रविवार 24 दिसंबर, 2023



विषयमसीह ईसा

SubjectChrist Jesus

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: इफिसियों 1: 2

"हमारे पिता परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह की ओर से तुम्हें अनुग्रह और शान्ति मिलती रहे॥"



Golden Text: Ephesians 1 : 2

Grace be to you, and peace, from God our Father, and from the Lord Jesus Christ.




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उत्तरदायी अध्ययन: इफिसियों 3: 14-21


14     मैं इसी कारण उस पिता के साम्हने घुटने टेकता हूं,

15     जिस से स्वर्ग और पृथ्वी पर, हर एक घराने का नाम रखा जाता है।

16     कि वह अपनी महिमा के धन के अनुसार तुम्हें यह दान दे, कि तुम उसके आत्मा से अपने भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ पाकर बलवन्त होते जाओ।

17     और विश्वास के द्वारा मसीह तुम्हारे हृदय में बसे कि तुम प्रेम में जड़ पकड़ कर और नेव डाल कर।

18     सब पवित्र लोगों के साथ भली भांति समझने की शक्ति पाओ; कि उसकी चौड़ाई, और लम्बाई, और ऊंचाई, और गहराई कितनी है।

19     और मसीह के उस प्रेम को जान सको जो ज्ञान से परे है, कि तुम परमेश्वर की सारी भरपूरी तक परिपूर्ण हो जाओ॥

20     अब जो ऐसा सामर्थी है, कि हमारी बिनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकता है, उस सामर्थ के अनुसार जो हम में कार्य करता है,

21     कलीसिया में, और मसीह यीशु में, उस की महिमा पीढ़ी से पीढ़ी तक युगानुयुग होती रहे। आमीन॥

Responsive Reading: Ephesians 3 : 14-21

14.     For this cause I bow my knees unto the Father of our Lord Jesus Christ,

15.     Of whom the whole family in heaven and earth is named,

16.     That he would grant you, according to the riches of his glory, to be strengthened with might by his Spirit in the inner man;

17.     That Christ may dwell in your hearts by faith; that ye, being rooted and grounded in love,

18.     May be able to comprehend with all saints what is the breadth, and length, and depth, and height;

19.     And to know the love of Christ, which passeth knowledge, that ye might be filled with all the fulness of God.

20.     Now unto him that is able to do exceeding abundantly above all that we ask or think, according to the power that worketh in us,

21.     Unto him be glory in the church by Christ Jesus throughout all ages, world without end.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. लूका 1: 26-28 (से :), 31-35, 37

26     छठवें महीने में परमेश्वर की ओर से जिब्राईल स्वर्गदूत गलील के नासरत नगर में एक कुंवारी के पास भेजा गया।

27     जिस की मंगनी यूसुफ नाम दाऊद के घराने के एक पुरूष से हुई थी: उस कुंवारी का नाम मरियम था।

28     और स्वर्गदूत ने उसके पास भीतर आकर कहा; आनन्द और जय तेरी हो, जिस पर ईश्वर का अनुग्रह हुआ है, प्रभु तेरे साथ है।

31     और देख, तू गर्भवती होगी, और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा; तू उसका नाम यीशु रखना।

32     वह महान होगा; और परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा; और प्रभु परमेश्वर उसके पिता दाऊद का सिंहासन उस को देगा।

33     और वह याकूब के घराने पर सदा राज्य करेगा; और उसके राज्य का अन्त न होगा।

34     मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, यह क्योंकर होगा? मैं तो पुरूष को जानती ही नहीं।

35     स्वर्गदूत ने उस को उत्तर दिया; कि पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा, और परमप्रधान की सामर्थ तुझ पर छाया करेगी इसलिये वह पवित्र जो उत्पन्न होनेवाला है, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।

37     क्योंकि जो वचन परमेश्वर की ओर से होता है वह प्रभावरिहत नहीं होता।

1. Luke 1 : 26-28 (to :), 31-35, 37

26     And in the sixth month the angel Gabriel was sent from God unto a city of Galilee, named Nazareth,

27     To a virgin espoused to a man whose name was Joseph, of the house of David; and the virgin’s name was Mary.

28     And the angel came in unto her, and said, Hail, thou that art highly favoured, the Lord is with thee:

31     And, behold, thou shalt conceive in thy womb, and bring forth a son, and shalt call his name JESUS.

32     He shall be great, and shall be called the Son of the Highest: and the Lord God shall give unto him the throne of his father David:

33     And he shall reign over the house of Jacob for ever; and of his kingdom there shall be no end.

34     Then said Mary unto the angel, How shall this be, seeing I know not a man?

35     And the angel answered and said unto her, The Holy Ghost shall come upon thee, and the power of the Highest shall overshadow thee: therefore also that holy thing which shall be born of thee shall be called the Son of God.

37     For with God nothing shall be impossible.

2. लूका 2: 1, 3-11, 40

1     उन दिनों में औगूस्तुस कैसर की ओर से आज्ञा निकली, कि सारे जगत के लोगों के नाम लिखे जाएं।

3     और सब लोग नाम लिखवाने के लिये अपने अपने नगर को गए।

4     सो यूसुफ भी इसलिये कि वह दाऊद के घराने और वंश का था, गलील के नासरत नगर से यहूदिया में दाऊद के नगर बैतलहम को गया।

5     कि अपनी मंगेतर मरियम के साथ जो गर्भवती थी नाम लिखवाए।

6     उन के वहां रहते हुए उसके जनने के दिन पूरे हुए।

7     और वह अपना पहिलौठा पुत्र जनी और उसे कपड़े में लपेटकर चरनी में रखा: क्योंकि उन के लिये सराय में जगह न थी।

8     और उस देश में कितने गड़ेरिये थे, जो रात को मैदान में रहकर अपने झुण्ड का पहरा देते थे।

9     और प्रभु का एक दूत उन के पास आ खड़ा हुआ; और प्रभु का तेज उन के चारों ओर चमका, और वे बहुत डर गए।

10     तब स्वर्गदूत ने उन से कहा, मत डरो; क्योंकि देखो मैं तुम्हें बड़े आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूं जो सब लोगों के लिये होगा।

11     कि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिये एक उद्धारकर्ता जन्मा है, और यही मसीह प्रभु है।

2. Luke 2 : 1, 3-11, 40

1     And it came to pass in those days, that there went out a decree from Cæsar Augustus, that all the world should be taxed.

3     And all went to be taxed, every one into his own city.

4     And Joseph also went up from Galilee, out of the city of Nazareth, into Judæa, unto the city of David, which is called Bethlehem; (because he was of the house and lineage of David:)

5     To be taxed with Mary his espoused wife, being great with child.

6     And so it was, that, while they were there, the days were accomplished that she should be delivered.

7     And she brought forth her firstborn son, and wrapped him in swaddling clothes, and laid him in a manger; because there was no room for them in the inn.

8     And there were in the same country shepherds abiding in the field, keeping watch over their flock by night.

9     And, lo, the angel of the Lord came upon them, and the glory of the Lord shone round about them: and they were sore afraid.

10     And the angel said unto them, Fear not: for, behold, I bring you good tidings of great joy, which shall be to all people.

11     For unto you is born this day in the city of David a Saviour, which is Christ the Lord.

40     And the child grew, and waxed strong in spirit, filled with wisdom: and the grace of God was upon him.

3. यूहन्ना 2: 1-11

1     फिर तीसरे दिन गलील के काना में किसी का ब्याह था, और यीशु की माता भी वहां थी।

2     और यीशु और उसके चेले भी उस ब्याह में नेवते गए थे।

3     जब दाखरस घट गया, तो यीशु की माता ने उस से कहा, कि उन के पास दाखरस नहीं रहा।

4     यीशु ने उस से कहा, हे महिला मुझे तुझ से क्या काम? अभी मेरा समय नहीं आया।

5     उस की माता ने सेवकों से कहा, जो कुछ वह तुम से कहे, वही करना।

6     वहां यहूदियों के शुद्ध करने की रीति के अनुसार पत्थर के छ: मटके धरे थे, जिन में दो दो, तीन तीन मन समाता था।

7     यीशु ने उन से कहा, मटकों में पानी भर दो: सो उन्हों ने मुँहामुँह भर दिया।

8     यीशु ने उन से कहा, अब निकालकर भोज के प्रधान के पास ले जाओ।

9     वे ले गए, जब भोज के प्रधान ने वह पानी चखा, जो दाखरस बन गया था, और नहीं जानता था, कि वह कहां से आया हे, (परन्तु जिन सेवकों ने पानी निकाला था, वे जानते थे) तो भोज के प्रधान ने दूल्हे को बुलाकर, उस से कहा।

10     हर एक मनुष्य पहिले अच्छा दाखरस देता है और जब लोग पीकर छक जाते हैं, तब मध्यम देता है; परन्तु तू ने अच्छा दाखरस अब तक रख छोड़ा है।

11     यीशु ने गलील के काना में अपना यह पहिला चिन्ह दिखाकर अपनी महिमा प्रगट की और उसके चेलों ने उस पर विश्वास किया॥

3. John 2 : 1-11

1     And the third day there was a marriage in Cana of Galilee; and the mother of Jesus was there:

2     And both Jesus was called, and his disciples, to the marriage.

3     And when they wanted wine, the mother of Jesus saith unto him, They have no wine.

4     Jesus saith unto her, Woman, what have I to do with thee? mine hour is not yet come.

5     His mother saith unto the servants, Whatsoever he saith unto you, do it.

6     And there were set there six waterpots of stone, after the manner of the purifying of the Jews, containing two or three firkins apiece.

7     Jesus saith unto them, Fill the waterpots with water. And they filled them up to the brim.

8     And he saith unto them, Draw out now, and bear unto the governor of the feast. And they bare it.

9     When the ruler of the feast had tasted the water that was made wine, and knew not whence it was: (but the servants which drew the water knew;) the governor of the feast called the bridegroom,

10     And saith unto him, Every man at the beginning doth set forth good wine; and when men have well drunk, then that which is worse: but thou hast kept the good wine until now.

11     This beginning of miracles did Jesus in Cana of Galilee, and manifested forth his glory; and his disciples believed on him.

4. यूहन्ना 9: 1-7

1     फिर जाते हुए उस ने एक मनुष्य को देखा, जो जन्म का अन्धा था।

2     और उसके चेलों ने उस से पूछा, हे रब्बी, किस ने पाप किया था कि यह अन्धा जन्मा, इस मनुष्य ने, या उसके माता पिता ने?

3     यीशु ने उत्तर दिया, कि न तो इस ने पाप किया था, न इस के माता पिता ने: परन्तु यह इसलिये हुआ, कि परमेश्वर के काम उस में प्रगट हों।

4     जिस ने मुझे भेजा है; हमें उसके काम दिन ही दिन में करना अवश्य है: वह रात आनेवाली है जिस में कोई काम नहीं कर सकता।

5     जब तक मैं जगत में हूं, तब तक जगत की ज्योति हूं।

6     यह कहकर उस ने भूमि पर थूका और उस थूक से मिट्टी सानी, और वह मिट्टी उस अन्धे की आंखों पर लगाकर।

7     उस से कहा; जा शीलोह के कुण्ड में धो ले, (जिस का अर्थ भेजा हुआ है) सो उस ने जाकर धोया, और देखता हुआ लौट आया।

4. John 9 : 1-7

1     And as Jesus passed by, he saw a man which was blind from his birth.

2     And his disciples asked him, saying, Master, who did sin, this man, or his parents, that he was born blind?

3     Jesus answered, Neither hath this man sinned, nor his parents: but that the works of God should be made manifest in him.

4     I must work the works of him that sent me, while it is day: the night cometh, when no man can work.

5     As long as I am in the world, I am the light of the world.

6     When he had thus spoken, he spat on the ground, and made clay of the spittle, and he anointed the eyes of the blind man with the clay,

7     And said unto him, Go, wash in the pool of Siloam, (which is by interpretation, Sent.) He went his way therefore, and washed, and came seeing.

5. फिलिप्पियों 2: 1, 2, 5-11

1     सोयदि मसीह में कुछ शान्ति और प्रेम से ढाढ़स और आत्मा की सहभागिता, और कुछ करूणा और दया है।

2     तो मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो।

5     जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।

6     जिस ने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा।

7     वरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया।

8     और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली।

9     इस कारण परमेश्वर ने उस को अति महान भी किया, और उस को वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है।

10     कि जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और जो पृथ्वी के नीचे है; वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें।

11     और परमेश्वर पिता की महिमा के लिये हर एक जीभ अंगीकार कर ले कि यीशु मसीह ही प्रभु है॥

5. Philippians 2 : 1, 2, 5-11

1     If there be therefore any consolation in Christ, if any comfort of love, if any fellowship of the Spirit, if any bowels and mercies,

2     Fulfil ye my joy, that ye be likeminded, having the same love, being of one accord, of one mind.

5     Let this mind be in you, which was also in Christ Jesus:

6     Who, being in the form of God, thought it not robbery to be equal with God:

7     But made himself of no reputation, and took upon him the form of a servant, and was made in the likeness of men:

8     And being found in fashion as a man, he humbled himself, and became obedient unto death, even the death of the cross.

9     Wherefore God also hath highly exalted him, and given him a name which is above every name:

10     That at the name of Jesus every knee should bow, of things in heaven, and things in earth, and things under the earth;

11     And that every tongue should confess that Jesus Christ is Lord, to the glory of God the Father.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 18: 3-12

नासरत के यीशु ने पिता के साथ मनुष्य की एकता को सिखाया और प्रदर्शित किया, और इसके लिए हम उसे अंतहीन श्रद्धांजलि देते हैं। उनका मिशन व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों था। उन्होंने जीवन का काम न केवल स्वयं के प्रति न्याय में, बल्कि मनुष्यों पर दया करने में भी किया। यीशु ने निर्भीकता से, इंद्रियों के मान्यता प्राप्त सबूतों के खिलाफ, फरिसासिक पंथों और प्रथाओं के खिलाफ काम किया, और उन्होंने अपनी उपचार शक्ति के साथ सभी विरोधियों का खंडन किया।

1. 18 : 3-12

Jesus of Nazareth taught and demonstrated man's oneness with the Father, and for this we owe him endless homage. His mission was both individual and collective. He did life's work aright not only in justice to himself, but in mercy to mortals, — to show them how to do theirs, but not to do it for them nor to relieve them of a single responsibility. Jesus acted boldly, against the accredited evidence of the senses, against Pharisaical creeds and practices, and he refuted all opponents with his healing power.

2. 29: 32-25

यीशु ईश्वर के साथ मरियम की आत्म-सचेत संगति की संतान थे। इसलिए वह अन्य मनुष्यों की तुलना में जीवन का अधिक आध्यात्मिक विचार दे सकता था, और प्रेम के विज्ञान - अपने पिता या दिव्य सिद्धांत - का प्रदर्शन कर सकता था।

एक महिला से जन्मे, यीशु के शरीर में आगमन ने मैरी की सांसारिक स्थिति में आंशिक रूप से योगदान दिया, हालांकि वह बिना किसी माप के मसीह, दिव्य आत्मा से संपन्न थे। यह गेथसेमेन और कलवारी में उनके संघर्षों का विवरण देता है, और इसने उन्हें भगवान और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ, या रास्ता दिखाने वाला बनने में सक्षम बनाया। यदि उसकी उत्पत्ति और जन्म नश्वर उपयोग से पूरी तरह अलग होता, तो यीशु नश्वर मन के लिए "मार्ग" के रूप में प्रशंसनीय नहीं होता।

रब्बी और पुजारी ने मोज़ेक कानून सिखाया, जिसमें कहा गया था: "आंख की सन्ती आंख का," तथा "जो कोई मनुष्य का लोहू बहाएगा उसका लोहू मनुष्य ही से बहाया जाएगा।" ऐसा नहीं है, परमेश्वर के नए निष्पादक, यीशु ने प्रेम के दिव्य नियम को प्रस्तुत किया, जो इसे शाप देने वालों को भी आशीष देता है।

सत्य के व्यक्तिगत आदर्श के रूप में, ईसा मसीह सत्य और जीवन के तरीके को इंगित करने के लिए, सभी गलतियों, बीमारी, और मृत्यु - को रबिनिकल त्रुटि और फटकार के लिए आया था। आत्मा और भौतिक अर्थ, सत्य और त्रुटि के बीच अंतर दिखाते हुए, इस आदर्श को यीशु के संपूर्ण सांसारिक जीवन के दौरान प्रदर्शित किया गया था।

2. 29 : 32-25

Jesus was the offspring of Mary's self-conscious communion with God. Hence he could give a more spiritual idea of life than other men, and could demonstrate the Science of Love — his Father or divine Principle.

Born of a woman, Jesus' advent in the flesh partook partly of Mary's earthly condition, although he was endowed with the Christ, the divine Spirit, without measure. This accounts for his struggles in Gethsemane and on Calvary, and this enabled him to be the mediator, or way-shower, between God and men. Had his origin and birth been wholly apart from mortal usage, Jesus would not have been appreciable to mortal mind as "the way."

Rabbi and priest taught the Mosaic law, which said: "An eye for an eye," and "Whoso sheddeth man's blood, by man shall his blood be shed." Not so did Jesus, the new executor for God, present the divine law of Love, which blesses even those that curse it.

As the individual ideal of Truth, Christ Jesus came to rebuke rabbinical error and all sin, sickness, and death, — to point out the way of Truth and Life. This ideal was demonstrated throughout the whole earthly career of Jesus, showing the difference between the offspring of Soul and of material sense, of Truth and of error.

3. 539: 27-4

यीशु के दिव्य मूल ने उन्हें मानव शक्ति से अधिक सृजन के तथ्यों को उजागर करने के लिए दिया, और एक मन को प्रदर्शित करता है जो मनुष्य और ब्रह्मांड को बनाता है और नियंत्रित करता है। सृष्टि का विज्ञान, यीशु के जन्म में इतना विशिष्ट, उसकी बुद्धिमानी और कम से कम समझ वाली बातों को प्रेरित करता था, और उसके अद्भुत प्रदर्शनों का आधार था। मसीह आत्मा की संतान है, और आध्यात्मिक अस्तित्व से पता चलता है कि आत्मा न तो दुष्ट और न ही नश्वर मनुष्य को पाप, बीमारी और मृत्यु में धकेलता है।

3. 539 : 27-4

The divine origin of Jesus gave him more than human power to expound the facts of creation, and demonstrate the one Mind which makes and governs man and the universe. The Science of creation, so conspicuous in the birth of Jesus, inspired his wisest and least-understood sayings, and was the basis of his marvellous demonstrations. Christ is the offspring of Spirit, and spiritual existence shows that Spirit creates neither a wicked nor a mortal man, lapsing into sin, sickness, and death.

4. 26: 28-32

हमारे मास्टर ने कोई विचार, सिद्धांत या विश्वास नहीं सिखाया। यह सभी वास्तविक लोगों का दिव्य सिद्धांत था जो उन्होंने सिखाया और अभ्यास किया। ईसाई धर्म का उनका प्रमाण धर्म और पूजा का कोई रूप या प्रणाली नहीं था, लेकिन क्रिश्चियन साइंस, जो जीवन और प्रेम के सामंजस्य को दर्शाता है।

4. 26 : 28-32

Our Master taught no mere theory, doctrine, or belief. It was the divine Principle of all real being which he taught and practised. His proof of Christianity was no form or system of religion and worship, but Christian Science, working out the harmony of Life and Love.

5. 473: 6-17

मसीह पाप के विश्वास को नष्ट करने के लिए आया था। ईश्वर-तत्त्व सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है। ईश्वर हर जगह है, और उसके बिना कुछ भी मौजूद नहीं है या उसकी कोई शक्ति नहीं है। मसीह एक आदर्श सत्य है, जो क्रायश्चियन साइंस के माध्यम से बीमारी और पाप को ठीक करने के लिए आता है, और ईश्वर को सभी शक्ति प्रदान करता है। यीशु उस आदमी का नाम है, जिसने अन्य सभी मनुष्यों से बढ़कर, मसीह को ईश्वर का सच्चा विचार, बीमारों और पापियों को ठीक करने और मृत्यु की शक्ति को नष्ट करने के लिए प्रस्तुत किया है। यीशु मानव मनुष्य है, और मसीह ईश्वरीय विचार है; इसलिए यीशु मसीह की एकता।

5. 473 : 6-17

Christ came to destroy the belief of sin. The God-principle is omnipresent and omnipotent. God is everywhere, and nothing apart from Him is present or has power. Christ is the ideal Truth, that comes to heal sickness and sin through Christian Science, and attributes all power to God. Jesus is the name of the man who, more than all other men, has presented Christ, the true idea of God, healing the sick and the sinning and destroying the power of death. Jesus is the human man, and Christ is the divine idea; hence the duality of Jesus the Christ.

6. 51: 19-27

उनका घाघ उदाहरण हम सभी के उद्धार के लिए था, लेकिन केवल उन कार्यों को करने के माध्यम से जो उन्होंने किए और दूसरों को करना सिखाया। उपचार में उनका उद्देश्य केवल स्वास्थ्य को बहाल करना ही नहीं था, बल्कि अपने दिव्य सिद्धांत को प्रदर्शित करना भी था। वह परमेश्वर से, सत्य और प्रेम से, जो कुछ उसने कहा और किया, उससे प्रेरित था। उनके उत्पीड़कों का उद्देश्य गर्व, ईर्ष्या, क्रूरता और प्रतिशोध था, जो भौतिक यीशु को दिया गया था, लेकिन उनका लक्ष्य ईश्वरीय सिद्धांत, प्रेम था, जिसने उनकी कामुकता को फटकार लगाई।

6. 51 : 19-27

His consummate example was for the salvation of us all, but only through doing the works which he did and taught others to do. His purpose in healing was not alone to restore health, but to demonstrate his divine Principle. He was inspired by God, by Truth and Love, in all that he said and did. The motives of his persecutors were pride, envy, cruelty, and vengeance, inflicted on the physical Jesus, but aimed at the divine Principle, Love, which rebuked their sensuality.

7. 52: 1-8

बचपन से ही, वह अपने "पिता के व्यवसाय" में शामिल थे। उसकी खोज दूसरों से बहुत अलग थी। उसका स्वामी आत्मा था; लेकिन उनका स्वामी सामग्री था। उसने परमेश्वर की सेवा की; उन्होंने लालच की सेवा की। उसके स्नेह शुद्ध थे; उनके कामुक थे। उसके स्वास्थ्य, पवित्रता और जीवन के आध्यात्मिक प्रमाण में इन्द्रियाँ डूब जाती हैं; उनकी इंद्रियों ने विपरीत रूप से गवाही दी और पाप, बीमारी और मृत्यु के भौतिक साक्ष्य को आत्मसात कर लिया।

7. 52 : 1-8

From early boyhood he was about his "Father's business." His pursuits lay far apart from theirs. His master was Spirit; their master was matter. He served God; they served mammon. His affections were pure; theirs were carnal. His senses drank in the spiritual evidence of health, holiness, and life; their senses testified oppositely, and absorbed the material evidence of sin, sickness, and death.

8. 40: 25-28, 31-7

ईश्वरीय विचार की उच्चतम मानव भौतिक अवधारणा, विद्रोह करने और त्रुटि को नष्ट करने और प्रकाश की अमरता लाने के लिए।

ईसाई धर्म की प्रकृति शांतिपूर्ण और धन्य है, लेकिन राज्य में प्रवेश करने के लिए, आशा के लंगर को शकीना में सामग्री के घूंघट से परे डाल दिया जाना चाहिए जिसमें यीशु हमारे जाने से पहले चला गया है; और सामग्री से परे यह उन्नति धर्मियों की खुशियों और विजय के साथ-साथ उनके दुखों और कष्टों से भी होनी चाहिए। अपने गुरु की तरह, हमें भौतिक अर्थों में होने के आध्यात्मिक अर्थ से प्रस्थान करना चाहिए।

8. 40 : 25-28, 31-7

Our heavenly Father, divine Love, demands that all men should follow the example of our Master and his apostles and not merely worship his personality.

The nature of Christianity is peaceful and blessed, but in order to enter into the kingdom, the anchor of hope must be cast beyond the veil of matter into the Shekinah into which Jesus has passed before us; and this advance beyond matter must come through the joys and triumphs of the righteous as well as through their sorrows and afflictions. Like our Master, we must depart from material sense into the spiritual sense of being.

9. 52: 19-28

"दुखों का आदमी" भौतिक जीवन और बुद्धिमत्ता की श्रेष्ठता और सभी समावेशी ईश्वर की ताकतवर वास्तविकता को अच्छी तरह से समझता है। ये मन की चिकित्सा या क्रिएचरियन साइंस के दो मुख्य बिंदु थे, जिसने उन्हें प्यार से सशस्त्र किया। ईश्वर की सर्वोच्च सांसारिक प्रतिनिधि, ईश्वरीय शक्ति को प्रतिबिंबित करने की मानवीय क्षमता की बात करते हुए, केवल अपने युग के लिए नहीं, बल्कि सभी युगों के लिए, अपने शिष्यों से कहा। "कि जो मुझ पर विश्वास रखता है, ये काम जो मैं करता हूं वह भी करेगा;" और "और विश्वास करने वालों में ये चिन्ह होंगे कि वे।"

9. 52 : 19-28

The "man of sorrows" best understood the nothingness of material life and intelligence and the mighty actuality of all-inclusive God, good. These were the two cardinal points of Mind-healing, or Christian Science, which armed him with Love. The highest earthly representative of God, speaking of human ability to reflect divine power, prophetically said to his disciples, speaking not for their day only but for all time: "He that believeth on me, the works that I do shall he do also;" and "These signs shall follow them that believe."

10. 55: 21-26

वादे पूरे होंगे। दिव्य चिकित्सा के प्रकट होने का समय हर समय है; और जो कोई भी दिव्य विज्ञान की वेदी पर अपने सांसारिक स्तर को रखता है, अब मसीह के प्याले को पीता है, और वह ईसाई उपचार की भावना और शक्ति से संपन्न है।

10. 55 : 21-26

The promises will be fulfilled. The time for the reappearing of the divine healing is throughout all time; and whosoever layeth his earthly all on the altar of divine Science, drinketh of Christ's cup now, and is endued with the spirit and power of Christian healing.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6