रविवार 23 अगस्त, 2020 |

रविवार 23 अगस्त, 2020



विषयमन

SubjectMind

वर्ण पाठ: नीतिवचन 23 : 7

जैसा वह अपने मन में विचार करता है, वैसा वह आप है।



Golden Text: Proverbs 23 : 7

For as he thinketh in his heart, so is he.




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1 कुरिन्थियों 2 : 5, 12 • 1 पतरस 1: 13, 14 • 2 कुरिन्थियों 10: 3-5


5     इसलिये कि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ पर निर्भर हो॥

12     परन्तु हम ने संसार की आत्मा नहीं, परन्तु वह आत्मा पाया है, जो परमेश्वर की ओर से है, कि हम उन बातों को जानें, जो परमेश्वर ने हमें दी हैं।

13     अपनी बुद्धि की कमर बान्धकर, सचेत रहकर ।

14     और आज्ञाकारी बालकों की नाईं अपनी अज्ञानता के समय की पुरानी अभिलाषाओं के सदृश न बनो।

3     क्योंकि यद्यपि हम शरीर में चलते फिरते हैं, तौभी शरीर के अनुसार नहीं लड़ते।

4     क्योंकि हमारी लड़ाई के हथियार शारीरिक नहीं, पर गढ़ों को ढा देने के लिये परमेश्वर के द्वारा सामर्थी हैं।

5     सो हम कल्पनाओं को, और हर एक ऊंची बात को, जो परमेश्वर की पहिचान के विरोध में उठती है, खण्डन करते हैं; और हर एक भावना को कैद करके मसीह का आज्ञाकारी बना देते हैं।

Responsive Reading: I Corinthians 2 : 5, 12; I Peter 1 : 13, 14; II Corinthians 10 : 3-5

5.     Your faith should not stand in the wisdom of men, but in the power of God.

12.     Now we have received, not the spirit of the world, but the spirit which is of God; that we might know the things that are freely given to us of God.

13.     Wherefore gird up the loins of your mind, be sober,

14.     As obedient children, not fashioning yourselves according to the former lusts in your ignorance.

3.     For though we walk in the flesh, we do not war after the flesh:

4.     (For the weapons of our warfare are not carnal, but mighty through God to the pulling down of strong holds;)

5.     Casting down imaginations, and every high thing that exalteth itself against the knowledge of God, and bringing into captivity every thought to the obedience of Christ.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. व्यवस्थाविवरण 6 : 1, 5 (अपने), 14, 18, 19

1     यह वह आज्ञा, और वे विधियां और नियम हैं जो तुम्हें सिखाने की तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने आज्ञा दी है, कि तुम उन्हें उस देश में मानो जिसके अधिकारी होने को पार जाने पर हो;

5     ... तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन, और सारे जीव, और सारी शक्ति के साथ प्रेम रखना।

14     तुम पराए देवताओं के, अर्थात अपने चारों ओर के देशों के लोगों के देवताओं के पीछे न हो लेना;

18     और जो काम यहोवा की दृष्टि में ठीक और सुहावना है वही किया करना, जिस से कि तेरा भला हो, और जिस उत्तम देश के विषय में यहोवा ने तेरे पूर्वजों से शपथ खाई उस में तू प्रवेश करके उसका अधिकारी हो जाए,

19     कि तेरे सब शत्रु तेरे साम्हने से दूर कर दिए जाएं, जैसा कि यहोवा ने कहा था॥

1. Deuteronomy 6 : 1, 5 (thou), 14, 18, 19

1     Now these are the commandments, the statutes, and the judgments, which the Lord your God commanded to teach you, that ye might do them in the land whither ye go to possess it:

5     …thou shalt love the Lord thy God with all thine heart, and with all thy soul, and with all thy might.

14     Ye shall not go after other gods, of the gods of the people which are round about you;

18     And thou shalt do that which is right and good in the sight of the Lord: that it may be well with thee, and that thou mayest go in and possess the good land which the Lord sware unto thy fathers,

19     To cast out all thine enemies from before thee, as the Lord hath spoken.

2. व्यवस्थाविवरण 4 : 36 (से :), 39

36     आकाश में से उसने तुझे अपनी वाणी सुनाईं कि तुझे शिक्षा दे।

39     सो आज जान ले, और अपने मन में सोच भी रख, कि ऊपर आकाश में और नीचे पृथ्वी पर यहोवा ही परमेश्वर है; और कोई दूसरा नहीं।

2. Deuteronomy 4 : 36 (to :), 39

36     Out of heaven he made thee to hear his voice, that he might instruct thee:

39     Know therefore this day, and consider it in thine heart, that the Lord he is God in heaven above, and upon the earth beneath: there is none else.

3. भजन संहिता 141 : 3, 4

3     हे यहोवा, मेरे मुख का पहरा बैठा, मेरे हाठों के द्वार पर रखवाली कर!

4     मेरा मन किसी बुरी बात की ओर फिरने न दे; मैं अनर्थकारी पुरूषों के संग, दुष्ट कामों में न लगूं, और मैं उनके स्वादिष्ट भोजन वस्तुओं में से कुछ न खाऊं!

3. Psalm 141 : 3, 4

3     Set a watch, O Lord, before my mouth; keep the door of my lips.

4     Incline not my heart to any evil thing, to practise wicked works with men that work iniquity: and let me not eat of their dainties.

4. भजन संहिता 139 : 23, 24

23     हे ईश्वर, मुझे जांच कर जान ले! मुझे परख कर मेरी चिन्ताओं को जान ले!

24     और देख कि मुझ में कोई बुरी चाल है कि नहीं, और अनन्त के मार्ग में मेरी अगुवाई कर!

4. Psalm 139 : 23, 24

23     Search me, O God, and know my heart: try me, and know my thoughts:

24     And see if there be any wicked way in me, and lead me in the way everlasting.

5. मत्ती 4 : 1-11

1     तब उस समय आत्मा यीशु को जंगल में ले गया ताकि इब्लीस से उस की परीक्षा हो।

2     वह चालीस दिन, और चालीस रात, निराहार रहा, अन्त में उसे भूख लगी।

3     तब परखने वाले ने पास आकर उस से कहा, यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियां बन जाएं।

4     उस ने उत्तर दिया; कि लिखा है कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है जीवित रहेगा।

5     तब इब्लीस उसे पवित्र नगर में ले गया और मन्दिर के कंगूरे पर खड़ा किया।

6     और उस से कहा यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को नीचे गिरा दे; क्योंकि लिखा है, कि वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा; और वे तुझे हाथों हाथ उठा लेंगे; कहीं ऐसा न हो कि तेरे पांवों में पत्थर से ठेस लगे।

7     यीशु ने उस से कहा; यह भी लिखा है, कि तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।

8     फिर शैतान उसे एक बहुत ऊंचे पहाड़ पर ले गया और सारे जगत के राज्य और उसका विभव दिखाकर

9     उस से कहा, कि यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूंगा।

10     तब यीशु ने उस से कहा; हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा है, कि तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।

11     तब शैतान उसके पास से चला गया, और देखो, स्वर्गदूत आकर उस की सेवा करने लगे॥

5. Matthew 4 : 1-11

1     Then was Jesus led up of the Spirit into the wilderness to be tempted of the devil.

2     And when he had fasted forty days and forty nights, he was afterward an hungred.

3     And when the tempter came to him, he said, If thou be the Son of God, command that these stones be made bread.

4     But he answered and said, It is written, Man shall not live by bread alone, but by every word that proceedeth out of the mouth of God.

5     Then the devil taketh him up into the holy city, and setteth him on a pinnacle of the temple,

6     And saith unto him, If thou be the Son of God, cast thyself down: for it is written, He shall give his angels charge concerning thee: and in their hands they shall bear thee up, lest at any time thou dash thy foot against a stone.

7     Jesus said unto him, It is written again, Thou shalt not tempt the Lord thy God.

8     Again, the devil taketh him up into an exceeding high mountain, and sheweth him all the kingdoms of the world, and the glory of them;

9     And saith unto him, All these things will I give thee, if thou wilt fall down and worship me.

10     Then saith Jesus unto him, Get thee hence, Satan: for it is written, Thou shalt worship the Lord thy God, and him only shalt thou serve.

11     Then the devil leaveth him, and, behold, angels came and ministered unto him.

6. याकूब 4: 7, 8 (से 1st.)

7     इसलिये परमेश्वर के आधीन हो जाओ; और शैतान का साम्हना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा।

8     परमेश्वर के निकट आओ, तो वह भी तुम्हारे निकट आएगा।

6. James 4 : 7, 8 (to 1st .)

7     Submit yourselves therefore to God. Resist the devil, and he will flee from you.

8     Draw nigh to God, and he will draw nigh to you.

7. मत्ती 15: 1-3, 7-11, 15-20 (से :)

1     तब यरूशलेम से कितने फरीसी और शास्त्री यीशु के पास आकर कहने लगे।

2     तेरे चेले पुरनियों की रीतों को क्यों टालते हैं, कि बिना हाथ धोए रोटी खाते हैं?

3     उस ने उन को उत्तर दिया, कि तुम भी अपनी रीतों के कारण क्यों परमेश्वर की आज्ञा टालते हो?

7     हे कपटियों, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यद्वाणी ठीक की।

8     कि ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उन का मन मुझ से दूर रहता है।

9     और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं।

10     और उस ने लोगों को अपने पास बुलाकर उन से कहा, सुनो; और समझो।

11     जो मुंह में जाता है, वह मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता, पर जो मुंह से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।

15     यह सुनकर, पतरस ने उस से कहा, यह दृष्टान्त हमें समझा दे।

16     उस ने कहा, क्या तुम भी अब तक ना समझ हो?

17     क्या नहीं समझते, कि जो कुछ मुंह में जाता, वह पेट में पड़ता है, और सण्डास में निकल जाता है?

18     पर जो कुछ मुंह से निकलता है, वह मन से निकलता है, और वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।

19     क्योंकि कुचिन्ता, हत्या, पर स्त्रीगमन, व्यभिचार, चोरी, झूठी गवाही और निन्दा मन ही से निकलतीं है।

20     यही हैं जो मनुष्य को अशुद्ध करती हैं॥

7. Matthew 15 : 1-3, 7-11, 15-20 (to :)

1     Then came to Jesus scribes and Pharisees, which were of Jerusalem, saying,

2     Why do thy disciples transgress the tradition of the elders? for they wash not their hands when they eat bread.

3     But he answered and said unto them, Why do ye also transgress the commandment of God by your tradition?

7     Ye hypocrites, well did Esaias prophesy of you, saying,

8     This people draweth nigh unto me with their mouth, and honoureth me with their lips; but their heart is far from me.

9     But in vain they do worship me, teaching for doctrines the commandments of men.

10     And he called the multitude, and said unto them, Hear, and understand:

11     Not that which goeth into the mouth defileth a man; but that which cometh out of the mouth, this defileth a man.

15     Then answered Peter and said unto him, Declare unto us this parable.

16     And Jesus said, Are ye also yet without understanding?

17     Do not ye yet understand, that whatsoever entereth in at the mouth goeth into the belly, and is cast out into the draught?

18     But those things which proceed out of the mouth come forth from the heart; and they defile the man.

19     For out of the heart proceed evil thoughts, murders, adulteries, fornications, thefts, false witness, blasphemies:

20     These are the things which defile a man:

8. फिलिप्पियों 2 : 5

5     जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।

8. Philippians 2 : 5

5     Let this mind be in you, which was also in Christ Jesus:

9. फिलिप्पियों 4 : 7, 8 (जो भी)

7     तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरिक्षत रखेगी॥

8     ... जो जो बातें सत्य हैं, और जो जो बातें आदरणीय हैं, और जो जो बातें उचित हैं, और जो जो बातें पवित्र हैं, और जो जो बातें सुहावनी हैं, और जो जो बातें मनभावनी हैं, निदान, जो जो सदगुण और प्रशंसा की बातें हैं, उन्हीं पर ध्यान लगाया करो।

9. Philippians 4 : 7, 8 (whatsoever)

7     And the peace of God, which passeth all understanding, shall keep your hearts and minds through Christ Jesus.

8     …whatsoever things are true, whatsoever things are honest, whatsoever things are just, whatsoever things are pure, whatsoever things are lovely, whatsoever things are of good report; if there be any virtue, and if there be any praise, think on these things.

10. फिलिप्पियों 3 : 3, 4, 7, 8 (से :), 10 (से 2nd ,), 15, 16, 20

3     क्योंकि खतना वाले तो हम ही हैं जो परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई से उपासना करते हैं, और मसीह यीशु पर घमण्ड करते हैं और शरीर पर भरोसा नहीं रखते।

4     पर मैं तो शरीर पर भी भरोसा रख सकता हूं यदि किसी और को शरीर पर भरोसा रखने का विचार हो, तो मैं उस से भी बढ़कर रख सकता हूं।

7     परन्तु जो जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है।

8     वरन मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं।

10     और मैं उस को और उसके मृत्युंजय की सामर्थ को प्राप्त करूं।

15     सो हम में से जितने सिद्ध हैं, यही विचार रखें, और यदि किसी बात में तुम्हारा और ही विचार हो तो परमेश्वर उसे भी तुम पर प्रगट कर देगा।

16     सो जहां तक हम पहुंचे हैं, उसी के अनुसार चलें॥

20     पर हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहां से आने ही बाट जोह रहे हैं।

10. Philippians 3 : 3, 4, 7, 8 (to :), 10 (to 2nd ,), 15, 16, 20

3     For we are the circumcision, which worship God in the spirit, and rejoice in Christ Jesus, and have no confidence in the flesh.

4     Though I might also have confidence in the flesh. If any other man thinketh that he hath whereof he might trust in the flesh, I more:

7     But what things were gain to me, those I counted loss for Christ.

8     Yea doubtless, and I count all things but loss for the excellency of the knowledge of Christ Jesus my Lord:

10     That I may know him, and the power of his resurrection,

15     Let us therefore, as many as be perfect, be thus minded: and if in any thing ye be otherwise minded, God shall reveal even this unto you.

16     Nevertheless, whereto we have already attained, let us walk by the same rule, let us mind the same thing.

20     For our conversation is in heaven; from whence also we look for the Saviour, the Lord Jesus Christ:



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 307 : 25 (यह)-30

दिव्य मन मनुष्य की आत्मा है, और यह मनुष्य को सभी चीजों पर प्रभुत्व प्रदान करता है। मनुष्य को भौतिक आधार से नहीं बनाया गया था, न ही उन भौतिक कानूनों का पालन करने पर प्रतिबंध लगाया गया है जो आत्मा ने कभी नहीं बनाए; उनका प्रांत मन की उच्च विधि में आध्यात्मिक विधियों में है।

1. 307 : 25 (The)-30

The divine Mind is the Soul of man, and gives man dominion over all things. Man was not created from a material basis, nor bidden to obey material laws which Spirit never made; his province is in spiritual statutes, in the higher law of Mind.

2. 496 : 3 (वहाँ)-8

… लेकिन एक मन है, और यह कभी-कभी मौजूद सर्वव्यापी मन मनुष्य द्वारा परिलक्षित होता है और पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है. आप सीखेंगे कि क्रिश्चियन साइंस में पहला कर्तव्य भगवान का पालन करना है, एक दिमाग रखना है, और दूसरे को खुद के रूप में प्यार करना है।

2. 496 : 3 (there)-8

…there is but one Mind, and this ever-present omnipotent Mind is reflected by man and governs the entire universe. You will learn that in Christian Science the first duty is to obey God, to have one Mind, and to love another as yourself.

3. 311: 3-6 (से 1st.)

जिसे हम नश्वर मन या कार्तिक मन कहते हैं, वह अभिव्यक्ति के लिए सामग्री पर निर्भर है, मन नहीं है। ईश्वर मन है: वह सब मन, ईश्वर, है, या बनाया गया है, अच्छा है, और उसने सब बनाया है।

3. 311 : 3-6 (to 1st .)

What we term mortal mind or carnal mind, dependent on matter for manifestation, is not Mind. God is Mind: all that Mind, God, is, or hath made, is good, and He made all.

4. 372 : 1-13

याद रखें, दिमाग दिमाग नहीं है। सामग्री बीमार नहीं हो सकती है, और मन अमर है। नश्वर शरीर केवल भौतिक में मन की एक गलत नश्वर धारणा है। जिसे आप सामग्री कहते हैं वह मूल रूप से समाधान में प्राथमिक त्रुटि थी, प्रारंभिक नश्वर मन, - मिल्टन द्वारा "अराजकता और पुरानी रात।" इस नश्वर मन के बारे में एक सिद्धांत यह है कि इसकी संवेदनाएं मनुष्य को पुन: उत्पन्न कर सकती हैं, रक्त, मांस और हड्डियों का निर्माण कर सकती हैं। होने का विज्ञान, जिसमें सभी दिव्य मन, या भगवान और उसका विचार है, इस युग में स्पष्ट होगा, लेकिन इस विश्वास के लिए कि सामग्री मनुष्य का माध्यम है, या वह आदमी अपने स्वयं के सन्निहित विचार में प्रवेश कर सकता है, खुद को बांधता है उनकी अपनी मान्यताएं, और उनकी संबंधों की सामग्री का नाम और उन्हें दिव्य कानून का नाम देते हैं।

4. 372 : 1-13

Remember, brain is not mind. Matter cannot be sick, and Mind is immortal. The mortal body is only an erroneous mortal belief of mind in matter. What you call matter was originally error in solution, elementary mortal mind, — likened by Milton to "chaos and old night." One theory about this mortal mind is, that its sensations can reproduce man, can form blood, flesh, and bones. The Science of being, in which all is divine Mind, or God and His idea, would be clearer in this age, but for the belief that matter is the medium of man, or that man can enter his own embodied thought, bind himself with his own beliefs, and then call his bonds material and name them divine law.

5. 166 : 3-7

जैसा आदमी सोचता है, वैसा ही वह है। मन वह सब है जो महसूस करता है, कार्य करता है, या कार्रवाई को बाधित करता है। इससे अनभिज्ञ या अपनी निहित जिम्मेदारी से हटने के लिए, उपचार का प्रयास गलत पक्ष पर किया जाता है, और इस प्रकार शरीर पर सचेत नियंत्रण खो जाता है।

5. 166 : 3-7

As a man thinketh, so is he. Mind is all that feels, acts, or impedes action. Ignorant of this, or shrinking from its implied responsibility, the healing effort is made on the wrong side, and thus the conscious control over the body is lost.

6. 423 : 18-26

तत्वमीमांसा, चाहे वह काम के आधार को अपना मामला क्यों न बनाता हो और त्रुटि और कलह से श्रेष्ठ होने के सत्य और सद्भाव के संबंध में, बीमारी से निपटने के लिए खुद को कमजोर के बजाय मजबूत बना लेता है; और वह आनुपातिक रूप से अपने रोगी को साहस और जागरूक शक्ति की उत्तेजना के साथ मजबूत करता है। विज्ञान और चेतना दोनों अब मन के कानून के अनुसार होने की अर्थव्यवस्था में काम कर रहे हैं, जो अंततः अपने पूर्ण वर्चस्व का दावा करता है।

6. 423 : 18-26

The metaphysician, making Mind his basis of operation irrespective of matter and regarding the truth and harmony of being as superior to error and discord, has rendered himself strong, instead of weak, to cope with the case; and he proportionately strengthens his patient with the stimulus of courage and conscious power. Both Science and consciousness are now at work in the economy of being according to the law of Mind, which ultimately asserts its absolute supremacy.

7. 392 : 11-12, 24 (खड़ा)-30

रोग की शारीरिक पुष्टि हमेशा मानसिक उपेक्षा के साथ होनी चाहिए।

विचार के द्वार पर एक कुली को खड़ा करो। केवल ऐसे निष्कर्षों को स्वीकार करते हुए, जैसा कि आप शारीरिक परिणामों में महसूस करते हैं, आप अपने आप को सामंजस्यपूर्ण रूप से नियंत्रित करेंगे। जब स्थिति मौजूद होती है, जिसे आप कहते हैं कि बीमारी को प्रेरित करता है, चाहे वह हवा, व्यायाम, आनुवंशिकता, छूत या दुर्घटना हो, तो अपने कार्यालय को कुली के रूप में प्रदर्शन करें और इन अस्वास्थ्यकर विचारों और भय को बंद करें।

7. 392 : 11-12, 24 (Stand)-30

The physical affirmation of disease should always be met with the mental negation.

Stand porter at the door of thought. Admitting only such conclusions as you wish realized in bodily results, you will control yourself harmoniously. When the condition is present which you say induces disease, whether it be air, exercise, heredity, contagion, or accident, then perform your office as porter and shut out these unhealthy thoughts and fears.

8. 234 : 9-12, 17-21, 25-30

हमें बुराई के साथ अच्छे से अधिक परिचित होना चाहिए, और झूठे विश्वासों के खिलाफ चौकस रहना चाहिए क्योंकि हम चोरों और हत्यारों के दृष्टिकोण के खिलाफ अपने दरवाजे बंद करते हैं।

यदि नश्वर नश्वर मन पर उचित वार्ड रखेंगे, तो बुराइयों का भण्डार होगा जो इसे नष्ट कर देगा। हमें इस तथाकथित दिमाग से शुरू करना चाहिए और इसे पाप और बीमारी से खाली करना चाहिए, या पाप और बीमारी कभी भी खत्म नहीं होगी।

प्रकट होने से पहले पाप और बीमारी के बारे में सोचा जाना चाहिए। आपको पहले उदाहरण में बुरे विचारों को नियंत्रित करना होगा, या वे दूसरे में आपको नियंत्रित करेंगे। यीशु ने घोषित किया कि निषिद्ध वस्तुओं पर इच्छा के साथ देखना एक नैतिक अवधारणा को तोड़ना था। उन्होंने मानव मन की क्रिया पर बहुत जोर दिया, इंद्रियों को अनदेखा किया।

8. 234 : 9-12, 17-21, 25-30

We should become more familiar with good than with evil, and guard against false beliefs as watchfully as we bar our doors against the approach of thieves and murderers.

If mortals would keep proper ward over mortal mind, the brood of evils which infest it would be cleared out. We must begin with this so-called mind and empty it of sin and sickness, or sin and sickness will never cease.

Sin and disease must be thought before they can be manifested. You must control evil thoughts in the first instance, or they will control you in the second. Jesus declared that to look with desire on forbidden objects was to break a moral precept. He laid great stress on the action of the human mind, unseen to the senses.

9. 7:1-2

गलती के लिए उसे जो एकमात्र सजा थी, वह थी, "हे शैतान, मेरे साम्हने से दूर हो।"

9. 7 : 1-2

The only civil sentence which he had for error was, "Get thee behind me, Satan."

10. 234 : 31-3

बुराई के विचार और उद्देश्य किसी भी हद तक नहीं पहुंचते हैं और किसी के विश्वास परमिट से अधिक नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। बुराई के विचार, वासना और दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य आगे नहीं बढ़ सकते हैं, जैसे पराग को भटकाना, एक मानव मन से दूसरे में, असुरक्षित पोजिशन ढूंढना, अगर सद्गुण और सत्य एक मजबूत रक्षा का निर्माण करते हैं।

10. 234 : 31-3

Evil thoughts and aims reach no farther and do no more harm than one's belief permits. Evil thoughts, lusts, and malicious purposes cannot go forth, like wandering pollen, from one human mind to another, finding unsuspected lodgment, if virtue and truth build a strong defence.

11. 445 : 1 (यह)-8

… वैज्ञानिक को भगवान की आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। इसके अलावा, शिक्षक को अपने छात्रों को पाप के खिलाफ खुद का बचाव करने के लिए, और मानसिक रूप से हत्यारे होने वाले मानसिक हत्यारे के हमलों से बचाने के लिए पूरी तरह से फिट होना चाहिए। किसी अन्य शक्ति के अस्तित्व के रूप में कोई परिकल्पना को क्राइस्टियन साइंस के प्रदर्शन में बाधा डालने के लिए संदेह या भय का सामना नहीं करना चाहिए।

11. 445 : 1 (the)-8

…the Scientist must conform to God's requirements. Also the teacher must thoroughly fit his students to defend themselves against sin, and to guard against the attacks of the would-be mental assassin, who attempts to kill morally and physically. No hypothesis as to the existence of another power should interpose a doubt or fear to hinder the demonstration of Christian Science.

12. 469 : 13 (यह)-17, 23 (बुराई)-24

त्रुटि का नाश करने वाला महान सत्य है कि भगवान, अच्छा, एकमात्र दिमाग है, और यह कि अनंत मन के विपरीत - जिसे शैतान या बुराई कहा जाता है - मन नहीं है, सत्य नहीं है, बल्कि त्रुटि, बुद्धि या वास्तविकता के बिना है। ... बुराई का कोई स्थान नहीं हो सकता है, जहाँ सारा स्थान भगवान से भरा हो।

12. 469 : 13 (The)-17, 23 (evil)-24

The exterminator of error is the great truth that God, good, is the only Mind, and that the supposititious opposite of infinite Mind — called devil or evil — is not Mind, is not Truth, but error, without intelligence or reality. … evil can have no place, where all space is filled with God.

13. 406: 19-20 (से 1st.)

हर प्रकार की दुष्ट त्रुटि का विरोध करें, और वह आपसे भाग जाएगी।

13. 406 : 19-20 (to 1st .)

Resist evil — error of every sort — and it will flee from you.

14. 272 : 19-27

यह भौतिक जीवन के भयावह रूप से परिणाम के विपरीत, दैनिक जीवन के विचार और ईसाईकरण का आध्यात्मिकीकरण है; यह शुद्धता और पवित्रता, कामुकता और अशुद्धता के नीचे की ओर झुकाव और सांसारिक गुरुत्वाकर्षण के विपरीत है, जो वास्तव में क्राइस्टियन साइंस के दिव्य उत्पत्ति और संचालन को प्रमाणित करता है। क्राइस्टियन साइंस की जीत त्रुटि और बुराई के विनाश में दर्ज की जाती है, जिसमें से पाप, बीमारी और मृत्यु की निराशाजनक मान्यताओं का प्रचार किया जाता है।

14. 272 : 19-27

It is the spiritualization of thought and Christianization of daily life, in contrast with the results of the ghastly farce of material existence; it is chastity and purity, in contrast with the downward tendencies and earthward gravitation of sensualism and impurity, which really attest the divine origin and operation of Christian Science. The triumphs of Christian Science are recorded in the destruction of error and evil, from which are propagated the dismal beliefs of sin, sickness, and death.

15. 276 : 4-11

जब दिव्य उपदेशों को समझा जाता है, तो वे फेलोशिप की नींव को उजागर करते हैं, जिसमें एक मन दूसरे के साथ युद्ध में नहीं है, लेकिन सभी के पास एक आत्मा, भगवान, एक बुद्धिमान स्रोत है, जो कि इंजील कमांड के अनुसार है: "जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।" मनुष्य और उसके निर्माता का संबंध ईश्वरीय विज्ञान में है, और वास्तविक चेतना केवल ईश्वर की बातों के प्रति ही संज्ञान है।

15. 276 : 4-11

When the divine precepts are understood, they unfold the foundation of fellowship, in which one mind is not at war with another, but all have one Spirit, God, one intelligent source, in accordance with the Scriptural command: "Let this Mind be in you, which was also in Christ Jesus." Man and his Maker are correlated in divine Science, and real consciousness is cognizant only of the things of God.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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