रविवार 21 जनवरी, 2024



विषयजिंदगी

SubjectLife

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: 2 शमूएल 22: 33

"भगवान जो मेरा अति दृढ़ क़िला है, वह खरे मनुष्य को अपने मार्ग में लिए चलता है।"



Golden Text: II Samuel 22 : 33

God is my strength and power: And he maketh my way perfect.




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उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 18: 1, 2, 6, 17, 20, 21, 29, 32 • भजन संहिता 19: 14


1     हेपरमेश्वर, हे मेरे बल, मैं तुझ से प्रेम करता हूं।

2     यहोवा मेरी चट्टान, और मेरा गढ़ और मेरा छुड़ाने वाला है; मेरा ईश्वर, मेरी चट्टान है, जिसका मैं शरणागत हूं, वह मेरी ढ़ाल और मेरी मुक्ति का सींग, और मेरा ऊँचा गढ़ है।

6     अपने संकट में मैं ने यहोवा परमेश्वर को पुकारा; मैं ने अपने परमेश्वर की दोहाई दी। और उसने अपने मन्दिर में से मेरी बातें सुनी। और मेरी दोहाई उसके पास पहुंचकर उसके कानों में पड़ी॥

17     उसने मेरे बलवन्त शत्रु से, और उन से जो मुझ से घृणा करते थे मुझे छुड़ाया; क्योंकि वे अधिक सामर्थी थे।

20     यहोवा ने मुझ से मेरे धर्म के अनुसार व्यवहार किया; और मेरे हाथों की शुद्धता के अनुसार उसने मुझे बदला दिया।

21     क्योंकि मैं यहोवा के मार्गों पर चलता रहा, और दुष्टता के कारण अपने परमेश्वर से दूर न हुआ।

29     क्योंकि तेरी सहायता से मैं सेना पर धावा करता हूं; और अपने परमेश्वर की सहायता से शहरपनाह को लांघ जाता हूं।

32     यह वही ईश्वर है, जो सामर्थ से मेरा कटिबन्ध बान्धता है, और मेरे मार्ग को सिद्ध करता है।

14     मेरे मुंह के वचन और मेरे हृदय का ध्यान तेरे सम्मुख ग्रहण योग्य हों, हे यहोवा परमेश्वर, मेरी चट्टान और मेरे उद्धार करने वाले।

Responsive Reading: Psalm 18 : 1, 2, 6, 17, 20, 21, 29, 32   •   Psalm 19 : 14

1.     I will love thee, O Lord, my strength.

2.     The Lord is my rock, and my fortress, and my deliverer; my God, my strength, in whom I will trust; my buckler, and the horn of my salvation, and my high tower.

6.     In my distress I called upon the Lord, and cried unto my God: he heard my voice out of his temple, and my cry came before him, even into his ears.

17.     He delivered me from my strong enemy, and from them which hated me: for they were too strong for me.

20.     The Lord rewarded me according to my righteousness; according to the cleanness of my hands hath he recompensed me.

21.     For I have kept the ways of the Lord, and have not wickedly departed from my God.

29.     For by thee I have run through a troop; and by my God have I leaped over a wall.

32.     It is God that girdeth me with strength, and maketh my way perfect.

14.     Let the words of my mouth, and the meditation of my heart, be acceptable in thy sight, O Lord, my strength, and my redeemer.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 27: 1, 3-5, 14

1     यहोवा परमेश्वर मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है; मैं किस से डरूं? यहोवा मेरे जीवन का दृढ़ गढ़ ठहरा है, मैं किस का भय खाऊं?

3     चाहे सेना भी मेरे विरुद्ध छावनी डाले, तौभी मैं न डरूंगा; चाहे मेरे विरुद्ध लड़ाई ठन जाए, उस दशा में भी मैं हियाव बान्धे निशचिंत रहूंगा॥

4     एक वर मैं ने यहोवा से मांगा है, उसी के यत्न में लगा रहूंगा; कि मैं जीवन भर यहोवा के भवन में रहने पाऊं, जिस से यहोवा की मनोहरता पर दृष्टि लगाए रहूं, और उसके मन्दिर में ध्यान किया करूं॥

5     क्योंकि वह तो मुझे विपत्ति के दिन में अपने मण्डप में छिपा रखेगा; अपने तम्बू के गुप्त स्थान में वह मुझे छिपा लेगा, और चट्टान पर चढ़ाएगा।

14     यहोवा की बाट जोहता रह; हियाव बान्ध और तेरा हृदय दृढ़ रहे; हां, यहोवा ही की बाट जोहता रह!

1. Psalm 27 : 1, 3-5, 14

1     The Lord is my light and my salvation; whom shall I fear? the Lord is the strength of my life; of whom shall I be afraid?

3     Though an host should encamp against me, my heart shall not fear: though war should rise against me, in this will I be confident.

4 One thing have I desired of the Lord, that will I seek after; that I may dwell in the house of the Lord all the days of my life, to behold the beauty of the Lord, and to inquire in his temple.

5     For in the time of trouble he shall hide me in his pavilion: in the secret of his tabernacle shall he hide me; he shall set me up upon a rock.

14     Wait on the Lord: be of good courage, and he shall strengthen thine heart: wait, I say, on the Lord.

2. गिनती 13: 1, 2 (से:), 17, 18, 25, 26 (से 1st,), 27, 28, 32, 33

1     फिर यहोवा ने मूसा से कहा,

2     कनान देश जिसे मैं इस्त्राएलियों को देता हूं उसका भेद लेने के लिये पुरूषों को भेज; वे उनके पितरों के प्रति गोत्र का एक प्रधान पुरूष हों।

17     उन को कनान देश के भेद लेने को भेजते समय मूसा ने कहा, इधर से, अर्थात दक्षिण देश हो कर जाओ,

18     और पहाड़ी देश में जा कर उस देश को देख लो कि कैसा है, और उस में बसे हुए लोगों को भी देखो कि वे बलवान् हैं वा निर्बल, थोड़े हैं वा बहुत,

25     चालीस दिन के बाद वे उस देश का भेद ले कर लौट आए।

26     और पारान जंगल के कादेश नाम स्थान में मूसा और हारून और इस्त्राएलियों की सारी मण्डली के पास पहुंचे; और उन को और सारी मण्डली को संदेशा दिया, और उस देश के फल उन को दिखाए।

27     उन्होंने मूसा से यह कहकर वर्णन किया, कि जिस देश में तू ने हम को भेजा था उस में हम गए; उस में सचमुच दूध और मधु की धाराएं बहती हैं, और उसकी उपज में से यही है।

28     परन्तु उस देश के निवासी बलवान् हैं, और उसके नगर गढ़ वाले हैं और बहुत बड़े हैं; और फिर हम ने वहां अनाकवंशियों को भी देखा।

32     और उन्होंने इस्त्राएलियों के साम्हने उस देश की जिसका भेद उन्होंने लिया था यह कहकर निन्दा भी की, कि वह देश जिसका भेद लेने को हम गये थे ऐसा है, जो अपने निवासियों निगल जाता है; और जितने पुरूष हम ने उस में देखे वे सब के सब बड़े डील डौल के हैं।

33     फिर हम ने वहां नपीलों को, अर्थात नपीली जाति वाले अनाकवंशियों को देखा; और हम अपनी दृष्टि में तो उनके साम्हने टिड्डे के सामान दिखाई पड़ते थे, और ऐसे ही उनकी दृष्टि में मालूम पड़ते थे॥

2. Numbers 13 : 1, 2 (to :), 17, 18, 25, 26 (to 1st ,), 27, 28, 32, 33

1     And the Lord spake unto Moses, saying,

2     Send thou men, that they may search the land of Canaan, which I give unto the children of Israel:

17     And Moses sent them to spy out the land of Canaan, and said unto them, Get you up this way southward, and go up into the mountain:

18     And see the land, what it is; and the people that dwelleth therein, whether they be strong or weak, few or many;

25     And they returned from searching of the land after forty days.

26     And they went and came to Moses,

27     And they told him, and said, We came unto the land whither thou sentest us, and surely it floweth with milk and honey; and this is the fruit of it.

28     Nevertheless the people be strong that dwell in the land, and the cities are walled, and very great: and moreover we saw the children of Anak there.

32     And they brought up an evil report of the land which they had searched unto the children of Israel, saying, The land, through which we have gone to search it, is a land that eateth up the inhabitants thereof; and all the people that we saw in it are men of a great stature.

33     And there we saw the giants, the sons of Anak, which come of the giants: and we were in our own sight as grasshoppers, and so we were in their sight.

3. गिनती 14: 6-9, 26, 27, 30

6     और नून का पुत्र यहोशू और यपुन्ने का पुत्र कालिब, जो देश के भेद लेने वालों में से थे, अपने अपने वस्त्र फाड़कर,

7     इस्त्राएलियों की सारी मण्डली से कहने लगे, कि जिस देश का भेद लेने को हम इधर उधर घूम कर आए हैं, वह अत्यन्त उत्तम देश है।

8     यदि यहोवा हम से प्रसन्न हो, तो हम को उस देश में, जिस में दूध और मधु की धाराएं बहती हैं, पहुंचाकर उसे हमे दे देगा।

9     केवल इतना करो कि तुम यहोवा के विरुद्ध बलवा न करो; और न तो उस देश के लोगों से डरो, क्योंकि वे हमारी रोटी ठहरेंगे; छाया उनके ऊपर से हट गई है, और यहोवा हमारे संग है; उन से न डरो।

26     फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा,

27     यह बुरी मण्डली मुझ पर बुड़बुड़ाती रहती है, उसको मैं कब तक सहता रहूं? इस्त्राएली जो मुझ पर बुड़बुड़ाते रहते हैं, उनका यह बुड़बुड़ाना मैं ने तो सुना है।

30     उस में से यपुन्ने के पुत्र कालिब और नून के पुत्र यहोशू को छोड़ कोई भी उस देश में न जाने पाएगा, जिसके विषय मैं ने शपथ खाई है कि तुम को उस में बसाऊंगा।

3. Numbers 14 : 6-9, 26, 27, 30

6     And Joshua the son of Nun, and Caleb the son of Jephunneh, which were of them that searched the land, rent their clothes:

7     And they spake unto all the company of the children of Israel, saying, The land, which we passed through to search it, is an exceeding good land.

8 If the Lord delight in us, then he will bring us into this land, and give it us; a land which floweth with milk and honey.

9     Only rebel not ye against the Lord, neither fear ye the people of the land; for they are bread for us: their defence is departed from them, and the Lord is with us: fear them not.

26     And the Lord spake unto Moses and unto Aaron, saying,

27     How long shall I bear with this evil congregation, which murmur against me? I have heard the murmurings of the children of Israel, which they murmur against me.

30     Doubtless ye shall not come into the land, concerning which I sware to make you dwell therein, save Caleb the son of Jephunneh, and Joshua the son of Nun.

4. व्यवस्थाविवरण 31: 1-3 (से 2nd,), 3 (और यहोशू), 6-8

1     और मूसा ने जा कर यह बातें सब इस्रएलियों को सुनाईं।

2     और उसने उन से यह भी कहा, कि आज मैं एक सौ बीस वर्ष का हूं; और अब मैं चल फिर नहीं सकता; क्योंकि यहोवा ने मुझ से कहा है, कि तू इस यरदन पार नहीं जाने पाएगा।

3     तेरे आगे पार जाने वाला तेरा परमेश्वर यहोवा ही है ...और यहोवा के वचन के अनुसार यहोशू तेरे आगे आगे पार जाएगा।

6     तू हियाव बान्ध और दृढ़ हो, उन से न डर और न भयभीत हो; क्योंकि तेरे संग चलने वाला तेरा परमेश्वर यहोवा है; वह तुझ को धोखा न देगा और न छोड़ेगा।

7     तब मूसा ने यहोशू को बुलाकर सब इस्राएलियों के सम्मुख कहा, कि तू हियाव बान्ध और दृढ़ हो जा; क्योंकि इन लोगों के संग उस देश में जिसे यहोवा ने इनके पूर्वजों से शपथ खाकर देने को कहा था तू जाएगा; और तू इन को उसका अधिकारी कर देगा।

8     और तेरे आगे आगे चलने वाला यहोवा है; वह तेरे संग रहेगा, और न तो तुझे धोखा देगा और न छोड़ देगा; इसलिये मत डर और तेरा मन कच्चा न हो॥

4. Deuteronomy 31 : 1-3 (to 2nd ,), 3 (and Joshua), 6-8

1     And Moses went and spake these words unto all Israel.

2     And he said unto them, I am an hundred and twenty years old this day; I can no more go out and come in: also the Lord hath said unto me, Thou shalt not go over this Jordan.

3     The Lord thy God, he will go over before thee, … and Joshua, he shall go over before thee, as the Lord hath said.

6     Be strong and of a good courage, fear not, nor be afraid of them: for the Lord thy God, he it is that doth go with thee; he will not fail thee, nor forsake thee.

7     And Moses called unto Joshua, and said unto him in the sight of all Israel, Be strong and of a good courage: for thou must go with this people unto the land which the Lord hath sworn unto their fathers to give them; and thou shalt cause them to inherit it.

8     And the Lord, he it is that doth go before thee; he will be with thee, he will not fail thee, neither forsake thee: fear not, neither be dismayed.

5. यहोशू 3: 7

7     तब यहोवा ने यहोशू से कहा, आज के दिन से मैं सब इस्राएलियों के सम्मुख तेरी प्रशंसा करना आरम्भ करूंगा, जिस से वे जान लें कि जैसे मैं मूसा के संग रहता था वैसे ही मैं तेरे संग भी हूं।

5. Joshua 3 : 7

7     And the Lord said unto Joshua, This day will I begin to magnify thee in the sight of all Israel, that they may know that, as I was with Moses, so I will be with thee.

6. यशायाह 40: 28-31

28     क्या तुम नहीं जानते? क्या तुम ने नहीं सुना? यहोवा जो सनातन परमेश्वर और पृथ्वी भर का सिरजनहार है, वह न थकता, न श्रमित होता है, उसकी बुद्धि अगम है।

29     वह थके हुए को बल देता है और शक्तिहीन को बहुत सामर्थ देता है।

30     तरूण तो थकते और श्रमित हो जाते हैं, और जवान ठोकर खाकर गिरते हैं;

31     परन्तु जो यहोवा की बाट जोहते हैं, वे नया बल प्राप्त करते जाएंगे, वे उकाबों की नाईं उड़ेंगे, वे दौड़ेंगे और श्रमित न होंगे, चलेंगे और थकित न होंगे॥

6. Isaiah 40 : 28-31

28     Hast thou not known? hast thou not heard, that the everlasting God, the Lord, the Creator of the ends of the earth, fainteth not, neither is weary? there is no searching of his understanding.

29     He giveth power to the faint; and to them that have no might he increaseth strength.

30     Even the youths shall faint and be weary, and the young men shall utterly fall:

31     But they that wait upon the Lord shall renew their strength; they shall mount up with wings as eagles; they shall run, and not be weary; and they shall walk, and not faint.

7. 1 पतरस 5: 6-9 (से,), 10

6     इसलिये परमेश्वर के बलवन्त हाथ के नीचे दीनता से रहो, जिस से वह तुम्हें उचित समय पर बढ़ाए।

7     और अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उस को तुम्हारा ध्यान है।

8     सचेत हो, और जागते रहो, क्योंकि तुम्हारा विरोधी शैतान गर्जने वाले सिंह की नाईं इस खोज में रहता है, कि किस को फाड़ खाए।

9     विश्वास में दृढ़ हो कर।

10     अब परमेश्वर जो सारे अनुग्रह का दाता है, जिस ने तुम्हें मसीह में अपनी अनन्त महिमा के लिये बुलाया, तुम्हारे थोड़ी देर तक दुख उठाने के बाद आप ही तुम्हें सिद्ध और स्थिर और बलवन्त करेगा।

7. I Peter 5 : 6-9 (to ,), 10

6 Humble yourselves therefore under the mighty hand of God, that he may exalt you in due time:

7     Casting all your care upon him; for he careth for you.

8     Be sober, be vigilant; because your adversary the devil, as a roaring lion, walketh about, seeking whom he may devour:

9     Whom resist stedfast in the faith,

10     But the God of all grace, who hath called us unto his eternal glory by Christ Jesus, after that ye have suffered a while, make you perfect, stablish, strengthen, settle you.

8. यशायाह 30: 15 (से :)

15     प्रभु यहोवा, इस्राएल का पवित्र यों कहता है, लौट आने और शान्त रहने में तुम्हारा उद्धार है; शान्त रहते और भरोसा रखने में तुम्हारी वीरता है।

8. Isaiah 30 : 15 (to :)

15     For thus saith the Lord God, the Holy One of Israel; In returning and rest shall ye be saved; in quietness and in confidence shall be your strength.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 203: 32 (भगवान अकेले)

ईश्वर ही मनुष्य का जीवन है।

1. 203 : 32 (God alone)

God alone is man's life.

2. 228: 25(केवल)

ईश्वर से अलग कोई शक्ति नहीं है।

2. 228 : 25(only)

There is no power apart from God.

3. 183: 16-25

अस्थायी कानून, जिसके परिणामस्वरूप परेशानी और बीमारी होती है, उनके कानून नहीं हैं, सत्य के वैध और एकमात्र संभव कार्य के लिए सद्भाव का उत्पादन है। प्रकृति के नियम आत्मा के नियम हैं; लेकिन नश्वर आमतौर पर कानून के रूप में पहचानते हैं जो आत्मा की शक्ति को छुपाता है। डिवाइन माइंड सही ढंग से मनुष्य की संपूर्ण आज्ञाकारिता, स्नेह और शक्ति की माँग करता है। किसी भी कम निष्ठा के लिए कोई आरक्षण नहीं किया जाता है। सत्य का पालन मनुष्य को शक्ति और सामर्थ्य देता है। त्रुटि के अधीन होने से शक्ति का नुकसान होता है।

3. 183 : 16-25

The supposed laws which result in weariness and disease are not His laws, for the legitimate and only possible action of Truth is the production of harmony. Laws of nature are laws of Spirit; but mortals commonly recognize as law that which hides the power of Spirit. Divine Mind rightly demands man's entire obedience, affection, and strength. No reservation is made for any lesser loyalty. Obedience to Truth gives man power and strength. Submission to error superinduces loss of power.

4. 262: 9-16

हम नश्वर विश्वास के उथलेपन में गोता लगाकर ईश्वर की रचना की प्रकृति और गुणवत्ता को थाह नहीं दे सकते। हमें जीवन में सत्य और भौतिकता को खोजने के अपने अथक स्पंदन को उलट देना चाहिए - और ईश्वर के अमर विचार के लिए नश्वर से ऊपर, भौतिक इंद्रियों की गवाही से ऊपर उठना होगा। ये स्पष्ट, उच्च विचार भगवान-जैसे मनुष्य को उसके अस्तित्व के पूर्ण केंद्र और सीमा तक पहुंचने के लिए प्रेरित करते हैं।

4. 262 : 9-16

We cannot fathom the nature and quality of God's creation by diving into the shallows of mortal belief. We must reverse our feeble flutterings — our efforts to find life and truth in matter — and rise above the testimony of the material senses, above the mortal to the immortal idea of God. These clearer, higher views inspire the Godlike man to reach the absolute centre and circumference of his being.

5. 192: 17-31

नैतिक और आध्यात्मिक आत्मा से संबंधित हो सकते हैं, जो "मुट्ठी में हवा" रखता है; और यह शिक्षण विज्ञान और सद्भाव के साथ उच्चारण करता है। विज्ञान में, आपके पास भगवान के विपरीत कोई शक्ति नहीं हो सकती है, और शारीरिक इंद्रियों को अपनी झूठी गवाही देनी चाहिए। अच्छे के लिए आपका प्रभाव आपके द्वारा सही पैमाने पर फेंके गए वजन पर निर्भर करता है। आप जो अच्छा करते हैं और अवतार लेते हैं वह आपको एकमात्र शक्ति प्राप्त करने योग्य बनाता है। बुराई शक्ति नहीं है। यह ताकत का मजाक है, जो अपनी कमजोरी को मिटाता है और गिरता है, कभी नहीं उठता।

हम ईश्वरीय तत्वमीमांसा की समझ में अपने गुरु के उदाहरण का अनुसरण करके सत्य और प्रेम के नक्शेकदम पर चलते हैं। ईसाई धर्म सच्ची चिकित्सा का आधार है। जो कुछ भी मानव विचार को निःस्वार्थ प्रेम के अनुरूप रखता है, वह सीधे दैवीय शक्ति प्राप्त करता है।

5. 192 : 17-31

Moral and spiritual might belong to Spirit, who holds the "wind in His fists;" and this teaching accords with Science and harmony. In Science, you can have no power opposed to God, and the physical senses must give up their false testimony. Your influence for good depends upon the weight you throw into the right scale. The good you do and embody gives you the only power obtainable. Evil is not power. It is a mockery of strength, which erelong betrays its weakness and falls, never to rise.

We walk in the footsteps of Truth and Love by following the example of our Master in the understanding of divine metaphysics. Christianity is the basis of true healing. Whatever holds human thought in line with unselfed love, receives directly the divine power.

6. 193: 32-2

मुझे यह दिखाया गया है कि जीवन ही ईश्वर है और सर्वशक्तिमान आत्मा की शक्ति पदार्थ या मानवीय इच्छा के साथ अपनी शक्ति साझा नहीं करती है।

6. 193 : 32-2

It has been demonstrated to me that Life is God and that the might of omnipotent Spirit shares not its strength with matter or with human will.

7. 426: 9-11

सत्य के लिए संघर्ष एक को कमजोर बनाने के बजाय मजबूत बनाता है, एक को पहनने के बजाय आराम करता है।

7. 426 : 9-11

The struggle for Truth makes one strong instead of weak, resting instead of wearying one.

8. 97: 5-7, 21-25

वास्तव में, अधिक निकट त्रुटि सच्चाई का अनुकरण करती है और तथाकथित मामला अपने सार, नश्वर मन जैसा दिखता है, उतना ही नपुंसक त्रुटि विश्वास के रूप में बन जाता है।

व्यापक तथ्यों में खुद के खिलाफ सबसे अधिक गलतियाँ हैं, क्योंकि वे कवर के तहत त्रुटि लाते हैं। सत्य बोलने के लिए साहस चाहिए; क्योंकि जितनी अधिक शनि अपनी आवाज उठाएगा, संभावना उतनी ही जोर से चिल्लाएगी, जब तक कि इसकी पूर्व ध्वनि हमेशा के लिए तिरनामी में चुप नहीं जाए।

8. 97 : 5-7, 21-25

In reality, the more closely error simulates truth and so-called matter resembles its essence, mortal mind, the more impotent error becomes as a belief.

The broadest facts array the most falsities against themselves, for they bring error from under cover. It requires courage to utter truth; for the higher Truth lifts her voice, the louder will error scream, until its inarticulate sound is forever silenced in oblivion.

9. 514: 10-18

नैतिक साहस "यहूदा के गोत्र का शेर है," मानसिक दायरे के राजा। मुक्त और निडर यह जंगल में घूमता है। यह खुले मैदान में निहित है, या "हरे चरागाहों में रहता है, ... शांत पानी के बगल में।" दिव्य से मानव के लिए लाक्षणिक संचरण में, परिश्रम, मुस्तैदी और दृढ़ता की तुलना "एक हजार पहाड़ियों पर मवेशियों" से की जाती है। वे कठोर संकल्प का सामान ले जाते हैं, और उच्चतम उद्देश्य के साथ तालमेल रखते हैं।

9. 514 : 10-18

Moral courage is "the lion of the tribe of Juda," the king of the mental realm. Free and fearless it roams in the forest. Undisturbed it lies in the open field, or rests in "green pastures, ... beside the still waters." In the figurative transmission from the divine thought to the human, diligence, promptness, and perseverance are likened to "the cattle upon a thousand hills." They carry the baggage of stern resolve, and keep pace with highest purpose.

10. 28: 32-6

समाज में बहुत अधिक पशु साहस है और पर्याप्त नैतिक साहस नहीं है। ईसाईयों को देश और विदेश में त्रुटि के खिलाफ हथियार उठाने चाहिए उन्हें स्वयं में और दूसरों में पाप से जूझना चाहिए, और इस युद्ध को तब तक जारी रखें जब तक वे अपना कोर्स पूरा नहीं कर लेते। यदि वे विश्वास बनाए रखेंगे, तो उनके पास आनन्द का ताज होगा।

10. 28 : 32-6

There is too much animal courage in society and not sufficient moral courage. Christians must take up arms against error at home and abroad. They must grapple with sin in themselves and in others, and continue this warfare until they have finished their course. If they keep the faith, they will have the crown of rejoicing.

11. 417: 5-10

बीमारों को यह कभी न बताएं कि उनमें ताकत से ज्यादा साहस है। बल्कि उन्हें बताएं कि उनकी ताकत उनके साहस के अनुपात में है। यदि आप बीमार को इस महान सत्य का एहसास करा दें, तो अत्यधिक परिश्रम या उत्तेजना की स्थिति से कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी।

11. 417 : 5-10

Never tell the sick that they have more courage than strength. Tell them rather, that their strength is in proportion to their courage. If you make the sick realize this great truism, there will be no reaction from overexertion or from excited conditions.

12. 455: 3-6, 8-16

आत्म-निंदा और अपराधबोध की मानसिक स्थिति या सत्य में डगमगाता और संदेह करने वाला विश्वास बीमार को ठीक करने के लिए अनुपयुक्त स्थितियाँ हैं। ऐसी मानसिक स्थितियाँ ताकत की बजाय कमज़ोरी का संकेत देती हैं। … आपको त्रुटि की लहरों पर चलने और प्रदर्शन द्वारा अपने दावों का समर्थन करने के लिए मन की नैतिक शक्ति का उपयोग करना चाहिए। यदि आप स्वयं बीमारी या पाप के विश्वास और भय में खोए हुए हैं, और यदि, उपाय जानने के बाद, आप अपनी ओर से मन की ऊर्जा का उपयोग करने में विफल रहते हैं, तो आप दूसरों की मदद के लिए बहुत कम या बिल्कुल भी शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकते हैं। "पहले अपनी आंख में से लट्ठा निकाल ले, तब तू अपने भाई की आंख का तिनका भली भांति देखकर निकाल सकेगा॥"

12. 455 : 3-6, 8-16

A mental state of self-condemnation and guilt or a faltering and doubting trust in Truth are unsuitable conditions for healing the sick. Such mental states indicate weakness instead of strength. … You must utilize the moral might of Mind in order to walk over the waves of error and support your claims by demonstration. If you are yourself lost in the belief and fear of disease or sin, and if, knowing the remedy, you fail to use the energies of Mind in your own behalf, you can exercise little or no power for others' help. "First cast out the beam out of thine own eye; and then shalt thou see clearly to cast out the mote out of thy brother's eye."

13. 387: 8 (कब)-12, 18-24

… जब हमें पता चलता है कि अमर मन कभी सक्रिय है, और यह कि आध्यात्मिक ऊर्जा न तो बाहर पहन सकती है और न ही ईश्वर प्रदत्त शक्तियों और संसाधनों पर तथाकथित भौतिक कानून को लागू कर सकती है, हम सत्य में आराम करने में सक्षम हैं, अमरता के आश्वासन से ताज़ा, मृत्यु दर के विरोध में।

वह व्यक्ति कठोर दंड नहीं भुगतता जो सबसे अच्छा कार्य करता है। शाश्वत अस्तित्व की वास्तविकताओं का पालन करके, - इस असंगत धारणा पर विवेचन पढ़ने के बजाय कि मृत्यु जीवन के नियम का पालन करने पर आती है, और भगवान मनुष्य को अच्छा करने के लिए दंडित करते हैं, - कोई भी प्रेम के किसी भी श्रम के परिणाम के रूप में पीड़ित नहीं हो सकता है , लेकिन इसकी वजह से मजबूत होता है।

13. 387 : 8 (when)-12, 18-24

…when we realize that immortal Mind is ever active, and that spiritual energies can neither wear out nor can so-called material law trespass upon God-given powers and resources, we are able to rest in Truth, refreshed by the assurances of immortality, opposed to mortality.

That man does not pay the severest penalty who does the most good. By adhering to the realities of eternal existence, — instead of reading disquisitions on the inconsistent supposition that death comes in obedience to the law of life, and that God punishes man for doing good, — one cannot suffer as the result of any labor of love, but grows stronger because of it.

14. 79: 29-5

माइंड-साइंस सिखाता है कि मनुष्यों को "अच्छे कामों में थके हुए नहीं होना चाहिए।" यह अच्छा करने में थकावट दूर करता है। देने से हमें अपने निर्माता की सेवा में कमजोर नहीं पड़ता है, और न ही हमें समृद्ध बनाता है। हमारे पास सत्य के बारे में हमारी आशंका के अनुपात में ताकत है, और सच्चाई को प्रदर्शन देने से हमारी ताकत कम नहीं है। एक कप कॉफी या चाय सत्य के बराबर नहीं है, चाहे उपदेश की प्रेरणा के लिए हो या शारीरिक सहनशक्ति के समर्थन के लिए।

14. 79 : 29-5

Mind-science teaches that mortals need "not be weary in well doing." It dissipates fatigue in doing good. Giving does not impoverish us in the service of our Maker, neither does withholding enrich us. We have strength in proportion to our apprehension of the truth, and our strength is not lessened by giving utterance to truth. A cup of coffee or tea is not the equal of truth, whether for the inspiration of a sermon or for the support of bodily endurance.

15. 249: 6-10

आइए हम आत्मा की दिव्य ऊर्जा को महसूस करें, हमें जीवन के नएपन में लाएं और किसी भी नश्वर और भौतिक शक्ति को नष्ट करने में सक्षम न होने को पहचानें। आइए हम आनन्दित हों कि हम दैवीय शक्तियों के अधीन हैं। होने का सही विज्ञान ऐसा है।

15. 249 : 6-10

Let us feel the divine energy of Spirit, bringing us into newness of life and recognizing no mortal nor material power as able to destroy. Let us rejoice that we are subject to the divine "powers that be." Such is the true Science of being.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6