रविवार 2 फरवरी, 2020 |

रविवार 2 फरवरी, 2020



विषयप्रेम

SubjectLove

वर्ण पाठ: I यूहन्ना 4 : 11

हे प्रियो, जब परमेश्वर ने हम से ऐसा प्रेम किया, तो हम को भी आपस में प्रेम रखना चाहिए।



Golden Text: I John 4 : 11

Beloved, if God so loved us, we ought also to love one another.




PDF Downloads:


पाठ के ऑडियो के लिए यहां क्लिक करें

YouTube पर सुनने के लिए यहां क्लिक करें

████████████████████████████████████████████████████████████████████████


I यूहन्ना 3 : 18 • लूका 6: 31 • I यूहन्ना 3: 17, 16 • यूहन्ना 15 : 13


18     हे बालकों, हम वचन और जीभ ही से नहीं, पर काम और सत्य के द्वारा भी प्रेम करें।

31     और जैसा तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें, तुम भी उन के साथ वैसा ही करो।

17     पर जिस किसी के पास संसार की संपत्ति हो और वह अपने भाई को कंगाल देख कर उस पर तरस न खाना चाहे, तो उस में परमेश्वर का प्रेम क्योंकर बना रह सकता है?

16     हम ने प्रेम इसी से जाना, कि उस ने हमारे लिये अपने प्राण दे दिए; और हमें भी भाइयों के लिये प्राण देना चाहिए।

13     इस से बड़ा प्रेम किसी का नहीं, कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे।

Responsive Reading: I John 3 : 18 ; Luke 6 : 31 ; I John 3 : 17, 16 ; John 15 : 13

18.     My little children, let us not love in word, neither in tongue; but in deed and in truth.

31.     And as ye would that men should do to you, do ye also to them likewise.

17.     But whoso hath this world’s good, and seeth his brother have need, and shutteth up his bowels of compassion from him, how dwelleth the love of God in him?

16.     Hereby perceive we the love of God, because he laid down his life for us: and we ought to lay down our lives for the brethren.

13.     Greater love hath no man than this, that a man lay down his life for his friends.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यिर्मयाह 5 : 1

1     यरूशलेम की सड़कों में इधर उधर दौड़कर देखो! उसके चौकों में ढूंढ़ो यदि कोई ऐसा मिल सके जो न्याय से काम करे और सच्चाई का खोजी हो; तो मैं उसका पाप क्षमा करूंगा।

1. Jeremiah 5 : 1

1     Run ye to and fro through the streets of Jerusalem, and see now, and know, and seek in the broad places thereof, if ye can find a man, if there be any that executeth judgment, that seeketh the truth; and I will pardon it.

2. यहेजकेल 13 : 1, 4, 5

1     यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुंचा,

4     हे इस्राएल, तेरे भविष्यद्वक्ता खण्डहरों में की लोमडिय़ों के समान बने हैं।

5     तुम ने नाकों में चढ़ कर इस्राएल के घराने के लिये भीत नहीं सुधारी, जिस से वे यहोवा के दिन युद्ध में स्थिर रह सकते।

2. Ezekiel 13 : 1, 4, 5

1     And the word of the Lord came unto me, saying,

4     O Israel, thy prophets are like the foxes in the deserts.

5     Ye have not gone up into the gaps, neither made up the hedge for the house of Israel to stand in the battle in the day of the Lord.

3. यहेजकेल 22 : 30

30     और मैं ने उन में ऐसा मनुष्य ढूंढ़ना चाहा जो बाड़े को सुधारे और देश के निमित्त नाके में मेरे साम्हने ऐसा खड़ा हो कि मुझे उसको नाश न करना पड़े, परन्तु ऐसा कोई न मिला।

3. Ezekiel 22 : 30

30     And I sought for a man among them, that should make up the hedge, and stand in the gap before me for the land, that I should not destroy it: but I found none.

4. आमोस 9 : 9, 11

9     मेरी आज्ञा से इस्राएल का घराना सब जातियों में ऐसा चाला जाएगा जैसा अन्न चलनी में चाला जाता है, परन्तु उसका एक भी पुष्ट दाना भूमि पर न गिरेगा।

11     उस समय मैं दाऊद की गिरी हुई झोंपड़ी को खड़ा करूंगा, और उसके बाड़े के नाकों को सुधारूंगा, और उसके खण्डहरों को फिर बनाऊंगा, और जैसा वह प्राचीनकाल से था, उसको वैसा ही बना दुंगा;

4. Amos 9 : 9, 11

9     For, lo, I will command, and I will sift the house of Israel among all nations, like as corn is sifted in a sieve, yet shall not the least grain fall upon the earth.

11     In that day will I raise up the tabernacle of David that is fallen, and close up the breaches thereof; and I will raise up his ruins, and I will build it as in the days of old:

5. यशायाह 58 : 12

12     और तेरे वंश के लोग बहुत काल के उजड़े हुए स्थानों को फिर बसाएंगे; तू पीढ़ी पीढ़ी की पड़ी हुई नेव पर घर उठाएगा; तेरा नाम टूटे हुए बाड़े का सुधारक और पथों का ठीक करने वाला पड़ेगा॥

5. Isaiah 58 : 12

12     And they that shall be of thee shall build the old waste places: thou shalt raise up the foundations of many generations; and thou shalt be called, The repairer of the breach, The restorer of paths to dwell in.

6. मत्ती 1 : 1

1     इब्राहीम की सन्तान, दाऊद की सन्तान, यीशु मसीह की वंशावली।

6. Matthew 1 : 1

1     The book of the generation of Jesus Christ, the son of David, the son of Abraham.

7. मत्ती 9 : 35-38

35     और यीशु सब नगरों और गांवों में फिरता रहा और उन की सभाओं में उपदेश करता, और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और हर प्रकार की बीमारी और दुर्बलता को दूर करता रहा।

36     जब उस ने भीड़ को देखा तो उस को लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे उन भेड़ों की नाईं जिनका कोई रखवाला न हो, व्याकुल और भटके हुए से थे।

37     तब उस ने अपने चेलों से कहा, पक्के खेत तो बहुत हैं पर मजदूर थोड़े हैं।

38     इसलिये खेत के स्वामी से बिनती करो कि वह अपने खेत काटने के लिये मजदूर भेज दे॥

7. Matthew 9 : 35-38

35     And Jesus went about all the cities and villages, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing every sickness and every disease among the people.

36     But when he saw the multitudes, he was moved with compassion on them, because they fainted, and were scattered abroad, as sheep having no shepherd.

37     Then saith he unto his disciples, The harvest truly is plenteous, but the labourers are few;

38     Pray ye therefore the Lord of the harvest, that he will send forth labourers into his harvest.

8. मत्ती 10 : 5-8

5     इन बारहों को यीशु ने यह आज्ञा देकर भेजा कि अन्यजातियों की ओर न जाना, और सामरियों के किसी नगर में प्रवेश न करना।

6     परन्तु इस्राएल के घराने ही की खोई हुई भेड़ों के पास जाना।

7     और चलते चलते प्रचार कर कहो कि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।

8     बीमारों को चंगा करो: मरे हुओं को जिलाओ: कोढिय़ों को शुद्ध करो: दुष्टात्माओं को निकालो: तुम ने सेंतमेंत पाया है, सेंतमेंत दो।

8. Matthew 10 : 5-8

5     These twelve Jesus sent forth, and commanded them, saying, Go not into the way of the Gentiles, and into any city of the Samaritans enter ye not:

6     But go rather to the lost sheep of the house of Israel.

7     And as ye go, preach, saying, The kingdom of heaven is at hand.

8     Heal the sick, cleanse the lepers, raise the dead, cast out devils: freely ye have received, freely give.

9. मत्ती 5 : 38-47

38     तुम सुन चुके हो, कि कहा गया था, कि आंख के बदले आंख, और दांत के बदले दांत।

39     परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि बुरे का सामना न करना; परन्तु जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उस की ओर दूसरा भी फेर दे।

40     और यदि कोई तुझ पर नालिश करके तेरा कुरता लेना चाहे, तो उसे दोहर भी ले लेने दे।

41     और जो कोई तुझे कोस भर बेगार में ले जाए तो उसके साथ दो कोस चला जा।

42     जो कोई तुझ से मांगे, उसे दे; और जो तुझ से उधार लेना चाहे, उस से मुंह न मोड़॥

43     तुम सुन चुके हो, कि कहा गया था; कि अपने पड़ोसी से प्रेम रखना, और अपने बैरी से बैर।

44     परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सताने वालों के लिये प्रार्थना करो।

45     जिस से तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे क्योंकि वह भलों और बुरों दोनो पर अपना सूर्य उदय करता है, और धमिर्यों और अधमिर्यों दोनों पर मेंह बरसाता है।

46     क्योंकि यदि तुम अपने प्रेम रखने वालों ही से प्रेम रखो, तो तुम्हारे लिये क्या फल होगा? क्या महसूल लेने वाले भी ऐसा ही नहीं करते?

47     और यदि तुम केवल अपने भाइयों ही को नमस्कार करो, तो कौन सा बड़ा काम करते हो? क्या अन्यजाति भी ऐसा नहीं करते?

9. Matthew 5 : 38-47

38     Ye have heard that it hath been said, An eye for an eye, and a tooth for a tooth:

39     But I say unto you, That ye resist not evil: but whosoever shall smite thee on thy right cheek, turn to him the other also.

40     And if any man will sue thee at the law, and take away thy coat, let him have thy cloke also.

41     And whosoever shall compel thee to go a mile, go with him twain.

42     Give to him that asketh thee, and from him that would borrow of thee turn not thou away.

43     Ye have heard that it hath been said, Thou shalt love thy neighbour, and hate thine enemy.

44     But I say unto you, Love your enemies, bless them that curse you, do good to them that hate you, and pray for them which despitefully use you, and persecute you;

45     That ye may be the children of your Father which is in heaven: for he maketh his sun to rise on the evil and on the good, and sendeth rain on the just and on the unjust.

46     For if ye love them which love you, what reward have ye? do not even the publicans the same?

47     And if ye salute your brethren only, what do ye more than others? do not even the publicans so?

10. यूहन्ना 15 : 12

12     मेरी आज्ञा यह है, कि जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो।

10. John 15 : 12

12     This is my commandment, That ye love one another, as I have loved you.

11. यूहन्ना 17 : 1, 6, 9, 10, 20, 26

1     यीशु ने ये बातें कहीं और अपनी आंखे आकाश की ओर उठाकर कहा, हे पिता, वह घड़ी आ पहुंची, अपने पुत्र की महिमा कर, कि पुत्र भी तेरी महिमा करे।

6     मैं ने तेरा नाम उन मनुष्यों पर प्रगट किया जिन्हें तू ने जगत में से मुझे दिया: वे तेरे थे और तू ने उन्हें मुझे दिया और उन्होंने तेरे वचन को मान लिया है।

9     मैं उन के लिये बिनती करता हूं, संसार के लिये बिनती नहीं करता हूं परन्तु उन्हीं के लिये जिन्हें तू ने मुझे दिया है, क्योंकि वे तेरे हैं।

10     और जो कुछ मेरा है वह सब तेरा है; और जो तेरा है वह मेरा है; और इन से मेरी महिमा प्रगट हुई है।

20     मैं केवल इन्हीं के लिये बिनती नहीं करता, परन्तु उन के लिये भी जो इन के वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे, कि वे सब एक हों।

26     और मैं ने तेरा नाम उन को बताया और बताता रहूंगा कि जो प्रेम तुझ को मुझ से था, वह उन में रहे और मैं उन में रहूं॥

11. John 17 : 1, 6, 9, 10, 20, 26

1     These words spake Jesus, and lifted up his eyes to heaven, and said, Father, the hour is come; glorify thy Son, that thy Son also may glorify thee:

6     I have manifested thy name unto the men which thou gavest me out of the world: thine they were, and thou gavest them me; and they have kept thy word.

9     I pray for them: I pray not for the world, but for them which thou hast given me; for they are thine.

10     And all mine are thine, and thine are mine; and I am glorified in them.

20     Neither pray I for these alone, but for them also which shall believe on me through their word;

26     And I have declared unto them thy name, and will declare it: that the love wherewith thou hast loved me may be in them, and I in them.

12. कुलुस्सियों 1 : 9-11

9     इसी लिये जिस दिन से यह सुना है, हम भी तुम्हारे लिये यह प्रार्थना करने और बिनती करने से नहींचूकते कि तुम सारे आत्मिक ज्ञान और समझ सहित परमेश्वर की इच्छा की पहिचान में परिपूर्ण हो जाओ।

10     ताकि तुम्हारा चाल-चलन प्रभु के योग्य हो, और वह सब प्रकार से प्रसन्न हो, और तुम में हर प्रकार के भले कामों का फल लगे, और परमेश्वर की पहिचान में बढ़ते जाओ।

11     और उस की महिमा की शक्ति के अनुसार सब प्रकार की सामर्थ से बलवन्त होते जाओ, यहां तक कि आनन्द के साथ हर प्रकार से धीरज और सहनशीलता दिखा सको।

12. Colossians 1 : 9-11

9     For this cause we also, since the day we heard it, do not cease to pray for you, and to desire that ye might be filled with the knowledge of his will in all wisdom and spiritual understanding;

10     That ye might walk worthy of the Lord unto all pleasing, being fruitful in every good work, and increasing in the knowledge of God;

11     Strengthened with all might, according to his glorious power, unto all patience and longsuffering with joyfulness;

13. 1 तीमुथियुस 2 : 1-4, 8

1     अब मैं सब से पहिले यह उपदेश देता हूं, कि बिनती, और प्रार्थना, और निवेदन, और धन्यवाद, सब मनुष्यों के लिये किए जाएं।

2     राजाओं और सब ऊंचे पद वालों के निमित्त इसलिये कि हम विश्राम और चैन के साथ सारी भक्ति और गम्भीरता से जीवन बिताएं।

3     यह हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर को अच्छा लगता, और भाता भी है।

4     वह यह चाहता है, कि सब मनुष्यों का उद्धार हो; और वे सत्य को भली भांति पहिचान लें।

8     सो मैं चाहता हूं, कि हर जगह पुरूष बिना क्रोध और विवाद के पवित्र हाथों को उठा कर प्रार्थना किया करें।

13. 1 Timothy 2 : 1-4, 8

1     I exhort therefore, that, first of all, supplications, prayers, intercessions, and giving of thanks, be made for all men;

2     For kings, and for all that are in authority; that we may lead a quiet and peaceable life in all godliness and honesty.

3     For this is good and acceptable in the sight of God our Saviour;

4     Who will have all men to be saved, and to come unto the knowledge of the truth.

8     I will therefore that men pray every where, lifting up holy hands, without wrath and doubting.

14. याकूब 5 : 16 (प्रार्थना करना) (से ,), 16 (यह)

16     ...एक दूसरे के लिये प्रार्थना करो...धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है।

14. James 5 : 16 (pray) (to ,), 16 (The)

16     …pray one for another, … The effectual fervent prayer of a righteous man availeth much.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 266 : 18 (यूनिवर्सल)-19

सार्वभौमिक प्रेम क्राइस्टियन साइंस में दिव्य तरीका है।

1. 266 : 18 (Universal)-19

Universal Love is the divine way in Christian Science.

2. 454 : 17-24

ईश्वर और मनुष्य के लिए प्यार हीलिंग और शिक्षण दोनों में सच्चा प्रोत्साहन है। प्रेम प्रेरणा देता है, रोशनी करता है, नामित करता है और मार्ग प्रशस्त करता है। सही इरादों ने विचार, और ताकत और बोलने और कार्रवाई करने की स्वतंत्रता को चुटकी दी। सत्य की वेदी पर प्रेम पुरोहिती है। दिव्य प्रेम के लिए धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करें नश्वर मन के पानी पर आगे बढ़ने के लिए, और सही अवधारणा बनाएं। धीरज "को अपना पूरा काम करने दो॥"

2. 454 : 17-24

Love for God and man is the true incentive in both healing and teaching. Love inspires, illumines, designates, and leads the way. Right motives give pinions to thought, and strength and freedom to speech and action. Love is priestess at the altar of Truth. Wait patiently for divine Love to move upon the waters of mortal mind, and form the perfect concept. Patience must “have her perfect work.”

3. 192 : 27-29

हम दिव्य तत्वमीमांसा की समझ में अपने गुरु के उदाहरण का अनुसरण करके सत्य और प्रेम के चरणों में चलते हैं।

3. 192 : 27-29

We walk in the footsteps of Truth and Love by following the example of our Master in the understanding of divine metaphysics.

4. 31 : 12-17

सबसे पहले ईसाई कर्तव्यों की सूची में, उन्होंने अपने अनुयायियों को सत्य और प्रेम की उपचार शक्ति सिखाई। उन्होंने मृत समारोहों के लिए कोई महत्व नहीं दिया। यह जीवित मसीह है, व्यावहारिक सत्य है, जो यीशु को उन सभी लोगों के लिए "पुनरुत्थान और जीवन" बनाता है जो उसे विलेख में पालन करते हैं।

4. 31 : 12-17

First in the list of Christian duties, he taught his followers the healing power of Truth and Love. He attached no importance to dead ceremonies. It is the living Christ, the practical Truth, which makes Jesus “the resurrection and the life” to all who follow him in deed.

5. 4:3-9

हमें सबसे अधिक जरूरत है, अनुग्रह में वृद्धि, धैर्य, नम्रता, प्रेम, और अच्छे कार्यों में व्यक्त की गई इच्छा की प्रार्थना। हमारे मास्टर की आज्ञाओं को रखने के लिए और उनके उदाहरण का पालन करने के लिए, क्या वह हमारे लिए उचित ऋण है और उसने जो कुछ भी किया है, उसके लिए हमारी कृतज्ञता का एकमात्र योग्य प्रमाण है।

5. 4 : 3-9

What we most need is the prayer of fervent desire for growth in grace, expressed in patience, meekness, love, and good deeds. To keep the commandments of our Master and follow his example, is our proper debt to him and the only worthy evidence of our gratitude for all that he has done.

6. 37 : 22-25

यह संभव है, - हाँ, यह प्रत्येक बच्चे, पुरुष और महिला का कर्तव्य और विशेषाधिकार है, - कि उन्हें कुछ हद तक स्वास्थ्य और पवित्रता के सत्य और जीवन के प्रदर्शन द्वारा मास्टर के उदाहरण का पालन करना चाहिए।

6. 37 : 22-25

It is possible, — yea, it is the duty and privilege of every child, man, and woman, — to follow in some degree the example of the Master by the demonstration of Truth and Life, of health and holiness.

7. 271 : 11-19

लैटिन में "गाया हुआ शिष्य" शब्द छात्र को दर्शाता है; और यह शब्द इंगित करता है कि चिकित्सा की शक्ति उन शिक्षार्थियों के लिए एक अलौकिक उपहार नहीं थी, बल्कि उनकी दिव्य विज्ञान की आध्यात्मिक साधना का परिणाम थी, जिसे उनके गुरु ने बीमारों और पापों के उपचार द्वारा प्रदर्शित किया था। इसलिए उनके कहने का सार्वभौमिक अनुप्रयोग: "मैं केवल इन्हीं के लिये बिनती नहीं करता, परन्तु उन के लिये भी जो इन के वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे[मुझे समझेंगे]।"

7. 271 : 11-19

In Latin the word rendered disciple signifies student; and the word indicates that the power of healing was not a supernatural gift to those learners, but the result of their cultivated spiritual understanding of the divine Science, which their Master demonstrated by healing the sick and sinning. Hence the universal application of his saying: “Neither pray I for these alone, but for them also which shall believe on me [understand me] through their word.”

8. 496 : 5-8

आप सीखेंगे कि क्रिश्चियन साइंस में पहला कर्तव्य भगवान का पालन करना है, एक दिमाग रखना है, और दूसरे को खुद के रूप में प्यार करना है।

8. 496 : 5-8

You will learn that in Christian Science the first duty is to obey God, to have one Mind, and to love another as yourself.

9. 88 : 18-20

किसी के पड़ोसी को स्वयं के रूप में प्यार करना, एक दिव्य विचार है; लेकिन इस विचार को भौतिक इंद्रियों के माध्यम से कभी नहीं देखा, महसूस किया जा सकता है और न ही समझा जा सकता है।

9. 88 : 18-20

To love one’s neighbor as one’s self, is a divine idea; but this idea can never be seen, felt, nor understood through the physical senses.

10. 275 : 12-19

आत्मा, जीवन, सत्य, प्रेम, एक के रूप में गठबंधन, - और भगवान के लिए शास्त्र के नाम हैं। सभी पदार्थ, बुद्धि, ज्ञान, अस्तित्व, अमरता, कारण और प्रभाव ईश्वर के हैं। ये उनकी विशेषताएं हैं, अनंत दिव्य सिद्धांत, प्रेम की शाश्वत अभिव्यक्तियाँ। कोई भी ज्ञान बुद्धिमान नहीं है, लेकिन उसका ज्ञान है; कोई सत्य सत्य नहीं है, कोई प्रेम प्यारा नहीं है, कोई जीवन जीवन नहीं है, लेकिन परमात्मा है; कोई अच्छा नहीं है, लेकिन अच्छा भगवान सबसे अच्छा है।

10. 275 : 12-19

Spirit, Life, Truth, Love, combine as one, — and are the Scriptural names for God. All substance, intelligence, wisdom, being, immortality, cause, and effect belong to God. These are His attributes, the eternal manifestations of the infinite divine Principle, Love. No wisdom is wise but His wisdom; no truth is true, no love is lovely, no life is Life but the divine; no good is, but the good God bestows.

11. 205 : 22-3

जब हमें पता चलता है कि एक मन है, तो अपने पड़ोसी को अपने जैसे प्यार करने का ईश्वरीय नियम सामने आता है; जबकि कई सत्तारूढ़ मन में एक विश्वास मनुष्य के मन, एक ईश्वर के प्रति सामान्य बहाव में बाधा डालता है, और मानव विचारों को विपरीत रास्तों पर ले जाता है जहां स्वार्थ राज करता है।

स्वार्थ, मानवीय अस्तित्व की किरण को सत्य के पक्ष की ओर ले जाता है, सत्य की ओर नहीं। मन की एकता का खंडन हमारे वजन को पैमाने में फेंकता है, लेकिन आत्मा, ईश्वर, अच्छाई और सामग्री के पैमाने पर नहीं।

जब हम दिव्य के साथ अपने संबंध को पूरी तरह से समझते हैं, तो हमारे पास कोई अन्य मन नहीं हो सकता है, लेकिन उनका - कोई अन्य प्रेम, ज्ञान, या सत्य, जीवन का कोई अन्य अर्थ नहीं है, और पदार्थ या त्रुटि के अस्तित्व की कोई चेतना नहीं

11. 205 : 22-3

When we realize that there is one Mind, the divine law of loving our neighbor as ourselves is unfolded; whereas a belief in many ruling minds hinders man’s normal drift towards the one Mind, one God, and leads human thought into opposite channels where selfishness reigns.

Selfishness tips the beam of human existence towards the side of error, not towards Truth. Denial of the oneness of Mind throws our weight into the scale, not of Spirit, God, good, but of matter.

When we fully understand our relation to the Divine, we can have no other Mind but His, — no other Love, wisdom, or Truth, no other sense of Life, and no consciousness of the existence of matter or error.

12. 113 : 3-8

विज्ञान का पत्र बहुतायत से आज मानवता तक पहुंचता है, लेकिन इसकी भावना केवल छोटी डिग्री में आती है। ईसाई विज्ञान का महत्वपूर्ण हिस्सा, हृदय और आत्मा, प्रेम है। इसके बिना, विज्ञान के मृत शरीर को छोड़कर, नाड़ी, ठंड, निर्जीव, पत्र कुछ भी नहीं है

12. 113 : 3-8

The letter of Science plentifully reaches humanity to-day, but its spirit comes only in small degrees. The vital part, the heart and soul of Christian Science, is Love. Without this, the letter is but the dead body of Science, — pulseless, cold, inanimate.

13. 9 : 5-16

इन सवालों के जवाब में सभी प्रार्थनाओं का परीक्षण निहित है: क्या हम इस आज्ञा के कारण अपने पड़ोसी से बेहतर प्रेम करते हैं? क्या हम पुराने स्वार्थ का पीछा करते हैं, किसी चीज़ के लिए बेहतर प्रार्थना करने से संतुष्ट हैं, हालाँकि हम अपनी प्रार्थना के साथ लगातार रहकर अपने अनुरोधों की ईमानदारी का कोई सबूत नहीं देते हैं? अगर स्वार्थ ने दया को जगह दी है, तो हम अपने पड़ोसी को निस्वार्थ रूप से सम्मान देंगे, और उन्हें आशीर्वाद देंगे कि हमें अभिशाप दें; लेकिन हम इस महान कर्तव्य को कभी नहीं पूछेंगे कि यह किया जाए। इससे पहले कि हम अपनी आशा और विश्वास के फल का आनंद ले सकें, हमें एक क्रास उठाना होगा।

13. 9 : 5-16

The test of all prayer lies in the answer to these questions: Do we love our neighbor better because of this asking? Do we pursue the old selfishness, satisfied with having prayed for something better, though we give no evidence of the sincerity of our requests by living consistently with our prayer? If selfishness has given place to kindness, we shall regard our neighbor unselfishly, and bless them that curse us; but we shall never meet this great duty simply by asking that it may be done. There is a cross to be taken up before we can enjoy the fruition of our hope and faith.

14. 365 : 15-19, 31-2

यदि वैज्ञानिक दिव्य प्रेम के माध्यम से अपने रोगी तक पहुँचता है, चिकित्सा कार्य एक यात्रा में पूरा किया जाएगा, और रोग सुबह की धूप से पहले ओस की तरह अपनी मूल शून्यता में गायब हो जाएगा। गरीब पीड़ित हृदय को अपने सही पोषण की आवश्यकता होती है, जैसे कि शांति, क्लेश में धैर्य, और प्रिय पिता की प्रेम-कृपा का एक अनमोल भाव।

14. 365 : 15-19, 31-2

If the Scientist reaches his patient through divine Love, the healing work will be accomplished at one visit, and the disease will vanish into its native nothingness like dew before the morning sunshine.

The poor suffering heart needs its rightful nutriment, such as peace, patience in tribulation, and a priceless sense of the dear Father’s loving-kindness.

15. 518 : 13-23

ईश्वर स्वयं का विचार देता है, अधिक के लिए कम करने के लिए, और बदले में, उच्च हमेशा कम की रक्षा करता है। सभी को एक ही सिद्धांत, या पिता, को एक भव्य भाईचारे में रखते हुए, आत्मा में समृद्ध गरीबों की मदद करते हैं। और धन्य है वह आदमी जो दूसरे की भलाई में अपनी भलाई जानता है, अपने भाई की आवश्यकता को देखता है और उसकी आपूर्ति करता है। प्रेम कमजोर आध्यात्मिक को, अमरता, और अच्छाई देता है, जो सभी के माध्यम से चमकता है जैसे कि कली के माध्यम से खिलता है। ईश्वर की सभी विविध अभिव्यक्तियाँ स्वास्थ्य, पवित्रता, अमरता - अनंत जीवन, सत्य और प्रेम को दर्शाती हैं।

15. 518 : 13-23

God gives the lesser idea of Himself for a link to the greater, and in return, the higher always protects the lower. The rich in spirit help the poor in one grand brotherhood, all having the same Principle, or Father; and blessed is that man who seeth his brother’s need and supplieth it, seeking his own in another’s good. Love giveth to the least spiritual idea might, immortality, and goodness, which shine through all as the blossom shines through the bud. All the varied expressions of God reflect health, holiness, immortality — infinite Life, Truth, and Love.

16. 572 : 6-8, 12-17

"आपस में प्रेम रखें" (I यूहन्ना, 3:23), प्रेरित लेखक की सबसे सरल और गहन सलाह है।

प्रेम क्रिश्चियन साइंस के कानून को पूरा करता है, और इस दिव्य सिद्धांत की कुछ भी कमी, समझा और प्रदर्शित नहीं किया जा सकता है, कभी भी सर्वनाश की दृष्टि प्रस्तुत कर सकता है, सत्य के साथ त्रुटि के सात मुहरों को खोल सकता है, या पाप, बीमारी और मृत्यु के असंख्य भ्रमों को उजागर कर सकता है।

16. 572 : 6-8, 12-17

“Love one another” (I John, iii. 23), is the most simple and profound counsel of the inspired writer.

Love fulfils the law of Christian Science, and nothing short of this divine Principle, understood and demonstrated, can ever furnish the vision of the Apocalypse, open the seven seals of error with Truth, or uncover the myriad illusions of sin, sickness, and death.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


████████████████████████████████████████████████████████████████████████