रविवार 21 मई, 2023



विषयआत्मा और शरीर

SubjectSoul And Body

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: 1 कुरिन्थियों 6: 19

"क्या तुम नहीं जानते, कि तुम्हारी देह पवित्रात्मा का मन्दिर है; जो तुम में बसा हुआ है और तुम्हें परमेश्वर की ओर से मिला है, और तुम अपने नहीं हो?"



Golden Text: >I Corinthians 6 : 19

What? know ye not that your body is the temple of the Holy Ghost which is in you, which ye have of God, and ye are not your own?




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उत्तरदायी अध्ययन: 1 कुरिन्थियों 6: 20 • 1 थिस्सलुनीकियों 5: 16-24


20     क्योंकि दाम देकर मोल लिये गए हो, इसलिये अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो॥

16     सदा आनन्दित रहो।

17     निरन्तर प्रार्थना मे लगे रहो।

18     हर बात में धन्यवाद करो: क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है।

19     आत्मा को न बुझाओ।

20     भविष्यद्वाणियों को तुच्छ न जानो।

21     सब बातों को परखो: जो अच्छी है उसे पकड़े रहो।

22     सब प्रकार की बुराई से बचे रहो॥

23     शान्ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे; और तुम्हारी आत्मा और प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक पूरे पूरे और निर्दोष सुरक्षित रहें।

24     तुम्हारा बुलाने वाला सच्चा है, और वह ऐसा ही करेगा॥

Responsive Reading: I Corinthians 6 : 20I Thessalonians 5 : 16-24

20.     For ye are bought with a price: therefore glorify God in your body, and in your spirit, which are God’s.

16.     Rejoice evermore.

17.     Pray without ceasing.

18.     In every thing give thanks: for this is the will of God in Christ Jesus concerning you.

19.     Quench not the Spirit.

20.     Despise not prophesyings.

21.     Prove all things; hold fast that which is good.

22.     Abstain from all appearance of evil.

23.     And the very God of peace sanctify you wholly; and I pray God your whole spirit and soul and body be preserved blameless unto the coming of our Lord Jesus Christ.

24.     Faithful is he that calleth you, who also will do it.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 23: 1-3 (से :)

1     यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी।

2     वह मुझे हरी हरी चराइयों में बैठाता है; वह मुझे सुखदाई जल के झरने के पास ले चलता है;

3     वह मेरे जी में जी ले आता है।

1. Psalm 23 : 1-3 (to :)

1     The Lord is my shepherd; I shall not want.

2     He maketh me to lie down in green pastures: he leadeth me beside the still waters.

3     He restoreth my soul:

2. भजन संहिता 121: 1-8

1     मैंअपनी आंखें पर्वतों की ओर लगाऊंगा। मुझे सहायता कहां से मिलेगी?

2     मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है॥

3     वह तेरे पांव को टलने न देगा, तेरा रक्षक कभी न ऊंघेगा।

4     सुन, इस्राएल का रक्षक, न ऊंघेगा और न सोएगा॥

5     यहोवा तेरा रक्षक है; यहोवा तेरी दाहिनी ओर तेरी आड़ है।

6     न तो दिन को धूप से, और न रात को चांदनी से तेरी कुछ हानि होगी॥

7     यहोवा सारी विपत्ति से तेरी रक्षा करेगा; वह तेरे प्राण की रक्षा करेगा।

8     यहोवा तेरे आने जाने में तेरी रक्षा अब से ले कर सदा तक करता रहेगा॥

2. Psalm 121 : 1-8

1     I will lift up mine eyes unto the hills, from whence cometh my help.

2     My help cometh from the Lord, which made heaven and earth.

3     He will not suffer thy foot to be moved: he that keepeth thee will not slumber.

4     Behold, he that keepeth Israel shall neither slumber nor sleep.

5     The Lord is thy keeper: the Lord is thy shade upon thy right hand.

6     The sun shall not smite thee by day, nor the moon by night.

7     The Lord shall preserve thee from all evil: he shall preserve thy soul.

8     The Lord shall preserve thy going out and thy coming in from this time forth, and even for evermore.

3. दानिय्येल 1: 1, 3-6, 8, 11-15

1     यहूदा के राजा यहोयाकीम के राज्य के तीसरे वर्ष में बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर ने यरूशेलम पर चढ़ाई कर के उसको घेर लिया।

3     तब उस राजा ने अपने खोजों के प्रधान अशपनज को आज्ञा दी कि इस्राएली राजपुत्रों और प्रतिष्ठित पुरूषों में से ऐसे कई जवानों को ला,

4     जो निर्दोष, सुन्दर और सब प्रकार की बुद्धि में प्रवीण, और ज्ञान में निपुण और विद्वान् और राजमन्दिर में हाजिर रहने के योग्य हों; और उन्हें कसदियों के शास्त्र और भाषा की शिक्षा दे।

5     और राजा ने आज्ञा दी कि उसके भोजन और पीने के दाखमधु में से उन्हें प्रतिदिन खाने-पीने को दिया जाए। इस प्रकार तीन वर्ष तक उनका पालन पोषण होता रहे; तब उसके बाद वे राजा के साम्हने हाजिर किए जाएं।

6     उन में यहूदा की सन्तान से चुने हुए, दानिय्येल, हनन्याह, मीशाएल, और अजर्याह नाम यहूदी थे।

8     परन्तु दानिय्येल ने अपने मन में ठान लिया कि वह राजा का भोजन खाकर, और उसके पीने का दाखमधु पीकर अपवित्र न होए; इसलिये उसने खोजों के प्रधान से बिनती की कि उसे अपवित्र न होना पड़े।

11     तब दानिय्येल ने उस मुखिये से, जिस को खोजों के प्रधान ने दानिय्येल, हनन्याह, मीशाएल, और अजर्याह के ऊपर देखभाल करने के लिये नियुक्त किया था, कहा,

12     मैं तेरी बिनती करता हूं, अपने दासों को दस दिन तक जांच, हमारे खाने के लिये सागपात और पीने के लिये पानी ही दिया जाए।

13     फिर दस दिन के बाद हमारे मुंह और जो जवान राजा का भोजन खाते हैं उनके मुंह को देख; और जैसा तुझे देख पड़े, उसी के अनुसार अपने दासों से व्यवहार करना।

14     उनकी यह बिनती उसने मान ली, और दास दिन तक उन को जांचता रहा।

15     दस दिन के बाद उनके मुंह राजा के भोजन के खाने वाले सब जवानों से अधिक अच्छे और चिकने देख पड़े।

3. Daniel 1 : 1, 3-6, 8, 11-15

1     In the third year of the reign of Jehoiakim king of Judah came Nebuchadnezzar king of Babylon unto Jerusalem, and besieged it.

3     And the king spake unto Ashpenaz the master of his eunuchs, that he should bring certain of the children of Israel, and of the king’s seed, and of the princes;

4     Children in whom was no blemish, but well favoured, and skilful in all wisdom, and cunning in knowledge, and understanding science, and such as had ability in them to stand in the king’s palace, and whom they might teach the learning and the tongue of the Chaldeans.

5     And the king appointed them a daily provision of the king’s meat, and of the wine which he drank: so nourishing them three years, that at the end thereof they might stand before the king.

6     Now among these were of the children of Judah, Daniel, Hananiah, Mishael, and Azariah:

8     But Daniel purposed in his heart that he would not defile himself with the portion of the king’s meat, nor with the wine which he drank: therefore he requested of the prince of the eunuchs that he might not defile himself.

11     Then said Daniel to Melzar, whom the prince of the eunuchs had set over Daniel, Hananiah, Mishael, and Azariah,

12     Prove thy servants, I beseech thee, ten days; and let them give us pulse to eat, and water to drink.

13     Then let our countenances be looked upon before thee, and the countenance of the children that eat of the portion of the king’s meat: and as thou seest, deal with thy servants.

14     So he consented to them in this matter, and proved them ten days.

15     And at the end of ten days their countenances appeared fairer and fatter in flesh than all the children which did eat the portion of the king’s meat.

4. यशायाह 50: 10

10     तुम में से कौन है जो यहोवा का भय मानता और उसके दास की बातें सुनता है, जो अन्धियारे में चलता हो और उसके पास ज्योति न हो? वह यहोवा के नाम का भरोसा रखे, और अपने परमेश्वर पर आशा लगाए रहे।

4. Isaiah 50 : 10

10     Who is among you that feareth the Lord, that obeyeth the voice of his servant, that walketh in darkness, and hath no light? let him trust in the name of the Lord, and stay upon his God.

5. यशायाह 58: 9 (से .), 10, 11

9     तब तू पुकारेगा और यहोवा उत्तर देगा; तू दोहाई देगा और वह कहेगा, मैं यहां हूं।

10     उदारता से भूखे की सहायता करे और दीन दु:खियों को सन्तुष्ट करे, तब अन्धियारे में तेरा प्रकाश चमकेगा, और तेरा घोर अन्धकार दोपहर का सा उजियाला हो जाएगा।

11     और यहोवा तुझे लगातार लिए चलेगा, और काल के समय तुझे तृप्त और तेरी हड्डियों को हरी भरी करेगा; और तू सींची हुई बारी और ऐसे सोते के समान होगा जिसका जल कभी नहीं सूखता।

5. Isaiah 58 : 9 (to .), 10, 11

9     Then shalt thou call, and the Lord shall answer; thou shalt cry, and he shall say, Here I am.

10     And if thou draw out thy soul to the hungry, and satisfy the afflicted soul; then shall thy light rise in obscurity, and thy darkness be as the noonday:

11     And the Lord shall guide thee continually, and satisfy thy soul in drought, and make fat thy bones: and thou shalt be like a watered garden, and like a spring of water, whose waters fail not.

6. मत्ती 8: 14-16

14     और यीशु ने पतरस के घर में आकर उस की सास को ज्वर में पड़ी देखा।

15     उस ने उसका हाथ छूआ और उसका ज्वर उतर गया; और वह उठकर उस की सेवा करने लगी।

16     जब संध्या हुई तब वे उसके पास बहुत से लोगों को लाए जिन में दुष्टात्माएं थीं और उस ने उन आत्माओं को अपने वचन से निकाल दिया, और सब बीमारों को चंगा किया।

6. Matthew 8 : 14-16

14     And when Jesus was come into Peter’s house, he saw his wife’s mother laid, and sick of a fever.

15     And he touched her hand, and the fever left her: and she arose, and ministered unto them.

16     When the even was come, they brought unto him many that were possessed with devils: and he cast out the spirits with his word, and healed all that were sick:

7. मत्ती 5: 1, 2

1     वह इस भीड़ को देखकर, पहाड़ पर चढ़ गया; और जब बैठ गया तो उसके चेले उसके पास आए।

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

7. Matthew 5 : 1, 2

1     And seeing the multitudes, he went up into a mountain: and when he was set, his disciples came unto him:

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

8. मत्ती 6: 24-33

24     कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, क्योंकि वह एक से बैर ओर दूसरे से प्रेम रखेगा, वा एक से मिला रहेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा; तुम परमेश्वर और धन दोनो की सेवा नहीं कर सकते।

25     अपने प्राण के लिये यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएंगे? और क्या पीएंगे? और न अपने शरीर के लिये कि क्या पहिनेंगे? क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर नहीं?

26     आकाश के पक्षियों को देखो! वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तौभी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उन को खिलाता है; क्या तुम उन से अधिक मूल्य नहीं रखते।

27     तुम में कौन है, जो चिन्ता करके अपनी अवस्था में एक घड़ी भी बढ़ा सकता है

28     और वस्त्र के लिये क्यों चिन्ता करते हो? जंगली सोसनों पर ध्यान करो, कि वै कैसे बढ़ते हैं, वे न तो परिश्रम करते हैं, न कातते हैं।

29     तौभी मैं तुम से कहता हूं, कि सुलैमान भी, अपने सारे विभव में उन में से किसी के समान वस्त्र पहिने हुए न था।

30     इसलिये जब परमेश्वर मैदान की घास को, जो आज है, और कल भाड़ में झोंकी जाएगी, ऐसा वस्त्र पहिनाता है, तो हे अल्पविश्वासियों, तुम को वह क्योंकर न पहिनाएगा?

31     इसलिये तुम चिन्ता करके यह न कहना, कि हम क्या खाएंगे, या क्या पीएंगे, या क्या पहिनेंगे?

32     क्योंकि अन्यजाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं, और तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्तुएं चाहिए।

33     इसलिये पहिले तुम उसे राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी।

8. Matthew 6 : 24-33

24     No man can serve two masters: for either he will hate the one, and love the other; or else he will hold to the one, and despise the other. Ye cannot serve God and mammon.

25     Therefore I say unto you, Take no thought for your life, what ye shall eat, or what ye shall drink; nor yet for your body, what ye shall put on. Is not the life more than meat, and the body than raiment?

26     Behold the fowls of the air: for they sow not, neither do they reap, nor gather into barns; yet your heavenly Father feedeth them. Are ye not much better than they?

27     Which of you by taking thought can add one cubit unto his stature?

28     And why take ye thought for raiment? Consider the lilies of the field, how they grow; they toil not, neither do they spin:

29     And yet I say unto you, That even Solomon in all his glory was not arrayed like one of these.

30     Wherefore, if God so clothe the grass of the field, which to day is, and to morrow is cast into the oven, shall he not much more clothe you, O ye of little faith?

31     Therefore take no thought, saying, What shall we eat? or, What shall we drink? or, Wherewithal shall we be clothed?

32     (For after all these things do the Gentiles seek:) for your heavenly Father knoweth that ye have need of all these things.

33     But seek ye first the kingdom of God, and his righteousness; and all these things shall be added unto you.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 98 : 7-8

मन के बिना शरीर को बचाया नहीं जा सकता।

1. 98 : 7-8

Body cannot be saved except through Mind.

2. 92 : 32-9

क्या आप कहते हैं कि समय अभी तक नहीं आया है जिसमें आत्मा को पर्याप्त रूप से पहचानना और शरीर को नियंत्रित करने में सक्षम होना चाहिए? यीशु को याद करें, जिन्होंने लगभग उन्नीस सदियों पहले आत्मा की शक्ति का प्रदर्शन किया था और कहा था, "जो मुझ पर विश्वास रखता है, ये काम जो मैं करता हूं वह भी करेगा", और यह भी कहा, "परन्तु वह समय आता है, वरन अब भी है जिस में सच्चे भक्त पिता का भजन आत्मा और सच्चाई से करेंगे।" "अभी वह प्रसन्नता का समय है; देखो, अभी उद्धार का दिन है," पॉल ने कहा।

2. 92 : 32-9

Do you say the time has not yet come in which to recognize Soul as substantial and able to control the body? Remember Jesus, who nearly nineteen centuries ago demonstrated the power of Spirit and said, "He that believeth on me, the works that I do shall he do also," and who also said, "But the hour cometh, and now is, when the true worshippers shall worship the Father in spirit and in truth." "Behold, now is the accepted time; behold, now is the day of salvation," said Paul.

3. 595: 7-9 (से ;)

मंदिर। शरीर; जीवन, पदार्थ और बुद्धि का विचार; सत्य की अधिरचना; प्रेम का तीर्थ;

3. 595 : 7-9 (to ;)

Temple. Body; the idea of Life, substance, and intelligence; the superstructure of Truth; the shrine of Love;

4. 477 : 19-2

सवाल। - शरीर और आत्मा क्या हैं?

उत्तर। - पहचान आत्मा का प्रतिबिंब है, जीवित सिद्धांत, प्रेम के विविध रूपों में प्रतिबिंब है। आत्मा ही मनुष्य का पदार्थ, जीवन और बुद्धिमत्ता है, जो व्यक्तिगत है, लेकिन पदार्थ में नहीं। आत्मा कभी भी किसी भी चीज को हीन नहीं कर सकती।

मनुष्य आत्मा की अभिव्यक्ति है। भारतीयों ने अंतर्निहित वास्तविकता की कुछ झलकियाँ पकड़ीं, जब उन्होंने एक निश्चित सुंदर झील को "द ग्रेट स्पिरिट की मुस्कान" कहा। मनुष्य से अलग, जो आत्मा को व्यक्त करता है, आत्मा एक अस्तित्वहीन होगा; मनुष्य, आत्मा से तलाकशुदा, अपना अस्तित्व खो देगा। लेकिन ऐसा कोई विभाजन नहीं है, हो भी नहीं सकता, क्योंकि मनुष्य ईश्वर के साथ सह-अस्तित्व में है।

4. 477 : 19-2

Question. — What are body and Soul?

Answer. — Identity is the reflection of Spirit, the reflection in multifarious forms of the living Principle, Love. Soul is the substance, Life, and intelligence of man, which is individualized, but not in matter. Soul can never reflect anything inferior to Spirit.

Man is the expression of Soul. The Indians caught some glimpses of the underlying reality, when they called a certain beautiful lake "the smile of the Great Spirit." Separated from man, who expresses Soul, Spirit would be a nonentity; man, divorced from Spirit, would lose his entity. But there is, there can be, no such division, for man is coexistent with God.

5. 476 : 7-11, 21-22

त्रुटि यह दावा छोड़ देगी कि आत्मा शरीर में है, कि जीवन और बुद्धि पदार्थ में हैं, और यह सामग्री मनुष्य है। ईश्वर मनुष्य का सिद्धांत है, और मनुष्य ईश्वर का विचार है। इसलिए मनुष्य न तो नश्वर है और न ही भौतिक।

इसे जानें, नश्वर, और ईमानदारी से मनुष्य की आध्यात्मिक स्थिति की तलाश करें, जो सभी भौतिक स्वार्थ से अप्रासंगिक है।

5. 476 : 7-11, 21-22

Error will cease to claim that soul is in body, that life and intelligence are in matter, and that this matter is man. God is the Principle of man, and man is the idea of God. Hence man is not mortal nor material.

Learn this, O mortal, and earnestly seek the spiritual status of man, which is outside of all material selfhood.

6. 162 : 4-13

क्रिश्चियन साइंस शरीर में सत्य का सूर्यप्रकाश लाता है, जो स्फूर्तिदायक और शुद्ध करता है। क्रिश्चियन साइंस सत्य के साथ एक परिवर्तनकारी, तटस्थ त्रुटि के रूप में कार्य करता है। यह स्रावों को बदलता है, देह को बाहर निकालता है, ट्यूमर को घोलता है, कठोर मांसपेशियों को आराम देता है, और क्षतिग्रस्त हड्डियों को सुदृढ़ता में पुनर्स्थापित करता है। इस विज्ञान का प्रभाव मानव मन को आधार के परिवर्तन के लिए प्रेरित करना है, जिस पर वह दिव्य मन के सामंजस्य के लिए झुक सकता है।

अनुभवों ने इस तथ्य का पक्ष लिया है कि मन शरीर को नियंत्रित करता है, एक उदाहरण में नहीं, बल्कि हर उदाहरण में।

6. 162 : 4-13

Christian Science brings to the body the sunlight of Truth, which invigorates and purifies. Christian Science acts as an alterative, neutralizing error with Truth. It changes the secretions, expels humors, dissolves tumors, relaxes rigid muscles, restores carious bones to soundness. The effect of this Science is to stir the human mind to a change of base, on which it may yield to the harmony of the divine Mind.

Experiments have favored the fact that Mind governs the body, not in one instance, but in every instance.

7. 216 : 28-1

जब आप कहते हैं, "मनुष्य का शरीर भौतिक है," मैं कहता हूं पॉल: "देह से अलग होकर प्रभु के साथ रहना और भी उत्तम समझते हैं" मन की भौतिक धारणा को भौतिकता में छोड़ दो, और एक मन है, यहाँ तक कि भगवान भी; इसके लिए मन अपनी समानता बनाता है।

7. 216 : 28-1

When you say, "Man's body is material," I say with Paul: Be "willing rather to be absent from the body, and to be present with the Lord." Give up your material belief of mind in matter, and have but one Mind, even God; for this Mind forms its own likeness.

8. 221 : 1-4, 10-16

मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता था जिसने बचपन में अपच को ठीक करने के लिए ग्राहम प्रणाली को अपनाया था। कई सालों तक उन्होंने केवल रोटी और सब्जियां खाईं और पानी के अलावा कुछ नहीं पिया। … उन्होंने भूख और कमजोरी में, लगभग भुखमरी में कई थके हुए साल गुजारे, और अंत में मरने का मन बना लिया, डॉक्टरों के कौशल को समाप्त कर दिया, जिन्होंने उन्हें सूचित किया कि मृत्यु वास्तव में उनका एकमात्र विकल्प था। इस बिंदु पर क्रिश्चियन साइंस ने उसे बचा लिया, और वह अब पुरानी शिकायत के अवशेष के बिना पूर्ण स्वास्थ्य में है।

8. 221 : 1-4, 10-16

I knew a person who when quite a child adopted the Graham system to cure dyspepsia. For many years, he ate only bread and vegetables, and drank nothing but water. … He passed many weary years in hunger and weakness, almost in starvation, and finally made up his mind to die, having exhausted the skill of the doctors, who kindly informed him that death was indeed his only alternative. At this point Christian Science saved him, and he is now in perfect health without a vestige of the old complaint.

9. 222 : 11-17, 22-28

भोजन के पास मदद करने या उसे चोट पहुँचाने की शक्ति कम थी क्योंकि उसने इस तथ्य का लाभ उठाया था कि मन मनुष्य को नियंत्रित करता है, और उसे पदार्थ के तथाकथित सुख और दर्द में भी कम विश्वास था। उसे क्या खाना-पीना चाहिए, इस बारे में कम विचार करके, जीवन की अर्थव्यवस्था के बारे में पेट कम और ईश्वर के बारे में अधिक सलाह लेते हुए, उसने तेजी से ताकत और मांस प्राप्त किया।

उन्होंने सीखा कि एक पेट का रोगी भगवान की छवि और समानता से बहुत दूर था - यदि जानवर का थोड़ा सा मांस खाने से उस पर हावी हो सकता है, तो "समुद्र की मछली पर और मवेशियों पर हवा के पक्षियों पर अधिकार" होना बहुत दूर है। उन्होंने अंत में निष्कर्ष निकाला कि ईश्वर ने कभी भी अपच को नहीं बनाया, जबकि, उनकी आज्ञाओं के विपरीत, भय, स्वच्छता, शरीर विज्ञान और भौतिकी ने उन्हें बनाया था।

9. 222 : 11-17, 22-28

Food had less power to help or to hurt him after he had availed himself of the fact that Mind governs man, and he also had less faith in the so-called pleasures and pains of matter. Taking less thought about what he should eat or drink, consulting the stomach less about the economy of living and God more, he recovered strength and flesh rapidly.

He learned that a dyspeptic was very far from being the image and likeness of God, — far from having "dominion over the fish of the sea, and over the fowl of the air, and over the cattle," if eating a bit of animal flesh could overpower him. He finally concluded that God never made a dyspeptic, while fear, hygiene, physiology, and physics had made him one, contrary to His commands.

10. 223 : 3-6

जल्दी या बाद में हमें पता चलेगा कि मनुष्य की परिमित क्षमता के भ्रूण को इस भ्रम से मजबूर किया जाता है कि वह आत्मा के बजाय आत्मा के स्थान पर शरीर में रहता है।

10. 223 : 3-6

Sooner or later we shall learn that the fetters of man's finite capacity are forged by the illusion that he lives in body instead of in Soul, in matter instead of in Spirit.

11. 390 : 12-13, 20-26

जब रोग के पहले लक्षण दिखाई देते हैं, तो दिव्य विज्ञान के साथ सामग्री इंद्रियों की गवाही का विवाद करें। … विचार पर बढ़ने के लिए पाप या बीमारी का कोई दावा नहीं है। इसे एक घृणित दृढ़ विश्वास के साथ खारिज कर दें कि यह नाजायज है, क्योंकि आप जानते हैं कि ईश्वर पाप से अधिक बीमारी का लेखक नहीं है। आपके पास पाप या बीमारी की आवश्यकता का समर्थन करने के लिए उसका कोई कानून नहीं है, लेकिन आपके पास उस आवश्यकता को नकारने और बीमार को ठीक करने के लिए दिव्य अधिकार है।

11. 390 : 12-13, 20-26

When the first symptoms of disease appear, dispute the testimony of the material senses with divine Science. … Suffer no claim of sin or of sickness to grow upon the thought. Dismiss it with an abiding conviction that it is illegitimate, because you know that God is no more the author of sickness than He is of sin. You have no law of His to support the necessity either of

sin or sickness, but you have divine authority for denying that necessity and healing the sick.

12. 391 : 7-13

रोग के उद्दीप्त या उन्नत चरणों में अंधे और शांत प्रस्तुत करने के बजाय, उनके खिलाफ विद्रोह में वृद्धि। इस विश्वास को समाप्त करें कि आप संभवतः एक ही असहनीय दर्द का सामना कर सकते हैं, जिसे मन की शक्तियों द्वारा खारिज नहीं किया जा सकता है, और इस तरह आप शरीर में दर्द के विकास को रोक सकते हैं। भगवान का कोई भी कानून इस परिणाम में बाधा नहीं डालता है।

12. 391 : 7-13

Instead of blind and calm submission to the incipient or advanced stages of disease, rise in rebellion against them. Banish the belief that you can possibly entertain a single intruding pain which cannot be ruled out by the might of Mind, and in this way you can prevent the development of pain in the body. No law of God hinders this result.

13. 392 : 24 (खड़ा होना)-3

विचार के द्वार पर एक कुली को खड़ा करो। केवल ऐसे निष्कर्षों को स्वीकार करते हुए, जैसा कि आप शारीरिक परिणामों में महसूस करते हैं, आप अपने आप को सामंजस्यपूर्ण रूप से नियंत्रित करेंगे। जब स्थिति मौजूद होती है, जिसे आप कहते हैं कि बीमारी को प्रेरित करता है, चाहे वह हवा, व्यायाम, आनुवंशिकता, छूत या दुर्घटना हो, तो अपने कार्यालय को कुली के रूप में प्रदर्शन करें और इन अस्वास्थ्यकर विचारों और भय को बंद करें। नश्वर मन से अपमानजनक त्रुटियों को बाहर करें; तब शरीर उनसे पीड़ित नहीं हो सकता। दुख या सुख की बात मन से आती है, और जैसे चौकीदार अपना पद छोड़ देता है, हम घुसपैठ की धारणा को स्वीकार करते हैं, यह भूल जाते हैं कि ईश्वरीय सहायता के माध्यम से हम इस प्रवेश द्वार को मना कर सकते हैं।

13. 392 : 24 (Stand)-3

Stand porter at the door of thought. Admitting only such conclusions as you wish realized in bodily results, you will control yourself harmoniously. When the condition is present which you say induces disease, whether it be air, exercise, heredity, contagion, or accident, then perform your office as porter and shut out these unhealthy thoughts and fears. Exclude from mortal mind the offending errors; then the body cannot suffer from them. The issues of pain or pleasure must come through mind, and like a watchman forsaking his post, we admit the intruding belief, forgetting that through divine help we can forbid this entrance.

14. 393 : 8-15

मन शारीरिक इंद्रियों का स्वामी है, और बीमारी, पाप और मृत्यु को जीत सकता है। इस ईश्वर प्रदत्त अधिकार का प्रयोग करें। अपने शरीर पर अधिकार कर लो, और उसकी भावना और कार्य को नियंत्रित करो। आत्मा के सामर्थ्य में वृद्धि का विरोध करना अच्छा है। ईश्वर ने मनुष्य को इसके लिए सक्षम बनाया है, और कुछ भी मनुष्य में दिव्य रूप से दी गई क्षमता और शक्ति को नष्ट नहीं कर सकता है।

14. 393 : 8-15

Mind is the master of the corporeal senses, and can conquer sickness, sin, and death. Exercise this God-given authority. Take possession of your body, and govern its feeling and action. Rise in the strength of Spirit to resist all that is unlike good. God has made man capable of this, and nothing can vitiate the ability and power divinely bestowed on man.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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