रविवार 19 मई, 2019 विषय — नश्वर और अमर |

रविवार 19 मई, 2019



विषयनश्वर और अमर

SubjectMortals and Immortals

वर्ण पाठ: I कुरिन्थियों 15 : 50

हे भाइयों, मैं यह कहता हूं कि मांस और लोहू परमेश्वर के राज्य के अधिकारी नहीं हो सकते, और न विनाश अविनाशी का अधिकारी हो सकता है।



Golden Text: I Corinthians 15 : 50

Now this I say, brethren, that flesh and blood cannot inherit the kingdom of God; neither doth corruption inherit incorruption.




PDF Downloads:


पाठ के ऑडियो के लिए यहां क्लिक करें

YouTube पर सुनने के लिए यहां क्लिक करें

████████████████████████████████████████████████████████████████████████


भजन संहिता 4 : 1-6


1     हे मेरे धर्ममय परमेश्वर, जब मैं पुकारूं तब तू मुझे उत्तर दे; जब मैं सकेती में पड़ा तब तू ने मुझे विस्तार दिया। मुझ पर अनुग्रह कर और मेरी प्रार्थना सुन ले॥

2     हे मनुष्यों के पुत्रों, कब तक मेरी महिमा के बदले अनादर होता रहेगा? तुम कब तक व्यर्थ बातों से प्रीति रखोगे और झूठी युक्ति की खोज में रहोगे?

3     यह जान रखो कि यहोवा ने भक्त को अपने लिये अलग कर रखा है; जब मैं यहोवा को पुकारूंगा तब वह सुन लेगा॥

4     कांपते रहो और पाप मत करो; अपने अपने बिछौने पर मन ही मन सोचो और चुपचाप रहो।

5     धर्म के बलिदान चढ़ाओ, और यहोवा पर भरोसा रखो॥

6     बहुत से हैं जो कहते हैं, कि कौन हम को कुछ भलाई दिखाएगा? हे यहोवा तू अपने मुख का प्रकाश हम पर चमका!

Responsive Reading: Psalm 4 : 1-6

1.     Hear me when I call, O God of my righteousness: thou hast enlarged me when I was in distress; have mercy upon me, and hear my prayer.

2.     O ye sons of men, how long will ye turn my glory into shame? how long will ye love vanity, and seek after leasing?

3.     But know that the Lord hath set apart him that is godly for himself: the Lord will hear when I call into him.

4.     Stand in awe, and sin not: commune with your own heart upon your bed, and be still.

5.     Offer the sacrifices of righteousness, and put your trust in the Lord.

6.     There be many that say, Who will shew us any good? Lord, lift thou up the light of thy countenance upon us.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. उत्पत्ति 1 : 26 (से 4th ,), 26 (और हर पर), 27 (से ,)

26     फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगने वाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।

27     तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया,

1. Genesis 1 : 26 (to 4th ,), 26 (and over every), 27 (to ,)

26     And God said, Let us make man in our image, after our likeness: and let them have dominion over the fish of the sea, and over the fowl of the air, … and over every creeping thing that creepeth upon the earth.

27     So God created man in his own image,

2. गलातियों 3 : 26 (तु)

26     ... तुम सब उस विश्वास करने के द्वारा जो मसीह यीशु पर है, परमेश्वर की सन्तान हो।

2. Galatians 3 : 26 (ye)

26     …ye are all the children of God by faith in Christ Jesus.

3. यूहन्ना 3: 16-18 (से :)

16     क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।

17     परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा, कि जगत पर दंड की आज्ञा दे परन्तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए।

18     जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती,

3. John 3 : 16-18 (to :)

16     For God so loved the world, that he gave his only begotten Son, that whosoever believeth in him should not perish, but have everlasting life.

17     For God sent not his Son into the world to condemn the world; but that the world through him might be saved.

18     He that believeth on him is not condemned:

4. यूहन्ना 8 : 1-11

1     परन्तु यीशु जैतून के पहाड़ पर गया।

2     और भोर को फिर मन्दिर में आया, और सब लोग उसके पास आए; और वह बैठकर उन्हें उपदेश देने लगा।

3     तब शास्त्री और फरीसी एक स्त्री को लाए, जो व्यभिचार में पकड़ी गई थी, और उस को बीच में खड़ी करके यीशु से कहा।

4     हे गुरू, यह स्त्री व्यभिचार करते ही पकड़ी गई है।

5     व्यवस्था में मूसा ने हमें आज्ञा दी है कि ऐसी स्त्रियों को पत्थरवाह करें: सो तू इस स्त्री के विषय में क्या कहता है?

6     उन्होंने उस को परखने के लिये यह बात कही ताकि उस पर दोष लगाने के लिये कोई बात पाएं, परन्तु यीशु झुककर उंगली से भूमि पर लिखने लगा।

7     जब वे उस से पूछते रहे, तो उस ने सीधे होकर उन से कहा, कि तुम में जो निष्पाप हो, वही पहिले उस को पत्थर मारे।

8     और फिर झुककर भूमि पर उंगली से लिखने लगा।

9     परन्तु वे यह सुनकर बड़ों से लेकर छोटों तक एक एक करके निकल गए, और यीशु अकेला रह गया, और स्त्री वहीं बीच में खड़ी रह गई।

10     यीशु ने सीधे होकर उस से कहा, हे नारी, वे कहां गए? क्या किसी ने तुझ पर दंड की आज्ञा न दी।

11     उस ने कहा, हे प्रभु, किसी ने नहीं: यीशु ने कहा, मैं भी तुझ पर दंड की आज्ञा नहीं देता; जा, और फिर पाप न करना॥

4. John 8 : 1-11

1     Jesus went unto the mount of Olives.

2     And early in the morning he came again into the temple, and all the people came unto him; and he sat down, and taught them.

3     And the scribes and Pharisees brought unto him a woman taken in adultery; and when they had set her in the midst,

4     They say unto him, Master, this woman was taken in adultery, in the very act.

5     Now Moses in the law commanded us, that such should be stoned: but what sayest thou?

6     This they said, tempting him, that they might have to accuse him. But Jesus stooped down, and with his finger wrote on the ground, as though he heard them not.

7     So when they continued asking him, he lifted up himself, and said unto them, He that is without sin among you, let him first cast a stone at her.

8     And again he stooped down, and wrote on the ground.

9     And they which heard it, being convicted by their own conscience, went out one by one, beginning at the eldest, even unto the last: and Jesus was left alone, and the woman standing in the midst.

10     When Jesus had lifted up himself, and saw none but the woman, he said unto her, Woman, where are those thine accusers? hath no man condemned thee?

11     She said, No man, Lord. And Jesus said unto her, Neither do I condemn thee: go, and sin no more.

5. यूहन्ना 11 : 1, 3, 17, 21-26, 39-44

1     मरियम और उस की बहिन मारथा के गांव बैतनिय्याह का लाजर नाम एक मनुष्य बीमार था।

3     सो उस की बहिनों ने उसे कहला भेजा, कि हे प्रभु, देख, जिस से तू प्रीति रखता है, वह बीमार है।

17     सो यीशु को आकर यह मालूम हुआ कि उसे कब्र में रखे चार दिन हो चुके हैं।

21     मारथा ने यीशु से कहा, हे प्रभु, यदि तू यहां होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता।

22     और अब भी मैं जानती हूं, कि जो कुछ तू परमेश्वर से मांगेगा, परमेश्वर तुझे देगा।

23     यीशु ने उस से कहा, तेरा भाई जी उठेगा।

24     मारथा ने उस से कहा, मैं जानती हूं, कि अन्तिम दिन में पुनरुत्थान के समय वह जी उठेगा।

25     यीशु ने उस से कहा, पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूं, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा।

26     और जो कोई जीवता है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा, क्या तू इस बात पर विश्वास करती है?

39     यीशु ने कहा; पत्थर को उठाओ: उस मरे हुए की बहिन मारथा उस से कहने लगी, हे प्रभु, उस में से अब तो र्दुगंध आती है क्योंकि उसे मरे चार दिन हो गए।

40     यीशु ने उस से कहा, क्या मैं ने तुझ से न कहा था कि यदि तू विश्वास करेगी, तो परमेश्वर की महिमा को देखेगी।

41     तब उन्होंने उस पत्थर को हटाया, फिर यीशु ने आंखें उठाकर कहा, हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं कि तू ने मेरी सुन ली है।

42     और मै जानता था, कि तू सदा मेरी सुनता है, परन्तु जो भीड़ आस पास खड़ी है, उन के कारण मैं ने यह कहा, जिस से कि वे विश्वास करें, कि तू ने मुझे भेजा है।

43     यह कहकर उस ने बड़े शब्द से पुकारा, कि हे लाजर, निकल आ।

44     जो मर गया था, वह कफन से हाथ पांव बन्धे हुए निकल आया और उसका मुंह अंगोछे से लिपटा हुआ तें यीशु ने उन से कहा, उसे खोलकर जाने दो॥

5. John 11 : 1, 3, 17, 21-26, 39-44

1     Now a certain man was sick, named Lazarus, of Bethany, the town of Mary and her sister Martha.

3     Therefore his sisters sent unto him, saying, Lord, behold, he whom thou lovest is sick.

17     Then when Jesus came, he found that he had lain in the grave four days already.

21     Then said Martha unto Jesus, Lord, if thou hadst been here, my brother had not died.

22     But I know, that even now, whatsoever thou wilt ask of God, God will give it thee.

23     Jesus saith unto her, Thy brother shall rise again.

24     Martha saith unto him, I know that he shall rise again in the resurrection at the last day.

25     Jesus said unto her, I am the resurrection, and the life: he that believeth in me, though he were dead, yet shall he live:

26     And whosoever liveth and believeth in me shall never die. Believest thou this?

39     Jesus said, Take ye away the stone. Martha, the sister of him that was dead, saith unto him, Lord, by this time he stinketh: for he hath been dead four days.

40     Jesus saith unto her, Said I not unto thee, that, if thou wouldest believe, thou shouldest see the glory of God?

41     Then they took away the stone from the place where the dead was laid. And Jesus lifted up his eyes, and said, Father, I thank thee that thou hast heard me.

42     And I knew that thou hearest me always: but because of the people which stand by I said it, that they may believe that thou hast sent me.

43     And when he thus had spoken, he cried with a loud voice, Lazarus, come forth.

44     And he that was dead came forth, bound hand and foot with graveclothes: and his face was bound about with a napkin. Jesus saith unto them, Loose him, and let him go.

6. I कुरिन्थियों 15 : 53-57

53     क्योंकि अवश्य है, कि यह नाशमान देह अविनाश को पहिन ले, और यह मरनहार देह अमरता को पहिन ले।

54     और जब यह नाशमान अविनाश को पहिन लेगा, और यह मरनहार अमरता को पहिन लेगा, तक वह वचन जो लिखा है, पूरा हो जाएगा, कि जय ने मृत्यु को निगल लिया।

55     हे मृत्यु तेरी जय कहां रही?

56     हे मृत्यु तेरा डंक कहां रहा? मृत्यु का डंक पाप है; और पाप का बल व्यवस्था है।

57     परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें जयवन्त करता है।

6. I Corinthians 15 : 53-57

53     For this corruptible must put on incorruption, and this mortal must put on immortality.

54     So when this corruptible shall have put on incorruption, and this mortal shall have put on immortality, then shall be brought to pass the saying that is written, Death is swallowed up in victory.

55     O death, where is thy sting? O grave, where is thy victory?

56     The sting of death is sin; and the strength of sin is the law.

57     But thanks be to God, which giveth us the victory through our Lord Jesus Christ.

7. I कुरिन्थियों 6 : 9-11

9     क्या तुम नहीं जानते, कि अन्यायी लोग परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे? धोखा न खाओ, न वेश्यागामी, न मूर्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, न लुच्चे, न पुरूषगामी।

10     न चोर, न लोभी, न पियक्कड़, न गाली देने वाले, न अन्धेर करने वाले परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे।

11     और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए, और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे॥

7. I Corinthians 6 : 9-11

9     Know ye not that the unrighteous shall not inherit the kingdom of God? Be not deceived: neither fornicators, nor idolaters, nor adulterers, nor effeminate, nor abusers of themselves with mankind,

10     Nor thieves, nor covetous, nor drunkards, nor revilers, nor extortioners, shall inherit the kingdom of God.

11     And such were some of you: but ye are washed, but ye are sanctified, but ye are justified in the name of the Lord Jesus, and by the Spirit of our God.

8. I तीमुथियुस 1 : 17

17     अब सनातन राजा अर्थात अविनाशी अनदेखे अद्वैत परमेश्वर का आदर और महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन॥

8. I Timothy 1 : 17

17     Now unto the King eternal, immortal, invisible, the only wise God, be honour and glory for ever and ever. Amen.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 246 : 5-6

सही और अमर उनके निर्माता की शाश्वत समानता है।

1. 246 : 5-6

The perfect and immortal are the eternal likeness of their Maker.

2. 209 : 1-4

मनुष्य, अमर होने के नाते, एक आदर्श अविनाशी जीवन है यह नश्वर विश्वास है जो शरीर को अज्ञानता, भय के रूप में अनुपातहीन और रोगग्रस्त बनाता है या मानव नश्वरों को नियंत्रित करेगा।

2. 209 : 1-4

Man, being immortal, has a perfect indestructible life. It is the mortal belief which makes the body discordant and diseased in proportion as ignorance, fear, or human will governs mortals.

3. 492 : 25-28

ईश्वर मन है, और ईश्वर अनंत है; इसलिए सब मन है। इस कथन पर विज्ञान के होने का पता लगाया जाता है और इस विज्ञान का सिद्धांत ईश्वरीय है, जिसमें सामंजस्य और अमरता है।

3. 492 : 25-28

God is Mind, and God is infinite; hence all is Mind. On this statement rests the Science of being, and the Principle of this Science is divine, demonstrating harmony and immortality.

4. 247 : 15-18

अमर पुरुष और महिला आध्यात्मिक भावना के उदाहरण हैं, पूर्ण मन से खींचे गए और प्रेम के उन उच्च अवधारणाओं को दर्शाते हैं जो अपनी भौतिक भावना को पार करते हैं।

4. 247 : 15-18

Immortal men and women are models of spiritual sense, drawn by perfect Mind and reflecting those higher conceptions of loveliness which transcend all material sense.

5. 295: 5-15

भगवान मनुष्य सहित ब्रह्मांड का निर्माण और संचालन करता है। ब्रह्मांड आध्यात्मिक विचारों से भरा है, जिसे वह विकसित करता है, और वे मन के आज्ञाकारी हैं जो उन्हें बनाता है। नश्वर मन आध्यात्मिक को भौतिक में बदल देगा, और फिर इस त्रुटि की नश्वरता से बचने के लिए मनुष्य के मूल स्व को पुनर्प्राप्त करेगा। ईश्वर की स्वयं की छवि में बनाए गए नश्वर अमर की तरह नहीं हैं; लेकिन अनंत आत्मा सभी होने के नाते, नश्वर चेतना वैज्ञानिक तथ्य के लिए अंतिम पैदावार होगी और गायब हो जाएगी, और सही, और हमेशा के लिए होने का वास्तविक अर्थ प्रकट होगा।

5. 295 : 5-15

God creates and governs the universe, including man. The universe is filled with spiritual ideas, which He evolves, and they are obedient to the Mind that makes them. Mortal mind would transform the spiritual into the material, and then recover man's original self in order to escape from the mortality of this error. Mortals are not like immortals, created in God's own image; but infinite Spirit being all, mortal consciousness will at last yield to the scientific fact and disappear, and the real sense of being, perfect and forever intact, will appear.

6. 538: 17-22

उत्पत्ति के एलोहिस्टिक परिचय में पाप, बीमारी और मृत्यु का कोई रिकॉर्ड नहीं है, जिसमें भगवान आकाश, पृथ्वी और मनुष्य का निर्माण करते हैं। जब तक वह अखाड़े में प्रवेश करने के सत्य का खंडन नहीं करता, तब तक बुराई का कोई इतिहास नहीं है, और बुराई को केवल वास्तविक और शाश्वत के विपरीत विरोधाभासी के रूप में देखा जाता है।

6. 538 : 17-22

Sin, sickness, and death have no record in the Elohistic introduction of Genesis, in which God creates the heavens, earth, and man. Until that which contradicts the truth of being enters into the arena, evil has no history, and evil is brought into view only as the unreal in contradistinction to the real and eternal.

7. 476: 1 (केवल), 9-20

नश्वर अमर के नकली हैं।

ईश्वर मनुष्य का सिद्धांत है, और मनुष्य ईश्वर का विचार है। इसलिए मनुष्य न तो नश्वर है और न ही भौतिक। नश्वर गायब हो जाएंगे, और अमर होंगे, या भगवान की संतान, मनुष्य के एकमात्र और अनन्त सत्य के रूप में दिखाई देंगे। मुर्दा भगवान के बच्चे नहीं हैं। उनके पास कभी भी पूर्ण राज्य नहीं था, जिसे बाद में फिर से हासिल किया जा सकता है। वे नश्वर इतिहास की शुरुआत से थे, "पाप में कल्पना की और अधर्म में माता के गर्भ में लाया।" मृत्यु दर अंततः अमरता में निगल जाती है। पाप, बीमारी, और मृत्यु को उन तथ्यों को जगह देनी होगी जो अमर आदमी के हैं।

7. 476 : 1 (only), 9-20

Mortals are the counterfeits of immortals.

God is the Principle of man, and man is the idea of God. Hence man is not mortal nor material. Mortals will disappear, and immortals, or the children of God, will appear as the only and eternal verities of man. Mortals are not fallen children of God. They never had a perfect state of being, which may subsequently be regained. They were, from the beginning of mortal history, "conceived in sin and brought forth in iniquity." Mortality is finally swallowed up in immortality. Sin, sickness, and death must disappear to give place to the facts which belong to immortal man.

8. 426: 16-22

जब यह जान लिया जाता है कि बीमारी जीवन को नष्ट नहीं कर सकती है, और मृत्यु से पाप या बीमारी से मृत्यु को बचाया नहीं जाता है, तो यह समझ जीवन के नएपन में बदल जाएगी। यह या तो मरने या कब्र से डरने की इच्छा में महारत हासिल करेगा, और इस तरह नश्वर अस्तित्व को नष्ट करने वाले महान भय को नष्ट कर देगा।

8. 426 : 16-22

When it is learned that disease cannot destroy life, and that mortals are not saved from sin or sickness by death, this understanding will quicken into newness of life. It will master either a desire to die or a dread of the grave, and thus destroy the great fear that besets mortal existence.

9. 428: 22-29

महान आध्यात्मिक तथ्य को सामने लाना चाहिए कि मनुष्य है, पूर्ण और अमर नहीं। हमें हमेशा अस्तित्व की चेतना को धारण करना चाहिए, और जल्द ही या बाद में, मसीह और ईसाई विज्ञान के माध्यम से, हमें पाप और मृत्यु पर नियंत्रण रखना चाहिए। मनुष्य की अमरता के प्रमाण अधिक स्पष्ट हो जाएंगे, क्योंकि भौतिक विश्वासों को छोड़ दिया जाता है और होने के अमर तथ्यों को स्वीकार किया जाता है।

9. 428 : 22-29

The great spiritual fact must be brought out that man is, not shall be, perfect and immortal. We must hold forever the consciousness of existence, and sooner or later, through Christ and Christian Science, we must master sin and death. The evidence of man's immortality will become more apparent, as material beliefs are given up and the immortal facts of being are admitted.

10. 494: 19-29

कारण, सही ढंग से निर्देशित, कॉर्पोरल सेंस की त्रुटियों को ठीक करने का कार्य करता है; लेकिन पाप, बीमारी और मृत्यु वास्तविक प्रतीत होगी (भले ही सोते हुए सपने के अनुभव वास्तविक लगते हैं) जब तक कि मनुष्य के शाश्वत सद्भाव का विज्ञान वैज्ञानिक की अखंड वास्तविकता के साथ उनके भ्रम को नहीं तोड़ता।

आप इन दोनों सिद्धांतों में से कौन सा आदमी स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? एक नश्वर गवाही है, जो बदल रहा है, मर रहा है, असत्य है। दूसरा शाश्वत और वास्तविक साक्ष्य है, सत्य का संकेत, इसकी गोद अमर फलों से ऊँची है।

10. 494 : 19-29

Reason, rightly directed, serves to correct the errors of corporeal sense; but sin, sickness, and death will seem real (even as the experiences of the sleeping dream seem real) until the Science of man's eternal harmony breaks their illusion with the unbroken reality of scientific being.

Which of these two theories concerning man are you ready to accept? One is the mortal testimony, changing, dying, unreal. The other is the eternal and real evidence, bearing Truth's signet, its lap piled high with immortal fruits.

11. 444: 27-30

ईश्वरीय विज्ञान में अमर या भगवान के बच्चे, एक सामंजस्यपूर्ण परिवार हैं; लेकिन भौतिक अर्थों में नश्वर, या "पुरुषों के बच्चे", असभ्य और झूठे भाई हैं।

11. 444 : 27-30

Immortals, or God's children in divine Science, are one harmonious family; but mortals, or the "children of men" in material sense, are discordant and ofttimes false brethren.

12. 491: 7-16

मटेरियल मैन अनैच्छिक और स्वैच्छिक त्रुटि से बना है, एक नकारात्मक अधिकार का और एक सकारात्मक गलत का, बाद वाला खुद को सही कहता है। मनुष्य का आध्यात्मिक व्यक्तित्व कभी गलत नहीं होता। यह मनुष्य के निर्माता की समानता है। पदार्थ नश्वर को वास्तविक उत्पत्ति और होने के तथ्यों से नहीं जोड़ सकता, जिसमें सभी को समाप्त होना चाहिए। यह आत्मा के वर्चस्व को स्वीकार करने से ही है, जो पदार्थ के दावों को खारिज करता है, कि नश्वरता मृत्यु दर को दूर कर सकती है और उस अदम्य आध्यात्मिक लिंक को खोज सकती है जो मनुष्य को दैवीय समानता में स्थापित करता है, जो अपने निर्माता से अविभाज्य है।

12. 491 : 7-16

Material man is made up of involuntary and voluntary error, of a negative right and a positive wrong, the latter calling itself right. Man's spiritual individuality is never wrong. It is the likeness of man's Maker. Matter cannot connect mortals with the true origin and facts of being, in which all must end. It is only by acknowledging the supremacy of Spirit, which annuls the claims of matter, that mortals can lay off mortality and find the indissoluble spiritual link which establishes man forever in the divine likeness, inseparable from his creator.

13. 493: 6-8

भौतिक ज्ञान के सभी प्रमाण और भौतिक ज्ञान से प्राप्त सभी ज्ञान विज्ञान को सभी चीजों के अमर सत्य तक पहुंचाना चाहिए।

13. 493 : 6-8

All the evidence of physical sense and all the knowledge obtained from physical sense must yield to Science, to the immortal truth of all things.

14. 495: 14-24

जब बीमारी या पाप का भ्रम आपको झकझोरता है, ईश्वर और उसके विचार के प्रति दृढ़ रहना अपने विचार में पालन करने के लिए उसकी समानता के अलावा कुछ भी अनुमति न दें। न तो डर और न ही संदेह को अपनी स्पष्ट भावना और शांत विश्वास का पालन करें, कि जीवन के सामंजस्यपूर्ण जीवन की मान्यता - जैसा कि जीवन है - किसी भी दर्दनाक भावना, या विश्वास को नष्ट कर सकता है, जो जीवन नहीं है। क्रिश्चियन साइंस, कॉरपोरल सेंस के बजाय अपनी होने की समझ का समर्थन करें, और यह समझ सच्चाई के साथ त्रुटि को दबा देगी, मृत्यु दर को अमरता से बदल देगी, और सद्भाव के साथ चुप्पी को दूर करेगी।

14. 495 : 14-24

When the illusion of sickness or sin tempts you, cling steadfastly to God and His idea. Allow nothing but His likeness to abide in your thought. Let neither fear nor doubt overshadow your clear sense and calm trust, that the recognition of life harmonious — as Life eternally is — can destroy any painful sense of, or belief in, that which Life is not. Let Christian Science, instead of corporeal sense, support your understanding of being, and this understanding will supplant error with Truth, replace mortality with immortality, and silence discord with harmony.

15. 75: 13-16

यीशु ने लाजर को इस समझ के साथ बहाल किया कि लाजर की मृत्यु कभी नहीं हुई थी, न कि इस बात से कि उसका शरीर मर गया था और फिर दोबारा जीवित हो गया था।

15. 75 : 13-16

Jesus restored Lazarus by the understanding that Lazarus had never died, not by an admission that his body had died and then lived again.

16. 496: 20-27

"मृत्यु का डंक पाप है; और पाप का बल व्यवस्था है," — नश्वर विश्वास के कानून, अमर जीवन के तथ्यों के साथ युद्ध पर, यहां तक कि आध्यात्मिक कानून जो कब्र को कहते हैं, "तुम्हारी जीत कहाँ है?" परंतु "जब यह नाशमान अविनाश को पहिन लेगा, और यह मरनहार अमरता को पहिन लेगा, तक वह वचन जो लिखा है, पूरा हो जाएगा, कि जय ने मृत्यु को निगल लिया।"

16. 496 : 20-27

"The sting of death is sin; and the strength of sin is the law," — the law of mortal belief, at war with the facts of immortal Life, even with the spiritual law which says to the grave, "Where is thy victory?" But "when this corruptible shall have put on incorruption, and this mortal shall have put on immortality, then shall be brought to pass the saying that is written, Death is swallowed up in victory."

17. 434: 31 (परमेश्वर)-32

परमेश्वर ने मनुष्य को केवल आत्मा के लिए अमर और उत्तरदायी बनाया।

17. 434 : 31 (God)-32

God made Man immortal and amenable to Spirit only.

18. 249: 8-10

आइए हम आनन्दित हों कि हम दैवीय शक्तियों के अधीन हैं। ऐसा होने का सही विज्ञान है। होने का सही विज्ञान ऐसा है।

18. 249 : 8-10

Let us rejoice that we are subject to the divine "powers that be." Such is the true Science of being.

19. 492 : 7 (only)

Being is holiness, harmony, immortality.

19. 492: 7 (केवल)

पवित्र होना, समरसता, अमरता है।


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


████████████████████████████████████████████████████████████████████████