रविवार 20 दिसंबर, 2020



विषयक्या ब्रह्मांड, मनुष्य सहित, परमाणु बल द्वारा विकसित है?

SubjectIs the Universe, Including Man, Evolved by Atomic Force?

वर्ण पाठ: नीतिवचन 3: 19

यहोवा ने पृथ्वी की नेव बुद्धि ही से डाली; और स्वर्ग को समझ ही के द्वारा स्थिर किया।



Golden Text: Proverbs 3 : 19

The Lord by wisdom hath founded the earth; by understanding hath he established the heavens.




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भजन संहिता 95: 1-6


1     आओ हम यहोवा के लिये ऊंचे स्वर से गाएं, अपने उद्धार की चट्टान का जयजयकार करें!

2     हम धन्यवाद करते हुए उसके सम्मुख आएं, और भजन गाते हुए उसका जयजयकार करें!

3     क्योंकि यहोवा महान ईश्वर है, और सब देवताओं के ऊपर महान राजा है।

4     पृथ्वी के गहिरे स्थान उसी के हाथ में हैं; और पहाड़ों की चोटियां भी उसी की हैं।

5     समुद्र उसका है, और उसी ने उसको बनाया, और स्थल भी उसी के हाथ का रचा है॥

6     आओ हम झुक कर दण्डवत करें, और अपने कर्ता यहोवा के साम्हने घुटने टेकें!

Responsive Reading: Psalm 95 : 1-6

1.     O come, let us sing unto the Lord: let us make a joyful noise to the rock of our salvation.

2.     Let us come before his presence with thanksgiving, and make a joyful noise unto him with psalms.

3.     For the Lord is a great God, and a great King above all gods.

4.     In his hand are the deep places of the earth: the strength of the hills is his also.

5.     The sea is his, and he made it: and his hands formed the dry land.

6.     O come, let us worship and bow down: let us kneel before the Lord our maker.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. उत्पत्ति 1: 1, 26-28, 31 (से 1st.)

1     आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।

26     फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगने वाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।

27     तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।

28     और परमेश्वर ने उन को आशीष दी: और उन से कहा, फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगने वाले सब जन्तुओ पर अधिकार रखो।

31     तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है।

1. Genesis 1 : 1, 26-28, 31 (to 1st .)

1     In the beginning God created the heaven and the earth.

26     And God said, Let us make man in our image, after our likeness: and let them have dominion over the fish of the sea, and over the fowl of the air, and over the cattle, and over all the earth, and over every creeping thing that creepeth upon the earth.

27     So God created man in his own image, in the image of God created he him; male and female created he them.

28     And God blessed them, and God said unto them, Be fruitful, and multiply, and replenish the earth, and subdue it: and have dominion over the fish of the sea, and over the fowl of the air, and over every living thing that moveth upon the earth.

31     And God saw every thing that he had made, and, behold, it was very good.

2. निर्गमन 14 : 5 (यह), 6, 15 (से 1st ,), 15 (बोले), 19-23, 26-28, 30, 31

5     ...मिस्र के राजा को यह समाचार मिला कि वे लोग भाग गए, तब फिरौन और उसके कर्मचारियों का मन उनके विरुद्ध पलट गया, और वे कहने लगे, हम ने यह क्या किया, कि इस्राएलियों को अपनी सेवकाई से छुटकारा देकर जाने दिया?

6     तब उसने अपना रथ जुतवाया और अपनी सेना को संग लिया।

15     तब यहोवा ने मूसा से कहा, ... इस्राएलियों को आज्ञा दे कि यहां से कूच करें।

19     तब परमेश्वर का दूत जो इस्राएली सेना के आगे आगे चला करता था जा कर उनके पीछे हो गया; और बादल का खम्भा उनके आगे से हटकर उनके पीछे जा ठहरा।

20     इस प्रकार वह मिस्रियों की सेना और इस्राएलियों की सेना के बीच में आ गया; और बादल और अन्धकार तो हुआ, तौभी उससे रात को उन्हें प्रकाश मिलता रहा; और वे रात भर एक दूसरे के पास न आए।

21     और मूसा ने अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ाया; और यहोवा ने रात भर प्रचण्ड पुरवाई चलाई, और समुद्र को दो भाग करके जल ऐसा हटा दिया, जिससे कि उसके बीच सूखी भूमि हो गई।

22     तब इस्राएली समुद्र के बीच स्थल ही स्थल पर हो कर चले, और जल उनकी दाहिनी और बाईं ओर दीवार का काम देता था।

23     तब मिस्री, अर्थात फिरौन के सब घोड़े, रथ, और सवार उनका पीछा किए हुए समुद्र के बीच में चले गए।

26     फिर यहोवा ने मूसा से कहा, अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ा, कि जल मिस्रियों, और उनके रथों, और सवारों पर फिर बहने लगे।

27     तब मूसा ने अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ाया, और भोर होते होते क्या हुआ, कि समुद्र फिर ज्यों का त्योंअपने बल पर आ गया; और मिस्री उलटे भागने लगे, परन्तु यहोवा ने उन को समुद्र के बीच ही में झटक दिया।

28     और जल के पलटने से, जितने रथ और सवार इस्राएलियों के पीछे समुद्र में आए थे, सो सब वरन फिरौन की सारी सेना उस में डूब गई, और उस में से एक भी न बचा।

30     और यहोवा ने उस दिन इस्राएलियों को मिस्रियों के वश से इस प्रकार छुड़ाया; और इस्राएलियों ने मिस्रियों को समुद्र के तट पर मरे पड़े हुए देखा।

31     और यहोवा ने मिस्रियों पर जो अपना पराक्रम दिखलाता था, उसको देखकर इस्राएलियों ने यहोवा का भय माना और यहोवा की और उसके दास मूसा की भी प्रतीति की॥

2. Exodus 14 : 5 (it), 6, 15 (to 1st ,), 15 (speak), 19-23, 26-28, 30, 31

5     …it was told the king of Egypt that the people fled: and the heart of Pharaoh and of his servants was turned against the people, and they said, Why have we done this, that we have let Israel go from serving us?

6     And he made ready his chariot, and took his people with him:

15     And the Lord said unto Moses, … speak unto the children of Israel, that they go forward:

19     And the angel of God, which went before the camp of Israel, removed and went behind them; and the pillar of the cloud went from before their face, and stood behind them:

20     And it came between the camp of the Egyptians and the camp of Israel; and it was a cloud and darkness to them, but it gave light by night to these: so that the one came not near the other all the night.

21     And Moses stretched out his hand over the sea; and the Lord caused the sea to go back by a strong east wind all that night, and made the sea dry land, and the waters were divided.

22     And the children of Israel went into the midst of the sea upon the dry ground: and the waters were a wall unto them on their right hand, and on their left.

23     And the Egyptians pursued, and went in after them to the midst of the sea, even all Pharaoh’s horses, his chariots, and his horsemen.

26     And the Lord said unto Moses, Stretch out thine hand over the sea, that the waters may come again upon the Egyptians, upon their chariots, and upon their horsemen.

27     And Moses stretched forth his hand over the sea, and the sea returned to his strength when the morning appeared; and the Egyptians fled against it; and the Lord overthrew the Egyptians in the midst of the sea.

28     And the waters returned, and covered the chariots, and the horsemen, and all the host of Pharaoh that came into the sea after them; there remained not so much as one of them.

30     Thus the Lord saved Israel that day out of the hand of the Egyptians; and Israel saw the Egyptians dead upon the sea shore.

31     And Israel saw that great work which the Lord did upon the Egyptians: and the people feared the Lord, and believed the Lord, and his servant Moses.

3. भजन संहिता 114 : 1-8

1     जब इस्राएल ने मिस्त्र से, अर्थात याकूब के घराने ने अन्य भाषा वालों के बीच में कूच किया,

2     तब यहूदा यहोवा का पवित्र स्थान और इस्राएल उसके राज्य के लोग हो गए॥

3     समुद्र देखकर भागा, यर्दन नदी उलटी बही।

4     पहाड़ मेढ़ों की नाईं उछलने लगे, और पहाड़ियां भेड़- बकरियों के बच्चों की नाईं उछलने लगीं॥

5     हे समुद्र, तुझे क्या हुआ, कि तू भागा? और हे यर्दन तुझे क्या हुआ, कि तू उलटी बही?

6     हे पहाड़ों तुम्हें क्या हुआ, कि तुम भेड़ों की नाईं, और हे पहाड़ियों तुम्हें क्या हुआ, कि तुम भेड़- बकरियों के बच्चों की नाईं उछलीं?

7     हे पृथ्वी प्रभु के साम्हने, हां याकूब के परमेश्वर के साम्हने थरथरा।

8     वह चट्टान को जल का ताल, चकमक के पत्थर को जल का सोता बना डालता है॥

3. Psalm 114 : 1-8

1     When Israel went out of Egypt, the house of Jacob from a people of strange language;

2     Judah was his sanctuary, and Israel his dominion.

3     The sea saw it, and fled: Jordan was driven back.

4     The mountains skipped like rams, and the little hills like lambs.

5     What ailed thee, O thou sea, that thou fleddest? thou Jordan, that thou wast driven back?

6     Ye mountains, that ye skipped like rams; and ye little hills, like lambs?

7     Tremble, thou earth, at the presence of the Lord, at the presence of the God of Jacob;

8     Which turned the rock into a standing water, the flint into a fountain of waters.

4. मत्ती 14 : 22 (से 1st ,), 23 (से :), 24-33

22     और उस ने तुरन्त अपने चेलों को बरबस नाव पर चढ़ाया।

23     वह लोगों को विदा करके, प्रार्थना करने को अलग पहाड़ पर चढ़ गया।

24     उस समय नाव झील के बीच लहरों से डगमगा रही थी, क्योंकि हवा साम्हने की थी।

25     और वह रात के चौथे पहर झील पर चलते हुए उन के पास आया।

26     चेले उस को झील पर चलते हुए देखकर घबरा गए! और कहने लगे, वह भूत है; और डर के मारे चिल्ला उठे।

27     यीशु ने तुरन्त उन से बातें की, और कहा; ढाढ़स बान्धो; मैं हूं; डरो मत।

28     पतरस ने उस को उत्तर दिया, हे प्रभु, यदि तू ही है, तो मुझे अपने पास पानी पर चलकर आने की आज्ञा दे।

29     उस ने कहा, आ: तब पतरस नाव पर से उतरकर यीशु के पास जाने को पानी पर चलने लगा।

30     पर हवा को देखकर डर गया, और जब डूबने लगा, तो चिल्लाकर कहा; हे प्रभु, मुझे बचा।

31     यीशु ने तुरन्त हाथ बढ़ाकर उसे थाम लिया, और उस से कहा, हे अल्प-विश्वासी, तू ने क्यों सन्देह किया?

32     जब वे नाव पर चढ़ गए, तो हवा थम गई।

33     इस पर जो नाव पर थे, उन्होंने उसे दण्डवत करके कहा; सचमुच तू परमेश्वर का पुत्र है॥

4. Matthew 14 : 22 (to 1st ,), 23 (to :), 24-33

22     And straightway Jesus constrained his disciples to get into a ship,

23     And when he had sent the multitudes away, he went up into a mountain apart to pray:

24     But the ship was now in the midst of the sea, tossed with waves: for the wind was contrary.

25     And in the fourth watch of the night Jesus went unto them, walking on the sea.

26     And when the disciples saw him walking on the sea, they were troubled, saying, It is a spirit; and they cried out for fear.

27     But straightway Jesus spake unto them, saying, Be of good cheer; it is I; be not afraid.

28     And Peter answered him and said, Lord, if it be thou, bid me come unto thee on the water.

29     And he said, Come. And when Peter was come down out of the ship, he walked on the water, to go to Jesus.

30     But when he saw the wind boisterous, he was afraid; and beginning to sink, he cried, saying, Lord, save me.

31     And immediately Jesus stretched forth his hand, and caught him, and said unto him, O thou of little faith, wherefore didst thou doubt?

32     And when they were come into the ship, the wind ceased.

33     Then they that were in the ship came and worshipped him, saying, Of a truth thou art the Son of God.

5. प्रकाशित वाक्य 21: 3, 6, 7

3     फिर मैं ने सिंहासन में से किसी को ऊंचे शब्द से यह कहते सुना, कि देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है; वह उन के साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उन के साथ रहेगा; और उन का परमेश्वर होगा।

6     फिर उस ने मुझ से कहा, ये बातें पूरी हो गई हैं, मैं अलफा और ओमिगा, आदि और अन्त हूं: मैं प्यासे को जीवन के जल के सोते में से सेंतमेंत पिलाऊंगा।

7     जो जय पाए, वही इन वस्तुओं का वारिस होगा; और मैं उसका परमेश्वर होऊंगा, और वह मेरा पुत्र होगा।

5. Revelation 21 : 3, 6, 7

3     And I heard a great voice out of heaven saying, Behold, the tabernacle of God is with men, and he will dwell with them, and they shall be his people, and God himself shall be with them, and be their God.

6     And he said unto me, It is done. I am Alpha and Omega, the beginning and the end. I will give unto him that is athirst of the fountain of the water of life freely.

7     He that overcometh shall inherit all things; and I will be his God, and he shall be my son.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 583 : 20 (से .), 23 (सिद्धांत)-25

रचनाकार। ...सिद्धांत, ईश्वर, जिसने वह सब बनाया था जो स्वयं एक परमाणु या एक तत्व नहीं बना सकता था।

1. 583 : 20 (to .), 23 (Principle)-25

Creator. … Principle; God, who made all that was made and could not create an atom or an element the opposite of Himself.

2. 295 : 5-15

भगवान मनुष्य सहित ब्रह्मांड का निर्माण और संचालन करता है। ब्रह्मांड आध्यात्मिक विचारों से भरा है, जिसे वह विकसित करता है, और वे मन के आज्ञाकारी हैं जो उन्हें बनाता है। नश्वर मन आध्यात्मिक को भौतिक में बदल देगा, और फिर इस त्रुटि की नश्वरता से बचने के लिए मनुष्य के मूल स्व को पुनर्प्राप्त करेगा। ईश्वर की स्वयं की छवि में बनाए गए नश्वर अमर की तरह नहीं हैं; लेकिन अनंत आत्मा सभी होने के नाते, नश्वर चेतना वैज्ञानिक तथ्य के लिए अंतिम पैदावार होगी और गायब हो जाएगी, और सही, और हमेशा के लिए होने का वास्तविक अर्थ प्रकट होगा।

2. 295 : 5-15

God creates and governs the universe, including man. The universe is filled with spiritual ideas, which He evolves, and they are obedient to the Mind that makes them. Mortal mind would transform the spiritual into the material, and then recover man's original self in order to escape from the mortality of this error. Mortals are not like immortals, created in God's own image; but infinite Spirit being all, mortal consciousness will at last yield to the scientific fact and disappear, and the real sense of being, perfect and forever intact, will appear.

3. 539 : 19-1

यह कहना गलत है कि सत्य और निर्माण में त्रुटि। दृष्टांत और तर्क में, यह मिथ्या हमारे मास्टर द्वारा स्व-स्पष्ट रूप से गलत है। इन बिंदुओं को फरीसियों के साथ विवाद करके और सृजन के विज्ञान के लिए बहस करके, यीशु ने कहा: "लोग क्या झाडिय़ों से अंगूर तोड़ते?" पॉल ने पूछा: "ज्योति और अन्धकार की क्या संगति? और मसीह का बलियाल के साथ क्या लगाव?"

यीशु के दिव्य मूल ने उन्हें मानव शक्ति से अधिक सृजन के तथ्यों को उजागर करने के लिए दिया, और एक मन को प्रदर्शित करता है जो मनुष्य और ब्रह्मांड को बनाता है और नियंत्रित करता है। सृष्टि का विज्ञान, यीशु के जन्म में इतना विशिष्ट, उसकी बुद्धिमानी और कम से कम समझ वाली बातों को प्रेरित करता था, और उसके अद्भुत प्रदर्शनों का आधार था।

3. 539 : 19-1

It is false to say that Truth and error commingle in creation. In parable and argument, this falsity is exposed by our Master as self-evidently wrong. Disputing these points with the Pharisees and arguing for the Science of creation, Jesus said: "Do men gather grapes of thorns?" Paul asked: "What communion hath light with darkness? And what concord hath Christ with Belial?"

The divine origin of Jesus gave him more than human power to expound the facts of creation, and demonstrate the one Mind which makes and governs man and the universe. The Science of creation, so conspicuous in the birth of Jesus, inspired his wisest and least-understood sayings, and was the basis of his marvellous demonstrations.

4. 31 : 4-11

यीशु ने स्वीकार किया कि मांस का कोई संबंध नहीं है। उसने कहा: "पृथ्वी पर किसी को अपना पिता न कहना, क्योंकि तुम्हारा एक ही पिता है, जो स्वर्ग में है।" फिर से उसने पूछा: "कौन है मेरी माता? और कौन है मेरे भाई?" यह समझकर कि यह वे हैं जो अपने पिता की इच्छा को पूरा करते हैं। हमारे पास पिता के नाम से किसी भी आदमी को बुलाने का कोई रिकॉर्ड नहीं है। उन्होंने आत्मा, ईश्वर को एकमात्र निर्माता, और इसलिए सभी के पिता के रूप में मान्यता दी।

4. 31 : 4-11

Jesus acknowledged no ties of the flesh. He said: "Call no man your father upon the earth: for one is your Father, which is in heaven." Again he asked: "Who is my mother, and who are my brethren," implying that it is they who do the will of his Father. We have no record of his calling any man by the name of father. He recognized Spirit, God, as the only creator, and therefore as the Father of all.

5. 134 : 31-10

एक चमत्कार भगवान के नियम को पूरा करता है, लेकिन उस कानून का उल्लंघन नहीं करता है। वर्तमान में यह तथ्य चमत्कार से अधिक रहस्यमय प्रतीत होता है। भजनहार ने गाया: “हे समुद्र, तुझे क्या हुआ, कि तू भागा? और हे यर्दन तुझे क्या हुआ, कि तू उलटी बही? हे पहाड़ों तुम्हें क्या हुआ, कि तुम भेड़ों की नाईं, और हे पहाड़ियों तुम्हें क्या हुआ, कि तुम भेड़- बकरियों के बच्चों की नाईं उछलीं? हे पृथ्वी प्रभु के साम्हने, हां याकूब के परमेश्वर के साम्हने थरथरा” यह चमत्कार किसी विकार का परिचय नहीं देता है, लेकिन मौलिक आदेश को प्रकट करता है, भगवान के अपरिवर्तनीय कानून के विज्ञान की स्थापना। आध्यात्मिक विकास अकेले ईश्वरीय शक्ति के व्यायाम के योग्य है।

5. 134 : 31-10

A miracle fulfils God's law, but does not violate that law. This fact at present seems more mysterious than the miracle itself. The Psalmist sang: "What ailed thee, O thou sea, that thou fleddest? Thou Jordan, that thou wast driven back? Ye mountains, that ye skipped like rams, and ye little hills, like lambs? Tremble, thou earth, at the presence of the Lord, at the presence of the God of Jacob." The miracle introduces no disorder, but unfolds the primal order, establishing the Science of God's unchangeable law. Spiritual evolution alone is worthy of the exercise of divine power.

6. 507 : 24-6

अनंत मन मानसिक अणु से अनंत तक सभी को बनाता और नियंत्रित करता है। सभी का यह दिव्य सिद्धांत उनकी रचना के दौरान विज्ञान और कला, और मनुष्य और ब्रह्मांड की अमरता को व्यक्त करता है। सृजन हमेशा दिखाई दे रहा है, और हमेशा अपने अटूट स्रोत की प्रकृति से प्रकट होता रहना चाहिए। नश्वर भाव इस प्रकार प्रकट होता है और विचार सामग्री कहता है। इस प्रकार, गलत अर्थ में, दिव्य विचार मानव या भौतिक विश्वास के स्तर तक गिर जाता है, जिसे नश्वर मनुष्य कहा जाता है। लेकिन बीज अपने आप में है, केवल दिव्य मन ही सब कुछ है और सभी को पुन: उत्पन्न करता है — जैसा कि मन गुणक है, और मन का अनंत विचार, मनुष्य और ब्रह्मांड, उत्पाद है। एक विचार, एक बीज, या एक फूल की एकमात्र बुद्धि या पदार्थ ईश्वर है, जो इसका निर्माता है।

6. 507 : 24-6

Infinite Mind creates and governs all, from the mental molecule to infinity. This divine Principle of all expresses Science and art throughout His creation, and the immortality of man and the universe. Creation is ever appearing, and must ever continue to appear from the nature of its inexhaustible source. Mortal sense inverts this appearing and calls ideas material. Thus misinterpreted, the divine idea seems to fall to the level of a human or material belief, called mortal man. But the seed is in itself, only as the divine Mind is All and reproduces all — as Mind is the multiplier, and Mind's infinite idea, man and the universe, is the product. The only intelligence or substance of a thought, a seed, or a flower is God, the creator of it.

7. 547 : 15-30

मृत्यु दर के अपने इतिहास में, भौतिक आधार से डार्विन के विकास का सिद्धांत अधिकांश सिद्धांतों की तुलना में अधिक सुसंगत है। संक्षेप में, यह डार्विन का सिद्धांत है, — वह मन, मनुष्य सहित ब्रह्मांड को फिर से बनाने के लिए इसके विपरीत, द्रव्य और अंत पदार्थ को उत्पन्न करता है। भौतिक विकास का तात्पर्य है कि महान प्रथम कारण सामग्री बन जाना चाहिए, और बाद में या तो मन में वापस आना चाहिए या धूल और शून्य में नीचे जाना चाहिए।

शास्त्र बहुत पवित्र हैं। हमारा उद्देश्य उन्हें आध्यात्मिक रूप से समझना होगा, केवल इस समझ से सत्य को प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य सहित ब्रह्मांड का सही सिद्धांत भौतिक इतिहास में नहीं बल्कि आध्यात्मिक विकास में है। प्रेरित विचार ब्रह्मांड की एक सामग्री, कामुक, और नश्वर सिद्धांत को त्यागता है, और आध्यात्मिक और अमरता को अपनाता है।

7. 547 : 15-30

In its history of mortality, Darwin's theory of evolution from a material basis is more consistent than most theories. Briefly, this is Darwin's theory, — that Mind produces its opposite, matter, and endues matter with power to recreate the universe, including man. Material evolution implies that the great First Cause must become material, and afterwards must either return to Mind or go down into dust and nothingness.

The Scriptures are very sacred. Our aim must be to have them understood spiritually, for only by this understanding can truth be gained. The true theory of the universe, including man, is not in material history but in spiritual development. Inspired thought relinquishes a material, sensual, and mortal theory of the universe, and adopts the spiritual and immortal.

8. 303 : 10-20

जो कुछ भी मन, जीवन, सत्य और प्रेम को दर्शाता है, आध्यात्मिक रूप से कल्पना और सामने लाया गया है; लेकिन यह कथन कि मनुष्य की कल्पना की जाती है और आध्यात्मिक और भौतिक दोनों रूप से विकसित होता है, या भगवान और मनुष्य दोनों द्वारा, इस शाश्वत सत्य का खंडन करता है। युगों की सारी आपाधापी इन दोनों विरोधाभासों को कभी सच नहीं बना सकती। दिव्य विज्ञान इस भ्रम की जड़ पर कुल्हाड़ी मारता है कि जीवन, या मन, भौतिक शरीर में है या उससे बनता है, और विज्ञान अंततः इस भ्रम को सभी त्रुटि के आत्म-विनाश और विज्ञान के जीवन की समझदार समझ के माध्यम से नष्ट कर देगा।

8. 303 : 10-20

Whatever reflects Mind, Life, Truth, and Love, is spiritually conceived and brought forth; but the statement that man is conceived and evolved both spiritually and materially, or by both God and man, contradicts this eternal truth. All the vanity of the ages can never make both these contraries true. Divine Science lays the axe at the root of the illusion that life, or mind, is formed by or is in the material body, and Science will eventually destroy this illusion through the self-destruction of all error and the beatified understanding of the Science of Life.

9. 68 : 27-16

क्रिस्चियन साइंस अभियोग प्रस्तुत करता है, अभिवृद्धि नहीं; यह अणु से मन तक कोई भौतिक विकास नहीं दर्शाता है, लेकिन मनुष्य और ब्रह्मांड के लिए दिव्य मन का एक संस्कार है। मानव पीढ़ी के रूप में आनुपातिक रूप से बंद हो जाता है, शाश्वत के सामंजस्यपूर्ण लिंक, आध्यात्मिक रूप से विवेकी होंगे; और मनुष्य, पृथ्वी के पृथ्वी पर नहीं बल्कि परमेश्वर के साथ सह-अस्तित्व में दिखाई देगा। मनुष्य और ब्रह्मांड का वैज्ञानिक तथ्य आत्मा से विकसित होता है, और इसलिए आध्यात्मिक हैं, जैसा कि दिव्य विज्ञान में तय किया गया है, इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य केवल स्वास्थ्य की भावना प्राप्त करते हैं क्योंकि वे पाप और बीमारी की भावना को खो देते हैं। मनुष्य कभी भी यह नहीं मान सकता कि मनुष्य एक निर्माता है। पहले से ही बनाए गए भगवान के बच्चों को पहचान लिया जाएगा क्योंकि मनुष्य होने का सत्य पाता है। इस प्रकार यह है कि असली, आदर्श आदमी अनुपात में प्रकट होता है क्योंकि झूठ और सामग्री गायब हो जाती है। अब शादी करने या "विवाह में दिए जाने" के लिए न तो मनुष्य की निरंतरता को बंद करता है और न ही भगवान की अनंत योजना में बढ़ती संख्या की उसकी भावना। आध्यात्मिक रूप से यह समझने के लिए कि एक रचनाकार है, ईश्वर, सारी सृष्टि को उजागर करता है, शास्त्रों की पुष्टि करता है, बिना किसी पक्षपात के, बिना किसी पीड़ा के, और मनुष्य की मृत्यु और सही और शाश्वत का मधुर आश्वासन लाता है।

9. 68 : 27-16

Christian Science presents unfoldment, not accretion; it manifests no material growth from molecule to mind, but an impartation of the divine Mind to man and the universe. Proportionately as human generation ceases, the unbroken links of eternal, harmonious being will be spiritually discerned; and man, not of the earth earthly but coexistent with God, will appear. The scientific fact that man and the universe are evolved from Spirit, and so are spiritual, is as fixed in divine Science as is the proof that mortals gain the sense of health only as they lose the sense of sin and disease. Mortals can never understand God's creation while believing that man is a creator. God's children already created will be cognized only as man finds the truth of being. Thus it is that the real, ideal man appears in proportion as the false and material disappears. No longer to marry or to be "given in marriage" neither closes man's continuity nor his sense of increasing number in God's infinite plan. Spiritually to understand that there is but one creator, God, unfolds all creation, confirms the Scriptures, brings the sweet assurance of no parting, no pain, and of man deathless and perfect and eternal.

10. 502 : 27-5

रचनात्मक सिद्धांत - जीवन, सत्य और प्रेम - ईश्वर है। ब्रह्मांड ईश्वर को दर्शाता है। लेकिन एक रचनाकार और एक रचना है। इस रचना में आध्यात्मिक विचारों और उनकी पहचानों का खुलासा होता है, जो अनंत मन में समाहित हैं और हमेशा के लिए परिलक्षित होते हैं। ये विचार अनंत से लेकर अनंत तक हैं, और उच्चतम विचार ईश्वर के पुत्र और पुत्रियाँ हैं।

10. 502 : 27-5

The creative Principle — Life, Truth, and Love — is God. The universe reflects God. There is but one creator and one creation. This creation consists of the unfolding of spiritual ideas and their identities, which are embraced in the infinite Mind and forever reflected. These ideas range from the infinitesimal to infinity, and the highest ideas are the sons and daughters of God.


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मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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