रविवार 25 जून, 2023



विषयक्रिश्चियन साइंस

SubjectChristian Science

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: 2 तीमुथियुस 2: 15

"अपने आप को परमेश्वर का ग्रहणयोग्य और ऐसा काम करने वाला ठहराने का प्रयत्न कर, जो लज्ज़ित होने न पाए, और जो सत्य के वचन को ठीक रीति से काम में लाता हो।"



Golden Text: II Timothy 2 : 15

Study to shew thyself approved unto God, a workman that needeth not to be ashamed, rightly dividing the word of truth.




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उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 119: 33-38, 40


33     हे यहोवा, मुझे अपनी विधियों का मार्ग दिखा दे; तब मैं उसे अन्त तक पकड़े रहूंगा।

34     मुझे समझ दे, तब मैं तेरी व्यवस्था को पकड़े रहूंगा और पूर्ण मन से उस पर चलूंगा।

35     अपनी आज्ञाओं के पथ में मुझ को चला, क्योंकि मैं उसी से प्रसन्न हूं।

36     मेरे मन को लोभ की ओर नहीं, अपनी चितौनियों ही की ओर फेर दे।

37     मेरी आंखों को व्यर्थ वस्तुओं की ओर से फेर दे; तू अपने मार्ग में मुझे जिला।

38     तेरा वचन जो तेरे भय मानने वालों के लिये है, उसको अपने दास के निमित्त भी पूरा कर।

40     देख, मैं तेरे उपदेशों का अभिलाषी हूं; अपने धर्म के कारण मुझ को जिला।

Responsive Reading: Psalm 119 : 33-38, 40

33.     Teach me, O Lord, the way of thy statutes; and I shall keep it unto the end.

34.     Give me understanding, and I shall keep thy law; yea, I shall observe it with my whole heart.

35.     Make me to go in the path of thy commandments; for therein do I delight.

36.     Incline my heart unto thy testimonies, and not to covetousness.

37.     Turn away mine eyes from beholding vanity; and quicken thou me in thy way.

38.     Stablish thy word unto thy servant.

40.     Behold, I have longed after thy precepts: quicken me in thy righteousness.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यिर्मयाह 10: 2

2     अन्यजातियों को चाल मत सीखो, न उनकी नाईं आकाश के चिन्हों से विस्मित हो, इसलिये कि अन्यजाति लोग उन से विस्मित होते हैं।

1. Jeremiah 10: 2

2     Thus saith the Lord, Learn not the way of the heathen, and be not dismayed at the signs of heaven; for the heathen are dismayed at them.

2. दानिय्येल 2: 1, 2 (से 1st.), 3-5, 10, 12, 13 (वे और), 16, 19, 20 (और कहा), 21 (वह देता है), 22, 23, 46 (से 2nd,), 47 (और कहा), 48

1     अपने राज्य के दूसरे वर्ष में नबूकदनेस्सर ने ऐसा स्वप्न देखा जिस से उसका मन बहुत ही व्याकुल हो गया और उसको नींद न आई।

2     तब राजा ने आज्ञा दी, कि ज्योतिषी, तन्त्री, टोनहे और कसदी बुलाए जाएं कि वे राजा को उसका स्वप्न बताएं; सो वे आए और राजा के साम्हने हाजिर हुए।

3     तब राजा ने उन से कहा, मैं ने एक स्वप्न देखा है, और मेरा मन व्याकुल है कि स्वपन को कैसे समझूं।

4     कसदियों ने, राजा से अरामी भाषा में कहा, हे राजा, तू चिरंजीव रहे! अपने दासों को स्वप्न बता, और हम उसका फल बताएंगे।

5     राजा ने कसदियों को उत्तर दिया, मैं यह आज्ञा दे चुका हूं कि यदि तुम फल समेत स्वप्न को न बताओगे तो तुम टुकड़े टुकड़े किए जाओगे, और तुम्हारे घर फुंकवा दिए जाएंगे।

10     कसदियों ने राजा से कहा, पृथ्वी भर में ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो राजा के मन की बात बता सके; और न कोई ऐसा राजा, वा प्रधान, वा हाकिम कभी हुआ है जिसने किसी ज्योतिषी वा तन्त्री, वा कसदी से ऐसी बात पूछी हो।

12     इस पर राजा ने झुंझलाकर, और बहुत की क्रोधित हो कर, बाबुल के सब पण्डितों के नाश करने की आज्ञा दे दी।

13     ... और लोग दानिय्येल और उसके संगियों को ढूंढ़ रहे थे कि वे भी घात किए जाएं।

16     और दानिय्येल ने भीतर जा कर राजा से बिनती की, कि उसके लिये कोई समय ठहराया जाए, तो वह महाराज को स्वप्न का फल बता देगा।

19     तब वह भेद दानिय्येल को रात के समय दर्शन के द्वारा प्रगट किया गया। सो दानिय्येल ने स्वर्ग के परमेश्वर का यह कह कर धन्यवाद किया,

20     ... परमेश्वर का नाम युगानुयुग धन्य है; क्योंकि बुद्धि और पराक्रम उसी के हैं।

21     समयों और ऋतुओं को वही पलटता है; राजाओं का अस्त और उदय भी वही करता है; बुद्धिमानों को बुद्धि और समझ वालों को समझ भी वही देता है;

22     ... वह जानता है कि अन्धियारे में क्या है, और उसके संग सदा प्रकाश बना रहता है।

23     हे मेरे पूर्वजों के परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद और स्तुति करता हूं, क्योंकि तू ने मुझे बुद्धि और शक्ति दी है, और जिस भेद का खुलना हम लोगों न तुझ से मांगे था, उसे तू ने मुझ पर प्रगट किया है, तू ने हम को राजा की बात बताई है।

46     इतना सुनकर नबूकदनेस्सर राजा ने मुंह के बल गिर कर दानिय्येल को दण्डवत की, और आज्ञा दी कि उसको भेंट चढ़ाओ, और उसके साम्हने सुगन्ध वस्तु जलाओ।

47     ... सच तो यह है कि तुम लोगों का परमेश्वर, सब ईश्वरों का ईश्वर, राजाओं का राजा और भेदों का खोलने वाला है, इसलिये तू यह भेद प्रगट कर पाया।

48     तब राजा ने दानिय्येल का पद बड़ा किया, और उसको बहुत से बड़े बड़े दान दिए; और यह आज्ञा दी कि वह बाबुल के सारे प्रान्त पर हाकिम और बाबुल के सब पण्डितों पर मुख्य प्रधान बने।

2. Daniel 2 : 1, 2 (to 1st .), 3-5, 10, 12, 13 (and they), 16, 19, 20 (and said), 21 (he giveth), 22, 23, 46 (to 2nd ,), 47 (and said), 48

1     And in the second year of the reign of Nebuchadnezzar Nebuchadnezzar dreamed dreams, wherewith his spirit was troubled, and his sleep brake from him.

2     Then the king commanded to call the magicians, and the astrologers, and the sorcerers, and the Chaldeans, for to shew the king his dreams.

3     And the king said unto them, I have dreamed a dream, and my spirit was troubled to know the dream.

4     Then spake the Chaldeans to the king in Syriack, O king, live for ever: tell thy servants the dream, and we will shew the interpretation.

5     The king answered and said to the Chaldeans, The thing is gone from me: if ye will not make known unto me the dream, with the interpretation thereof, ye shall be cut in pieces, and your houses shall be made a dunghill.

10     The Chaldeans answered before the king, and said, There is not a man upon the earth that can shew the king’s matter: therefore there is no king, lord, nor ruler, that asked such things at any magician, or astrologer, or Chaldean.

12     For this cause the king was angry and very furious, and commanded to destroy all the wise men of Babylon.

13     …and they sought Daniel and his fellows to be slain.

16     Then Daniel went in, and desired of the king that he would give him time, and that he would shew the king the interpretation.

19     Then was the secret revealed unto Daniel in a night vision. Then Daniel blessed the God of heaven.

20     …and said, Blessed be the name of God for ever and ever: for wisdom and might are his:

21     …he giveth wisdom unto the wise, and knowledge to them that know understanding:

22     He revealeth the deep and secret things: he knoweth what is in the darkness, and the light dwelleth with him.

23     I thank thee, and praise thee, O thou God of my fathers, who hast given me wisdom and might, and hast made known unto me now what we desired of thee: for thou hast now made known unto us the king’s matter.

46     Then the king Nebuchadnezzar fell upon his face, and worshipped Daniel,

47     …and said, Of a truth it is, that your God is a God of gods, and a Lord of kings, and a revealer of secrets, seeing thou couldest reveal this secret.

48     Then the king made Daniel a great man, and gave him many great gifts, and made him ruler over the whole province of Babylon, and chief of the governors over all the wise men of Babylon.

3. मत्ती 4: 23

23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

3. Matthew 4 : 23

23     And Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing all manner of sickness and all manner of disease among the people.

4. मत्ती 9: 10-13

10     और जब वह घर में भोजन करने के लिये बैठा तो बहुतेरे महसूल लेने वाले और पापी आकर यीशु और उसके चेलों के साथ खाने बैठे।

11     यह देखकर फरीसियों ने उसके चेलों से कहा; तुम्हारा गुरू महसूल लेने वालों और पापियों के साथ क्यों खाता है?

12     उस ने यह सुनकर उन से कहा, वैद्य भले चंगों को नहीं परन्तु बीमारों को अवश्य है।

13     सो तुम जाकर इस का अर्थ सीख लो, कि मैं बलिदान नहीं परन्तु दया चाहता हूं; क्योंकि मैं धमिर्यों को नहीं परन्तु पापियों को बुलाने आया हूं॥

4. Matthew 9 : 10-13

10     And it came to pass, as Jesus sat at meat in the house, behold, many publicans and sinners came and sat down with him and his disciples.

11     And when the Pharisees saw it, they said unto his disciples, Why eateth your Master with publicans and sinners?

12     But when Jesus heard that, he said unto them, They that be whole need not a physician, but they that are sick.

13     But go ye and learn what that meaneth, I will have mercy, and not sacrifice: for I am not come to call the righteous, but sinners to repentance.

5. मत्ती 10: 1

1     फिर उस ने अपने बारह चेलों को पास बुलाकर, उन्हें अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार दिया, कि उन्हें निकालें और सब प्रकार की बीमारियों और सब प्रकार की दुर्बलताओं को दूर करें॥

5. Matthew 10 : 1

1     And when he had called unto him his twelve disciples, he gave them power against unclean spirits, to cast them out, and to heal all manner of sickness and all manner of disease.

6. मत्ती 11: 25 (और कहा), 28-30

25     …उसी समय यीशु ने कहा, हे पिता, स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु; मैं तेरा धन्यवाद करता हूं, कि तू ने इन बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा रखा, और बालकों पर प्रगट किया है।

28     हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा।

29     मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो; और मुझ से सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूं: और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे।

30     क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हल्का है॥

6. Matthew 11 : 25 (and said), 28-30

25     …and said, I thank thee, O Father, Lord of heaven and earth, because thou hast hid these things from the wise and prudent, and hast revealed them unto babes.

28     Come unto me, all ye that labour and are heavy laden, and I will give you rest.

29     Take my yoke upon you, and learn of me; for I am meek and lowly in heart: and ye shall find rest unto your souls.

30     For my yoke is easy, and my burden is light.

7. मत्ती 12: 14, 15, 23-28

14     तब फरीसियों ने बाहर जाकर उसके विरोध में सम्मति की, कि उसे किस प्रकार नाश करें?

15     यह जानकर यीशु वहां से चला गया; और बहुत लोग उसके पीछे हो लिये; और उस ने सब को चंगा किया।

23     इस पर सब लोग चकित होकर कहने लगे, यह क्या दाऊद की सन्तान का है?

24     परन्तु फरीसियों ने यह सुनकर कहा, यह तो दुष्टात्माओं के सरदार शैतान की सहायता के बिना दुष्टात्माओं को नहीं निकालता।

25     उस ने उन के मन की बात जानकर उन से कहा; जिस किसी राज्य में फूट होती है, वह उजड़ जाता है, और कोई नगर या घराना जिस में फूट होती है, बना न रहेगा।

26     और यदि शैतान ही शैतान को निकाले, तो वह अपना ही विरोधी हो गया है; फिर उसका राज्य क्योंकर बना रहेगा?

27     भला, यदि मैं शैतान की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता हूं, तो तुम्हारे वंश किस की सहायता से निकालते हैं? इसलिये वे ही तुम्हारा न्याय चुकाएंगे।

28     पर यदि मैं परमेश्वर के आत्मा की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता हूं, तो परमेश्वर का राज्य तुम्हारे पास आ पहुंचा है।

7. Matthew 12 : 14, 15, 23-28

14     Then the Pharisees went out, and held a council against him, how they might destroy him.

15     But when Jesus knew it, he withdrew himself from thence: and great multitudes followed him, and he healed them all;

23     And all the people were amazed, and said, Is not this the son of David?

24     But when the Pharisees heard it, they said, This fellow doth not cast out devils, but by Beelzebub the prince of the devils.

25     And Jesus knew their thoughts, and said unto them, Every kingdom divided against itself is brought to desolation; and every city or house divided against itself shall not stand:

26     And if Satan cast out Satan, he is divided against himself; how shall then his kingdom stand?

27     And if I by Beelzebub cast out devils, by whom do your children cast them out? therefore they shall be your judges.

28     But if I cast out devils by the Spirit of God, then the kingdom of God is come unto you.

8. मत्ती 21: 22

22     और जो कुछ तुम प्रार्थना में विश्वास से मांगोगे वह सब तुम को मिलेगा॥

8. Matthew 21 : 22

22     And all things, whatsoever ye shall ask in prayer, believing, ye shall receive.

9. यूहन्ना 14: 15-18, 25-27

15     यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।

16     और मैं पिता से बिनती करूंगा, और वह तुम्हें एक और सहायक देगा, कि वह सर्वदा तुम्हारे साथ रहे।

17     अर्थात सत्य का आत्मा, जिसे संसार ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह न उसे देखता है और न उसे जानता है: तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है, और वह तुम में होगा।

18     मैं तुम्हें अनाथ न छोडूंगा, मैं तुम्हारे पास आता हूं।

25     ये बातें मैं ने तुम्हारे साथ रहते हुए तुम से कहीं।

26     परन्तु सहायक अर्थात पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा।

27     मैं तुम्हें शान्ति दिए जाता हूं, अपनी शान्ति तुम्हें देता हूं; जैसे संसार देता है, मैं तुम्हें नहीं देता: तुम्हारा मन न घबराए और न डरे।

9. John 14 : 15-18, 25-27

15     If ye love me, keep my commandments.

16     And I will pray the Father, and he shall give you another Comforter, that he may abide with you for ever;

17     Even the Spirit of truth; whom the world cannot receive, because it seeth him not, neither knoweth him: but ye know him; for he dwelleth with you, and shall be in you.

18     I will not leave you comfortless: I will come to you.

25     These things have I spoken unto you, being yet present with you.

26     But the Comforter, which is the Holy Ghost, whom the Father will send in my name, he shall teach you all things, and bring all things to your remembrance, whatsoever I have said unto you.

27     Peace I leave with you, my peace I give unto you: not as the world giveth, give I unto you. Let not your heart be troubled, neither let it be afraid.

10. 2 तीमुथियुस 3: 14 (जारी रखना)-17

14     … तू इन बातों पर जो तू ने सीखीं हैं और प्रतीति की थी, यह जानकर दृढ़ बना रह; कि तू ने उन्हें किन लोगों से सीखा था

15     और बालकपन से पवित्र शास्त्र तेरा जाना हुआ है, जो तुझे मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान बना सकता है।

16     हर एक पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है।

17     ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्पर हो जाए॥

10. II Timothy 3 : 14 (continue)-17

14     …continue thou in the things which thou hast learned and hast been assured of, knowing of whom thou hast learned them;

15     And that from a child thou hast known the holy scriptures, which are able to make thee wise unto salvation through faith which is in Christ Jesus.

16     All scripture is given by inspiration of God, and is profitable for doctrine, for reproof, for correction, for instruction in righteousness:

17     That the man of God may be perfect, throughly furnished unto all good works.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 3: 14 (से)-16

...ईश्वर को समझना अनंत काल का कार्य है, और इसके लिए विचार, ऊर्जा और इच्छा के पूर्ण समर्पण की आवश्यकता होती है।

1. 3 : 14 (to)-16

…to understand God is the work of eternity, and demands absolute consecration of thought, energy, and desire.

2. 84: 28-6

आत्मा के बारे में हम सभी सही रूप से जानते हैं कि ईश्वर, ईश्वरीय सिद्धांत से आता है, और यह मसीह और ईसाई विज्ञान के माध्यम से सीखा जाता है। यदि इस विज्ञान को अच्छी तरह से सीखा और ठीक से पचा लिया गया है, तो हम सत्य को अधिक सटीक रूप से जान सकते हैं कि खगोलशास्त्री तारों को पढ़ सकते हैं या किसी ग्रहण की गणना कर सकते हैं।

यह माइंड-रीडिंग क्लैरवॉयन्स के विपरीत है। यह आध्यात्मिक समझ की रोशनी है जो आत्मा की क्षमता को प्रदर्शित करती है, भौतिक अर्थ की नहीं। यह आत्मा-बोध मानव मन में तब आता है जब उत्तरार्द्ध दिव्य मन को उपजता है।

2. 84 : 28-6

All we correctly know of Spirit comes from God, divine Principle, and is learned through Christ and Christian Science. If this Science has been thoroughly learned and properly digested, we can know the truth more accurately than the astronomer can read the stars or calculate an eclipse. This Mind-reading is the opposite of clairvoyance. It is the illumination of the spiritual understanding which demonstrates the capacity of Soul, not of material sense. This Soul-sense comes to the human mind when the latter yields to the divine Mind.

3. 147: 14-29

यद्यपि इस खंड में मन को ठीक करने का संपूर्ण विज्ञान समाहित है, फिर भी कभी भी विश्वास न करें कि आप इस पुस्तक के एक साधारण अध्ययन से विज्ञान के पूरे अर्थ को आत्मसात कर सकते हैं। पुस्तक का अध्ययन करने की आवश्यकता है, और वैज्ञानिक उपचार के नियमों का प्रदर्शन आपको क्रिश्चियन साइंस के आध्यात्मिक आधार पर मजबूती से स्थापित करेगा। यह प्रमाण आपको पहले से ही पुरातन सिद्धांतों के नष्ट होने वाले जीवाश्मों से ऊपर उठाता है, और आपको अब तक अप्राप्य और प्रतीत होने वाले मंद होने के आध्यात्मिक तथ्यों को समझने में सक्षम बनाता है।

हमारे मास्टर ने बीमारों को चंगा किया, ईसाई उपचार का अभ्यास किया, और अपने छात्रों को इसके दिव्य सिद्धांत की सामान्यताओं को सिखाया; लेकिन उन्होंने बीमारी को ठीक करने और रोकने के इस सिद्धांत को प्रदर्शित करने के लिए कोई निश्चित नियम नहीं छोड़ा। ईसाई विज्ञान में इस नियम की खोज की जानी बाकी थी।

3. 147 : 14-29

Although this volume contains the complete Science of Mind-healing, never believe that you can absorb the whole meaning of the Science by a simple perusal of this book. The book needs to be studied, and the demonstration of the rules of scientific healing will plant you firmly on the spiritual groundwork of Christian Science. This proof lifts you high above the perishing fossils of theories already antiquated, and enables you to grasp the spiritual facts of being hitherto unattained and seemingly dim.

Our Master healed the sick, practised Christian healing, and taught the generalities of its divine Principle to his students; but he left no definite rule for demonstrating this Principle of healing and preventing disease. This rule remained to be discovered in Christian Science.

4. 358: 9-13, 15-18

क्रिश्चियन साइंस, समझ में आया, शास्त्रों के साथ मेल खाता है, और तार्किक और प्रदर्शनकारी रूप से प्रस्तुत किए गए हर बिंदु को बनाए रखता है। अन्यथा, यह विज्ञान नहीं होता, और इसके प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाता। … यह त्रुटि के खिलाफ सत्य के शांत और स्पष्ट फैसले को प्रस्तुत करता है, जिसे नबियों द्वारा, यीशु द्वारा, उनके प्रेरितों द्वारा कहा और चित्रित किया गया है, जैसा कि पूरे शास्त्र में दर्ज है।

4. 358 : 9-13, 15-18

Christian Science, understood, coincides with the Scriptures, and sustains logically and demonstratively every point it presents. Otherwise it would not be Science, and could not present its proofs. … It presents the calm and clear verdict of Truth against error, uttered and illustrated by the prophets, by Jesus, by his apostles, as is recorded throughout the Scriptures.

5. 372: 17-21

ईसाई विज्ञान और ईसाई धर्म एक हैं। फिर, ईसाई धर्म की तुलना में ईसाई धर्म में, हम सत्य और त्रुटि, आत्मा और पदार्थ दोनों की वास्तविकता और शक्ति में विश्वास कैसे कर सकते हैं और इसके विपरीत सफल होने की आशा कर सकते हैं?

5. 372 : 17-21

Christian Science and Christianity are one. How, then, in Christianity any more than in Christian Science, can we believe in the reality and power of both Truth and error, Spirit and matter, and hope to succeed with contraries?

6. 349: 7 (हमारा)-12

…हमारे मास्टर ने इसके विपरीत उपचार करके भौतिक कानून को रद्द कर दिया। हम मास्टर के उदाहरण का पालन करने का प्रस्ताव करते हैं। हमें भौतिक नियमों को आध्यात्मिक नियमों के अधीन करना चाहिए। क्रिश्चियन साइंस के दो आवश्यक बिंदु हैं, कि न तो जीवन मरता है और न ही मनुष्य मरता है, और यह कि ईश्वर बीमारी का लेखक नहीं है।

6. 349 : 7 (our)-12

…our Master annulled material law by healing contrary to it. We propose to follow the Master's example. We should subordinate material law to spiritual law. Two essential points of Christian Science are, that neither Life nor man dies, and that God is not the author of sickness.

7. 162: 4-16

क्रिश्चियन साइंस शरीर में सत्य का सूर्यप्रकाश लाता है, जो स्फूर्तिदायक और शुद्ध करता है। क्रिश्चियन साइंस सत्य के साथ एक परिवर्तनकारी, तटस्थ त्रुटि के रूप में कार्य करता है। यह स्रावों को बदलता है, देह को बाहर निकालता है, ट्यूमर को घोलता है, कठोर मांसपेशियों को आराम देता है, और क्षतिग्रस्त हड्डियों को सुदृढ़ता में पुनर्स्थापित करता है। इस विज्ञान का प्रभाव मानव मन को आधार के परिवर्तन के लिए प्रेरित करना है, जिस पर वह दिव्य मन के सामंजस्य के लिए झुक सकता है।

अनुभवों ने इस तथ्य का पक्ष लिया है कि मन शरीर को नियंत्रित करता है, एक उदाहरण में नहीं, बल्कि हर उदाहरण में। आत्मा के अविनाशी गुण पदार्थ की स्थितियों के बिना और तथाकथित भौतिक अस्तित्व की झूठी मान्यताओं के बिना भी मौजूद हैं।

7. 162 : 4-16

Christian Science brings to the body the sunlight of Truth, which invigorates and purifies. Christian Science acts as an alterative, neutralizing error with Truth. It changes the secretions, expels humors, dissolves tumors, relaxes rigid muscles, restores carious bones to soundness. The effect of this Science is to stir the human mind to a change of base, on which it may yield to the harmony of the divine Mind.

Experiments have favored the fact that Mind governs the body, not in one instance, but in every instance. The indestructible faculties of Spirit exist without the conditions of matter and also without the false beliefs of a so-called material existence.

8. 351: 2-7

जब हम ईश्वर की चंगा करने की शक्ति में विश्वास खो देते हैं, तो हम ईश्वरीय सिद्धांत पर अविश्वास करते हैं जो क्रिश्चियन साइंस को प्रदर्शित करता है, और फिर हम बीमारों को ठीक नहीं कर सकते। न ही हम आत्मा की सहायता से चंगा कर सकते हैं, यदि हम स्वयं को भौतिक आधार पर स्थापित करते हैं।

8. 351 : 2-7

When we lose faith in God's power to heal, we distrust the divine Principle which demonstrates Christian Science, and then we cannot heal the sick. Neither can we heal through the help of Spirit, if we plant ourselves on a material basis.

9. 273: 29-10 (से 2nd,)

विज्ञान दिखाता है कि सामग्री, परस्पर विरोधी नश्वर राय और विश्वास हर समय त्रुटि के प्रभावों का उत्सर्जन करते हैं, लेकिन यह नश्वर मन का वातावरण नैतिक और स्वास्थ्य के लिए विनाशकारी नहीं हो सकता है जब यह क्राइस्टच्यून साइंस द्वारा तुरंत और लगातार विरोध किया जाता है। ट्रुथ एंड लव इस मानसिक माया का प्रतिकार करता है, और इस प्रकार अस्तित्व और अस्तित्व को बनाए रखता है। पाँचों इंद्रियों से प्राप्त अनावश्यक ज्ञान केवल लौकिक है, - नश्वर मन का गर्भाधान, भावना का वंश, आत्मा का नहीं, - और जो बुराई और नाश होने का प्रतीक है। प्राकृतिक विज्ञान, जैसा कि आमतौर पर कहा जाता है, वास्तव में प्राकृतिक नहीं है और न ही वैज्ञानिक है, क्योंकि यह भौतिक इंद्रियों के प्रमाण से उत्पन्न होता है। इसके विपरीत, विचार आत्मा से उत्पन्न होते हैं,

9. 273 : 29-10 (to 2nd ,)

Science shows that material, conflicting mortal opinions and beliefs emit the effects of error at all times, but this atmosphere of mortal mind cannot be destructive to morals and health when it is opposed promptly and persistently by Christian Science. Truth and Love antidote this mental miasma, and thus invigorate and sustain existence. Unnecessary knowledge gained from the five senses is only temporal, — the conception of mortal mind, the offspring of sense, not of Soul, Spirit, — and symbolizes all that is evil and perishable. Natural science, as it is commonly called, is not really natural nor scientific, because it is deduced from the evidence of the material senses. Ideas, on the contrary, are born of Spirit,

10. 274: 23-25

ईश्वरीय विज्ञान निरपेक्ष है, और इसके सिद्धांत और नियम को सीखने में किसी भी आधे रास्ते की अनुमति नहीं देता है - इसे प्रदर्शन द्वारा स्थापित करना।

10. 274 : 23-25

Divine Science is absolute, and permits no half-way position in learning its Principle and rule — establishing it by demonstration.

11. 45: 19-24

ईसाई विज्ञान सामान्य नियम का अपवाद नहीं है, कि सीधी रेखा में श्रम के बिना कोई उत्कृष्टता नहीं है। कोई अपनी आग को नहीं फैला सकता है, और एक ही समय में निशान मारा। अन्य विज्ञानों को आगे बढ़ाने और इस विज्ञान के प्रदर्शन में तेजी से आगे बढ़ना संभव नहीं है।

11. 457 : 19-24

Christian Science is not an exception to the general rule, that there is no excellence without labor in a direct line. One cannot scatter his fire, and at the same time hit the mark. To pursue other vocations and advance rapidly in the demonstration of this Science, is not possible.

12. 349: 18-21

क्रिश्चियन साइंस की व्याख्या इसके आध्यात्मिक अर्थ में निहित है, और इस विज्ञान के अर्थ को समझने के लिए इसके शिष्यों द्वारा इस अर्थ को प्राप्त किया जाना चाहिए।

12. 349 : 18-21

The elucidation of Christian Science lies in its spiritual sense, and this sense must be gained by its disciples in order to grasp the meaning of this Science.

13. 347: 23-31

यदि क्रिश्चियन विज्ञान लोकप्रिय देवताओं को हटा देता है, - पाप, बीमारी और मृत्यु, - यह मसीह, सत्य है, जो इन बुराइयों को नष्ट कर देता है, और इस प्रकार उनकी शून्यता को सिद्ध करता है।

यह सपना कि मामला और त्रुटि कुछ हैं, कारण और रहस्योद्घाटन के लिए झुकना चाहिए। तब नश्वर लोग बीमारी और पाप की शून्यता देखेंगे, और पाप और बीमारी चेतना से गायब हो जाएगी। सामंजस्यपूर्ण वास्तविक दिखाई देगा, और धार्मिक अवास्तविक।

13. 347 : 23-31

If Christian Science takes away the popular gods, — sin, sickness, and death, — it is Christ, Truth, who destroys these evils, and so proves their nothingness.

The dream that matter and error are something must yield to reason and revelation. Then mortals will behold the nothingness of sickness and sin, and sin and sickness will disappear from consciousness. The harmonious will appear real, and the inharmonious unreal.

14. 345: 17-20

जो क्रिश्चियन साइंस को समझता है वह क्रिश्चियन साइंस के दिव्य सिद्धांत पर बीमारों को ठीक कर सकता है, और यह व्यावहारिक प्रमाण ही एकमात्र संभव सबूत है कि कोई इस विज्ञान को समझता है।

14. 345 : 17-20

One who understands Christian Science can heal the sick on the divine Principle of Christian Science, and this practical proof is the only feasible evidence that one does understand this Science.

15. 412: 13-15

क्राइस्टियन साइंस और दिव्य प्रेम की शक्ति सर्वशक्तिमान है। यह वास्तव में पकड़ को नष्ट करने और बीमारी, पाप और मृत्यु को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है।

15. 412 : 13-15

The power of Christian Science and divine Love is omnipotent. It is indeed adequate to unclasp the hold and to destroy disease, sin, and death.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6