रविवार 23 मई, 2021



विषयआत्मा और शरीर

SubjectSoul and Body

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: भजन संहिता 19 : 7

"यहोवा की व्यवस्था खरी है।"



Golden Text: Psalm 19 : 7

The law of the Lord is perfect, converting the soul.




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उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 34: 1-4 ∙ नीतिवचन 16: 17


1     मैंहर समय यहोवा को धन्य कहा करूंगा; उसकी स्तुति निरन्तर मेरे मुख से होती रहेगी।

2     मैं यहोवा पर घमण्ड करूंगा; नम्र लोग यह सुनकर आनन्दित होंगे।

3     मेरे साथ यहोवा की बड़ाई करो, और आओ हम मिलकर उसके नाम की स्तुति करें।

4     मैं यहोवा के पास गया, तब उसने मेरी सुन ली, और मुझे पूरी रीति से निर्भय किया।

17     बुराई से हटना सीधे लोगों के लिये राजमार्ग है, जो अपने चाल चलन की चौकसी करता, वह अपने प्राण की भी रक्षा करता है।

Responsive Reading: Psalm 34 : 1-4; Proverbs 16 : 17

1.     I will bless the Lord at all times: his praise shall continually be in my mouth.

2.     My soul shall make her boast in the Lord: the humble shall hear thereof, and be glad.

3.     O magnify the Lord with me, and let us exalt his name together.

4.     I sought the Lord, and he heard me, and delivered me from all my fears.

17.     The highway of the upright is to depart from evil: he that keepeth his way preserveth his soul.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. व्यवस्थाविवरण 6 : 4, 5

4     हे इस्राएल, सुन, यहोवा हमारा परमेश्वर है, यहोवा एक ही है;

5     तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन, और सारे जीव, और सारी शक्ति के साथ प्रेम रखना।

1. Deuteronomy 6 : 4, 5

4     Hear, O Israel: The Lord our God is one Lord:

5     And thou shalt love the Lord thy God with all thine heart, and with all thy soul, and with all thy might.

2. नीतिवचन 15 : 32

32     जो शिक्षा को सुनी-अनसुनी करता, वह अपने प्राण को तुच्छ जानता है, परन्तु जो डांट को सुनता, वह बुद्धि प्राप्त करता है।

2. Proverbs 15 : 32

32     He that refuseth instruction despiseth his own soul: but he that heareth reproof getteth understanding.

3. व्यवस्थाविवरण 4 : 1 (से 6th ,), 2, 9 (से :), 29-31, 35

1     अब, हे इस्राएल, जो जो विधि और नियम मैं तुम्हें सिखाना चाहता हूं उन्हें सुन लो, और उन पर चलो; जिस से तुम जीवित रहो, और जो देश तुम्हारे पितरों का परमेश्वर यहोवा तुम्हें देता है उस में जा कर उसके अधिकारी हो जाओ।

2     जो आज्ञा मैं तुम को सुनाता हूं उस में न तो कुछ बढ़ाना, और न कुछ घटाना; तुम्हारे परमेश्वर यहोवा की जो जो आज्ञा मैं तुम्हें सुनाता हूं उन्हें तुम मानना।

9     यह अत्यन्त आवश्यक है कि तुम अपने विषय में सचेत रहो, और अपने मन की बड़ी चौकसी करो, कहीं ऐसा न हो कि जो जो बातें तुम ने अपनी आंखों से देखीं उन को भूल जाओ, और वह जीवन भर के लिये तुम्हारे मन से जाती रहे।

29     परन्तु वहां भी यदि तुम अपने परमेश्वर यहोवा को ढूंढ़ोगे, तो वह तुम को मिल जाएगा, शर्त यह है कि तुम अपने पूरे मन से और अपने सारे प्राण से उसे ढूंढ़ो।

30     अन्त के दिनों में जब तुम संकट में पड़ो, और ये सब विपत्तियां तुम पर आ पड़ेंगी, तब तुम अपने परमेश्वर यहोवा की ओर फिरो और उसकी मानना;

31     क्योंकि तेरा परमेश्वर यहोवा दयालु ईश्वर है, वह तुम को न तो छोड़ेगा और न नष्ट करेगा, और जो वाचा उसने तेरे पितरों से शपथ खाकर बान्धी है उसको नहीं भूलेगा।

35     यह सब तुझ को दिखाया गया, इसलिये कि तू जान रखे कि यहोवा ही परमेश्वर है; उसको छोड़ और कोई है ही नहीं।

3. Deuteronomy 4 : 1 (to 6th ,), 2, 9 (to :), 29-31, 35

1     Now therefore hearken, O Israel, unto the statutes and unto the judgments, which I teach you, for to do them, that ye may live,

2     Ye shall not add unto the word which I command you, neither shall ye diminish ought from it, that ye may keep the commandments of the Lord your God which I command you.

9     Only take heed to thyself, and keep thy soul diligently, lest thou forget the things which thine eyes have seen, and lest they depart from thy heart all the days of thy life:

29     But if from thence thou shalt seek the Lord thy God, thou shalt find him, if thou seek him with all thy heart and with all thy soul.

30     When thou art in tribulation, and all these things are come upon thee, even in the latter days, if thou turn to the Lord thy God, and shalt be obedient unto his voice;

31     (For the Lord thy God is a merciful God;) he will not forsake thee, neither destroy thee, nor forget the covenant of thy fathers which he sware unto them.

35     Unto thee it was shewed, that thou mightest know that the Lord he is God; there is none else beside him.

4. यहेजकेल 1 : 1 (हो गई), 3 (से 1st ,)

1     अब यह हुआ...

3     यहोवा का वचन यहेजकेल के पास पहुचा।

4. Ezekiel 1 : 1 (to pass), 3 (to 1st ,)

1     Now it came to pass …

3     The word of the Lord came expressly unto Ezekiel the priest,

5. यहेजकेल 2 : 3 (से :), 4-6 (से 4th ,)

3     और उसने मुझ से कहा, हे मनुष्य के सन्तान, मैं तुझे इस्राएलियों के पास अर्थात बलवा करने वाली जाति के पास भेजता हूँ, जिन्होंने मेरे विरुद्ध बलवा किया है; उनके पुरखा और वे भी आज के दिल तक मेरा अपराध करते चले आए हैं।

4     इस पीढ़ी के लोग जिनके पास मैं तुझे भेजता हूँ, वे निर्लज्ज और हठीले हैं;

5     और तू उन से कहना, प्रभु यहोवा यों कहता हे, इस से वे, जो बलवा करने वाले घराने के हैं, चाहे वे सुनें व न सुनें, तौभी वे इतना जान लेंगे कि हमारे बीच एक भविष्यद्वक्ता प्रगट हुआ है।

6     और हे मनुष्य के सन्तान, तू उन से न डरना; न तो उनके वचनों से डरना।

5. Ezekiel 2 : 3 (to :), 4-6 (to 4th ,)

3     And he said unto me, Son of man, I send thee to the children of Israel, to a rebellious nation that hath rebelled against me:

4     For they are impudent children and stiffhearted. I do send thee unto them; and thou shalt say unto them, Thus saith the Lord God.

5     And they, whether they will hear, or whether they will forbear, (for they are a rebellious house,) yet shall know that there hath been a prophet among them.

6     And thou, son of man, be not afraid of them, neither be afraid of their words,

6. यहेजकेल 18 : 4 (से :), 27 (जब), 30, 31 (से :), 32 (इसलिये)

4     देखो, सभों के प्राण तो मेरे हैं; जैसा पिता का प्राण, वैसा ही पुत्र का भी प्राण है; दोनों मेरे ही हैं।

27     ... जब दुष्ट अपने दुष्ट कामों से फिर कर, न्याय और धर्म के काम करने लगे, तो वह अपना प्राण बचाएगा।

30     प्रभु यहोवा की यह वाणी है, हे इस्राएल के घराने, मैं तुम में से हर एक मनुष्य का न्याय उसकी चालचलन के अनुसार ही करूंगा। पश्चात्ताप करो और अपने सब अपराधों को छोड़ो, तभी तुम्हारा अधर्म तुम्हारे ठोकर खाने का कारण न होगा।

31     अपने सब अपराधों को जो तुम ने किए हैं, दूर करो; अपना मन और अपनी आत्मा बदल डालो! हे इस्राएल के घराने, तुम क्यों मरो?

32     ... इसलिये पश्चात्ताप करो, तभी तुम जीवित रहोगे।

6. Ezekiel 18 : 4 (to :), 27 (when), 30, 31 (to :), 32 (wherefore)

4     Behold, all souls are mine; as the soul of the father, so also the soul of the son is mine:

27     …when the wicked man turneth away from his wickedness that he hath committed, and doeth that which is lawful and right, he shall save his soul alive.

30     Therefore I will judge you, O house of Israel, every one according to his ways, saith the Lord God. Repent, and turn yourselves from all your transgressions; so iniquity shall not be your ruin.

31     Cast away from you all your transgressions, whereby ye have transgressed; and make you a new heart and a new spirit:

32     …wherefore turn yourselves, and live ye.

7. मीका 6 : 8

8     हे मनुष्य, वह तुझे बता चुका है कि अच्छा क्या है; और यहोवा तुझ से इसे छोड़ और क्या चाहता है, कि तू न्याय से काम करे, और कृपा से प्रीति रखे, और अपने परमेश्वर के साथ नम्रता से चले?

7. Micah 6 : 8

8     He hath shewed thee, O man, what is good; and what doth the Lord require of thee, but to do justly, and to love mercy, and to walk humbly with thy God?

8. मत्ती 4 : 23

23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

8. Matthew 4 : 23

23     And Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing all manner of sickness and all manner of disease among the people.

9. मत्ती 5 : 2, 17-20

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

17     यह न समझो, कि मैं व्यवस्था था भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों को लोप करने आया हूं।

18     लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूं, क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूं, कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएं, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा।

19     इसलिये जो कोई इन छोटी से छोटी आज्ञाओं में से किसी एक को तोड़े, और वैसा ही लोगों को सिखाए, वह स्वर्ग के राज्य में सब से छोटा कहलाएगा; परन्तु जो कोई उन का पालन करेगा और उन्हें सिखाएगा, वही स्वर्ग के राज्य में महान कहलाएगा।

20     क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि यदि तुम्हारी धामिर्कता शास्त्रियों और फरीसियों की धामिर्कता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे॥

9. Matthew 5 : 2, 17-20

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

17     Think not that I am come to destroy the law, or the prophets: I am not come to destroy, but to fulfil.

18     For verily I say unto you, Till heaven and earth pass, one jot or one tittle shall in no wise pass from the law, till all be fulfilled.

19     Whosoever therefore shall break one of these least commandments, and shall teach men so, he shall be called the least in the kingdom of heaven: but whosoever shall do and teach them, the same shall be called great in the kingdom of heaven.

20     For I say unto you, That except your righteousness shall exceed the righteousness of the scribes and Pharisees, ye shall in no case enter into the kingdom of heaven.

10. लूका 12 : 1 (खबरदार), 2, 4, 5

1     कि फरीसियों के कपटरूपी खमीर से चौकस रहना।

2     कुछ ढपा नहीं, जो खोला न जाएगा; और न कुछ छिपा है, जो जाना न जाएगा।

4     परन्तु मैं तुम से जो मेरे मित्र हो कहता हूं, कि जो शरीर को घात करते हैं परन्तु उसके पीछे और कुछ नहीं कर सकते उन से मत डरो।

5     मैं तुम्हें चिताता हूं कि तुम्हें किस से डरना चाहिए, घात करने के बाद जिस को नरक में डालने का अधिकार है, उसी से डरो: वरन मैं तुम से कहता हूं उसी से डरो।

10. Luke 12 : 1 (Beware), 2, 4, 5

1     Beware ye of the leaven of the Pharisees, which is hypocrisy.

2     For there is nothing covered, that shall not be revealed; neither hid, that shall not be known.

4     And I say unto you my friends, Be not afraid of them that kill the body, and after that have no more that they can do.

5     But I will forewarn you whom ye shall fear: Fear him, which after he hath killed hath power to cast into hell; yea, I say unto you, Fear him.

11. लूका 13 : 10-14 (से 2nd ,), 15 (से 2nd ,), 16 (चाहिए), 17, 20, 21

10     सब्त के दिन वह एक आराधनालय में उपदेश कर रहा था॥

11     और देखो, एक स्त्री थी, जिसे अठारह वर्ष से एक र्दुबल करने वाली दुष्टात्मा लगी थी, और वह कुबड़ी हो गई थी, और किसी रीति से सीधी नहीं हो सकती थी।

12     यीशु ने उसे देखकर बुलाया, और कहा हे नारी, तू अपनी र्दुबलता से छूट गई।

13     तब उस ने उस पर हाथ रखे, और वह तुरन्त सीधी हो गई, और परमेश्वर की बड़ाई करने लगी।

14     इसलिये कि यीशु ने सब्त के दिन उसे अच्छा किया था, आराधनालय का सरदार रिसयाकर लोगों से कहने लगा, छ: दिन हैं, जिन में काम करना चाहिए, सो उन ही दिनों में आकर चंगे होओ; परन्तु सब्त के दिन में नहीं।

15     यह सुन कर प्रभु ने उत्तर देकर कहा;

16     ... क्या उचित न था, कि यह स्त्री जो इब्राहीम की बेटी है जिसे शैतान ने अठारह वर्ष से बान्ध रखा था, सब्त के दिन इस बन्धन से छुड़ाई जाती?

17     जब उस ने ये बातें कहीं, तो उसके सब विरोधी लज्ज़ित हो गए, और सारी भीड़ उन महिमा के कामों से जो वह करता था, आनन्दित हुई॥

20     उस ने फिर कहा; मैं परमेश्वर के राज्य कि उपमा किस से दूं?

21     वह खमीर के समान है, जिस को किसी स्त्री ने लेकर तीन पसेरी आटे में मिलाया, और होते होते सब आटा खमीर हो गया॥

11. Luke 13 : 10-14 (to 2nd ,), 15 (to 2nd ,), 16 (ought), 17, 20, 21

10     And he was teaching in one of the synagogues on the sabbath.

11     And, behold, there was a woman which had a spirit of infirmity eighteen years, and was bowed together, and could in no wise lift up herself.

12     And when Jesus saw her, he called her to him, and said unto her, Woman, thou art loosed from thine infirmity.

13     And he laid his hands on her: and immediately she was made straight, and glorified God.

14     And the ruler of the synagogue answered with indignation, because that Jesus had healed on the sabbath day,

15     The Lord then answered him, and said,

16     …ought not this woman, being a daughter of Abraham, whom Satan hath bound, lo, these eighteen years, be loosed from this bond on the sabbath day?

17     And when he had said these things, all his adversaries were ashamed: and all the people rejoiced for all the glorious things that were done by him.

20     And again he said, Whereunto shall I liken the kingdom of God?

21     It is like leaven, which a woman took and hid in three measures of meal, till the whole was leavened.

12. 1 कुरिन्थियों 5 : 6 (जानना), 7 (से 2nd ,), 8

6     क्या तुम नहीं जानते, कि थोड़ा सा खमीर पूरे गूंधे हुए आटे को खमीर कर देता है।

7     पुराना खमीर निकाल कर, अपने आप को शुद्ध करो: कि नया गूंधा हुआ आटा बन जाओ।

8     सो आओ हम उत्सव में आनन्द मनावें, न तो पुराने खमीर से और न बुराई और दुष्टता के खमीर से, परन्तु सीधाई और सच्चाई की अखमीरी रोटी से॥

12. I Corinthians 5 : 6 (Know), 7 (to 2nd ,), 8

6     Know ye not that a little leaven leaveneth the whole lump?

7     Purge out therefore the old leaven, that ye may be a new lump,

8     Therefore let us keep the feast, not with old leaven, neither with the leaven of malice and wickedness; but with the unleavened bread of sincerity and truth.

13. 1 कुरिन्थियों 3: 16, 18, 19 (से 1st.)

16     क्या तुम नहीं जानते, कि तुम परमेश्वर का मन्दिर हो, और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है?

18     कोई अपने आप को धोखा न दे: यदि तुम में से कोई इस संसार में अपने आप को ज्ञानी समझे, तो मूर्ख बने; कि ज्ञानी हो जाए।

19     क्योंकि इस संसार का ज्ञान परमेश्वर के निकट मूर्खता है, जैसा लिखा है।

13. I Corinthians 3 : 16, 18, 19 (to 1st .)

16     Know ye not that ye are the temple of God, and that the Spirit of God dwelleth in you?

18     Let no man deceive himself. If any man among you seemeth to be wise in this world, let him become a fool, that he may be wise.

19     For the wisdom of this world is foolishness with God.

14. 1 थिस्सलुनीकियों 5 : 5, 6, 16-18 (से :), 19-21, 23, 24, 28

5     क्योंकि तुम सब ज्योति की सन्तान, और दिन की सन्तान हो, हम न रात के हैं, न अन्धकार के हैं।

6     इसलिये हम औरों की नाईं सोते न रहें, पर जागते और सावधान रहें।

16     सदा आनन्दित रहो।

17     निरन्तर प्रार्थना मे लगे रहो।

18     हर बात में धन्यवाद करो: क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है।

19     आत्मा को न बुझाओ।

20     भविष्यद्वाणियों को तुच्छ न जानो।

21     सब बातों को परखो: जो अच्छी है उसे पकड़े रहो।

23     शान्ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे; और तुम्हारी आत्मा और प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक पूरे पूरे और निर्दोष सुरक्षित रहें।

24     तुम्हारा बुलाने वाला सच्चा है, और वह ऐसा ही करेगा॥

28     हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह तुम पर होता रहे॥

14. I Thessalonians 5 : 5, 6, 16-18 (to :), 19-21, 23, 24, 28

5     Ye are all the children of light, and the children of the day: we are not of the night, nor of darkness.

6     Therefore let us not sleep, as do others; but let us watch and be sober.

16     Rejoice evermore.

17     Pray without ceasing.

18     In every thing give thanks:

19     Quench not the Spirit.

20     Despise not prophesyings.

21     Prove all things; hold fast that which is good.

23     And the very God of peace sanctify you wholly; and I pray God your whole spirit and soul and body be preserved blameless unto the coming of our Lord Jesus Christ.

24     Faithful is he that calleth you, who also will do it.

28     The grace of our Lord Jesus Christ be with you. Amen.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 477 : 22-25

आत्मा ही मनुष्य का पदार्थ, जीवन और बुद्धिमत्ता है, जो व्यक्तिगत है, लेकिन पदार्थ में नहीं। अंतर मन कभी भी आत्मा से हीन किसी भी चीज को प्रतिबिंबित नहीं कर सकता है।

1. 477 : 22-25

Soul is the substance, Life, and intelligence of man, which is individualized, but not in matter. Soul can never reflect anything inferior to Spirit.

2. 120 : 4-6

आत्मा या आत्मा, ईश्वर, अपरिवर्तनीय और शाश्वत है; और मनुष्य आत्मा, ईश्वर के साथ सह-अस्तित्व रखता है, क्योंकि मनुष्य ईश्वर की छवि है।

2. 120 : 4-6

Soul, or Spirit, is God, unchangeable and eternal; and man coexists with and reflects Soul, God, for man is God's image.

3. 9 : 17-24

क्या आप "अपने भगवान को अपने प्रभु और अपने सभी प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रखते हैं"? इस आदेश में बहुत कुछ शामिल है, यहां तक कि सभी भौतिक संवेदना, स्नेह और पूजा का समर्पण भी। यह ईसाई धर्म का एल डोराडो है। इसमें जीवन का विज्ञान शामिल है, और केवल आत्मा के दिव्य नियंत्रण को मान्यता देता है, जिसमें आत्मा हमारा स्वामी है, और भौतिक अर्थ और मानव का कोई स्थान नहीं होगा।

3. 9 : 17-24

Dost thou "love the Lord thy God with all thy heart, and with all thy soul, and with all thy mind"? This command includes much, even the surrender of all merely material sensation, affection, and worship. This is the El Dorado of Christianity. It involves the Science of Life, and recognizes only the divine control of Spirit, in which Soul is our master, and material sense and human will have no place.

4. 117 : 29-5

यीशु ने अपने शिष्यों को फरीसियों और सदूकियों के चरित्र से सावधान किया, जिन्हें उन्होंने मानवीय सिद्धांतों के रूप में परिभाषित किया। "लेवन, जिसे एक महिला ने लिया, और खाने के तीन उपायों में छिप गई, जब तक कि पूरी तरह से रिसाव नहीं हो गया, उसका दृष्टांत "इस आशय को व्यक्त करता है कि आध्यात्मिक रिसाव मसीह के विज्ञान और उसकी आध्यात्मिक व्याख्या को दर्शाता है, - एक उपर दूर तक चित्रण के केवल सनकी और औपचारिक अनुप्रयोगों।

4. 117 : 29-5

Jesus bade his disciples beware of the leaven of the Pharisees and of the Sadducees, which he defined as human doctrines. His parable of the "leaven, which a woman took, and hid in three measures of meal, till the whole was leavened," impels the inference that the spiritual leaven signifies the Science of Christ and its spiritual interpretation, — an inference far above the merely ecclesiastical and formal applications of the illustration.

5. 329 : 5-7

थोड़ा सा लेवन पूरे गांठ को काट देता है। क्रिश्चियन साइंस की थोड़ी सी समझ इस बात का सच साबित करती है कि मैं इसके बारे में कहता हूं।

5. 329 : 5-7

A little leaven leavens the whole lump. A little understanding of Christian Science proves the truth of all that I say of it.

6. 302 : 19-24

मनुष्य के पूर्ण, यहाँ तक कि पिता के रूप में भी पूर्ण होने का विज्ञान बताता है, क्योंकि आध्यात्मिक मनुष्य का आत्मा या मन, ईश्वर है, जो सभी का दिव्य सिद्धांत है, और क्योंकि यह वास्तविक व्यक्ति आत्मा के बजाय आत्मा के नियम द्वारा शासित है, न कि पदार्थ के तथाकथित नियमों द्वारा।

6. 302 : 19-24

The Science of being reveals man as perfect, even as the Father is perfect, because the Soul, or Mind, of the spiritual man is God, the divine Principle of all being, and because this real man is governed by Soul instead of sense, by the law of Spirit, not by the so-called laws of matter.

7. 28 : 1-8

फरीसियों ने ईश्वरीय इच्छा को जानने और सिखाने का दावा किया, लेकिन उन्होंने केवल यीशु के मिशन की सफलता में बाधा डाली। यहां तक कि उनके कई छात्र भी उनके रास्ते में खड़े थे। यदि मास्टर ने एक छात्र को नहीं लिया था और भगवान की अनदेखी सत्य सिखाया था, तो उसे क्रूस पर नहीं चढ़ाया जाता था। पदार्थ की समझ में आत्मा को धारण करने का दृढ़ संकल्प, सत्य और प्रेम का उत्पीड़न करने वाला है।

7. 28 : 1-8

The Pharisees claimed to know and to teach the divine will, but they only hindered the success of Jesus' mission. Even many of his students stood in his way. If the Master had not taken a student and taught the unseen verities of God, he would not have been crucified. The determination to hold Spirit in the grasp of matter is the persecutor of Truth and Love.

8. 196 : 11-18

"उससे डरें जो आत्मा और शरीर दोनों को नरक में नष्ट करने में सक्षम हैं," यीशु ने कहा। इस पाठ का सावधानीपूर्वक अध्ययन से पता चलता है कि यहाँ आत्मा शब्द का अर्थ गलत अर्थ या भौतिक चेतना है। यह आदेश रोम के, शैतान का नहीं, ईश्वर का नहीं, बल्कि पाप से सावधान रहने की चेतावनी थी। बीमारी, पाप और मृत्यु जीवन या सत्य के सहवर्ती नहीं हैं। कोई कानून उनका समर्थन नहीं करता। उनकी सत्ता स्थापित करने के लिए ईश्वर के साथ उनका कोई संबंध नहीं है।

8. 196 : 11-18

"Fear him which is able to destroy both soul and body in hell," said Jesus. A careful study of this text shows that here the word soul means a false sense or material consciousness. The command was a warning to beware, not of Rome, Satan, nor of God, but of sin. Sickness, sin, and death are not concomitants of Life or Truth. No law supports them. They have no relation to God wherewith to establish their power.

9. 451 : 2-4, 8-11

ईसाई वैज्ञानिकों को भौतिक दुनिया से बाहर आने और अलग होने के लिए धर्मत्यागी आदेश के निरंतर दबाव में रहना चाहिए।

क्रिश्चियन साइंस के छात्र, जो अपने पत्र के साथ शुरू करते हैं और आत्मा के बिना सफल होने के लिए सोचते हैं, या तो अपने विश्वास का जहाज़ बना लेंगे या दुखी हो जाएंगे।

9. 451 : 2-4, 8-11

Christian Scientists must live under the constant pressure of the apostolic command to come out from the material world and be separate. 

Students of Christian Science, who start with its letter and think to succeed without the spirit, will either make shipwreck of their faith or be turned sadly awry. 

10. 140 : 8-13, 16-18

जब हम ईश्वरीय प्रकृति को समझ लेते हैं और उसी रूप से प्रेम करते हैं, तो हम उस अनुपात को स्वीकार करेंगे और उसका पालन करेंगे, जो कि नगरपालिका से अधिक नहीं, बल्कि हमारे ईश्वर के सान्निध्य में आनन्दित होगा। तब धर्म हृदय का होगा, मस्तिष्क का नहीं।

हम आध्यात्मिक रूप से पूजा करते हैं, केवल इसलिए कि हम भौतिक रूप से पूजा करते हैं। आध्यात्मिक भक्ति ईसाई धर्म की आत्मा है।

10. 140 : 8-13, 16-18

We shall obey and adore in proportion as we apprehend the divine nature and love Him understandingly, warring no more over the corporeality, but rejoicing in the affluence of our God. Religion will then be of the heart and not of the head.

We worship spiritually, only as we cease to worship materially. Spiritual devoutness is the soul of Christianity.

11. 118 : 10-12

युग बीत जाते हैं, लेकिन सत्य का यह उत्थान कभी काम पर होता है। इसे त्रुटि के पूरे द्रव्यमान को नष्ट करना चाहिए, और इसलिए मनुष्य की आध्यात्मिक स्वतंत्रता में अनंत काल तक महिमामंडित किया जाना चाहिए।

11. 118 : 10-12

Ages pass, but this leaven of Truth is ever at work. It must destroy the entire mass of error, and so be eternally glorified in man's spiritual freedom.

12. 253 : 19-28

पदार्थ पाप या बीमारी के खिलाफ सही प्रयासों के लिए कोई विरोध नहीं कर सकता, क्योंकि यह जड़ता, नासमझी है। इसके अलावा, यदि आप अपने आप को रोगग्रस्त मानते हैं, तो आप शरीर से बाधा के बिना इस गलत विश्वास और कार्रवाई को बदल सकते हैं।

पाप, बीमारी, या मृत्यु के लिए किसी भी आवश्यक आवश्यकता पर विश्वास नहीं करना, जानना (जैसा कि आप जानना चाहते हैं) कि भगवान को कभी भी एक तथाकथित भौतिक कानून के लिए आज्ञाकारिता की आवश्यकता नहीं होती है, ऐसा कोई कानून मौजूद नहीं है।

12. 253 : 19-28

Matter can make no opposition to right endeavors against sin or sickness, for matter is inert, mindless. Also, if you believe yourself diseased, you can alter this wrong belief and action without hindrance from the body.

Do not believe in any supposed necessity for sin, disease, or death, knowing (as you ought to know) that God never requires obedience to a so-called material law, for no such law exists.

13. 119 : 29 (ईसाई)-6

ईसाई विज्ञान आत्मा और शरीर के प्रतीत होने वाले संबंध को उलट देता है और शरीर को मन की सहायक बनाता है। इस प्रकार यह मनुष्य के साथ है, जो संयमशील मन का विनम्र सेवक है, हालांकि यह समझदारी को अन्यथा प्रकट करता है। लेकिन हम इसे कभी नहीं समझेंगे जबकि हम स्वीकार करते हैं कि आत्मा शरीर या मन में है, और वह आदमी गैर-बुद्धि में शामिल है। आत्मा या आत्मा, ईश्वर, अपरिवर्तनीय और शाश्वत है; और मनुष्य आत्मा, ईश्वर के साथ सह-अस्तित्व रखता है, क्योंकि मनुष्य ईश्वर की छवि है।

13. 119 : 29 (Christian)-6

Christian Science reverses the seeming relation of Soul and body and makes body tributary to Mind. Thus it is with man, who is but the humble servant of the restful Mind, though it seems otherwise to finite sense. But we shall never understand this while we admit that soul is in body or mind in matter, and that man is included in non-intelligence. Soul, or Spirit, is God, unchangeable and eternal; and man coexists with and reflects Soul, God, for man is God's image.

14. 223 : 3-12

जल्दी या बाद में हमें पता चलेगा कि मनुष्य की परिमित क्षमता के भ्रूण को इस भ्रम से मजबूर किया जाता है कि वह आत्मा के बजाय आत्मा के स्थान पर शरीर में रहता है।

पदार्थ आत्मा को व्यक्त नहीं करता है। ईश्वर अनंत सर्वव्यापी आत्मा है। यदि आत्मा सब कुछ है और हर जगह है, क्या और कहाँ है? याद रखें कि सत्य त्रुटि से अधिक है, और हम बड़े को कम में नहीं डाल सकते हैं। प्राण आत्मा है, और प्राण शरीर से अधिक है।

14. 223 : 3-12

Sooner or later we shall learn that the fetters of man's finite capacity are forged by the illusion that he lives in body instead of in Soul, in matter instead of in Spirit.

Matter does not express Spirit. God is infinite omnipresent Spirit. If Spirit is all and is everywhere, what and where is matter? Remember that truth is greater than error, and we cannot put the greater into the less. Soul is Spirit, and Spirit is greater than body.

15. 60 : 29-6

आत्मा के पास आत्मा को प्राप्त करने के लिए अनंत संसाधन हैं, और खुशी अधिक आसानी से प्राप्त की जाएगी और हमारे रखने में अधिक सुरक्षित होगी, अगर आत्मा में मांग की जाए। अकेले उच्च आनंद अमर आदमी के को संतुष्ट कर सकते हैं। हम व्यक्तिगत समझदारी की सीमा के भीतर खुशी का संचार नहीं कर सकते। इंद्रियां वास्तविक आनंद नहीं देती हैं।

मानव के हित में अच्छाई बुराई पर अध्यात्म और पशु पर आधिपत्य होना चाहिए, या सुख कभी नहीं जीता जाएगा।

15. 60 : 29-6

Soul has infinite resources with which to bless mankind, and happiness would be more readily attained and would be more secure in our keeping, if sought in Soul. Higher enjoyments alone can satisfy the cravings of immortal man. We cannot circumscribe happiness within the limits of personal sense. The senses confer no real enjoyment.

The good in human affections must have ascendency over the evil and the spiritual over the animal, or happiness will never be won.

16. 125 : 12-16

जैसे-जैसे मानव विचार एक अवस्था से दूसरे चरण में बदलता है, दर्द और दर्द रहितता, दुःख और आनन्द, - भय से आशा और विश्वास से समझ तक, - दृश्य अभिव्यक्ति अंतिम रूप से मनुष्य द्वारा शासित होगी, भौतिक अर्थ से नहीं।

16. 125 : 12-16

As human thought changes from one stage to another of conscious pain and painlessness, sorrow and joy, — from fear to hope and from faith to understanding, — the visible manifestation will at last be man governed by Soul, not by material sense.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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