रविवार 24 नवंबर, 2019 |

रविवार 24 नवंबर, 2019



विषयआत्मा और शरीर

SubjectSoul and Body

वर्ण पाठ: इफिसियों 5 : 23

मसीह कलीसिया का सिर है; और आप ही देह का उद्धारकर्ता है।



Golden Text: Ephesians 5 : 23

Christ is the head of the church: and he is the saviour of the body.




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यशायाह 55 : 3, 6, 8-11


3     कान लगाओ, और मेरे पास आओ; सुनो, तब तुम जीवित रहोगे।

6     जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो, जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो;

8     क्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं है, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है।

9     क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है॥

10     जिस प्रकार से वर्षा और हिम आकाश से गिरते हैं और वहां यों ही लौट नहीं जाते, वरन भूमि पर पड़कर उपज उपजाते हैं जिस से बोने वाले को बीज और खाने वाले को रोटी मिलती है,

11     उसी प्रकार से मेरा वचन भी होगा जो मेरे मुख से निकलता है; वह व्यर्थ ठहरकर मेरे पास न लौटेगा, परन्तु, जो मेरी इच्छा है उसे वह पूरा करेगा, और जिस काम के लिये मैं ने उसको भेजा है उसे वह सफल करेगा॥

Responsive Reading: Isaiah 55 : 3, 6, 8-11

3.     Incline your ear, and come unto me: hear, and your soul shall live.

6.     Seek ye the Lord while he may be found, call ye upon him while he is near.

8.     For my thoughts are not your thoughts, neither are your ways my ways, saith the Lord.

9.     For as the heavens are higher than the earth, so are my ways higher than your ways, and my thoughts than your thoughts.

10.     For as the rain cometh down, and the snow from heaven, and returneth not thither, but watereth the earth, and maketh it bring forth and bud, that it may give seed to the sower, and bread to the eater:

11.     So shall my word be that goeth forth out of my mouth: it shall not return unto me void, but it shall accomplish that which I please, and it shall prosper in the thing whereto I sent it.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 34 : 22

22     यहोवा अपने दासों का प्राण मोल लेकर बचा लेता है; और जितने उसके शरणागत हैं उन में से कोई भी दोषी न ठहरेगा॥

1. Psalm 34 : 22

22     The Lord redeemeth the soul of his servants: and none of them that trust in him shall be desolate.

2. भजन संहिता 107 : 8, 9

8     लोग यहोवा की करूणा के कारण, और उन आश्चर्यकर्मों के कारण, जो वह मनुष्यों के लिये करता है, उसका धन्यवाद करें!

9     क्योंकि वह अभिलाषी जीव को सन्तुष्ट करता है, और भूखे को उत्तम पदार्थों से तृप्त करता है॥

2. Psalm 107 : 8, 9

8     Oh that men would praise the Lord for his goodness, and for his wonderful works to the children of men!

9     For he satisfieth the longing soul, and filleth the hungry soul with goodness.

3. दानिय्येल 1 : 1, 3-6, 8 (से :), 11-15, 18 (फिर)-20

1     यहूदा के राजा यहोयाकीम के राज्य के तीसरे वर्ष में बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर ने यरूशेलम पर चढ़ाई कर के उसको घेर लिया।

3     तब उस राजा ने अपने खोजों के प्रधान अशपनज को आज्ञा दी कि इस्राएली राजपुत्रों और प्रतिष्ठित पुरूषों में से ऐसे कई जवानों को ला,

4     जो निर्दोष, सुन्दर और सब प्रकार की बुद्धि में प्रवीण, और ज्ञान में निपुण और विद्वान् और राजमन्दिर में हाजिर रहने के योग्य हों; और उन्हें कसदियों के शास्त्र और भाषा की शिक्षा दे।

5     और राजा ने आज्ञा दी कि उसके भोजन और पीने के दाखमधु में से उन्हें प्रतिदिन खाने-पीने को दिया जाए। इस प्रकार तीन वर्ष तक उनका पालन पोषण होता रहे; तब उसके बाद वे राजा के साम्हने हाजिर किए जाएं।

6     उन में यहूदा की सन्तान से चुने हुए, दानिय्येल, हनन्याह, मीशाएल, और अजर्याह नाम यहूदी थे।

8     परन्तु दानिय्येल ने अपने मन में ठान लिया कि वह राजा का भोजन खाकर, और उसके पीने का दाखमधु पीकर अपवित्र न होए; इसलिये उसने खोजों के प्रधान से बिनती की कि उसे अपवित्र न होना पड़े।

11     तब दानिय्येल ने उस मुखिये से, जिस को खोजों के प्रधान ने दानिय्येल, हनन्याह, मीशाएल, और अजर्याह के ऊपर देखभाल करने के लिये नियुक्त किया था, कहा,

12     मैं तेरी बिनती करता हूं, अपने दासों को दस दिन तक जांच, हमारे खाने के लिये सागपात और पीने के लिये पानी ही दिया जाए।

13     फिर दस दिन के बाद हमारे मुंह और जो जवान राजा का भोजन खाते हैं उनके मुंह को देख; और जैसा तुझे देख पड़े, उसी के अनुसार अपने दासों से व्यवहार करना।

14     उनकी यह बिनती उसने मान ली, और दास दिन तक उन को जांचता रहा।

15     दस दिन के बाद उनके मुंह राजा के भोजन के खाने वाले सब जवानों से अधिक अच्छे और चिकने देख पड़े।

18     ...तब खोजों का प्रधान उन्हें उसके सामने ले गया।

19     और राजा उन से बातचीत करने लगा; और दानिय्येल, हनन्याह, मीशाएल, और अजर्याह के तुल्य उन सब में से कोई न ठहरा; इसलिये वे राजा के सम्मुख हाजिर रहने लगे।

20     और बुद्धि और हर प्रकार की समझ के विषय में जो कुछ राजा उन से पूछता था उस में वे राज्य भर के सब ज्योतिषयों और तन्त्रियों से दस गुणे निपुण ठहरते थे।

1. I कुरिन्थियों 6 : 19, 20

19     क्या तुम नहीं जानते, कि तुम्हारी देह पवित्रात्मा का मन्दिर है; जो तुम में बसा हुआ है और तुम्हें परमेश्वर की ओर से मिला है, और तुम अपने नहीं हो?

20     क्योंकि दाम देकर मोल लिये गए हो, इसलिये अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो॥

3. Daniel 1 : 1, 3-6, 8 (to :), 11-15, 18 (then)-20

1     In the third year of the reign of Jehoiakim king of Judah came Nebuchadnezzar king of Babylon unto Jerusalem, and besieged it.

3     And the king spake unto Ashpenaz the master of his eunuchs, that he should bring certain of the children of Israel, and of the king’s seed, and of the princes;

4     Children in whom was no blemish, but well favoured, and skilful in all wisdom, and cunning in knowledge, and understanding science, and such as had ability in them to stand in the king’s palace, and whom they might teach the learning and the tongue of the Chaldeans.

5     And the king appointed them a daily provision of the king’s meat, and of the wine which he drank: so nourishing them three years, that at the end thereof they might stand before the king.

6     Now among these were of the children of Judah, Daniel, Hananiah, Mishael, and Azariah:

8     But Daniel purposed in his heart that he would not defile himself with the portion of the king’s meat, nor with the wine which he drank:

11     Then said Daniel to Melzar, whom the prince of the eunuchs had set over Daniel, Hananiah, Mishael, and Azariah,

12     Prove thy servants, I beseech thee, ten days; and let them give us pulse to eat, and water to drink.

13     Then let our countenances be looked upon before thee, and the countenance of the children that eat of the portion of the king’s meat: and as thou seest, deal with thy servants.

14     So he consented to them in this matter, and proved them ten days.

15     And at the end of ten days their countenances appeared fairer and fatter in flesh than all the children which did eat the portion of the king’s meat.

18     …then the prince of the eunuchs brought them in before Nebuchadnezzar.

19     And the king communed with them; and among them all was found none like Daniel, Hananiah, Mishael, and Azariah: therefore stood they before the king.

20     And in all matters of wisdom and understanding, that the king enquired of them, he found them ten times better than all the magicians and astrologers that were in all his realm.

4. मत्ती 12 : 1 (यीशु) (से ;), 22-28

1     उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था।

22     तब लोग एक अन्धे-गूंगे को जिस में दुष्टात्मा थी, उसके पास लाए; और उस ने उसे अच्छा किया; और वह गूंगा बोलने और देखने लगा।

23     इस पर सब लोग चकित होकर कहने लगे, यह क्या दाऊद की सन्तान का है?

24     परन्तु फरीसियों ने यह सुनकर कहा, यह तो दुष्टात्माओं के सरदार शैतान की सहायता के बिना दुष्टात्माओं को नहीं निकालता।

25     उस ने उन के मन की बात जानकर उन से कहा; जिस किसी राज्य में फूट होती है, वह उजड़ जाता है, और कोई नगर या घराना जिस में फूट होती है, बना न रहेगा।

26     और यदि शैतान ही शैतान को निकाले, तो वह अपना ही विरोधी हो गया है; फिर उसका राज्य क्योंकर बना रहेगा?

27     भला, यदि मैं शैतान की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता हूं, तो तुम्हारे वंश किस की सहायता से निकालते हैं? इसलिये वे ही तुम्हारा न्याय चुकाएंगे।

28     पर यदि मैं परमेश्वर के आत्मा की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता हूं, तो परमेश्वर का राज्य तुम्हारे पास आ पहुंचा है।

4. I Corinthians 6 : 19, 20

19     What? know ye not that your body is the temple of the Holy Ghost which is in you, which ye have of God, and ye are not your own?

20     For ye are bought with a price: therefore glorify God in your body, and in your spirit, which are God’s.

5. रोमियो 8 : 1, 2, 22, 23

1     सो अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं: क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के अनुसार चलते हैं।

2     क्योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया।

22     क्योंकि हम जानते हैं, कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कराहती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है।

23     और केवल वही नहीं पर हम भी जिन के पास आत्मा का पहिला फल है, आप ही अपने में कराहते हैं; और लेपालक होने की, अर्थात अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हैं।

5. Matthew 12 : 1 (Jesus) (to ;), 22-28

1     Jesus went on the sabbath day through the corn;

22     Then was brought unto him one possessed with a devil, blind, and dumb: and he healed him, insomuch that the blind and dumb both spake and saw.

23     And all the people were amazed, and said, Is not this the son of David?

24     But when the Pharisees heard it, they said, This fellow doth not cast out devils, but by Beelzebub the prince of the devils.

25     And Jesus knew their thoughts, and said unto them, Every kingdom divided against itself is brought to desolation; and every city or house divided against itself shall not stand:

26     And if Satan cast out Satan, he is divided against himself; how shall then his kingdom stand?

27     And if I by Beelzebub cast out devils, by whom do your children cast them out? therefore they shall be your judges.

28     But if I cast out devils by the Spirit of God, then the kingdom of God is come unto you.

6. II कुरिन्थियों 5 : 1-8

1     क्योंकि हम जानते हैं, कि जब हमारा पृथ्वी पर का डेरा सरीखा घर गिराया जाएगा तो हमें परमेश्वर की ओर से स्वर्ग पर एक ऐसा भवन मिलेगा, जो हाथों से बना हुआ घर नहीं परन्तु चिरस्थाई है।

2     इस में तो हम कराहते, और बड़ी लालसा रखते हैं; कि अपने स्वर्गीय घर को पहिन लें।

3     कि इस के पहिनने से हम नंगे न पाए जाएं।

4     और हम इस डेरे में रहते हुए बोझ से दबे कराहते रहते हैं; क्योंकि हम उतारना नहीं, वरन और पहिनना चाहते हैं, ताकि वह जो मरनहार है जीवन में डूब जाए।

5     और जिस ने हमें इसी बात के लिये तैयार किया है वह परमेश्वर है, जिस ने हमें बयाने में आत्मा भी दिया है।

6     सो हम सदा ढाढ़स बान्धे रहते हैं और यह जानते हैं; कि जब तक हम देह में रहते हैं, तब तक प्रभु से अलग हैं।

7     क्योंकि हम रूप को देखकर नहीं, पर विश्वास से चलते हैं।

8     इसलिये हम ढाढ़स बान्धे रहते हैं, और देह से अलग होकर प्रभु के साथ रहना और भी उत्तम समझते हैं।

6. Romans 8 : 1, 2, 22, 23

1     There is therefore now no condemnation to them which are in Christ Jesus, who walk not after the flesh, but after the Spirit.

2     For the law of the Spirit of life in Christ Jesus hath made me free from the law of sin and death.

22     For we know that the whole creation groaneth and travaileth in pain together until now.

23     And not only they, but ourselves also, which have the firstfruits of the Spirit, even we ourselves groan within ourselves, waiting for the adoption, to wit, the redemption of our body.

7. I थिस्सलुनीकियों 5 : 23

23     शान्ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे; और तुम्हारी आत्मा और प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक पूरे पूरे और निर्दोष सुरक्षित रहें।

7. II Corinthians 5 : 1-8

1     For we know that if our earthly house of this tabernacle were dissolved, we have a building of God, an house not made with hands, eternal in the heavens.

2     For in this we groan, earnestly desiring to be clothed upon with our house which is from heaven:

3     If so be that being clothed we shall not be found naked.

4     For we that are in this tabernacle do groan, being burdened: not for that we would be unclothed, but clothed upon, that mortality might be swallowed up of life.

5     Now he that hath wrought us for the selfsame thing is God, who also hath given unto us the earnest of the Spirit.

6     Therefore we are always confident, knowing that, whilst we are at home in the body, we are absent from the Lord:

7     (For we walk by faith, not by sight:)

8     We are confident, I say, and willing rather to be absent from the body, and to be present with the Lord.

8. I Thessalonians 5 : 23

23     And the very God of peace sanctify you wholly; and I pray God your whole spirit and soul and body be preserved blameless unto the coming of our Lord Jesus Christ.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 477 : 26 केवल

मनुष्य आत्मा की अभिव्यक्ति है।

1. 477 : 26 only

Man is the expression of Soul.

2. 335 : 16 (परमेश्वर)-18, 20-21, 22-24

भगवान और आत्मा एक हैं, और यह एक सीमित दिमाग या एक सीमित शरीर में कभी भी शामिल नहीं है। … क्योंकि आत्मा अमर है, यह मृत्यु दर में मौजूद नहीं है। ... आत्मा के झूठे अर्थों को खोने के द्वारा ही हम जीवन के अनन्त जीवन को प्रकाश में लाए गए अमरत्व को प्राप्त कर सकते हैं।

2. 335 : 16 (God)-18, 20-21, 22-24

God and Soul are one, and this one never included in a limited mind or a limited body. … Because Soul is immortal, it does not exist in mortality. … Only by losing the false sense of Soul can we gain the eternal unfolding of Life as immortality brought to light.

3. 427 : 2-7, 9-12

जीवन आत्मा का नियम है, यहां तक कि सत्य की आत्मा का कानून, और आत्मा कभी भी अपने प्रतिनिधि के बिना नहीं है। मनुष्य की आत्मा न तो मर सकती है और न ही बेहोशी में गायब हो सकती है, क्योंकि आत्मा अमर है। ... यह विश्वास कि अस्तित्व अस्तित्व में है, जीवन को समझने और सामंजस्य प्राप्त करने से पहले विज्ञान से मिलना और उसमें महारत हासिल करना चाहिए।

3. 427 : 2-7, 9-12

Life is the law of Soul, even the law of the spirit of Truth, and Soul is never without its representative. Man's individual being can no more die nor disappear in unconsciousness than can Soul, for both are immortal. … The belief that existence is contingent on matter must be met and mastered by Science, before Life can be understood and harmony obtained. 

4. 119 : 25-9

सूर्योदय को देखने में, कोई पाता है कि यह इंद्रियों के सामने सबूतों का खंडन करता है कि यह विश्वास है कि पृथ्वी गति में है और सूर्य आराम के लिए है। चूंकि खगोल विज्ञान सौर प्रणाली के आंदोलन की मानवीय धारणा को उलट देता है, इसलिए ईसाई विज्ञान आत्मा और शरीर के प्रतीत होने वाले संबंध को उलट देता है और शरीर को मन की सहायक बनाता है। इस प्रकार यह मनुष्य के साथ है, जो संयमशील मन का विनम्र सेवक है, हालांकि यह समझदारी को अन्यथा प्रकट करता है। लेकिन हम इसे कभी नहीं समझेंगे जबकि हम स्वीकार करते हैं कि आत्मा शरीर या मन में है, और वह आदमी गैर-बुद्धि में शामिल है। आत्मा या आत्मा, ईश्वर, अपरिवर्तनीय और शाश्वत है; और मनुष्य आत्मा, ईश्वर के साथ सह-अस्तित्व रखता है, क्योंकि मनुष्य ईश्वर की छवि है।

विज्ञान भौतिक इंद्रियों की झूठी गवाही को उलट देता है, और इस उलट नश्वरता के मूल तथ्यों पर पहुंचता है।

4. 119 : 25-9

In viewing the sunrise, one finds that it contradicts the evidence before the senses to believe that the earth is in motion and the sun at rest. As astronomy reverses the human perception of the movement of the solar system, so Christian Science reverses the seeming relation of Soul and body and makes body tributary to Mind. Thus it is with man, who is but the humble servant of the restful Mind, though it seems otherwise to finite sense. But we shall never understand this while we admit that soul is in body or mind in matter, and that man is included in non-intelligence. Soul, or Spirit, is God, unchangeable and eternal; and man coexists with and reflects Soul, God, for man is God's image.

Science reverses the false testimony of the physical senses, and by this reversal mortals arrive at the fundamental facts of being.

5. 120: 15 (से ;)

स्वास्थ्य पदार्थ की नहीं, मन की स्थिति है;

5. 120 : 15 (to ;)

Health is not a condition of matter, but of Mind;

6. 388 : 12-24

आम परिकल्पना स्वीकार करें कि भोजन जीवन का पोषक है, और विपरीत दिशा में एक और प्रवेश के लिए आवश्यकता का पालन करता है, — उस भोजन में कमी या अधिकता, गुणवत्ता या मात्रा के माध्यम से जीवन, ईश्वर को नष्ट करने की शक्ति है। यह सभी भौतिक स्वास्थ्य-सिद्धांतों की अस्पष्ट प्रकृति का एक नमूना है। वे आत्म-विरोधाभासी और आत्म-विनाशकारी हैं, जो "खुद के खिलाफ विभाजित राज्य," का गठन करते हैं। जो "उजाड़ हो जाता है।" यदि भोजन यीशु द्वारा अपने शिष्यों के लिए तैयार किया गया था, तो यह जीवन को नष्ट नहीं कर सकता।

तथ्य यह है कि भोजन मनुष्य के पूर्ण जीवन को प्रभावित नहीं करता है, और यह स्वयं स्पष्ट हो जाता है, जब हम सीखते हैं कि भगवान हमारा जीवन है।

6. 388 : 12-24

Admit the common hypothesis that food is the nutriment of life, and there follows the necessity for another admission in the opposite direction, — that food has power to destroy Life, God, through a deficiency or an excess, a quality or a quantity. This is a specimen of the ambiguous nature of all material health-theories. They are self-contradictory and self-destructive, constituting a "kingdom divided against itself," which is "brought to desolation." If food was prepared by Jesus for his disciples, it cannot destroy life.

The fact is, food does not affect the absolute Life of man, and this becomes self-evident, when we learn that God is our Life.

7. 220 : 26-30

यह विश्वास कि उपवास या भोज करना पुरुषों को नैतिक रूप से बेहतर बनाता है या शारीरिक रूप से "अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष" के फल में से एक है, जिसके बारे में भगवान ने कहा, "आप इसे नहीं खाएंगे।"

7. 220 : 26-30

The belief that either fasting or feasting makes men better morally or physically is one of the fruits of "the tree of the knowledge of good and evil," concerning which God said, "Thou shalt not eat of it."

8. 442 : 22-25

क्राइस्ट, ट्रुथ, मॉर्टल्स को अस्थायी भोजन और कपड़े देता है जब तक कि सामग्री गायब नहीं हो जाती, जो आदर्श के साथ बदल जाती है, और जब तक आदमी को कपड़े नहीं पहनाए जाते हैं और आध्यात्मिक रूप से नहीं खिलाया जाता है।

8. 442 : 22-25

Christ, Truth, gives mortals temporary food and clothing until the material, transformed with the ideal, disappears, and man is clothed and fed spiritually.

9. 176 : 7-10

भोजन के बारे में कोई विचार न करने के आदिम रिवाज ने पेट और आंतों को प्रकृति की आज्ञाकारिता में कार्य करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया, और इसने शरीर पर इसके शानदार प्रभावों को देखने का मौका दिया।

9. 176 : 7-10

The primitive custom of taking no thought about food left the stomach and bowels free to act in obedience to nature, and gave the gospel a chance to be seen in its glorious effects upon the body.

10. 168 : 15-23

क्योंकि मानव निर्मित प्रणालियाँ इस बात पर जोर देती हैं कि मनुष्य बीमार और बेकार हो जाता है, पीड़ित होता है और मर जाता है, सभी ईश्वर के नियमों के अनुरूप होते हैं, तो क्या हम इस पर विश्वास करते हैं? क्या हम एक ऐसे अधिकारी पर विश्वास करते हैं जो पूर्णता से संबंधित भगवान की आध्यात्मिक आज्ञा को अस्वीकार करता है, — एक अधिकार जो यीशु को झूठा साबित हुआ? उसने पिता की इच्छा पूरी की। उन्होंने कहा कि बीमारी कानून कहा जाता है, लेकिन भगवान के कानून, मन के कानून के अनुसार की रक्षा में बीमारी चंगा।

10. 168 : 15-23

Because man-made systems insist that man becomes sick and useless, suffers and dies, all in consonance with the laws of God, are we to believe it? Are we to believe an authority which denies God's spiritual command relating to perfection, — an authority which Jesus proved to be false? He did the will of the Father. He healed sickness in defiance of what is called material law, but in accordance with God's law, the law of Mind.

11. 390 : 4-18, 23-26

हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि जीवन आत्मनिर्भर है और हमें आत्मा के सदा के सामंजस्य से इनकार नहीं करना चाहिए, सिर्फ इसलिए कि, नश्वर इंद्रियों के लिए, प्रतीत होता है कलह। यह ईश्वर की हमारी अज्ञानता है, ईश्वरीय सिद्धांत, जो स्पष्ट कलह उत्पन्न करता है, और उसके सामंजस्य की सही समझ। सत्य हम सभी को आत्मा के सुख के लिए सुखों और दुखों के आदान-प्रदान के लिए मजबूर करेगा।

जब रोग के पहले लक्षण दिखाई देते हैं, तो दिव्य विज्ञान के साथ सामग्री इंद्रियों की गवाही का विवाद करें। न्याय की अपनी उच्च भावना को नश्वर राय की झूठी प्रक्रिया को नष्ट करने दें, जिसे आप कानून का नाम देते हैं, और फिर आप एक बीमारी तक ही सीमित नहीं होंगे और न ही अंतिम भुगतान के भुगतान में पीड़ित होने की स्थिति में, जो कि अंतिम दंड है, जो त्रुटि की मांग करता है। … आपके पास पाप या बीमारी की आवश्यकता का समर्थन करने के लिए उसका कोई कानून नहीं है, लेकिन आपके पास उस आवश्यकता को नकारने और बीमार को ठीक करने के लिए दिव्य अधिकार है।

11. 390 : 4-18, 23-26

We cannot deny that Life is self-sustained, and we should never deny the everlasting harmony of Soul, simply because, to the mortal senses, there is seeming discord. It is our ignorance of God, the divine Principle, which produces apparent discord, and the right understanding of Him restores harmony. Truth will at length compel us all to exchange the pleasures and pains of sense for the joys of Soul.

When the first symptoms of disease appear, dispute the testimony of the material senses with divine Science. Let your higher sense of justice destroy the false process of mortal opinions which you name law, and then you will not be confined to a sick-room nor laid upon a bed of suffering in payment of the last farthing, the last penalty demanded by error. … You have no law of His to support the necessity either of sin or sickness, but you have divine authority for denying that necessity and healing the sick.

12. 391 : 29-2

मानसिक रूप से शरीर से हर शिकायत का खंडन करते हैं, और जीवन की सच्ची चेतना को प्रेम के रूप में जन्म देते हैं, - जैसा कि सभी शुद्ध हैं, और आत्मा के फल को प्रभावित करते हैं। भय बीमारी का फव्वारा है, और आप डर और ईश्वरीय मन के माध्यम से पाप करते हैं; इसलिए यह दिव्य मन के माध्यम से है कि आप बीमारी को दूर करते हैं।

12. 391 : 29-2

Mentally contradict every complaint from the body, and rise to the true consciousness of Life as Love, — as all that is pure, and bearing the fruits of Spirit. Fear is the fountain of sickness, and you master fear and sin through divine Mind; hence it is through divine Mind that you overcome disease.

13. 393 : 4-18

शरीर आत्म-कार्य करने लगता है, केवल इसलिए कि नश्वर मन स्वयं के अज्ञान से, अपने कार्यों से और अपने परिणामों से, — अज्ञानी कि सभी बुरे प्रभावों का पूर्वाभास, दूरस्थ और रोमांचक कारण, तथाकथित नश्वर मन का एक नियम है, पदार्थ का नहीं। मन शारीरिक इंद्रियों का स्वामी है, और बीमारी, पाप और मृत्यु को जीत सकता है। इस ईश्वर प्रदत्त अधिकार का प्रयोग करें। अपने शरीर पर अधिकार कर लो, और उसकी भावना और कार्य को नियंत्रित करो। आत्मा के सामर्थ्य में वृद्धि का विरोध करना अच्छा है। ईश्वर ने मनुष्य को इसके लिए सक्षम बनाया है, और कुछ भी मनुष्य में दिव्य रूप से दी गई क्षमता और शक्ति को नष्ट नहीं कर सकता है।

अपनी समझ में दृढ़ रहें कि दिव्य मन शासन करता है, और यह कि विज्ञान में मनुष्य ईश्वर की सरकार को दर्शाता है।

13. 393 : 4-18

The body seems to be self-acting, only because mortal mind is ignorant of itself, of its own actions, and of their results, — ignorant that the predisposing, remote, and exciting cause of all bad effects is a law of so-called mortal mind, not of matter. Mind is the master of the corporeal senses, and can conquer sickness, sin, and death. Exercise this God-given authority. Take possession of your body, and govern its feeling and action. Rise in the strength of Spirit to resist all that is unlike good. God has made man capable of this, and nothing can vitiate the ability and power divinely bestowed on man.

Be firm in your understanding that the divine Mind governs, and that in Science man reflects God's government.

14. 302 : 14 (चलो)-18, 19-24

… हमें याद रखना चाहिए कि सामंजस्यपूर्ण और अमर आदमी हमेशा के लिए अस्तित्व में है, और किसी भी जीवन, पदार्थ और बुद्धि के नश्वर भ्रम से परे और हमेशा मौजूद है। … मनुष्य के पूर्ण, यहाँ तक कि पिता के रूप में भी पूर्ण होने का विज्ञान बताता है, क्योंकि आध्यात्मिक मनुष्य का आत्मा या मन, ईश्वर है, जो सभी का दिव्य सिद्धांत है, और क्योंकि यह वास्तविक व्यक्ति आत्मा के बजाय आत्मा के नियम द्वारा शासित है, न कि पदार्थ के तथाकथित नियमों द्वारा।

14. 302 : 14 (let)-18, 19-24

…let us remember that harmonious and immortal man has existed forever, and is always beyond and above the mortal illusion of any life, substance, and intelligence as existent in matter. … The Science of being reveals man as perfect, even as the Father is perfect, because the Soul, or Mind, of the spiritual man is God, the divine Principle of all being, and because this real man is governed by Soul instead of sense, by the law of Spirit, not by the so-called laws of matter.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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