रविवार 23 जनवरी, 2022



विषयसत्य

SubjectTruth

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: याकूब 1 : 18

"उस ने अपनी ही इच्छा से हमें सत्य के वचन के द्वारा उत्पन्न किया, ताकि हम उस की सृष्टि की हुई वस्तुओं में से एक प्रकार के प्रथम फल हों॥"



Golden Text: James 1 : 18

Of his own will begat he us with the word of truth, that we should be a kind of firstfruits of his creatures.




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उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 1: 1-3, 6 • भजन संहिता 92: 12-14 • भजन संहिता 86: 11


1     क्याही धन्य है वह पुरूष जो दुष्टों की युक्ति पर नहीं चलता, और न पापियों के मार्ग में खड़ा होता; और न ठट्ठा करने वालों की मण्डली में बैठता है!

2     परन्तु वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है।

3     वह उस वृक्ष के समान है, जो बहती नालियों के किनारे लगाया गया है। और अपनी ऋतु में फलता है, और जिसके पत्ते कभी मुरझाते नहीं। इसलिये जो कुछ वह पुरूष करे वह सफल होता है॥

6     क्योंकि यहोवा धर्मियों का मार्ग जानता है, परन्तु दुष्टों का मार्ग नाश हो जाएगा॥

12     धर्मी लोग खजूर की नाईं फूले फलेंगे, और लबानोन के देवदार की नाईं बढ़ते रहेंगे।

13     वे यहोवा के भवन में रोपे जा कर, हमारे परमेश्वर के आंगनों में फूले फलेंगे।

14     वे पुराने होने पर भी फलते रहेंगे, और रस भरे और लहलहाते रहेंगे,

11     हे यहोवा अपना मार्ग मुझे दिखा, तब मैं तेरे सत्य मार्ग पर चलूंगा।

Responsive Reading: Psalm 1 : 1-3, 6; Psalm 92 : 12-14; Psalm 86 : 11

1.     Blessed is the man that walketh not in the counsel of the ungodly, nor standeth in the way of sinners, nor sitteth in the seat of the scornful.

2.     But his delight is in the law of the Lord; and in his law doth he meditate day and night.

3.     And he shall be like a tree planted by the rivers of water, that bringeth forth his fruit in his season; his leaf also shall not wither; and whatsoever he doeth shall prosper.

6.     For the Lord knoweth the way of the righteous.

12.     The righteous shall flourish like the palm tree: he shall grow like a cedar in Lebanon.

13.     Those that be planted in the house of the Lord shall flourish in the courts of our God.

14.     They shall still bring forth fruit in old age; they shall be fat and flourishing.

11.     Teach me thy way, O Lord; I will walk in thy truth.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यशायाह 55 : 1, 3 (से 3rd ,), 8-11

1     अहो सब प्यासे लोगो, पानी के पास आओ; और जिनके पास रूपया न हो, तुम भी आकर मोल लो और खाओ! दाखमधु और दूध बिन रूपए और बिना दाम ही आकर ले लो।

3     कान लगाओ, और मेरे पास आओ; सुनो, तब तुम जीवित रहोगे; और मैं तुम्हारे साथ सदा की वाचा बान्धूंगा।

8     क्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं है, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है।

9     क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है॥

10     जिस प्रकार से वर्षा और हिम आकाश से गिरते हैं और वहां यों ही लौट नहीं जाते, वरन भूमि पर पड़कर उपज उपजाते हैं जिस से बोने वाले को बीज और खाने वाले को रोटी मिलती है,

11     उसी प्रकार से मेरा वचन भी होगा जो मेरे मुख से निकलता है; वह व्यर्थ ठहरकर मेरे पास न लौटेगा, परन्तु, जो मेरी इच्छा है उसे वह पूरा करेगा, और जिस काम के लिये मैं ने उसको भेजा है उसे वह सफल करेगा॥

1. Isaiah 55 : 1, 3 (to 3rd ,), 8-11

1     Ho, every one that thirsteth, come ye to the waters, and he that hath no money; come ye, buy, and eat; yea, come, buy wine and milk without money and without price.

3     Incline your ear, and come unto me: hear, and your soul shall live; and I will make an everlasting covenant with you,

8     For my thoughts are not your thoughts, neither are your ways my ways, saith the Lord.

9     For as the heavens are higher than the earth, so are my ways higher than your ways, and my thoughts than your thoughts.

10     For as the rain cometh down, and the snow from heaven, and returneth not thither, but watereth the earth, and maketh it bring forth and bud, that it may give seed to the sower, and bread to the eater:

11     So shall my word be that goeth forth out of my mouth: it shall not return unto me void, but it shall accomplish that which I please, and it shall prosper in the thing whereto I sent it.

2. मत्ती 13: 1

1     उसी दिन यीशु घर से निकलकर झील के किनारे जा बैठा।

2. Matthew 13 : 1

1     The same day went Jesus out of the house, and sat by the sea side.

3. लूका 8: 4-8, 11-15

4     जब बड़ी भीड़ इकट्ठी हुई, और नगर नगर के लोग उसके पास चले आते थे, तो उस ने दृष्टान्त में कहा।

5     कि एक बोने वाला बीज बोने निकला: बोते हुए कुछ मार्ग के किनारे गिरा, और रौंदा गया, और आकाश के पक्षियों ने उसे चुग लिया।

6     और कुछ चट्टान पर गिरा, और उपजा, परन्तु तरी न मिलने से सूख गया।

7     कुछ झाड़ियों के बीच में गिरा, और झाड़ियों ने साथ साथ बढ़कर उसे दबा लिया।

8     और कुछ अच्छी भूमि पर गिरा, और उगकर सौ गुणा फल लाया: यह कहकर उस ने ऊंचे शब्द से कहा; जिस के सुनने के कान होंवह सुन ले॥

11 दृष्टान्त यह है; बीज तो परमेश्वर का वचन है।

12     मार्ग के किनरे के वे हैं, जिन्हों ने सुना; तब शैतान आकर उन के मन में से वचन उठा ले जाता है, कि कहीं ऐसा न हो कि वे विश्वास करके उद्धार पाएं।

13     चट्टान पर के वे हैं, कि जब सुनते हैं, तो आनन्द से वचन को ग्रहण तो करते हैं, परन्तु जड़ न पकड़ने से वे थोड़ी देर तक विश्वास रखते हैं, और परीक्षा के समय बहक जाते हैं।

14     जो झाड़ियों में गिरा, सो वे हैं, जो सुनते हैं, पर होते होते चिन्ता और धन और जीवन के सुख विलास में फंस जाते हैं, और उन का फल नहीं पकता।

15     पर अच्छी भूमि में के वे हैं, जो वचन सुनकर भले और उत्तम मन में सम्भाले रहते हैं, और धीरज से फल लाते हैं॥

3. Luke 8 : 4-8, 11-15

4     And when much people were gathered together, and were come to him out of every city, he spake by a parable:

5     A sower went out to sow his seed: and as he sowed, some fell by the way side; and it was trodden down, and the fowls of the air devoured it.

6     And some fell upon a rock; and as soon as it was sprung up, it withered away, because it lacked moisture.

7     And some fell among thorns; and the thorns sprang up with it, and choked it.

8     And other fell on good ground, and sprang up, and bare fruit an hundredfold. And when he had said these things, he cried, He that hath ears to hear, let him hear.

11     Now the parable is this: The seed is the word of God.

12     Those by the way side are they that hear; then cometh the devil, and taketh away the word out of their hearts, lest they should believe and be saved.

13     They on the rock are they, which, when they hear, receive the word with joy; and these have no root, which for a while believe, and in time of temptation fall away.

14     And that which fell among thorns are they, which, when they have heard, go forth, and are choked with cares and riches and pleasures of this life, and bring no fruit to perfection.

15     But that on the good ground are they, which in an honest and good heart, having heard the word, keep it, and bring forth fruit with patience.

4. मत्ती 13 : 31-35

31     उस ने उन्हें एक और दृष्टान्त दिया; कि स्वर्ग का राज्य राई के एक दाने के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने लेकर अपने खेत में बो दिया।

32     वह सब बीजों से छोटा तो है पर जब बढ़ जाता है तब सब साग पात से बड़ा होता है; और ऐसा पेड़ हो जाता है, कि आकाश के पक्षी आकर उस की डालियों पर बसेरा करते हैं॥

33     उस ने एक और दृष्टान्त उन्हें सुनाया; कि स्वर्ग का राज्य खमीर के समान है जिस को किसी स्त्री ने लेकर तीन पसेरी आटे में मिला दिया और होते होते वह सब खमीर हो गया॥

34     ये सब बातें यीशु ने दृष्टान्तों में लोगों से कहीं, और बिना दृष्टान्त वह उन से कुछ न कहता था।

35     कि जो वचन भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था, वह पूरा हो कि मैं दृष्टान्त कहने को अपना मुंह खोलूंगा: मैं उन बातों को जो जगत की उत्पत्ति से गुप्त रही हैं प्रगट करूंगा॥

4. Matthew 13 : 31-35

31     Another parable put he forth unto them, saying, The kingdom of heaven is like to a grain of mustard seed, which a man took, and sowed in his field:

32     Which indeed is the least of all seeds: but when it is grown, it is the greatest among herbs, and becometh a tree, so that the birds of the air come and lodge in the branches thereof.

33     Another parable spake he unto them; The kingdom of heaven is like unto leaven, which a woman took, and hid in three measures of meal, till the whole was leavened.

34     All these things spake Jesus unto the multitude in parables; and without a parable spake he not unto them:

35     That it might be fulfilled which was spoken by the prophet, saying, I will open my mouth in parables; I will utter things which have been kept secret from the foundation of the world.

5. लूका 9: 1, 2, 6

1     फिर उस ने बारहों को बुलाकर उन्हें सब दुष्टात्माओं और बिमारियों को दूर करने की सामर्थ और अधिकार दिया।

2     और उन्हें परमेश्वर के राज्य का प्रचार करने, और बिमारों को अच्छा करने के लिये भेजा।

6     सो वे निकलकर गांव गांव सुसमाचार सुनाते, और हर कहीं लोगों को चंगा करते हुए फिरते रहे॥

5. Luke 9 : 1, 2, 6

1     Then he called his twelve disciples together, and gave them power and authority over all devils, and to cure diseases.

2     And he sent them to preach the kingdom of God, and to heal the sick.

6     And they departed, and went through the towns, preaching the gospel, and healing every where.

6. 2 कुरिन्थियों 9: 6 (वह), 7 (से ;), 8, 10 (से ;), 11

6     परन्तु बात तो यह है, कि जो थोड़ा बोता है वह थोड़ा काटेगा भी; और जो बहुत बोता है, वह बहुत काटेगा।

7     हर एक जन जैसा मन में ठाने वैसा ही दान करे न कुढ़ कुढ़ के, और न दबाव से, क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है।

8     और परमेश्वर सब प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है जिस से हर बात में और हर समय, सब कुछ, जो तुम्हें आवश्यक हो, तुम्हारे पास रहे, और हर एक भले काम के लिये तुम्हारे पास बहुत कुछ हो।

9     जेसा लिखा है, उस ने बिथराया, उस ने कंगालों को दान दिया, उसका धर्म सदा बना रहेगा।

10     सो जो बोने वाले को बीज, और भोजन के लिये रोटी देता है वह तुम्हें बीज देगा, और उसे फलवन्त करेगा; और तुम्हारे धर्म के फलों को बढ़ाएगा।

11     कि तुम हर बात में सब प्रकार की उदारता के लिये जो हमारे द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करवाती है, धनवान किए जाओ।

6. II Corinthians 9 : 6 (He), 7 (to ;), 8, 10 (to ;), 11

6     He which soweth sparingly shall reap also sparingly; and he which soweth bountifully shall reap also bountifully.

7     Every man according as he purposeth in his heart, so let him give;

8     And God is able to make all grace abound toward you; that ye, always having all sufficiency in all things, may abound to every good work:

10     Now he that ministereth seed to the sower both minister bread for your food, and multiply your seed sown, and increase the fruits of your righteousness;

11     Being enriched in every thing to all bountifulness, which causeth through us thanksgiving to God.

7. 1 पतरस 2: 11-14 (से 1st,), 15

11     हे प्रियों मैं तुम से बिनती करता हूं, कि तुम अपने आप को परदेशी और यात्री जान कर उस सांसारिक अभिलाषाओं से जो आत्मा से युद्ध करती हैं, बचे रहो।

12     अन्यजातियों में तुम्हारा चालचलन भला हो; इसलिये कि जिन जिन बातों में वे तुम्हें कुकर्मी जान कर बदनाम करते हैं, वे तुम्हारे भले कामों को देख कर; उन्हीं के कारण कृपा दृष्टि के दिन परमेश्वर की महिमा करें॥

13     प्रभु के लिये मनुष्यों के ठहराए हुए हर एक प्रबन्ध के आधीन में रहो, राजा के इसलिये कि वह सब पर प्रधान है।

14     और हाकिमों के।

15     क्योंकि परमेश्वर की इच्छा यह है, कि तुम भले काम करने से निर्बुद्धि लोगों की अज्ञानता की बातों को बन्द कर दो।

7. I Peter 2 : 11-14 (to 1st ,), 15

11     Dearly beloved, I beseech you as strangers and pilgrims, abstain from fleshly lusts, which war against the soul;

12     Having your conversation honest among the Gentiles: that, whereas they speak against you as evildoers, they may by your good works, which they shall behold, glorify God in the day of visitation.

13     Submit yourselves to every ordinance of man for the Lord’s sake: whether it be to the king, as supreme;

14     Or unto governors,

15     For so is the will of God, that with well doing ye may put to silence the ignorance of foolish men:

8. 1 पतरस 3: 8, 9

8     निदान, सब के सब एक मन और कृपामय और भाईचारे की प्रीति रखने वाले, और करूणामय, और नम्र बनो।

9     बुराई के बदले बुराई मत करो; और न गाली के बदले गाली दो; पर इस के विपरीत आशीष ही दो: क्योंकि तुम आशीष के वारिस होने के लिये बुलाए गए हो।

8. I Peter 3 : 8, 9

8     Finally, be ye all of one mind, having compassion one of another, love as brethren, be pitiful, be courteous:

9     Not rendering evil for evil, or railing for railing: but contrariwise blessing; knowing that ye are thereunto called, that ye should inherit a blessing.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 293 : 28-31

क्रिश्चियन साइंस सत्य और उसके वर्चस्व, सार्वभौमिक सद्भाव, ईश्वर की पवित्रता, अच्छे और बुरे की बुराई को प्रकाश में लाता है।

1. 293 : 28-31

Christian Science brings to light Truth and its supremacy, universal harmony, the entireness of God, good, and the nothingness of evil.

2. 322 : 31-5

सत्य को स्वयं की गलती से छुटकारा देने के लिए इच्छा करना आसान है। मुर्दा लोग क्रिश्चियन साइंस की समझ की तलाश कर सकते हैं, लेकिन वे क्राइस्टचियन साइंस से उनके लिए प्रयास किए बिना तथ्यों को चमकने में सक्षम नहीं होंगे। इस संघर्ष में हर तरह की त्रुटि का त्याग करने और कोई अन्य चेतना नहीं बल्कि अच्छा होने का प्रयास शामिल है।

2. 322 : 31-5

It is easier to desire Truth than to rid one's self of error. Mortals may seek the understanding of Christian Science, but they will not be able to glean from Christian Science the facts of being without striving for them. This strife consists in the endeavor to forsake error of every kind and to possess no other consciousness but good.

3. 4: 12-24 (से ;)

हमेशा अच्छा रहने की आदतन संघर्ष एक दैनिक प्रार्थना है। इसका मकसद उनके द्वारा लाए गए आशीर्वाद में प्रकट होना है, — वह आशीर्वाद, जो भले ही श्रव्य शब्दों में स्वीकार नहीं किया जाता है, हमारी योग्यता को प्यार का भागीदार बनाते हैं।

केवल यह कहते हुए कि हम ईश्वर से प्रेम कर सकते हैं, हमसे कभी प्रेम नहीं करेंगे; लेकिन बेहतर और पवित्र होने की लालसा, दैनिक निगरानी में और दिव्य चरित्र के अधिक आत्मसात करने के प्रयास में, ढालेगी और हमें नए सिरे से बनाएगी, जब तक कि हम उसकी समानता में नहीं जागते। हम ईश्वरीय प्रकृति के प्रदर्शन के माध्यम से ईसाई धर्म के विज्ञान तक पहुँचते हैं;

3. 4 : 12-24 (to ;)

The habitual struggle to be always good is unceasing prayer. Its motives are made manifest in the blessings they bring, — blessings which, even if not acknowledged in audible words, attest our worthiness to be partakers of Love.

Simply asking that we may love God will never make us love Him; but the longing to be better and holier, expressed in daily watchfulness and in striving to assimilate more of the divine character, will mould and fashion us anew, until we awake in His likeness. We reach the Science of Christianity through demonstration of the divine nature;

4. 323 : 13-16

अधिक जानने के लिए, हमें जो पहले से जानते हैं उसे व्यवहार में लाना चाहिए। हमें यह याद रखना चाहिए कि सत्य को समझने पर प्रदर्शित किया जा सकता है, और उस अच्छे को तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक कि प्रदर्शित न हो जाए।

4. 323 : 13-16

In order to apprehend more, we must put into practice what we already know. We must recollect that Truth is demonstrable when understood, and that good is not understood until demonstrated.

5. 361 : 23-30 (से ,)

दिव्य विज्ञान की एक मानवीय धारणा, हालांकि, सीमित है, विज्ञान होने और प्रदर्शन के अधीन होने के लिए सही होना चाहिए। अनंत सत्य का एक रोगाणु, भले ही स्वर्ग के राज्य में कम से कम पृथ्वी पर उच्च आशा है, लेकिन जब तक भगवान बीज के लिए मिट्टी तैयार नहीं करते तब तक इसे खारिज कर दिया जाएगा और निंदा की जाएगी। जो बोए जाने पर अमर फल देता है, मानव जाति को तभी समृद्ध करता है जब उसे समझा जाए,

5. 361 : 23-30 (to ,)

A human perception of divine Science, however limited, must be correct in order to be Science and subject to demonstration. A germ of infinite Truth, though least in the kingdom of heaven is the higher hope on earth, but it will be rejected and reviled until God prepares the soil for the seed. That which when sown bears immortal fruit, enriches mankind only when it is understood,

6. 272 : 3-8

सत्य को समझने से पहले सच्चाई की आध्यात्मिक समझ हासिल करनी चाहिए। इस भावना को केवल इसलिए आत्मसात किया जाता है क्योंकि हम ईमानदार, निःस्वार्थ, प्यार और नम्र हैं। "ईमानदार और अच्छे दिल" की मिट्टी में बीज बोना चाहिए; इसके अलावा, यह मानव प्रकृति में मूल तत्व को उखाड़ फेंकने के लिए ज्यादा फल नहीं है।

6. 272 : 3-8

The spiritual sense of truth must be gained before Truth can be understood. This sense is assimilated only as we are honest, unselfish, loving, and meek. In the soil of an "honest and good heart" the seed must be sown; else it beareth not much fruit, for the swinish element in human nature uproots it.

7. 535 : 1-5

सत्य के बीज और त्रुटि के बीज, विश्वास और समझ के, - हां, आत्मा के बीज और पदार्थ के बीज - ये गेहूँ और तारे हैं जो समय अलग हो जाएंगे, एक को जला दिया जाएगा, दूसरे को स्वर्गीय स्थानों में प्राप्त किया।

7. 535 : 1-5

The seed of Truth and the seed of error, of belief and of understanding, — yea, the seed of Spirit and the seed of matter, — are the wheat and tares which time will separate, the one to be burned, the other to be garnered into heavenly places.

8. 428 : 8-12

झूठे न्यासों और भौतिक साक्ष्यों के बारे में विचार करने के लिए ताकि आध्यात्मिक तथ्य सामने आ सकें — यह महान प्राप्ति है जिसके माध्यम से हम असत्य को मिटा देंगे और सत्य को स्थान देंगे।

8. 428 : 8-12

To divest thought of false trusts and material evidences in order that the spiritual facts of being may appear, — this is the great attainment by means of which we shall sweep away the false and give place to the true.

9. 418 : 5-11, 20-32

जीवन, पदार्थ, या बुद्धि के मामले में होने वाली त्रुटि के विपरीत होने के सत्य पर टिके रहें। सत्य के प्रति ईमानदार विश्वास और दिव्य विज्ञान के अपरिवर्तनीय, अचूक और निश्चित प्रभाव की स्पष्ट धारणा के साथ निवेदन करें। फिर, यदि आपकी निष्ठा आपकी विनती की सच्चाई से आधी है, तो आप बीमारों को ठीक कर देंगे।

सत्य सकारात्मक है, और सद्भाव प्रदान करता है। सभी रूपक तर्क सत्य के इस सरल नियम से प्रेरित हैं, जो सभी वास्तविकता को नियंत्रित करता है। आपके द्वारा नियोजित सत्य तर्कों और विशेष रूप से सत्य और प्रेम की भावना से जो आप मनोरंजन करते हैं, आप बीमारों को चंगा करेंगे।

त्रुटि को नष्ट करने के अपने प्रयासों में नैतिक और साथ ही भौतिक विश्वास को भी शामिल करें। सभी प्रकार की बुराईयों को दूर करो। "सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो।" हर प्रकार की त्रुटि के लिए सत्य बोलें। ट्यूमर, अल्सर, ट्यूबरकल्स, सूजन, दर्द, विकृत जोड़ों, स्वप्न-छाया को जागृत कर रहे हैं, नश्वर विचारों की काली छवियां, जो सत्य के प्रकाश से पहले भाग जाती हैं।

9. 418 : 5-11, 20-32

Stick to the truth of being in contradistinction to the error that life, substance, or intelligence can be in matter. Plead with an honest conviction of truth and a clear perception of the unchanging, unerring, and certain effect of divine Science. Then, if your fidelity is half equal to the truth of your plea, you will heal the sick.

Truth is affirmative, and confers harmony. All metaphysical logic is inspired by this simple rule of Truth, which governs all reality. By the truthful arguments you employ, and especially by the spirit of Truth and Love which you entertain, you will heal the sick.

Include moral as well as physical belief in your efforts to destroy error. Cast out all manner of evil. "Preach the gospel to every creature." Speak the truth to every form of error. Tumors, ulcers, tubercles, inflammation, pain, deformed joints, are waking dream-shadows, dark images of mortal thought, which flee before the light of Truth.

10. 419 : 4-16

आपका सच्चा पाठ्यक्रम दुश्मन को नष्ट करना है, और ईश्वर, जीवन, सत्य और प्रेम के क्षेत्र को छोड़ देना है, यह याद रखना कि भगवान और उनके विचार अकेले वास्तविक और सामंजस्यपूर्ण हैं।

यदि आपके रोगी को किसी भी कारण से फिर से दर्द होता है, तो मानसिक और साहसपूर्वक कारण का सामना करें, यह जानते हुए कि सत्य में कोई प्रतिक्रिया नहीं हो सकती है। न तो स्वयं रोग, न पाप, न भय में रोग या पुनरावर्तन करने की शक्ति है। रोग के पास ऐसी कोई बुद्धि नहीं होती जिसके द्वारा वह अपने आप को एक रूप से दूसरे रूप में स्थानांतरित कर सके या स्वयं को बदल सके। यदि रोग चलता है, तो मन, पदार्थ नहीं, चलता है; इसलिए सुनिश्चित करें कि आप इसे हटा दें। हर विपरीत परिस्थिति को अपना स्वामी मानकर उसका सामना करें।

10. 419 : 4-16

Your true course is to destroy the foe, and leave the field to God, Life, Truth, and Love, remembering that God and His ideas alone are real and harmonious.

If your patient from any cause suffers a relapse, meet the cause mentally and courageously, knowing that there can be no reaction in Truth. Neither disease itself, sin, nor fear has the power to cause disease or a relapse. Disease has no intelligence with which to move itself about or to change itself from one form to another. If disease moves, mind, not matter, moves it; therefore be sure that you move it off. Meet every adverse circumstance as its master.

11. 183 : 17 (यह)-18, 26-29

... सत्य के वैध और एकमात्र संभव कार्य के लिए सद्भाव का उत्पादन है।

सत्य वास्तविक आध्यात्मिक कानून के साथ सभी बुराइयों और भौतिकवादी तरीकों को निकालता है, — वह कानून जो अंधे को दृष्टि देता है, बहरे को सुनता है, गूंगे को आवाज देता है, पैर को लंगड़ा करता है।

11. 183 : 17 (the)-18, 26-29

…the legitimate and only possible action of Truth is the production of harmony.

Truth casts out all evils and materialistic methods with the actual spiritual law, — the law which gives sight to the blind, hearing to the deaf, voice to the dumb, feet to the lame.

12. 232 : 26-31

सत्य के पवित्र अभयारण्य में गंभीर महत्व की आवाजें हैं, लेकिन हम उन पर ध्यान नहीं देते हैं। जब हमारे जीवन में तथाकथित सुख और दुख दूर हो जाते हैं, तभी हम त्रुटि के दफनाने और आध्यात्मिक जीवन के पुनरुत्थान के निर्विवाद संकेत पाते हैं।

12. 232 : 26-31

In the sacred sanctuary of Truth are voices of solemn import, but we heed them not. It is only when the so-called pleasures and pains of sense pass away in our lives, that we find unquestionable signs of the burial of error and the resurrection to spiritual life.

13. 496 : 9 (पूछ)-14

अपने आप से पूछें: क्या मैं उस जीवन को जी रहा हूं जो सर्वोच्च भलाई के लिए है? क्या मैं सत्य और प्रेम की उपचार शक्ति का प्रदर्शन कर रहा हूँ? यदि ऐसा है, तो रास्ता उज्जवल हो जाएगा "पूरे दिन तक।" आपका फल यह साबित करेगा कि परमेश्वर की समझ मनुष्य को क्या लाती है।

13. 496 : 9 (Ask)-14

Ask yourself: Am I living the life that approaches the supreme good? Am I demonstrating the healing power of Truth and Love? If so, then the way will grow brighter "unto the perfect day." Your fruits will prove what the understanding of God brings to man.

14. 326 : 16-22

जीवित रहने का उद्देश्य और मकसद अब हासिल किया जा सकता है। यह बिंदु जीत गया, जैसा कि आपको शुरू करना चाहिए, आपने किया है। आप क्रिश्चियन साइंस के अंक-तालिका में शुरू कर चुके हैं, और गलत इरादे के अलावा कुछ भी आपकी उन्नति में बाधा नहीं बन सकता है। सच्चे इरादों के साथ काम करने और प्रार्थना करने से, आपके पिता आपके लिए रास्ता खोलेंगे। "किस ने तुम्हें रोक दिया, कि सत्य को न मानो?"

14. 326 : 16-22

The purpose and motive to live aright can be gained now. This point won, you have started as you should. You have begun at the numeration-table of Christian Science, and nothing but wrong intention can hinder your advancement. Working and praying with true motives, your Father will open the way. "Who did hinder you, that ye should not obey the truth?"


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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