रविवार 21 जून, 2020 |

रविवार 21 जून, 2020



विषयक्या ब्रह्मांड, मनुष्य सहित, परमाणु बल द्वारा विकसित है?

SubjectIs the Universe, Including Man, Evolved by Atomic Force?

वर्ण पाठ: मत्ती 23 : 9

और पृथ्वी पर किसी को अपना पिता न कहना, क्योंकि तुम्हारा एक ही पिता है, जो स्वर्ग में है।



Golden Text: Matthew 23 : 9

And call no man your father upon the earth: for one is your Father, which is in heaven.




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प्रेरितों के काम 17 : 22-28


22     तब पौलुस ने अरियुपगुस के बीच में खड़ा होकर कहा; हे अथेने के लोगों मैं देखता हूं, कि तुम हर बात में देवताओं के बड़े मानने वाले हो।

23     क्योंकि मैं फिरते हुए तुम्हारी पूजने की वस्तुओं को देख रहा था, तो एक ऐसी वेदी भी पाई, जिस पर लिखा था, कि अनजाने ईश्वर के लिये। सो जिसे तुम बिना जाने पूजते हो, मैं तुम्हें उसका समाचार सुनाता हूं।

24     जिस परमेश्वर ने पृथ्वी और उस की सब वस्तुओं को बनाया, वह स्वर्ग और पृथ्वी का स्वामी होकर हाथ के बनाए हुए मन्दिरों में नहीं रहता।

25     न किसी वस्तु का प्रयोजन रखकर मनुष्यों के हाथों की सेवा लेता है, क्योंकि वह तो आप ही सब को जीवन और स्वास और सब कुछ देता है।

26     उस ने एक ही मूल से मनुष्यों की सब जातियां सारी पृथ्वी पर रहने के लिये बनाईं हैं; और उन के ठहराए हुए समय, और निवास के सिवानों को इसलिये बान्धा है।

27     कि वे परमेश्वर को ढूंढ़ें, कदाचित उसे टटोल कर पा जाएं तौभी वह हम में से किसी से दूर नहीं!

28     क्योंकि हम उसी में जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं; जैसे तुम्हारे कितने कवियों ने भी कहा है, कि हम तो उसी के वंश भी हैं।

Responsive Reading: Acts 17 : 22-28

22.     Then Paul stood in the midst of Mars’ hill, and said, Ye men of Athens, I perceive that in all things ye are too superstitious.

23.     For as I passed by, and beheld your devotions, I found an altar with this inscription, TO THE UNKNOWN GOD. Whom therefore ye ignorantly worship, him declare I unto you.

24.     God that made the world and all things therein, seeing that he is Lord of heaven and earth, dwelleth not in temples made with hands;

25.     Neither is worshipped with men’s hands, as though he needed any thing, seeing he giveth to all life, and breath, and all things;

26.     And hath made of one blood all nations of men for to dwell on all the face of the earth, and hath determined the times before appointed, and the bounds of their habitation;

27.     That they should seek the Lord, if haply they might feel after him, and find him, though he be not far from every one of us:

28.     For in him we live, and move, and have our being; as certain also of your own poets have said, For we are also his offspring.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. अय्यूब 33 : 4

4     मुझे ईश्वर की आत्मा ने बनाया है, और सर्वशक्तिमान की सांस से मुझे जीवन मिलता है।

1. Job 33 : 4

4     The Spirit of God hath made me, and the breath of the Almighty hath given me life.

2. यशायाह 44 : 23, 24

23     हे आकाश, ऊंचे स्वर से गा, क्योंकि यहोवा ने यह काम किया है; हे पृथ्वी के गहिरे स्थानों, जयजयकार करो; हे पहाड़ों, हे वन, हे वन के सब वृक्षों, गला खोल कर ऊंचे स्वर से गाओ! क्योंकि यहोवा ने याकूब को छुड़ा लिया है और इस्राएल में महिमावान होगा॥

24     यहोवा, तेरा उद्धारकर्त्ता, जो तुझे गर्भ ही से बनाता आया है, यों कहता है, मैं यहोवा ही सब का बनाने वाला हूं जिसने अकेले ही आकाश को ताना और पृथ्वी को अपनी ही शक्ति से फैलाया है।

2. Isaiah 44 : 23, 24

23     Sing, O ye heavens; for the Lord hath done it: shout, ye lower parts of the earth: break forth into singing, ye mountains, O forest, and every tree therein: for the Lord hath redeemed Jacob, and glorified himself in Israel.

24     Thus saith the Lord, thy redeemer, and he that formed thee from the womb, I am the Lord that maketh all things; that stretcheth forth the heavens alone; that spreadeth abroad the earth by myself;

3. यशायाह 45: 2, 3, 12, 13 (से :)

2     मैं तेरे आगे आगे चलूंगा और ऊंची ऊंची भूमि को चौरस करूंगा, मैं पीतल के किवाड़ों को तोड़ डालूंगा और लोहे के बेड़ों को टुकड़े टुकड़े कर दूंगा।

3     मैं तुझ को अन्धकार में छिपा हुआ और गुप्त स्थानों में गड़ा हुआ धन दूंगा, जिस से तू जाने कि मैं इस्राएल का परमेश्वर यहोवा हूं जो तुझे नाम ले कर बुलाता है।

12     मैं ही ने पृथ्वी को बनाया और उसके ऊपर मनुष्यों को सृजा है; मैं ने अपने ही हाथों से आकाश को ताना और उसके सारे गणों को आज्ञा दी है।

13     मैं ही ने उस पुरूष को धामिर्कता से उभारा है और मैं उसके सब मार्गों को सीधा करूंगा॥

3. Isaiah 45 : 2, 3, 12, 13 (to :)

2     I will go before thee, and make the crooked places straight: I will break in pieces the gates of brass, and cut in sunder the bars of iron:

3     And I will give thee the treasures of darkness, and hidden riches of secret places, that thou mayest know that I, the Lord, which call thee by thy name, am the God of Israel.

12     I have made the earth, and created man upon it: I, even my hands, have stretched out the heavens, and all their host have I commanded.

13     I have raised him up in righteousness, and I will direct all his ways:

4. उत्पत्ति 16: 1 (से :)

1     अब्राम की पत्नी सारै के कोई सन्तान न थी।

4. Genesis 16 : 1 (to :)

1     Now Sarai Abram’s wife bare him no children:

5. उत्पत्ति 17 : 1, 2, 5, 6, 15-17, 19, 21 (मेरे)

1     जब अब्राम निन्नानवे वर्ष का हो गया, तब यहोवा ने उसको दर्शन देकर कहा मैं सर्वशक्तिमान ईश्वर हूं; मेरी उपस्थिति में चल और सिद्ध होता जा।

2     और मैं तेरे साथ वाचा बान्धूंगा, और तेरे वंश को अत्यन्त ही बढ़ाऊंगा।

5     सो अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा परन्तु तेरा नाम इब्राहीम होगा क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है।

6     और मैं तुझे अत्यन्त ही फुलाऊं फलाऊंगा, और तुझ को जाति जाति का मूल बना दूंगा, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।

15     फिर परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, तेरी जो पत्नी सारै है, उसको तू अब सारै न कहना, उसका नाम सारा होगा।

16     और मैं उसको आशीष दूंगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूंगा; और मैं उसको ऐसी आशीष दूंगा, कि वह जाति जाति की मूलमाता हो जाएगी; और उसके वंश में राज्य राज्य के राजा उत्पन्न होंगे।

17     तब इब्राहीम मुंह के बल गिर पड़ा और हंसा, और अपने मन ही मन कहने लगा, क्या सौ वर्ष के पुरूष के भी सन्तान होगा और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?

19     तब परमेश्वर ने कहा, निश्चय तेरी पत्नी सारा के तुझ से एक पुत्र उत्पन्न होगा; और तू उसका नाम इसहाक रखना: और मैं उसके साथ ऐसी वाचा बान्धूंगा जो उसके पश्चात उसके वंश के लिये युग युग की वाचा होगी।

21     ... मैं अपनी वाचा इसहाक ही के साथ बान्धूंगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्त समय में उत्पन्न होगा।

5. Genesis 17 : 1, 2, 5, 6, 15-17, 19, 21 (my)

1     And when Abram was ninety years old and nine, the Lord appeared to Abram, and said unto him, I am the Almighty God; walk before me, and be thou perfect.

2     And I will make my covenant between me and thee, and will multiply thee exceedingly.

5     Neither shall thy name any more be called Abram, but thy name shall be Abraham; for a father of many nations have I made thee.

6     And I will make thee exceeding fruitful, and I will make nations of thee, and kings shall come out of thee.

15     And God said unto Abraham, As for Sarai thy wife, thou shalt not call her name Sarai, but Sarah shall her name be.

16     And I will bless her, and give thee a son also of her: yea, I will bless her, and she shall be a mother of nations; kings of people shall be of her.

17     Then Abraham fell upon his face, and laughed, and said in his heart, Shall a child be born unto him that is an hundred years old? and shall Sarah, that is ninety years old, bear?

19     And God said, Sarah thy wife shall bear thee a son indeed; and thou shalt call his name Isaac: and I will establish my covenant with him for an everlasting covenant, and with his seed after him.

21     …my covenant will I establish with Isaac, which Sarah shall bear unto thee at this set time in the next year.

6. उत्पत्ति 21 : 1-3, 5

1     सो यहोवा ने जैसा कहा था वैसा ही सारा की सुधि लेके उसके साथ अपने वचन के अनुसार किया।

2     सो सारा को इब्राहीम से गर्भवती हो कर उसके बुढ़ापे में उसी नियुक्त समय पर जो परमेश्वर ने उससे ठहराया था एक पुत्र उत्पन्न हुआ।

3     और इब्राहीम ने अपने पुत्र का नाम जो सारा से उत्पन्न हुआ था इसहाक रखा।

5     और जब इब्राहीम का पुत्र इसहाक उत्पन्न हुआ तब वह एक सौ वर्ष का था।

6. Genesis 21 : 1-3, 5

1     And the Lord visited Sarah as he had said, and the Lord did unto Sarah as he had spoken.

2     For Sarah conceived, and bare Abraham a son in his old age, at the set time of which God had spoken to him.

3     And Abraham called the name of his son that was born unto him, whom Sarah bare to him, Isaac.

5     And Abraham was an hundred years old, when his son Isaac was born unto him.

7. अय्यूब 38 : 3-7, 31, 32

3     पुरुष की नाईं अपनी कमर बान्ध ले, क्योंकि मैं तुझ से प्रश्न करता हूँ, और तू मुझे उत्तर दे।

4     जब मैं ने पृथ्वी की नेव डाली, तब तू कहां था? यदि तू समझदार हो तो उत्तर दे।

5     उसकी नाप किस ने ठहराई, क्या तू जानता है उस पर किस ने सूत खींचा?

6     उसकी नेव कौन सी वस्तु पर रखी गई, वा किस ने उसके कोने का पत्थर बिठाया,

7     जब कि भोर के तारे एक संग आनन्द से गाते थे और परमेश्वर के सब पुत्र जयजयकार करते थे?

31     क्या तू कचपचिया का गुच्छा गूंथ सकता वा मृगशिरा के बन्धन खोल सकता है?

32     क्या तू राशियों को ठीक ठीक समय पर उदय कर सकता, वा सप्तर्षि को साथियों समेत लिए चल सकता है?

7. Job 38 : 3-7, 31, 32

3     Gird up now thy loins like a man; for I will demand of thee, and answer thou me.

4     Where wast thou when I laid the foundations of the earth? declare, if thou hast understanding.

5     Who hath laid the measures thereof, if thou knowest? or who hath stretched the line upon it?

6     Whereupon are the foundations thereof fastened? or who laid the corner stone thereof;

7     When the morning stars sang together, and all the sons of God shouted for joy?

31     Canst thou bind the sweet influences of Pleiades, or loose the bands of Orion?

32     Canst thou bring forth Mazzaroth in his season? or canst thou guide Arcturus with his sons?

8. अय्यूब 37 : 16, 17, 23

16     क्या तू घटाओं का तौलना, वा सर्वज्ञानी के आश्चर्यकर्म जानता है?

17     जब पृथ्वी पर दक्खिनी हवा ही के कारण से सन्नाटा रहता है तब तेरे वस्त्र क्यों गर्म हो जाते हैं?

23     सर्वशक्तिमान जो अति सामथीं है, और जिसका भेद हम पा नहीं सकते, वह न्याय और पूर्ण धर्म को छोड़ अत्याचार नहीं कर सकता।

8. Job 37 : 16, 17, 23

16     Dost thou know the balancings of the clouds, the wondrous works of him which is perfect in knowledge?

17     How thy garments are warm, when he quieteth the earth by the south wind?

23     Touching the Almighty, we cannot find him out: he is excellent in power, and in judgment, and in plenty of justice: he will not afflict.

9. मरकुस 3 : 7 (यीशु), 8

7     और यीशु अपने चेलों के साथ झील की ओर चला गया: और गलील से एक बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली।

8     और यहूदिया, और यरूशलेम और इदूमिया से, और यरदन के पार, और सूर और सैदा के आसपास से एक बड़ी भीड़ यह सुनकर, कि वह कैसे अचम्भे के काम करता है, उसके पास आई।

9. Mark 3 : 7 (Jesus), 8

7     Jesus withdrew himself with his disciples to the sea: and a great multitude from Galilee followed him, and from Judæa,

8     And from Jerusalem, and from Idumæa, and from beyond Jordan; and they about Tyre and Sidon, a great multitude, when they had heard what great things he did, came unto him.

10. मरकुस 4 : 35-41

35     उसी दिन जब सांझ हुई, तो उस ने उन से कहा; आओ, हम पार चलें,।

36     और वे भीड़ को छोड़कर जैसा वह था, वैसा ही उसे नाव पर साथ ले चले; और उसके साथ, और भी नावें थीं।

37     तब बड़ी आन्धी आई, और लहरें नाव पर यहां तक लगीं, कि वह अब पानी से भरी जाती थी।

38     और वह आप पिछले भाग में गद्दी पर सो रहा था; तब उन्होंने उसे जगाकर उस से कहा; हे गुरू, क्या तुझे चिन्ता नहीं, कि हम नाश हुए जाते हैं?

39     तब उस ने उठकर आन्धी को डांटा, और पानी से कहा; “शान्त रह, थम जा”: और आन्धी थम गई और बड़ा चैन हो गया।

40     और उन से कहा; तुम क्यों डरते हो? क्या तुम्हें अब तक विश्वास नहीं?

41     और वे बहुत ही डर गए और आपस में बोले; यह कौन है, कि आन्धी और पानी भी उस की आज्ञा मानते हैं?

10. Mark 4 : 35-41

35     And the same day, when the even was come, he saith unto them, Let us pass over unto the other side.

36     And when they had sent away the multitude, they took him even as he was in the ship. And there were also with him other little ships.

37     And there arose a great storm of wind, and the waves beat into the ship, so that it was now full.

38     And he was in the hinder part of the ship, asleep on a pillow: and they awake him, and say unto him, Master, carest thou not that we perish?

39     And he arose, and rebuked the wind, and said unto the sea, Peace, be still. And the wind ceased, and there was a great calm.

40     And he said unto them, Why are ye so fearful? how is it that ye have no faith?

41     And they feared exceedingly, and said one to another, What manner of man is this, that even the wind and the sea obey him?

11. आमोस 5 : 1 (शब्द से), 8

1     ... हेइस्राएल के घराने...:

8     जो कचपचिया और मृगशिरा का बनाने वाला है, जो घोर अन्धकार को भोर का प्रकाश बनाता है, जो दिन को अन्धकार कर के रात बना देता है, और समुद्र का जल स्थल के ऊपर बहा देता है, उसका नाम यहोवा है।

11. Amos 5 : 1 (to word), 8

1     Hear ye this word…

8     Seek him that maketh the seven stars and Orion, and turneth the shadow of death into the morning, and maketh the day dark with night: that calleth for the waters of the sea, and poureth them out upon the face of the earth: The Lord is his name:



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 516 : 9-23

ईश्वर सभी चीजों का, उसकी अपनी समानता पर पक्षपात करता है। जीवन अस्तित्व में परिलक्षित होता है, सत्यता में सत्य, अच्छाई में ईश्वर, जो अपनी शांति और स्थायित्व प्रदान करता है। निःस्वार्थ भाव से प्यार, सुंदरता और रोशनी में नहाया हुआ। हमारे पैरों के नीचे की घास चुपचाप बहती है, "नम्र पृथ्वी का वारिस होगा।" मामूली अर्बेटस उसकी प्यारी साँस को स्वर्ग भेज देता है। महान चट्टान छाया और आश्रय देती है। चर्च-गुंबद से सूरज की रोशनी, जेल-सेल में झलकती है, बीमार-कक्ष में घूमती है, फूल को रोशन करती है, परिदृश्य को सुशोभित करती है, पृथ्वी को आशीर्वाद देती है। मनुष्य, उसकी समानता में बना, उसके पास सभी पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रभुत्व को दर्शाता है। भगवान के साथ सहवास और शाश्वत के रूप में आदमी और औरत हमेशा के लिए, अनंत पिता-माता भगवान की महिमा में परिलक्षित होते हैं।

1. 516 : 9-23

God fashions all things, after His own likeness. Life is reflected in existence, Truth in truthfulness, God in goodness, which impart their own peace and permanence. Love, redolent with unselfishness, bathes all in beauty and light. The grass beneath our feet silently exclaims, "The meek shall inherit the earth." The modest arbutus sends her sweet breath to heaven. The great rock gives shadow and shelter. The sunlight glints from the church-dome, glances into the prison-cell, glides into the sick-chamber, brightens the flower, beautifies the landscape, blesses the earth. Man, made in His likeness, possesses and reflects God's dominion over all the earth. Man and woman as coexistent and eternal with God forever reflect, in glorified quality, the infinite Father-Mother God.

2. 509 : 16-28

ईश्वर ब्रह्मांड को बनाते और बनाते हैं। आध्यात्मिक समझ का प्रकाश केवल अनंत की झलक देता है, यहाँ तक कि नेबुलो भी अंतरिक्ष की अपरिपक्वता को दर्शाता है। तथाकथित खनिज, सब्जी, और पशु पदार्थ अब समय या सामग्री संरचना से अधिक आकस्मिक नहीं हैं, जब वे "सुबह के सितारे एक साथ गाते थे।" मन ने पृथ्वी में होने से पहले "खेत का पौधा" बनाया। आध्यात्मिक स्वर्गारोहण के काल मन की रचना के दिन और मौसम हैं, जिसमें सौंदर्य, उदात्तता, पवित्रता, और पवित्रता - हाँ, दैवीय प्रकृति - मनुष्य में प्रकट होती है और ब्रह्मांड कभी गायब नहीं होता है।

2. 509 : 16-28

God forms and peoples the universe. The light of spiritual understanding gives gleams of the infinite only, even as nebulæ indicate the immensity of space.

So-called mineral, vegetable, and animal substances are no more contingent now on time or material structure than they were when "the morning stars sang together." Mind made the "plant of the field before it was in the earth." The periods of spiritual ascension are the days and seasons of Mind's creation, in which beauty, sublimity, purity, and holiness — yea, the divine nature — appear in man and the universe never to disappear.

3. 295 : 6-8

ब्रह्मांड आध्यात्मिक विचारों से भरा है, जिसे वह विकसित करता है, और वे मन के आज्ञाकारी हैं जो उन्हें बनाता है।

3. 295 : 6-8

The universe is filled with spiritual ideas, which He evolves, and they are obedient to the Mind that makes them.

4. 332 : 4 (माता पिता)-8

पिता-माता देवता का नाम है, जो उनकी आध्यात्मिक रचना के उनके कोमल संबंधों को इंगित करता है। जैसा कि प्रेरित ने इसे उन शब्दों में व्यक्त किया है जो उसने एक क्लासिक कवि से मंजूर होने के साथ उद्धृत किए थे: "क्योंकि हम भी उसकी संतान हैं।"

4. 332 : 4 (Father-Mother)-8

Father-Mother is the name for Deity, which indicates His tender relationship to His spiritual creation. As the apostle expressed it in words which he quoted with approbation from a classic poet: "For we are also His offspring."

5. 257 : 12-21

मन विचारों में अपनी समानता बनाता है, और एक विचार का पदार्थ गैर-बुद्धिमान पदार्थ के कथित पदार्थ होने से बहुत दूर है। इसलिए पिता मन पदार्थ का पिता नहीं है। भौतिक इंद्रियां और मानव अवधारणाएं आध्यात्मिक विचारों को भौतिक विश्वासों में अनुवादित करेंगी, और कहेंगे कि मानव सिद्धांत, अनंत सिद्धांत के बजाय, ईश्वर, दूसरे शब्दों में, दिव्य प्रेम, - बारिश का जनक है, "जो बूंदों की भीख मांगता है ओस, "जो अपने मौसम में मजाज़रोथ को आगे लाता है," और अपने बेटों के साथ "आर्कटुरस" का मार्गदर्शन करता है।

5. 257 : 12-21

Mind creates His own likeness in ideas, and the substance of an idea is very far from being the supposed substance of non-intelligent matter. Hence the Father Mind is not the father of matter. The material senses and human conceptions would translate spiritual ideas into material beliefs, and would say that an anthropomorphic God, instead of infinite Principle, — in other words, divine Love, — is the father of the rain, "who hath begotten the drops of dew," who bringeth "forth Mazzaroth in his season," and guideth "Arcturus with his sons."

6. 547 : 25-32

मनुष्य सहित ब्रह्मांड का सही सिद्धांत भौतिक इतिहास में नहीं बल्कि आध्यात्मिक विकास में है। प्रेरित विचार ब्रह्मांड की एक सामग्री, कामुक, और नश्वर सिद्धांत को त्यागता है, और आध्यात्मिक और अमरता को अपनाता है।

यह पवित्रशास्त्र की आध्यात्मिक धारणा है, जो मानवता को बीमारी और मृत्यु से बचाती है और विश्वास को प्रेरित करती है।

6. 547 : 25-32

The true theory of the universe, including man, is not in material history but in spiritual development. Inspired thought relinquishes a material, sensual, and mortal theory of the universe, and adopts the spiritual and immortal.

It is this spiritual perception of Scripture, which lifts humanity out of disease and death and inspires faith.

7. 119 : 1-18

जब हम अस्पष्ट आध्यात्मिक शक्ति के साथ बात करते हैं, - जब हम अपने सिद्धांतों में ऐसा करते हैं, तो निश्चित रूप से हम वास्तव में इस बात का समर्थन नहीं कर सकते हैं कि यह क्या है और क्या नहीं कर सकता है, - हम सर्वशक्तिमान को भंग कर देते हैं, ऐसे सिद्धांतों के लिए नेतृत्व करते हैं दो चीजों की। वे या तो मामले के आत्म-विकास और स्व-सरकार को देखते हैं, या फिर वे मानते हैं कि मामला आत्मा का उत्पाद है। इस दुविधा के पहले सींग को जब्त करने और पदार्थ को स्वयं की शक्ति के रूप में विचार करने के लिए, अपने स्वयं के ब्रह्मांड से निर्माता को छोड़ना है; दुविधा के दूसरे सींग को समझकर और ईश्वर को पदार्थ का निर्माता मानते हुए, न केवल उसे सभी आपदाओं, भौतिक और नैतिक के लिए जिम्मेदार बनाना है, बल्कि उसे अपने स्रोत के रूप में घोषित करना है, इस प्रकार, उसे प्राकृतिक कानून के नाम से और फार्म में सदाचारी कुशासन बनाए रखने का दोषी माना जाता है।

एक अर्थ में ईश्वर प्रकृति के समान है, लेकिन यह प्रकृति आध्यात्मिक है और पदार्थ में व्यक्त नहीं है।

7. 119 : 1-18

When we endow matter with vague spiritual power, — that is, when we do so in our theories, for of course we cannot really endow matter with what it does not and cannot possess, — we disown the Almighty, for such theories lead to one of two things. They either presuppose the self-evolution and self-government of matter, or else they assume that matter is the product of Spirit. To seize the first horn of this dilemma and consider matter as a power in and of itself, is to leave the creator out of His own universe; while to grasp the other horn of the dilemma and regard God as the creator of matter, is not only to make Him responsible for all disasters, physical and moral, but to announce Him as their source, thereby making Him guilty of maintaining perpetual misrule in the form and under the name of natural law.

In one sense God is identical with nature, but this nature is spiritual and is not expressed in matter.

8. 171 : 12-16

मनुष्य सहित ब्रह्मांड पर मन का नियंत्रण अब एक खुला प्रश्न नहीं है, बल्कि विज्ञान है। यीशु ने बीमारी और पाप को ठीक करने और मृत्यु की नींव को नष्ट करके दिव्य सिद्धांत और अमर मन की शक्ति का वर्णन किया।

8. 171 : 12-16

Mind's control over the universe, including man, is no longer an open question, but is demonstrable Science. Jesus illustrated the divine Principle and the power of immortal Mind by healing sickness and sin and destroying the foundations of death.

9. 151 : 23-24

वह दिव्य मन जिसने मनुष्य को बनाया, वह अपनी छवि और समानता को बनाए रखता है।

9. 151 : 23-24

The divine Mind that made man maintains His own image and likeness.

10. 134 : 26-30

यीशु ने कहा: "मुझे पता था कि तू मुझे हमेशा सुनता है," और उस ने मरे हुओं में से लाजर को जीवित कर दिया, तूफान को रोक दिया, बीमारों को चंगा किया, पानी पर चला गया। भौतिक प्रतिरोध पर आध्यात्मिक शक्ति की श्रेष्ठता में विश्वास करने का दिव्य अधिकार है।

10. 134 : 26-30

Jesus said: "I knew that Thou hearest me always;" and he raised Lazarus from the dead, stilled the tempest, healed the sick, walked on the water. There is divine authority for believing in the superiority of spiritual power over material resistance.

11. 124 : 14-31

ब्रह्मांड, मनुष्य की तरह, विज्ञान द्वारा अपने दिव्य सिद्धांत, ईश्वर से व्याख्या की जानी है, और फिर इसे समझा जा सकता है; लेकिन जब भौतिक अर्थों के आधार पर समझाया जाता है और विकास, परिपक्वता और क्षय के विषय के रूप में प्रतिनिधित्व किया जाता है, तो ब्रह्मांड, जैसे मनुष्य, है और होना चाहिए, एक रहस्य है।

आसंजन, सामंजस्य और आकर्षण मन के गुण हैं। वे दिव्य सिद्धांत से संबंधित हैं, और उस विचार-शक्ति के उपसंहार का समर्थन करते हैं, जिसने पृथ्वी को अपनी कक्षा में लॉन्च किया और गर्व की लहर से कहा, "यहां तक और इसके आगे नहीं।"

आत्मा सभी चीजों का जीवन, पदार्थ और निरंतरता है। हम ताकतों पर चलते हैं। उन्हें वापस ले लें, और सृजन को ढह जाना चाहिए। मानव ज्ञान उन्हें पदार्थ की ताकत कहता है; लेकिन दिव्य विज्ञान घोषित करता है कि वे पूर्ण रूप से दिव्य मन से संबंधित हैं, इस दिमाग में निहित हैं, और इसलिए उन्हें उनके सही घर और वर्गीकरण के लिए पुनर्स्थापित करता है।

11. 124 : 14-31

The universe, like man, is to be interpreted by Science from its divine Principle, God, and then it can be understood; but when explained on the basis of physical sense and represented as subject to growth, maturity, and decay, the universe, like man, is, and must continue to be, an enigma.

Adhesion, cohesion, and attraction are properties of Mind. They belong to divine Principle, and support the equipoise of that thought-force, which launched the earth in its orbit and said to the proud wave, "Thus far and no farther."

Spirit is the life, substance, and continuity of all things. We tread on forces. Withdraw them, and creation must collapse. Human knowledge calls them forces of matter; but divine Science declares that they belong wholly to divine Mind, are inherent in this Mind, and so restores them to their rightful home and classification.

12. 121 : 24-32

सूर्य केंद्रीय शांति है, जहां तक हमारे सौर मंडल का संबंध है, और पृथ्वी सूर्य के बारे में एक वर्ष में एक बार घूमती है, इसके अलावा अपनी धुरी पर दैनिक रूप से घूमती है।

जैसा कि संकेत दिया गया है, खगोलीय आदेश ईश्वरीय सिद्धांत की कार्रवाई का अनुकरण करता है; और ब्रह्मांड, भगवान का प्रतिबिंब, इस प्रकार आध्यात्मिक तथ्य को निकट लाया जाता है, और ईश्वरीय विज्ञान से संबद्ध है जैसा कि ब्रह्मांड की चिरस्थायी सरकार में प्रदर्शित होता है।

12. 121 : 24-32

The sun is the central stillness, so far as our solar system is concerned, and the earth revolves about the sun once a year, besides turning daily on its own axis.

As thus indicated, astronomical order imitates the action of divine Principle; and the universe, the reflection of God, is thus brought nearer the spiritual fact, and is allied to divine Science as displayed in the everlasting government of the universe.

13. 503 : 9-17

दिव्य सिद्धांत और विचार आध्यात्मिक सद्भाव का गठन करते हैं, - स्वर्ग और अनंत काल। सत्य के ब्रह्मांड में, मामला अज्ञात है। त्रुटि का कोई भी दबाव वहां प्रवेश नहीं करता है। ईश्वरीय विज्ञान, ईश्वर का शब्द, त्रुटि पर अंधेरे के लिए कहता है, "ईश्वर सब में है," और हमेशा मौजूद प्रेम का प्रकाश ब्रह्मांड को प्रकाशित करता है। इसलिए अनन्त आश्चर्य, - कि अनंत अंतरिक्ष अनगिनत आध्यात्मिक रूपों में उसे दर्शाते हुए, ईश्वर के विचारों से अभिभूत है।

13. 503 : 9-17

The divine Principle and idea constitute spiritual harmony, — heaven and eternity. In the universe of Truth, matter is unknown. No supposition of error enters there. Divine Science, the Word of God, saith to the darkness upon the face of error, "God is All-in-all," and the light of ever-present Love illumines the universe. Hence the eternal wonder, — that infinite space is peopled with God's ideas, reflecting Him in countless spiritual forms.

14. 331 : 16-17

भगवान के ब्रह्मांड में सब कुछ उसे व्यक्त करता है।

14. 331 : 16-17

Everything in God's universe expresses Him.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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