रविवार 19 दिसंबर, 2021



विषयक्या ब्रह्मांड, मनुष्य सहित, परमाणु बल द्वारा विकसित है?

SubjectIs the Universe, Including Man, Evolved by Atomic Force?

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: भजन संहिता 103 : 19

"यहोवा ने तो अपना सिंहासन स्वर्ग में स्थिर किया है, और उसका राज्य पूरी सृष्टि पर है।"



Golden Text: Psalm 103 : 19

The Lord hath prepared his throne in the heavens; and his kingdom ruleth over all.




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उत्तरदायी अध्ययन: अय्यूब 12: 7-9 • अय्यूब 9: 6-10


7     पशुओं से तो पूछ और वे तुझे दिखाएंगे; और आकाश के पक्षियों से, और वे तुझे बता देंगे।

8     पृथ्वी पर ध्यान दे, तब उस से तुझे शिक्षा मिलेगी; ओर समुद्र की मछलियां भी तुझ से वर्णन करेंगी।

9     कौन इन बातों को नहीं जानता, कि यहोवा ही ने अपने हाथ से इस संसार को बनाया है।

6     वह पृथ्वी को हिला कर उसके स्थान से अलग करता है, और उसके खम्भे कांपने लगते हैं।

7     उसकी आज्ञा बिना सूर्य उदय होता ही नहीं; और वह तारों पर मुहर लगाता है;

8     वह आकाशमण्डल को अकेला ही फैलाता है, और समुद्र की ऊंची ऊंची लहरों पर चलता है;

9     वह सप्तर्षि, मृगशिरा और कचपचिया और दक्खिन के नक्षत्रों का बनाने वाला है।

10     वह तो ऐसे बड़े कर्म करता है, जिनकी थाह नहीं लगती; और इतने आश्चर्यकर्म करता है, जो गिने नहीं जा सकते।

Responsive Reading: Job 12 : 7-9; Job 9 : 6-10

7.     Ask now the beasts, and they shall teach thee; and the fowls of the air, and they shall tell thee:

8.     Or speak to the earth, and it shall teach thee: and the fishes of the sea shall declare unto thee.

9.     Who knoweth not in all these that the hand of the Lord hath wrought this?

6.     Which shaketh the earth out of her place, and the pillars thereof tremble.

7.     Which commandeth the sun, and it riseth not; and sealeth up the stars.

8.     Which alone spreadeth out the heavens, and treadeth upon the waves of the sea.

9.     Which maketh Arcturus, Orion, and Pleiades, and the chambers of the south.

10.     Which doeth great things past finding out; yea, and wonders without number.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. यूहन्ना 1 : 1, 3

1     आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।

3     सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।

1. John 1 : 1, 3

1     In the beginning was the Word, and the Word was with God, and the Word was God.

3     All things were made by him; and without him was not any thing made that was made.

2. उत्पत्ति 2 : 1

1     योंआकाश और पृथ्वी और उनकी सारी सेना का बनाना समाप्त हो गया।

2. Genesis 2 : 1

1     Thus the heavens and the earth were finished, and all the host of them.

3. भजन संहिता 104 : 1, 2, 5, 19, 30

1     हेमेरे मन, तू यहोवा को धन्य कह! हे मेरे परमेश्वर यहोवा, तू अत्यन्त महान है! तू वैभव और ऐश्वर्य का वस्त्र पहिने हुए है,

2     जो उजियाले को चादर की नाईं ओढ़े रहता है, और आकाश को तम्बू के समान ताने रहता है,

5     तू ने पृथ्वी को उसकी नीव पर स्थिर किया है, ताकि वह कभी न डगमगाए।

19     उसने नियत समयों के लिये चन्द्रमा को बनाया है; सूर्य अपने अस्त होने का समय जानता है।

30     फिर तू अपनी ओर से सांस भेजता है, और वे सिरजे जाते हैं; और तू धरती को नया कर देता है॥

3. Psalm 104 : 1, 2, 5, 19, 30

1     Bless the Lord, O my soul. O Lord my God, thou art very great; thou art clothed with honour and majesty.

2     Who coverest thyself with light as with a garment: who stretchest out the heavens like a curtain:

5     Who laid the foundations of the earth, that it should not be removed for ever.

19     He appointed the moon for seasons: the sun knoweth his going down.

30     Thou sendest forth thy spirit, they are created: and thou renewest the face of the earth.

4. 2 राजा 20 : 1-5 (से 2nd :), 6 (से 1st ;), 8 (से 2nd ,), 9-11

1     उन दिनों में हिजकिय्याह ऐसा रोगी हुआ कि मरने पर था, और आमोस के पुत्र यशायाह भविष्यद्वक्ता ने उसके पास जा कर कहा, यहोवा यों कहता है, कि अपने घराने के विषय जो आज्ञा देनी हो वह दे; क्योंकि तू नहीं बचेगा, मर जाएगा।

2     तब उसने भीत की ओर मुंह फेर, यहोवा से प्रार्थना कर के कहा, हे यहोवा!

3     मैं बिन्ती करता हूँ, स्मरण कर, कि मैं सच्चाई और खरे मन से अपने को तेरे सम्मुख जान कर चलता आया हूँ; और जो तुझे अच्छा तगता है वही मैं करता आया हूँ। तब हिजकिय्याह बिलक बिलक कर रोया।

4     और ऐसा हुआ कि यशायाह नगर के बीच तक जाने भी न पाया था कि यहोवा का यह वचन उसके पास पहुंचा,

5     कि लौटकर मेरी प्रजा के प्रधान हिजकिय्याह से कह, कि तेरे मूलपुरुष दाऊद का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, कि मैं ने तेरी प्रार्थना सुनी और तेरे आंसू देखे हैं; देख, मैं तुझे चंगा करता हूँ।

6     और मैं तेरी आयु पन्द्रह वर्ष और बढ़ा दूंगा।

8     हिजकिय्याह ने यशायाह से पूछा, यहोवा जो मुझे चंगा करेगा?

9     यशायाह ने कहा, यहोवा जो अपने कहे हुए वचन को पूरा करेगा, इस बात का यहोवा की ओर से तेरे लिये यह चिन्ह होगा, कि धूपघड़ी की छाया दस अंश आगे बढ़ जाएगी, व दस अंश घट जाएगी।

10     हिजकिय्याह ने कहा, छाया का दस अंश आगे बढ़ना तो हलकी बात है, इसलिए ऐसा हो कि छाया दस अंश पीछे लौट जाए।

11     तब यशायाह भविष्यद्वक्ता ने यहोवा को पुकारा, और आहाज की घूपघड़ी की छाया, जो दस अंश ढल चुकी थी, यहोवा ने उसको पीछे की ओर लौटा दिया।

4. II Kings 20 : 1-5 (to 2nd :), 6 (to 1st ;), 8 (to 2nd ,), 9-11

1     In those days was Hezekiah sick unto death. And the prophet Isaiah the son of Amoz came to him, and said unto him, Thus saith the Lord, Set thine house in order; for thou shalt die, and not live.

2     Then he turned his face to the wall, and prayed unto the Lord, saying,

3     I beseech thee, O Lord, remember now how I have walked before thee in truth and with a perfect heart, and have done that which is good in thy sight. And Hezekiah wept sore.

4     And it came to pass, afore Isaiah was gone out into the middle court, that the word of the Lord came to him, saying,

5     Turn again, and tell Hezekiah the captain of my people, Thus saith the Lord, the God of David thy father, I have heard thy prayer, I have seen thy tears: behold, I will heal thee:

6     And I will add unto thy days fifteen years;

8     And Hezekiah said unto Isaiah, What shall be the sign that the Lord will heal me,

9     And Isaiah said, This sign shalt thou have of the Lord, that the Lord will do the thing that he hath spoken: shall the shadow go forward ten degrees, or go back ten degrees?

10     And Hezekiah answered, It is a light thing for the shadow to go down ten degrees: nay, but let the shadow return backward ten degrees.

11     And Isaiah the prophet cried unto the Lord: and he brought the shadow ten degrees backward, by which it had gone down in the dial of Ahaz.

5. अय्यूब 22: 12 (से?)

12     क्या ईश्वर स्वर्ग के ऊंचे स्थान में नहीं है?

5. Job 22 : 12 (to ?)

12     Is not God in the height of heaven?

6. यहोशू 10 : 1, 2 (से 1st ,), 3, 4, 6 (से ;), 7-10 (से 1st ,), 11 (से :), 12, 13 (से 1st .), 14 (से,)

1     जब यरूशलेम के राजा अदोनीसेदेक ने सुना कि यहोशू ने ऐ को ले लिया, और उसको सत्यानाश कर डाला है, और जैसा उसने यरीहो और उसके राजा से किया है, और यह भी सुना कि गिबोन के निवासियों ने इस्राएलियों से मेल किया, और उनके बीच रहने लगे हैं,

2     तब वे निपट डर गए।

3     इसलिये यरूशलेम के राजा अदोनीसेदेक ने हेब्रोन के राजा होहाम, यर्मूत के राजा पिराम, लाकीश के राजा यापी, और एग्लोन के राजा दबीर के पास यह कहला भेजा,

4     कि मेरे पास आकर मेरी सहायता करो, और चलो हम गिबोन को मारें; क्योंकि उसने यहोशू और इस्राएलियों से मेल कर लिया है।

6     तक गिबोन के निवासियों ने गिलगाल की छावनी में यहोशू के पास यों कहला भेजा, कि अपने दासों की ओर से तू अपना हाथ न हटाना।

7     तब यहोशू सारे योद्धाओं और सब शूरवीरों को संग ले कर गिलगाल से चल पड़ा।

8     और यहोवा ने यहोशू से कहा, उन से मत डर, क्योंकि मैं ने उन को तेरे हाथ में कर दिया है; उन में से एक पुरूष भी तेरे साम्हने टिक न सकेगा।

9     तब यहोशू रातोरात गिलगाल से जा कर एकाएक उन पर टूट पड़ा।

10     और यहोवा ने इस्राएलियोंके साम्हने उनको ढांढस बंधाया,

11     फिर जब वे इस्राएलियों के साम्हने से भागकर बेथोरोन की उतराई पर आए, तब अजेका पहुंचने तक यहोवा ने आकाश से बड़े बड़े पत्थर उन पर बरसाए, और वे मर गए॥

12     और उस समय, अर्थात जिस दिन यहोवा ने एमोरियों को इस्राएलियों के वश में कर दिया, उस दिन यहोशू ने यहोवा से इस्राएलियों के देखते इस प्रकार कहा, हे सूर्य, तू गिबोन पर, और हे चन्द्रमा, तू अय्यालोन की तराई के ऊपर थमा रह॥

13     और सूर्य उस समय तक थमा रहा; और चन्द्रमा उस समय तक ठहरा रहा, जब तक उस जाति के लोगों ने अपने शत्रुओं से पलटा न लिया॥

14     न तो उस से पहिले कोई ऐसा दिन हुआ और न उसके बाद॥

6. Joshua 10 : 1, 2 (to 1st ,), 3, 4, 6 (to ;), 7-10 (to 1st ,), 11 (to :), 12,

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1. 13 (to 1st .), 14 (to ,)

1 Now it came to pass, when Adoni-zedek king of Jerusalem had heard how Joshua had taken Ai, and had utterly destroyed it; as he had done to Jericho and her king, so he had done to Ai and her king; and how the inhabitants of Gibeon had made peace with Israel, and were among them;

2     That they feared greatly,

3     Wherefore Adoni-zedek king of Jerusalem sent unto Hoham king of Hebron, and unto Piram king of Jarmuth, and unto Japhia king of Lachish, and unto Debir king of Eglon, saying,

4     Come up unto me, and help me, that we may smite Gibeon: for it hath made peace with Joshua and with the children of Israel.

6     And the men of Gibeon sent unto Joshua to the camp to Gilgal, saying, Slack not thy hand from thy servants;

7     So Joshua ascended from Gilgal, he, and all the people of war with him, and all the mighty men of valour.

8     And the Lord said unto Joshua, Fear them not: for I have delivered them into thine hand; there shall not a man of them stand before thee.

9     Joshua therefore came unto them suddenly, and went up from Gilgal all night.

10     And the Lord discomfited them before Israel,

11     And it came to pass, as they fled from before Israel, and were in the going down to Beth-horon, that the Lord cast down great stones from heaven upon them unto Azekah, and they died:

12     Then spake Joshua to the Lord in the day when the Lord delivered up the Amorites before the children of Israel, and he said in the sight of Israel, Sun, stand thou still upon Gibeon; and thou, Moon, in the valley of Ajalon.

13     And the sun stood still, and the moon stayed, until the people had avenged themselves upon their enemies.

14     And there was no day like that before it or after it,

7. भजन संहिता 103 : 19

19     यहोवा ने तो अपना सिंहासन स्वर्ग में स्थिर किया है, और उसका राज्य पूरी सृष्टि पर है।

7. Psalm 103 : 19

19     The Lord hath prepared his throne in the heavens; and his kingdom ruleth over all.

8. अय्यूब 26 : 7-13 (से ;), 14 (यह)

7     वह उत्तर दिशा को निराधार फैलाए रहता है, और बिना टेक पृथ्वी को लटकाए रखता है।

8     वह जल को अपनी काली घटाओं में बान्ध रखता, और बादल उसके बोझ से नहीं फटता।

9     वह अपने सिंहासन के साम्हने बादल फैला कर उसको छिपाए रखता है।

10     उजियाले और अन्धियारे के बीच जहां सिवाना बंधा है, वहां तक उसने जलनिधि का सिवाना ठहरा रखा है।

11     उसकी घुड़की से आकाश के खम्भे थरथरा कर चकित होते हैं।

12     वह अपने बल से समुद्र को उछालता, और अपनी बुद्धि से घपण्ड को छेद देता है।

13     उसकी आत्मा से आकाशमण्डल स्वच्छ हो जाता है।

14     ... उसके पराक्रम के गरजने का भेद कौन समझ सकता है?

8. Job 26 : 7-13 (to ;), 14 (the)

7     He stretcheth out the north over the empty place, and hangeth the earth upon nothing.

8     He bindeth up the waters in his thick clouds; and the cloud is not rent under them.

9     He holdeth back the face of his throne, and spreadeth his cloud upon it.

10     He hath compassed the waters with bounds, until the day and night come to an end.

11     The pillars of heaven tremble and are astonished at his reproof.

12     He divideth the sea with his power, and by his understanding he smiteth through the proud.

13     By his spirit he hath garnished the heavens;

14     …the thunder of his power who can understand?

9. प्रकाशित वाक्य 20: 11 (से;)

11     फिर मैं ने एक बड़ा श्वेत सिंहासन और उस को जो उस पर बैठा हुआ है, देखा, जिस के साम्हने से पृथ्वी और आकाश भाग गए।

9. Revelation 20 : 11 (to ;)

11     And I saw a great white throne, and him that sat on it, from whose face the earth and the heaven fled away;

10. प्रकाशित वाक्य 21: 5 (से 1st.), 6 (से 2nd.)

5     और जो सिंहासन पर बैठा था, उस ने कहा, कि देख, मैं सब कुछ नया कर देता हूं।

6     फिर उस ने मुझ से कहा, ये बातें पूरी हो गई हैं, मैं अलफा और ओमिगा, आदि और अन्त हूं।

10. Revelation 21 : 5 (to 1st .), 6 (to 2nd .)

5     And he that sat upon the throne said, Behold, I make all things new.

6     And he said unto me, It is done. I am Alpha and Omega, the beginning and the end.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 135 : 9-10

आध्यात्मिक विकास अकेले ईश्वरीय शक्ति के व्यायाम के योग्य है।

1. 135 : 9-10

Spiritual evolution alone is worthy of the exercise of divine power.

2. 275 : 20-23

दिव्य तत्वमीमांसा, जैसा कि आध्यात्मिक समझ से पता चलता है, स्पष्ट रूप से दिखाता है कि सभी मन है, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, - अर्थात्, सभी शक्ति, सभी उपस्थिति, सभी विज्ञान।

2. 275 : 20-23

Divine metaphysics, as revealed to spiritual understanding, shows clearly that all is Mind, and that Mind is God, omnipotence, omnipresence, omniscience, — that is, all power, all presence, all Science.

3. 547 : 19-22

भौतिक विकास का तात्पर्य है कि महान प्रथम कारण सामग्री बन जाना चाहिए, और बाद में या तो मन में वापस आना चाहिए या धूल और शून्य में नीचे जाना चाहिए।

3. 547 : 19-22

Material evolution implies that the great First Cause must become material, and afterwards must either return to Mind or go down into dust and nothingness.

4. 555 : 16-23

मनुष्य की उत्पत्ति की खोज करना, जो कि ईश्वर का प्रतिबिंब है, ईश्वर की उत्पत्ति, स्वयं-अस्तित्व और शाश्वत की खोज करने जैसा है। केवल नपुंसक त्रुटि ही आत्मा को पदार्थ के साथ, अच्छाई को बुराई के साथ, अमरता को मृत्यु दर के साथ एकजुट करने की कोशिश करेगी, और इस नकली एकता को मनुष्य कहेगी, जैसे कि मनुष्य मन और पदार्थ दोनों की संतान थे, देवता और मानवता दोनों के। सृष्टि आध्यात्मिक आधार पर टिकी हुई है।

4. 555 : 16-23

Searching for the origin of man, who is the reflection of God, is like inquiring into the origin of God, the self-existent and eternal. Only impotent error would seek to unite Spirit with matter, good with evil, immortality with mortality, and call this sham unity man, as if man were the offspring of both Mind and matter, of both Deity and humanity. Creation rests on a spiritual basis.

5. 317 : 2 (सामग्री) -5

...भौतिक ज्ञान ने रचनात्मक दिव्य सिद्धांत का सिंहासन हड़प लिया, पदार्थ की शक्ति, मिथ्यात्व की शक्ति, आत्मा की तुच्छता पर जोर दिया, और एक मानवरूपी ईश्वर की घोषणा की।

5. 317 : 2 (material) -5

…material knowledge usurped the throne of the creative divine Principle, insisted on the might of matter, the force of falsity, the insignificance of spirit, and proclaimed an anthropomorphic God.

6. 257 : 15-21

भौतिक इंद्रियां और मानव अवधारणाएं आध्यात्मिक विचारों को भौतिक विश्वासों में अनुवादित करेंगी, और कहेंगे कि मानव सिद्धांत, अनंत सिद्धांत के बजाय, ईश्वर, दूसरे शब्दों में, दिव्य प्रेम, - बारिश का जनक है, "जो बूंदों की भीख मांगता है ओस, "जो अपने मौसम में मजाज़रोथ को आगे लाता है," और अपने बेटों के साथ "आर्कटुरस" का मार्गदर्शन करता है।

6. 257 : 15-21

The material senses and human conceptions would translate spiritual ideas into material beliefs, and would say that an anthropomorphic God, instead of infinite Principle, — in other words, divine Love, — is the father of the rain, "who hath begotten the drops of dew," who bringeth "forth Mazzaroth in his season," and guideth "Arcturus with his sons."

7. 124 : 3-9 (से ,), 14-24, 26-31

भौतिक विज्ञान (तथाकथित) मानव ज्ञान है, - नश्वर मन का एक नियम, एक अंध विश्वास, एक सैमसन अपनी ताकत का कफन। जब इस मानवीय विश्वास में इसका समर्थन करने के लिए संगठनों का अभाव है, तो इसकी नींव खत्म हो गई है। न तो नैतिक शक्ति, आध्यात्मिक आधार, और न ही स्वयं का पवित्र सिद्धांत होने के कारण, यह विश्वास कारण के लिए गलतियाँ करता है और पदार्थ में जीवन और बुद्धि की खोज करता है,

ब्रह्मांड, मनुष्य की तरह, विज्ञान द्वारा अपने दिव्य सिद्धांत, ईश्वर से व्याख्या की जानी है, और फिर इसे समझा जा सकता है; लेकिन जब भौतिक अर्थों के आधार पर समझाया जाता है और विकास, परिपक्वता और क्षय के विषय के रूप में प्रतिनिधित्व किया जाता है, तो ब्रह्मांड, जैसे मनुष्य, है और होना चाहिए, एक रहस्य है।

आसंजन, सामंजस्य और आकर्षण मन के गुण हैं। वे दिव्य सिद्धांत से संबंधित हैं, और उस विचार-शक्ति के उपसंहार का समर्थन करते हैं, जिसने पृथ्वी को अपनी कक्षा में लॉन्च किया और गर्व की लहर से कहा, "यहां तक और इसके आगे नहीं।"

उन्हें वापस ले लें, और सृजन को ढह जाना चाहिए। मानव ज्ञान उन्हें पदार्थ की ताकत कहता है; लेकिन दिव्य विज्ञान घोषित करता है कि वे पूर्ण रूप से दिव्य मन से संबंधित हैं, इस दिमाग में निहित हैं, और इसलिए उन्हें उनके सही घर और वर्गीकरण के लिए पुनर्स्थापित करता है।

7. 124 : 3-9 (to ,), 14-24, 26-31

Physical science (so-called) is human knowledge, — a law of mortal mind, a blind belief, a Samson shorn of his strength. When this human belief lacks organizations to support it, its foundations are gone. Having neither moral might, spiritual basis, nor holy Principle of its own, this belief mistakes effect for cause and seeks to find life and intelligence in matter,

The universe, like man, is to be interpreted by Science from its divine Principle, God, and then it can be understood; but when explained on the basis of physical sense and represented as subject to growth, maturity, and decay, the universe, like man, is, and must continue to be, an enigma.

Adhesion, cohesion, and attraction are properties of Mind. They belong to divine Principle, and support the equipoise of that thought-force, which launched the earth in its orbit and said to the proud wave, "Thus far and no farther."

We tread on forces. Withdraw them, and creation must collapse. Human knowledge calls them forces of matter; but divine Science declares that they belong wholly to divine Mind, are inherent in this Mind, and so restores them to their rightful home and classification.

8. 192 : 11-21

श्रद्धा शक्ति एक भौतिक विश्वास है, एक अंधा गर्भित बल है, इच्छा की संतान है और ज्ञान की नहीं, नश्वर मन की है और न ही अमर की। यह सिर का लंबा मोतियाबिंद, भयावह लौ, टेम्परेस्ट की सांस है। यह बिजली और तूफान है, यह सब स्वार्थी, दुष्ट, बेईमान और अशुद्ध है।

नैतिक और आध्यात्मिक आत्मा का हो सकता है, जो "अपनी मुट्ठी में हवा" रखता है; और यह शिक्षण विज्ञान और सद्भाव के साथ उच्चारण करता है। विज्ञान में, आपके पास भगवान के विपरीत कोई शक्ति नहीं हो सकती है, और भौतिक इंद्रियों को अपनी झूठी गवाही देनी चाहिए।

8. 192 : 11-21

Erring power is a material belief, a blind miscalled force, the offspring of will and not of wisdom, of the mortal mind and not of the immortal. It is the headlong cataract, the devouring flame, the tempest's breath. It is lightning and hurricane, all that is selfish, wicked, dishonest, and impure.

Moral and spiritual might belong to Spirit, who holds the "wind in His fists;" and this teaching accords with Science and harmony. In Science, you can have no power opposed to God, and the physical senses must give up their false testimony.

9. 252 : 15-17, 24-8

भौतिक बोध के झूठे प्रमाण आत्मा की गवाही के साथ विपरीत रूप से विरोधाभासी हैं। भौतिक बोध, वास्तविकता के अहंकार के साथ अपनी आवाज बुलंद करता है और कहता है:

दुनिया मेरा राज्य है। मैं सामग्री की भव्यता में रोमांचित हूं। लेकिन भगवान का एक स्पर्श, एक दुर्घटना, भगवान का कानून, किसी भी समय मेरी शांति को नष्ट कर सकता है, क्योंकि मेरी सारी झूठी खुशी घातक है। फटने वाले लावा की तरह, मैं अपने स्वयं के निराशा में विस्तार करता हूं, और आग का उपभोग करने की लचीलापन के साथ चमकता हूं।

विपरीत गवाही देते हुए आत्मा कहती है:

मैं आत्मा हूं। मनुष्य, जिसकी इंद्रियाँ आध्यात्मिक हैं, मेरी समानता है। वह अनंत समझ को दर्शाता है, क्योंकि मैं अनंत हूं। पवित्रता की सुंदरता, होने की पूर्णता, अविनाशी महिमा, — सभी मेरे हैं, क्योंकि मैं भगवान हूं। मैं मनुष्य को अमरता देता हूं, क्योंकि मैं सत्य हूं। मैं सभी आनंद प्रदान करता हूं और उन्हें शामिल करता हूं, क्योंकि मैं प्रेम हूं। मैं जीवन देता हूं, बिना शुरुआत और बिना अंत के, क्योंकि मैं जीवन हूं। मैं सर्वोच्च हूं और सभी को देता हूं, क्योंकि मैं माइंड हूं। मैं सब का पदार्थ हूं, क्योंकि मैं जो हूं सो हूं.

9. 252 : 15-17, 24-8

The false evidence of material sense contrasts strikingly with the testimony of Spirit. Material sense lifts its voice with the arrogance of reality and says:

The world is my kingdom. I am enthroned in the gorgeousness of matter. But a touch, an accident, the law of God, may at any moment annihilate my peace, for all my fancied joys are fatal. Like bursting lava, I expand but to my own despair, and shine with the resplendency of consuming fire.

Spirit, bearing opposite testimony, saith:

I am Spirit. Man, whose senses are spiritual, is my likeness. He reflects the infinite understanding, for I am Infinity. The beauty of holiness, the perfection of being, imperishable glory, — all are Mine, for I am God. I give immortality to man, for I am Truth. I include and impart all bliss, for I am Love. I give life, without beginning and without end, for I am Life. I am supreme and give all, for I am Mind. I am the substance of all, because I am that I am.

10. 524 : 28-3

क्या आत्मा अपने विपरीत पदार्थ को विकसित कर सकती है, और पदार्थ को पाप और कष्ट सहने की क्षमता दे सकती है? क्या आत्मा, ईश्वर, धूल में डाला जाता है, और अंततः पदार्थ की मांग पर निकाल दिया जाता है? क्या आत्मा धूल में प्रवेश करती है, और उसमें दिव्य प्रकृति और सर्वशक्तिमानता खो देती है? क्या मन, ईश्वर, ईश्वर की सांस से अनुप्राणित, एक नश्वर पापी बनने के लिए पदार्थ में प्रवेश करता है?

10. 524 : 28-3

Could Spirit evolve its opposite, matter, and give matter ability to sin and suffer? Is Spirit, God, injected into dust, and eventually ejected at the demand of matter? Does Spirit enter dust, and lose therein the divine nature and omnipotence? Does Mind, God, enter matter to become there a mortal sinner, animated by the breath of God?

11. 195 : 11-14

हर एक को तय करने का बिंदु यह है कि क्या यह एक नश्वर मन है या एक अमर मन है, जो एक कारण है। हमें तत्वमीमांसा विज्ञान और इसके दिव्य सिद्धांत के लिए पदार्थ के आधार का त्याग करना चाहिए।

11. 195 : 11-14

The point for each one to decide is, whether it is mortal mind or immortal Mind that is causative. We should forsake the basis of matter for metaphysical Science and its divine Principle.

12. 306 : 25-29

भौतिक इंद्रियों की झकझोर देने वाली गवाही के बीच, विज्ञान, अभी भी विराजमान है, नश्वर, अपरिवर्तनीय, सामंजस्यपूर्ण, दिव्य सिद्धांत को प्रकट कर रहा है, - जीवन और ब्रह्मांड को प्रकट कर रहा है, जो हमेशा मौजूद और शाश्वत है।

12. 306 : 25-29

Undisturbed amid the jarring testimony of the material senses, Science, still enthroned, is unfolding to mortals the immutable, harmonious, divine Principle, — is unfolding Life and the universe, ever present and eternal.

13. 520 : 3-5 (से !), 23-24 (से 2nd ,)

अथाह मन प्रकट होता है। अनंत प्रेम की गहराई, चौड़ाई, ऊंचाई, पराक्रम, ऐश्वर्य और महिमा सारे स्थान को भर देती है। वह पर्याप्त है!

यहाँ यह जोरदार घोषणा है कि ईश्वर सब कुछ मन से बनाता है, पदार्थ के माध्यम से नहीं,

13. 520 : 3-5 (to !), 23-24 (to 2nd ,)

Unfathomable Mind is expressed. The depth, breadth, height, might, majesty, and glory of infinite Love fill all space. That is enough!

Here is the emphatic declaration that God creates all through Mind, not through matter,

14. 471 : 18-20

ईश्वर अनंत है, इसलिए हमेशा मौजूद है, और कोई अन्य शक्ति या उपस्थिति नहीं है। इसलिए ब्रह्मांड की आध्यात्मिकता ही सृष्टि का एकमात्र तथ्य है।

14. 471 : 18-20

God is infinite, therefore ever present, and there is no other power nor presence. Hence the spirituality of the universe is the only fact of creation.


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6


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