रविवार 2 अप्रैल, 2023



विषयकल्पना

SubjectUnreality

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: उत्पत्ति 1: 31

"तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है।"



Golden Text: Genesis 1 : 31

And God saw every thing that he had made, and, behold, it was very good.




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उत्तरदायी अध्ययन: इफिसियों 5: 14-21


14     इस कारण वह कहता है, हे सोने वाले जाग और मुर्दों में से जी उठ; तो मसीह की ज्योति तुझ पर चमकेगी॥

15     इसलिये ध्यान से देखो, कि कैसी चाल चलते हो; निर्बुद्धियों की नाईं नहीं पर बुद्धिमानों की नाईं चलो।

16     और अवसर को बहुमोल समझो, क्योंकि दिन बुरे हैं।

17     इस कारण निर्बुद्धि न हो, पर ध्यान से समझो, कि प्रभु की इच्छा क्या है?

18     और दाखरस से मतवाले न बनो, क्योंकि इस से लुचपन होता है, पर आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ।

19     और आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाया करो, और अपने अपने मन में प्रभु के साम्हने गाते और कीर्तन करते रहो।

20     और सदा सब बातों के लिये हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से परमेश्वर पिता का धन्यवाद करते रहो।

21     और मसीह के भय से एक दूसरे के आधीन रहो॥

Responsive Reading: Ephesians 5 : 14-21

14.     Wherefore he saith, Awake thou that sleepest, and arise from the dead, and Christ shall give thee light.

15.     See then that ye walk circumspectly, not as fools, but as wise,

16.     Redeeming the time, because the days are evil.

17.     Wherefore be ye not unwise, but understanding what the will of the Lord is.

18.     And be not drunk with wine, wherein is excess; but be filled with the Spirit;

19.     Speaking to yourselves in psalms and hymns and spiritual songs, singing and making melody in your heart to the Lord;

20.     Giving thanks always for all things unto God and the Father in the name of our Lord Jesus Christ;

21.     Submitting yourselves one to another in the fear of God.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 23: 1-6

1     यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी।

2     वह मुझे हरी हरी चराइयों में बैठाता है; वह मुझे सुखदाई जल के झरने के पास ले चलता है;

3     वह मेरे जी में जी ले आता है। धर्म के मार्गो में वह अपने नाम के निमित्त मेरी अगुवाई करता है।

4     चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूं, तौभी हानि से न डरूंगा, क्योंकि तू मेरे साथ रहता है; तेरे सोंटे और तेरी लाठी से मुझे शान्ति मिलती है॥

5     तू मेरे सताने वालों के साम्हने मेरे लिये मेज बिछाता है; तू ने मेरे सिर पर तेल मला है, मेरा कटोरा उमण्ड रहा है।

6     निश्चय भलाई और करूणा जीवन भर मेरे साथ साथ बनी रहेंगी; और मैं यहोवा के धाम में सर्वदा वास करूंगा॥

1. Psalm 23 : 1-6

1     The Lord is my shepherd; I shall not want.

2     He maketh me to lie down in green pastures: he leadeth me beside the still waters.

3     He restoreth my soul: he leadeth me in the paths of righteousness for his name’s sake.

4     Yea, though I walk through the valley of the shadow of death, I will fear no evil: for thou art with me; thy rod and thy staff they comfort me.

5     Thou preparest a table before me in the presence of mine enemies: thou anointest my head with oil; my cup runneth over.

6     Surely goodness and mercy shall follow me all the days of my life: and I will dwell in the house of the Lord for ever.

2. याकूब 1: 16

16     हे मेरे प्रिय भाइयों, धोखा न खाओ।

2. James 1 : 16

16     Do not err, my beloved brethren.

3. सभोपदेशक 3: 14

14     मैं जानता हूं कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह सदा स्थिर रहेगा; न तो उस में कुछ बढ़ाया जा सकता है और न कुछ घटाया जा सकता है; परमेश्वर ऐसा इसलिये करता है कि लोग उसका भय मानें।

3. Ecclesiastes 3 : 14

14     I know that, whatsoever God doeth, it shall be for ever: nothing can be put to it, nor any thing taken from it: and God doeth it, that men should fear before him.

4. 2 राजा 4: 1-7

1     भविष्यद्वक्ताओं के चेलों की पत्नियों में से एक स्त्री ने एलीशा की दोहाई देकर कहा, तेरा दास मेरा पति मर गया, और तू जानता है कि वह यहोवा का भय माननेवाला था, और जिसका वह कर्जदार था वह आया है कि मेरे दोनों पुत्रों को अपने दास बनाने के लिये ले जाए।

2     एलीशा ने उस से पूछा, मैं तेरे लिये क्या करूं? मुझ से कह, कि तेरे घर में क्या है? उसने कहा, तेरी दासी के घर में एक हांड़ी तेल को छोड़ और कुछ तहीं है।

3     उसने कहा, तू बाहर जा कर अपनी सब पड़ोसियों खाली बरतन मांग ले आ, और थोड़े बरतन न लाना।

4     फिर तू अपने बेटों समेत अपने घर में जा, और द्वार बन्द कर के उन सब बरतनों में तेल उण्डेल देना, और जो भर जाए उन्हें अलग रखना।

5     तब वह उसके पास से चली गई, और अपने बेटों समेत अपने घर जा कर द्वार बन्द किया; तब वे तो उसके पास बरतन लाते गए और वह उण्डेलती गई।

6     जब बरतन भर गए, तब उसने अपने बेटे से कहा, मेरे पास एक और भी ले आ, उसने उस से कहा, और बरतन तो नहीं रहा। तब तेल थम गया।

7     तब उसने जा कर परमेश्वर के भक्त को यह बता दिया। ओर उसने कहा, जा तेल बेच कर ऋण भर दे; और जो रह जाए, उस से तू अपने पुत्रों सहित अपना निर्वाह करना।

4. II Kings 4 : 1-7

1     Now there cried a certain woman of the wives of the sons of the prophets unto Elisha, saying, Thy servant my husband is dead; and thou knowest that thy servant did fear the Lord: and the creditor is come to take unto him my two sons to be bondmen.

2     And Elisha said unto her, What shall I do for thee? tell me, what hast thou in the house? And she said, Thine handmaid hath not any thing in the house, save a pot of oil.

3     Then he said, Go, borrow thee vessels abroad of all thy neighbours, even empty vessels; borrow not a few.

4     And when thou art come in, thou shalt shut the door upon thee and upon thy sons, and shalt pour out into all those vessels, and thou shalt set aside that which is full.

5     So she went from him, and shut the door upon her and upon her sons, who brought the vessels to her; and she poured out.

6     And it came to pass, when the vessels were full, that she said unto her son, Bring me yet a vessel. And he said unto her, There is not a vessel more. And the oil stayed.

7     Then she came and told the man of God. And he said, Go, sell the oil, and pay thy debt, and live thou and thy children of the rest.

5. मत्ती 4: 23

23     और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

5. Matthew 4 : 23

23     And Jesus went about all Galilee, teaching in their synagogues, and preaching the gospel of the kingdom, and healing all manner of sickness and all manner of disease among the people.

6. मरकुस 5: 25-34

25     और एक स्त्री, जिस को बारह वर्ष से लोहू बहने का रोग था।

26     और जिस ने बहुत वैद्यों से बड़ा दुख उठाया और अपना सब माल व्यय करने पर भी कुछ लाभ न उठाया था, परन्तु और भी रोगी हो गई थी।

27     यीशु की चर्चा सुनकर, भीड़ में उसके पीछे से आई, और उसके वस्त्र को छू लिया।

28     क्योंकि वह कहती थी, यदि मैं उसके वस्त्र ही को छू लूंगी, तो चंगी हो जाऊंगी।

29     और तुरन्त उसका लोहू बहना बन्द हो गया; और उस ने अपनी देह में जान लिया, कि मैं उस बीमारी से अच्छी हो गई।

30     यीशु ने तुरन्त अपने में जान लिया, कि मुझ में से सामर्थ निकली है, और भीड़ में पीछे फिरकर पूछा; मेरा वस्त्र किस ने छूआ?

31     उसके चेलों ने उस से कहा; तू देखता है, कि भीड़ तुझ पर गिरी पड़ती है, और तू कहता है; कि किस ने मुझे छुआ?

32     तब उस ने उसे देखने के लिये जिस ने यह काम किया था, चारों ओर दृष्टि की।

33     तब वह स्त्री यह जानकर, कि मेरी कैसी भलाई हुई है, डरती और कांपती हुई आई, और उसके पांवों पर गिरकर, उस से सब हाल सच सच कह दिया।

34     उस ने उस से कहा; पुत्री तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है: कुशल से जा, और अपनी इस बीमारी से बची रह॥

6. Mark 5 : 25-34

25     And a certain woman, which had an issue of blood twelve years,

26     And had suffered many things of many physicians, and had spent all that she had, and was nothing bettered, but rather grew worse,

27     When she had heard of Jesus, came in the press behind, and touched his garment.

28     For she said, If I may touch but his clothes, I shall be whole.

29     And straightway the fountain of her blood was dried up; and she felt in her body that she was healed of that plague.

30     And Jesus, immediately knowing in himself that virtue had gone out of him, turned him about in the press, and said, Who touched my clothes?

31     And his disciples said unto him, Thou seest the multitude thronging thee, and sayest thou, Who touched me?

32     And he looked round about to see her that had done this thing.

33     But the woman fearing and trembling, knowing what was done in her, came and fell down before him, and told him all the truth.

34     And he said unto her, Daughter, thy faith hath made thee whole; go in peace, and be whole of thy plague.

7. लूका 7: 11-16

11     थोड़े दिन के बाद वह नाईंन नाम के एक नगर को गया, और उसके चेले, और बड़ी भीड़ उसके साथ जा रही थी।

12     जब वह नगर के फाटक के पास पहुंचा, तो देखो, लोग एक मुरदे को बाहर लिए जा रहे थे; जो अपनी मां का एकलौता पुत्र था, और वह विधवा थी: और नगर के बहुत से लोग उसके साथ थे।

13     उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उस से कहा; मत रो।

14     तब उस ने पास आकर, अर्थी को छुआ; और उठाने वाले ठहर गए, तब उस ने कहा; हे जवान, मैं तुझ से कहता हूं, उठ।

15     तब वह मुरदा उठ बैठा, और बोलने लगा: और उस ने उसे उस की मां को सौप दिया।

16     इस से सब पर भय छा गया; और वे परमेश्वर की बड़ाई करके कहने लगे कि हमारे बीच में एक बड़ा भविष्यद्वक्ता उठा है, और परमेश्वर ने अपने लोगों पर कृपा दृष्टि की है।

7. Luke 7 : 11-16

11     And it came to pass the day after, that he went into a city called Nain; and many of his disciples went with him, and much people.

12     Now when he came nigh to the gate of the city, behold, there was a dead man carried out, the only son of his mother, and she was a widow: and much people of the city was with her.

13     And when the Lord saw her, he had compassion on her, and said unto her, Weep not.

14     And he came and touched the bier: and they that bare him stood still. And he said, Young man, I say unto thee, Arise.

15     And he that was dead sat up, and began to speak. And he delivered him to his mother.

16     And there came a fear on all: and they glorified God, saying, That a great prophet is risen up among us; and, That God hath visited his people.

8. यूहन्ना 17: 3

3     और अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जाने।

8. John 17 : 3

3     And this is life eternal, that they might know thee the only true God, and Jesus Christ, whom thou hast sent.

9. भजन संहिता 119: 12-18

12     हे यहोवा, तू धन्य है; मुझे अपनी विधियां सिखा!

13     तेरे सब कहे हुए नियमों का वर्णन, मैं ने अपने मुंह से किया है।

14     मैं तेरी चितौनियों के मार्ग से, मानों सब प्रकार के धन से हर्षित हुआ हूं।

15     मैं तेरे उपदेशों पर ध्यान करूंगा, और तेरे मार्गों की ओर दृष्टि रखूंगा।

16     मैं तेरी विधियों से सुख पाऊंगा; और तेरे वचन को न भूलूंगा॥

17     अपने दास का उपकार कर, कि मैं जीवित रहूं, और तेरे वचन पर चलता रहूं।

18     मेरी आंखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं।

9. Psalm 119 : 12-18

12     Blessed art thou, O Lord: teach me thy statutes.

13     With my lips have I declared all the judgments of thy mouth.

14     I have rejoiced in the way of thy testimonies, as much as in all riches.

15     I will meditate in thy precepts, and have respect unto thy ways.

16     I will delight myself in thy statutes: I will not forget thy word.

17     Deal bountifully with thy servant, that I may live, and keep thy word.

18     Open thou mine eyes, that I may behold wondrous things out of thy law.

10. भजन संहिता 103: 1-4, 12, 22

1     हेमेरे मन, यहोवा को धन्य कह; और जो कुछ मुझ में है, वह उसके पवित्र नाम को धन्य कहे!

2     हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह, और उसके किसी उपकार को न भूलना।

3     वही तो तेरे सब अधर्म को क्षमा करता, और तेरे सब रोगों को चंगा करता है,

4     वही तो तेरे प्राण को नाश होने से बचा लेता है, और तेरे सिर पर करूणा और दया का मुकुट बान्धता है।

12     उदयाचल अस्ताचल से जितनी दूर है, उसने हमारे अपराधों को हम से उतनी ही दूर कर दिया है।

22     हे यहोवा की सारी सृष्टि, उसके राज्य के सब स्थानों में उसको धन्य कहो। हे मेरे मन, तू यहोवा को धन्य कह!

10. Psalm 103 : 1-4, 12, 22

1     Bless the Lord, O my soul: and all that is within me, bless his holy name.

2     Bless the Lord, O my soul, and forget not all his benefits:

3     Who forgiveth all thine iniquities; who healeth all thy diseases;

4     Who redeemeth thy life from destruction; who crowneth thee with lovingkindness and tender mercies;

12     As far as the east is from the west, so far hath he removed our transgressions from us.

22     Bless the Lord, all his works in all places of his dominion: bless the Lord, O my soul.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 472 : 24 (सब)-26

ईश्वर और उसकी रचना में सभी वास्तविकता सामंजस्यपूर्ण और शाश्वत है। वह जो बनाता है वह अच्छा है, और जो कुछ भी बनाया जाता है वह उसी के द्वारा बनाया जाता है।

1. 472 : 24 (All)-26

All reality is in God and His creation, harmonious and eternal. That which He creates is good, and He makes all that is made.

2. 207 : 9-14

हमें सीखना चाहिए कि बुराई अस्तित्व का भ्रामक और असत्य है। बुराई सर्वोच्च नहीं है; अच्छा असहाय नहीं है; न तो पदार्थ के प्राथमिक, और आत्मा के कानून के तथाकथित कानून हैं। इस पाठ के बिना, हम पूर्ण पिता, या मनुष्य के दिव्य सिद्धांत की दृष्टि खो देते हैं।

2. 207 : 9-14

We must learn that evil is the awful deception and unreality of existence. Evil is not supreme; good is not helpless; nor are the so-called laws of matter primary, and the law of Spirit secondary. Without this lesson, we lose sight of the perfect Father, or the divine Principle of man.

3. 554 : 8 (गलती)-22

त्रुटि हमेशा त्रुटि होती है। यह कोई बात नहीं है। जीवन का कोई भी कथन, जीवन की गलत धारणा से अनुसरण करते हुए, गलत है क्योंकि यह जीवन के तथाकथित स्वार्थ के किसी भी ज्ञान से रहित है, इसके मूल या अस्तित्व के किसी भी ज्ञान से रहित है। नश्वर अपने भ्रूण और शिशु अस्तित्व से बेखबर है; लेकिन जैसे-जैसे वह एक और झूठे दावे में बढ़ता है, यानी आत्म-जागरूक सामग्री में, वह कहना सीखता है, "मैं कुछ हूं, लेकिन मुझे किसने बनाया?" त्रुटि उत्तर देती है, "भगवान ने तुम्हें बनाया है।" त्रुटि का पहला प्रयास ईश्वर के लिए जो कुछ भी पापी और नश्वर है उसका सृजन करना है; लेकिन अनंत मन ऐसी गलत धारणा को शून्य कर देता है।

यीशु ने परमेश्वर और उसकी सृष्टि के इस विपरीत को हमसे बेहतर परिभाषित किया, जब उसने कहा, "वह झूठा है, वरन झूठ का पिता है।"

3. 554 : 8 (Error)-22

Error is always error. It is no thing. Any statement of life, following from a misconception of life, is erroneous, because it is destitute of any knowledge of the so-called selfhood of life, destitute of any knowledge of its origin or existence. The mortal is unconscious of his foetal and infantile existence; but as he grows up into another false claim, that of self-conscious matter, he learns to say, "I am somebody; but who made me?" Error replies, "God made you." The first effort of error has been and is to impute to God the creation of whatever is sinful and mortal; but infinite Mind sets at naught such a mistaken belief.

Jesus defined this opposite of God and His creation better than we can, when he said, "He is a liar, and the father of it."

4. 596 : 20 (घाटी)-27

घाटी। अवसाद; नम्रता; अंधेरा।

"चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूं, तौभी हानि से न डरूंगा।" (भजन संहिता 23:4.)

यद्यपि यह रास्ता नश्वर अर्थों में अंधेरा है, दिव्य जीवन और प्रेम इसे रोशन करता है, नश्वर विचार की अशांति, मृत्यु का भय, और त्रुटि की कथित वास्तविकता को नष्ट करता है। क्रिश्चियन साइंस, विरोधाभासी अर्थ, घाटी को कली और गुलाब के रूप में खिलने के लिए।

4. 596 : 20 (Valley)-27

Valley. Depression; meekness; darkness.

"Though I walk through the valley of the shadow of death, I will fear no evil." (Psalm xxiii. 4.)

Though the way is dark in mortal sense, divine Life and Love illumine it, destroy the unrest of mortal thought, the fear of death, and the supposed reality of error. Christian Science, contradicting sense, maketh the valley to bud and blossom as the rose.

5. 495 : 8 (वर्गीकृत)-16

... तब बीमारी और त्रुटि को वर्गीकृत करें जैसा कि हमारे मास्टर ने किया था, जब उन्होंने बीमारों की बात की थी, "जिसे शैतान ने बाध्य किया," और मानव विश्वास पर कार्य करने वाली सत्य की जीवन-शक्ति में त्रुटि के लिए एक संप्रभु मारक पाते हैं, एक शक्ति जो जेल के दरवाज़े को इस तरह से खोलती है, और बंदी को शारीरिक और नैतिक रूप से मुक्त करती है।

जब बीमारी या पाप का भ्रम आपको झकझोरता है, ईश्वर और उसके विचार के प्रति दृढ़ रहना अपने विचार में पालन करने के लिए उसकी समानता के अलावा कुछ भी अनुमति न दें।

5. 495 : 8 (classify)-16

…classify sickness and error as our Master did, when he spoke of the sick, "whom Satan hath bound," and find a sovereign antidote for error in the life-giving power of Truth acting on human belief, a power which opens the prison doors to such as are bound, and sets the captive free physically and morally.

When the illusion of sickness or sin tempts you, cling steadfastly to God and His idea. Allow nothing but His likeness to abide in your thought.

6. 273 : 1-20

पाप, बीमारी और मृत्यु की सामग्री और इसके दावे ईश्वर के विपरीत हैं, और वे उससे नहीं निकल सकते। कोई भौतिक सत्य नहीं है। भौतिक इंद्रियाँ ईश्वर और आध्यात्मिक सत्य का कोई संज्ञान नहीं ले सकती हैं। मानव विश्वास ने कई आविष्कार किए हैं, लेकिन उनमें से एक भी दिव्य विज्ञान के दिव्य सिद्धांत के बिना होने की समस्या को हल नहीं कर सकता है। सामग्री की परिकल्पना से कटौती वैज्ञानिक नहीं है। वे वास्तविक विज्ञान से भिन्न हैं क्योंकि वे ईश्वरीय नियम पर आधारित नहीं हैं।

दिव्य विज्ञान भौतिक इंद्रियों की झूठी गवाही को उलट देता है, और इस प्रकार त्रुटि की नींव टूट जाती है। इसलिए विज्ञान और इंद्रियों के बीच की दुश्मनी, और समझ की त्रुटियों को समाप्त करने तक सही समझ प्राप्त करने की असंभवता।

सामग्री और चिकित्सा विज्ञान के तथाकथित कानूनों ने नश्वर को कभी भी पूर्ण, सामंजस्यपूर्ण और अमर नहीं बनाया है। आत्मा द्वारा शासित होने पर मनुष्य सामंजस्यपूर्ण होता है। इसलिए होने के सत्य को समझने का महत्व, जो आध्यात्मिक अस्तित्व के नियमों को प्रकट करता है।

6. 273 : 1-20

Matter and its claims of sin, sickness, and death are contrary to God, and cannot emanate from Him. There is no material truth. The physical senses can take no cognizance of God and spiritual Truth. Human belief has sought out many inventions, but not one of them can solve the problem of being without the divine Principle of divine Science. Deductions from material hypotheses are not scientific. They differ from real Science because they are not based on the divine law.

Divine Science reverses the false testimony of the material senses, and thus tears away the foundations of error. Hence the enmity between Science and the senses, and the impossibility of attaining perfect understanding till the errors of sense are eliminated.

The so-called laws of matter and of medical science have never made mortals whole, harmonious, and immortal. Man is harmonious when governed by Soul. Hence the importance of understanding the truth of being, which reveals the laws of spiritual existence.

7. 393 : 29-4

मनुष्य कभी बीमार नहीं होता, क्योंकि मन बीमार नहीं होता और न ही पदार्थ हो सकता है। एक गलत धारणा दोनों बहकानेवाला और प्रलोभन, पाप और पापी, बीमारी और उसके कारण है। बीमारी में शांत होना अच्छा है; आशावादी होना भी बेहतर है; लेकिन यह समझना कि बीमारी वास्तविक नहीं है और यह सत्य इसकी वास्तविक वास्तविकता को नष्ट कर सकता है, सबसे अच्छा है, इस समझ के लिए सार्वभौमिक और सही उपाय है।

7. 393 : 29-4

Man is never sick, for Mind is not sick and matter cannot be. A false belief is both the tempter and the tempted, the sin and the sinner, the disease and its cause. It is well to be calm in sickness; to be hopeful is still better; but to understand that sickness is not real and that Truth can destroy its seeming reality, is best of all, for this understanding is the universal and perfect remedy.

8. 231 : 3-11

जब तक एक बीमार सही तरीके से नहीं मिलता है और सच्चाई से काफी हद तक दूर हो जाता है, तब तक बीमार पर विजय नहीं मिलती है। यदि परमेश्वर पाप, बीमारी, और मृत्यु को नष्ट नहीं करता है, तो वे नश्वर लोगों के दिमाग में नष्ट नहीं होते हैं, बल्कि इस तथाकथित मन को अमर लगते हैं। भगवान जो नहीं कर सकता, उसके लिए आदमी को प्रयास करने की जरूरत नहीं है। यदि परमेश्वर बीमारों को नहीं चंगा करता है, तो वे चंगे नहीं होते हैं, क्योंकि कोई भी कम शक्ति अनंत-शक्ति के बराबर नहीं होती है; लेकिन परमेश्वर, सत्य, जीवन, प्रेम, धर्मी की प्रार्थना के माध्यम से बीमारों को चंगा करता है।

8. 231 : 3-11

Unless an ill is rightly met and fairly overcome by Truth, the ill is never conquered. If God destroys not sin, sickness, and death, they are not destroyed in the mind of mortals, but seem to this so-called mind to be immortal. What God cannot do, man need not attempt. If God heals not the sick, they are not healed, for no lesser power equals the infinite All-power; but God, Truth, Life, Love, does heal the sick through the prayer of the righteous.

9. 318 : 5-13

शारीरिक इंद्रियां बीमारियों को वास्तविकताओं के रूप में परिभाषित करती हैं; लेकिन शास्त्र घोषित करते हैं कि ईश्वर ने सब कुछ बनाया है, जबकि भौतिक इंद्रियां कह रही हैं कि पदार्थ रोग का कारण बनता है और दिव्य मन इसे ठीक नहीं कर सकता है या नहीं करेगा। भौतिक इंद्रियां उन सभी चीजों की उत्पत्ति और समर्थन करती हैं जो भौतिक, असत्य, स्वार्थी या बदनाम हैं। वे आत्मा को मिट्टी में, जीवन को अधर में डाल देंगे, और सभी चीजों को नष्ट कर देंगे। हमें भौतिक इंद्रियों के इस झूठ को आध्यात्मिक इंद्रिय के सत्य से चुप कराना चाहिए।

9. 318 : 5-13

Corporeal senses define diseases as realities; but the Scriptures declare that God made all, even while the corporeal senses are saying that matter causes disease and the divine Mind cannot or will not heal it. The material senses originate and support all that is material, untrue, selfish, or debased. They would put soul into soil, life into limbo, and doom all things to decay. We must silence this lie of material sense with the truth of spiritual sense.

10. 377 : 26-6

सभी तथाकथित बीमारियों का कारण मानसिक, एक नश्वर भय, एक गलत विश्वास या अस्वस्थता की आवश्यकता और शक्ति का विश्वास है; एक डर यह भी है कि मन मनुष्य के जीवन की रक्षा करने में लाचार है और इसे नियंत्रित करने में अक्षम है। इस अज्ञानी मानवीय विश्वास के बिना, कोई भी परिस्थिति अपने आप में पीड़ा उत्पन्न करने के लिए शक्तिहीन है। यह रोग में अव्यक्त विश्वास है, साथ ही रोग का भय भी है, जो बीमारी को कुछ परिस्थितियों से जोड़ता है और दोनों को संयुक्त रूप से प्रकट करने का कारण बनता है, भले ही कविता और संगीत मानव स्मृति द्वारा पुन: उत्पन्न होते हैं। रोग की कोई बुद्धि नहीं है। अनजाने में आप खुद को भुगतने की सजा देते हैं। इसे समझने से आप इस स्व-वाक्य को बदल सकेंगे, और हर परिस्थिति का सच्चाई से सामना कर सकेंगे।

10. 377 : 26-6

The cause of all so-called disease is mental, a mortal fear, a mistaken belief or conviction of the necessity and power of ill-health; also a fear that Mind is helpless to defend the life of man and incompetent to control it. Without this ignorant human belief, any circumstance is of itself powerless to produce suffering. It is latent belief in disease, as well as the fear of disease, which associates sickness with certain circumstances and causes the two to appear conjoined, even as poetry and music are reproduced in union by human memory. Disease has no intelligence. Unwittingly you sentence yourself to suffer. The understanding of this will enable you to commute this self-sentence, and meet every circumstance with truth.

11. 417 : 21-24

रोग चिकित्सक को वास्तविक नहीं दिखना चाहिए, क्योंकि यह प्रदर्शन है कि रोगी को ठीक करने का तरीका उसके लिए बीमारी को असत्य बनाना है।

11. 417 : 21-24

Disease should not appear real to the physician, since it is demonstrable that the way to cure the patient is to make disease unreal to him.

12. 353 : 19-24

हमें सभी जगहों पर भूतों के बारे में विचार छोड़ना चाहिए। हमें अंधविश्वास के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करना चाहिए, लेकिन हमें इसमें सभी विश्वास पैदा करना चाहिए और बुद्धिमान होना चाहिए। जब हमें पता चलता है कि त्रुटि वास्तविक नहीं है, तो हम प्रगति के लिए तैयार होंगे, "कि जो बातें पीछे रह गई हैं उन को भूल कर।"

12. 353 : 19-24

We must give up the spectral at all points. We must not continue to admit the somethingness of superstition, but we must yield up all belief in it and be wise. When we learn that error is not real, we shall be ready for progress, "forgetting those things which are behind."


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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