रविवार 25 फ़रवरी, 2024



विषयमन

SubjectMind

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: रोमियो 15: 6

"एक मन और एक मुंह होकर हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता परमेश्वर की बड़ाई करो।"



Golden Text: Romans 15 : 6

With one mind and one mouth glorify God, even the Father of our Lord Jesus Christ.




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उत्तरदायी अध्ययन: यशायाह 55: 3, 6-12


3     कान लगाओ, और मेरे पास आओ; सुनो, तब तुम जीवित रहोगे; और मैं तुम्हारे साथ सदा की वाचा बान्धूंगा अर्थात दाऊद पर की अटल करूणा की वाचा।

6     जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो, जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो.

7     दुष्ट अपनी चालचलन और अनर्थकारी अपने सोच विचार छोड़कर यहोवा ही की ओर फिरे, वह उस पर दया करेगा, वह हमारे परमेश्वर की ओर फिरे और वह पूरी रीति से उसको क्षमा करेगा।

8     क्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं है, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है।

9     क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है॥

10     जिस प्रकार से वर्षा और हिम आकाश से गिरते हैं और वहां यों ही लौट नहीं जाते, वरन भूमि पर पड़कर उपज उपजाते हैं जिस से बोने वाले को बीज और खाने वाले को रोटी मिलती है,

11     उसी प्रकार से मेरा वचन भी होगा जो मेरे मुख से निकलता है; वह व्यर्थ ठहरकर मेरे पास न लौटेगा, परन्तु, जो मेरी इच्छा है उसे वह पूरा करेगा, और जिस काम के लिये मैं ने उसको भेजा है उसे वह सफल करेगा॥

12     क्योंकि तुम आनन्द के साथ निकलोगे, और शान्ति के साथ पहुंचाए जाओगे।

Responsive Reading: Isaiah 55 : 3, 6-12

3.     Incline your ear, and come unto me: hear, and your soul shall live; and I will make an everlasting covenant with you.

6.     Seek ye the Lord while he may be found, call ye upon him while he is near:

7.     Let the wicked forsake his way, and the unrighteous man his thoughts: and let him return unto the Lord, and he will have mercy upon him; and to our God, for he will abundantly pardon.

8.     For my thoughts are not your thoughts, neither are your ways my ways, saith the Lord.

9.     For as the heavens are higher than the earth, so are my ways higher than your ways, and my thoughts than your thoughts.

10.     For as the rain cometh down, and the snow from heaven, and returneth not thither, but watereth the earth, and maketh it bring forth and bud, that it may give seed to the sower, and bread to the eater:

11.     So shall my word be that goeth forth out of my mouth: it shall not return unto me void, but it shall accomplish that which I please, and it shall prosper in the thing whereto I sent it.

12.     For ye shall go out with joy, and be led forth with peace.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. मत्ती 4: 23

23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

1. Matthew 4 : 23

23     And Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing all manner of sickness and all manner of disease among the people.

2. मत्ती 5: 2

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

2. Matthew 5 : 2

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

3. मत्ती 6: 8 (तुम्हारा), 33

8     ... तुम्हारा पिता तुम्हारे मांगने से पहिले ही जानता है, कि तुम्हारी क्या क्या आवश्यक्ता है।

33     इसलिये पहिले तुम उसे राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी।

3. Matthew 6 : 8 (your), 33

8     ...your Father knoweth what things ye have need of, before ye ask him.

33     But seek ye first the kingdom of God, and his righteousness; and all these things shall be added unto you.

4. मत्ती 9: 3, 4

3     और देखो, कई शास्त्रियों ने सोचा, कि यह तो परमेश्वर की निन्दा करता है।

4     यीशु ने उन के मन की बातें मालूम करके कहा, कि तुम लोग अपने अपने मन में बुरा विचार क्यों कर रहे हो?

4. Matthew 9 : 3, 4

3     And, behold, certain of the scribes said within themselves, This man blasphemeth.

4     And Jesus knowing their thoughts said, Wherefore think ye evil in your hearts?

5. मत्ती 12: 22-26, 28

22     तब लोग एक अन्धे-गूंगे को जिस में दुष्टात्मा थी, उसके पास लाए; और उस ने उसे अच्छा किया; और वह गूंगा बोलने और देखने लगा।

23     इस पर सब लोग चकित होकर कहने लगे, यह क्या दाऊद की सन्तान का है?

24     परन्तु फरीसियों ने यह सुनकर कहा, यह तो दुष्टात्माओं के सरदार शैतान की सहायता के बिना दुष्टात्माओं को नहीं निकालता।

25     उस ने उन के मन की बात जानकर उन से कहा; जिस किसी राज्य में फूट होती है, वह उजड़ जाता है, और कोई नगर या घराना जिस में फूट होती है, बना न रहेगा।

26     और यदि शैतान ही शैतान को निकाले, तो वह अपना ही विरोधी हो गया है; फिर उसका राज्य क्योंकर बना रहेगा?

28     पर यदि मैं परमेश्वर के आत्मा की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता हूं, तो परमेश्वर का राज्य तुम्हारे पास आ पहुंचा है।

5. Matthew 12 : 22-26, 28

22     Then was brought unto him one possessed with a devil, blind, and dumb: and he healed him, insomuch that the blind and dumb both spake and saw.

23     And all the people were amazed, and said, Is not this the son of David?

24     But when the Pharisees heard it, they said, This fellow doth not cast out devils, but by Beelzebub the prince of the devils.

25     And Jesus knew their thoughts, and said unto them, Every kingdom divided against itself is brought to desolation; and every city or house divided against itself shall not stand:

26     And if Satan cast out Satan, he is divided against himself; how shall then his kingdom stand?

28     But if I cast out devils by the Spirit of God, then the kingdom of God is come unto you.

6. लूका 5: 18 (से:), 20-25

18     और देखो कई लोग एक मनुष्य को जो झोले का मारा हुआ था, खाट पर लाए, और वे उसे भीतर ले जाने और यीशु के साम्हने रखने का उपाय ढूंढ़ रहे थे।

20     उस ने उन का विश्वास देखकर उस से कहा; हे मनुष्य, तेरे पाप क्षमा हुए।

21     तब शास्त्री और फरीसी विवाद करने लगे, कि यह कौन है, जो परमेश्वर की निन्दा करता है? परमेश्वर का छोड़ कौन पापों की क्षमा कर सकता है?

22     यीशु ने उन के मन की बातें जानकर, उन से कहा कि तुम अपने मनों में क्या विवाद कर रहे हो?

23     सहज क्या है? क्या यह कहना, कि तेरे पाप क्षमा हुए, या यह कहना कि उठ, और चल फिर?

24     परन्तु इसलिये कि तुम जानो कि मनुष्य के पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का भी अधिकार है (उस ने उस झोले के मारे हुए से कहा), मैं तुझ से कहता हूं, उठ और अपनी खाट उठाकर अपने घर चला जा।

25     वह तुरन्त उन के साम्हने उठा, और जिस पर वह पड़ा था उसे उठाकर, परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ अपने घर चला गया।

6. Luke 5 : 18 (to :), 20-25

18     And, behold, men brought in a bed a man which was taken with a palsy:

20     And when he saw their faith, he said unto him, Man, thy sins are forgiven thee.

21     And the scribes and the Pharisees began to reason, saying, Who is this which speaketh blasphemies? Who can forgive sins, but God alone?

22     But when Jesus perceived their thoughts, he answering said unto them, What reason ye in your hearts?

23     Whether is easier, to say, Thy sins be forgiven thee; or to say, Rise up and walk?

24     But that ye may know that the Son of man hath power upon earth to forgive sins, (he said unto the sick of the palsy,) I say unto thee, Arise, and take up thy couch, and go into thine house.

25     And immediately he rose up before them, and took up that whereon he lay, and departed to his own house, glorifying God.

7. यूहन्ना 4: 1, 3, 4, 6 (से:), 7, 9-21, 23-26

1     फिर जब प्रभु को मालूम हुआ, कि फरीसियों ने सुना है, कि यीशु यूहन्ना से अधिक चेले बनाता, और उन्हें बपतिस्मा देता है।

3     तब यहूदिया को छोड़कर फिर गलील को चला गया।

4     और उस को सामरिया से होकर जाना अवश्य था।

6     और याकूब का कूआं भी वहीं था; सो यीशु मार्ग का थका हुआ उस कूएं पर यों ही बैठ गया, और यह बात छठे घण्टे के लगभग हुई।

7     इतने में एक सामरी स्त्री जल भरने को आई: यीशु ने उस से कहा, मुझे पानी पिला।

9     उस सामरी स्त्री ने उस से कहा, तू यहूदी होकर मुझ सामरी स्त्री से पानी क्यों मांगता है? (क्योंकि यहूदी सामरियों के साथ किसी प्रकार का व्यवहार नहीं रखते) ।

10     यीशु ने उत्तर दिया, यदि तू परमेश्वर के वरदान को जानती, और यह भी जानती कि वह कौन है जो तुझ से कहता है; मुझे पानी पिला तो तू उस से मांगती, और वह तुझे जीवन का जल देता।

11     स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, तेरे पास जल भरने को तो कुछ है भी नहीं, और कूआं गहिरा है: तो फिर वह जीवन का जल तेरे पास कहां से आया?

13     यीशु ने उस को उत्तर दिया, कि जो कोई यह जल पीएगा वह फिर प्यासा होगा।

12     क्या तू हमारे पिता याकूब से बड़ा है, जिस ने हमें यह कूआं दिया; और आप ही अपने सन्तान, और अपने ढोरों समेत उस में से पीया?

14     परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूंगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा: वरन जो जल मैं उसे दूंगा, वह उस में एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा।

15     स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, वह जल मुझे दे ताकि मैं प्यासी न होऊं और न जल भरने को इतनी दूर आऊं।

16     यीशु ने उस से कहा, जा, अपने पति को यहां बुला ला।

17     स्त्री ने उत्तर दिया, कि मैं बिना पति की हूं: यीशु ने उस से कहा, तू ठीक कहती है कि मैं बिना पति की हूं।

18     क्योंकि तू पांच पति कर चुकी है, और जिस के पास तू अब है वह भी तेरा पति नहीं; यह तू ने सच कहा है।

19     स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, मुझे ज्ञात होता है कि तू भविष्यद्वक्ता है।

20     हमारे बाप दादों ने इसी पहाड़ पर भजन किया: और तुम कहते हो कि वह जगह जहां भजन करना चाहिए यरूशलेम में है।

21     यीशु ने उस से कहा, हे नारी, मेरी बात की प्रतीति कर कि वह समय आता है कि तुम न तो इस पहाड़ पर पिता का भजन करोगे न यरूशलेम में।

23     परन्तु वह समय आता है, वरन अब भी है जिस में सच्चे भक्त पिता का भजन आत्मा और सच्चाई से करेंगे, क्योंकि पिता अपने लिये ऐसे ही भजन करने वालों को ढूंढ़ता है।

24     परमेश्वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसके भजन करने वाले आत्मा और सच्चाई से भजन करें।

25     स्त्री ने उस से कहा, मैं जानती हूं कि मसीह जो ख्रीस्तुस कहलाता है, आनेवाला है; जब वह आएगा, तो हमें सब बातें बता देगा।

26     यीशु ने उस से कहा, मैं जो तुझ से बोल रहा हूं, वही हूं॥

7. John 4 : 1, 3, 4, 6 (to :), 7, 9-21, 23-26

1     When therefore the Lord knew how the Pharisees had heard that Jesus made and baptized more disciples than John,

3     He left Judæa, and departed again into Galilee.

4     And he must needs go through Samaria.

6     Now Jacob’s well was there. Jesus therefore, being wearied with his journey, sat thus on the well:

7     There cometh a woman of Samaria to draw water: Jesus saith unto her, Give me to drink.

9     Then saith the woman of Samaria unto him, How is it that thou, being a Jew, askest drink of me, which am a woman of Samaria? for the Jews have no dealings with the Samaritans.

10     Jesus answered and said unto her, If thou knewest the gift of God, and who it is that saith to thee, Give me to drink; thou wouldest have asked of him, and he would have given thee living water.

11     The woman saith unto him, Sir, thou hast nothing to draw with, and the well is deep: from whence then hast thou that living water?

12     Art thou greater than our father Jacob, which gave us the well, and drank thereof himself, and his children, and his cattle?

13     Jesus answered and said unto her, Whosoever drinketh of this water shall thirst again:

14     But whosoever drinketh of the water that I shall give him shall never thirst; but the water that I shall give him shall be in him a well of water springing up into everlasting life.

15     The woman saith unto him, Sir, give me this water, that I thirst not, neither come hither to draw.

16     Jesus saith unto her, Go, call thy husband, and come hither.

17     The woman answered and said, I have no husband. Jesus said unto her, Thou hast well said, I have no husband:

18     For thou hast had five husbands; and he whom thou now hast is not thy husband: in that saidst thou truly.

19     The woman saith unto him, Sir, I perceive that thou art a prophet.

20     Our fathers worshipped in this mountain; and ye say, that in Jerusalem is the place where men ought to worship.

21     Jesus saith unto her, Woman, believe me, the hour cometh, when ye shall neither in this mountain, nor yet at Jerusalem, worship the Father.

23     But the hour cometh, and now is, when the true worshippers shall worship the Father in spirit and in truth: for the Father seeketh such to worship him.

24     God is a Spirit: and they that worship him must worship him in spirit and in truth.

25     The woman saith unto him, I know that Messias cometh, which is called Christ: when he is come, he will tell us all things.

26     Jesus saith unto her, I that speak unto thee am he.

8. फिलिप्पियों 2: 5

5     जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।

8. Philippians 2 : 5

5     Let this mind be in you, which was also in Christ Jesus:



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 496: 3 (वहाँ)-8

… केवल एक ही मन है, और यह सदैव मौजूद सर्वशक्तिमान मन मनुष्य द्वारा प्रतिबिंबित होता है और पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है। आप सीखेंगे कि क्रिश्चियन साइंस में पहला कर्तव्य ईश्वर का पालन करना, एक मन रखना और दूसरे को अपने जैसा प्यार करना है।

1. 496 : 3 (there)-8

...there is but one Mind, and this ever-present omnipotent Mind is reflected by man and governs the entire universe. You will learn that in Christian Science the first duty is to obey God, to have one Mind, and to love another as yourself.

2. 427: 21-25

सबसे बड़ी कठिनाई इस अज्ञान में है कि ईश्वर क्या है। ईश्वर, जीवन, सत्य और प्रेम मनुष्य को अमर बनाते हैं। सभी को नियंत्रित करने वाले अमर मन को भौतिक क्षेत्र, तथाकथित, साथ ही आध्यात्मिक में सर्वोच्च के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।

2. 427 : 21-25

The great difficulty lies in ignorance of what God is. God, Life, Truth, and Love make man undying. Immortal Mind, governing all, must be acknowledged as supreme in the physical realm, so-called, as well as in the spiritual.

3. 588: 11-13 (से,), 15 (अधीन)-19

केवल एक मैं, या हम हैं, बल्कि एक दिव्य सिद्धांत, या मन है, जो सारे अस्तित्व को नियंत्रित करता है; पुरुष और महिला अपने व्यक्तिगत चरित्रों में हमेशा के लिए अपरिवर्तित रहते हैं, ... एक सिद्धांत द्वारा शासित होते हैं। ईश्वर की रचना की सभी वस्तुएँ एक मन को प्रतिबिंबित करती हैं, और जो कुछ भी इस एक मन को प्रतिबिंबित नहीं करता है, वह दोषपूर्ण और ग़लत है, यहाँ तक कि यह विश्वास भी कि जीवन, पदार्थ और बुद्धि दोनों मानसिक और भौतिक हैं।

3. 588 : 11-13 (to ,), 15 (governed)-19

There is but one I, or Us, but one divine Principle, or Mind, governing all existence; man and woman unchanged forever in their individual characters, ... governed by one Principle. All the objects of God's creation reflect one Mind, and whatever reflects not this one Mind, is false and erroneous, even the belief that life, substance, and intelligence are both mental and material.

4. 429: 13-16

नश्वर मन पुष्टि करता है कि मन शरीर के अधीन है, कि शरीर मर रहा है, कि इसे दफनाया जाना चाहिए और धूल में विघटित होना चाहिए; लेकिन नश्वर मन की पुष्टि सत्य नहीं है.

4. 429 : 13-16

Mortal mind affirms that mind is subordinate to the body, that the body is dying, that it must be buried and decomposed into dust; but mortal mind's affirmation is not true.

5. 425: 21-28

मनुष्य के लिए ईश्वर उसके विश्वास से कहीं अधिक है, और जितना कम हम पदार्थ या उसके नियमों को स्वीकार करते हैं, उतना अधिक अमरता हमारे पास होती है। चेतना एक बेहतर शरीर का निर्माण करती है जब सामग्री में विश्वास की जीत हुई है। आध्यात्मिक समझ से भौतिक विश्वास को ठीक करें, और आत्मा आपको नए सिरे से बनाएगी। आप फिर से ईश्वर को नाराज करने के अलावा कभी नहीं डरेंगे, और आप कभी भी यह विश्वास नहीं करेंगे कि हृदय या शरीर का कोई भी हिस्सा आपको नष्ट कर सकता है।

5. 425 : 21-28

God is more to a man than his belief, and the less we acknowledge matter or its laws, the more immortality we possess. Consciousness constructs a better body when faith in matter has been conquered. Correct material belief by spiritual understanding, and Spirit will form you anew. You will never fear again except to offend God, and you will never believe that heart or any portion of the body can destroy you.

6. 509: 29-5

सृष्टि के विज्ञान को जानते हुए, जिसमें सब कुछ मन और उसके विचार हैं, यीशु ने अपने साथी देशवासियों के भौतिक विचारों को फटकार लगाई: "तुम आकाश का लक्षण देखकर भेद बता सकते हो पर समयों के चिन्हों का भेद नहीं बता सकते?" इंद्रियों की वस्तुओं पर ध्यान केंद्रित करने की अपेक्षा हमें ईश्वर के आध्यात्मिक विचारों को समझने की कितनी अधिक कोशिश करनी चाहिए! आत्मा की लय को समझने और पवित्र होने के लिए, विचार विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक होना चाहिए।

6. 509 : 29-5

Knowing the Science of creation, in which all is Mind and its ideas, Jesus rebuked the material thought of his fellow-countrymen: "Ye can discern the face of the sky; but can ye not discern the signs of the times?" How much more should we seek to apprehend the spiritual ideas of God, than to dwell on the objects of sense! To discern the rhythm of Spirit and to be holy, thought must be purely spiritual.

7. 332: 9 (मसीह)-17

मसीह अच्छाई को व्यक्त करने वाला सच्चा विचार है, मानव चेतना को बोलने वाले मनुष्यों के लिए ईश्वर का दिव्य संदेश है। मसीह निराकार, आध्यात्मिक है, - हाँ, दिव्य छवि और समानता, इंद्रियों के भ्रम को दूर करने वाला; मार्ग, सत्य और जीवन, बीमारों को चंगा करना और बुराइयों को दूर करना, पाप, बीमारी और मृत्यु को नष्ट करना। जैसा कि पॉल कहते हैं: "परमेश्वर एक ही है: और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही बिचवई है, अर्थात मसीह यीशु जो मनुष्य है।"

7. 332 : 9 (Christ)-17

Christ is the true idea voicing good, the divine message from God to men speaking to the human consciousness. The Christ is incorporeal, spiritual, — yea, the divine image and likeness, dispelling the illusions of the senses; the Way, the Truth, and the Life, healing the sick and casting out evils, destroying sin, disease, and death. As Paul says: "There is one God, and one mediator between God and men, the man Christ Jesus."

8. 29: 5-8, 11-15

भगवान मनुष्य सहित ब्रह्मांड का निर्माण और संचालन करता है। ब्रह्मांड आध्यात्मिक विचारों से भरा है, जिसे वह विकसित करता है, और वे मन के आज्ञाकारी हैं जो उन्हें बनाता है। ... ईश्वर की स्वयं की छवि में बनाए गए नश्वर अमर की तरह नहीं हैं; लेकिन अनंत आत्मा सभी होने के नाते, नश्वर चेतना वैज्ञानिक तथ्य के लिए अंतिम पैदावार होगी और गायब हो जाएगी, और सही, और हमेशा के लिए होने का वास्तविक अर्थ प्रकट होगा।

8. 295 : 5-8, 11-15

God creates and governs the universe, including man. The universe is filled with spiritual ideas, which He evolves, and they are obedient to the Mind that makes them. ... Mortals are not like immortals, created in God's own image; but infinite Spirit being all, mortal consciousness will at last yield to the scientific fact and disappear, and the real sense of being, perfect and forever intact, will appear.

9. 88: 9-14 (से 2nd.)

वास्तविक विचारों को भ्रम से कैसे अलग किया जा सकता है? प्रत्येक की उत्पत्ति सीखकर। विचार दिव्य मन से निकले हुए हैं। मस्तिष्क या पदार्थ से उत्पन्न होने वाले विचार, नश्वर मन की शाखाएं हैं; वे नश्वर भौतिक विश्वास हैं। विचार आध्यात्मिक, सामंजस्यपूर्ण और शाश्वत हैं।

9. 88 : 9-14 (to 2nd .)

How are veritable ideas to be distinguished from illusions? By learning the origin of each. Ideas are emanations from the divine Mind. Thoughts, proceeding from the brain or from matter, are offshoots of mortal mind; they are mortal material beliefs. Ideas are spiritual, harmonious, and eternal.

10. 94: 24-26 (से ;), 28-32 (से 1st.)

हमारे गुरु ने मानव जाति के विचारों को आसानी से पढ़ लिया, और इस अंतर्दृष्टि ने उन्हें उन विचारों को सही ढंग से निर्देशित करने में बेहतर सक्षम बनाया; ... हमारे गुरु ने नश्वर मन को वैज्ञानिक आधार पर, मन की सर्वव्यापी उपस्थिति के आधार पर पढ़ा। इस विवेक का एक अनुमान आध्यात्मिक विकास और एक मन की अनंत क्षमताओं के साथ गठबंधन का संकेत देता है।

10. 94 : 24-26 (to ;), 28-32 (to 1st .)

Our Master easily read the thoughts of mankind, and this insight better enabled him to direct those thoughts aright; ... Our Master read mortal mind on a scientific basis, that of the omnipresence of Mind. An approximation of this discernment indicates spiritual growth and union with the infinite capacities of the one Mind.

11. 95: 1-3, 5-11

उनके मन का प्रभाव हमेशा उपचार करने और बचाने के लिए था, और यह नश्वर मन को पढ़ने का एकमात्र वास्तविक विज्ञान है। … पाल ने कहा, "आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है।" हम अपनी आध्यात्मिकता, सत्य और प्रेम के प्रति अपनी निष्ठा के अनुपात में ईश्वर या जीवन के पास जाते हैं; और उस अनुपात में हम सभी मानवीय ज़रूरतों को जानते हैं और बीमारों और पापियों को चंगा करने के उद्देश्य से उनके विचार को समझने में सक्षम हैं। किसी भी प्रकार की त्रुटि परमेश्वर की व्यवस्था से छिप नहीं सकती।

11. 95 : 1-3, 5-11

The effect of his Mind was always to heal and to save, and this is the only genuine Science of reading mortal mind. ... Paul said, "To be spiritually minded is life." We approach God, or Life, in proportion to our spirituality, our fidelity to Truth and Love; and in that ratio we know all human need and are able to discern the thought of the sick and the sinning for the purpose of healing them. Error of any kind cannot hide from the law of God.

12. 85: 1-18

यह माइंड-रीडिंग क्लैरवॉयन्स के विपरीत है। यह आध्यात्मिक समझ की रोशनी है जो आत्मा की क्षमता को प्रदर्शित करती है, भौतिक अर्थ की नहीं। यह आत्मा-बोध मानव मन में तब आता है जब उत्तरार्द्ध दिव्य मन को उपजता है।

इस तरह के अंतर्ज्ञान से पता चलता है कि जो कुछ भी बनता है और सद्भाव को बनाए रखता है, एक को अच्छा करने में सक्षम बनाता है, लेकिन बुराई को नहीं। जब आप इस तरीके से मानव मन को पढ़ने और उस त्रुटि को समझने में सक्षम हो जाएंगे जिसे आप नष्ट कर देंगे तो आप उपचार के संपूर्ण विज्ञान तक पहुंच जाएंगे। सामरी स्त्री ने कहा: "आओ, एक मनुष्य को देखो, जिस ने सब कुछ जो मैं ने किया मुझे बता दिया: कहीं यह तो मसीह नहीं है?"

यह दर्ज किया गया है कि यीशु, जब वह एक बार अपने छात्रों के साथ यात्रा कर रहा था, "उनके विचारों को जानता था," - उन्हें वैज्ञानिक रूप से पढ़ें। उसी प्रकार उसने रोग को पहचाना और रोगियों को चंगा किया।

12. 85 : 1-18

This Mind-reading is the opposite of clairvoyance. It is the illumination of the spiritual understanding which demonstrates the capacity of Soul, not of material sense. This Soul-sense comes to the human mind when the latter yields to the divine Mind.

Such intuitions reveal whatever constitutes and perpetuates harmony, enabling one to do good, but not evil. You will reach the perfect Science of healing when you are able to read the human mind after this manner and discern the error you would destroy. The Samaritan woman said: "Come, see a man, which told me all things that ever I did: is not this the Christ?"

It is recorded that Jesus, as he once journeyed with his students, "knew their thoughts," — read them scientifically. In like manner he discerned disease and healed the sick.

13. 14: 12-18

एक क्षण के लिए सचेत हो जाएं कि जीवन और बुद्धि विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक है, - न तो भौतिक में और न ही भौतिक के साथ, - और शरीर तब कोई शिकायत नहीं करेगा। यदि बीमारी में विश्वास से पीड़ित हैं, तो अचानक आप खुद को स्वस्थ पाएंगे। शरीर को आध्यात्मिक जीवन, सत्य और प्रेम द्वारा नियंत्रित किए जाने पर दु: ख को आनंद में बदल दिया जाता है।

13. 14 : 12-18

Become conscious for a single moment that Life and intelligence are purely spiritual, — neither in nor of matter, — and the body will then utter no complaints. If suffering from a belief in sickness, you will find yourself suddenly well. Sorrow is turned into joy when the body is controlled by spiritual Life, Truth, and Love.

14. 231: 30-2

मनुष्य, अपने निर्माता द्वारा शासित, जिसके पास कोई अन्य मन नहीं है, - इंजीलवादी के कथन पर लगाया गया है कि "सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न [दैवीय कथन] हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई," — पाप, बीमारी और मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

14. 231 : 30-2

Man, governed by his Maker, having no other Mind, — planted on the Evangelist's statement that "all things were made by Him [the Word of God]; and without Him was not anything made that was made," — can triumph over sin, sickness, and death.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6