रविवार 20 सितंबर, 2020 |

रविवार 20 सितंबर, 2020



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वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: प्रेरितों के काम 20 : 35

लेने से देना धन्य है॥



Golden Text: Acts 20 : 35

It is more blessed to give than to receive.




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भजन संहिता 97 : 1, 6, 7, 9, 11, 12


1     यहोवा राजा हुआ है, पृथ्वी मगन हो; और द्वीप जो बहुतेरे हैं, वह भी आनन्द करें!

6     आकाश ने उसके धर्म की साक्षी दी; और देश देश के सब लोगों ने उसकी महिमा देखी है।

7     जितने खुदी हुई मूर्तियों की उपासना करते और मूरतों पर फूलते हैं, वे लज्जित हों; हे सब देवताओं तुम उसी को दण्डवत करो।

9     क्योंकि हे यहोवा, तू सारी पृथ्वी के ऊपर परमप्रधान है; तू सारे देवताओं से अधिक महान ठहरा है।

11     धर्मी के लिये ज्योति, और सीधे मन वालों के लिये आनन्द बोया गया है।

12     हे धर्मियों यहोवा के कारण आनन्दित हो; और जिस पवित्र नाम से उसका स्मरण होता है, उसका धन्यवाद करो!

Responsive Reading: Psalm 97 : 1, 6, 7, 9, 11, 12

1.     The Lord reigneth; let the earth rejoice; let the multitude of isles be glad thereof.

6.     The heavens declare his righteousness, and all the people see his glory.

7.     Confounded be all they that serve graven images, that boast themselves of idols: worship him, all ye gods.

9.     For thou, Lord, art high above all the earth: thou art exalted far above all gods.

11.     Light is sown for the righteous, and gladness for the upright in heart.

12.     Rejoice in the Lord, ye righteous; and give thanks at the remembrance of his holiness.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. हबक्कूक 2 : 20 (यहोवा)

20     ... यहोवा अपने पवित्र मन्दिर में है; समस्त पृथ्वी उसके साम्हने शान्त रहे॥

1. Habakkuk 2 : 20 (the Lord)

20      …the Lord is in his holy temple: let all the earth keep silence before him.

2. 1 यूहन्ना 2 : 15-17

15     तुम न तो संसार से और न संसार में की वस्तुओं से प्रेम रखो: यदि कोई संसार से प्रेम रखता है, तो उस में पिता का प्रेम नहीं है।

16     क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात शरीर की अभिलाषा, और आंखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्तु संसार ही की ओर से है।

17     और संसार और उस की अभिलाषाएं दोनों मिटते जाते हैं, पर जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह सर्वदा बना रहेगा॥

2. I John 2 : 15-17

15     Love not the world, neither the things that are in the world. If any man love the world, the love of the Father is not in him.

16     For all that is in the world, the lust of the flesh, and the lust of the eyes, and the pride of life, is not of the Father, but is of the world.

17     And the world passeth away, and the lust thereof: but he that doeth the will of God abideth for ever.

3. 1 राजा 21 : 1 (नाबोत)-4 (अप्रसन्न), 4 (और वह), 7, 8 (से 1st,), 9 (कहने से), 13, 17, 18, 20, 27-29

1     नाबोत नाम एक यिज्रेली की एक दाख की बारी शोमरोन के राजा अहाब के राजमन्दिर के पास यिज्रेल में थी।

2     इन बातों के बाद अहाब ने नाबोत से कहा, तेरी दाख की बारी मेरे घर के पास है, तू उसे मुझे दे कि मैं उस में साग पात की बारी लगाऊं; और मैं उसके बदले तुझे उस से अच्छी एक वाटिका दूंगा, नहीं तो तेरी इच्छा हो तो मैं तुझे उसका मूल्य दे दूंगा।

3     नाबोत ने यहाब से कहा, यहोवा न करे कि मैं अपने पुरखाओं का निज भाग तुझे दूं!

4     ... अहाब उदास और अप्रसन्न हो कर अपने घर गया, और बिछौने पर लेट गया और मुंह फेर लिया, और कुछ भोजन न किया।

7     उसकी पत्नी ईज़ेबेल ने उस से कहा, क्या तू इस्राएल पर राज्य करता है कि नहीं? उठ कर भोजन कर; और तेरा मन आनन्दित हो; यिज्रेली नाबोत की दाख की बारी मैं तुझे दिलवा दूंगी।

8     तब उसने अहाब के नाम से चिट्ठी लिखकर उसकी।

9     ... उसने यों लिखा, कि उपवास का प्रचार करो, और नाबोत को लोगों के साम्हने ऊंचे स्थान पर बैठाना।

13     तब दो नीच जन आकर उसके सम्मुख बैठ गए; और उन नीच जनों ने लोगों लोगों के साम्हने नाबोत के विरुद्ध यह साक्षी दी, कि नाबोत ने परमेश्वर और राजा दोनों की निन्दा की। इस पर उन्होंने उसे नगर से बाहर ले जा कर उसको पत्थरवाह किया, और वह मर गया।

17     तब यहोवा का यह वचन तिशबी एलिय्यह के पास पहुंचा, कि चल,

18     शोमरोन में रहने वाले इस्राएल के राजा अहाब से मिलने को जा; वह तो नाबोत की दाख की बारी में है, उसे अपने अधिकार में लेने को वह वहां गया है।

20     एलिय्याह को देख कर अहाब ने कहा, हे मेरे शत्रु! क्या तू ने मेरा पता लगाया है? उसने कहा हां, लगाया तो है; और इसका कारण यह है, कि जो यहोवा की दृष्टि में बुरा है, उसे करने के लिये तू ने अपने को बेच डाला है।

27     एलिय्याह के ये वचन सुनकर अहाब ने अपने वस्त्र फाड़े, और अपनी देह पर टाट लपेट कर उपवास करने और टाट ही ओढ़े पड़ा रहने लगा, और दबे पांवों चलने लगा।

28     और यहोवा का यह वचन तिशबी एलिय्याह के पास पहुंचा,

29     कि क्या तू ने देखा है कि अहाब मेरे साम्हने नम्र बन गया है? इस कारण कि वह मेरे साम्हने नम्र बन गया है मैं वह विपत्ति उसके जीते जी उस पर न डालूंगा पर न्तू उसके पुत्र के दिनों में मैं उसके घराने पर वह पिपत्ति भेजूंगा।

3. I Kings 21 : 1 (Naboth)-4 (to displeased), 4 (And he), 7, 8 (to 1st,), 9 (saying), 13, 17, 18, 20, 27-29

1     Naboth the Jezreelite had a vineyard, which was in Jezreel, hard by the palace of Ahab king of Samaria.

2     And Ahab spake unto Naboth, saying, Give me thy vineyard, that I may have it for a garden of herbs, because it is near unto my house: and I will give thee for it a better vineyard than it; or, if it seem good to thee, I will give thee the worth of it in money.

3     And Naboth said to Ahab, The Lord forbid it me, that I should give the inheritance of my fathers unto thee.

4     And Ahab came into his house heavy and displeased … And he laid him down upon his bed, and turned away his face, and would eat no bread.

7     And Jezebel his wife said unto him, Dost thou now govern the kingdom of Israel? arise, and eat bread, and let thine heart be merry: I will give thee the vineyard of Naboth the Jezreelite.

8     So she wrote letters in Ahab’s name,

9     …saying, Proclaim a fast, and set Naboth on high among the people:

13     And there came in two men, children of Belial, and sat before him: and the men of Belial witnessed against him, even against Naboth, in the presence of the people, saying, Naboth did blaspheme God and the king. Then they carried him forth out of the city, and stoned him with stones, that he died.

17     And the word of the Lord came to Elijah the Tishbite, saying,

18     Arise, go down to meet Ahab king of Israel, which is in Samaria: behold, he is in the vineyard of Naboth, whither he is gone down to possess it.

20     And Ahab said to Elijah, Hast thou found me, O mine enemy? And he answered, I have found thee: because thou hast sold thyself to work evil in the sight of the Lord.

27     And it came to pass, when Ahab heard those words, that he rent his clothes, and put sackcloth upon his flesh, and fasted, and lay in sackcloth, and went softly.

28     And the word of the Lord came to Elijah the Tishbite, saying,

29     Seest thou how Ahab humbleth himself before me? because he humbleth himself before me, I will not bring the evil in his days: but in his son’s days will I bring the evil upon his house.

4. लूका 19 : 1 (यीशु)-10

1     वह यरीहो में प्रवेश करके जा रहा था।

2     और देखो, ज़क्कई नाम एक मनुष्य था जो चुंगी लेने वालों का सरदार और धनी था।

3     वह यीशु को देखना चाहता था कि वह कौन सा है परन्तु भीड़ के कारण देख न सकता था। क्योंकि वह नाटा था।

4     तब उस को देखने के लिये वह आगे दौड़कर एक गूलर के पेड़ पर चढ़ गया, क्योंकि वह उसी मार्ग से जाने वाला था।

5     जब यीशु उस जगह पहुंचा, तो ऊपर दृष्टि कर के उस से कहा; हे ज़क्कई झट उतर आ; क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना अवश्य है।

6     वह तुरन्त उतर कर आनन्द से उसे अपने घर को ले गया।

7     यह देख कर सब लोगे कुड़कुड़ा कर कहने लगे, वह तो एक पापी मनुष्य के यहां जा उतरा है।

8     ज़क्कई ने खड़े होकर प्रभु से कहा; हे प्रभु, देख मैं अपनी आधी सम्पत्ति कंगालों को देता हूं, और यदि किसी का कुछ भी अन्याय करके ले लिया है तो उसे चौगुना फेर देता हूं।

9     तब यीशु ने उस से कहा; आज इस घर में उद्धार आया है, इसलिये कि यह भी इब्राहीम का एक पुत्र है।

4. Luke 19 : 1 (Jesus)-9

1     Jesus entered and passed through Jericho.

2     And, behold, there was a man named Zacchæus, which was the chief among the publicans, and he was rich.

3     And he sought to see Jesus who he was; and could not for the press, because he was little of stature.

4     And he ran before, and climbed up into a sycomore tree to see him: for he was to pass that way.

5     And when Jesus came to the place, he looked up, and saw him, and said unto him, Zacchæus, make haste, and come down; for to day I must abide at thy house.

6     And he made haste, and came down, and received him joyfully.

7     And when they saw it, they all murmured, saying, That he was gone to be guest with a man that is a sinner.

8     And Zacchæus stood, and said unto the Lord; Behold, Lord, the half of my goods I give to the poor; and if I have taken any thing from any man by false accusation, I restore him fourfold.

9     And Jesus said unto him, This day is salvation come to this house, forsomuch as he also is a son of Abraham.

5. मरकुस 12 : 41-44

41     और वह मन्दिर के भण्डार के साम्हने बैठकर देख रहा था, कि लोग मन्दिर के भण्डार में किस प्रकार पैसे डालते हैं, और बहुत धनवानों ने बहुत कुछ डाला।

42     इतने में एक कंगाल विधवा ने आकर दो दमडिय़ां, जो एक अधेले के बराबर होती है, डालीं।

43     तब उस ने अपने चेलों को पास बुलाकर उन से कहा; मैं तुम से सच कहता हूं, कि मन्दिर के भण्डार में डालने वालों में से इस कंगाल विधवा ने सब से बढ़कर डाला है।

44     क्योंकि सब ने अपने धन की बढ़ती में से डाला है, परन्तु इस ने अपनी घटी में से जो कुछ उसका था, अर्थात अपनी सारी जीविका डाल दी है।

5. Mark 12 : 41-44

41     And Jesus sat over against the treasury, and beheld how the people cast money into the treasury: and many that were rich cast in much.

42     And there came a certain poor widow, and she threw in two mites, which make a farthing.

43     And he called unto him his disciples, and saith unto them, Verily I say unto you, That this poor widow hath cast more in, than all they which have cast into the treasury:

44     For all they did cast in of their abundance; but she of her want did cast in all that she had, even all her living.

6. मत्ती 5 : 2

2     और वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

6. Matthew 5 : 2

2     And he opened his mouth, and taught them, saying,

7. मत्ती 6 : 19-21

19     अपने लिये पृथ्वी पर धन इकट्ठा न करो; जहां कीड़ा और काई बिगाड़ते हैं, और जहां चोर सेंध लगाते और चुराते हैं।

20     परन्तु अपने लिये स्वर्ग में धन इकट्ठा करो, जहां न तो कीड़ा, और न काई बिगाड़ते हैं, और जहां चोर न सेंध लगाते और न चुराते हैं।

21     क्योंकि जहां तेरा धन है वहां तेरा मन भी लगा रहेगा।

7. Matthew 6 : 19-21

19     Lay not up for yourselves treasures upon earth, where moth and rust doth corrupt, and where thieves break through and steal:

20     But lay up for yourselves treasures in heaven, where neither moth nor rust doth corrupt, and where thieves do not break through nor steal:

21     For where your treasure is, there will your heart be also.

8. 2 कुरिन्थियों 9 : 6-11

6     परन्तु बात तो यह है, कि जो थोड़ा बोता है वह थोड़ा काटेगा भी; और जो बहुत बोता है, वह बहुत काटेगा।

7     हर एक जन जैसा मन में ठाने वैसा ही दान करे न कुढ़ कुढ़ के, और न दबाव से, क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है।

8     और परमेश्वर सब प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है जिस से हर बात में और हर समय, सब कुछ, जो तुम्हें आवश्यक हो, तुम्हारे पास रहे, और हर एक भले काम के लिये तुम्हारे पास बहुत कुछ हो।

9     जेसा लिखा है, उस ने बिथराया, उस ने कंगालों को दान दिया, उसका धर्म सदा बना रहेगा।

10     सो जो बोने वाले को बीज, और भोजन के लिये रोटी देता है वह तुम्हें बीज देगा, और उसे फलवन्त करेगा; और तुम्हारे धर्म के फलों को बढ़ाएगा।

11     कि तुम हर बात में सब प्रकार की उदारता के लिये जो हमारे द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करवाती है, धनवान किए जाओ।

8. II Corinthians 9 : 6-11

6     But this I say, He which soweth sparingly shall reap also sparingly; and he which soweth bountifully shall reap also bountifully.

7     Every man according as he purposeth in his heart, so let him give; not grudgingly, or of necessity: for God loveth a cheerful giver.

8     And God is able to make all grace abound toward you; that ye, always having all sufficiency in all things, may abound to every good work:

9     (as it is written, He hath dispersed abroad; he hath given to the poor: his righteousness remaineth for ever.

10     Now he that ministereth seed to the sower both minister bread for your food, and multiply your seed sown, and increase the fruits of your righteousness;)

11     Being enriched in every thing to all bountifulness, which causeth through us thanksgiving to God.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 468 : 8-15

सवाल। — होने का वैज्ञानिक कथन क्या है?

उत्तर। —पदार्थ में कोई जीवन, सत्य, बुद्धिमत्ता नहीं है, न ही पदार्थ। सब अनंत मन और उसकी अनंत अभिव्यक्ति है, भगवान के लिए सभी में है। आत्मा अमर सत्य है; मामला नश्वर त्रुटि है। आत्मा ही वास्तविक और शाश्वत है; पदार्थ असत्य और लौकिक है। आत्मा ईश्वर है, और मनुष्य उसकी छवि और समानता है। इसलिए आदमी भौतिक नहीं है; वह आध्यात्मिक है।

1. 468 : 8-15

Question. — What is the scientific statement of being?

Answer. — There is no life, truth, intelligence, nor substance in matter. All is infinite Mind and its infinite manifestation, for God is All-in-all. Spirit is immortal Truth; matter is mortal error. Spirit is the real and eternal; matter is the unreal and temporal. Spirit is God, and man is His image and likeness. Therefore man is not material; he is spiritual.

2. 477 : 9-17

जो कुछ भी भौतिक है वह नश्वर है। पांच शारीरिक इंद्रियों के लिए, मनुष्य पदार्थ और मन को एकजुट प्रतीत होता है; लेकिन क्राइस्टियन साइंस मनुष्य को ईश्वर के विचार के रूप में प्रकट करता है, और शारीरिक इंद्रियों को नश्वर और दुराचारी होने की घोषणा करता है। ईश्वरीय विज्ञान यह दिखाता है कि यह असंभव है कि एक भौतिक शरीर, मनुष्य होना चाहिए, हालांकि पदार्थ के उच्चतम स्तर के साथ जुड़ा हुआ है, यही इसका गलत नाम है - वास्तविक और पूर्ण मनुष्य, होने का अमर विचार, अविनाशी और शाश्वत

2. 477 : 9-17

Whatever is material is mortal. To the five corporeal senses, man appears to be matter and mind united; but Christian Science reveals man as the idea of God, and declares the corporeal senses to be mortal and erring illusions. Divine Science shows it to be impossible that a material body, though interwoven with matter's highest stratum, misnamed mind, should be man, — the genuine and perfect man, the immortal idea of being, indestructible and eternal.

3. 279 : 13-21, 26-29

आत्मा और पदार्थ न तो सहअस्तित्व कर सकते हैं और न ही सहयोग कर सकते हैं, और सत्य को छोड़कर कोई और नहीं बना सकता है, त्रुटि पैदा कर सकता है, या इसके विपरीत।

अनुपात के अनुसार यह विश्वास गायब हो जाता है कि जीवन और बुद्धि पदार्थ के हैं या होने के अमर तथ्य हैं, और उनका एकमात्र विचार या बुद्धिमत्ता ईश्वर में है। शाश्वत जीवन और सत्य और प्रेम की समझ और प्रदर्शन के माध्यम से ही आत्मा तक पहुंचा जाता है।

एक तार्किक और वैज्ञानिक निष्कर्ष केवल इस ज्ञान के माध्यम से पहुंचता है कि होने के दो आधार नहीं हैं, पदार्थ और मन, लेकिन एक अकेले - मन।

3. 279 : 13-21, 26-29

Spirit and matter can neither coexist nor cooperate, and one can no more create the other than Truth can create error, or vice versa.

In proportion as the belief disappears that life and intelligence are in or of matter, the immortal facts of being are seen, and their only idea or intelligence is in God. Spirit is reached only through the understanding and demonstration of eternal Life and Truth and Love.

A logical and scientific conclusion is reached only through the knowledge that there are not two bases of being, matter and mind, but one alone, — Mind.

4. 301 : 17-23, 24-29

जैसा कि ईश्वर पदार्थ है और मनुष्य ईश्वरीय छवि और समानता है, मनुष्य को आत्मा के पदार्थ की इच्छा करनी चाहिए, केवल पदार्थ की, न कि पदार्थ की और वास्तव में उसने ऐसा किया है। यह विश्वास कि मनुष्य के पास कोई अन्य पदार्थ या मन है, आध्यात्मिक नहीं है और पहले आज्ञा को तोड़ता है, आप एक ईश्वर को, एक मन को स्वीकार करेंगे। … भ्रम, पाप, बीमारी और मृत्यु भौतिक अर्थों की झूठी गवाही से उत्पन्न होती है, जो कि अनंत आत्मा की केंद्रीय दूरी के बाहर एक निश्चित दृष्टिकोण से, मन और पदार्थ की एक उलटी छवि प्रस्तुत करता है और सब कुछ उल्टा हो जाता है।

4. 301 : 17-23, 24-29

As God is substance and man is the divine image and likeness, man should wish for, and in reality has, only the substance of good, the substance of Spirit, not matter. The belief that man has any other substance, or mind, is not spiritual and breaks the First Commandment, Thou shalt have one God, one Mind. … Delusion, sin, disease, and death arise from the false testimony of material sense, which, from a supposed standpoint outside the focal distance of infinite Spirit, presents an inverted image of Mind and substance with everything turned upside down.

5. 269 : 21-28

भौतिक इंद्रियों की गवाही न तो पूर्ण है और न ही दिव्य है। इसलिए मैं अपने आप को यीशु के उपदेशों पर, भविष्यद्वक्ताओं के, और मन के विज्ञान की गवाही पर अनारक्षित रूप से रोपित करता हूं। अन्य नींव वहाँ कोई नहीं हैं। अन्य सभी प्रणालियाँ - सिस्टम पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से ज्ञान के आधार पर भौतिक इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त की जाती हैं - हवा से हिलती हुई चट्टानें हैं, न कि चट्टान पर बने मकान।

5. 269 : 21-28

The testimony of the material senses is neither absolute nor divine. I therefore plant myself unreservedly on the teachings of Jesus, of his apostles, of the prophets, and on the testimony of the Science of Mind. Other foundations there are none. All other systems — systems based wholly or partly on knowledge gained through the material senses — are reeds shaken by the wind, not houses built on the rock.

6. 326 : 8-14

सभी प्रकृति मनुष्य को ईश्वर का प्यार सिखाती है, लेकिन मनुष्य ईश्वर से प्रेम नहीं कर सकता है और आध्यात्मिक चीजों पर अपना पूरा प्यार कायम कर सकता है, जबकि सामग्री से प्रेम कर सकता है या आध्यात्मिक से अधिक उस पर भरोसा कर सकता है।

हमें भौतिक प्रणालियों की नींव का त्याग करना चाहिए, केवल समय-सम्मानित, अगर हम अपने एकमात्र उद्धारकर्ता के रूप में मसीह को प्राप्त करेंगे।

6. 326 : 8-14

All nature teaches God's love to man, but man cannot love God supremely and set his whole affections on spiritual things, while loving the material or trusting in it more than in the spiritual.

We must forsake the foundation of material systems, however time-honored, if we would gain the Christ as our only Saviour.

7. 593: 6 (से 2nd.)

बटुआ. सामग्री में खजाना रखना; त्रुटि।

7. 593 : 6 (to 2nd .)

Purse. Laying up treasures in matter; error.

8. 262 : 17-26

अय्यूब ने कहा: "मैं कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आंखें तुझे देखती हैं;" पुरुष अय्यूब के विचार को प्रतिध्वनित करेंगे, जब पदार्थ का दर्द और सुख पूर्वसूचक होना बंद हो जाएगा। वे फिर जीवन और खुशी, खुशी और दुःख के झूठे अनुमान को छोड़ देंगे, और प्रेमपूर्वक आनंद प्राप्त करने, धैर्य से काम लेने और ईश्वर के विपरीत सभी को जीतने का आनंद प्राप्त करेंगे। एक उच्च दृष्टिकोण से शुरू, कोई अनायास उठता है, यहां तक कि प्रकाश बिना प्रयास के प्रकाश का उत्सर्जन करता है; इसलिये "क्योंकि जहां तेरा धन है वहां तेरा मन भी लगा रहेगा।"

8. 262 : 17-26

Job said: "I have heard of Thee by the hearing of the ear: but now mine eye seeth Thee." Mortals will echo Job's thought, when the supposed pain and pleasure of matter cease to predominate. They will then drop the false estimate of life and happiness, of joy and sorrow, and attain the bliss of loving unselfishly, working patiently, and conquering all that is unlike God. Starting from a higher standpoint, one rises spontaneously, even as light emits light without effort; for "where your treasure is, there will your heart be also."

9. 272 : 19-25

यह भौतिक जीवन के भयावह रूप से परिणाम के विपरीत, दैनिक जीवन के विचार और ईसाईकरण का आध्यात्मिकीकरण है; यह शुद्धता और पवित्रता, कामुकता और अशुद्धता के नीचे की ओर झुकाव और सांसारिक गुरुत्वाकर्षण के विपरीत है, जो वास्तव में क्राइस्टियन साइंस के दिव्य उत्पत्ति और संचालन को प्रमाणित करता है।

9. 272 : 19-25

It is the spiritualization of thought and Christianization of daily life, in contrast with the results of the ghastly farce of material existence; it is chastity and purity, in contrast with the downward tendencies and earthward gravitation of sensualism and impurity, which really attest the divine origin and operation of Christian Science.

10. 322 : 26-5

पदार्थ के सपोसिटिटिव जीवन में विश्वास के तेज अनुभव, साथ ही साथ हमारी निराशा और निरंतर व्यर्थ, हमें थका हुआ बच्चों की तरह दिव्य प्रेम की ओर मोड़ते हैं। तब हम जीवन को दिव्य विज्ञान में सीखना शुरू करते हैं। वीनिंग की इस प्रक्रिया के बिना, "क्या तू खोज कर ईश्वर को खोज सकता है?" सत्य को स्वयं की गलती से छुटकारा देने के लिए इच्छा करना आसान है। मुर्दा लोग क्रिश्चियन साइंस की समझ की तलाश कर सकते हैं, लेकिन वे क्राइस्टचियन साइंस से उनके लिए प्रयास किए बिना तथ्यों को चमकने में सक्षम नहीं होंगे। इस संघर्ष में हर तरह की त्रुटि का त्याग करने और कोई अन्य चेतना नहीं बल्कि अच्छा होने का प्रयास शामिल है।

10. 322 : 26-5

The sharp experiences of belief in the supposititious life of matter, as well as our disappointments and ceaseless woes, turn us like tired children to the arms of divine Love. Then we begin to learn Life in divine Science. Without this process of weaning, "Canst thou by searching find out God?" It is easier to desire Truth than to rid one's self of error. Mortals may seek the understanding of Christian Science, but they will not be able to glean from Christian Science the facts of being without striving for them. This strife consists in the endeavor to forsake error of every kind and to possess no other consciousness but good.

11. 61 : 4-11

मानव के हित में अच्छाई बुराई पर अध्यात्म और पशु पर आधिपत्य होना चाहिए, या सुख कभी नहीं जीता जाएगा। इस खगोलीय स्थिति की प्राप्ति हमारे पूर्वजन्म को कम करेगी, अपराध को कम करेगी, और महत्वाकांक्षा को उच्च लक्ष्य देगी। पाप की हर घाटी को ऊंचा किया जाना चाहिए, और स्वार्थ के हर पहाड़ को नीचे लाया जाना चाहिए, ताकि विज्ञान में हमारे भगवान का राजमार्ग तैयार हो सके।

11. 61 : 4-11

The good in human affections must have ascendency over the evil and the spiritual over the animal, or happiness will never be won. The attainment of this celestial condition would improve our progeny, diminish crime, and give higher aims to ambition. Every valley of sin must be exalted, and every mountain of selfishness be brought low, that the highway of our God may be prepared in Science. 

12. 518 : 15-19

सभी को एक ही सिद्धांत, या पिता, को एक भव्य भाईचारे में रखते हुए, आत्मा में समृद्ध गरीबों की मदद करते हैं। और धन्य है वह आदमी जो दूसरे की भलाई में अपनी भलाई जानता है, अपने भाई की आवश्यकता को देखता है और उसकी आपूर्ति करता है।

12. 518 : 15-19

The rich in spirit help the poor in one grand brotherhood, all having the same Principle, or Father; and blessed is that man who seeth his brother's need and supplieth it, seeking his own in another's good.

13. 451 : 14-18

मनुष्य उस दिशा में चलता है जिस ओर वह देखता है, और जहां उसका खजाना है, वहां उसका दिल भी होगा। यदि हमारी आशाएँ और स्नेह आध्यात्मिक हैं, तो वे ऊपर से आते हैं, नीचे से नहीं, और अतीत की तरह वे आत्मा के फल का उत्पादन करते हैं।

13. 451 : 14-18

Man walks in the direction towards which he looks, and where his treasure is, there will his heart be also. If our hopes and affections are spiritual, they come from above, not from beneath, and they bear as of old the fruits of the Spirit.

14. 390 : 9-11

सत्य हम सभी को आत्मा के सुख के लिए सुखों और दुखों के आदान-प्रदान के लिए मजबूर करेगा।

14. 390 : 9-11

Truth will at length compel us all to exchange the pleasures and pains of sense for the joys of Soul.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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