रविवार 24 मार्च, 2024



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वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: लूका 10: 19

"देखो, मैने तुम्हे सांपों और बिच्छुओं को रौंदने का, और शत्रु की सारी सामर्थ पर अधिकार दिया है; और किसी वस्तु से तुम्हें कुछ हानि न होगी।" — मसीह यीशु



Golden Text: Luke 10 : 19

Behold, I give unto you power to tread on serpents and scorpions, and over all the power of the enemy: and nothing shall by any means hurt you.”— Christ Jesus




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उत्तरदायी अध्ययन: 1 राजा 8: 23, 37, 57, 60 • भजन संहिता 56: 3, 4, 11 • यशायाह 40: 5


23     हे इस्राएल के परमेश्वर! तेरे समान न तो ऊपर स्वर्ग में, और न नीचे पृथ्वी पर कोई ईश्वर है।

37     जब इस देश में काल वा मरी वा झुलस हो वा गेरुई वा टिड्डियां वा कीड़े लगें वा उनके शत्रु उनके देश के फाटकों में उन्हें घेर रखें, अथवा कोई विपत्ति वा रोग क्यों न हों,

57     हमारा परमेश्वर यहोवा हमारे संग रहे।

60     और इस से पृथ्वी की सब जातियां यह जान लें, कि यहोवा ही परमेश्वर है; और कोई दूसरा नहीं।

3     जिस समय मुझे डर लगेगा, मैं तुझ पर भरोसा रखूंगा।

4     मैं नहीं डरूंगा। कोई प्राणी मेरा क्या कर सकता है?

11     मैं ने परमेश्वर पर भरोसा रखा है, मैं न डरूंगा। मनुष्य मेरा क्या कर सकता है?

5     तब यहोवा का तेज प्रगट होगा और सब प्राणी उसको एक संग देखेंगे; क्योंकि यहोवा ने आप ही ऐसा कहा है॥

Responsive Reading: I Kings 8 : 23, 37, 57, 60Psalm 56 : 3, 4, 11Isaiah 40 : 5

23.     Lord God of Israel, there is no God like thee, in heaven above, or on earth beneath.

37.     If there be in the land famine, if there be pestilence, blasting, mildew, locust, or if there be caterpillar; if their enemy besiege them in the land of their cities; whatsoever plague, whatsoever sickness there be;

57.     The Lord our God be with us,

60.     That all the people of the earth may know that the Lord is God, and that there is none else.

3.     What time I am afraid, I will trust in thee.

4.     I will not fear what flesh can do unto me.

11.     I will not be afraid what man can do unto me.

5.     And the glory of the Lord shall be revealed, and all flesh shall see it together: for the mouth of the Lord hath spoken it.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. निर्गमन 20: 1-3, 5 (से:)

1     तब परमेश्वर ने ये सब वचन कहे,

2     कि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूं, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात मिस्र देश से निकाल लाया है॥

3     तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना॥

5     तू उन को दण्डवत न करना, और न उनकी उपासना करना॥

1. Exodus 20 : 1-3, 5 (to :)

1     And God spake all these words, saying,

2     I am the Lord thy God, which have brought thee out of the land of Egypt, out of the house of bondage.

3     Thou shalt have no other gods before me.

5     Thou shalt not bow down thyself to them, nor serve them:

2. निर्गमन 23: 1, 7 (से;), 13 (और बनाओ), 23 (से 1st,), 24, 25

1     झूठी बात न फैलाना। अन्यायी साक्षी हो कर दुष्ट का साथ न देना।

7     झूठे मुकद्दमे से दूर रहना।

13     ... और दूसरे देवताओं के नाम की चर्चा न करना, वरन वे तुम्हारे मुंह से सुनाईं भी न दें।

23     इस रीति मेरा दूत तेरे आगे आगे।

24     उनके देवताओं को दण्डवत न करना, और न उनकी उपासना करना, और न उनके से काम करना, वरन उन मूरतों को पूरी रीति से सत्यानाश कर डालना, और उन लोगों की लाटों के टुकड़े टुकड़े कर देना।

25     और तुम अपने परमेश्वर यहोवा की उपासना करना, तब वह तेरे अन्न जल पर आशीष देगा, और तेरे बीच में से रोग दूर करेगा।

2. Exodus 23 : 1, 7 (to ;), 13 (and make), 23 (to 1st ,), 24, 25

1     Thou shalt not raise a false report: put not thine hand with the wicked to be an unrighteous witness.

7     Keep thee far from a false matter;

13     ...and make no mention of the name of other gods, neither let it be heard out of thy mouth.

23     For mine Angel shall go before thee,

24     Thou shalt not bow down to their gods, nor serve them, nor do after their works: but thou shalt utterly overthrow them, and quite break down their images.

25     And ye shall serve the Lord your God, and he shall bless thy bread, and thy water; and I will take sickness away from the midst of thee.

3. उत्पत्ति 32: 1, 3, 6, 7 (से :), 9 (से 2nd,), 10 (से 1st ;), 11, 24-26, 28-30

1     याकूब ने भी अपना मार्ग लिया और परमेश्वर के दूत उसे आ मिले।

3     तब याकूब ने सेईर देश में, अर्थात एदोम देश में, अपने भाई ऐसाव के पास अपने आगे दूत भेज दिए।

6     वे दूत याकूब के पास लौट के कहने लगे, हम तेरे भाई ऐसाव के पास गए थे, और वह भी तुझ से भेंट करने को चार सौ पुरूष संग लिये हुए चला आता है।

7     तब याकूब निपट डर गया, और संकट में पड़ा:

9     फिर याकूब ने कहा, हे यहोवा, हे मेरे दादा इब्राहीम के परमेश्वर, तू ने तो मुझ से कहा, कि अपने देश और जन्म भूमि में लौट जा, और मैं तेरी भलाई करूंगा:

10     तू ने जो जो काम अपनी करूणा और सच्चाई से अपने दास के साथ किए हैं, कि मैं जो अपनी छड़ी ही ले कर इस यरदन नदी के पार उतर आया, सो अब मेरे दो दल हो गए हैं, तेरे ऐसे ऐसे कामों में से मैं एक के भी योग्य तो नहीं हूं।

11     मेरी विनती सुन कर मुझे मेरे भाई ऐसाव के हाथ से बचा: मैं तो उससे डरता हूं, कहीं ऐसा ने हो कि वह आकर मुझे और मां समेत लड़कों को भी मार डाले।

24     और याकूब आप अकेला रह गया; तब कोई पुरूष आकर पह फटने तक उससे मल्लयुद्ध करता रहा।

25     जब उसने देखा, कि मैं याकूब पर प्रबल नहीं होता, तब उसकी जांघ की नस को छूआ; सो याकूब की जांघ की नस उससे मल्लयुद्ध करते ही करते चढ़ गई।

26     तब उसने कहा, मुझे जाने दे, क्योंकि भोर हुआ चाहता है; याकूब ने कहा जब तक तू मुझे आशीर्वाद न दे, तब तक मैं तुझे जाने न दूंगा।

28     उसने कहा तेरा नाम अब याकूब नहीं, परन्तु इस्राएल होगा, क्योंकि तू परमेश्वर से और मनुष्यों से भी युद्ध कर के प्रबल हुआ है।

29     याकूब ने कहा, मैं बिनती करता हूं, मुझे अपना नाम बता। उसने कहा, तू मेरा नाम क्यों पूछता है? तब उसने उसको वहीं आशीर्वाद दिया।

30     तब याकूब ने यह कह कर उस स्थान का नाम पनीएल रखा: कि परमेश्वर को आम्हने साम्हने देखने पर भी मेरा प्राण बच गया है।

3. Genesis 32 : 1, 3, 6, 7 (to :), 9 (to 2nd ,), 10 (to 1st ;), 11, 24-26, 28-30

1     And Jacob went on his way, and the angels of God met him.

3     And Jacob sent messengers before him to Esau his brother unto the land of Seir, the country of Edom.

6     And the messengers returned to Jacob, saying, We came to thy brother Esau, and also he cometh to meet thee, and four hundred men with him.

7     Then Jacob was greatly afraid and distressed:

9     And Jacob said, O God of my father Abraham,

10      I am not worthy of the least of all the mercies, and of all the truth, which thou hast shewed unto thy servant;

11     Deliver me, I pray thee, from the hand of my brother, from the hand of Esau: for I fear him, lest he will come and smite me, and the mother with the children.

24     And Jacob was left alone; and there wrestled a man with him until the breaking of the day.

25     And when he saw that he prevailed not against him, he touched the hollow of his thigh; and the hollow of Jacob’s thigh was out of joint, as he wrestled with him.

26     And he said, Let me go, for the day breaketh. And he said, I will not let thee go, except thou bless me.

28     And he said, Thy name shall be called no more Jacob, but Israel: for as a prince hast thou power with God and with men, and hast prevailed.

29     And Jacob asked him, and said, Tell me, I pray thee, thy name. And he said, Wherefore is it that thou dost ask after my name? And he blessed him there.

30     And Jacob called the name of the place Peniel: for I have seen God face to face, and my life is preserved.

4. भजन संहिता 91: 2-6, 9, 10

2     मैं यहोवा के विषय कहूंगा, कि वह मेरा शरणस्थान और गढ़ है; वह मेरा परमेश्वर है, मैं उस पर भरोसा रखूंगा।

3     वह तो तुझे बहेलिये के जाल से, और महामारी से बचाएगा.

4     वह तुझे अपने पंखों की आड़ में ले लेगा, और तू उसके पैरों के नीचे शरण पाएगा; उसकी सच्चाई तेरे लिये ढाल और झिलम ठहरेगी।

5     तू न रात के भय से डरेगा, और न उस तीर से जो दिन को उड़ता है,

6     न उस मरी से जो अन्धेरे में फैलती है, और न उस महारोग से जो दिन दुपहरी में उजाड़ता है॥

9     हे यहोवा, तू मेरा शरण स्थान ठहरा है। तू ने जो परमप्रधान को अपना धाम मान लिया है,

10     इसलिये कोई विपत्ति तुझ पर न पड़ेगी, न कोई दु:ख तेरे डेरे के निकट आएगा॥

4. Psalm 91 : 2-6, 9, 10

2     I will say of the Lord, He is my refuge and my fortress: my God; in him will I trust.

3     Surely he shall deliver thee from the snare of the fowler, and from the noisome pestilence.

4     He shall cover thee with his feathers, and under his wings shalt thou trust: his truth shall be thy shield and buckler.

5     Thou shalt not be afraid for the terror by night; nor for the arrow that flieth by day;

6     Nor for the pestilence that walketh in darkness; nor for the destruction that wasteth at noonday.

9     Because thou hast made the Lord, which is my refuge, even the most High, thy habitation;

10     There shall no evil befall thee, neither shall any plague come nigh thy dwelling.

5. मत्ती 8: 14-16

14     और यीशु ने पतरस के घर में आकर उस की सास को ज्वर में पड़ी देखा।

15     उस ने उसका हाथ छूआ और उसका ज्वर उतर गया; और वह उठकर उस की सेवा करने लगी।

16     जब संध्या हुई तब वे उसके पास बहुत से लोगों को लाए जिन में दुष्टात्माएं थीं और उस ने उन आत्माओं को अपने वचन से निकाल दिया, और सब बीमारों को चंगा किया।

5. Matthew 8 : 14-16

14     And when Jesus was come into Peter’s house, he saw his wife’s mother laid, and sick of a fever.

15     And he touched her hand, and the fever left her: and she arose, and ministered unto them.

16     When the even was come, they brought unto him many that were possessed with devils: and he cast out the spirits with his word, and healed all that were sick:

6. मत्ती 10: 1, 7 (कह रहा)     केवल, 8 (से :), 20

1     फिर उस ने अपने बारह चेलों को पास बुलाकर, उन्हें अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार दिया, कि उन्हें निकालें और सब प्रकार की बीमारियों और सब प्रकार की दुर्बलताओं को दूर करें॥

7     ... कहो।

8     बीमारों को चंगा करो: मरे हुओं को जिलाओ: कोढिय़ों को शुद्ध करो: दुष्टात्माओं को निकालो।

20     क्योंकि बोलने वाले तुम नहीं हो परन्तु तुम्हारे पिता का आत्मा तुम में बोलता है।

6. Matthew 10 : 1, 7 (saying) only, 8 (to :), 20

1     And when he had called unto him his twelve disciples, he gave them power against unclean spirits, to cast them out, and to heal all manner of sickness and all manner of disease.

7     ...saying,

8     Heal the sick, cleanse the lepers, raise the dead, cast out devils:

20     For it is not ye that speak, but the Spirit of your Father which speaketh in you.

7. इब्रानियों 4: 12, 13 (से :), 14-1

12     क्योंकि परमेश्वर का वचन जीवित, और प्रबल, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है, और जीव, और आत्मा को, और गांठ गांठ, और गूदे गूदे को अलग करके, वार पार छेदता है; और मन की भावनाओं और विचारों को जांचता है।

13     और सृष्टि की कोई वस्तु उस से छिपी नहीं है वरन जिस से हमें काम है, उस की आंखों के साम्हने सब वस्तुएं खुली और बेपरदा हैं॥

14     सो जब हमारा ऐसा बड़ा महायाजक है, जो स्वर्गों से होकर गया है, अर्थात परमेश्वर का पुत्र यीशु; तो आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामें रहे।

15     क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं, जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सके; वरन वह सब बातों में हमारी नाईं परखा तो गया, तौभी निष्पाप निकला।

16     इसलिये आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बान्धकर चलें, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएं, जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे॥

7. Hebrews 4 : 12, 13 (to :), 14-16

12     For the word of God is quick, and powerful, and sharper than any twoedged sword, piercing even to the dividing asunder of soul and spirit, and of the joints and marrow, and is a discerner of the thoughts and intents of the heart.

13     Neither is there any creature that is not manifest in his sight:

14     Seeing then that we have a great high priest, that is passed into the heavens, Jesus the Son of God, let us hold fast our profession.

15     For we have not an high priest which cannot be touched with the feeling of our infirmities; but was in all points tempted like as we are, yet without sin.

16     Let us therefore come boldly unto the throne of grace, that we may obtain mercy, and find grace to help in time of need.

8. लूका 11: 2 (हमारा)

2     हे पिता, तेरा नाम पवित्र माना जाए, तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसे स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी पूरी हो।

8. Luke 11 : 2 (Our)

2     Our Father which art in heaven, Hallowed be thy name. Thy kingdom come. Thy will be done, as in heaven, so in earth.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 228: 25-29 (से 2nd.)

ईश्वर से अलग कोई शक्ति नहीं है। सर्वव्यापी के पास सर्व-शक्ति है, और किसी अन्य शक्ति को स्वीकार करने के लिए भगवान को बेइज्जत करना है विनम्र नाज़रीन ने इस पाप को दूर कर दिया कि पाप, बीमारी और मृत्यु में शक्ति है। उन्होंने उन्हें शक्तिहीन साबित कर दिया।

1. 228 : 25-29 (to 2nd .)

There is no power apart from God. Omnipotence has all-power, and to acknowledge any other power is to dishonor God. The humble Nazarene overthrew the supposition that sin, sickness, and death have power. He proved them powerless. 

2. 139: 4-5

शुरुआत से लेकर अंत तक, पवित्रशास्त्र आत्मा, मन की बात की विजय से भरपूर है।

2. 139 : 4-5

From beginning to end, the Scriptures are full of accounts of the triumph of Spirit, Mind, over matter.

3. 11: 14-18 (से 2nd,)

अब, अतीत की तरह, ये शक्तिशाली कार्य अलौकिक नहीं हैं, बल्कि सर्वोच्च प्राकृतिक हैं। वे इमैनुअल, या "भगवान हमारे साथ है," का संकेत हैं — मानवीय चेतना में मौजूद एक दिव्य प्रभाव और खुद को दोहराते हुए, अब जैसा कि वादा किया गया था, आ रहा है।

3. xi : 14-18 (to 2nd ,)

Now, as then, these mighty works are not supernatural, but supremely natural. They are the sign of Immanuel, or "God with us," — a divine influence ever present in human consciousness and repeating itself, coming now as was promised aforetime,

4. 307: 26-30

मनुष्य को भौतिक आधार से नहीं बनाया गया था, न ही उन भौतिक कानूनों का पालन करने पर प्रतिबंध लगाया गया है जो आत्मा ने कभी नहीं बनाए; उनका प्रांत मन की उच्च विधि में आध्यात्मिक विधियों में है।

4. 307 : 26-30

Man was not created from a material basis, nor bidden to obey material laws which Spirit never made; his province is in spiritual statutes, in the higher law of Mind.

5. 308: 1-6 (से     डरना), 16-25

आप जीवित विश्वास में कला है कि एक ईश्वर है और उसकी आज्ञा रख सकता है?" जब तक सबक नहीं सीखा जाता है कि भगवान एकमात्र मन शासी आदमी है, तब तक नश्वर विश्वास डर जाएगा...

जैकब अकेला था, त्रुटि से जूझ रहा था, - जीवन, पदार्थ और बुद्धि की नश्वर भावना के साथ संघर्ष कर रहा था, जो कि उसके झूठे सुख और दर्द के साथ अस्तित्व में थी, - जब एक स्वर्गदूत, सत्य और प्रेम का एक संदेश, उसके सामने प्रकट हुआ और उसे मार डाला उसकी त्रुटि की नस, या ताकत, जब तक कि उसने इसकी असत्यता नहीं देखी; और सत्य को, इस प्रकार समझा जाने पर, उसे दिव्य विज्ञान के इस पेनियल में आध्यात्मिक शक्ति मिली। तब आध्यात्मिक प्रचारक ने कहा: "मुझे जाने दे, क्योंकि भोर हुआ चाहता है;" अर्थात् सत्य और प्रेम का प्रकाश तुम पर उदय होता है।

5. 308 : 1-6 (to afraid), 16-25

Art thou dwelling in the belief that mind is in matter, and that evil is mind, or art thou in the living faith that there is and can be but one God, and keeping His commandment?" Until the lesson is learned that God is the only Mind governing man, mortal belief will be afraid...

Jacob was alone, wrestling with error, — struggling with a mortal sense of life, substance, and intelligence as existent in matter with its false pleasures and pains, — when an angel, a message from Truth and Love, appeared to him and smote the sinew, or strength, of his error, till he saw its unreality; and Truth, being thereby understood, gave him spiritual strength in this Peniel of divine Science. Then said the spiritual evangel: "Let me go, for the day breaketh;" that is, the light of Truth and Love dawns upon thee.

6. 309: 7-9 (से 2nd.)

जैकब के संघर्ष का परिणाम इस प्रकार सामने आया। उन्होंने आत्मा और आध्यात्मिक शक्ति की समझ से भौतिक त्रुटि पर विजय पा ली थी। इसने आदमी को बदल दिया.

6. 309 : 7-9 (to 2nd .)

The result of Jacob's struggle thus appeared. He had conquered material error with the understanding of Spirit and of spiritual power. This changed the man.

7. 310: 2-6

मानव विश्वास कल्पना करता है कि यह पदार्थ पर विचार को चित्रित करता है, लेकिन पदार्थ क्या है? क्या यह विचार से पहले अस्तित्व में था? पदार्थ कल्पित नश्वर मन-शक्ति से बना है; लेकिन सारी शक्ति दिव्य मन की है।

7. 310 : 2-6

The human belief fancies that it delineates thought on matter, but what is matter? Did it exist prior to thought? Matter is made up of supposititious mortal mind-force; but all might is divine Mind.

8. 108: 19-29

जब मृत्यु-घाटी की छाया में पहले से ही खड़े होकर, नश्वर अस्तित्व की सीमा के पास, मैंने दिव्य विज्ञान में इन सच्चाइयों को सीखा है: सभी वास्तविक अस्तित्व ईश्वर दिव्य मन, में हैं, और कि जीवन, सत्य और प्रेम सर्व-शक्तिशाली और सर्व-वर्तमान हैं; सत्य के विपरीत, - जिसे त्रुटि कहा जाता है, पाप, बीमारी, बीमारी, मृत्यु, सामग्री में मन की झूठी भौतिक भावना की झूठी गवाही है; यह असत्य भावना विकसित होती है, विश्वास में, नश्वर मन की एक व्यक्तिपरक स्थिति जो यह तथाकथित मन के नाम मायने रखती है, जिससे आत्मा की सच्ची भावना बंद हो जाती है।

8. 108 : 19-29

When apparently near the confines of mortal existence, standing already within the shadow of the death-valley, I learned these truths in divine Science: that all real being is in God, the divine Mind, and that Life, Truth, and Love are all-powerful and ever-present; that the opposite of Truth, — called error, sin, sickness, disease, death, — is the false testimony of false material sense, of mind in matter; that this false sense evolves, in belief, a subjective state of mortal mind which this same so-called mind names matter, thereby shutting out the true sense of Spirit.

9. 171: 17-22, 25-30

अपनी उत्पत्ति और प्रकृति को भूलकर, मनुष्य स्वयं को पदार्थ और आत्मा का संयुक्त रूप मानता है। उनका मानना है कि आत्मा को पदार्थ के माध्यम से छान लिया जाता है, तंत्रिका पर ले जाया जाता है, पदार्थ के संचालन द्वारा निष्कासन के लिए उजागर किया जाता है। बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक, - हाँ, अनंत मन की छवि, - गैर-बुद्धि के अधीन!

पदार्थ के तथाकथित नियम कुछ और नहीं बल्कि झूठी मान्यताएं हैं कि बुद्धि और जीवन वहां मौजूद हैं जहां मन नहीं है। ये झूठे विश्वास सभी पापों और बीमारियों का कारण हैं। विपरीत सत्य, कि बुद्धि और जीवन आध्यात्मिक हैं, कभी भौतिक नहीं, पाप, बीमारी और मृत्यु को नष्ट करते हैं।

9. 171 : 17-22, 25-30

Mistaking his origin and nature, man believes himself to be combined matter and Spirit. He believes that Spirit is sifted through matter, carried on a nerve, exposed to ejection by the operation of matter. The intellectual, the moral, the spiritual, — yea, the image of infinite Mind, — subject to non-intelligence!

The so-called laws of matter are nothing but false beliefs that intelligence and life are present where Mind is not. These false beliefs are the procuring cause of all sin and disease. The opposite truth, that intelligence and life are spiritual, never material, destroys sin, sickness,
and death.

10. 274: 12-22

आत्मा की इंद्रियाँ प्रेम में निवास करती हैं, और वे सत्य और जीवन का प्रदर्शन करती हैं। इसलिए ईसाई धर्म और इसकी व्याख्या करने वाला विज्ञान आध्यात्मिक समझ पर आधारित है, और वे पदार्थ के तथाकथित नियमों का स्थान लेते हैं। यीशु ने इस महान सत्य का प्रदर्शन किया। जब हम गलती से जिसे पांच भौतिक इंद्रियां कहते हैं, वह गलत दिशा में होती है, तो वे केवल नश्वर मन की प्रकट मान्यताएं होती हैं, जो पुष्टि करती हैं कि जीवन, पदार्थ और बुद्धि आध्यात्मिक के बजाय भौतिक हैं। ये झूठी मान्यताएँ और उनके उत्पाद शरीर का निर्माण करते हैं, और शरीर आत्मा के विरुद्ध युद्ध करता है।

10. 274 : 12-22

The senses of Spirit abide in Love, and they demonstrate Truth and Life. Hence Christianity and the Science which expounds it are based on spiritual understanding, and they supersede the so-called laws of matter. Jesus demonstrated this great verity. When what we erroneously term the five physical senses are misdirected, they are simply the manifested beliefs of mortal mind, which affirm that life, substance, and intelligence are material, instead of spiritual. These false beliefs and their products constitute the flesh, and the flesh wars against Spirit.

11. 556: 5-7

ये मिथ्या मान्यताएँ तब लुप्त हो जाएँगी, जब आत्मा का विकिरण बुद्धिमान पदार्थ में सभी विश्वासों को हमेशा के लिए नष्ट कर देगा।

11. 556 : 5-7

These false beliefs will disappear, when the radiation of Spirit destroys forever all belief in intelligent matter.

12. 392: 27-15

जब स्थिति मौजूद होती है, जिसे आप कहते हैं कि बीमारी को प्रेरित करता है, चाहे वह हवा, व्यायाम, आनुवंशिकता, छूत या दुर्घटना हो, तो अपने कार्यालय को कुली के रूप में प्रदर्शन करें और इन अस्वास्थ्यकर विचारों और भय को बंद करें। नश्वर मन से अपमानजनक त्रुटियों को बाहर करें; तब शरीर उनसे पीड़ित नहीं हो सकता। दुख या सुख की बात मन से आती है, और जैसे चौकीदार अपना पद छोड़ देता है, हम घुसपैठ की धारणा को स्वीकार करते हैं, यह भूल जाते हैं कि ईश्वरीय सहायता के माध्यम से हम इस प्रवेश द्वार को मना कर सकते हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि शरीर स्व-अभिनय कर रहा है, केवल इसलिए क्योंकि नश्वर मन स्वयं से, अपने कार्यों से और उनके परिणामों से अनभिज्ञ है, - इस बात से अनभिज्ञ है कि सभी बुरे प्रभावों का पूर्वगामी, दूरस्थ और रोमांचक कारण तथाकथित का कानून है नश्वर मन, पदार्थ का नहीं। मन शारीरिक इंद्रियों का स्वामी है, और बीमारी, पाप और मृत्यु को जीत सकता है। इस ईश्वर प्रदत्त अधिकार का प्रयोग करें। अपने शरीर पर अधिकार कर लो, और उसकी भावना और कार्य को नियंत्रित करो। आत्मा के सामर्थ्य में वृद्धि का विरोध करना अच्छा है। ईश्वर ने मनुष्य को इसके लिए सक्षम बनाया है, और कुछ भी मनुष्य में दिव्य रूप से दी गई क्षमता और शक्ति को नष्ट नहीं कर सकता है।

12. 392 : 27-15

When the condition is present which you say induces disease, whether it be air, exercise, heredity, contagion, or accident, then perform your office as porter and shut out these unhealthy thoughts and fears. Exclude from mortal mind the offending errors; then the body cannot suffer from them. The issues of pain or pleasure must come through mind, and like a watchman forsaking his post, we admit the intruding belief, forgetting that through divine help we can forbid this entrance.

The body seems to be self-acting, only because mortal mind is ignorant of itself, of its own actions, and of their results, — ignorant that the predisposing, remote, and exciting cause of all bad effects is a law of so-called mortal mind, not of matter. Mind is the master of the corporeal senses, and can conquer sickness, sin, and death. Exercise this God-given authority. Take possession of your body, and govern its feeling and action. Rise in the strength of Spirit to resist all that is unlike good. God has made man capable of this, and nothing can vitiate the ability and power divinely bestowed on man.

13. 393: 29-30

मनुष्य कभी बीमार नहीं होता, क्योंकि मन बीमार नहीं होता और न ही पदार्थ हो सकता है।

13. 393 : 29-30

Man is never sick, for Mind is not sick and matter cannot be.

14. 475: 28     केवल

मनुष्य पाप, बीमारी और मृत्यु के लिए अक्षम है।

14. 475 : 28 only

Man is incapable of sin, sickness, and death.

15. 476: 21-22

इसे जानें, नश्वर, और ईमानदारी से मनुष्य की आध्यात्मिक स्थिति की तलाश करें, जो सभी भौतिक स्वार्थ से अप्रासंगिक है।

15. 476 : 21-22

Learn this, O mortal, and earnestly seek the spiritual status of man, which is outside of all material selfhood.

16. 16: 27, 29, 31

हमारे पिता-माता भगवान, सभी सामंजस्यपूर्ण,

मनमोहक

तेरा राज्य आ गया; तू हमेशा मौजूद है।.

16. 16 : 27, 29, 31

Our Father-Mother God, all-harmonious,

Adorable One.

Thy kingdom is come; Thou art ever-present.

17. 17: 2-3

जैसा कि स्वर्ग में पृथ्वी पर भी है, हमें यह जानने में सक्षम करें, कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है, सर्वोच्च है।

17. 17 : 2-3

Enable us to know, — as in heaven, so on earth, — God is omnipotent, supreme.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6