रविवार 18 फ़रवरी, 2024



विषयआत्मा

SubjectSoul

वर्ण पाठ: स्वर्ण पाठ: यशायाह 33: 22

"क्योंकि यहोवा हमारा न्यायी, यहोवा हमारा हाकिम, यहोवा हमारा राजा है; वही हमारा उद्धार करेगा॥"



Golden Text: Isaiah 33 : 22

For the Lord is our judge, the Lord is our lawgiver, the Lord is our king; he will save us.




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उत्तरदायी अध्ययन: भजन संहिता 23:1,3 • भजन संहिता 25: 1, 4, 5, 10, 13, 20


1     यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी।

3     वह मेरे जी में जी ले आता है। धर्म के मार्गो में वह अपने नाम के निमित्त मेरी अगुवाई करता है।

1     हेयहोवा मैं अपने मन को तेरी ओर उठाता हूं।

4     हे यहोवा अपने मार्ग मुझ को दिखला; अपना पथ मुझे बता दे।

5     मुझे अपने सत्य पर चला और शिक्षा दे, क्योंकि तू मेरा उद्धार करने वाला परमेश्वर है; मैं दिन भर तेरी ही बाट जोहता रहता हूं।

10     जो यहोवा की वाचा और चितौनियों को मानते हैं, उनके लिये उसके सब मार्ग करूणा और सच्चाई हैं॥

13     वह कुशल से टिका रहेगा, और उसका वंश पृथ्वी पर अधिकारी होगा।

20     मेरे प्राण की रक्षा कर, और मुझे छुड़ा; मुझे लज्जित न होने दे, क्योंकि मैं तेरा शरणागत हूं।

Responsive Reading: Psalm 23 : 1, 3Psalm 25 : 1, 4, 5, 10, 13, 20

1.     The Lord is my shepherd; I shall not want.

3.     He restoreth my soul: he leadeth me in the paths of righteousness for his name’s sake.

1.     Unto thee, O Lord, do I lift up my soul.

4.     Shew me thy ways, O Lord; teach me thy paths.

5.     Lead me in thy truth, and teach me: for thou art the God of my salvation; on thee do I wait all the day.

10.     All the paths of the Lord are mercy and truth unto such as keep his covenant and his testimonies.

13.     His soul shall dwell at ease; and his seed shall inherit the earth.

20.     O keep my soul, and deliver me: let me not be ashamed; for I put my trust in thee.



पाठ उपदेश



बाइबल


1. भजन संहिता 33: 1-6, 8-15, 18-22

1     हेधर्मियों यहोवा के कारण जयजयकार करो क्योंकि धर्मी लोगों को स्तुति करनी सोहती है।

2     वीणा बजा बजाकर यहोवा का धन्यवाद करो, दस तार वाली सारंगी बजा बजाकर उसका भजन गाओ।

3     उसके लिये नया गीत गाओ, जयजयकार के साथ भली भांति बजाओ॥

4     क्योंकि यहोवा का वचन सीधा है; और उसका सब काम सच्चाई से होता है।

5     वह धर्म और न्याय से प्रीति रखता है; यहोवा की करूणा से पृथ्वी भरपूर है॥

6     आकाशमण्डल यहोवा के वचन से, और उसके सारे गण उसके मुंह ही श्वास से बने।

8     सारी पृथ्वी के लोग यहोवा से डरें, जगत के सब निवासी उसका भय मानें!

9     क्योंकि जब उसने कहा, तब हो गया; जब उसने आज्ञा दी, तब वास्तव में वैसा ही हो गया॥

10     यहोवा अन्य अन्य जातियों की युक्ति को व्यर्थ कर देता है; वह देश देश के लोगों की कल्पनाओं को निष्फल करता है।

11     यहोवा की युक्ति सर्वदा स्थिर रहेगी, उसके मन की कल्पनाएं पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहेंगी।

12     क्या ही धन्य है वह जाति जिसका परमेश्वर यहोवा है, और वह समाज जिसे उसने अपना निज भाग होने के लिये चुन लिया हो!

13     यहोवा स्वर्ग से दृष्टि करता है, वह सब मनुष्यों को निहारता है;

14     अपने निवास के स्थान से वह पृथ्वी के सब रहने वालों को देखता है,

15     वही जो उन सभों के हृदयों को गढ़ता, और उनके सब कामों का विचार करता है।

18     देखो, यहोवा की दृष्टि उसके डरवैयों पर और उन पर जो उसकी करूणा की आशा रखते हैं बनी रहती है,

19     कि वह उनके प्राण को मृत्यु से बचाए, और अकाल के समय उन को जीवित रखे॥

20     हम यहोवा का आसरा देखते आए हैं; वह हमारा सहायक और हमारी ढाल ठहरा है।

21     हमारा हृदय उसके कारण आनन्दित होगा, क्योंकि हम ने उसके पवित्र नाम का भरोसा रखा है।

22     हे यहोवा जैसी तुझ पर हमारी आशा है, वैसी ही तेरी करूणा भी हम पर हो॥

1. Psalm 33 : 1-6, 8-15, 18-22

1     Rejoice in the Lord, O ye righteous: for praise is comely for the upright.

2     Praise the Lord with harp: sing unto him with the psaltery and an instrument of ten strings.

3     Sing unto him a new song; play skilfully with a loud noise.

4     For the word of the Lord is right; and all his works are done in truth.

5     He loveth righteousness and judgment: the earth is full of the goodness of the Lord.

6     By the word of the Lord were the heavens made; and all the host of them by the breath of his mouth.

8     Let all the earth fear the Lord: let all the inhabitants of the world stand in awe of him.

9     For he spake, and it was done; he commanded, and it stood fast.

10     The Lord bringeth the counsel of the heathen to nought: he maketh the devices of the people of none effect.

11     The counsel of the Lord standeth for ever, the thoughts of his heart to all generations.

12     Blessed is the nation whose God is the Lord; and the people whom he hath chosen for his own inheritance.

13     The Lord looketh from heaven; he beholdeth all the sons of men.

14     From the place of his habitation he looketh upon all the inhabitants of the earth.

15     He fashioneth their hearts alike; he considereth all their works.

18     Behold, the eye of the Lord is upon them that fear him, upon them that hope in his mercy;

19     To deliver their soul from death, and to keep them alive in famine.

20     Our soul waiteth for the Lord: he is our help and our shield.

21     For our heart shall rejoice in him, because we have trusted in his holy name.

22     Let thy mercy, O Lord, be upon us, according as we hope in thee.

2. भजन संहिता 51: 12

12     अपने किए हुए उद्धार का हर्ष मुझे फिर से दे, और उदार आत्मा देकर मुझे सम्भाल॥

2. Psalm 51 : 12

12     Restore unto me the joy of thy salvation; and uphold me with thy free spirit.

3. लूका 7: 6 (से     यीशु), 11 (को गया)-16

6     फिर यीशु

11     ... नगर को गया, और उसके चेले, और बड़ी भीड़ उसके साथ जा रही थी।

12     जब वह नगर के फाटक के पास पहुंचा, तो देखो, लोग एक मुरदे को बाहर लिए जा रहे थे; जो अपनी मां का एकलौता पुत्र था, और वह विधवा थी: और नगर के बहुत से लोग उसके साथ थे।

13     उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उस से कहा; मत रो।

14     तब उस ने पास आकर, अर्थी को छुआ; और उठाने वाले ठहर गए, तब उस ने कहा; हे जवान, मैं तुझ से कहता हूं, उठ।

15     तब वह मुरदा उठ बैठा, और बोलने लगा: और उस ने उसे उस की मां को सौप दिया।

16     इस से सब पर भय छा गया; और वे परमेश्वर की बड़ाई करके कहने लगे कि हमारे बीच में एक बड़ा भविष्यद्वक्ता उठा है, और परमेश्वर ने अपने लोगों पर कृपा दृष्टि की है।

3. Luke 7 : 6 (to Jesus), 11 (went into)-16

6     Then Jesus

11 ...went into a city called Nain; and many of his disciples went with him, and much people.

12     Now when he came nigh to the gate of the city, behold, there was a dead man carried out, the only son of his mother, and she was a widow: and much people of the city was with her.

13     And when the Lord saw her, he had compassion on her, and said unto her, Weep not.

14     And he came and touched the bier: and they that bare him stood still. And he said, Young man, I say unto thee, Arise.

15     And he that was dead sat up, and began to speak. And he delivered him to his mother.

16     And there came a fear on all: and they glorified God, saying, That a great prophet is risen up among us; and, That God hath visited his people.

4. मरकुस 8: 22-25

22     और वे बैतसैदा में आए; और लोग एक अन्धे को उसके पास ले आए और उस से बिनती की, कि उस को छूए।

23     वह उस अन्धे का हाथ पकड़कर उसे गांव के बाहर ले गया, और उस की आंखों में थूककर उस पर हाथ रखे, और उस से पूछा; क्या तू कुछ देखता है?

24     उस ने आंख उठा कर कहा; मैं मनुष्यों को देखता हूं; क्योंकि वे मुझे चलते हुए दिखाई देते हैं, जैसे पेड़।

25     तब उस ने फिर दोबारा उस की आंखों पर हाथ रखे, और उस ने ध्यान से देखा, और चंगा हो गया, और सब कुछ साफ साफ देखने लगा।

4. Mark 8 : 22-25

22     And he cometh to Bethsaida; and they bring a blind man unto him, and besought him to touch him.

23     And he took the blind man by the hand, and led him out of the town; and when he had spit on his eyes, and put his hands upon him, he asked him if he saw ought.

24     And he looked up, and said, I see men as trees, walking.

25     After that he put his hands again upon his eyes, and made him look up: and he was restored, and saw every man clearly.

5. यूहन्ना 12: 44

44     यीशु ने पुकारकर कहा, जो मुझ पर विश्वास करता है, वह मुझ पर नहीं, वरन मेरे भेजने वाले पर विश्वास करता है।

5. John 12 : 44

44     Jesus cried and said, He that believeth on me, believeth not on me, but on him that sent me.

6. यूहन्ना 15: 7-14

7     यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो मांगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।

8     मेरे पिता की महिमा इसी से होती है, कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे।

9     जैसा पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही मैं ने तुम से प्रेम रखा, मेरे प्रेम में बने रहो।

10     यदि तुम मेरी आज्ञाओं को मानोगे, तो मेरे प्रेम में बने रहोगे: जैसा कि मैं ने अपने पिता की आज्ञाओं को माना है, और उसके प्रेम में बना रहता हूं।

11     मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि मेरा आनन्द तुम में बना रहे, और तुम्हारा आनन्द पूरा हो जाए।

12     मेरी आज्ञा यह है, कि जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो।

13     इस से बड़ा प्रेम किसी का नहीं, कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे।

14     जो कुछ मैं तुम्हें आज्ञा देता हूं, यदि उसे करो, तो तुम मेरे मित्र हो।

6. John 15 : 7-14

7     If ye abide in me, and my words abide in you, ye shall ask what ye will, and it shall be done unto you.

8     Herein is my Father glorified, that ye bear much fruit; so shall ye be my disciples.

9     As the Father hath loved me, so have I loved you: continue ye in my love.

10     If ye keep my commandments, ye shall abide in my love; even as I have kept my Father’s commandments, and abide in his love.

11     These things have I spoken unto you, that my joy might remain in you, and that your joy might be full.

12     This is my commandment, That ye love one another, as I have loved you.

13     Greater love hath no man than this, that a man lay down his life for his friends.

14     Ye are my friends, if ye do whatsoever I command you.

7. यशायाह 58: 10 (यदि)-12, 14

10     ... यदि तू उदारता से भूखे की सहायता करे और दीन दु: खियों को सन्तुष्ट करे, तब अन्धियारे में तेरा प्रकाश चमकेगा, और तेरा घोर अन्धकार दोपहर का सा उजियाला हो जाएगा।

11     और यहोवा तुझे लगातार लिए चलेगा, और काल के समय तुझे तृप्त और तेरी हड्डियों को हरी भरी करेगा; और तू सींची हुई बारी और ऐसे सोते के समान होगा जिसका जल कभी नहीं सूखता।

12     और तेरे वंश के लोग बहुत काल के उजड़े हुए स्थानों को फिर बसाएंगे; तू पीढ़ी पीढ़ी की पड़ी हुई नेव पर घर उठाएगा; तेरा नाम टूटे हुए बाड़े का सुधारक और पथों का ठीक करने वाला पड़ेगा॥

14     तो तू यहोवा के कारण सुखी होगा, और मैं तुझे देश के ऊंचे स्थानों पर चलने दूंगा; मैं तेरे मूलपुरूष याकूब के भाग की उपज में से तुझे खिलाऊंगा, क्योंकि यहोवा ही के मुख से यह वचन निकला है॥

7. Isaiah 58 : 10 (if)-12, 14

10     ...if thou draw out thy soul to the hungry, and satisfy the afflicted soul; then shall thy light rise in obscurity, and thy darkness be as the noonday:

11     And the Lord shall guide thee continually, and satisfy thy soul in drought, and make fat thy bones: and thou shalt be like a watered garden, and like a spring of water, whose waters fail not.

12     And they that shall be of thee shall build the old waste places: thou shalt raise up the foundations of many generations; and thou shalt be called, The repairer of the breach, The restorer of paths to dwell in.

14     Then shalt thou delight thyself in the Lord; and I will cause thee to ride upon the high places of the earth, and feed thee with the heritage of Jacob thy father: for the mouth of the Lord hath spoken it.

8. भजन संहिता 34: 1-4

1     मैंहर समय यहोवा को धन्य कहा करूंगा; उसकी स्तुति निरन्तर मेरे मुख से होती रहेगी।

2     मैं यहोवा पर घमण्ड करूंगा; नम्र लोग यह सुनकर आनन्दित होंगे।

3     मेरे साथ यहोवा की बड़ाई करो, और आओ हम मिलकर उसके नाम की स्तुति करें।

4     मैं यहोवा के पास गया, तब उसने मेरी सुन ली, और मुझे पूरी रीति से निर्भय किया।

8. Psalm 34 : 1-4

1     I will bless the Lord at all times: his praise shall continually be in my mouth.

2     My soul shall make her boast in the Lord: the humble shall hear thereof, and be glad.

3     O magnify the Lord with me, and let us exalt his name together.

4     I sought the Lord, and he heard me, and delivered me from all my fears.



विज्ञान और स्वास्थ्य


1. 120: 4-6

आत्मा या आत्मा, ईश्वर, अपरिवर्तनीय और शाश्वत है; और मनुष्य आत्मा, ईश्वर के साथ सह-अस्तित्व रखता है, क्योंकि मनुष्य ईश्वर की छवि है।

1. 120 : 4-6

Soul, or Spirit, is God, unchangeable and eternal; and man coexists with and reflects Soul, God, for man is God's image.

2. 60: 29-1

आत्मा के पास आत्मा को प्राप्त करने के लिए अनंत संसाधन हैं, और खुशी अधिक आसानी से प्राप्त की जाएगी और हमारे रखने में अधिक सुरक्षित होगी, अगर आत्मा में मांग की जाए। अकेले उच्च आनंद अमर आदमी के लालसा को संतुष्ट कर सकते हैं।

2. 60 : 29-1

Soul has infinite resources with which to bless mankind, and happiness would be more readily attained and would be more secure in our keeping, if sought in Soul. Higher enjoyments alone can satisfy the cravings of immortal man.

3. 467: 1-16

प्रश्न। — आत्मा के विज्ञान की क्या मांगें हैं?

उत्तर। —इस विज्ञान की पहली मांग है, "दूसरों को ईश्वर करके न मानना॥" यह "मैं" आत्मा है। इसलिए आज्ञा का यह अर्थ है: आपके पास कोई बुद्धि नहीं है, कोई जीवन नहीं है, कोई पदार्थ नहीं है, कोई सत्य नहीं है, कोई प्रेम नहीं है, इसके अलावा जो आध्यात्मिक है। दूसरा उसके जैसा है, "तू अपने पड़ोसी से अपने जैसा प्रेम रखना।" यह अच्छी तरह समझा जाना चाहिए कि सभी पुरुषों का एक मन, एक ईश्वर और पिता, एक जीवन, सत्य और प्रेम होता है। यह तथ्य स्पष्ट होते ही मानव जाति अनुपात में परिपूर्ण हो जाएगी, युद्ध बंद हो जाएगा और मनुष्य का सच्चा भाईचारा स्थापित हो जाएगा। कोई अन्य देवता नहीं, कोई दूसरा नहीं, बल्कि एक ही मार्गदर्शक का मन, मनुष्य ईश्वर की समानता है, शुद्ध और शाश्वत है, और उसके पास वह मन है जो मसीह में भी था।

3. 467 : 1-16

Question. — What are the demands of the Science of Soul?

Answer. — The first demand of this Science is, "Thou shalt have no other gods before me." This me is Spirit. Therefore the command means this: Thou shalt have no intelligence, no life, no substance, no truth, no love, but that which is spiritual. The second is like unto it, "Thou shalt love thy neighbor as thyself." It should be thoroughly understood that all men have one Mind, one God and Father, one Life, Truth, and Love. Mankind will become perfect in proportion as this fact becomes apparent, war will cease and the true brotherhood of man will be established. Having no other gods, turning to no other but the one perfect Mind to guide him, man is the likeness of God, pure and eternal, having that Mind which was also in Christ.

4. 62: 27-4

मनुष्य की उच्चतर प्रकृति निम्न द्वारा शासित नहीं होती; यदि ऐसा होता, तो ज्ञान का क्रम उलट जाता। जीवन के बारे में हमारे झूठे विचार शाश्वत सद्भाव को छिपाते हैं, और उन बुराइयों को जन्म देते हैं जिनकी हम शिकायत करते हैं। चूँकि नश्वर लोग भौतिक नियमों में विश्वास करते हैं और मन के विज्ञान को अस्वीकार करते हैं, इसलिए यह भौतिकता को पहले और आत्मा के श्रेष्ठ नियम को अंतिम नहीं बनाता है। यदि आप अस्तित्व के विज्ञान को समझते हैं, तो आप कभी नहीं सोचेंगे कि मन को नियंत्रित करने की तुलना में श्वसन रोग को दूर करने के लिए फलालैन बेहतर था।

4. 62 : 27-4

The higher nature of man is not governed by the lower; if it were, the order of wisdom would be reversed. Our false views of life hide eternal harmony, and produce the ills of which we complain. Because mortals believe in material laws and reject the Science of Mind, this does not make materiality first and the superior law of Soul last. You would never think that flannel was better for warding off pulmonary disease than the controlling Mind, if you understood the Science of being.

5. 70: 12-4

दिव्य मन सभी पहचानों को, घास के एक ब्लेड से लेकर एक तारे तक, विशिष्ट और शाश्वत के रूप में रखता है। प्रश्न हैं: भगवान की पहचान क्या हैं? जीवात्मा क्या है? क्या जीवन या आत्मा का गठन की गई चीज में होता है?

कुछ भी वास्तविक और शाश्वत नहीं है, — कुछ भी आत्मा नहीं है, - भगवान और उनके विचार को छोड़कर। बुराई की कोई वास्तविकता नहीं है। यह न तो व्यक्ति, स्थान, न ही चीज है, लेकिन केवल एक विश्वास है, भौतिक अर्थ का भ्रम है।

5. 70 : 12-4

The divine Mind maintains all identities, from a blade of grass to a star, as distinct and eternal. The questions are: What are God's identities? What is Soul? Does life or soul exist in the thing formed?

Nothing is real and eternal, — nothing is Spirit, — but God and His idea. Evil has no reality. It is neither person, place, nor thing, but is simply a belief, an illusion of material sense.

6. 114: 23-31

क्रिश्चियन साइंस मानसिक के रूप में सभी कारणों और प्रभाव को बताता है, शारीरिक नहीं। यह आत्मा और शरीर से रहस्य का पर्दा उठाता है। यह भगवान के लिए मनुष्य के वैज्ञानिक संबंध को दर्शाता है, जा रहा है की अंतरनिहित अस्पष्टताओं को हटा देता है, और कैद किए गए विचारों को मुक्त करता है। दिव्य विज्ञान में, मनुष्य सहित ब्रह्मांड, आध्यात्मिक, सामंजस्यपूर्ण और शाश्वत है। विज्ञान दर्शाता है कि जिसे पदार्थ कहा गया है, वह लेखक द्वारा नश्वर मन की व्यक्तिपरक अवस्था है।

6. 114 : 23-31

Christian Science explains all cause and effect as mental, not physical. It lifts the veil of mystery from Soul and body. It shows the scientific relation of man to God, disentangles the interlaced ambiguities of being, and sets free the imprisoned thought. In divine Science, the universe, including man, is spiritual, harmonious, and eternal. Science shows that what is termed matter is but the subjective state of what is termed by the author mortal mind.

7. 119: 29 (क्रिश्चियन)-3

इसलिए ईसाई विज्ञान आत्मा और शरीर के प्रतीत होने वाले संबंध को उलट देता है और शरीर को मन की सहायक बनाता है। इस प्रकार यह मनुष्य के साथ है, जो संयमशील मन का विनम्र सेवक है, हालांकि यह समझदारी को अन्यथा प्रकट करता है। लेकिन हम इसे कभी नहीं समझेंगे जबकि हम स्वीकार करते हैं कि आत्मा शरीर या मन में है, और वह आदमी गैर-बुद्धि में शामिल है।

7. 119 : 29 (Christian)-3

Christian Science reverses the seeming relation of Soul and body and makes body tributary to Mind. Thus it is with man, who is but the humble servant of the restful Mind, though it seems otherwise to finite sense. But we shall never understand this while we admit that soul is in body or mind in matter, and that man is included in non-intelligence.

8. 89: 18-24

जरूरी नहीं कि मन शैक्षिक प्रक्रियाओं पर निर्भर हो। यह अपने आप में सभी सुंदरता और कविता, और उन्हें व्यक्त करने की शक्ति रखता है। आत्मा, ईश्वर, तब सुनाई देता है जब इंद्रियाँ चुप हो जाती हैं। हम जितना करते हैं उससे कहीं अधिक हम सभी सक्षम हैं। आत्मा का प्रभाव या क्रिया एक स्वतंत्रता प्रदान करती है, जो कि अविवेक की घटनाओं और असभ्य होंठों के उत्साह की व्याख्या करती है।

8. 89 : 18-24

Mind is not necessarily dependent upon educational processes. It possesses of itself all beauty and poetry, and the power of expressing them. Spirit, God, is heard when the senses are silent. We are all capable of more than we do. The influence or action of Soul confers a freedom, which explains the phenomena of improvisation and the fervor of untutored lips.

9. 125: 12-20

जैसे-जैसे मानव विचार एक अवस्था से दूसरे चरण में बदलता है, दर्द और दर्द रहितता, दुःख और आनन्द, - भय से आशा और विश्वास से समझ तक, - दृश्य अभिव्यक्ति अंतिम रूप से मनुष्य द्वारा शासित होगी, भौतिक अर्थ से नहीं। भगवान की सरकार को दर्शाते हुए, मनुष्य स्व-शासित है। जब दिव्य आत्मा के अधीन होते हैं, तो मनुष्य को पाप या मृत्यु से नियंत्रित नहीं किया जा सकता है, इस प्रकार स्वास्थ्य के नियमों के बारे में हमारी सामग्री सिद्ध होती है।

9. 125 : 12-20

As human thought changes from one stage to another of conscious pain and painlessness, sorrow and joy, — from fear to hope and from faith to understanding, — the visible manifestation will at last be man governed by Soul, not by material sense. Reflecting God's government, man is self-governed. When subordinate to the divine Spirit, man cannot be controlled by sin or death, thus proving our material theories about laws of health to be valueless.

10. 481: 24-32

यदि आत्मा पाप करती है, तो उसे नश्वर होना चाहिए। पाप में आत्म-विनाश के तत्व होते हैं। यह स्वयं को कायम नहीं रख सकता। यदि पाप का समर्थन किया जाता है, तो ईश्वर को उसका समर्थन करना होगा, और यह असंभव है, क्योंकि सत्य त्रुटि का समर्थन नहीं कर सकता। जीवात्मा मनुष्य का दिव्य सिद्धांत है और कभी पाप नहीं करता, - इसलिए जीवात्मा की अमरता है। विज्ञान में हम सीखते हैं कि यह भौतिक अर्थ है, न कि जो पाप है; और यह पाया जाएगा कि यह पाप का बोध है जो खो गया है, और पापपूर्ण पाप नहीं है।

10. 481 : 24-32

If Soul sins, it must be mortal. Sin has the elements of self-destruction. It cannot sustain itself. If sin is supported, God must uphold it, and this is impossible, since Truth cannot support error. Soul is the divine Principle of man and never sins, — hence the immortality of Soul. In Science we learn that it is material sense, not Soul, which sins; and it will be found that it is the sense of sin which is lost, and not a sinful soul.

11. 14: 12-22

एक क्षण के लिए सचेत हो जाएं कि जीवन और बुद्धि विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक है, - न तो भौतिक में और न ही भौतिक के साथ, - और शरीर तब कोई शिकायत नहीं करेगा। यदि बीमारी में विश्वास से पीड़ित हैं, तो अचानक आप खुद को स्वस्थ पाएंगे। शरीर को आध्यात्मिक जीवन, सत्य और प्रेम द्वारा नियंत्रित किए जाने पर दु: ख को आनंद में बदल दिया जाता है। इसलिए यीशु की प्रतिज्ञा की आशा पूरी हुई: "जो मुझ पर विश्वास रखता है, ये काम जो मैं करता हूं वह भी करेगा ... क्योंकि मैं पिता के पास जाता हूं," — [क्योंकि अहंकार शरीर से अनुपस्थित है, और सत्य और प्रेम के साथ मौजूद है।] प्रभु की प्रार्थना आत्मा की प्रार्थना है, भौतिक अर्थ की नहीं।

11. 14 : 12-22

Become conscious for a single moment that Life and intelligence are purely spiritual, — neither in nor of matter, — and the body will then utter no complaints. If suffering from a belief in sickness, you will find yourself suddenly well. Sorrow is turned into joy when the body is controlled by spiritual Life, Truth, and Love. Hence the hope of the promise Jesus bestows: "He that believeth on me, the works that I do shall he do also; ... because I go unto my Father," — [because the Ego is absent from the body, and present with Truth and Love.]

12. 9: 17-24

क्या आप "अपने भगवान को अपने प्रभु और अपने सभी प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रखते हैं"? इस आदेश में बहुत कुछ शामिल है, यहां तक कि सभी भौतिक संवेदना, स्नेह और पूजा का समर्पण भी। यह ईसाई धर्म का एल डोराडो है। इसमें जीवन का विज्ञान शामिल है, और केवल आत्मा के दिव्य नियंत्रण को मान्यता देता है, जिसमें आत्मा हमारा स्वामी है, और भौतिक अर्थ और मानव का कोई स्थान नहीं होगा।

12. 9 : 17-24

Dost thou "love the Lord thy God with all thy heart, and with all thy soul, and with all thy

mind"? This command includes much, even the surrender of all merely material sensation, affection, and worship. This is the El Dorado of Christianity. It involves the Science of Life, and recognizes only the divine control of Spirit, in which Soul is our master, and material sense and human will have no place.

13. 14: 25-30

भौतिक समझ के विश्वास और सपने से पूरी तरह से अलग, आध्यात्मिक समझ और पूरी पृथ्वी पर मनुष्य के प्रभुत्व की चेतना को प्रकट करके, जीवन दिव्य है। यह समझ त्रुटि निकालती है और बीमारों को चंगा करता है, और इसके साथ आप "धिकारी की नान" बोल सकते हैं।

13. 14 : 25-30

Entirely separate from the belief and dream of material living, is the Life divine, revealing spiritual understanding and the consciousness of man's dominion over the whole earth. This understanding casts out error and heals the sick, and with it you can speak "as one having authority."


दैनिक कर्तव्यों

मैरी बेकर एड्डी द्वारा

दैनिक प्रार्थना

प्रत्येक दिन प्रार्थना करने के लिए इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा: "तुम्हारा राज्य आओ;" ईश्वरीय सत्य, जीवन और प्रेम के शासन को मुझमें स्थापित करो, और मुझ पर शासन करो; और तेरा वचन सभी मनुष्यों के स्नेह को समृद्ध कर सकता है, और उन पर शासन करो!

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 4

उद्देश्यों और कृत्यों के लिए एक नियम

न तो दुश्मनी और न ही व्यक्तिगत लगाव मदर चर्च के सदस्यों के उद्देश्यों या कृत्यों को लागू करना चाहिए। विज्ञान में, दिव्य प्रेम ही मनुष्य को नियंत्रित करता है; और एक क्रिश्चियन साइंटिस्ट प्यार की मीठी सुविधाओं को दर्शाता है, पाप में डांटने पर, सच्चा भाईचारा, परोपकार और क्षमा में। इस चर्च के सदस्यों को प्रतिदिन ध्यान रखना चाहिए और प्रार्थना को सभी बुराईयों से दूर करने, भविष्यद्वाणी, न्याय करने, निंदा करने, परामर्श देने, प्रभावित करने या गलत तरीके से प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 1

कर्तव्य के प्रति सतर्कता

इस चर्च के प्रत्येक सदस्य का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन आक्रामक मानसिक सुझाव से बचाव करे, और भूलकर भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपने नेता और मानव जाति के लिए। उनके कामों से उन्हें आंका जाएगा, — और वह उचित या निंदनीय होगा।

चर्च मैनुअल, लेख VIII, अनुभाग 6