रविवार 22 मार्च, 2020 |

रविवार 22 मार्च, 2020



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वर्ण पाठ: जकर्याह 2 : 13

हे सब प्राणियों! यहोवा के साम्हने चुपके रहो॥



Golden Text: Zechariah 2 : 13

Be silent, O all flesh, before the Lord.




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I कुरिन्थियों 2 : 9, 10, 12-14


9     परन्तु जैसा लिखा है, कि जो आंख ने नहीं देखी, और कान ने नहीं सुना, और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ीं वे ही हैं, जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखने वालों के लिये तैयार की हैं।

10     परन्तु परमेश्वर ने उन को अपने आत्मा के द्वारा हम पर प्रगट किया।

12     परन्तु हम ने संसार की आत्मा नहीं, परन्तु वह आत्मा पाया है, जो परमेश्वर की ओर से है, कि हम उन बातों को जानें, जो परमेश्वर ने हमें दी हैं।

13     जिन को हम मनुष्यों के ज्ञान की सिखाई हुई बातों में नहीं, परन्तु आत्मा की सिखाई हुई बातों में, आत्मिक बातें आत्मिक बातों से मिला मिला कर सुनाते हैं।

14     परन्तु शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उस की दृष्टि में मूर्खता की बातें हैं, और न वह उन्हें जान सकता है क्योंकि उन की जांच आत्मिक रीति से होती है।

Responsive Reading: I Corinthians 2 : 9, 10, 12-14

9.     As it is written, Eye hath not seen, nor ear heard, neither have entered into the heart of man, the things which God hath prepared for them that love him.

10.     But God hath revealed them unto us by his Spirit.

12.     Now we have received, not the spirit of the world, but the spirit which is of God; that we might know the things that are freely given to us of God.

13.     Which things also we speak, not in the words which man’s wisdom teacheth, but which the Holy Ghost teacheth; comparing spiritual things with spiritual.

14.     But the natural man receiveth not the things of the Spirit of God: for they are foolishness unto him: neither can he know them, because they are spiritually discerned.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यशायाह 60: 1-4 (से 1st :)

1     उठ, प्रकाशमान हो; क्योंकि तेरा प्रकाश आ गया है, और यहोवा का तेज तेरे ऊपर उदय हुआ है।

2     देख, पृथ्वी पर तो अन्धियारा और राज्य राज्य के लोगों पर घोर अन्धकार छाया हुआ है; परन्तु तेरे ऊपर यहोवा उदय होगा, और उसका तेज तुझ पर प्रगट होगा।

3     और अन्यजातियां तेरे पास प्रकाश के लिये और राजा तेरे आरोहण के प्रताप की ओर आएंगे॥

4     अपनी आंखें चारो ओर उठा कर देख।

1. Isaiah 60 : 1-4 (to 1st :)

1     Arise, shine; for thy light is come, and the glory of the Lord is risen upon thee.

2     For, behold, the darkness shall cover the earth, and gross darkness the people: but the Lord shall arise upon thee, and his glory shall be seen upon thee.

3     And the Gentiles shall come to thy light, and kings to the brightness of thy rising.

4     Lift up thine eyes round about, and see:

2. II राजा 6 : 8-17

8     ओैर अराम का जाजा इस्राएल से युद्ध कर रहा था, और सम्मति कर के अपने कर्मचारियों से कहा, कि अमुक स्थान पर मेरी छावनी होगी।

9     तब परमेश्वर के भक्त ने इस्राएल के राजा के पास कहला भेजा, कि चौकसी कर और अमुक स्थान से हो कर न जाना क्योंकि वहां अरामी चढ़ाई करने वाले हैं।

10     तब इस्राएल के राजा ने उस स्थान को, जिसकी चर्चा कर के परमेश्वर के भक्त ने उसे चिताया था, भेज कर, अपनी रक्षा की; और उस प्रकार एक दो बार नहीं वरन बहुत बार हुआ।

11     इस कारण अराम के राजा का मन बहुत घबरा गया; सो उसने अपने कर्मचारियों को बुला कर उन से पूछा, क्या तुम मुझे न बताओगे कि हम लोगों में से कौन इस्राएल के राजा की ओर का है? उसके एक कर्मचारी ने कहा, हे मेरे प्रभु! हे राजा! ऐसा नहीं,

12     एलीशा जो इस्राएल में भविष्यद्वक्ता है, वह इस्राएल के राजा को वे बातें भी बताया करता है, जो तू शयन की कोठरी में बोलता है।

13     राजा ने कहा, जा कर देखो कि वह कहां है, तब मैं भेज कर उसे पकड़वा मंगाऊंगा। और उसको यह समाचार मिला कि वह दोतान में है।

14     तब उसने वहां घोड़ों और रथों समेत एक भारी दल भेजा, और उन्होंने रात को आकर नगर को घेर लिया।

15     भोर को परमेश्वर के भक्त का टहलुआ उठा और निकल कर क्या देखता है कि घोड़ों और रथों समेत एक दल नगर को घेरे हुए पड़ा है। और उसके सेवक ने उस से कहा, हाय! मेरे स्वामी, हम क्या करें?

16     उसने कहा, मत डर; क्योंकि जो हमारी ओर हैं, वह उन से अधिक हैं, जो उनकी ओर हैं।

17     तब एलीशा ने यह प्रार्थना की, हे यहोवा, इसकी आंखें खोल दे कि यह देख सके। तब यहोवा ने सेवक की आंखें खोल दीं, और जब वह देख सका, तब क्या देखा, कि एलीशा के चारों ओर का पहाड़ अग्निमय घोड़ों और रथों से भरा हुआ है।

2. II Kings 6 : 8-17

8     Then the king of Syria warred against Israel, and took counsel with his servants, saying, In such and such a place shall be my camp.

9     And the man of God sent unto the king of Israel, saying, Beware that thou pass not such a place; for thither the Syrians are come down.

10     And the king of Israel sent to the place which the man of God told him and warned him of, and saved himself there, not once nor twice.

11     Therefore the heart of the king of Syria was sore troubled for this thing; and he called his servants, and said unto them, Will ye not shew me which of us is for the king of Israel?

12     And one of his servants said, None, my lord, O king: but Elisha, the prophet that is in Israel, telleth the king of Israel the words that thou speakest in thy bedchamber.

13     And he said, Go and spy where he is, that I may send and fetch him. And it was told him, saying, Behold, he is in Dothan.

14     Therefore sent he thither horses, and chariots, and a great host: and they came by night, and compassed the city about.

15     And when the servant of the man of God was risen early, and gone forth, behold, an host compassed the city both with horses and chariots. And his servant said unto him, Alas, my master! how shall we do?

16     And he answered, Fear not: for they that be with us are more than they that be with them.

17     And Elisha prayed, and said, Lord, I pray thee, open his eyes, that he may see. And the Lord opened the eyes of the young man; and he saw: and, behold, the mountain was full of horses and chariots of fire round about Elisha.

3. यशायाह 17 : 7, 8

7     उस समय मनुष्य अपने कर्ता की ओर दृष्टि करेगा, और उसकी आंखें इस्राएल के पवित्र की ओर लगी रहेंगी;

8     वह अपनी बनाई हुई वेदियों की ओर दृष्टि न करेगा, और न अपनी बनाई हुई अशेरा नाम मूरतों वा सूर्य की प्रतिमाओं की ओर देखेगा।

3. Isaiah 17 : 7, 8

7     At that day shall a man look to his Maker, and his eyes shall have respect to the Holy One of Israel.

8     And he shall not look to the altars, the work of his hands, neither shall respect that which his fingers have made, either the groves, or the images.

4. मत्ती 13 : 1-3 (से 1st ,), 10-17

1     उसी दिन यीशु घर से निकलकर झील के किनारे जा बैठा।

2     और उसके पास ऐसी बड़ी भीड़ इकट्ठी हुई कि वह नाव पर चढ़ गया, और सारी भीड़ किनारे पर खड़ी रही।

3     और उस ने उन से दृष्टान्तों में बहुत सी बातें।

10     और चेलों ने पास आकर उस से कहा, तू उन से दृष्टान्तों में क्यों बातें करता है?

11     उस ने उत्तर दिया, कि तुम को स्वर्ग के राज्य के भेदों की समझ दी गई है, पर उन को नहीं।

12     क्योंकि जिस के पास है, उसे दिया जाएगा; और उसके पास बहुत हो जाएगा; पर जिस के पास कुछ नहीं है, उस से जो कुछ उसके पास है, वह भी ले लिया जाएगा।

13     मैं उन से दृष्टान्तों में इसलिये बातें करता हूं, कि वे देखते हुए नहीं देखते; और सुनते हुए नहीं सुनते; और नहीं समझते।

14     और उन के विषय में यशायाह की यह भविष्यद्ववाणी पूरी होती है, कि तुम कानों से तो सुनोगे, पर समझोगे नहीं; और आंखों से तो देखोगे, पर तुम्हें न सूझेगा।

15     क्योंकि इन लोगों का मन मोटा हो गया है, और वे कानों से ऊंचा सुनते हैं और उन्होंने अपनी आंखें मूंद लीं हैं; कहीं ऐसा न हो कि वे आंखों से देखें, और कानों से सुनें और मन से समझें, और फिर जाएं, और मैं उन्हें चंगा करूं।

16     पर धन्य है तुम्हारी आंखें, कि वे देखती हैं; और तुम्हारे कान, कि वे सुनते हैं।

17     क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूं, कि बहुत से भविष्यद्वक्ताओं ने और धमिर्यों ने चाहा कि जो बातें तुम देखते हो, देखें पर न देखीं; और जो बातें तुम सुनते हो, सुनें, पर न सुनीं।

4. Matthew 13 : 1-3 (to 1st ,), 10-17

1     The same day went Jesus out of the house, and sat by the sea side.

2     And great multitudes were gathered together unto him, so that he went into a ship, and sat; and the whole multitude stood on the shore.

3     And he spake many things unto them in parables,

10     And the disciples came, and said unto him, Why speakest thou unto them in parables?

11     He answered and said unto them, Because it is given unto you to know the mysteries of the kingdom of heaven, but to them it is not given.

12     For whosoever hath, to him shall be given, and he shall have more abundance: but whosoever hath not, from him shall be taken away even that he hath.

13     Therefore speak I to them in parables: because they seeing see not; and hearing they hear not, neither do they understand.

14     And in them is fulfilled the prophecy of Esaias, which saith, By hearing ye shall hear, and shall not understand; and seeing ye shall see, and shall not perceive:

15     For this people’s heart is waxed gross, and their ears are dull of hearing, and their eyes they have closed; lest at any time they should see with their eyes, and hear with their ears, and should understand with their heart, and should be converted, and I should heal them.

16     But blessed are your eyes, for they see: and your ears, for they hear.

17     For verily I say unto you, That many prophets and righteous men have desired to see those things which ye see, and have not seen them; and to hear those things which ye hear, and have not heard them.

5. लूका 10: 21

21     उसी घड़ी वह पवित्र आत्मा में होकर आनन्द से भर गया, और कहा; हे पिता, स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं, कि तू ने इन बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा रखा, और बालकों पर प्रगट किया: हां, हे पिता, क्योंकि तुझे यही अच्छा लगा।

5. Luke 10: 21

21     In that hour Jesus rejoiced in spirit, and said, I thank thee, O Father, Lord of heaven and earth, that thou hast hid these things from the wise and prudent, and hast revealed them unto babes: even so, Father; for so it seemed good in thy sight.

6. गलातियों 6 : 7-9

7     धोखा न खाओ, परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता, क्योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा।

8     क्योंकि जो अपने शरीर के लिये बोता है, वह शरीर के द्वारा विनाश की कटनी काटेगा; और जो आत्मा के लिये बोता है, वह आत्मा के द्वारा अनन्त जीवन की कटनी काटेगा।

9     हम भले काम करने में हियाव न छोड़े, क्योंकि यदि हम ढीले न हों, तो ठीक समय पर कटनी काटेंगे।

6. Galatians 6 : 7-9

7     Be not deceived; God is not mocked: for whatsoever a man soweth, that shall he also reap.

8     For he that soweth to his flesh shall of the flesh reap corruption; but he that soweth to the Spirit shall of the Spirit reap life everlasting.

9     And let us not be weary in well doing: for in due season we shall reap, if we faint not.

7. I यूहन्ना 2 : 15-17

15     तुम न तो संसार से और न संसार में की वस्तुओं से प्रेम रखो: यदि कोई संसार से प्रेम रखता है, तो उस में पिता का प्रेम नहीं है।

16     क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात शरीर की अभिलाषा, और आंखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्तु संसार ही की ओर से है।

17     और संसार और उस की अभिलाषाएं दोनों मिटते जाते हैं, पर जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह सर्वदा बना रहेगा॥

7. I John 2 : 15-17

15     Love not the world, neither the things that are in the world. If any man love the world, the love of the Father is not in him.

16     For all that is in the world, the lust of the flesh, and the lust of the eyes, and the pride of life, is not of the Father, but is of the world.

17     And the world passeth away, and the lust thereof: but he that doeth the will of God abideth for ever.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 335 : 7 (आत्मा)-15

आत्मा, ईश्वर, ने सभी को स्वयं में बनाया है। आत्मा ने कभी सामग्री नहीं बनाई। आत्मा में ऐसा कुछ नहीं है जिससे सामग्री बनाई जा सके, क्योंकि बाइबल घोषित करती है, बिना लोगो के, परमेश्वर का वचन या वचन, “जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई” आत्मा एकमात्र पदार्थ है, अदृश्य और अविभाज्य अनंत भगवान। आध्यात्मिक और शाश्वत चीजें पर्याप्त हैं। चीजें सामग्री और अस्थायी असाध्य हैं।

1. 335 : 7 (Spirit)-15

Spirit, God, has created all in and of Himself. Spirit never created matter. There is nothing in Spirit out of which matter could be made, for, as the Bible declares, without the Logos, the Æon or Word of God, "was not anything made that was made." Spirit is the only substance, the in-visible and indivisible infinite God. Things spiritual and eternal are substantial. Things material and temporal are insubstantial.

2. 292 : 13-26

पदार्थ नश्वर मन की आदिम मान्यता है, क्योंकि इस तथाकथित मन का आत्मा के प्रति कोई संज्ञान नहीं है। नश्वर मन के लिए, सामग्री पर्याप्त है, और बुराई वास्तविक है। नश्वर की तथाकथित इंद्रियां भौतिक हैं। इसलिए नश्वर का तथाकथित जीवन सामग्री पर निर्भर है।

भौतिक मनुष्य और नश्वर मन की उत्पत्ति के बारे में बताते हुए, यीशु ने कहा: "तुम मेरी बात क्यों नहीं समझते? इसलिये कि मेरा वचन सुन नहीं सकते। तुम अपने पिता शैतान से हो(अनुचित), और अपने पिता की लालसाओं को पूरा करना चाहते हो। वह तो आरम्भ से हत्यारा है, और सत्य पर स्थिर न रहा, क्योंकि सत्य उस में है ही नहीं: जब वह झूठ बोलता, तो अपने स्वभाव ही से बोलता है; क्योंकि वह झूठा है, वरन झूठ का पिता है।"

2. 292 : 13-26

Matter is the primitive belief of mortal mind, because this so-called mind has no cognizance of Spirit. To mortal mind, matter is substantial, and evil is real. The so-called senses of mortals are material. Hence the so-called life of mortals is dependent on matter.

Explaining the origin of material man and mortal mind, Jesus said: "Why do ye not understand my speech? Even because ye cannot hear my word. Ye are of your father, the devil [evil], and the lusts of your father ye will do. He was a murderer from the beginning, and abode not in the truth, because there is no truth in him. When he speaketh a lie, he speaketh of his own: for he is a liar, and the father of it."

3. 591 : 8-10 (से ;), 12 (सत्य के विपरीत) केवल

सामग्री. पौराणिक कथा; मृत्यु दर; नश्वर मन का दूसरा नाम; मोह माया; बुद्धि, पदार्थ, और गैर-बुद्धि और मृत्यु दर में जीवन; ... सत्य के विपरीत।

3. 591 : 8-10 (to ;), 12 (the opposite of Truth) only

Matter. Mythology; mortality; another name for mortal mind; illusion; intelligence, substance, and life in non-intelligence and mortality; … the opposite of Truth;

4. 38 : 24-32

यीशु ने दूसरों के लिए रास्ता निकाला। उन्होंने मसीह, दिव्य प्रेम के आध्यात्मिक विचार का अनावरण किया। पाप और स्वयं के विश्वास में दबे हुए लोगों को, उन लोगों के लिए जो केवल आनंद या इंद्रियों के संतुष्टि के लिए जी रहे हैं, पदार्थ में उसने कहा: आंखे रखते हुए भी नहीं देखते, और कान रखते हुए भी नहीं सुनते; कहीं ऐसा न हो कि वे आंखों से देखें, और कानों से सुनें और मन से समझें, और फिर जाएं, और मैं उन्हें चंगा करूं। उन्होंने सिखाया कि भौतिक इंद्रियाँ सत्य और उसकी उपचार शक्ति को बंद कर देती हैं।

4. 38 : 24-32

Jesus mapped out the path for others. He unveiled the Christ, the spiritual idea of divine Love. To those buried in the belief of sin and self, living only for pleasure or the gratification of the senses, he said in substance: Having eyes ye see not, and having ears ye hear not; lest ye should understand and be converted, and I might heal you. He taught that the material senses shut out Truth and its healing power.

5. 284 : 15-18, 21-23, 28-32

क्या भौतिक इंद्रियों के माध्यम से देवता को जाना जा सकता है? क्या भौतिक इंद्रियां, जो आत्मा का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं प्राप्त करती हैं, आध्यात्मिक जीवन, सत्य और प्रेम के रूप में सही गवाही देती हैं?

भौतिक इंद्रियाँ ईश्वर का कोई प्रमाण नहीं प्राप्त कर सकती हैं। वे न तो आत्मा को आंख से देख सकते हैं और न ही उसे कान के माध्यम से सुन सकते हैं, और न ही वे आत्मा को महसूस कर सकते हैं, स्वाद ले सकते हैं, न ही उसे सूंघ सकते हैं।

क्रिश्चियन साइंस के अनुसार, मनुष्य की एकमात्र वास्तविक भावना आध्यात्मिक है, जो दिव्य मन से निकलती है। विचार ईश्वर से मनुष्य की ओर जाता है, लेकिन न तो संवेदना और न ही रिपोर्ट भौतिक शरीर से मन तक जाती है। अंतर्मन हमेशा ईश्वर से लेकर उसके विचार, मनुष्य तक होता है।

5. 284 : 15-18, 21-23, 28-32

Can Deity be known through the material senses? Can the material senses, which receive no direct evidence of Spirit, give correct testimony as to spiritual life, truth, and love?

The physical senses can obtain no proof of God. They can neither see Spirit through the eye nor hear it through the ear, nor can they feel, taste, or smell Spirit.

According to Christian Science, the only real senses of man are spiritual, emanating from divine Mind. Thought passes from God to man, but neither sensation nor report goes from material body to Mind. The intercommunication is always from God to His idea, man.

6. 209 : 31-32

आध्यात्मिक ज्ञान ईश्वर को समझने की एक सचेत, निरंतर क्षमता है।

6. 209 : 31-32

Spiritual sense is a conscious, constant capacity to understand God.

7. 210 : 5-10

ईसाई धर्म का सिद्धांत और प्रमाण आध्यात्मिक अर्थों से समझा जाता है। उन्हें यीशु के प्रदर्शनों में दिखाया गया है, - जो सामग्री और उसके तथाकथित कानूनों की अवहेलना करता है बुराइयों को मिटाकर, और मृत्यु को नष्ट करके, "अंतिम शत्रु जो नष्ट हो जाएगा,"।

7. 210 : 5-10

The Principle and proof of Christianity are discerned by spiritual sense. They are set forth in Jesus' demonstrations, which show — by his healing the sick, casting out evils, and destroying death, "the last enemy that shall be destroyed," — his disregard of matter and its so-called laws.

8. 294 : 9-18

यह विश्वास कि सामग्री सोचता है, देखता है, या महसूस करता है इस विश्वास से अधिक वास्तविक नहीं है कि सामग्री आनंद लेती है और पीड़ित होती है। यह नश्वर विश्वास, गलत आदमी, त्रुटि है, यह कह रहा है: “सामग्री में बुद्धिमत्ता और संवेदना है। नसों को महसूस होता है। मस्तिष्क सोचता है और पाप करता है। पेट आदमी को गुस्सा दिला सकता है। चोट अपंग हो सकती है और सामग्री मनुष्य को मार सकती है। ” तथाकथित भौतिक इंद्रियों का यह निर्णय मृत्यु दर का शिकार होता है, जिसे सिखाया जाता है, क्योंकि वे शरीर विज्ञान और विकृति विज्ञान द्वारा झूठी गवाही देने के लिए हैं, यहां तक कि गलतियां जो सत्य द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान और विज्ञान के माध्यम से नष्ट हो जाती हैं।

8. 294 : 9-18

The belief that matter thinks, sees, or feels is not more real than the belief that matter enjoys and suffers. This mortal belief, misnamed man, is error, saying: “Matter has intelligence and sensation. Nerves feel. Brain thinks and sins. The stomach can make a man cross. Injury can cripple and matter can kill man." This verdict of the so-called material senses victimizes mortals, taught, as they are by physiology and pathology, to revere false testimony, even the errors that are destroyed by Truth through spiritual sense and Science.

9. 122 : 1-14

भौतिक इंद्रियों के प्रमाण अक्सर होने के वास्तविक विज्ञान को उलट देते हैं, और इसलिए पाप, बीमारी, और मृत्यु को शक्ति प्रदान करते हुए, कलह का एक राज पैदा करता है; लेकिन जीवन के महान तथ्य, ठीक से समझे गए, त्रुटियों के इस त्रिकोण को पराजित करते हैं, उनके झूठे गवाहों का खंडन करते हैं, और स्वर्ग के राज्य को प्रकट करते हैं, यही पृथ्वी पर सद्भाव का वास्तविक शासनकाल है। यीशु के प्रदर्शनों से सौ साल पहले आत्मा की विज्ञान की भौतिक इंद्रियों को उलट दिया गया था; अभी तक ये तथाकथित इंद्रियां अभी भी नश्वर शरीर के लिए नश्वर मन को सहायक बनाती हैं, और पदार्थ के कुछ वर्गों, जैसे कि मस्तिष्क और नसों, दर्द और खुशी के स्थानों के रूप में बताती हैं, जिससे सामग्री इस तथाकथित दिमाग को बताती है सुख या दुख की स्थिति।

9. 122 : 1-14

The evidence of the physical senses often reverses the real Science of being, and so creates a reign of discord, — assigning seeming power to sin, sickness, and death; but the great facts of Life, rightly understood, defeat this triad of errors, contradict their false witnesses, and reveal the kingdom of heaven, — the actual reign of harmony on earth. The material senses' reversal of the Science of Soul was practically exposed nineteen hundred years ago by the demonstrations of Jesus; yet these so-called senses still make mortal mind tributary to mortal body, and ordain certain sections of matter, such as brain and nerves, as the seats of pain and pleasure, from which matter reports to this so-called mind its status of happiness or misery.

10. 120 : 7-9, 15-24

विज्ञान भौतिक इंद्रियों की झूठी गवाही को उलट देता है, और इस उलट नश्वरता के मूल तथ्यों पर पहुंचता है।

स्वास्थ्य पदार्थ की नहीं, मन की स्थिति है; न ही स्वास्थ्य के विषय पर सामग्री इंद्रियां विश्वसनीय गवाही दे सकती हैं। दिमागी चिकित्सा विज्ञान यह दिखाता है कि यह असंभव है लेकिन मन को सही मायने में गवाही देना या मनुष्य की वास्तविक स्थिति का प्रदर्शन करना है। इसलिए विज्ञान के दिव्य सिद्धांत, भौतिक इंद्रियों की गवाही को उलट कर, मनुष्य को सच्चाई में सामंजस्यपूर्ण रूप से अस्तित्व के रूप में प्रकट करता है, जो स्वास्थ्य का एकमात्र आधार है; और इस प्रकार विज्ञान सभी बीमारियों से इनकार करता है, बीमारों को चंगा करता है, झूठे सबूतों को उखाड़ फेंकता है और भौतिकवादी तर्क का खंडन करता है।

10. 120 : 7-9, 15-24

Science reverses the false testimony of the physical senses, and by this reversal mortals arrive at the fundamental facts of being.

Health is not a condition of matter, but of Mind; nor can the material senses bear reliable testimony on the subject of health. The Science of Mind-healing shows it to be impossible for aught but Mind to testify truly or to exhibit the real status of man. Therefore the divine Principle of Science, reversing the testimony of the physical senses, reveals man as harmoniously existent in Truth, which is the only basis of health; and thus Science denies all disease, heals the sick, overthrows false evidence, and refutes materialistic logic.

11. 84 : 19-23

यह समझना कि माइंड असीम है, कॉरपोरलिटी से घिरा नहीं है, ध्वनि या दृष्टि के लिए कान और आंख पर निर्भर नहीं है और न ही यह मांसपेशियों और हड्डियों पर निर्भर करता है, माइंड-साइंस की ओर एक कदम है जिसके द्वारा हम मनुष्य के स्वभाव और अस्तित्व की व्याख्या करते हैं।

11. 84 : 19-23

To understand that Mind is infinite, not bounded by corporeality, not dependent upon the ear and eye for sound or sight nor upon muscles and bones for locomotion, is a step towards the Mind-science by which we discern man's nature and existence.

12. 227 : 5 (यह)-13, 24-29

... ग़ुलामों के दृष्टिकोण के दावों को नकारना चाहिए और उन्हें छोड़ देना चाहिए। ईश्वरीय मन के नियम से मानव बंधन समाप्त होना चाहिए, या नश्वर मनुष्य के अयोग्य अधिकारों के प्रति अनभिज्ञ और निराशाजनक गुलामी के अधीन रहेंगे, क्योंकि कुछ सार्वजनिक शिक्षक ईश्वरीय शक्ति की अज्ञानता की अनुमति देते हैं, - एक अज्ञानता है जो निरंतर बंधन और मानव पीड़ा की नींव है।

दुनिया के नागरिक, "परमेश्वर के बच्चों की शानदार स्वतंत्रता" स्वीकार करें और मुक्त रहें! यह तुम्हारा दिव्य अधिकार है। भौतिक बोध का भ्रम, ईश्वरीय विधान नहीं, आपको बाध्य करता है, आपके मुक्त अंगों को उलझाता है, आपकी क्षमताओं को अपंग करता है, आपके शरीर को ऊर्जावान करता है, और आपके होने के टैबलेट को ख़राब कर देता है।

12. 227 : 5 (the)-13, 24-29

…the claims of the enslaving senses must be denied and superseded. The law of the divine Mind must end human bondage, or mortals will continue unaware of man's inalienable rights and in subjection to hopeless slavery, because some public teachers permit an ignorance of divine power, — an ignorance that is the foundation of continued bondage and of human suffering.

Citizens of the world, accept the "glorious liberty of the children of God," and be free! This is your divine right. The illusion of material sense, not divine law, has bound you, entangled your free limbs, crippled your capacities, enfeebled your body, and defaced the tablet of your being.

13. 393 : 8-15

मन शारीरिक इंद्रियों का स्वामी है, और बीमारी, पाप और मृत्यु को जीत सकता है। इस ईश्वर प्रदत्त अधिकार का प्रयोग करें। अपने शरीर पर अधिकार कर लो, और उसकी भावना और कार्य को नियंत्रित करो। आत्मा के सामर्थ्य में वृद्धि का विरोध करना अच्छा है। ईश्वर ने मनुष्य को इसके लिए सक्षम बनाया है, और कुछ भी मनुष्य में दिव्य रूप से दी गई क्षमता और शक्ति को नष्ट नहीं कर सकता है।

13. 393 : 8-15

Mind is the master of the corporeal senses, and can conquer sickness, sin, and death. Exercise this God-given authority. Take possession of your body, and govern its feeling and action. Rise in the strength of Spirit to resist all that is unlike good. God has made man capable of this, and nothing can vitiate the ability and power divinely bestowed on man.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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