रविवार 2 जून, 2019 |

रविवार 2 जून, 2019



विषयप्राचीन और आधुनिक काला जादू, उपनाम कृत्रिम निद्रावस्था और हाइपोहान

SubjectAncient and Modern Necromancy, Alias Mesmerism and Hypnotism, Denounced

वर्ण पाठ: भजन संहिता 121: 7

यहोवा सारी विपत्ति से तेरी रक्षा करेगा।



Golden Text: Psalm 121 : 7

The Lord shall preserve thee from all evil.




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भजन संहिता 97 : 1, 6, 7, 9-12


1     यहोवा राजा हुआ है, पृथ्वी मगन हो;

6     आकाश ने उसके धर्म की साक्षी दी; और देश देश के सब लोगों ने उसकी महिमा देखी है।

7     जितने खुदी हुई मूर्तियों की उपासना करते और मूरतों पर फूलते हैं, वे लज्जित हों; हे सब देवताओं तुम उसी को दण्डवत करो।

9     क्योंकि हे यहोवा, तू सारी पृथ्वी के ऊपर परमप्रधान है; तू सारे देवताओं से अधिक महान ठहरा है।

10     हे यहोवा के प्रेमियों, बुराई से घृणा करो; वह अपने भक्तों के प्राणो की रक्षा करता, और उन्हें दुष्टों के हाथ से बचाता है।

11     धर्मी के लिये ज्योति, और सीधे मन वालों के लिये आनन्द बोया गया है।

12     हे धर्मियों यहोवा के कारण आनन्दित हो; और जिस पवित्र नाम से उसका स्मरण होता है, उसका धन्यवाद करो!

Responsive Reading: Psalm 97 : 1, 6, 7, 9-12

1.     The Lord reigneth; let the earth rejoice.

6.     The heavens declare his righteousness, and all the people see his glory.

7.     Confounded be all they that serve graven images, that boast themselves of idols: worship him, all ye gods.

9.     For thou, Lord, art high above all the earth: thou art exalted far above all gods.

10.     Ye that love the Lord, hate evil: he preserveth the souls of his saints; he delivereth them out of the hand of the wicked.

11.     Light is sown for the righteous, and gladness for the upright in heart.

12.     Rejoice in the Lord, ye righteous; and give thanks at the remembrance of his holiness.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 34 : 12-15

12     वह कौन मनुष्य है जो जीवन की इच्छा रखता, और दीर्घायु चाहता है ताकि भलाई देखे?

13     अपनी जीभ को बुराई से रोक रख, और अपने मुंह की चौकसी कर कि उससे छल की बात न निकले।

14     बुराई को छोड़ और भलाई कर; मेल को ढूंढ और उसी का पीछा कर॥

15     यहोवा की आंखे धर्मियों पर लगी रहती हैं, और उसके कान भी उसकी दोहाई की ओर लगे रहते हैं।

1. Psalm 34 : 12-15

12     What man is he that desireth life, and loveth many days, that he may see good?

13     Keep thy tongue from evil, and thy lips from speaking guile.

14     Depart from evil, and do good; seek peace, and pursue it.

15     The eyes of the Lord are upon the righteous, and his ears are open unto their cry.

2. II इतिहास 33 : 1-3, 6 (भी)-13, 15, 16

1     जब मनश्शे राज्य करने लगा तब वह बारह वर्ष का था, और यरूशलेम में पचपन वर्ष तक राज्य करता रहा।

2     उसने वह किया, जो यहोवा की दृष्टि में बुरा था, अर्थात उन जातियों के घिनौने कामों के अनुसार जिन को यहोवा ने इस्राएलियों के साम्हने से देश से निकाल दिया था।

3     उसने उन ऊंचे स्थानों को जिन्हें उसके पिता हिजकिय्याह ने तोड़ दिया था, फिर बनाया, और बाल नाम देवताओं के लिये वेदियां ओर अशेरा नाम मूरतें बनाईं, और आकाश के सारे गण को दण्डवत करता, और उनकी उपासना करता रहा।

6     फिर उसने हिन्नोम के बेटे की तराई में अपने लड़के-बालों को होम कर के चढ़ाया, और शुभ-अशुभ मुहूर्तों को मानता, और टोना और तंत्र-मंत्र करता, और ओझों और भूतसिद्धि वालों से व्यवहार करता था। वरन उसने ऐसे बहुत से काम किए, जो यहोवा की दृष्टि में बुरे हैं और जिन से वह अप्रसन्न होता है।

7     और उसने अपनी खुदवाई हुई मूर्ति परमेश्वर के उस भवन में स्थापन की जिसके विषय परमेश्वर ने दाऊद और उसके पुत्र सुलैमान से कहा था, कि इस भवन में, और यरूशलेम में, जिस को मैं ने इस्राएल के सब गोत्रों में से चुन लिया है मैं अपना नाम सर्वदा रखूंगा,

8     और मैं ऐसा न करूंगा कि जो देश मैं ने तुम्हारे पुरखाओं को दिया था, उस में से इस्राएल फिर मारा मारा फिरे; इतना अवश्य हो कि वे मेरी सब आज्ञाओं को अर्थात मूसा की दी हुई सारी व्यवस्था और विधियों और नियमों को पालन करने की चौकसी करें।

9     और मनश्शे ने यहूदा और यरूशलेम के निवासियों यहां तक भटका दिया कि उन्होंने उन जातियों से भी बढ़ कर बुराई की, जिन्हें यहोवा ने इस्राएलियों के साम्हने से विनाश किया था।

10     और यहोवा ने मनश्शे और उसकी प्रजा से बातें कीं, परन्तु उन्होंने कुछ ध्यान नहीं दिया।

11     तब यहोवा ने उन पर अश्शूर के सेनापतियों से चढ़ाई कराई, और ये मनश्शे को नकेल डाल कर, और पीतल की बेडिय़ां जकड़ कर, उसे बाबेल को ले गए।

12     तब संकट में पड़ कर वह अपने परमेश्वर यहोवा को मानने लगा, और अपने पूर्वजों के परमेश्वर के साम्हने बहुत दीन हुआ, और उस से प्रार्थना की।

13     तब उसने प्रसन्न हो कर उसकी विनती सुनी, और उसको यरूशलेम में पहुंचा कर उसका राज्य लौटा दिया। तब मनश्शे को निश्चय हो गया कि यहोवा ही परमेश्वर है।

15     फिर उसने पराये देवताओं को और यहोवा के भवन में की मूर्ति को, और जितनी वेदियां उसने यहोवा के भवन के पर्वत पर, और यरूशलेम में बनवाई थीं, उन सब को दूर कर के नगर से बाहर फेंकवा दिया।

16     तब उसने यहोवा की वेदी की मरम्मत की, और उस पर मेलबलि और धन्यवादबलि चढ़ाने लगा, और यहूदियों को इस्राएल के परमेश्वर यहोवा की उपासना करने की आज्ञा दी।

2. II Chronicles 33 : 1-3, 6 (also)-13, 15, 16

1     Manasseh was twelve years old when he began to reign, and he reigned fifty and five years in Jerusalem:

2     But did that which was evil in the sight of the Lord, like unto the abominations of the heathen, whom the Lord had cast out before the children of Israel.

3     For he built again the high places which Hezekiah his father had broken down, and he reared up altars for Baalim, and made groves, and worshipped all the host of heaven, and served them.

6     …also he observed times, and used enchantments, and used witchcraft, and dealt with a familiar spirit, and with wizards: he wrought much evil in the sight of the Lord, to provoke him to anger.

7     And he set a carved image, the idol which he had made, in the house of God, of which God had said to David and to Solomon his son, In this house, and in Jerusalem, which I have chosen before all the tribes of Israel, will I put my name for ever:

8     Neither will I any more remove the foot of Israel from out of the land which I have appointed for your fathers; so that they will take heed to do all that I have commanded them, according to the whole law and the statutes and the ordinances by the hand of Moses.

9     So Manasseh made Judah and the inhabitants of Jerusalem to err, and to do worse than the heathen, whom the Lord had destroyed before the children of Israel.

10     And the Lord spake to Manasseh, and to his people: but they would not hearken.

11     Wherefore the Lord brought upon them the captains of the host of the king of Assyria, which took Manasseh among the thorns, and bound him with fetters, and carried him to Babylon.

12     And when he was in affliction, he besought the Lord his God, and humbled himself greatly before the God of his fathers,

13     And prayed unto him: and he was intreated of him, and heard his supplication, and brought him again to Jerusalem into his kingdom. Then Manasseh knew that the Lord he was God.

15     And he took away the strange gods, and the idol out of the house of the Lord, and all the altars that he had built in the mount of the house of the Lord, and in Jerusalem, and cast them out of the city.

16     And he repaired the altar of the Lord, and sacrificed thereon peace offerings and thank offerings, and commanded Judah to serve the Lord God of Israel.

3. II इतिहास 7 : 14

14     तब यदि मेरी प्रजा के लोग जो मेरे कहलाते हैं, दीन हो कर प्रार्थना करें और मेरे दर्शन के खोजी हो कर अपनी बुरी चाल से फिरें, तो मैं स्वर्ग में से सुन कर उनका पाप क्षमा करूंगा और उनके देश को ज्यों का त्यों कर दूंगा।

3. II Chronicles 7 : 14

14     If my people, which are called by my name, shall humble themselves, and pray, and seek my face, and turn from their wicked ways; then will I hear from heaven, and will forgive their sin, and will heal their land.

4. यिर्मयाह 29 : 8 (इस प्रकार), 9, 11-13

8     ... इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा तुम से यों कहता है कि तुम्हारे जो भविष्यद्वक्ता और भावी कहने वाले तुम्हारे बीच में हैं, वे तुम को बहकाने न पाएं, और जो स्वप्न वे तुम्हारे निमित्त देखते हैं उनकी ओर कान मत धरो,

9     क्योंकि वे मेरे नाम से तुम को झूठी भविष्यद्वाणी सुनाते हैं; मैं ने उन्हें नहीं भेजा, मुझ यहोवा की यह वाणी है।

11     क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, कि जो कल्पनाएं मैं तुम्हारे विषय करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ, वे हानी की नहीं, वरन कुशल ही की हैं, और अन्त में तुम्हारी आशा पूरी करूंगा।

12     तब उस समय तुम मुझ को पुकारोगे और आकर मुझ से प्रार्थना करोगे और मैं तुम्हारी सुनूंगा।

13     तुम मुझे ढूंढ़ोगे और पाओगे भी; क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मेरे पास आओगे।

4. Jeremiah 29 : 8 (thus), 9, 11-13

8     …thus saith the Lord of hosts, the God of Israel; Let not your prophets and your diviners, that be in the midst of you, deceive you, neither hearken to your dreams which ye cause to be dreamed.

9     For they prophesy falsely unto you in my name: I have not sent them, saith the Lord.

11     For I know the thoughts that I think toward you, saith the Lord, thoughts of peace, and not of evil, to give you an expected end.

12     Then shall ye call upon me, and ye shall go and pray unto me, and I will hearken unto you.

13     And ye shall seek me, and find me, when ye shall search for me with all your heart.

5. यूहन्ना 17 : 1-4, 6-9, 11, 14, 15, 17

1     यीशु ने ये बातें कहीं और अपनी आंखे आकाश की ओर उठाकर कहा, हे पिता, वह घड़ी आ पहुंची, अपने पुत्र की महिमा कर, कि पुत्र भी तेरी महिमा करे।

2     क्योंकि तू ने उस को सब प्राणियों पर अधिकार दिया, कि जिन्हें तू ने उस को दिया है, उन सब को वह अनन्त जीवन दे।

3     और अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जाने।

4     जो काम तू ने मुझे करने को दिया था, उसे पूरा करके मैं ने पृथ्वी पर तेरी महिमा की है।

6     मैं ने तेरा नाम उन मनुष्यों पर प्रगट किया जिन्हें तू ने जगत में से मुझे दिया: वे तेरे थे और तू ने उन्हें मुझे दिया और उन्होंने तेरे वचन को मान लिया है।

7     अब वे जान गए हैं, कि जो कुछ तू ने मुझे दिया है, सब तेरी ओर से है।

8     क्योंकि जो बातें तू ने मुझे पहुंचा दीं, मैं ने उन्हें उन को पहुंचा दिया और उन्होंने उन को ग्रहण किया: और सच सच जान लिया है, कि मैं तेरी ओर से निकला हूं, और प्रतीति कर ली है कि तू ही ने मुझे भेजा।

9     मैं उन के लिये बिनती करता हूं, संसार के लिये बिनती नहीं करता हूं परन्तु उन्हीं के लिये जिन्हें तू ने मुझे दिया है, क्योंकि वे तेरे हैं।

11     मैं आगे को जगत में न रहूंगा, परन्तु ये जगत में रहेंगे, और मैं तेरे पास आता हूं; हे पवित्र पिता, अपने उस नाम से जो तू ने मुझे दिया है, उन की रक्षा कर, कि वे हमारी नाईं एक हों।

14     मैं ने तेरा वचन उन्हें पहुंचा दिया है, और संसार ने उन से बैर किया, क्योंकि जैसा मैं संसार का नहीं, वैसे ही वे भी संसार के नहीं।

15     मैं यह बिनती नहीं करता, कि तू उन्हें जगत से उठा ले, परन्तु यह कि तू उन्हें उस दुष्ट से बचाए रख।

17     सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर: तेरा वचन सत्य है।

5. John 17 : 1-4, 6-9, 11, 14, 15, 17

1     These words spake Jesus, and lifted up his eyes to heaven, and said, Father, the hour is come; glorify thy Son, that thy Son also may glorify thee:

2     As thou hast given him power over all flesh, that he should give eternal life to as many as thou hast given him.

3     And this is life eternal, that they might know thee the only true God, and Jesus Christ, whom thou hast sent.

4     I have glorified thee on the earth: I have finished the work which thou gavest me to do.

6     I have manifested thy name unto the men which thou gavest me out of the world: thine they were, and thou gavest them me; and they have kept thy word.

7     Now they have known that all things whatsoever thou hast given me are of thee.

8     For I have given unto them the words which thou gavest me; and they have received them, and have known surely that I came out from thee, and they have believed that thou didst send me.

9     I pray for them: I pray not for the world, but for them which thou hast given me; for they are thine.

11     And now I am no more in the world, but these are in the world, and I come to thee. Holy Father, keep through thine own name those whom thou hast given me, that they may be one, as we are.

14     I have given them thy word; and the world hath hated them, because they are not of the world, even as I am not of the world.

15     I pray not that thou shouldest take them out of the world, but that thou shouldest keep them from the evil.

17     Sanctify them through thy truth: thy word is truth.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 471 : 18-19

ईश्वर अनंत है, इसलिए हमेशा मौजूद है, और न ही कोई अन्य शक्ति है और न ही उपस्थिति।

1. 471 : 18-19

God is infinite, therefore ever present, and there is no other power nor presence.

2. 469 : 25-6

हम सर्वशक्तिमानता के उच्च संकेत को खो देते हैं, जब यह स्वीकार करने के बाद कि ईश्वर, या अच्छा, सर्वव्यापी है और सर्व-शक्ति है, हम अभी भी मानते हैं कि एक और शक्ति है, जिसका नाम बुराई है। यह धारणा कि ईश्वरीय धर्मशास्त्र के लिए एक से अधिक मन उतना ही खतरनाक है जितना कि प्राचीन पौराणिक कथाएं और मूर्तिपूजक मूर्तिपूजा। एक पिता, यहां तक कि भगवान के साथ, मनुष्य का पूरा परिवार भाइयों होगा; और एक मन और उस ईश्वर, या भलाई के साथ, मनुष्य का भाईचारा प्रेम और सत्य से मिलकर बना होगा, और इसमें सिद्धांत और आध्यात्मिक शक्ति की एकता होगी जो दिव्य विज्ञान का गठन करती है। एक से अधिक मन का माना गया अस्तित्व मूर्तिपूजा की मूल त्रुटि थी।

2. 469 : 25-6

We lose the high signification of omnipotence, when after admitting that God, or good, is omnipresent and has all-power, we still believe there is another power, named evil. This belief that there is more than one mind is as pernicious to divine theology as are ancient mythology and pagan idolatry. With one Father, even God, the whole family of man would be brethren; and with one Mind and that God, or good, the brotherhood of man would consist of Love and Truth, and have unity of Principle and spiritual power which constitute divine Science. The supposed existence of more than one mind was the basic error of idolatry.

3. 103 : 18-28

जैसा कि क्राइस्टियन साइंस में नाम दिया गया है, पशु चुंबकत्व या हिप्नोटिज्म त्रुटि, या नश्वर मन के लिए विशिष्ट शब्द है। यह गलत धारणा है कि मन पदार्थ में है, और यह बुराई और अच्छा दोनों है; यह बुराई उतनी ही वास्तविक है जितनी अच्छी और अधिक शक्तिशाली। इस विश्वास में सत्य का एक गुण नहीं है। यह या तो अज्ञानी है या दुर्भावनापूर्ण। हिप्नोटिज्म का दुर्भावनापूर्ण रूप नैतिक मूर्खता में बदल जाता है अमर मन के सत्य मनुष्य को बनाए रखते हैं, और वे नश्वर मन की दंतकथाओं का सत्यानाश करते हैं, जिनकी भड़कीली और भड़कीली दिखावा, मूर्खतापूर्ण पतंगों की तरह, अपने स्वयं के पंख गाते हैं और धूल में गिर जाते हैं।

3. 103 : 18-28

As named in Christian Science, animal magnetism or hypnotism is the specific term for error, or mortal mind. It is the false belief that mind is in matter, and is both evil and good; that evil is as real as good and more powerful. This belief has not one quality of Truth. It is either ignorant or malicious. The malicious form of hypnotism ultimates in moral idiocy. The truths of immortal Mind sustain man, and they annihilate the fables of mortal mind, whose flimsy and gaudy pretensions, like silly moths, singe their own wings and fall into dust.

4. 102 : 1-11

पशु चुंबकत्व के पास कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, क्योंकि भगवान सभी को नियंत्रित करता है जो वास्तविक, सामंजस्यपूर्ण और शाश्वत है, और उनकी शक्ति न तो पशु है और न ही मानव। विज्ञान पशु चुंबकत्व, मेस्मेरिज्म, या हिप्नोटिज्म में एक विश्वास और इस विश्वास जानवर होने का आधार एक नकारात्मकता है, जिसमें न तो बुद्धि, शक्ति, न ही वास्तविकता है, और इस अर्थ में यह तथाकथित नश्वर मन की एक अवास्तविक अवधारणा है।

लेकिन आत्मा का एक वास्तविक आकर्षण है। ध्रुव को सुई की ओर इशारा करना इस सर्व-शक्तिमान या ईश्वर, दिव्य मन के आकर्षण का प्रतीक है।

4. 102 : 1-11

Animal magnetism has no scientific foundation, for God governs all that is real, harmonious, and eternal, and His power is neither animal nor human. Its basis being a belief and this belief animal, in Science animal magnetism, mesmerism, or hypnotism is a mere negation, possessing neither intelligence, power, nor reality, and in sense it is an unreal concept of the so-called mortal mind.

There is but one real attraction, that of Spirit. The pointing of the needle to the pole symbolizes this all-embracing power or the attraction of God, divine Mind.

5. 16: 7-8, 15-19

हमारे मास्टर ने अपने शिष्यों को एक संक्षिप्त प्रार्थना सिखाई, जिसे हम उनके नाम प्रभु प्रार्थना के नाम से जानते हैं।

वाक्यांश में, "हमें बुराई से छुड़ाओ," मूल ठीक से पढ़ता है, "हमें बुरे से उद्धार करो।" यह पढ़ना हमारी वैज्ञानिक आशंका को मजबूत करता है, क्योंकि क्रिश्चियन साइंस हमें सिखाता है कि "बुरा," या एक बुराई है, लेकिन पहला झूठ और सभी झूठों का दूसरा नाम है।

5. 16 : 7-8, 15-19

Our Master taught his disciples one brief prayer, which we name after him the Lord’s Prayer.

In the phrase, “Deliver us from evil,” the original properly reads, “Deliver us from the evil one.” This reading strengthens our scientific apprehension of the petition, for Christian Science teaches us that “the evil one,” or one evil, is but another name for the first lie and all liars.

6. 584: 17-19 (से 2nd ;)

शैतान। बुराई; एक झूट; त्रुटि; न शालीनता और न मन; सत्य के विपरीत; पाप, बीमारी और मृत्यु में विश्वास; पशु चुंबकत्व या सम्मोहन;

6. 584 : 17-19 (to 2nd ;)

Devil. Evil; a lie; error; neither corporeality nor mind; the opposite of Truth; a belief in sin, sickness, and death; animal magnetism or hypnotism;

7. 330: 25 (वह)-32

यह धारणा कि बुराई और भलाई दोनों वास्तविक हैं, भौतिक अर्थों का भ्रम है, जिसे विज्ञान ने समाप्त कर दिया है। बुराई कुछ भी नहीं है, कोई बात नहीं, मन, और न ही शक्ति। जैसा कि मानव जाति द्वारा प्रकट किया गया है, यह झूठ के लिए खड़ा है, कुछ भी होने का दावा नहीं करता है, - वासना, बेईमानी, स्वार्थ, ईर्ष्या, पाखंड, बदनामी, घृणा, चोरी, व्यभिचार, हत्या, मनोभ्रंश, विक्षेपन, निर्जीवता, शैतान, नरक, सभी के साथ वगैरह जिसमें शब्द शामिल है।

7. 330 : 25 (The)-32

The notion that both evil and good are real is a delusion of material sense, which Science annihilates. Evil is nothing, no thing, mind, nor power. As manifested by mankind it stands for a lie, nothing claiming to be something, — for lust, dishonesty, selfishness, envy, hypocrisy, slander, hate, theft, adultery, murder, dementia, insanity, inanity, devil, hell, with all the etceteras that word includes.

8. 186: 11-16

बुराई एक नकार है, क्योंकि यह सच्चाई की अनुपस्थिति है। यह कुछ भी नहीं है, क्योंकि यह किसी चीज की अनुपस्थिति है। यह असत्य है, क्योंकि यह ईश्वर की अनुपस्थिति, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी का संरक्षण करता है। प्रत्येक नश्वर को यह सीखना चाहिए कि बुराई में न तो शक्ति है और न ही वास्तविकता।

8. 186 : 11-16

Evil is a negation, because it is the absence of truth. It is nothing, because it is the absence of something. It is unreal, because it presupposes the absence of God, the omnipotent and omnipresent. Every mortal must learn that there is neither power nor reality in evil.

9. 339: 7 (जबसे)-19

चूँकि ईश्वर सब है, इसलिए उसकी निष्पक्षता के लिए कोई जगह नहीं है। ईश्वर, आत्मा, अकेले सभी को बनाया, और इसे अच्छा कहा। इसलिए बुराई, अच्छे के विपरीत है, असत्य है, और भगवान का उत्पाद नहीं हो सकता है। पापी को इस तथ्य से कोई प्रोत्साहन नहीं मिल सकता है कि विज्ञान बुराई की असत्यता को प्रदर्शित करता है, क्योंकि पापी पाप की वास्तविकता बना देगा, - जो वास्तविक असत्य है, और इस प्रकार "क्रोध के दिन के खिलाफ क्रोध" एकत्र करता है। वह खुद के खिलाफ एक साजिश में शामिल हो रहा है, - अपने स्वयं के जागरण के खिलाफ भयानक अवास्तविकता जिसके द्वारा उसे धोखा दिया गया है। केवल वे ही, जो पाप का पश्चाताप करते हैं और असत्य का त्याग करते हैं, बुराई की असत्यता को पूरी तरह से समझ सकते हैं।

9. 339 : 7 (Since)-19

Since God is All, there is no room for His unlikeness. God, Spirit, alone created all, and called it good. Therefore evil, being contrary to good, is unreal, and cannot be the product of God. A sinner can receive no encouragement from the fact that Science demonstrates the unreality of evil, for the sinner would make a reality of sin, — would make that real which is unreal, and thus heap up “wrath against the day of wrath.” He is joining in a conspiracy against himself, — against his own awakening to the awful unreality by which he has been deceived. Only those, who repent of sin and forsake the unreal, can fully understand the unreality of evil.

10. 367: 30-5

क्योंकि सत्य अनंत है, त्रुटि को कुछ भी नहीं के रूप में जाना जाना चाहिए। क्योंकि सत्य अच्छाई में सर्वशक्तिमान है, त्रुटि, सत्य के विपरीत, कोई हो सकता है। बुराई है, लेकिन शून्य का प्रतिकार है। सबसे बड़ा गलत है, लेकिन सर्वोच्च अधिकार के विपरीत है। विज्ञान से प्रेरित विश्वास इस तथ्य में निहित है कि सत्य वास्तविक है और त्रुटि असत्य है। सत्य से पहले त्रुटि कायरता है।

10. 367 : 30-5

Because Truth is infinite, error should be known as nothing. Because Truth is omnipotent in goodness, error, Truth’s opposite, has no might. Evil is but the counterpoise of nothingness. The greatest wrong is but a supposititious opposite of the highest right. The confidence inspired by Science lies in the fact that Truth is real and error is unreal. Error is a coward before Truth.

11. 450: 19-26

क्रिश्चियन साइंटिस्ट ने बुराई, बीमारी और मृत्यु को कम करने के लिए सूचीबद्ध किया है; और वह उनकी नीयत और भगवान की भलाई या अच्छेपन को समझकर उन्हें दूर करेगा। उसके प्रति बीमार होना किसी पाप से कम नहीं है, और वह उन दोनों को ईश्वर की शक्ति को समझकर उन्हें ठीक करता है क्रिश्चियन साइंटिस्ट जानते हैं कि वे विश्वास की त्रुटियां हैं, जो सत्य को नष्ट कर सकता है।

11. 450 : 19-26

The Christian Scientist has enlisted to lessen evil, disease, and death; and he will overcome them by understanding their nothingness and the allness of God, or good. Sickness to him is no less a temptation than is sin, and he heals them both by understanding God’s power over them. The Christian Scientist knows that they are errors of belief, which Truth can and will destroy.

12. 106: 15-29

इस पीढ़ी को, जो क्रिश्चियन साइंस के फैसले पर बैठता है, केवल ऐसे तरीकों को मंजूरी दें, जो सत्य में प्रदर्शन के योग्य हैं और उनके फल से जाने जाते हैं, और अन्य सभी को सेंट पॉल के रूप में वर्गीकृत करते हैं, जिन्होंने गैलाटियन को अपने महान पत्र में कहा था, जब उन्होंने इस प्रकार लिखा था:

"शरीर के काम तो प्रगट हैं, अर्थात व्यभिचार, गन्दे काम, लुचपन। मूर्ति पूजा, टोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, विरोध, फूट, विधर्म। डाह, मतवालापन, लीलाक्रीड़ा, और इन के जैसे और और काम हैं, इन के विषय में मैं तुम को पहिले से कह देता हूं जैसा पहिले कह भी चुका हूं, कि ऐसे ऐसे काम करने वाले परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे।पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज, और कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम हैं; ऐसे ऐसे कामों के विरोध में कोई भी व्यवस्था नहीं।"

12. 106 : 15-29

Let this age, which sits in judgment on Christian Science, sanction only such methods as are demonstrable in Truth and known by their fruit, and classify all others as did St. Paul in his great epistle to the Galatians, when he wrote as follows:

“Now the works of the flesh are manifest, which are these; Adultery, fornication, uncleanness, lasciviousness, idolatry, witchcraft, hatred, variance, emulations, wrath, strife, seditions, heresies, envyings, murders, drunkenness, revellings and such like: of the which I tell you before, as I have also told you in time past, that they which do such things shall not inherit the kingdom of God. But the fruit of the Spirit is love, joy, peace, longsuffering, gentleness, goodness, faith, meekness, temperance: against such there is no law.”


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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