रविवार 21 अप्रैल, 2019 |

रविवार 21 अप्रैल, 2019



विषयप्रायश्चित का सिद्धांत

SubjectDoctrine of Atonement

वर्ण पाठ: यूहन्ना 14 : 9, 11

Golden Text: John 14 : 9, 11



यीशु ने कहा; मेरी ही प्रतीति करो, कि मैं पिता में हूं; और पिता मुझ में है; नहीं तो कामों ही के कारण मेरी प्रतीति करो।

Jesus saith, Believe me that I am in the Father, and the Father in me: or else believe me for the very works’ sake.




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प्रकाशित वाक्य 19 : 11-16

Responsive Reading: Revelation 19 : 11-16


11     फिर मैं ने स्वर्ग को खुला हुआ देखा; और देखता हूं कि एक श्वेत घोड़ा है; और उस पर एक सवार है, जो विश्वास योग्य, और सत्य कहलाता है; और वह धर्म के साथ न्याय और लड़ाई करता है।

12     उस की आंखे आग की ज्वाला हैं: और उसके सिर पर बहुत से राजमुकुट हैं; और उसका एक नाम लिखा है, जिस उस को छोड़ और कोई नहीं जानता।

13     और वह लोहू से छिड़का हुआ वस्त्र पहिने है: और उसका नाम परमेश्वर का वचन है।

14     और स्वर्ग की सेना श्वेत घोड़ों पर सवार और श्वेत और शुद्ध मलमल पहिने हुए उसके पीछे पीछे है।

15     और जाति जाति को मारने के लिये उसके मुंह से एक चोखी तलवार निकलती है, और वह लोहे का राजदण्ड लिए हुए उन पर राज्य करेगा, और वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के भयानक प्रकोप की जलजलाहट की मदिरा के कुंड में दाख रौंदेगा।

16     और उसके वस्त्र और जांघ पर यह नाम लिखा है, राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु॥

11.     And I saw heaven opened, and behold a white horse; and he that sat upon him was called Faithful and True, and in righteousness he doth judge and make war.

12.     His eyes were as a flame of fire, and on his head were many crowns; and he had a name written, that no man knew, but he himself.

13.     And he was clothed with a vesture dipped in blood: and his name is called The Word of God.

14.     And the armies which were in heaven followed him upon white horses, clothed in fine linen, white and clean.

15.     And out of his mouth goeth a sharp sword, that with it he should smite the nations: and he shall rule them with a rod of iron: and he treadeth the winepress of the fierceness and wrath of Almighty God.

16.     And he hath on his vesture and on his thigh a name written, KING OF KINGS, AND LORD OF LORDS.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 91 : 1, 2, 10, 11, 14-16

1     जो परमप्रधान के छाए हुए स्थान में बैठा रहे, वह सर्वशक्तिमान की छाया में ठिकाना पाएगा।

2     मैं यहोवा के विषय कहूंगा, कि वह मेरा शरणस्थान और गढ़ है; वह मेरा परमेश्वर है, मैं उस पर भरोसा रखूंगा।

10     इसलिये कोई विपत्ति तुझ पर न पड़ेगी, न कोई दु:ख तेरे डेरे के निकट आएगा॥

11     क्योंकि वह अपने दूतों को तेरे निमित्त आज्ञा देगा, कि जहां कहीं तू जाए वे तेरी रक्षा करें।

14     उसने जो मुझ से स्नेह किया है, इसलिये मैं उसको छुड़ाऊंगा; मैं उसको ऊंचे स्थान पर रखूंगा, क्योंकि उसने मेरे नाम को जान लिया है।

15     जब वह मुझ को पुकारे, तब मैं उसकी सुनूंगा; संकट में मैं उसके संग रहूंगा, मैं उसको बचा कर उसकी महिमा बढ़ाऊंगा।

16     मैं उसको दीर्घायु से तृप्त करूंगा, और अपने किए हुए उद्धार का दर्शन दिखाऊंगा॥

1. Psalm 91 : 1, 2, 10, 11, 14-16

1     He that dwelleth in the secret place of the most High shall abide under the shadow of the Almighty.

2     I will say of the Lord, He is my refuge and my fortress: my God; in him will I trust.

10     There shall no evil befall thee, neither shall any plague come nigh thy dwelling.

11     For he shall give his angels charge over thee, to keep thee in all thy ways.

14     Because he hath set his love upon me, therefore will I deliver him: I will set him on high, because he hath known my name.

15     He shall call upon me, and I will answer him: I will be with him in trouble; I will deliver him, and honour him.

16     With long life will I satisfy him, and shew him my salvation.

2. यूहन्ना 17 : 1, 4, 11

1     यीशु ने ये बातें कहीं और अपनी आंखे आकाश की ओर उठाकर कहा, हे पिता, वह घड़ी आ पहुंची, अपने पुत्र की महिमा कर, कि पुत्र भी तेरी महिमा करे।

4     जो काम तू ने मुझे करने को दिया था, उसे पूरा करके मैं ने पृथ्वी पर तेरी महिमा की है।

11     मैं आगे को जगत में न रहूंगा, परन्तु ये जगत में रहेंगे, और मैं तेरे पास आता हूं; हे पवित्र पिता, अपने उस नाम से जो तू ने मुझे दिया है, उन की रक्षा कर, कि वे हमारी नाईं एक हों।

2. John 17 : 1, 4, 11

1     These words spake Jesus, and lifted up his eyes to heaven, and said, Father, the hour is come; glorify thy Son, that thy Son also may glorify thee:

4     I have glorified thee on the earth: I have finished the work which thou gavest me to do.

11     And now I am no more in the world, but these are in the world, and I come to thee. Holy Father, keep through thine own name those whom thou hast given me, that they may be one, as we are.

3. मत्ती 27 : 1, 11-19, 22-24, 26-29, 33, 35 (वे) (से 1st ,)

1     जब भोर हुई, तो सब महायाजकों और लोगों के पुरनियों ने यीशु के मार डालने की सम्मति की।

11     जब यीशु हाकिम के साम्हने खड़ा था, तो हाकिम ने उस से पूछा; कि क्या तू यहूदियों का राजा है? यीशु ने उस से कहा, तू आप ही कह रहा है।

12     जब महायाजक और पुरिनए उस पर दोष लगा रहे थे, तो उस ने कुछ उत्तर नहीं दिया।

13     इस पर पीलातुस ने उस से कहा: क्या तू नहीं सुनता, कि ये तेरे विरोध में कितनी गवाहियां दे रहे हैं?

14     परन्तु उस ने उस को एक बात का भी उत्तर नहीं दिया, यहां तक कि हाकिम को बड़ा आश्चर्य हुआ।

15     और हाकिम की यह रीति थी, कि उस पर्व्व में लोगों के लिये किसी एक बन्धुए को जिसे वे चाहते थे, छोड़ देता था।

16     उस समय बरअब्बा नाम उन्हीं में का एक नामी बन्धुआ था।

17     सो जब वे इकट्ठे हुए, तो पीलातुस ने उन से कहा; तुम किस को चाहते हो, कि मैं तुम्हारे लिये छोड़ दूं? बरअब्बा को, या यीशु को जो मसीह कहलाता है?

18     क्योंकि वह जानता था कि उन्होंने उसे डाह से पकड़वाया है।

19     जब वह न्याय की गद्दी पर बैठा हुआ था तो उस की पत्नी ने उसे कहला भेजा, कि तू उस धर्मी के मामले में हाथ न डालना; क्योंकि मैं ने आज स्वप्न में उसके कारण बहुत दुख उठाया है।

22     पीलातुस ने उन से पूछा; फिर यीशु को जो मसीह कहलाता है, क्या करूं? सब ने उस से कहा, वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।

23     हाकिम ने कहा; क्यों उस ने क्या बुराई की है? परन्तु वे और भी चिल्ला, चिल्लाकर कहने लगे, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए”।

24     जब पीलातुस ने देखा, कि कुछ बन नहीं पड़ता परन्तु इस के विपरीत हुल्लड़ होता जाता है, तो उस ने पानी लेकर भीड़ के साम्हने अपने हाथ धोए, और कहा; मैं इस धर्मी के लोहू से निर्दोष हूं; तुम ही जानो।

26     इस पर उस ने बरअब्बा को उन के लिये छोड़ दिया, और यीशु को कोड़े लगवाकर सौंप दिया, कि क्रूस पर चढ़ाया जाए॥

27     तब हाकिम के सिपाहियों ने यीशु को किले में ले जाकर सारी पलटन उसके चहुं ओर इकट्ठी की।

28     और उसके कपड़े उतारकर उसे किरिमजी बागा पहिनाया।

29     और काटों को मुकुट गूंथकर उसके सिर पर रखा; और उसके दाहिने हाथ में सरकण्डा दिया और उसके आगे घुटने टेककर उसे ठट्ठे में उड़ाने लगे, कि हे यहूदियों के राजा नमस्कार।

33     और उस स्थान पर जो गुलगुता नाम की जगह अर्थात खोपड़ी का स्थान कहलाता है पहुंचकर।

35     ... तब उन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाया;

3. Matthew 27 : 1, 11-19, 22-24, 26-29, 33, 35 (they) (to 1st ,)

1     When the morning was come, all the chief priests and elders of the people took counsel against Jesus to put him to death:

11     And Jesus stood before the governor: and the governor asked him, saying, Art thou the King of the Jews? And Jesus said unto him, Thou sayest.

12     And when he was accused of the chief priests and elders, he answered nothing.

13     Then said Pilate unto him, Hearest thou not how many things they witness against thee?

14     And he answered him to never a word; insomuch that the governor marvelled greatly.

15     Now at that feast the governor was wont to release unto the people a prisoner, whom they would.

16     And they had then a notable prisoner, called Barabbas.

17     Therefore when they were gathered together, Pilate said unto them, Whom will ye that I release unto you? Barabbas, or Jesus which is called Christ?

18     For he knew that for envy they had delivered him.

19     When he was set down on the judgment seat, his wife sent unto him, saying, Have thou nothing to do with that just man: for I have suffered many things this day in a dream because of him.

22     Pilate saith unto them, What shall I do then with Jesus which is called Christ? They all say unto him, Let him be crucified.

23     And the governor said, Why, what evil hath he done? But they cried out the more, saying, Let him be crucified.

24     When Pilate saw that he could prevail nothing, but that rather a tumult was made, he took water, and washed his hands before the multitude, saying, I am innocent of the blood of this just person: see ye to it.

26     Then released he Barabbas unto them: and when he had scourged Jesus, he delivered him to be crucified.

27     Then the soldiers of the governor took Jesus into the common hall, and gathered unto him the whole band of soldiers.

28     And they stripped him, and put on him a scarlet robe.

29     And when they had platted a crown of thorns, they put it upon his head, and a reed in his right hand: and they bowed the knee before him, and mocked him, saying, Hail, King of the Jews!

33     And when they were come unto a place called Golgotha, that is to say, a place of a skull,

35     …they crucified him,

4. मरकुस 16 : 1-9, 14, 15, 17-20

1     जब सब्त का दिन बीत गया, तो मरियम मगदलीनी और याकूब की माता मरियम और शलोमी ने सुगन्धित वस्तुएं मोल लीं, कि आकर उस पर मलें।

2     और सप्ताह के पहिले दिन बड़ी भोर, जब सूरज निकला ही था, वे कब्र पर आईं।

3     और आपस में कहती थीं, कि हमारे लिये कब्र के द्वार पर से पत्थर कौन लुढ़ाएगा?

4     जब उन्होंने आंख उठाई, तो देखा कि पत्थर लुढ़का हुआ है! क्योंकि वह बहुत ही बड़ा था।

5     और कब्र के भीतर जाकर, उन्होंने एक जवान को श्वेत वस्त्र पहिने हुए दाहिनी ओर बैठे देखा, और बहुत चकित हुईं।

6     उस ने उन से कहा, चकित मत हो, तुम यीशु नासरी को, जो क्रूस पर चढ़ाया गया था, ढूंढ़ती हो: वह जी उठा है; यहां नहीं है; देखो, यही वह स्थान है, जहां उन्होंने उसे रखा था।

7     परन्तु तुम जाओ, और उसके चेलों और पतरस से कहो, कि वह तुम से पहिले गलील को जाएगा; जैसा उस ने तुम से कहा था, तुम वहीं उसे देखोगे।

8     और वे निकलकर कब्र से भाग गईं; क्योंकि कपकपी और घबराहट उन पर छा गई थीं और उन्होंने किसी से कुछ न कहा, क्योंकि डरती थीं॥

9     सप्ताह के पहिले दिन भोर होते ही वह जी उठ कर पहिले पहिल मरियम मगदलीनी को जिस में से उस ने सात दुष्टात्माएं निकाली थीं, दिखाई दिया।

14     पीछे वह उन ग्यारहों को भी, जब वे भोजन करने बैठे थे दिखाई दिया, और उन के अविश्वास और मन की कठोरता पर उलाहना दिया, क्योंकि जिन्हों ने उसके जी उठने के बाद उसे देखा था, इन्होंने उन की प्रतीति न की थी।

15     और उस ने उन से कहा, तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो।

17     और विश्वास करने वालों में ये चिन्ह होंगे कि वे मेरे नाम से दुष्टात्माओं को निकालेंगे।

18     नई नई भाषा बोलेंगे, सांपों को उठा लेंगे, और यदि वे नाशक वस्तु भी पी जांए तौभी उन की कुछ हानि न होगी, वे बीमारों पर हाथ रखेंगे, और वे चंगे हो जाएंगे।

19     निदान प्रभु यीशु उन से बातें करने के बाद स्वर्ग पर उठा लिया गया, और परमेश्वर की दाहिनी ओर बैठ गया।

20     और उन्होंने निकलकर हर जगह प्रचार किया, और प्रभु उन के साथ काम करता रहा, और उन चिन्हों के द्वारा जो साथ साथ होते थे वचन को, दृढ़ करता रहा। आमीन॥

4. Mark 16 : 1-9, 14, 15, 17-20

1     And when the sabbath was past, Mary Magdalene, and Mary the mother of James, and Salome, had bought sweet spices, that they might come and anoint him.

2     And very early in the morning the first day of the week, they came unto the sepulchre at the rising of the sun.

3     And they said among themselves, Who shall roll us away the stone from the door of the sepulchre?

4     And when they looked, they saw that the stone was rolled away: for it was very great.

5     And entering into the sepulchre, they saw a young man sitting on the right side, clothed in a long white garment; and they were affrighted.

6     And he saith unto them, Be not affrighted: Ye seek Jesus of Nazareth, which was crucified: he is risen; he is not here: behold the place where they laid him.

7     But go your way, tell his disciples and Peter that he goeth before you into Galilee: there shall ye see him, as he said unto you.

8     And they went out quickly, and fled from the sepulchre; for they trembled and were amazed: neither said they any thing to any man; for they were afraid.

9     Now when Jesus was risen early the first day of the week, he appeared first to Mary Magdalene, out of whom he had cast seven devils.

14     Afterward he appeared unto the eleven as they sat at meat, and upbraided them with their unbelief and hardness of heart, because they believed not them which had seen him after he was risen.

15     And he said unto them, Go ye into all the world, and preach the gospel to every creature.

17     And these signs shall follow them that believe; In my name shall they cast out devils; they shall speak with new tongues;

18     They shall take up serpents; and if they drink any deadly thing, it shall not hurt them; they shall lay hands on the sick, and they shall recover.

19     So then after the Lord had spoken unto them, he was received up into heaven, and sat on the right hand of God.

20     And they went forth, and preached every where, the Lord working with them, and confirming the word with signs following. Amen.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 361: 16-20

जैसे पानी की एक बूंद सागर के साथ है, सूर्य के साथ प्रकाश की एक किरण, यहां तक कि भगवान और मनुष्य, पिता और पुत्र, अस्तित्व में एक हैं। शास्त्र कहता है: "क्योंकि हम उसी में जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं."

1. 361 : 16-20

As a drop of water is one with the ocean, a ray of light one with the sun, even so God and man, Father and son, are one in being. The Scripture reads: "For in Him we live, and move, and have our being."

2. 18 : 1-12

प्रायश्चित परमेश्वर के साथ मनुष्य की एकता का उदाहरण है, जिससे मनुष्य ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम को दर्शाता है। नासरत के यीशु ने पिता के साथ मनुष्य की एकता को सिखाया और प्रदर्शित किया, और इसके लिए हम उसे अंतहीन श्रद्धांजलि देते हैं। उनका मिशन व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों था। उन्होंने जीवन का काम न केवल स्वयं के प्रति न्याय में, बल्कि मनुष्यों पर दया करने में भी किया। यीशु ने निर्भीकता से, इंद्रियों के मान्यता प्राप्त सबूतों के खिलाफ, फरिसासिक पंथों और प्रथाओं के खिलाफ काम किया, और उन्होंने अपनी उपचार शक्ति के साथ सभी विरोधियों का खंडन किया।

2. 18 : 1-12

ATONEMENT is the exemplification of man's unity with God, whereby man reflects divine Truth, Life, and Love. Jesus of Nazareth taught and demonstrated man's oneness with the Father, and for this we owe him endless homage. His mission was both individual and collective. He did life's work aright not only in justice to himself, but in mercy to mortals, — to show them how to do theirs, but not to do it for them nor to relieve them of a single responsibility. Jesus acted boldly, against the accredited evidence of the senses, against Pharisaical creeds and practices, and he refuted all opponents with his healing power.

3. 20 : 16-23

"तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था," शाप के लिए आशीर्वाद वापस करके, उसने नश्वर को खुद के विपरीत, यहां तक कि भगवान की प्रकृति को सिखाया; और जब त्रुटि ने सत्य की शक्ति को महसूस किया, तो महापुरुष ने क्रॉस और क्रॉस का इंतजार किया। फिर भी उन्होंने यह नहीं कहा कि ईश्वरीय आदेश का पालन करना और ईश्वर पर भरोसा रखना, यह जानते हुए भी पाप से पवित्रता के मार्ग को बदलना और पीछे हटाना है।

3. 20 : 16-23

"Despised and rejected of men," returning blessing for cursing, he taught mortals the opposite of themselves, even the nature of God; and when error felt the power of Truth, the scourge and the cross awaited the great Teacher. Yet he swerved not, well knowing that to obey the divine order and trust God, saves retracing and traversing anew the path from sin to holiness.

4. 24 : 27-31

क्रूस की प्रभावकारिता व्यावहारिक स्नेह और भलाई में निहित है जो मानव जाति के लिए प्रदर्शित हुई। सच्चाई पुरुषों के बीच रह चुकी थी; लेकिन जब तक उन्होंने देखा कि इसने अपने गुरु को कब्र पर विजय प्राप्त करने के लिए सक्षम कर दिया है, तब तक उनके अपने शिष्य इस तरह के आयोजन को संभव नहीं मानते थे।

4. 24 : 27-31

The efficacy of the crucifixion lay in the practical affection and goodness it demonstrated for mankind. The truth had been lived among men; but until they saw that it enabled their Master to triumph over the grave, his own disciples could not admit such an event to be possible.

5. 34 : 18-9

अनुभवी सभी शिष्यों के माध्यम से, वे अधिक आध्यात्मिक हो गए और बेहतर समझा कि मास्टर ने क्या सिखाया था। उनका पुनरुत्थान भी उनका पुनरुत्थान था। इससे उन्हें खुद को और दूसरों को आध्यात्मिक नीरसता से दूर रखने और ईश्वर में असीम संभावनाओं की धारणा में अंधे होने में मदद मिली। उन्हें इस जल्दी की आवश्यकता थी, जल्द ही उनके प्रिय मास्टर वास्तविकता के आध्यात्मिक क्षेत्र में फिर से उठेंगे, और उनकी आशंका से बहुत ऊपर उठेंगे। अपने विश्वासयोग्य के लिए पुरस्कार के रूप में, वह उस परिवर्तन में भौतिक अर्थों के लिए गायब हो जाएगा जिसे तब से उदगम कहा जाता है।

गैलिलियन सागर के तट पर हर्षित बैठक में हमारे प्रभु के अंतिम भक्त और उनके अंतिम आध्यात्मिक नाश्ते के बीच उनके शिष्यों के साथ उज्ज्वल सुबह के घंटों में क्या विपरीत है! उसकी उदासी महिमा में पारित हो गई थी, और उसके शिष्यों के पश्चाताप में दु: ख, - दिलों का पीछा किया और गर्व ने डांटा। अंधेरे में अपने शौचालय के फलहीनता के प्रति आश्वस्त और अपने मास्टर की आवाज से जागृत, उन्होंने अपने तरीकों को बदल दिया, भौतिक चीजों से दूर हो गए, और दाईं ओर अपना जाल डाला। समय के किनारे पर मसीह, सत्य, नए सिरे से, वे नश्वर कामुकता से कुछ हद तक उठने में सक्षम थे, या मन में दफन आत्मा के रूप में जीवन के नएपन में।

5. 34 : 18-9

Through all the disciples experienced, they became more spiritual and understood better what the Master had taught. His resurrection was also their resurrection. It helped them to raise themselves and others from spiritual dulness and blind belief in God into the perception of infinite possibilities. They needed this quickening, for soon their dear Master would rise again in the spiritual realm of reality, and ascend far above their apprehension. As the reward for his faithfulness, he would disappear to material sense in that change which has since been called the ascension.

What a contrast between our Lord's last supper and his last spiritual breakfast with his disciples in the bright morning hours at the joyful meeting on the shore of the Galilean Sea! His gloom had passed into glory, and His disciples' grief into repentance, - hearts chastened and pride rebuked. Convinced of the fruitlessness of their toil in the dark and wakened by their Master's voice, they changed their methods, turned away from material things, and cast their net on the right side. Discerning Christ, Truth, anew on the shore of time, they were enabled to rise somewhat from mortal sensuousness, or the burial of mind in matter, into newness of life as Spirit.

6. 42 : 21-2

परमेश्वर के अभिषिक्त, प्रलोभन, पाप, बीमारी, और मृत्यु के कारण जो चमत्कारिक महिमा थी, उसके कारण यीशु के लिए कोई आतंक नहीं था। पुरुषों को लगता है कि उन्होंने शरीर को मार डाला! बाद में वह इसे उन्हें अपरिवर्तित दिखाएगा। यह दर्शाता है कि ईसाई विज्ञान में सच्चा मनुष्य ईश्वर द्वारा शासित है - अच्छाई से, बुराई से नहीं - और इसलिए वह नश्वर नहीं बल्कि अमर है। यीशु ने अपने शिष्यों को इस प्रमाण का विज्ञान पढ़ाया था। वह यहाँ था कि वह उन्हें अभी भी बिना सोचे समझे परीक्षण करने में सक्षम बनाता है, "कि जो मुझ पर विश्वास रखता है, ये काम जो मैं करता हूं वह भी करेगा" उन्हें पूरी तरह से अपने जीवन-सिद्धांत को गलती से कास्टिंग करना, बीमारों को चंगा करना, और मृतकों को उठाना चाहिए, यहां तक कि उन्होंने इसे उनके शारीरिक प्रस्थान के बाद भी समझा।

6. 42 : 21-2

Because of the wondrous glory which God bestowed on His anointed, temptation, sin, sickness, and death had no terror for Jesus. Let men think they had killed the body! Afterwards he would show it to them unchanged. This demonstrates that in Christian Science the true man is governed by God — by good, not evil — and is therefore not a mortal but an immortal. Jesus had taught his disciples the Science of this proof. He was here to enable them to test his still uncomprehended saying, "He that believeth on me, the works that I do shall he do also." They must understand more fully his Life-principle by casting out error, healing the sick, and raising the dead, even as they did understand it after his bodily departure. 

7. 43: 11-20, 32-19

यीशु का अंतिम प्रमाण सबसे अधिक, सबसे अधिक समझाने वाला, अपने छात्रों के लिए सबसे अधिक लाभदायक था। क्रूर अत्याचारियों, देशद्रोहियों और उनके विश्वासघाती की आत्महत्या की दुर्भावना, मनुष्य के महिमामंडन और ईश्वर के सच्चे विचार के लिए ईश्वरीय प्रेम से प्रभावित हुई, जिसे यीशु के उत्पीड़कों ने मार डाला और हत्या करने की कोशिश की। सत्य का अंतिम प्रदर्शन जो यीशु ने सिखाया था और जिसके लिए उसे सूली पर चढ़ाया गया था, उसने दुनिया के लिए एक नया युग खोला। जो लोग उसके प्रभाव को बनाए रखने के लिए उसे मारते थे और उसे बढ़ाते थे।

प्यार नफरत पर विजय चाहिए। सत्य और जीवन को जीत और त्रुटि और मृत्यु पर रोकना होगा, इससे पहले कि काँटे को एक मुकुट के लिए अलग रखा जा सके, बीडक्शन कहता है, "अच्छा काम अच्छा एवं विश्वसनीय सेवक," और आत्मा की सर्वोच्चता का प्रदर्शन किया जाए।

मकबरे की एकाकी प्रवृत्ति ने यीशु को उसके शत्रुओं से मुक्ति दिलाई, एक ऐसी जगह जिसमें होने की बड़ी समस्या को हल करना था। सीपुलचर में उनके तीन दिनों के काम ने समय पर अनंत काल की मुहर लगा दी। उन्होंने जीवन को मृत्युहीन और प्रेम को घृणा का स्वामी साबित कर दिया। उन्होंने मेडिसिन, सर्जरी और हाइजीन के सभी दावों पर क्रिश्चियन साइंस, माइंड की शक्ति, के आधार पर मुलाकात और महारत हासिल की।

उन्होंने सूजन को कम करने के लिए कोई दवा नहीं ली। उसने भोजन और शुद्ध हवा पर निर्भर नहीं किया कि वह बर्बाद होने वाली ऊर्जाओं को पुनर्जीवित करे। उन्हें फटे हथेलियों को ठीक करने और घायल पक्ष और पैरों को ढीला करने के लिए एक सर्जन के कौशल की आवश्यकता नहीं थी, कि वह नैपकिन और घुमावदार शीट को हटाने के लिए उन हाथों का उपयोग कर सकते हैं, और हो सकता है कि वह अपने पैरों को पहले से नियोजित करें।

7. 43 : 11-20, 32-19

Jesus' last proof was the highest, the most convincing, the most profitable to his students. The malignity of brutal persecutors, the treason and suicide of his betrayer, were overruled by divine Love to the glorification of the man and of the true idea of God, which Jesus' persecutors had mocked and tried to slay. The final demonstration of the truth which Jesus taught, and for which he was crucified, opened a new era for the world. Those who slew him to stay his influence perpetuated and extended it.

Love must triumph over hate. Truth and Life must seal the victory over error and death, before the thorns can be laid aside for a crown, the benediction follow, "Well done, good and faithful servant," and the supremacy of Spirit be demonstrated.

The lonely precincts of the tomb gave Jesus a refuge from his foes, a place in which to solve the great problem of being. His three days' work in the sepulchre set the seal of eternity on time.

He proved Life to be deathless and Love to be the master of hate. He met and mastered on the basis of Christian Science, the power of Mind over matter, all the claims of medicine, surgery, and hygiene.

He took no drugs to allay inflammation. He did not depend upon food or pure air to resuscitate wasted energies. He did not require the skill of a surgeon to heal the torn palms and bind up the wounded side and lacerated feet, that he might use those hands to remove the napkin and winding-sheet, and that he might employ his feet as before.

8. 44: 28-5

उनके शिष्यों ने यीशु को मृत मानते हुए कहा कि वह कब्र में छिपे हुए थे, जबकि वह जीवित थे, नश्वर, भौतिक अर्थों को उखाड़ने के लिए आत्मा की संकीर्ण कब्र के भीतर प्रदर्शन किया। रास्ते में रॉक-रिब्ड दीवारें थीं, और गुफा के मुंह से एक महान पत्थर को लुढ़काया जाना चाहिए; लेकिन यीशु ने हर भौतिक बाधा को पार कर लिया, मामले के हर नियम को पछाड़ दिया, और अपने उदास आराम करने वाले स्थान से आगे बढ़ गए, एक शानदार सफलता की महिमा के साथ ताज पहनाया, हमेशा की जीत।

8. 44 : 28-5

His disciples believed Jesus to be dead while he was hidden in the sepulchre, whereas he was alive, demonstrating within the narrow tomb the power of Spirit to overrule mortal, material sense. There were rock-ribbed walls in the way, and a great stone must be rolled from the cave's mouth; but Jesus vanquished every material obstacle, overcame every law of matter, and stepped forth from his gloomy resting-place, crowned with the glory of a sublime success, an everlasting victory.

9. 45: 16-21

भगवान की जय हो, और संघर्षशील दिलों को शांति मिले! मसीह ने मानव आशा और विश्वास के द्वार से पत्थर को लुढ़का दिया, और ईश्वर में जीवन के रहस्योद्घाटन और प्रदर्शन के माध्यम से, उन्हें मनुष्य के आध्यात्मिक विचार और उनके दिव्य सिद्धांत, प्रेम के साथ संभवतया एक-मानसिक रूप से उन्नत किया।

9. 45 : 16-21

Glory be to God, and peace to the struggling hearts! Christ hath rolled away the stone from the door of human hope and faith, and through the revelation and demonstration of life in God, hath elevated them to possible at-one-ment with the spiritual idea of man and his divine Principle, Love.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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