रविवार 21 अगस्त, 2022



विषयमन

SubjectMind

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: निर्गमन 20 : 3

"तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना॥"



Golden Text: Exodus 20 : 3

Thou shalt have no other gods before me.




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उत्तरदायी अध्ययन: मत्ती 4: 23, 24 • मत्ती 17: 14-18


23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

24     और सारे सूरिया में उसका यश फैल गया; और लोग सब बीमारों को, जो नाना प्रकार की बीमारियों और दुखों में जकड़े हुए थे, और जिन में दुष्टात्माएं थीं और मिर्गी वालों और झोले के मारे हुओं को उसके पास लाए और उस ने उन्हें चंगा किया।

14     जब वे भीड़ के पास पहुंचे, तो एक मनुष्य उसके पास आया, और घुटने टेक कर कहने लगा।

15     हे प्रभु, मेरे पुत्र पर दया कर; क्योंकि उस को मिर्गी आती है: और वह बहुत दुख उठाता है; और बार बार आग में और बार बार पानी में गिर पड़ता है।

16     और मैं उस को तेरे चेलों के पास लाया था, पर वे उसे अच्छा नहीं कर सके।

17     यीशु ने उत्तर दिया, कि हे अविश्वासी और हठीले लोगों मैं कब तक तुम्हारे साथ रहूंगा? कब तक तुम्हारी सहूंगा? उसे यहां मेरे पास लाओ।

18     तब यीशु ने उसे घुड़का, और दुष्टात्मा उस में से निकला; और लड़का उसी घड़ी अच्छा हो गया।

Responsive Reading: Matthew 4 : 23, 24Matthew 17 : 14-18

23.     And Jesus went about all Galilee,

24.     And they brought unto him all sick people that were taken with divers diseases and torments, and those which were possessed with devils, and those which were lunatick, and those that had the palsy; and he healed them.

14.     And when they were come to the multitude, there came to him a certain man, kneeling down to him, and saying,

15.     Lord, have mercy on my son: for he is lunatick, and sore vexed: for ofttimes he falleth into the fire, and oft into the water.

16.     And I brought him to thy disciples, and they could not cure him.

17.     Then Jesus answered and said, O faithless and perverse generation, how long shall I be with you? how long shall I suffer you? bring him hither to me.

18.     And Jesus rebuked the devil; and he departed out of him: and the child was cured from that very hour.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. सभोपदेशक 7: 25, 29 (से ;)

25     मैं ने अपना मन लगाया कि बुद्धि के विषय में जान लूं; कि खोज निकालूं और उसका भेद जानूं, और कि दुष्टता की मूर्खता और मूर्खता जो निरा बावलापन है जानूं।

29     देखो, मैं ने केवल यह बात पाई है, कि परमेश्वर ने मनुष्य को सीधा बनाया॥

1. Ecclesiastes 7 : 25, 29 (to ;)

25     I applied mine heart to know, and to search, and to seek out wisdom, and the reason of things, and to know the wickedness of folly, even of foolishness and madness:

29     Lo, this only have I found, that God hath made man upright;

2. भजन संहिता 139: 23, 24

23     हे ईश्वर, मुझे जांच कर जान ले! मुझे परख कर मेरी चिन्ताओं को जान ले!

24     और देख कि मुझ में कोई बुरी चाल है कि नहीं, और अनन्त के मार्ग में मेरी अगुवाई कर!

2. Psalm 139 : 23, 24

23     Search me, O God, and know my heart: try me, and know my thoughts:

24     And see if there be any wicked way in me, and lead me in the way everlasting.

3. दानिय्येल 4: 28-31, 32 (तक) (से 4th ,), 33, 34, 36, 37 (से 2nd ,)

28     यह सब कुछ नबूकदनेस्सर राजा पर घट गया।

29     बारह महीने बीतने पर जब वह बाबुल के राजभवन की छत पर टहल रहा था, तब वह कहने लगा,

30     क्या यह बड़ा बाबुल नहीं है, जिसे मैं ही ने अपने बल और सामर्थ से राजनिवास होने को और अपने प्रताप की बड़ाई के लिये बसाया है?

31     यह वचन राजा के मुंह से निकलने भी न पाया था कि आकाशवाणी हुई, हे राजा नबूकदनेस्सर तेरे विषय में यह आज्ञा निकलती है कि राज्य तेरे हाथ से निकल गया,

32     ... जब तक कि तू न जान ले कि परमप्रधान, मनुष्यों के राज्य में प्रभुता करता।

33     उसी घड़ी यह वचन नबूकदनेस्सर के विषय में पूरा हुआ। वह मनुष्यों में से निकाला गया, और बैलों की नाईं घास चरने लगा, और उसकी देह आकाश की ओस से भीगती थी, यहां तक कि उसके बाल उकाब पक्षियों के परों से और उसके नाखून चिडिय़ोंके चंगुलों के समान बढ़ गए॥

34     उन दिनों के बीतने पर, मुझ नबूकदनेस्सर ने अपनी आंखें स्वर्ग की ओर उठाईं, और मेरी बुद्धि फिर ज्यों की त्यों हो गई; तब मैं ने परमप्रधान को धन्य कहा, और जो सदा जीवित है उसकी स्तुति और महिमा यह कह कर करने लगा: उसकी प्रभुता सदा की है और उसका राज्य पीढ़ी से पीढ़ी तब बना रहने वाला है।

36     उसी समय, मेरी बुद्धि फिर ज्यों की त्यों हो गई; और मेरे राज्य की महिमा के लिये मेरा प्रताप और मुकुट मुझ पर फिर आ गया। और मेरे मन्त्री और प्रधान लोग मुझ से भेंट करने के लिये आने लगे, और मैं राज्य में स्थिर हो गया; और मेरी और अधिक प्रशंसा होने लगी।

37     अब मैं नबूकदनेस्सर स्वर्ग के राजा को सराहता हूं, और उसकी स्तुति और महिमा करता हूं क्योंकि उसके सब काम सच्चे॥

3. Daniel 4 : 28-31, 32 (until) (to 4th ,), 33, 34, 36, 37 (to 2nd ,)

28     All this came upon the king Nebuchadnezzar.

29     At the end of twelve months he walked in the palace of the kingdom of Babylon.

30     The king spake, and said, Is not this great Babylon, that I have built for the house of the kingdom by the might of my power, and for the honour of my majesty?

31     While the word was in the king’s mouth, there fell a voice from heaven, saying, O king Nebuchadnezzar, to thee it is spoken; The kingdom is departed from thee.

32     …until thou know that the most High ruleth in the kingdom of men,

33     The same hour was the thing fulfilled upon Nebuchadnezzar: and he was driven from men, and did eat grass as oxen, and his body was wet with the dew of heaven, till his hairs were grown like eagles’ feathers, and his nails like birds’ claws.

34     And at the end of the days I Nebuchadnezzar lifted up mine eyes unto heaven, and mine understanding returned unto me, and I blessed the most High, and I praised and honoured him that liveth for ever, whose dominion is an everlasting dominion, and his kingdom is from generation to generation:

36     At the same time my reason returned unto me; and for the glory of my kingdom, mine honour and brightness returned unto me; and my counsellers and my lords sought unto me; and I was established in my kingdom, and excellent majesty was added unto me.

37     Now I Nebuchadnezzar praise and extol and honour the King of heaven, all whose works are truth,

4. यिर्मयाह 29: 11-14 (से 2nd,)

11     क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, कि जो कल्पनाएं मैं तुम्हारे विषय करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ, वे हानी की नहीं, वरन कुशल ही की हैं, और अन्त में तुम्हारी आशा पूरी करूंगा।

12     तब उस समय तुम मुझ को पुकारोगे और आकर मुझ से प्रार्थना करोगे और मैं तुम्हारी सुनूंगा।

13     तुम मुझे ढूंढ़ोगे और पाओगे भी; क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मेरे पास आओगे।

14     मैं तुम्हें मिलूंगा, यहोवा की यह वाणी है, और बंधुआई से लौटा ले आऊंगा।

4. Jeremiah 29 : 11-14 (to 2nd ,)

11     For I know the thoughts that I think toward you, saith the Lord, thoughts of peace, and not of evil, to give you an expected end.

12     Then shall ye call upon me, and ye shall go and pray unto me, and I will hearken unto you.

13     And ye shall seek me, and find me, when ye shall search for me with all your heart.

14     And I will be found of you, saith the Lord: and I will turn away your captivity,

5. यशायाह 26: 3 (से :), 13, 14 (इसलिए)

3     जिसका मन तुझ में धीरज धरे हुए हैं, उसकी तू पूर्ण शान्ति के साथ रक्षा करता है।

13     हे हमारे परमेश्वर यहोवा, तेरे सिवाय और स्वामी भी हम पर प्रभुता करते थे, परन्तु तेरी कृपा से हम केवल तेरे ही नाम का गुणानुवाद करेंगे।

14     ... तू ने उनका विचार कर के उन को ऐसा नाश किया कि वे फिर स्मरण में न आएंगे।

5. Isaiah 26 : 3 (to :), 13, 14 (therefore)

3     Thou wilt keep him in perfect peace, whose mind is stayed on thee:

13     O Lord our God, other lords beside thee have had dominion over us: but by thee only will we make mention of thy name.

14     …therefore hast thou visited and destroyed them, and made all their memory to perish.

6. लूका 4: 14 (से :)

14     फिर यीशु आत्मा की सामर्थ से भरा हुआ गलील को लौटा।

6. Luke 4 : 14 (to :)

14     And Jesus returned in the power of the Spirit into Galilee:

7. लूका 8: 1 (से :), 26-34 (से 2nd,), 35 (से :), 38, 39 (से 1st.)

1     इस के बाद वह नगर नगर और गांव गांव प्रचार करता हुआ, और परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाता हुआ, फिरने लगा।

26     फिर वे गिरासेनियों के देश में पहुंचे, जो उस पार गलील के साम्हने है।

27     जब वह किनारे पर उतरा, तो उस नगर का एक मनुष्य उसे मिला, जिस में दुष्टात्माएं थीं और बहुत दिनों से न कपड़े पहिनता था और न घर में रहता था वरन कब्रों में रहा करता था।

28     वह यीशु को देखकर चिल्लाया, और उसके साम्हने गिरकर ऊंचे शब्द से कहा; हे परम प्रधान परमेश्वर के पुत्र यीशु, मुझे तुझ से क्या काम! मैं तेरी बिनती करता हूं, मुझे पीड़ा न दे!

29     क्योंकि वह उस अशुद्ध आत्मा को उस मनुष्य में से निकलने की आज्ञा दे रहा था, इसलिये कि वह उस पर बार बार प्रबल होती थी; और यद्यपि लोग उसे सांकलों और बेडिय़ों से बांधते थे, तौभी वह बन्धनों को तोड़ डालता था, और दुष्टात्मा उसे जंगल में भगाये फिरती थी।

30     यीशु ने उस से पूछा; तेरा क्या नाम है? उसने कहा, सेना; क्योंकि बहुत दुष्टात्माएं उसमें पैठ गईं थीं।

31     और उन्होंने उस से बिनती की, कि हमें अथाह गड़हे में जाने की आज्ञा न दे।

32     वहां पहाड़ पर सूअरों का एक बड़ा झुण्ड चर रहा था, सो उन्होंने उस से बिनती की, कि हमें उन में पैठने दे, सो उस ने उन्हें जाने दिया।

33     तब दुष्टात्माएं उस मनुष्य से निकल कर सूअरों में गईं और वह झुण्ड कड़ाडे पर से झपटकर झील में जा गिरा और डूब मरा।

34     चरवाहे यह जो हुआ था देखकर भागे, और नगर में, और गांवों में जाकर उसका समाचार कहा।

35     और लोग यह जो हुआ था उसके देखने को निकले, और यीशु के पास आकर जिस मनुष्य से दुष्टात्माएं निकली थीं, उसे यीशु के पांवों के पास कपड़े पहिने और सचेत बैठे हुए पाकर डर गए।

38     जिस मनुष्य से दुष्टात्माऐं निकली थीं वह उस से बिनती करने लगा, कि मुझे अपने साथ रहने दे, परन्तु यीशु ने उसे विदा करके कहा।

39     अपने घर को लौट जा और लोगों से कह दे, कि परमेश्वर ने तेरे लिये कैसे बड़े काम किए हैं॥

7. Luke 8 : 1 (to :), 26-34 (to 2nd ,), 35 (to :), 38, 39 (to 1st .)

1     And it came to pass afterward, that he went throughout every city and village, preaching and shewing the glad tidings of the kingdom of God:

26     And they arrived at the country of the Gadarenes, which is over against Galilee.

27     And when he went forth to land, there met him out of the city a certain man, which had devils long time, and ware no clothes, neither abode in any house, but in the tombs.

28     When he saw Jesus, he cried out, and fell down before him, and with a loud voice said, What have I to do with thee, Jesus, thou Son of God most high? I beseech thee, torment me not.

29     (For he had commanded the unclean spirit to come out of the man. For oftentimes it had caught him: and he was kept bound with chains and in fetters; and he brake the bands, and was driven of the devil into the wilderness.)

30     And Jesus asked him, saying, What is thy name? And he said, Legion: because many devils were entered into him.

31     And they besought him that he would not command them to go out into the deep.

32     And there was there an herd of many swine feeding on the mountain: and they besought him that he would suffer them to enter into them. And he suffered them.

33     Then went the devils out of the man, and entered into the swine: and the herd ran violently down a steep place into the lake, and were choked.

34     When they that fed them saw what was done, they fled,

35     Then they went out to see what was done; and came to Jesus, and found the man, out of whom the devils were departed, sitting at the feet of Jesus, clothed, and in his right mind:

38     Now the man out of whom the devils were departed besought him that he might be with him: but Jesus sent him away, saying,

39     Return to thine own house, and shew how great things God hath done unto thee.

8. इब्रानियों 4 : 12, 13, 16

12     क्योंकि परमेश्वर का वचन जीवित, और प्रबल, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है, और जीव, और आत्मा को, और गांठ गांठ, और गूदे गूदे को अलग करके, वार पार छेदता है; और मन की भावनाओं और विचारों को जांचता है।

13     और सृष्टि की कोई वस्तु उस से छिपी नहीं है वरन जिस से हमें काम है, उस की आंखों के साम्हने सब वस्तुएं खुली और बेपरदा हैं॥

16     इसलिये आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बान्धकर चलें, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएं, जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे॥

8. Hebrews 4 : 12, 13, 16

12     For the word of God is quick, and powerful, and sharper than any twoedged sword, piercing even to the dividing asunder of soul and spirit, and of the joints and marrow, and is a discerner of the thoughts and intents of the heart.

13     Neither is there any creature that is not manifest in his sight: but all things are naked and opened unto the eyes of him with whom we have to do.

16     Let us therefore come boldly unto the throne of grace, that we may obtain mercy, and find grace to help in time of need.

9. रोमियो 15 : 4 (से ,), 6

4     जितनी बातें पहिले से लिखी गईं, वे हमारी ही शिक्षा के लिये लिखी गईं।

6     ताकि तुम एक मन और एक मुंह होकर हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता परमेश्वर की बड़ाई करो।

9. Romans 15 : 4 (to ,), 6

4     For whatsoever things were written aforetime were written for our learning,

6     That ye may with one mind and one mouth glorify God, even the Father of our Lord Jesus Christ.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 467: 3 (यह)-4 (से 1st .), 5-7, 9-10, 13-16

इस विज्ञान की पहली मांग है, "दूसरों को ईश्वर करके न मानना॥ … इसलिए आज्ञा का यह अर्थ है: आपके पास कोई बुद्धि नहीं है, कोई जीवन नहीं है, कोई पदार्थ नहीं है, कोई सत्य नहीं है, कोई प्रेम नहीं है, इसके अलावा जो आध्यात्मिक है। … यह अच्छी तरह समझा जाना चाहिए कि सभी पुरुषों का एक मन, एक ईश्वर और पिता, एक जीवन, सत्य और प्रेम होता है। … कोई अन्य देवता नहीं, कोई दूसरा नहीं, बल्कि एक ही मार्गदर्शक का मन, मनुष्य ईश्वर की समानता है, शुद्ध और शाश्वत है, और उसके पास वह मन है जो मसीह में भी था।

1. 467 : 3 (The)-4 (to 1st .), 5-7, 9-10, 13-16

The first demand of this Science is, "Thou shalt have no other gods before me." … Therefore the command means this: Thou shalt have no intelligence, no life, no substance, no truth, no love, but that which is spiritual. … It should be thoroughly understood that all men have one Mind, one God and Father, one Life, Truth, and Love. … Having no other gods, turning to no other but the one perfect Mind to guide him, man is the likeness of God, pure and eternal, having that Mind which was also in Christ.

2. 587: 5-9 (से.), 11 (यह)-15 (से ;)

परमेश्वर। मैं जो महान हूं; सर्व-ज्ञान, सर्व-दर्शन, सर्व-कार्य, सर्व-ज्ञान, सर्व-प्रिय और शाश्वत; सिद्धांत; मन; अन्त: मन; आत्मा; जिंदगी; सत्य; प्रेम; सभी पदार्थ; बुद्धि।

भगवान का। … यह विश्वास कि अनंत मन सीमित रूपों में है; मस्तिष्क, तंत्रिका, पदार्थ में विद्यमान विभिन्न सिद्धांत जो मन को भौतिक अर्थ मानते हैं; संदिग्ध दिमाग, या आत्माएं, पदार्थ के अंदर और बाहर जा रहे हैं, गलत और नश्वर;

2. 587 : 5-9 (to .), 11 (the)-15 (to ;)

God. The great I am; the all-knowing, all-seeing, all-acting, all-wise, all-loving, and eternal; Principle; Mind; Soul; Spirit; Life; Truth; Love; all substance; intelligence.

Gods. … the belief that infinite Mind is in finite forms; the various theories that hold mind to be a material sense, existing in brain, nerve, matter; supposititious minds, or souls, going in and out of matter, erring and mortal;

3. 285 : 17-22

समय आ गया है कि अनंत और भौतिक शरीर की मन की सीट के रूप में एक सीमित अवधारणा के लिए बुद्धि की दिव्य भावना और इसकी अभिव्यक्तियों को जगह दी जाए, — बेहतर समझ के लिए कि विज्ञान सर्वोच्च होने, या दिव्य सिद्धांत, और विचार देता है।

3. 285 : 17-22

The time has come for a finite conception of the infinite and of a material body as the seat of Mind to give place to a diviner sense of intelligence and its manifestations, — to the better understanding that Science gives of the Supreme Being, or divine Principle, and idea.

4. 262 : 27-4

नश्वर कलह की नींव मनुष्य की उत्पत्ति का एक गलत अर्थ है। ठीक से शुरू करने के लिए सही तरीके से समाप्त करना है। हर अवधारणा जो मस्तिष्क से शुरू होती है, मिथ्या से शुरू होती है। ईश्वरीय मन ही अस्तित्व का एकमात्र कारण या सिद्धांत है। कारण पदार्थ में, नश्वर मन में, या भौतिक रूपों में मौजूद नहीं है।

मुर्दा अहंकारी हैं। वे खुद को स्वतंत्र कार्यकर्ता, व्यक्तिगत लेखक और यहां तक कि किसी चीज के विशेषाधिकार प्राप्त प्रवर्तक मानते हैं, जिसे देवता नहीं बना सकते थे या नहीं बना सकते थे।

4. 262 : 27-4

The foundation of mortal discord is a false sense of man's origin. To begin rightly is to end rightly. Every concept which seems to begin with the brain begins falsely. Divine Mind is the only cause or Principle of existence. Cause does not exist in matter, in mortal mind, or in physical forms.

Mortals are egotists. They believe themselves to be independent workers, personal authors, and even privileged originators of something which Deity would not or could not create.

5. 216 : 11-16

यह समझ कि अहंकार मन है, और यह कि एक मन या बुद्धि है, एक बार में नश्वर अर्थ की त्रुटियों को नष्ट करने और अमर भावना की सच्चाई की आपूर्ति करने के लिए शुरू होता है। यह समझ शरीर को सामंजस्यपूर्ण बनाती है; यह तंत्रिकाओं, हड्डियों, मस्तिष्क इत्यादि को नौकरों के बजाय नौकर बनाता है।

5. 216 : 11-16

The understanding that the Ego is Mind, and that there is but one Mind or intelligence, begins at once to destroy the errors of mortal sense and to supply the truth of immortal sense. This understanding makes the body harmonious; it makes the nerves, bones, brain, etc., servants, instead of masters.

6. 191 : 1-3, 16-20, 32-3

मस्तिष्क भगवान के आदमी का कोई विचार नहीं दे सकता। यह मन का कोई संज्ञान नहीं ले सकता। पदार्थ अनंत मन का अंग नहीं है।

मानव विचार को स्वयं को भौतिकता और बंधन से मुक्त करना होगा। इसे अब सिर, हृदय या फेफड़ों से नहीं पूछना चाहिए: जीवन के लिए मनुष्य की संभावनाएँ क्या हैं? मन असहाय नहीं है। अ-बुद्धि के समक्ष बुद्धिमत्ता मूक नहीं है।

मन, ईश्वर, आत्मा की सुगंध, बुद्धि का वातावरण भेजता है। यह विश्वास कि खोपड़ी के नीचे एक गूदेदार पदार्थ मन है, बुद्धि का उपहास है, मन की नकल है।

6. 191 : 1-3, 16-20, 32-3

The brain can give no idea of God's man. It can take no cognizance of Mind. Matter is not the organ of infinite Mind.

The human thought must free itself from self-imposed materiality and bondage. It should no longer ask of the head, heart, or lungs: What are man's prospects for life? Mind is not helpless. Intelligence is not mute before non-intelligence.

Mind, God, sends forth the aroma of Spirit, the atmosphere of intelligence. The belief that a pulpy substance under the skull is mind is a mockery of intelligence, a mimicry of Mind.

7. 171 : 25-30

पदार्थ के तथाकथित नियम कुछ और नहीं बल्कि झूठी मान्यताएं हैं कि बुद्धि और जीवन वहां मौजूद हैं जहां मन नहीं है। ये झूठे विश्वास सभी पापों और बीमारियों का कारण हैं। विपरीत सत्य, कि बुद्धि और जीवन आध्यात्मिक हैं, कभी भौतिक नहीं, पाप, बीमारी और मृत्यु को नष्ट करते हैं।

7. 171 : 25-30

The so-called laws of matter are nothing but false beliefs that intelligence and life are present where Mind is not. These false beliefs are the procuring cause of all sin and disease. The opposite truth, that intelligence and life are spiritual, never material, destroys sin, sickness, and death.

8. 570 : 26-5

जब परमेश्वर बीमारों या पापों को चंगा करता है, तो उन्हें उस महान लाभ को जानना चाहिए जो कि माइंड ने गढ़ा है। उन्हें नश्वर मन के महान भ्रम को भी जानना चाहिए, जब यह उन्हें बीमार या पापी बनाता है। बहुत से लोग दिव्य मन में अच्छे निवासी की शक्ति के लिए लोगों की आंखें खोलने के लिए तैयार हैं, लेकिन वे मानव विचार में बुराई को इंगित करने के लिए तैयार नहीं हैं, और बुराई को पूरा करने के लिए बुराई के छिपे हुए मानसिक तरीकों को उजागर करने के लिए तैयार नहीं हैं।

यह पिछड़ापन, बुराई से बचने के लिए जोखिम क्यों आवश्यक है?

8. 570 : 26-5

When God heals the sick or the sinning, they should know the great benefit which Mind has wrought. They should also know the great delusion of mortal mind, when it makes them sick or sinful. Many are willing to open the eyes of the people to the power of good resident in divine Mind, but they are not so willing to point out the evil in human thought, and expose evil's hidden mental ways of accomplishing iniquity.

Why this backwardness, since exposure is necessary to ensure the avoidance of the evil?

9. 407 : 29 (सभी)-30

सभी पाप अलग-अलग डिग्री में पागलपन है।

9. 407 : 29 (All)-30

All sin is insanity in different degrees.

10. 423 : 8-14, 27 (कोई)-29

ईसाई वैज्ञानिक, वैज्ञानिक रूप से यह समझते हुए कि सब कुछ मन है, मानसिक कारण से शुरू होता है, होने का सत्य, त्रुटि को नष्ट करने के लिए। यह सुधारात्मक एक परिवर्तनकारी है, जो मानव प्रणाली के हर हिस्से तक पहुंचता है। पवित्रशास्त्र के अनुसार, यह "जोड़ों और मज्जा" की खोज करता है और यह मनुष्य के सामंजस्य को पुनर्स्थापित करता है।

... शरीर की कोई भी असामान्य स्थिति या विक्षोभ सीधे नश्वर मन की क्रिया है जैसा कि मनोभ्रंश या पागलपन है।

10. 423 : 8-14, 27 (any)-29

The Christian Scientist, understanding scientifically that all is Mind, commences with mental causation, the truth of being, to destroy the error. This corrective is an alterative, reaching to every part of the human system. According to Scripture, it searches "the joints and marrow," and it restores the harmony of man.

…any abnormal condition or derangement of the body is as directly the action of mortal mind as is dementia or insanity.

11. 411 : 13-22

यह दर्ज है कि एक बार यीशु ने एक बीमारी का नाम पूछा, - एक बीमारी जिसे आधुनिक लोग मनोभ्रंश कहते हैं। दानव, या दुष्ट, ने जवाब दिया कि उसका नाम लीजन था। उसके बाद यीशु ने बुराई को खत्म कर दिया, और पागल आदमी को बदल दिया गया और सीधे पूरे हो गए। इंजील आयात करने के लिए लगता है कि यीशु ने बुराई को आत्म-देखा और इसलिए नष्ट कर दिया।

सभी बीमारी का कारण और आधार भय, अज्ञानता या पाप है। रोग हमेशा एक झूठी भावना से प्रेरित होता है जो मानसिक रूप से मनोरंजन करता है, नष्ट नहीं होता है।

11. 411 : 13-22

It is recorded that once Jesus asked the name of a disease, — a disease which moderns would call dementia. The demon, or evil, replied that his name was Legion. Thereupon Jesus cast out the evil, and the insane man was changed and straightway became whole. The Scripture seems to import that Jesus caused the evil to be self-seen and so destroyed.

The procuring cause and foundation of all sickness is fear, ignorance, or sin. Disease is always induced by a false sense mentally entertained, not destroyed.

12. 147 : 32-4

यीशु ने कभी भी बीमारी को खतरनाक या चंगा करने की बात नहीं की। जब उनके छात्र उनके पास एक ऐसा मामला लाए, जिसे वे ठीक करने में विफल रहे, तो उन्होंने उनसे कहा, "ओ विश्वासहीन पीढ़ी," यह कहते हुए कि चंगा करने की अपेक्षित शक्ति मन में थी।

12. 147 : 32-4

Jesus never spoke of disease as dangerous or as difficult to heal. When his students brought to him a case they had failed to heal, he said to them, "O faithless generation," implying that the requisite power to heal was in Mind.

13. 414 : 4-14

पागलपन का उपचार विशेष रूप से दिलचस्प है। हालांकि मामले में बाधा है, यह सच्चाई की सलामी कार्रवाई के लिए अधिकांश रोगों की तुलना में अधिक आसानी से उपज देता है, जो त्रुटि का प्रतिकार करता है। पागलपन का इलाज करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दलीलें अन्य बीमारियों की तरह ही हैं: अर्थात्, वह असंभावना, जो मस्तिष्क, मस्तिष्क को नियंत्रित या विचलित कर सकती है, पीड़ित या पीड़ित कर सकती है; यह भी तथ्य कि सत्य और प्रेम स्वस्थ राज्य, मार्गदर्शक और शासित नश्वर मन या रोगी के विचार को स्थापित करेंगे, और सभी त्रुटि को नष्ट कर देंगे, चाहे इसे मनोभ्रंश, घृणा, या कोई अन्य कलह कहा जाए।

13. 414 : 4-14

The treatment of insanity is especially interesting. However obstinate the case, it yields more readily than do most diseases to the salutary action of truth, which counteracts error. The arguments to be used in curing insanity are the same as in other diseases: namely, the impossibility that matter, brain, can control or derange mind, can suffer or cause suffering; also the fact that truth and love will establish a healthy state, guide and govern mortal mind or the thought of the patient, and destroy all error, whether it is called dementia, hatred, or any other discord.

14. 372 : 1-2

याद रखें, दिमाग दिमाग नहीं है। सामग्री बीमार नहीं हो सकती है, और मन अमर है।

14. 372 : 1-2

Remember, brain is not mind. Matter cannot be sick, and Mind is immortal.

15. 171 : 12-13

मनुष्य सहित ब्रह्मांड पर मन का नियंत्रण अब एक खुला प्रश्न नहीं है, बल्कि विज्ञान है।

15. 171 : 12-13

Mind's control over the universe, including man, is no longer an open question, but is demonstrable Science.

16. 184 : 16-17

दिव्य बुद्धि द्वारा नियंत्रित, मनुष्य सामंजस्यपूर्ण और शाश्वत है।

16. 184 : 16-17

Controlled by the divine intelligence, man is harmonious and eternal.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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