रविवार 21 फरवरी, 2021



विषयमन

SubjectMind

वर्ण पाठ: नीतिवचन 9 : 10

यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है, और परमपवित्र ईश्वर को जानना ही समझ है।



Golden Text: Proverbs 9 : 10

The fear of the Lord is the beginning of wisdom: and the knowledge of the holy is understanding.




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नीतिवचन 2 : 3-9


3     और प्रवीणता और समझ के लिये अति यत्न से पुकारे,

4     ओर उस को चान्दी की नाईं ढूंढ़े, और गुप्त धन के समान उसी खोज में लगा रहे;

5     तो तू यहोवा के भय को समझेगा, और परमेश्वर का ज्ञान तुझे प्राप्त होगा।

6     क्योंकि बुद्धि यहोवा ही देता है; ज्ञान और समझ की बातें उसी के मुंह से निकलती हैं।

7     वह सीधे लोगों के लिये खरी बुद्धि रख छोड़ता है; जो खराई से चलते हैं, उनके लिये वह ढाल ठहरता है।

8     वह न्याय के पथों की देख भाल करता, और अपने भक्तों के मार्ग की रक्षा करता है।

9     तब तू धर्म और न्याय, और सीधाई को, निदान सब भली-भली चाल समझ सकेगा;

Responsive Reading: Proverbs 2 : 3-9

3.     If thou criest after knowledge, and liftest up thy voice for understanding;

4.     If thou seekest her as silver, and searchest for her as for hid treasures;

5.     Then shalt thou understand the fear of the Lord, and find the knowledge of God.

6.     For the Lord giveth wisdom: out of his mouth cometh knowledge and understanding.

7.     He layeth up sound wisdom for the righteous: he is a buckler to them that walk uprightly.

8.     He keepeth the paths of judgment, and preserveth the way of his saints.

9.     Then shalt thou understand righteousness, and judgment, and equity; yea, every good path.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 119 : 89, 97-104

89     हे यहोवा, तेरा वचन, आकाश में सदा तक स्थिर रहता है।

97     अहा! मैं तेरी व्यवस्था में कैसी प्रीति रखता हूं! दिन भर मेरा ध्यान उसी पर लगा रहता है।

98     तू अपनी आज्ञाओं के द्वारा मुझे अपने शत्रुओं से अधिक बुद्धिमान करता है, क्योंकि वे सदा मेरे मन में रहती हैं।

99     मैं अपने सब शिक्षकों से भी अधिक समझ रखता हूं, क्योंकि मेरा ध्यान तेरी चितौनियों पर लगा है।

100     मैं पुरनियों से भी समझदार हूं, क्योंकि मैं तेरे उपदेशों को पकड़े हुए हूं।

101     मैं ने अपने पांवों को हर एक बुरे रास्ते से रोक रखा है, जिस से मैं तेरे वचन के अनुसार चलूं।

102     मैं तेरे नियमों से नहीं हटा, क्योंकि तू ही ने मुझे शिक्षा दी है।

103     तेरे वचन मुझ को कैसे मीठे लगते हैं, वे मेरे मुंह में मधु से भी मीठे हैं!

104     तेरे उपदेशों के कारण मैं समझदार हो जाता हूं, इसलिये मैं सब मिथ्या मार्गों से बैर रखता हूं॥

1. Psalm 119 : 89, 97-104

89     For ever, O Lord, thy word is settled in heaven.

97     O how love I thy law! it is my meditation all the day.

98     Thou through thy commandments hast made me wiser than mine enemies: for they are ever with me.

99     I have more understanding than all my teachers: for thy testimonies are my meditation.

100     I understand more than the ancients, because I keep thy precepts.

101     I have refrained my feet from every evil way, that I might keep thy word.

102     I have not departed from thy judgments: for thou hast taught me.

103     How sweet are thy words unto my taste! yea, sweeter than honey to my mouth!

104     Through thy precepts I get understanding: therefore I hate every false way.

2. 1 राजा 5 : 1 (हीराम)-3, 5-7, 10-12

1     और सोर नगर के हीराम राजा ने अपने दूत सुलैमान के पास भेजे, क्योंकि उसने सुना था, कि वह अभिषिक्त हो कर अपने पिता के स्थान पर राजा हुआ है: और दाऊद के जीवन भर हीराम उसका मित्र बना रहा।

2     और सुलैमान ने हीराम के पास यों कहला भेजा, कि तुझे मालूम है,

3     कि मेरा पिता दाऊद अपने परमेश्वर यहोवा के नाम का एक भवन इसलिये न बनवा सका कि वह चारों ओर लड़ाइयों में तब तक बझा रहा, जब नक यहोवा ने उसके शत्रुओं को उसके पांव तल न कर दिया।

5     मैं ने अपने परमेश्वर यहोवा के नाम का एक भवन बनवाने को ठाना है अर्थात उस बात के अनुसार जो यहोवा ने मेरे पिता दाऊद से कही थी; कि तेरा पुत्र जिसे मैं तेरे स्थान में गद्दी पर बैठाऊंगा, वही मेरे नाम का भवन बनवाएगा।

6     इसलिये अब तू मेरे लिये लबानोन पर से देवदारु काटने की आज्ञा दे, और मेरे दास तेरे दासों के संग रहेंगे, और जो कुछ मज़दूरी तू ठहराए, वही मैं तुझे तेरे दासों के लिये दूंगा, तुझे मालूम तो है, कि सीदोनियों के बराबर लकड़ी काटने का भेद हम लोगों में से कोई भी नहीं जानता।

7     सुलैमान की ये बातें सुनकर, हीराम बहुत आनन्दित हुआ, और कहा, आज यहोवा धन्य है, जिसने दाऊद को उस बड़ी जाति पर राज्य करने के लिये एक बुद्धिमान पुत्र दिया है।

10     इस प्रकार हीराम सुलैमान की इच्छा के अनुसार उसको देवदारू और सनोवर की लकड़ी देने लगा।

11     और सुलैमान ने हीराम के परिवार के खाने के लिये उसे बीस हज़ार कोर गेहूं और बीस कोर पेरा हुआ तेल दिया; इस प्रकार सुलैमान हीराम को प्रति वर्ष दिया करता था।

12     और यहोवा ने सुलैमान को अपने वचन के अनुसार बुद्धि दी, और हीराम और सुलैमान के बीच मेल बना रहा वरन उन दोनों ने आपस में वाचा भी बान्ध ली।

2. I Kings 5 : 1 (Hiram)-3, 5-7, 10-12

1     Hiram king of Tyre sent his servants unto Solomon; for he had heard that they had anointed him king in the room of his father: for Hiram was ever a lover of David.

2     And Solomon sent to Hiram, saying,

3     Thou knowest how that David my father could not build an house unto the name of the Lord his God for the wars which were about him on every side, until the Lord put them under the soles of his feet.

5     And, behold, I purpose to build an house unto the name of the Lord my God, as the Lord spake unto David my father, saying, Thy son, whom I will set upon thy throne in thy room, he shall build an house unto my name.

6     Now therefore command thou that they hew me cedar trees out of Lebanon; and my servants shall be with thy servants: and unto thee will I give hire for thy servants according to all that thou shalt appoint: for thou knowest that there is not among us any that can skill to hew timber like unto the Sidonians.

7     And it came to pass, when Hiram heard the words of Solomon, that he rejoiced greatly, and said, Blessed be the Lord this day, which hath given unto David a wise son over this great people.

10     So Hiram gave Solomon cedar trees and fir trees according to all his desire.

11     And Solomon gave Hiram twenty thousand measures of wheat for food to his household, and twenty measures of pure oil: thus gave Solomon to Hiram year by year.

12     And the Lord gave Solomon wisdom, as he promised him: and there was peace between Hiram and Solomon; and they two made a league together.

3. 1 राजा 3 : 16-28

16     उस समय दो वेश्याएं राजा के पास आकर उसके सम्मुख खड़ी हुईं।

17     उन में से एक स्त्री कहने लगी, हे मेरे प्रभु! मैं और यह स्त्री दोनों एक ही घर में रहती हैं; और इसके संग घर में रहते हुए मेरे एक बच्चा हुआ।

18     फिर मेरे ज़च्चा के तीन दिन के बाद ऐसा हुआ कि यह स्त्री भी जच्चा हो गई; हम तो संग ही संग थीं, हम दोनों को छोड़कर घर में और कोई भी न था।

19     और रात में इस स्त्री का बालक इसके नीचे दबकर मर गया।

20     तब इस ने आधी रात को उठ कर, जब तेरी दासी सो ही रही थी, तब मेरा लड़का मेरे पास से ले कर अपनी छाती में रखा, और अपना मरा हुआ बालक मेरी छाती में लिटा दिया।

21     भोर को जब मैं अपना बालक दूध पिलाने को उठी, तब उसे मरा हुआ पाया; परन्तु भोर को मैं ने ध्यान से यह देखा, कि वह मेरा पुत्र नहीं है।

22     तब दूसरी स्त्री ने कहा, नहीं जीवित पुत्र मेरा है, और मरा पुत्र तेरा है। परन्तु वह कहती रही, नहीं मरा हुआ तेरा पुत्र है और जीवित मेरा पुत्र है, योंवे राजा के साम्हने बातें करती रही।

23     राजा ने कहा, एक तो कहती है जो जीवित है, वही मेरा पुत्र है, और मरा हुआ तेरा पुत्र है; और दूसरी कहती है, नहीं, जो मरा है वही तेरा पुत्र है, और जो जीवित है, वह मेरा पुत्र है।

24     फिर राजा ने कहा, मेरे पास तलवार ले आओ; सो एक तलवार राजा के साम्हने लाई गई।

25     तब राजा बोला, जीविते बालक को दो टुकड़े करके आधा इस को और आधा उसको दो।

26     तब जीवित बालक की माता का मन अपने बेटे के स्नेह से भर आया, और उसने राजा से कहा, हे मेरे प्रभु! जीवित बालक उसी को दे; परन्तु उसको किसी भांति न मार। दूसरी स्त्री ने कहा, वह न तो मेरा हो और न तेरा, वह दो टुकड़े किया जाए।

27     तब राजा ने कहा, पहिली को जीवित बालक दो; किसी भांति उसको न पारो; क्योंकि उसकी माता वही है।

28     जो न्याय राजा ने चुकाया था, उसका समाचार समस्त इस्राएल को मिला, और उन्होंने राजा का भय माना, क्योंकि उन्होंने यह देखा, कि उसके मन में न्याय करने के लिये परमेश्वर की बुद्धि है।

3. I Kings 3 : 16-28

16     Then came there two women, that were harlots, unto the king, and stood before him.

17     And the one woman said, O my lord, I and this woman dwell in one house; and I was delivered of a child with her in the house.

18     And it came to pass the third day after that I was delivered, that this woman was delivered also: and we were together; there was no stranger with us in the house, save we two in the house.

19     And this woman’s child died in the night; because she overlaid it.

20     And she arose at midnight, and took my son from beside me, while thine handmaid slept, and laid it in her bosom, and laid her dead child in my bosom.

21     And when I rose in the morning to give my child suck, behold, it was dead: but when I had considered it in the morning, behold, it was not my son, which I did bear.

22     And the other woman said, Nay; but the living is my son, and the dead is thy son. And this said, No; but the dead is thy son, and the living is my son. Thus they spake before the king.

23     Then said the king, The one saith, This is my son that liveth, and thy son is the dead: and the other saith, Nay; but thy son is the dead, and my son is the living.

24     And the king said, Bring me a sword. And they brought a sword before the king.

25     And the king said, Divide the living child in two, and give half to the one, and half to the other.

26     Then spake the woman whose the living child was unto the king, for her bowels yearned upon her son, and she said, O my lord, give her the living child, and in no wise slay it. But the other said, Let it be neither mine nor thine, but divide it.

27     Then the king answered and said, Give her the living child, and in no wise slay it: she is the mother thereof.

28     And all Israel heard of the judgment which the king had judged; and they feared the king: for they saw that the wisdom of God was in him, to do judgment.

4. नीतिवचन 3 : 13-19

13     क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो बुद्धि पाए, और वह मनुष्य जो समझ प्राप्त करे,

14     क्योंकि बुद्धि की प्राप्ति चान्दी की प्राप्ति से बड़ी, और उसका लाभ चोखे सोने के लाभ से भी उत्तम है।

15     वह मूंगे से अधिक अनमोल है, और जितनी वस्तुओं की तू लालसा करता है, उन में से कोई भी उसके तुल्य न ठहरेगी।

16     उसके दहिने हाथ में दीर्घायु, और उसके बाएं हाथ में धन और महिमा है।

17     उसके मार्ग मनभाऊ हैं, और उसके सब मार्ग कुशल के हैं।

18     जो बुद्धि को ग्रहण कर लेते हैं, उनके लिये वह जीवन का वृक्ष बनती है; और जो उस को पकड़े रहते हैं, वह धन्य हैं॥

19     यहोवा ने पृथ्वी की नेव बुद्धि ही से डाली; और स्वर्ग को समझ ही के द्वारा स्थिर किया।

4. Proverbs 3 : 13-19

13     Happy is the man that findeth wisdom, and the man that getteth understanding.

14     For the merchandise of it is better than the merchandise of silver, and the gain thereof than fine gold.

15     She is more precious than rubies: and all the things thou canst desire are not to be compared unto her.

16     Length of days is in her right hand; and in her left hand riches and honour.

17     Her ways are ways of pleasantness, and all her paths are peace.

18     She is a tree of life to them that lay hold upon her: and happy is every one that retaineth her.

19     The Lord by wisdom hath founded the earth; by understanding hath he established the heavens.

5. यिर्मयाह 9 : 23, 24

23     यहोवा यों कहता है, बुद्धिमान अपनी बुद्धि पर घमण्ड न करे, न वीर अपनी वीरता पर, न धनी अपने धन पर घमण्ड करे;

24     परन्तु जो घमण्ड करे वह इसी बात पर घमण्ड करे, कि वह मुझे जानता और समझता हे, कि मैं ही वह यहोवा हूँ, जो पृथ्वी पर करुणा, न्याय और धर्म के काम करता है; क्योंकि मैं इन्हीं बातों से प्रसन्न रहता हूँ।

5. Jeremiah 9 : 23, 24

23     Thus saith the Lord, Let not the wise man glory in his wisdom, neither let the mighty man glory in his might, let not the rich man glory in his riches:

24     But let him that glorieth glory in this, that he understandeth and knoweth me, that I am the Lord which exercise lovingkindness, judgment, and righteousness, in the earth: for in these things I delight, saith the Lord.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 591 : 16-20

मन। केवल मैं, या हम; एकमात्र आत्मा, जीवन, दिव्य सिद्धांत, पदार्थ, जीवन, सत्य, प्रेम; एक ईश्वर; वह नहीं जो मनुष्य में है, लेकिन ईश्वरीय सिद्धांत या ईश्वर, किसका मनुष्य पूर्ण और परिपूर्ण अभिव्यक्ति है; देवता, जो रेखांकित करते हैं, लेकिन रेखांकित नहीं किए जाते हैं।

1. 591 : 16-20

Mind. The only I, or Us; the only Spirit, Soul, divine Principle, substance, Life, Truth, Love; the one God; not that which is in man, but the divine Principle, or God, of whom man is the full and perfect expression; Deity, which outlines but is not outlined.

2. 209 : 5-8

मन, अपने सभी स्वरूपों पर सर्वोच्च और उन सभी पर शासन करने वाला, विचारों की अपनी प्रणाली, अपने सभी विशाल निर्माण का जीवन और प्रकाश का केंद्रीय सूर्य है; और मनुष्य दिव्य मन के लिए सहायक है।

2. 209 : 5-8

Mind, supreme over all its formations and governing them all, is the central sun of its own systems of ideas, the life and light of all its own vast creation; and man is tributary to divine Mind.

3. 591 : 5-7

आदमी। अनंत आत्मा का यौगिक विचार; भगवान की आध्यात्मिक छवि और समानता; मन का पूर्ण प्रतिनिधित्व।

3. 591 : 5-7

Man. The compound idea of infinite Spirit; the spiritual image and likeness of God; the full representation of Mind.

4. 257 : 12-15

मन विचारों में अपनी समानता बनाता है, और एक विचार का पदार्थ गैर-बुद्धिमान पदार्थ के कथित पदार्थ होने से बहुत दूर है। इसलिए पिता मन पदार्थ का पिता नहीं है।

4. 257 : 12-15

Mind creates His own likeness in ideas, and the substance of an idea is very far from being the supposed substance of non-intelligent matter. Hence the Father Mind is not the father of matter.

5. 280 : 1-8

मन की अनंतता में, सामग्री को अज्ञात होना चाहिए। कलह और क्षय के प्रतीक और तत्व अनंत, परिपूर्ण और शाश्वत सभी के उत्पाद नहीं हैं। प्रेम से और प्रकाश और सद्भाव से जो आत्मा के निवास हैं, केवल अच्छे के प्रतिबिंब आ सकते हैं। सुंदर और हानिरहित सभी चीजें मन के विचार हैं। मन उन्हें बनाता है और गुणा करता है, और उत्पाद को मानसिक होना चाहिए।

5. 280 : 1-8

In the infinitude of Mind, matter must be unknown. Symbols and elements of discord and decay are not products of the infinite, perfect, and eternal All. From Love and from the light and harmony which are the abode of Spirit, only reflections of good can come. All things beautiful and harmless are ideas of Mind. Mind creates and multiplies them, and the product must be mental.

6. 283 : 4-12

मन सभी आंदोलन का स्रोत है, और इसकी स्थायी और सामंजस्यपूर्ण कार्रवाई की मंदता या जांच करने के लिए कोई जड़ता नहीं है। माइंड "कल, और आज, और हमेशा" जीवन, प्रेम और ज्ञान की तरह ही है। पदार्थ और उसके प्रभाव - पाप, बीमारी और मृत्यु - नश्वर मन की अवस्थाएँ हैं जो कार्य करते हैं, प्रतिक्रिया करते हैं, और फिर एक पड़ाव पर आते हैं। वे मन के तथ्य नहीं हैं। वे विचार नहीं हैं, बल्कि भ्रम हैं। सिद्धांत निरपेक्ष है। यह किसी भी त्रुटि से स्वीकार नहीं किया जाता है, लेकिन समझने पर निश्चित रहता है।

6. 283 : 4-12

Mind is the source of all movement, and there is no inertia to retard or check its perpetual and harmonious action. Mind is the same Life, Love, and wisdom "yesterday, and to-day, and forever." Matter and its effects — sin, sickness, and death — are states of mortal mind which act, react, and then come to a stop. They are not facts of Mind. They are not ideas, but illusions. Principle is absolute. It admits of no error, but rests upon understanding.

7. 275 : 6-9, 20-24

दिव्य विज्ञान का प्रारंभिक बिंदु यह है कि भगवान, आत्मा, संपूर्ण है और न ही कोई अन्य शक्ति है और न ही मन — वह ईश्वर प्रेम है, और इसलिए वह दिव्य सिद्धांत है।

दिव्य तत्वमीमांसा, जैसा कि आध्यात्मिक समझ से पता चलता है, स्पष्ट रूप से दिखाता है कि सब माइंड है और वह मन ईश्वर है, सर्व-शक्ति, सर्व-भूत, सर्व-ज्ञानी, — अर्थात् सभी शक्ति, सभी उपस्थिति, सभी विज्ञान। इसलिए सभी वास्तव में माइंड की अभिव्यक्ति है।

7. 275 : 6-9, 20-24

The starting-point of divine Science is that God, Spirit, is All-in-all, and that there is no other might nor Mind, — that God is Love, and therefore He is divine Principle.

Divine metaphysics, as revealed to spiritual understanding, shows clearly that all is Mind, and that Mind is God, omnipotence, omnipresence, omniscience, — that is, all power, all presence, all Science. Hence all is in reality the manifestation of Mind.

8. 281 : 14-17

एक अहंकार, एक मन या आत्मा जिसे भगवान कहा जाता है, अनंत व्यक्तित्व है, जो सभी प्रकार और शांति प्रदान करता है और जो व्यक्तिगत आध्यात्मिक व्यक्ति और चीजों में वास्तविकता और दिव्यता को दर्शाता है।

8. 281 : 14-17

The one Ego, the one Mind or Spirit called God, is infinite individuality, which supplies all form and comeliness and which reflects reality and divinity in individual spiritual man and things.

9. 258 : 11-18

मनुष्य अनंतता को दर्शाता है, और यह प्रतिबिंब भगवान का सही विचार है।

ईश्वर मनुष्य में अनंत विचार व्यक्त करता है जो हमेशा अपने आप को विकसित करता है, एक व्यापक आधार से ऊंचा और ऊंचा होता है। मन सत्य की अनंतता में मौजूद है। हम ईश्वर के बारे में मनुष्य की सच्ची ईश्वरीय छवि और समानता के रूप में नहीं जानते हैं।

9. 258 : 11-18

Man reflects infinity, and this reflection is the true idea of God.

God expresses in man the infinite idea forever developing itself, broadening and rising higher and higher from a boundless basis. Mind manifests all that exists in the infinitude of Truth. We know no more of man as the true divine image and likeness, than we know of God.

10. 216 : 11-21

यह समझ कि अहंकार मन है, और यह कि एक मन या बुद्धि है, एक बार में नश्वर अर्थ की त्रुटियों को नष्ट करने और अमर भावना की सच्चाई की आपूर्ति करने के लिए शुरू होता है। यह समझ शरीर को सामंजस्यपूर्ण बनाती है; यह तंत्रिकाओं, हड्डियों, मस्तिष्क इत्यादि को नौकरों के बजाय नौकर बनाता है। यदि मनुष्य दिव्य मन के नियम से संचालित होता है, तो उसका शरीर हमेशा की ज़िंदगी और सच्चाई और प्रेम को प्रस्तुत करने में है। मनुष्यों की महान गलती यह है कि उस आदमी को, भगवान की छवि और समानता को मानने के लिए, भौतिक और आत्मा दोनों अच्छाई और बुराई दोनों हैं।

10. 216 : 11-21

The understanding that the Ego is Mind, and that there is but one Mind or intelligence, begins at once to destroy the errors of mortal sense and to supply the truth of immortal sense. This understanding makes the body harmonious; it makes the nerves, bones, brain, etc., servants, instead of masters. If man is governed by the law of divine Mind, his body is in submission to everlasting Life and Truth and Love. The great mistake of mortals is to suppose that man, God's image and likeness, is both matter and Spirit, both good and evil.

11. 84 : 7-23

जब विज्ञान में पर्याप्त रूप से उन्नत होने की सच्चाई के साथ सामंजस्य स्थापित किया जाता है, तो पुरुष अनैच्छिक रूप से द्रष्टा और भविष्यद्वक्ता बन जाते हैं, जो राक्षसों, आत्माओं, या लोकतंत्रों द्वारा नियंत्रित नहीं होते हैं, लेकिन एक आत्मा द्वारा। यह वर्तमान, दिव्य मन का विचार है, और विचार का जो इस मन के साथ संबंध में है, अतीत, वर्तमान और भविष्य को जानने के लिए।

साइंस के साथ परिचित होना हमें बड़े पैमाने पर दिव्य मन के साथ कम्यून को सक्षम बनाता है, सर्वकल्याण की चिंता करने वाली घटनाओं का पूर्वाभास और पूर्वाभास, दैवीय रूप से प्रेरित करने के लिए, — हाँ, भ्रूणहीन मन की सीमा तक पहुँचने के लिए।

यह समझना कि माइंड असीम है, कॉरपोरलिटी से घिरा नहीं है, ध्वनि या दृष्टि के लिए कान और आंख पर निर्भर नहीं है और न ही यह मांसपेशियों और हड्डियों पर निर्भर करता है, माइंड-साइंस की ओर एक कदम है जिसके द्वारा हम मनुष्य के स्वभाव और अस्तित्व की व्याख्या करते हैं।

11. 84 : 7-23

When sufficiently advanced in Science to be in harmony with the truth of being, men become seers and prophets involuntarily, controlled not by demons, spirits, or demigods, but by the one Spirit. It is the prerogative of the ever-present, divine Mind, and of thought which is in rapport with this Mind, to know the past, the present, and the future.

Acquaintance with the Science of being enables us to commune more largely with the divine Mind, to foresee and foretell events which concern the universal welfare, to be divinely inspired, — yea, to reach the range of fetterless Mind.

To understand that Mind is infinite, not bounded by corporeality, not dependent upon the ear and eye for sound or sight nor upon muscles and bones for locomotion, is a step towards the Mind-science by which we discern man's nature and existence.

12. 469 : 13 (वह)-24

त्रुटि का नाश करने वाला महान सत्य है कि भगवान, अच्छा, एकमात्र दिमाग है, और यह कि अनंत मन के विपरीत - जिसे शैतान या बुराई कहा जाता है - मन नहीं है, सत्य नहीं है, बल्कि त्रुटि, बुद्धि या वास्तविकता के बिना है। एक मन हो सकता है, लेकिन एक भगवान है; और यदि मनुष्यों ने किसी अन्य मन का दावा किया और किसी अन्य को स्वीकार नहीं किया, तो पाप अज्ञात होगा। हमारे पास एक मन हो सकता है, अगर वह अनंत है। हम अनन्तता की भावना को दफनाते हैं, जब हम मानते हैं कि, हालांकि ईश्वर अनंत है, इस अनंत में बुराई का स्थान है, क्योंकि बुराई के लिए कोई जगह नहीं हो सकती है, जहां सभी स्थान ईश्वर से भरे हुए हैं।

12. 469 : 13 (The)-24

The exterminator of error is the great truth that God, good, is the only Mind, and that the supposititious opposite of infinite Mind — called devil or evil — is not Mind, is not Truth, but error, without intelligence or reality. There can be but one Mind, because there is but one God; and if mortals claimed no other Mind and accepted no other, sin would be unknown. We can have but one Mind, if that one is infinite. We bury the sense of infinitude, when we admit that, although God is infinite, evil has a place in this infinity, for evil can have no place, where all space is filled with God.

13. 470 : 21-5

ईश्वर मनुष्य का निर्माता है, और, मनुष्य का ईश्वरीय सिद्धांत शेष पूर्ण है, दिव्य विचार या प्रतिबिंब, मनुष्य, परिपूर्ण रहता है मनुष्य ईश्वर के अस्तित्व की अभिव्यक्ति है। अगर कभी ऐसा क्षण आया जब मनुष्य ने ईश्वरीय पूर्णता को व्यक्त नहीं किया, तब एक ऐसा क्षण आया जब मनुष्य ने ईश्वर को व्यक्त नहीं किया, और फलस्वरूप एक समय था जब देवता अप्रसन्न थे — यह इकाई के बिना है। अगर मनुष्य ने पूर्णता खो दी है, तो उसने अपने सिद्ध सिद्धांत, दिव्य मन को खो दिया है। यदि मनुष्य कभी भी इस सिद्ध सिद्धांत या मन के बिना अस्तित्व में था, तो मनुष्य का अस्तित्व एक मिथक था।

साइंस में ईश्वर और मनुष्य के संबंध, ईश्वरीय सिद्धांत और विचार अविनाशी हैं; और विज्ञान जानता है कि कोई चूक नहीं हुई है और न ही सद्भाव में लौटा लेकिन यह ईश्वरीय आदेश या आध्यात्मिक कानून रखता है, जिसमें भगवान और वह जो कुछ भी बनाता है वह परिपूर्ण और शाश्वत है, अपने सनातन इतिहास में अपरिवर्तित रहा है।

13. 470 : 21-5

God is the creator of man, and, the divine Principle of man remaining perfect, the divine idea or reflection, man, remains perfect. Man is the expression of God's being. If there ever was a moment when man did not express the divine perfection, then there was a moment when man did not express God, and consequently a time when Deity was unexpressed — that is, without entity. If man has lost perfection, then he has lost his perfect Principle, the divine Mind. If man ever existed without this perfect Principle or Mind, then man's existence was a myth.

The relations of God and man, divine Principle and idea, are indestructible in Science; and Science knows no lapse from nor return to harmony, but holds the divine order or spiritual law, in which God and all that He creates are perfect and eternal, to have remained unchanged in its eternal history.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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