रविवार 23 फरवरी, 2020 |

रविवार 23 फरवरी, 2020



विषयमन

SubjectMind

वर्ण पाठ: भजन संहिता 94 : 10

जो जाति जाति को ताड़ना देता, और मनुष्य को ज्ञान सिखाता है



Golden Text: Psalm 94 : 10

“He that teacheth man knowledge, shall not he know.”




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निर्गमन 20 : 2-4 • नीतिवचन 2 : 6-8


2     कि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूं, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात मिस्र देश से निकाल लाया है॥

3     तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना॥

4     तू अपने लिये कोई मूर्ति खोदकर न बनाना, न किसी कि प्रतिमा बनाना, जो आकाश में, वा पृथ्वी पर, वा पृथ्वी के जल में है।

6     क्योंकि बुद्धि यहोवा ही देता है; ज्ञान और समझ की बातें उसी के मुंह से निकलती हैं।

7     वह सीधे लोगों के लिये खरी बुद्धि रख छोड़ता है; जो खराई से चलते हैं, उनके लिये वह ढाल ठहरता है।

8     वह न्याय के पथों की देख भाल करता, और अपने भक्तों के मार्ग की रक्षा करता है।

Responsive Reading: Exodus 20 : 2-4 • Proverbs 2 : 6-8

2.     I am the Lord thy God, which have brought thee out of the land of Egypt, out of the house of bondage.

3.     Thou shalt have no other gods before me.

4.     Thou shalt not make unto thee any graven image, or any likeness of any thing that is in heaven above, or that is in the earth beneath, or that is in the water under the earth.

6.     For the Lord giveth wisdom: out of his mouth cometh knowledge and understanding.

7.     He layeth up sound wisdom for the righteous: he is a buckler to them that walk uprightly.

8.     He keepeth the paths of judgment, and preserveth the way of his saints.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. मलाकी 4 : 2 (पर्यत)-4

2     ... लिये जो मेरे नाम का भय मानते हो, धर्म का सूर्य उदय होगा, और उसकी किरणों के द्वारा तुम चंगे हो जाओगे; और तुम निकल कर पाले हुए बछड़ों की नाईं कूदोगे और फांदोगे।

3     तब तुम दुष्टों को लताड़ डालोगे, अर्थात मेरे उस ठहराए हुए दिन में वे तुम्हारे पांवों के नीचे की राख बन जाएंगे, सेनाओं के यहोवा का यही वचन है॥

4     मेरे दास मूसा की व्यवस्था अर्थात जो जो विधि और नियम मैं ने सारे इस्रएलियों के लिये उसको होरेब में दिए थे, उन को स्मरण रखो॥

1. Malachi 4 : 2 (unto)-4

2     unto you that fear my name shall the Sun of righteousness arise with healing in his wings; and ye shall go forth, and grow up as calves of the stall.

3     And ye shall tread down the wicked; for they shall be ashes under the soles of your feet in the day that I shall do this, saith the Lord of hosts.

4     Remember ye the law of Moses my servant, which I commanded unto him in Horeb for all Israel, with the statutes and judgments.

2. I शमूएल 30 : 1-6, 8-10 (से :), 11, 15 (से ?), 16 (से 5th ,), 17 (से :), 18, 19

1     तीसरे दिन जब दाऊद अपने जनों समेत सिकलग पहुंचा, तब उन्होंने क्या देखा, कि अमालेकियों ने दक्खिन देश और सिकलग पर चढ़ाई की। और सिकलग को मार के फूंक दिया,

2     और उस में की स्त्री आदि छोटे बड़े जितने थे, सब को बन्धुआई में ले गए; उन्होंने किसी को मार तो नहीं डाला, परन्तु सभों को ले कर अपना मार्ग लिया।

3     इसलिये जब दाऊद अपने जनों समेत उस नगर में पहुंचा, तब नगर तो जला पड़ा था, और स्त्रियां और बेटे-बेटियां बन्धुआई में चली गई थीं।

4     तब दाऊद और वे लोग जो उसके साथ थे चिल्लाकर इतना रोए, कि फिर उन में रोने की शक्ति न रही।

5     और दाऊद की दो स्त्रियां, यिज्रेली अहीनोअम, और कर्मैली नाबाल की स्त्री अबीगैल, बन्धुआई में गई थीं।

6     और दाऊद बड़े संकट में पड़ा; क्योंकि लोग अपने बेटे-बेटियों के कारण बहुत शोकित हो कर उस पर पत्थरवाह करने की चर्चा कर रहे थे। परन्तु दाऊद ने अपने परमेश्वर यहोवा को स्मरण करके हियाव बान्धा॥

8     और दाऊद ने यहोवा से पूछा, क्या मैं इस दल का पीछा करूं? क्या उसको जा पकडूंगा? उसने उस से कहा, पीछा कर; क्योंकि तू निश्चय उसको पकड़ेगा, और निसन्देह सब कुछ छुड़ा लाएगा;

9     तब दाऊद अपने छ: सौ साथी जनों को ले कर बसोर नाम नाले तक पहुंचा; वहां कुछ लोग छोड़े जा कर रह गए।

10     दाऊद तो चार सौ पुरूषों समेत पीछा किए चला गया।

11     उन को एक मिस्री पुरूष मैदान में मिला, उन्होंने उसे दाऊद के पास ले जा कर रोटी दी; और उसने उसे खाया, तब उसे पानी पिलाया,

15     दाऊद ने उस से पूछा, क्या तू मुझे उस दल के पास पहुंचा देगा?

16     जब उसने उसे पहुंचाया, तब देखने में आया कि वे सब भूमि पर छिटके हुए खाते पीते।

17     इसलिये दाऊद उन्हें रात के पहिले पहर से ले कर दूसरे दिन की सांझ तक मारता रहा।

18     और जो कुछ अमालेकी ले गए थे वह सब दाऊद ने छुड़ाया; और दाऊद ने अपनी दोनों स्त्रियों को भी छुड़ा लिया।

19     वरन उनके क्या छोटे, क्या बड़े,क्या बेटे, क्या बेटियां, क्या लूट का माल, सब कुछ जो अमालेकी ले गए थे, उस में से कोई वस्तु न रही जो उन को न मिली हो; क्योंकि दाऊद सब का सब लौटा लाया।

2. I Samuel 30 : 1-6, 8-10 (to :), 11, 15 (to ?), 16 (to 5th ,), 17 (to :), 18, 19

1     And it came to pass, when David and his men were come to Ziklag on the third day, that the Amalekites had invaded the south, and Ziklag, and smitten Ziklag, and burned it with fire;

2     And had taken the women captives, that were therein: they slew not any, either great or small, but carried them away, and went on their way.

3     So David and his men came to the city, and, behold, it was burned with fire; and their wives, and their sons, and their daughters, were taken captives.

4     Then David and the people that were with him lifted up their voice and wept, until they had no more power to weep.

5     And David’s two wives were taken captives, Ahinoam the Jezreelitess, and Abigail the wife of Nabal the Carmelite.

6     And David was greatly distressed; for the people spake of stoning him, because the soul of all the people was grieved, every man for his sons and for his daughters: but David encouraged himself in the Lord his God.

8     And David inquired at the Lord, saying, Shall I pursue after this troop? shall I overtake them? And he answered him, Pursue: for thou shalt surely overtake them, and without fail recover all.

9     So David went, he and the six hundred men that were with him, and came to the brook Besor, where those that were left behind stayed.

10     But David pursued, he and four hundred men:

11     And they found an Egyptian in the field, and brought him to David, and gave him bread, and he did eat; and they made him drink water;

15     And David said to him, Canst thou bring me down to this company?

16     And when he had brought him down, behold, they were spread abroad upon all the earth, eating and drinking, and dancing,

17     And David smote them from the twilight even unto the evening of the next day:

18     And David recovered all that the Amalekites had carried away: and David rescued his two wives.

19     And there was nothing lacking to them, neither small nor great, neither sons nor daughters, neither spoil, nor any thing that they had taken to them: David recovered all.

3. लूका 4 : 14 (से :), 40

14     फिर यीशु आत्मा की सामर्थ से भरा हुआ गलील को लौटा।

40     सूरज डूबते समय जिन जिन के यहां लोग नाना प्रकार की बीमारियों में पड़े हुए थे, वे सब उन्हें उसके पास ले आए, और उस ने एक एक पर हाथ रखकर उन्हें चंगा किया।

3. Luke 4 : 14 (to :), 40

14     And Jesus returned in the power of the Spirit into Galilee:

40     Now when the sun was setting, all they that had any sick with divers diseases brought them unto him; and he laid his hands on every one of them, and healed them.

4. लूका 12 : 22-24, 27-31

22     फिर उस ने अपने चेलों से कहा; इसलिये मैं तुम से कहता हूं, अपने प्राण की चिन्ता न करो, कि हम क्या खाएंगे; न अपने शरीर की कि क्या पहिनेंगे।

23     क्योंकि भोजन से प्राण, और वस्त्र से शरीर बढ़कर है।

24     कौवों पर ध्यान दो; वे न बोते हैं, न काटते; न उन के भण्डार और न खत्ता होता है; तौभी परमेश्वर उन्हें पालता है; तुम्हारा मूल्य पक्षियों से कहीं अधिक है।

27     सोसनों के पेड़ों पर ध्यान करो कि वे कैसे बढ़ते हैं; वे न परिश्रम करते, न कातते हैं: तौभी मैं तुम से कहता हूं, कि सुलैमान भी, अपने सारे विभव में, उन में से किसी एक के समान वस्त्र पहिने हुए न था।

28     इसलिये यदि परमेश्वर मैदान की घास को जो आज है, और कल भाड़ में झोंकी जाएगी, ऐसा पहिनाता है; तो हे अल्प विश्वासियों, वह तुम्हें क्यों न पहिनाएगा?

29     और तुम इस बात की खोज में न रहो, कि क्या खाएंगे और क्या पीएंगे, और न सन्देह करो।

30     क्योंकि संसार की जातियां इन सब वस्तुओं की खोज में रहती हैं: और तुम्हारा पिता जानता है, कि तुम्हें इन वस्तुओं की आवश्यकता है।

31     परन्तु उसके राज्य की खोज में रहो, तो ये वस्तुऐं भी तुम्हें मिल जाएंगी।

4. Luke 12 : 22-24, 27-31

22     And he said unto his disciples, Therefore I say unto you, Take no thought for your life, what ye shall eat; neither for the body, what ye shall put on.

23     The life is more than meat, and the body is more than raiment.

24     Consider the ravens: for they neither sow nor reap; which neither have storehouse nor barn; and God feedeth them: how much more are ye better than the fowls?

27     Consider the lilies how they grow: they toil not, they spin not; and yet I say unto you, that Solomon in all his glory was not arrayed like one of these.

28     If then God so clothe the grass, which is to day in the field, and to morrow is cast into the oven; how much more will he clothe you, O ye of little faith?

29     And seek not ye what ye shall eat, or what ye shall drink, neither be ye of doubtful mind.

30     For all these things do the nations of the world seek after: and your Father knoweth that ye have need of these things.

31     But rather seek ye the kingdom of God; and all these things shall be added unto you.

5. यूहन्ना 5 : 19, 20, 30

19     इस पर यीशु ने उन से कहा, मैं तुम से सच सच कहता हूं, पुत्र आप से कुछ नहीं कर सकता, केवल वह जो पिता को करते देखता है, क्योंकि जिन जिन कामों को वह करता है उन्हें पुत्र भी उसी रीति से करता है।

20     क्योंकि पिता पुत्र से प्रीति रखता है और जो जो काम वह आप करता है, वह सब उसे दिखाता है; और वह इन से भी बड़े काम उसे दिखाएगा, ताकि तुम अचम्भा करो।

30     मैं अपने आप से कुछ नहीं कर सकता; जैसा सुनता हूं, वैसा न्याय करता हूं, और मेरा न्याय सच्चा है; क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, परन्तु अपने भेजने वाले की इच्छा चाहता हूं।

5. John 5 : 19, 20, 30

19     Then answered Jesus and said unto them, Verily, verily, I say unto you, The Son can do nothing of himself, but what he seeth the Father do: for what things soever he doeth, these also doeth the Son likewise.

20     For the Father loveth the Son, and sheweth him all things that himself doeth: and he will shew him greater works than these, that ye may marvel.

30     I can of mine own self do nothing: as I hear, I judge: and my judgment is just; because I seek not mine own will, but the will of the Father which hath sent me.

6. यूहन्ना 7 : 14-16

14     और जब पर्व के आधे दिन बीत गए; तो यीशु मन्दिर में जाकर उपदेश करने लगा।

15     तब यहूदियों ने अचम्भा करके कहा, कि इसे बिन पढ़े विद्या कैसे आ गई?

16     यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, कि मेरा उपदेश मेरा नहीं, परन्तु मेरे भेजने वाले का है।

6. John 7 : 14-16

14     Now about the midst of the feast Jesus went up into the temple, and taught.

15     And the Jews marvelled, saying, How knoweth this man letters, having never learned?

16     Jesus answered them, and said, My doctrine is not mine, but his that sent me.

7. याकूब 3 : 17 (ज्ञान)

17     ...जो ज्ञान ऊपर से आता है वह पहिले तो पवित्र होता है फिर मिलनसार, कोमल और मृदुभाव और दया, और अच्छे फलों से लदा हुआ और पक्षपात और कपट रहित होता है।

7. James 3 : 17 (the wisdom)

17     …the wisdom that is from above is first pure, then peaceable, gentle, and easy to be intreated, full of mercy and good fruits, without partiality, and without hypocrisy.

8. नीतिवचन 3 : 1, 5, 6

1     हेमेरे पुत्र, मेरी शिक्षा को न भूलना; अपने हृदय में मेरी आज्ञाओं को रखे रहना;

5     तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना।

6     उसी को स्मरण करके सब काम करना, तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा।

8. Proverbs 3 : 1, 5, 6

1     My son, forget not my law; but let thine heart keep my commandments:

5     Trust in the Lord with all thine heart; and lean not unto thine own understanding.

6     In all thy ways acknowledge him, and he shall direct thy paths.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 587 : 5-8

परमेश्वर। मैं जो महान हूं; सर्व-ज्ञान, सर्व-दर्शन, सर्व-कार्य, सर्व-ज्ञान, सर्व-प्रिय और शाश्वत; सिद्धांत; मन; अन्त: मन; आत्मा; जिंदगी; सत्य; प्रेम; सभी पदार्थ; बुद्धि।

1. 587 : 5-8

God. The great I am; the all-knowing, all-seeing, all-acting, all-wise, all-loving, and eternal; Principle; Mind; Soul; Spirit; Life; Truth; Love; all substance; intelligence.

2. 591 : 16-20

मन। केवल मैं, या हम; एकमात्र आत्मा, जीवन, दिव्य सिद्धांत, पदार्थ, जीवन, सत्य, प्रेम; एक ईश्वर; वह नहीं जो मनुष्य में है, लेकिन ईश्वरीय सिद्धांत या ईश्वर, किसका मनुष्य पूर्ण और परिपूर्ण अभिव्यक्ति है; देवता, जो रेखांकित करते हैं, लेकिन रेखांकित नहीं किए जाते हैं।

2. 591 : 16-20

Mind. The only I, or Us ; the only Spirit, Soul, divine Principle, substance, Life, Truth, Love; the one God; not that which is in man, but the divine Principle, or God, of whom man is the full and perfect expression; Deity, which outlines but is not outlined.

3. 379 : 6-8

संसार का वास्तविक क्षेत्राधिकार मन में है, प्रत्येक प्रभाव को नियंत्रित करता है और सभी कार्य को दिव्य मन में निहित माना जाता है।

3. 379 : 6-8

The real jurisdiction of the world is in Mind, controlling every effect and recognizing all causation as vested in divine Mind.

4. 488 : 23-27

अकेले मन के पास सभी संकायों, धारणा और समझ है। इसलिए मानसिक अंतर्मुखता संगठन और विघटन की दया पर नहीं हैं, — अन्यथा कीड़े मनुष्य को नष्ट कर सकते थे।

4. 488 : 23-27

Mind alone possesses all faculties, perception, and comprehension. Therefore mental endowments are not at the mercy of organization and decomposition, — otherwise the very worms could unfashion man.

5. 453 : 29-31

एक क्रिश्चियन वैज्ञानिक की दवा मन है, वह दिव्य सत्य जो मनुष्य को स्वतंत्र बनाता है। एक क्रिश्चियन वैज्ञानिक कभी भी सामग्री स्वच्छता की सिफारिश नहीं करता है, कभी भी हेरफेर नहीं करता है।

5. 453 : 29-31

A Christian Scientist’s medicine is Mind, the divine Truth that makes man free. A Christian Scientist never recommends material hygiene, never manipulates.

6. 483 : 6 (मन कर सकता है)-12

मन चंगा कर सकता है, और यह मन मानवीय होना चाहिए, दिव्य नहीं। मन अन्य सभी शक्ति को पार कर जाता है, और अंततः चिकित्सा में अन्य सभी साधनों को उलट देगा। विज्ञान द्वारा चंगा करने के लिए, आपको विज्ञान की नैतिक और आध्यात्मिक मांगों से अनभिज्ञ नहीं होना चाहिए और न ही उनकी अवज्ञा करनी चाहिए। नैतिक अज्ञानता या पाप आपके प्रदर्शन को प्रभावित करता है, और ईसाई विज्ञान में मानक के लिए अपने दृष्टिकोण में बाधा।

6. 483 : 6 (Mind can)-12

Mind can heal, and this Mind must be divine, not human. Mind transcends all other power, and will ultimately supersede all other means in healing. In order to heal by Science, you must not be ignorant of the moral and spiritual demands of Science nor disobey them. Moral ignorance or sin affects your demonstration, and hinders its approach to the standard in Christian Science.

7. 13 : 15 (परमेश्वर)-19

इससे पहले कि हम उसे या हमारे साथी-प्राणियों को इसके बारे में बताएं, ईश्वर हमारी आवश्यकता को जानता है। यदि हम ईमानदारी से और चुपचाप और विनम्रता से इच्छा को संजोते हैं, तो भगवान इसे आशीर्वाद देंगे, और हम शब्दों की एक धार के साथ अपनी वास्तविक इच्छाओं को कम करने के जोखिम को कम करेंगे।

7. 13 : 15 (God)-19

God knows our need before we tell Him or our fellow-beings about it. If we cherish the desire honestly and silently and humbly, God will bless it, and we shall incur less risk of over-whelming our real wishes with a torrent of words.

8. 7 : 23-26

ईश्वर मनुष्य से प्रभावित नहीं है। "दिव्य कान" श्रवण तंत्रिका नहीं है। यह सर्व-श्रवण और सर्व-ज्ञान मन है, जिनके लिए मनुष्य की प्रत्येक आवश्यकता को हमेशा जाना जाता है और जिनके द्वारा इसकी आपूर्ति की जाएगी।

8. 7 : 23-26

God is not influenced by man. The “divine ear” is not an auditory nerve. It is the all-hearing and all-knowing Mind, to whom each need of man is always known and by whom it will be supplied.

9. 15 : 7-13

गुप्त में पिता भौतिक इंद्रियों के लिए अनदेखा है, लेकिन वह सभी चीजों को जानता है और इरादों के अनुसार पुरस्कार लेता है, भाषण के अनुसार नहीं। प्रार्थना के दिल में प्रवेश करने के लिए, गलत इंद्रियों का दरवाजा बंद होना चाहिए। होंठों को मूक और भौतिकवाद चुप होना चाहिए, ताकि मनुष्य में आत्मा, दिव्य सिद्धांत और प्रेम के साथ दर्शक हो, जो सभी त्रुटि को नष्ट कर दे।

9. 15 : 7-13

The Father in secret is unseen to the physical senses, but He knows all things and rewards according to motives, not according to speech. To enter into the heart of prayer, the door of the erring senses must be closed. Lips must be mute and materialism silent, that man may have audience with Spirit, the divine Principle, Love, which destroys all error.

10. 84 : 11-23

भूत, वर्तमान और भविष्य को जानना, वर्तमान, दिव्य मन का विचार है, और इस विचार का जो इस मन के साथ तालमेल है,

साइंस के साथ परिचित होना हमें बड़े पैमाने पर दिव्य मन के साथ कम्यून को सक्षम बनाता है, सर्वकल्याण की चिंता करने वाली घटनाओं का पूर्वाभास और पूर्वाभास, दैवीय रूप से प्रेरित करने के लिए, — हाँ, भ्रूणहीन मन की सीमा तक पहुँचने के लिए।

यह समझना कि माइंड असीम है, कॉरपोरलिटी से घिरा नहीं है, ध्वनि या दृष्टि के लिए कान और आंख पर निर्भर नहीं है और न ही यह मांसपेशियों और हड्डियों पर निर्भर करता है, माइंड-साइंस की ओर एक कदम है जिसके द्वारा हम मनुष्य के स्वभाव और अस्तित्व की व्याख्या करते हैं

10. 84 : 11-23

It is the prerogative of the ever-present, divine Mind, and of thought which is in rapport with this Mind, to know the past, the present, and the future.

Acquaintance with the Science of being enables us to commune more largely with the divine Mind, to foresee and foretell events which concern the universal welfare, to be divinely inspired, — yea, to reach the range of fetterless Mind.

To understand that Mind is infinite, not bounded by corporeality, not dependent upon the ear and eye for sound or sight nor upon muscles and bones for locomotion, is a step towards the Mind-science by which we discern man’s nature and existence.

11. 254 : 10-12

जब हम धैर्यपूर्वक ईश्वर की प्रतीक्षा करते हैं और सत्य की तलाश करते हैं, तो वह हमारे मार्ग का निर्देशन करता है।

11. 254 : 10-12

When we wait patiently on God and seek Truth righteously, He directs our path.

12. 170 : 14-21

सत्य की माँगें आध्यात्मिक हैं, और मन के द्वारा शरीर तक पहुँचती हैं। मनुष्य की जरूरतों का सबसे अच्छा दुभाषिया ने कहा: "कि अपने प्राण के लिये यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएंगे,और क्या पीएंगे"

यदि ऐसे भौतिक कानून हैं जो बीमारी को रोकते हैं, तो इसके कारण क्या हैं? ईश्वरीय कानून नहीं, क्योंकि यीशु ने बीमारों को चंगा किया और त्रुटि को मिटा दिया, हमेशा विरोध में, कभी भी आज्ञाकारिता में, भौतिकी को नहीं।

12. 170 : 14-21

The demands of Truth are spiritual, and reach the body through Mind. The best interpreter of man’s needs said: “Take no thought for your life, what ye shall eat, or what ye shall drink.”

If there are material laws which prevent disease, what then causes it? Not divine law, for Jesus healed the sick and cast out error, always in opposition, never in obedience, to physics.

13. 171 : 12-16

मनुष्य सहित ब्रह्मांड पर मन का नियंत्रण अब एक खुला प्रश्न नहीं है, बल्कि विज्ञान है। यीशु ने बीमारी और पाप को ठीक करने और मृत्यु की नींव को नष्ट करके दिव्य सिद्धांत और अमर मन की शक्ति का वर्णन किया।

13. 171 : 12-16

Mind’s control over the universe, including man, is no longer an open question, but is demonstrable Science. Jesus illustrated the divine Principle and the power of immortal Mind by healing sickness and sin and destroying the foundations of death.

14. 371 : 26-32

विज्ञान और ईसाई धर्म के माध्यम से मानव जाति में सुधार होगा। दौड़ को बढ़ाने के लिए आवश्यकता इस तथ्य के लिए पिता है कि माइंड यह कर सकता है; क्योंकि मन अशुद्धता के बजाय पवित्रता प्रदान कर सकता है, कमजोरी के बजाय ताकत और बीमारी के बजाय स्वास्थ्य। सत्य संपूर्ण व्यवस्था में परिवर्तनकारी है, और इसके “हर तिनका को पूरा” कर सकते हैं।

14. 371 : 26-32

Mankind will improve through Science and Christianity. The necessity for uplifting the race is father to the fact that Mind can do it; for Mind can impart purity instead of impurity, strength instead of weakness, and health instead of disease. Truth is an alterative in the entire system, and can make it “every whit whole.”

15. 383 : 5-11

कोई कहता है: "मैं अपने शरीर की अच्छी देखभाल करता हूं।" ऐसा करने के लिए, शरीर पर दिव्य मन का शुद्ध और उत्कृष्ट प्रभाव अपेक्षित है, और क्रिश्चियन साइंटिस्ट अपने शरीर का सबसे अच्छा ख्याल रखते हैं जब वह इसे अपने विचार से बाहर छोड़ देता है, और, प्रेरित पॉल की तरह, "शरीर से अनुपस्थित रहने के लिए और प्रभु के साथ उपस्थित होने के लिए तैयार है।"

15. 383 : 5-11

One says: “I take good care of my body.” To do this, the pure and exalting influence of the divine Mind on the body is requisite, and the Christian Scientist takes the best care of his body when he leaves it most out of his thought, and, like the Apostle Paul, is “willing rather to be absent from the body, and to be present with the Lord.”

16. 283 : 4-12

मन सभी आंदोलन का स्रोत है, और इसकी स्थायी और सामंजस्यपूर्ण कार्रवाई की मंदता या जांच करने के लिए कोई जड़ता नहीं है। माइंड "कल, और आज, और हमेशा" जीवन, प्रेम और ज्ञान की तरह ही है। पदार्थ और उसके प्रभाव - पाप, बीमारी और मृत्यु - नश्वर मन की अवस्थाएँ हैं जो कार्य करते हैं, प्रतिक्रिया करते हैं, और फिर एक पड़ाव पर आते हैं। वे मन के तथ्य नहीं हैं। वे विचार नहीं हैं, बल्कि भ्रम हैं। सिद्धांत निरपेक्ष है। यह किसी भी त्रुटि से स्वीकार नहीं किया जाता है, लेकिन समझने पर निश्चित रहता है।

16. 283 : 4-12

Mind is the source of all movement, and there is no inertia to retard or check its perpetual and harmonious action. Mind is the same Life, Love, and wisdom “yesterday, and to-day, and forever.” Matter and its effects — sin, sickness, and death — are states of mortal mind which act, react, and then come to a stop. They are not facts of Mind. They are not ideas, but illusions. Principle is absolute. It admits of no error, but rests upon understanding.

17. 205 : 32-3

जब हम दिव्य के साथ अपने संबंध को पूरी तरह से समझते हैं, तो हमारे पास कोई अन्य मन नहीं हो सकता है, लेकिन उनका - कोई अन्य प्रेम, ज्ञान, या सत्य, जीवन का कोई अन्य अर्थ नहीं है, और पदार्थ या त्रुटि के अस्तित्व की कोई चेतना नहीं है।

17. 205 : 32-3

When we fully understand our relation to the Divine, we can have no other Mind but His, — no other Love, wisdom, or Truth, no other sense of Life, and no consciousness of the existence of matter or error.

18. 467 : 9-16

यह अच्छी तरह समझा जाना चाहिए कि सभी पुरुषों का एक मन, एक ईश्वर और पिता, एक जीवन, सत्य और प्रेम होता है। यह तथ्य स्पष्ट होते ही मानव जाति अनुपात में परिपूर्ण हो जाएगी, युद्ध बंद हो जाएगा और मनुष्य का सच्चा भाईचारा स्थापित हो जाएगा। कोई अन्य देवता नहीं, कोई दूसरा नहीं, बल्कि एक ही मार्गदर्शक का मन, मनुष्य ईश्वर की समानता है, शुद्ध और शाश्वत है, और उसके पास वह मन है जो मसीह में भी था।

18. 467 : 9-16

It should be thoroughly understood that all men have one Mind, one God and Father, one Life, Truth, and Love. Mankind will become perfect in proportion as this fact becomes apparent, war will cease and the true brotherhood of man will be established. Having no other gods, turning to no other but the one perfect Mind to guide him, man is the likeness of God, pure and eternal, having that Mind which was also in Christ.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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