।

24     मारथा ने उस से कहा, मैं जानती हूं, कि अन्तिम दिन में पुनरुत्थान के समय वह जी उठेगा।

25     यीशु ने उस से कहा, पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूं, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा।

26     और जो कोई जीवता है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा।

32     जब मरियम वहां पहुंची जहां यीशु था, तो उसे देखते ही उसके पांवों पर गिर के कहा, हे प्रभु, यदि तू यहां होता तो मेरा भाई न मरता।

33     जब यीशु न उस को और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास हुआ, और घबरा कर कहा, तुम ने उसे कहां रखा है?

34     उन्होंने उस से कहा, हे प्रभु, चलकर देख ले।

38     यीशु मन में फिर बहुत ही उदास होकर कब्र पर आया, वह एक गुफा थी, और एक पत्थर उस पर धरा था।

39     यीशु ने कहा; पत्थर को उठाओ: उस मरे हुए की बहिन मारथा उस से कहने लगी, हे प्रभु, उस में से अब तो र्दुगंध आती है क्योंकि उसे मरे चार दिन हो गए।

40     यीशु ने उस से कहा, क्या मैं ने तुझ से न कहा था कि यदि तू विश्वास करेगी, तो परमेश्वर की महिमा को देखेगी।

41     तब उन्होंने उस पत्थर को हटाया, फिर यीशु ने आंखें उठाकर कहा, हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं कि तू ने मेरी सुन ली है।

42     और मै जानता था, कि तू सदा मेरी सुनता है, परन्तु जो भीड़ आस पास खड़ी है, उन के कारण मैं ने यह कहा, जिस से कि वे विश्वास करें, कि तू ने मुझे भेजा है।

43     यह कहकर उस ने बड़े शब्द से पुकारा, कि हे लाजर, निकल आ।

44     जो मर गया था, वह कफन से हाथ पांव बन्धे हुए निकल आया और उसका मुंह अंगोछे से लिपटा हुआ तें यीशु ने उन से कहा, उसे खोलकर जाने दो॥

3. John 11 : 1, 3, 4, 7, 11 (Our)-14, 17, 21-26 (to .), 32-34, 38-44

1     Now a certain man was sick, named Lazarus, of Bethany, the town of Mary and her sister Martha.

3     Therefore his sisters sent unto him, saying, Lord, behold, he whom thou lovest is sick.

4     When Jesus heard that, he said, This sickness is not unto death, but for the glory of God, that the Son of God might be glorified thereby.

7     Then after that saith he to his disciples, Let us go into Judæa again.

11     Our friend Lazarus sleepeth; but I go, that I may awake him out of sleep.

12     Then said his disciples, Lord, if he sleep, he shall do well.

13     Howbeit Jesus spake of his death: but they thought that he had spoken of taking of rest in sleep.

14     Then said Jesus unto them plainly, Lazarus is dead.

17     Then when Jesus came, he found that he had lain in the grave four days already.

21     Then said Martha unto Jesus, Lord, if thou hadst been here, my brother had not died.

22     But I know, that even now, whatsoever thou wilt ask of God, God will give it thee.

23     Jesus saith unto her, Thy brother shall rise again.

24     Martha saith unto him, I know that he shall rise again in the resurrection at the last day.

25     Jesus said unto her, I am the resurrection, and the life: he that believeth in me, though he were dead, yet shall he live:

26     And whosoever liveth and believeth in me shall never die.

32     Then when Mary was come where Jesus was, and saw him, she fell down at his feet, saying unto him, Lord, if thou hadst been here, my brother had not died.

33     When Jesus therefore saw her weeping, and the Jews also weeping which came with her, he groaned in the spirit, and was troubled,

34     And said, Where have ye laid him? They said unto him, Lord, come and see.

38     Jesus therefore again groaning in himself cometh to the grave. It was a cave, and a stone lay upon it.

39     Jesus said, Take ye away the stone. Martha, the sister of him that was dead, saith unto him, Lord, by this time he stinketh: for he hath been dead four days.

40     Jesus saith unto her, Said I not unto thee, that, if thou wouldest believe, thou shouldest see the glory of God?

41     Then they took away the stone from the place where the dead was laid. And Jesus lifted up his eyes, and said, Father, I thank thee that thou hast heard me.

42     And I knew that thou hearest me always: but because of the people which stand by I said it, that they may believe that thou hast sent me.

43     And when he thus had spoken, he cried with a loud voice, Lazarus, come forth.

44     And he that was dead came forth, bound hand and foot with graveclothes: and his face was bound about with a napkin. Jesus saith unto them, Loose him, and let him go.

4. यूहन्ना 5 : 24

24     मैं तुम से सच सच कहता हूं, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले की प्रतीति करता है, अनन्त जीवन उसका है, और उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।

4. John 5 : 24

24     Verily, verily, I say unto you, He that heareth my word, and believeth on him that sent me, hath everlasting life, and shall not come into condemnation; but is passed from death unto life.

5. I कुरिन्थियों 15 : 51-54

51     देखे, मैं तुम से भेद की बात कहता हूं: कि हम सब तो नहीं सोएंगे, परन्तु सब बदल जाएंगे।

52     और यह क्षण भर में, पलक मारते ही पिछली तुरही फूंकते ही होगा: क्योंकि तुरही फूंकी जाएगी और मुर्दे अविनाशी दशा में उठाए जांएगे, और हम बदल जाएंगे।

53     क्योंकि अवश्य है, कि यह नाशमान देह अविनाश को पहिन ले, और यह मरनहार देह अमरता को पहिन ले।

54     और जब यह नाशमान अविनाश को पहिन लेगा, और यह मरनहार अमरता को पहिन लेगा, तक वह वचन जो लिखा है, पूरा हो जाएगा, कि जय ने मृत्यु को निगल लिया।

5. I Corinthians 15 : 51-54

51     Behold, I shew you a mystery; We shall not all sleep, but we shall all be changed,

52     In a moment, in the twinkling of an eye, at the last trump: for the trumpet shall sound, and the dead shall be raised incorruptible, and we shall be changed.

53     For this corruptible must put on incorruption, and this mortal must put on immortality.

54     So when this corruptible shall have put on incorruption, and this mortal shall have put on immortality, then shall be brought to pass the saying that is written, Death is swallowed up in victory.

6. रोमियो 13 : 11 (अब इसे)

11     ... तुम्हारे लिये नींद से जाग उठने की घड़ी आ पहुंची है, क्योंकि जिस समय हम ने विश्वास किया था, उस समय के विचार से अब हमारा उद्धार निकट है।

6. Romans 13 : 11 (now it)

11     …now it is high time to awake out of sleep: for now is our salvation nearer than when we believed.

7. कुलुस्सियों 3 : 1-4

1     सो जब तुम मसीह के साथ जिलाए गए, तो स्वर्गीय वस्तुओं की खोज में रहो, जहां मसीह वर्तमान है और परमेश्वर के दाहिनी ओर बैठा है।

2     पृथ्वी पर की नहीं परन्तु स्वर्गीय वस्तुओं पर ध्यान लगाओ।

3     क्योंकि तुम तो मर गए, और तुम्हारा जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा हुआ है।

4     जब मसीह जो हमारा जीवन है, प्रगट होगा, तब तुम भी उसके साथ महिमा सहित प्रगट किए जाओगे।

7. Colossians 3 : 1-4

1     If ye then be risen with Christ, seek those things which are above, where Christ sitteth on the right hand of God.

2     Set your affection on things above, not on things on the earth.

3     For ye are dead, and your life is hid with Christ in God.

4     When Christ, who is our life, shall appear, then shall ye also appear with him in glory.

8. I पतरस 1 : 3-5, 23

3     हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद दो, जिस ने यीशु मसीह के हुओं में से जी उठने के द्वारा, अपनी बड़ी दया से हमें जीवित आशा के लिये नया जन्म दिया।

4     अर्थात एक अविनाशी और निर्मल, और अजर मीरास के लिये।

5     जो तुम्हारे लिये स्वर्ग में रखी है, जिन की रक्षा परमेश्वर की सामर्थ से, विश्वास के द्वारा उस उद्धार के लिये, जो आने वाले समय में प्रगट होने वाली है, की जाती है।

23     क्योंकि तुम ने नाशमान नहीं पर अविनाशी बीज से परमेश्वर के जीवते और सदा ठहरने वाले वचन के द्वारा नया जन्म पाया है।

8. I Peter 1 : 3-5, 23

3     Blessed be the God and Father of our Lord Jesus Christ, which according to his abundant mercy hath begotten us again unto a lively hope by the resurrection of Jesus Christ from the dead,

4     To an inheritance incorruptible, and undefiled, and that fadeth not away, reserved in heaven for you,

5     Who are kept by the power of God through faith unto salvation ready to be revealed in the last time.

23     Being born again, not of corruptible seed, but of incorruptible, by the word of God, which liveth and abideth for ever.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 410 : 4-7

"यह जीवन अनन्त है," यीशु कहते हैं, - है, नहीं होगा; और फिर वह अपने पिता और स्वयं के वर्तमान ज्ञान के रूप में अनन्त जीवन को परिभाषित करता है, - जिसका अर्थ है प्रेम, सत्य और जीवन का ज्ञान।

1. 410 : 4-7

"This is life eternal," says Jesus, — is, not shall be; and then he defines everlasting life as a present knowledge of his Father and of himself, — the knowledge of Love, Truth, and Life.

2. 242 : 9-14

स्वर्ग का एक ही रास्ता है सद्भाव, और ईश्वरीय विज्ञान में मसीह हमें यह रास्ता दिखाता है। यह कोई अन्य वास्तविकता नहीं है - जीवन की कोई अन्य चेतना नहीं है - अच्छा, ईश्वर और उसका प्रतिबिंब, और इंद्रियों के तथाकथित दर्द और आनंद से बेहतर उठना।

2. 242 : 9-14

There is but one way to heaven, harmony, and Christ in divine Science shows us this way. It is to know no other reality — to have no other consciousness of life — than good, God and His reflection, and to rise superior to the so-called pain and pleasure of the senses.

3. 587 : 25-27

स्वर्ग। सद्भाव; आत्मा का शासन; दिव्य सिद्धांत द्वारा सरकार; आध्यात्मिकता; आनंद; आत्मा का वातावरण।

3. 587 : 25-27

Heaven. Harmony; the reign of Spirit; government by divine Principle; spirituality; bliss; the atmosphere of Soul.

4. 266 : 20-21

पापी बुराई करके अपना नरक बनाता है, और अच्छाई करने से पवित्र आदमी अपना स्वर्ग बनाता है।

4. 266 : 20-21

The sinner makes his own hell by doing evil, and the saint his own heaven by doing right.

5. 6 : 14-16

स्वर्ग तक पहुँचने के लिए, हम होने के दिव्य सिद्धांत को समझना चाहिए।

5. 6 : 14-16

To reach heaven, the harmony of being, we must understand the divine Principle of being.

6. 568 : 30-5

स्व-उन्मूलन क्रायश्चियन साइंस में एक नियम है, जिसके द्वारा त्रुटि के खिलाफ हमारे युद्ध में हम सच्चाई या मसीह के लिए सब कुछ छोड़ देते हैं। यह नियम स्पष्ट रूप से ईश्वर को ईश्वरीय सिद्धांत के रूप में व्याख्या करता है, - जीवन के रूप में, पिता द्वारा दर्शाया गया; सत्य के रूप में, पुत्र द्वारा प्रतिनिधित्व; प्यार से, माँ द्वारा प्रतिनिधित्व किया। किसी न किसी अवधि में, यहाँ या उसके बाद, प्रत्येक नश्वर को भगवान के विपरीत एक शक्ति में नश्वर विश्वास के साथ जूझना चाहिए।

6. 568 : 30-5

Self-abnegation, by which we lay down all for Truth, or Christ, in our warfare against error, is a rule in Christian Science. This rule clearly interprets God as divine Principle, — as Life, represented by the Father; as Truth, represented by the Son; as Love, represented by the Mother. Every mortal at some period, here or hereafter, must grapple with and overcome the mortal belief in a power opposed to God.

7. 290 : 3-10, 16-25

यदि मृत्यु के पहले मनुष्य के अस्तित्व का सिद्धांत, नियम और प्रदर्शन कम से कम समझ में नहीं आता है, तो वे उस एकल अनुभव के कारण अस्तित्व के पैमाने पर आध्यात्मिक रूप से कोई ऊंचा नहीं उठेंगे, लेकिन संक्रमण के पहले की तरह ही रहेंगे। अभी भी जीवन की एक आध्यात्मिक भावना के बजाय, और स्वार्थी और हीन उद्देश्यों से, एक सामग्री के माध्यम से खुशी की तलाश है।

यदि मृत्यु नामक परिवर्तन पाप, बीमारी और मृत्यु में विश्वास को नष्ट कर देता है, तो विघटन के क्षण में खुशी जीत जाएगी, और हमेशा के लिए स्थायी हो जाएगी; लेकिन यह ऐसा नहीं है। पूर्णता से ही पूर्णता प्राप्त होती है। जो लोग अधर्मी हैं वे अभी भी अधर्मी होंगे, जब तक कि दिव्य विज्ञान में क्राइस्ट, सत्य, सभी अज्ञान और पाप को हटा नहीं देते हैं।

वह पाप और त्रुटि जो हमें मृत्यु के तुरंत बाद प्राप्त होती है, उस क्षण में समाप्त नहीं होती है, लेकिन इन त्रुटियों की मृत्यु तक होती है।

7. 290 : 3-10, 16-25

If the Principle, rule, and demonstration of man's being are not in the least understood before what is termed death overtakes mortals, they will rise no higher spiritually in the scale of existence on account of that single experience, but will remain as material as before the transition, still seeking happiness through a material, instead of through a spiritual sense of life, and from selfish and inferior motives.

If the change called death destroyed the belief in sin, sickness, and death, happiness would be won at the moment of dissolution, and be forever permanent; but this is not so. Perfection is gained only by perfection. They who are unrighteous shall be unrighteous still, until in divine Science Christ, Truth, removes all ignorance and sin.

The sin and error which possess us at the instant of death do not cease at that moment, but endure until the death of these errors.

8. 291 : 5-18, 28-31

हम जानते हैं कि सब बदल जाएगा "एक पल में," जब आखिरी तुरही ध्वनि होगी; लेकिन ज्ञान का यह अंतिम निमंत्रण तब तक नहीं आ सकता जब तक कि ईसाई चरित्र की वृद्धि में प्रत्येक कम आमंत्रण के लिए नश्वर न हो गए हों। मनुष्यों को यह कल्पना करने की आवश्यकता नहीं है कि मृत्यु के अनुभव में विश्वास उन्हें महिमा प्रदान करेगा।

सार्वभौमिक मुक्ति प्रगति और परिवीक्षा पर टिकी हुई है, और उनके बिना अप्राप्य है। स्वर्ग एक स्थानीयता नहीं है, बल्कि मन की एक दिव्य स्थिति है जिसमें मन की सभी अभिव्यक्तियाँ सामंजस्यपूर्ण और अमर हैं, क्योंकि पाप नहीं है और मनुष्य अपने स्वयं के धार्मिकता नहीं पा रहा है, लेकिन "प्रभु के मन" , "जैसा कि शास्त्र कहता है।

कोई भी अंतिम निर्णय नश्वर की प्रतीक्षा नहीं करता है, क्योंकि ज्ञान का निर्णय दिन प्रति घंटा और लगातार आता है, यहां तक कि वह निर्णय जिसके द्वारा नश्वर मनुष्य को सभी भौतिक त्रुटि से विभाजित किया जाता है।

8. 291 : 5-18, 28-31

We know that all will be changed "in the twinkling of an eye," when the last trump shall sound; but this last call of wisdom cannot come till mortals have already yielded to each lesser call in the growth of Christian character. Mortals need not fancy that belief in the experience of death will awaken them to glorified being.

Universal salvation rests on progression and probation, and is unattainable without them. Heaven is not a locality, but a divine state of Mind in which all the manifestations of Mind are harmonious and immortal, because sin is not there and man is found having no righteousness of his own, but in possession of "the mind of the Lord," as the Scripture says.

No final judgment awaits mortals, for the judgment-day of wisdom comes hourly and continually, even the judgment by which mortal man is divested of all material error.

9. 36 : 21-29

पापियों के लिए कब्र के इस तरफ अपनी पूरी सज़ा प्राप्त करना उतना ही असंभव है जितना कि इस दुनिया को उनके पूर्ण प्रतिफल के लिए पुण्य देना। यह मान लेना बेकार है कि दुष्ट अपने अपराधों पर अंतिम क्षण तक खुश हो सकता है और फिर अचानक क्षमा कर दिया जाता है और स्वर्ग में धकेल दिया जाता है, या यह कि प्रेम का हाथ हमें केवल संघर्ष, बलिदान, परिश्रम, बहुउद्देश्यीय परीक्षण देने के लिए संतुष्ट है।

9. 36 : 21-29

It is quite as impossible for sinners to receive their full punishment this side of the grave as for this world to bestow on the righteous their full reward. It is useless to suppose that the wicked can gloat over their offences to the last moment and then be suddenly pardoned and pushed into heaven, or that the hand of Love is satisfied with giving us only toil, sacrifice, cross-bearing, multiplied trials, and mockery of our motives in return for our efforts at well doing.

10. 75 : 12-20

यीशु ने लाजर के बारे में कहा: "कि हमारा मित्र लाजर सो गया है, परन्तु मैं उसे जगाने जाता हूं।" यीशु ने लाजर को इस समझ के साथ बहाल किया कि लाजर की मृत्यु कभी नहीं हुई थी, न कि इस बात से कि उसका शरीर मर गया था और फिर दोबारा जीवित हो गया था। अगर यीशु का मानना था कि लाजर उसके शरीर में रहता या मर गया है, तो मास्टर विश्वास के उसी तल पर खड़े होते थे, जो शरीर को दफनाते थे, और वे इसे पुनर्जीवित नहीं कर सकते थे।

10. 75 : 12-20

Jesus said of Lazarus: "Our friend Lazarus sleepeth; but I go, that I may awake him out of sleep." Jesus restored Lazarus by the understanding that Lazarus had never died, not by an admission that his body had died and then lived again. Had Jesus believed that Lazarus had lived or died in his body, the Master would have stood on the same plane of belief as those who buried the body, and he could not have resuscitated it.

11. 46 : 20-29

यीशु की मृत्यु के बाद लगने वाली शारीरिक स्थिति सभी भौतिक स्थितियों से ऊपर होने के कारण उसकी मृत्यु हो गई, और इस अतिशयोक्ति ने उसके उदगम की व्याख्या की, और कब्र से परे एक परिवीक्षाधीन और प्रगतिशील राज्य का खुलासा किया। यीशु "रास्ता" था इसका मतलब है, उसने सभी पुरुषों के लिए रास्ता चिह्नित किया। अपने अंतिम प्रदर्शन में, स्वर्गारोहण कहा जाता है, जिसने यीशु के सांसारिक रिकॉर्ड को बंद कर दिया, वह अपने शिष्यों के भौतिक ज्ञान से ऊपर उठ गया, और भौतिक इंद्रियों ने उसे नहीं देखा।

11. 46 : 20-29

Jesus' unchanged physical condition after what seemed to be death was followed by his exaltation above all material conditions; and this exaltation explained his ascension, and revealed unmistakably a probationary and progressive state beyond the grave. Jesus was "the way;" that is, he marked the way for all men. In his final demonstration, called the ascension, which closed the earthly record of Jesus, he rose above the physical knowledge of his disciples, and the material senses saw him no more.

12. 76 : 6-21

जब समझा जाएगा, तो जीवन को न तो भौतिक और न ही परिमित, बल्कि अनंत के रूप में पहचाना जाएगा; और यह विश्वास कि जीवन, या मन, कभी भी एक सीमित रूप में था, या बुराई में अच्छा था, नष्ट हो जाएगा। तब यह समझा जाएगा कि आत्मा ने कभी पदार्थ में प्रवेश नहीं किया था और इसलिए पदार्थ से कभी नहीं उठी। जब आध्यात्मिक और भगवान की समझ के लिए उन्नत, आदमी अब बात के साथ कम्यून नहीं हो सकता; न तो वह उसके पास लौट सकता है, न किसी पेड़ से ज्यादा उसके बीज पर लौट सकता है। न तो मनुष्य को शिरोमणि प्रतीत होगा, लेकिन वह एक व्यक्तिगत चेतना होगी, जिसे दिव्य आत्मा द्वारा विचार के रूप में चित्रित किया जाएगा, कोई फर्क नहीं पड़ता।

दुख, पाप, मरते विश्वास असत्य हैं। जब दैवीय विज्ञान को सार्वभौमिक रूप से समझा जाता है, तो उनके पास मनुष्य पर कोई शक्ति नहीं होगी, क्योंकि मनुष्य अमर है और दिव्य अधिकार से जीवित है।

12. 76 : 6-21

When being is understood, Life will be recognized as neither material nor finite, but as infinite, — as God, universal good; and the belief that life, or mind, was ever in a finite form, or good in evil, will be destroyed. Then it will be understood that Spirit never entered matter and was therefore never raised from matter. When advanced to spiritual being and the understanding of God, man can no longer commune with matter; neither can he return to it, any more than a tree can return to its seed. Neither will man seem to be corporeal, but he will be an individual consciousness, characterized by the divine Spirit as idea, not matter.

Suffering, sinning, dying beliefs are unreal. When divine Science is universally understood, they will have no power over man, for man is immortal and lives by divine authority.

13. 254 : 16-23

कामुक युगों के दौरान, पूर्ण क्रिश्चियन साइंस को मृत्यु नामक परिवर्तन से पहले प्राप्त नहीं किया जा सकता है, क्योंकि हमारे पास वह शक्ति नहीं है जो हम नहीं समझते हैं। लेकिन मानव स्वयं को प्रचारित करना चाहिए। यह कार्य ईश्वर हमें आज प्रेमपूर्वक स्वीकार करने के लिए, और इतनी तेजी से व्यावहारिक सामग्री को छोड़ने के लिए, और आध्यात्मिक कार्य करने के लिए कहता है जो बाहरी और वास्तविक को निर्धारित करता है।

13. 254 : 16-23

During the sensual ages, absolute Christian Science may not be achieved prior to the change called death, for we have not the power to demonstrate what we do not understand. But the human self must be evangelized. This task God demands us to accept lovingly to-day, and to abandon so fast as practical the material, and to work out the spiritual which determines the outward and actual.

14. 264 : 28-31

जब हम क्रिश्चियन साइंस में रास्ता सीखते हैं और मनुष्य के आध्यात्मिक होने को पहचानते हैं, तो हम भगवान की रचना को समझेंगे और समझेंगे, - पृथ्वी और स्वर्ग और मनुष्य की सभी महिमा।

14. 264 : 28-31

When we learn the way in Christian Science and recognize man's spiritual being, we shall behold and understand God's creation, — all the glories of earth and heaven and man.

15. 548 : 15-17

यह प्रति घंटा चलने वाला नया जन्म है, जिसके द्वारा पुरुष स्वर्गदूतों, ईश्वर के सच्चे विचारों, होने की आध्यात्मिक भावना का मनोरंजन कर सकते हैं।

15. 548 : 15-17

This is the new birth going on hourly, by which men may entertain angels, the true ideas of God, the spiritual sense of being.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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