रविवार 23 अक्टूबर, 2022



विषयमृत्यु के बाद की प्रक्रिया

SubjectProbation After Death

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: प्रकाशित वाक्य 2: 7

"मैं उसे उस जीवन के पेड़ में से जो परमेश्वर के स्वर्गलोक में है, फल खाने को दूंगा॥"



Golden Text: Revelation 2 : 7

To him that overcometh will I give to eat of the tree of life, which is in the midst of the paradise of God.




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उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 33: 8, 9, 18-21 • रोमियो 5: 14, 20, 21


8     सारी पृथ्वी के लोग यहोवा से डरें, जगत के सब निवासी उसका भय मानें!

9     क्योंकि जब उसने कहा, तब हो गया; जब उसने आज्ञा दी, तब वास्तव में वैसा ही हो गया॥

18     देखो, यहोवा की दृष्टि उसके डरवैयों पर और उन पर जो उसकी करूणा की आशा रखते हैं बनी रहती है,

19     कि वह उनके प्राण को मृत्यु से बचाए, और अकाल के समय उन को जीवित रखे॥

20     हम यहोवा का आसरा देखते आए हैं; वह हमारा सहायक और हमारी ढाल ठहरा है।

21     हमारा हृदय उसके कारण आनन्दित होगा, क्योंकि हम ने उसके पवित्र नाम का भरोसा रखा है।

14     तौभी आदम से लेकर मूसा तक मृत्यु ने उन लोगों पर भी राज्य किया, जिन्हों ने उस आदम के अपराध की नाईं जो उस आने वाले का चिन्ह है, पाप न किया।

20     परन्तु जहां पाप बहुत हुआ, वहां अनुग्रह उस से भी कहीं अधिक हुआ।

21     कि जैसा पाप ने मृत्यु फैलाते हुए राज्य किया, वैसा ही हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह भी अनन्त जीवन के लिये धर्मी ठहराते हुए राज्य करे॥

Responsive Reading: Psalm 33 : 8, 9, 18-21Romans 5 : 14, 20, 21

8.     Let all the earth fear the Lord: let all the inhabitants of the world stand in awe of him.

9.     For he spake, and it was done; he commanded, and it stood fast.

18.     Behold, the eye of the Lord is upon them that fear him, upon them that hope in his mercy;

19.     To deliver their soul from death, and to keep them alive in famine.

20.     Our soul waiteth for the Lord: he is our help and our shield.

21.     For our heart shall rejoice in him, because we have trusted in his holy name.

14.     Nevertheless death reigned from Adam to Moses, even over them that had not sinned after the similitude of Adam’s transgression, who is the figure of him that was to come.

20.     But where sin abounded, grace did much more abound:

21.     That as sin hath reigned unto death, even so might grace reign through righteousness unto eternal life by Jesus Christ our Lord.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 56: 11-13

11     मैं ने परमेश्वर पर भरोसा रखा है, मैं न डरूंगा। मनुष्य मेरा क्या कर सकता है?

12     हे परमेश्वर, तेरी मन्नतों का भार मुझ पर बना है; मैं तुझ को धन्यवाद बलि चढ़ाऊंगा।

13     क्योंकि तू ने मुझ को मृत्यु से बचाया है; तू ने मेरे पैरों को भी फिसलने से बचाया है, ताकि मैं ईश्वर के साम्हने जीवतों के उजियाले में चलूं फिरूं?

1. Psalm 56 : 11-13

11     In God have I put my trust: I will not be afraid what man can do unto me.

12     Thy vows are upon me, O God: I will render praises unto thee.

13     For thou hast delivered my soul from death: wilt not thou deliver my feet from falling, that I may walk before God in the light of the living?

2. भजन संहिता 68: 19 (से 2nd ,), 20

19     धन्य है प्रभु, जो प्रति दिन हमारा बोझ उठाता है।

20     वही हमारे लिये बचाने वाला ईश्वर ठहरा; यहोवा प्रभु मृत्यु से भी बचाता है॥

2. Psalm 68 : 19 (to 2nd ,), 20

19     Blessed be the Lord, who daily loadeth us with benefits,

20     He that is our God is the God of salvation; and unto God the Lord belong the issues from death.

3. होशे 13: 14 (से 2nd :)

14     मैं उसको अधोलोक के वश से छुड़ा लूंगा और मृत्यु से उसको छुटकारा दूंगा। हे मृत्यु, तेरी मारने की शक्ति कहां रही? हे अधोलोक, तेरी नाश करने की शक्ति कहां रहीं? मैं फिर कभी नहीं पछताऊंगा॥

3. Hosea 13 : 14 (to 2nd :)

14     I will ransom them from the power of the grave; I will redeem them from death: O death, I will be thy plagues; O grave, I will be thy destruction:

4. यूहन्ना 11: 1, 4-7, 11 (हमारी), 17, 20-27, 32-36, 38-44

1     मरियम और उस की बहिन मारथा के गांव बैतनिय्याह का लाजर नाम एक मनुष्य बीमार था।

4     यह सुनकर यीशु ने कहा, यह बीमारी मृत्यु की नहीं, परन्तु परमेश्वर की महिमा के लिये है, कि उसके द्वारा परमेश्वर के पुत्र की महिमा हो।

5     और यीशु मारथा और उस की बहन और लाजर से प्रेम रखता था।

6     सो जब उस ने सुना, कि वह बीमार है, तो जिस स्थान पर वह था, वहां दो दिन और ठहर गया।

7     फिर इस के बाद उस ने चेलों से कहा, कि आओ, हम फिर यहूदिया को चलें।

11     कि हमारा मित्र लाजर सो गया है, परन्तु मैं उसे जगाने जाता हूं।

17     सो यीशु को आकर यह मालूम हुआ कि उसे कब्र में रखे चार दिन हो चुके हैं।

20     सो मारथा यीशु के आने का समचार सुनकर उस से भेंट करने को गई, परन्तु मरियम घर में बैठी रही।

21     मारथा ने यीशु से कहा, हे प्रभु, यदि तू यहां होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता।

22     और अब भी मैं जानती हूं, कि जो कुछ तू परमेश्वर से मांगेगा, परमेश्वर तुझे देगा।

23     यीशु ने उस से कहा, तेरा भाई जी उठेगा।

24     मारथा ने उस से कहा, मैं जानती हूं, कि अन्तिम दिन में पुनरुत्थान के समय वह जी उठेगा।

25     यीशु ने उस से कहा, पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूं, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा।

26     और जो कोई जीवता है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा, क्या तू इस बात पर विश्वास करती है?

27     उस ने उस से कहा, हां हे प्रभु, मैं विश्वास कर चुकी हूं, कि परमेश्वर का पुत्र मसीह जो जगत में आनेवाला था, वह तू ही है।

32     जब मरियम वहां पहुंची जहां यीशु था, तो उसे देखते ही उसके पांवों पर गिर के कहा, हे प्रभु, यदि तू यहां होता तो मेरा भाई न मरता।

33     जब यीशु न उस को और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास हुआ।

34     जब यीशु न उस को और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास हुआ, और घबरा कर कहा, तुम ने उसे कहां रखा है?

35     यीशु के आंसू बहने लगे।

36     तब यहूदी कहने लगे, देखो, वह उस से कैसी प्रीति रखता था।

38     यीशु मन में फिर बहुत ही उदास होकर कब्र पर आया, वह एक गुफा थी, और एक पत्थर उस पर धरा था।

39     यीशु ने कहा; पत्थर को उठाओ: उस मरे हुए की बहिन मारथा उस से कहने लगी, हे प्रभु, उस में से अब तो र्दुगंध आती है क्योंकि उसे मरे चार दिन हो गए।

40     यीशु ने उस से कहा, क्या मैं ने तुझ से न कहा था कि यदि तू विश्वास करेगी, तो परमेश्वर की महिमा को देखेगी।

41     तब उन्होंने उस पत्थर को हटाया, फिर यीशु ने आंखें उठाकर कहा, हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं कि तू ने मेरी सुन ली है।

42     और मै जानता था, कि तू सदा मेरी सुनता है, परन्तु जो भीड़ आस पास खड़ी है, उन के कारण मैं ने यह कहा, जिस से कि वे विश्वास करें, कि तू ने मुझे भेजा है।

43     यह कहकर उस ने बड़े शब्द से पुकारा, कि हे लाजर, निकल आ।

44     जो मर गया था, वह कफन से हाथ पांव बन्धे हुए निकल आया और उसका मुंह अंगोछे से लिपटा हुआ तें यीशु ने उन से कहा, उसे खोलकर जाने दो॥

4. John 11 : 1, 4-7, 11 (Our), 17, 20-27, 32-36, 38-44

1     Now a certain man was sick, named Lazarus, of Bethany, the town of Mary and her sister Martha.

4     When Jesus heard that, he said, This sickness is not unto death, but for the glory of God, that the Son of God might be glorified thereby.

5     Now Jesus loved Martha, and her sister, and Lazarus.

6     When he had heard therefore that he was sick, he abode two days still in the same place where he was.

7     Then after that saith he to his disciples, Let us go into Judæa again.

11     Our friend Lazarus sleepeth; but I go, that I may awake him out of sleep.

17     Then when Jesus came, he found that he had lain in the grave four days already.

20     Then Martha, as soon as she heard that Jesus was coming, went and met him: but Mary sat still in the house.

21     Then said Martha unto Jesus, Lord, if thou hadst been here, my brother had not died.

22     But I know, that even now, whatsoever thou wilt ask of God, God will give it thee.

23     Jesus saith unto her, Thy brother shall rise again.

24     Martha saith unto him, I know that he shall rise again in the resurrection at the last day.

25     Jesus said unto her, I am the resurrection, and the life: he that believeth in me, though he were dead, yet shall he live:

26     And whosoever liveth and believeth in me shall never die. Believest thou this?

27     She saith unto him, Yea, Lord: I believe that thou art the Christ, the Son of God, which should come into the world.

32     Then when Mary was come where Jesus was, and saw him, she fell down at his feet, saying unto him, Lord, if thou hadst been here, my brother had not died.

33     When Jesus therefore saw her weeping, and the Jews also weeping which came with her, he groaned in the spirit, and was troubled,

34     And said, Where have ye laid him? They said unto him, Lord, come and see.

35     Jesus wept.

36     Then said the Jews, Behold how he loved him!

38     Jesus therefore again groaning in himself cometh to the grave. It was a cave, and a stone lay upon it.

39     Jesus said, Take ye away the stone. Martha, the sister of him that was dead, saith unto him, Lord, by this time he stinketh: for he hath been dead four days.

40     Jesus saith unto her, Said I not unto thee, that, if thou wouldest believe, thou shouldest see the glory of God?

41     Then they took away the stone from the place where the dead was laid. And Jesus lifted up his eyes, and said, Father, I thank thee that thou hast heard me.

42     And I knew that thou hearest me always: but because of the people which stand by I said it, that they may believe that thou hast sent me.

43     And when he thus had spoken, he cried with a loud voice, Lazarus, come forth.

44     And he that was dead came forth, bound hand and foot with graveclothes: and his face was bound about with a napkin. Jesus saith unto them, Loose him, and let him go.

5. यूहन्ना 5: 24-26

24     मैं तुम से सच सच कहता हूं, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले की प्रतीति करता है, अनन्त जीवन उसका है, और उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।

25     मैं तुम से सच सच कहता हूं, वह समय आता है, और अब है, जिस में मृतक परमेश्वर के पुत्र का शब्द सुनेंगे, और जो सुनेंगे वे जीएंगे।

26     क्योंकि जिस रीति से पिता अपने आप में जीवन रखता है, उसी रीति से उस ने पुत्र को भी यह अधिकार दिया है कि अपने आप में जीवन रखे।

5. John 5 : 24-26

24     Verily, verily, I say unto you, He that heareth my word, and believeth on him that sent me, hath everlasting life, and shall not come into condemnation; but is passed from death unto life.

25     Verily, verily, I say unto you, The hour is coming, and now is, when the dead shall hear the voice of the Son of God: and they that hear shall live.

26     For as the Father hath life in himself; so hath he given to the Son to have life in himself;

6. इब्रानियों 1: 1, 2 (से 2nd ,)

1     पूर्व युग में परमेश्वर ने बाप दादों से थोड़ा थोड़ा करके और भांति भांति से भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें कर के।

2     इन दिनों के अन्त में हम से पुत्र के द्वारा बातें की, जिसे उस ने सारी वस्तुओं का वारिस ठहराया।

6. Hebrews 1 : 1, 2 (to 2nd ,)

1     God, who at sundry times and in divers manners spake in time past unto the fathers by the prophets,

2     Hath in these last days spoken unto us by his Son, whom he hath appointed heir of all things,

7. इब्रानियों 2: 14, 15

14     इसलिये जब कि लड़के मांस और लोहू के भागी हैं, तो वह आप भी उन के समान उन का सहभागी हो गया; ताकि मृत्यु के द्वारा उसे जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात शैतान को निकम्मा कर दे।

15     और जितने मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फंसे थे, उन्हें छुड़ा ले।

7. Hebrews 2 : 14, 15

14     Forasmuch then as the children are partakers of flesh and blood, he also himself likewise took part of the same; that through death he might destroy him that had the power of death, that is, the devil;

15     And deliver them who through fear of death were all their lifetime subject to bondage.

8. 1 यूहन्ना 5: 20

20     और यह भी जानते हैं, कि परमेश्वर का पुत्र आ गया है और उस ने हमें समझ दी है, कि हम उस सच्चे को पहचानें, और हम उस में जो सत्य है, अर्थात उसके पुत्र यीशु मसीह में रहते हैं: सच्चा परमेश्वर और अनन्त जीवन यही है।

8. I John 5 : 20

20     And we know that the Son of God is come, and hath given us an understanding, that we may know him that is true, and we are in him that is true, even in his Son Jesus Christ. This is the true God, and eternal life.

9. प्रकाशित वाक्य 2: 10 (तुम हो)

10     ... प्राण देने तक विश्वासी रह; तो मैं तुझे जीवन का मुकुट दूंगा।

9. Revelation 2 : 10 (be thou)

10     …be thou faithful unto death, and I will give thee a crown of life.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 288 : 20-7

क्रिश्चियन साइंस के मंदिर में मुख्य पत्थर निम्नलिखित अभिधारणाओं में पाए जाते हैं: कि जीवन ईश्वर है, अच्छा है, बुरा नहीं; कि आत्मा निष्पाप है, जो शरीर में नहीं मिलती; कि आत्मा भौतिक नहीं है, और न ही हो सकती है; कि जीवन मृत्यु के अधीन नहीं है; कि आध्यात्मिक वास्तविक मनुष्य का कोई जन्म नहीं है, कोई भौतिक जीवन नहीं है, और कोई मृत्यु नहीं है।

विज्ञान अमर मानव की गौरवशाली संभावनाओं को प्रकट करता है, नश्वर इंद्रियों द्वारा हमेशा के लिए असीमित।मसीहा में मसीह-तत्व ने उन्हें मार्ग-दर्शन, सत्य और जीवन का मार्ग दिखाया।

शाश्वत सत्य को नष्ट कर देता है जो लगता है कि मनुष्यों ने त्रुटि से सीखा है, और भगवान के बच्चे के रूप में मनुष्य का वास्तविक अस्तित्व प्रकाश में आता है। सत्य का प्रदर्शन शाश्वत जीवन है। नश्वर मनुष्य कभी भी त्रुटि, पाप, बीमारी, और मृत्यु में विश्वास की लौकिक दुर्बलता से नहीं उठ सकता, जब तक कि वह यह न जान ले कि ईश्वर ही एकमात्र जीवन है। यह विश्वास कि जीवन और संवेदना शरीर में हैं, मनुष्य को ईश्वर की छवि के रूप में समझने की समझ से दूर होना चाहिए। तब आत्मा ने देह पर काबू पा लिया होगा।

1. 288 : 20-7

The chief stones in the temple of Christian Science are to be found in the following postulates: that Life is God, good, and not evil; that Soul is sinless, not to be found in the body; that Spirit is not, and cannot be, materialized; that Life is not subject to death; that the spiritual real man has no birth, no material life, and no death.

Science reveals the glorious possibilities of immortal man, forever unlimited by the mortal senses. The Christ-element in the Messiah made him the Way-shower, Truth and Life.

The eternal Truth destroys what mortals seem to have learned from error, and man's real existence as a child of God comes to light. Truth demonstrated is eternal life. Mortal man can never rise from the temporal débris of error, belief in sin, sickness, and death, until he learns that God is the only Life. The belief that life and sensation are in the body should be overcome by the understanding of what constitutes man as the image of God. Then Spirit will have overcome the flesh.

2. 289 : 14-20

यह तथ्य कि क्राइस्ट या सत्य, मृत्यु पर काबू पा लेता है और "आतंकियों का राजा" साबित हो जाता है, लेकिन एक नश्वर विश्वास, या त्रुटि, जिसे सत्य जीवन के आध्यात्मिक प्रमाणों से नष्ट कर देता है; और इससे पता चलता है कि मृत्यु के प्रति इंद्रियों को जो दिखाई देता है वह वास्तविक मनुष्य और वास्तविक ब्रह्मांड के लिए एक नश्वर भ्रम है, लेकिन मृत्यु-प्रक्रिया नहीं है।

2. 289 : 14-20

The fact that the Christ, or Truth, overcame and still overcomes death proves the "king of terrors" to be but a mortal belief, or error, which Truth destroys with the spiritual evidences of Life; and this shows that what appears to the senses to be death is but a mortal illusion, for to the real man and the real universe there is no death-process.

3. 253 : 25-31

पाप, बीमारी, या मृत्यु के लिए किसी भी आवश्यक आवश्यकता पर विश्वास नहीं करना, जानना (जैसा कि आप जानना चाहते हैं) कि भगवान को कभी भी एक तथाकथित भौतिक कानून के लिए आज्ञाकारिता की आवश्यकता नहीं होती है, ऐसा कोई कानून मौजूद नहीं है। पाप और मृत्यु में विश्वास ईश्वर के कानून द्वारा नष्ट हो जाता है, जो मृत्यु के बजाय जीवन का नियम है, कलह के बजाय सद्भाव का, मांस के बजाय आत्मा का।

3. 253 : 25-31

Do not believe in any supposed necessity for sin, disease, or death, knowing (as you ought to know) that God never requires obedience to a so-called material law, for no such law exists. The belief in sin and death is destroyed by the law of God, which is the law of Life instead of death, of harmony instead of discord, of Spirit instead of the flesh.

4. 254 : 16-23

कामुक युगों के दौरान, पूर्ण क्रिश्चियन साइंस को मृत्यु नामक परिवर्तन से पहले प्राप्त नहीं किया जा सकता है, क्योंकि हमारे पास वह शक्ति नहीं है जो हम नहीं समझते हैं। लेकिन मानव स्वयं को प्रचारित करना चाहिए। यह कार्य ईश्वर हमें आज प्रेमपूर्वक स्वीकार करने के लिए, और इतनी तेजी से व्यावहारिक सामग्री को छोड़ने के लिए, और आध्यात्मिक कार्य करने के लिए कहता है जो बाहरी और वास्तविक को निर्धारित करता है।

4. 254 : 16-23

During the sensual ages, absolute Christian Science may not be achieved prior to the change called death, for we have not the power to demonstrate what we do not understand. But the human self must be evangelized. This task God demands us to accept lovingly to-day, and to abandon so fast as practical the material, and to work out the spiritual which determines the outward and actual.

5. 43 : 27-4

परमात्मा को हर बिंदु पर मानव को दूर करना होगा। विज्ञान यीशु ने सिखाया और जीना चाहिए, जीवन, पदार्थ और बुद्धि के बारे में सभी भौतिक विश्वासों पर विजय प्राप्त करना चाहिए, और इस तरह की मान्यताओं से बढ़ती हुई बहुपक्षीय त्रुटियां।

प्यार नफरत पर विजय चाहिए। सत्य और जीवन को जीत और त्रुटि और मृत्यु पर रोकना होगा, इससे पहले कि काँटे को एक मुकुट के लिए अलग रखा जा सके, बीडक्शन कहता है, "अच्छा काम अच्छा एवं विश्वसनीय सेवक," और आत्मा की सर्वोच्चता का प्रदर्शन किया जाए।

5. 43 : 27-4

The divine must overcome the human at every point. The Science Jesus taught and lived must triumph over all material beliefs about life, substance, and intelligence, and the multitudinous errors growing from such beliefs.

Love must triumph over hate. Truth and Life must seal the victory over error and death, before the thorns can be laid aside for a crown, the benediction follow, "Well done, good and faithful servant," and the supremacy of Spirit be demonstrated.

6. 76 : 6-17, 22-31

जब अस्तित्व को समझा जाता है, तो जीवन को न तो भौतिक और न ही सीमित, बल्कि अनंत के रूप में पहचाना जाएगा, - भगवान के रूप में, सार्वभौमिक अच्छा; और यह विश्वास कि जीवन, या मन, कभी एक सीमित रूप में था या बुराई में अच्छा था, नष्ट हो जाएगा। तब यह समझा जाएगा कि आत्मा ने कभी पदार्थ में प्रवेश नहीं किया और इसलिए वह कभी भी पदार्थ से नहीं उठा। जब आध्यात्मिक अस्तित्व और परमेश्वर की समझ के लिए उन्नत किया जाता है, तो मनुष्य अब पदार्थ के साथ संवाद नहीं कर सकता है; और न ही वह उसके पास लौट सकता है, जैसे वृक्ष अपने बीज में कभी नहीं लौट सकता। न तो मनुष्य भौतिक प्रतीत होगा, लेकिन वह एक व्यक्तिगत चेतना होगी, जिसे दिव्य आत्मा द्वारा विचार के रूप में चित्रित किया जाएगा, न कि पदार्थ के रूप में।

पाप रहित आनन्द, - जीवन की पूर्ण सद्भाव और अमरता, एक दिव्य सुख या पीड़ा के बिना असीमित दिव्य सौंदर्य और अच्छाई का होना, - एकमात्र सत्य, अविनाशी पुरुष का निर्माण करता है, जिसका अस्तित्व आध्यात्मिक है। अस्तित्व की यह स्थिति वैज्ञानिक और अक्षुण्ण है, - एक पूर्णता केवल उन लोगों द्वारा समझ में आती है जिनके पास दिव्य विज्ञान में मसीह की अंतिम समझ है। मृत्यु कभी अस्तित्व की इस स्थिति को जल्दबाजी नहीं कर सकती, क्योंकि अमरता प्रकट होने से पहले मृत्यु को दूर करना होगा, प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।

6. 76 : 6-17, 22-31

When being is understood, Life will be recognized as neither material nor finite, but as infinite, — as God, universal good; and the belief that life, or mind, was ever in a finite form, or good in evil, will be destroyed. Then it will be understood that Spirit never entered matter and was therefore never raised from matter. When advanced to spiritual being and the understanding of God, man can no longer commune with matter; neither can he return to it, any more than a tree can return to its seed. Neither will man seem to be corporeal, but he will be an individual consciousness, characterized by the divine Spirit as idea, not matter.

The sinless joy, — the perfect harmony and immortality of Life, possessing unlimited divine beauty and goodness without a single bodily pleasure or pain, — constitutes the only veritable, indestructible man, whose being is spiritual. This state of existence is scientific and intact, — a perfection discernible only by those who have the final understanding of Christ in divine Science. Death can never hasten this state of existence, for death must be overcome, not submitted to, before immortality appears.

7. 427 : 17-25

यदि मनुष्य को कभी भी मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं करनी है, तो शास्त्र क्यों कहते हैं, "सब से अन्तिम बैरी जो नाश किया जाएगा वह मृत्यु है"? वचन की अवधि दर्शाती है कि हम पाप पर विजय पाने के अनुपात में मृत्यु पर विजय प्राप्त करेंगे। सबसे बड़ी कठिनाई इस अज्ञान में है कि ईश्वर क्या है। ईश्वर, जीवन, सत्य और प्रेम मनुष्य को अमर बनाते हैं। सभी को नियंत्रित करने वाले अमर मन को भौतिक क्षेत्र, तथाकथित, साथ ही आध्यात्मिक में सर्वोच्च के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।

7. 427 : 17-25

If man is never to overcome death, why do the Scriptures say, "The last enemy that shall be destroyed is death"? The tenor of the Word shows that we shall obtain the victory over death in proportion as we overcome sin. The great difficulty lies in ignorance of what God is. God, Life, Truth, and Love make man undying. Immortal Mind, governing all, must be acknowledged as supreme in the physical realm, so-called, as well as in the spiritual.

8. 77 : 13-18

भौतिक जीवन के इस सपने के लिए आवश्यक अवधि, अपने तथाकथित सुख और पीड़ा को गले लगाते हुए, चेतना से गायब होने के लिए, "कोई आदमी नहीं जानता ... न ही पुत्र, लेकिन पिता।" त्रुटि की दृढ़ता के अनुसार यह अवधि लंबी या छोटी अवधि की होगी।

8. 77 : 13-18

The period required for this dream of material life, embracing its so-called pleasures and pains, to vanish from consciousness, "knoweth no man ... neither the Son, but the Father." This period will be of longer or shorter duration according to the tenacity of error.

9. 493 : 28-30

यदि यीशु ने लाजर को स्वप्न, भ्रम, मृत्यु से जगाया, तो यह साबित हुआ कि मसीह झूठे अर्थों में सुधार कर सकता है।

9. 493 : 28-30

If Jesus awakened Lazarus from the dream, illusion, of death, this proved that the Christ could improve on a false sense.

10. 290 : 3-10

यदि मनुष्य के अस्तित्व के सिद्धांत, नियम और प्रदर्शन को कम से कम समझ में नहीं आता है, जिसे मृत्यु कहा जाता है, नश्वर से आगे निकल जाता है, तो वे उस एकल अनुभव के कारण आध्यात्मिक रूप से अस्तित्व के पैमाने में अधिक नहीं उठेंगे, लेकिन पहले की तरह भौतिक बने रहेंगे संक्रमण, अभी भी भौतिक के माध्यम से, जीवन की आध्यात्मिक भावना के माध्यम से, और स्वार्थी और निम्न उद्देश्यों से खुशी की तलाश में है।

10. 290 : 3-10

If the Principle, rule, and demonstration of man's being are not in the least understood before what is termed death overtakes mortals, they will rise no higher spiritually in the scale of existence on account of that single experience, but will remain as material as before the transition, still seeking happiness through a material, instead of through a spiritual sense of life, and from selfish and inferior motives.

11. 291 : 12-18

सार्वभौमिक मुक्ति प्रगति और परिवीक्षा पर टिकी हुई है, और उनके बिना अप्राप्य है। स्वर्ग एक स्थानीयता नहीं है, बल्कि मन की एक दिव्य स्थिति है जिसमें मन की सभी अभिव्यक्तियाँ सामंजस्यपूर्ण और अमर हैं, क्योंकि पाप नहीं है और मनुष्य अपने स्वयं के धार्मिकता नहीं पा रहा है, लेकिन "प्रभु के मन", जैसा कि शास्त्र कहता है।

11. 291 : 12-18

Universal salvation rests on progression and probation, and is unattainable without them. Heaven is not a locality, but a divine state of Mind in which all the manifestations of Mind are harmonious and immortal, because sin is not there and man is found having no righteousness of his own, but in possession of "the mind of the Lord," as the Scripture says.

12. 264 : 13-19, 28-31

जैसा कि नश्वर भगवान और मनुष्य के बारे में अधिक सही दृष्टिकोण प्राप्त करते हैं, सृष्टि की बहुपक्षीय वस्तुएं, जो पहले अदृश्य थीं, दृश्यमान हो जाएंगी। जब हम महसूस करते हैं कि जीवन आत्मा है, तो कभी भी नहीं, न ही इस मामले में, यह समझ आत्म-पूर्णता में विस्तारित होगी, सभी को ईश्वर में मिल जाएगी, अच्छा होगा, और किसी अन्य चेतना की आवश्यकता नहीं होगी।

जब हम क्रिश्चियन साइंस में रास्ता सीखते हैं और मनुष्य के आध्यात्मिक होने को पहचानते हैं, तो हम भगवान की रचना को समझेंगे और समझेंगे, - पृथ्वी और स्वर्ग और मनुष्य की सभी महिमा।

12. 264 : 13-19, 28-31

As mortals gain more correct views of God and man, multitudinous objects of creation, which before were invisible, will become visible. When we realize that Life is Spirit, never in nor of matter, this understanding will expand into self-completeness, finding all in God, good, and needing no other consciousness.

When we learn the way in Christian Science and recognize man's spiritual being, we shall behold and understand God's creation, — all the glories of earth and heaven and man.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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